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Wednesday, August 22, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने चंडीगढ़ गए रतन सिंह यादव अपनी ससुराल के लिए समय न निकाल पाने की बात कह कर भारी फजीहत का शिकार हुए

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने चंडीगढ़ पहुँचे रतन सिंह यादव को सोशल मीडिया में कही गई अपनी ही एक बात के कारण खासी मुसीबत और फजीहत झेलना पड़ रही है । अपने चुनाव प्रचार के लिए चंडीगढ़ रवाना होने से पहले रतन सिंह यादव ने सोशल मीडिया पर एक कमेंट लिखा, जिसे पढ़कर लोगों को पता चला कि चंडीगढ़ में उनकी ससुराल है, लेकिन जहाँ वह जा/आ नहीं पाते हैं और इसे लेकर उनकी ससुराल वालों को उनसे शिकायत रहती है । रतन सिंह यादव का यह कहना ही उनके लिए भारी मुसीबत बन गया । चंडीगढ़ में कई लोगों ने उनसे पूछा कि आपके पास जब अपनी ससुराल वालों के लिए समय नहीं है, जिन्होंने आपको अपनी लड़की दी है - तो हमारे लिए आपके पास समय कैसे होगा, हम तो आपके कुछ लगते भी नहीं हैं ? रतन सिंह यादव से लोगों ने वहाँ पूछा कि अपने जीवन को संपूर्णता देने के लिए जीवनसंगिनी लेने जब आप ससुराल आए होंगे, तब तो खूब समय निकाल कर रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ आए होंगे; लेकिन अपना काम निकल जाने के बाद ससुराल वालों को दिखाने/जताने/बताने लगे कि आपके पास उनके लिए तो समय ही नहीं है - ऐसे में, इस बात की क्या गारंटी है कि हमारा वोट लेकर अपना काम निकाल लेने के बाद आप हमें भी दिखाने/जताने/बताने नहीं लगोगे कि हमारे लिए तो आपके पास समय ही नहीं है ? लोगों ने उनसे पूछा कि आपके इस अहसानफरामोशी वाले रवैये को देखते हुए हम वही गलती क्यों करें, जो आपकी ससुराल वालों ने की - जो बेचारे आपके आने का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन जिनके लिए आपके पास समय ही नहीं है ? 
रतन सिंह यादव को उम्मीद नहीं थी, कि यूँ ही अपनी बात में थोड़ा मजाक भरने की कोशिश के चलते उन्हें ऐसी फजीहत का शिकार होना पड़ेगा । लोगों के सवालों को उन्होंने मजाक में उड़ाने/टालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन लोगों को भी जैसे उनकी खिल्ली उड़ाने और खिंचाई करने का मौका मिल गया और उन्होंने रतन सिंह यादव की जमकर फजीहत की । चंडीगढ़ में हुई उनकी फजीहत की बात जब दिल्ली में उनके साथियों व अन्य लोगों को पता चली, तो उनका कहना रहा कि रतन सिंह यादव बेवकूफीभरी बातों के कारण अक्सर ही मजाक का विषय बनता रहता है, लेकिन फिर भी सबक नहीं सीखता है और न जाने कैसी कैसी बकवास करता रहता है । उनके कुछेक नजदीकियों ने ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि उन्होंने रतन सिंह यादव को कई बार समझाया है कि थोड़ा कम बोला/लिखा कर, और बोलने/लिखने से पहले थोड़ा सोच/विचार कर लिया कर - लेकिन सोच/विचार करने से तो लगता है कि उसका पुराना बैर है और वह सोचने/विचारने की तो जैसे कोई जरूरत ही नहीं समझता है । रतन सिंह यादव के शुभचिंतकों का कहना है कि उन्होंने अपने साथ अपने ही जैसे लोग भी जोड़े हुए हैं, जो बिना सोचे/समझे कुछ भी बोलते रहते हैं । पिछले चुनाव के दौरान उनके एक घनघोर समर्थक ने उनकी उपलब्धियों को बखान करने के जोश में होश खोते हुए दावा किया कि वह इंस्टीट्यूट की कई कमेटियों में सदस्य रहे हैं; किसी ने पूछ लिया कि कृपया बताइये कि रतन सिंह यादव कौन कौन सी कमेटियों में सदस्य रहे हैं ? उस जोशीले समर्थक को तो जैसे साँप सूँघ गया, वह बेचारा क्या बताता ? रतन सिंह यादव ने मामले को सँभालने की बजाये यह कहते/कमेंट करते हुए हुए मामले को और हास्यास्पद बना दिया कि मैं अभी चुनाव प्रचार में व्यस्त हूँ, चुनाव हो जाने के बाद मैं बताऊँगा कि मैं इंस्टीट्यूट की किन किन कमेटियों में रहा हूँ ।
रतन सिंह यादव के नजदीकियों का कहना/बताना है कि फालतू और बेमतलब की बातें करने के साथ-साथ ऊँची ऊँची हाँकने तथा जुमलेबाजी करने का रतन सिंह यादव को जो शौक है, उसके कारण उन्होंने अपना मजाक बनवाया हुआ है । पिछले कुछेक महीनों में ही वह एक तरफ तो न्याय की और आदर्श की बड़ी बड़ी बातें करते/लिखते सुने गए हैं, और दूसरी तरफ रीजनल काउंसिल में होने वाली बेईमानियों और बदतमीजियों के लिए जिम्मेदार लोगों के समर्थन में खड़े दिखते रहे हैं । पिछले वर्ष राकेश मक्कड़ के चेयरमैन-वर्ष में रीजनल काउंसिल में बेईमानियों और बदतमीजियों के कई किस्से हुए, लेकिन मजाल है कि किसी भी मामले में रतन सिंह यादव ने मुँह खोला हो; हालाँकि मुँह तो उन्होंने कई बार खोला, लेकिन हर बार राकेश मक्कड़ का बचाव करने के लिए । दरअसल रतन सिंह यादव को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राकेश मक्कड़ का समर्थन चाहिए, इसलिए उन्होंने चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ की हर बेईमानी और हरकत पर या तो चुप्पी साध ली और या उनका बचाव किया । कई मौकों पर तो उन्होंने राकेश मक्कड़ की बेईमानी व बदतमीजी का विरोध करने वाले लोगों को ही निशाने पर लेने की कोशिश की । रतन सिंह यादव के इस दोहरे चरित्र को देखते हुए ही कई लोगों ने कहना शुरू किया कि रतन सिंह यादव यदि चुनाव जीत कर रीजनल काउंसिल में आ भी गए, तो इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन का उससे ज्यादा ही नुकसान पहुँचायेंगे, जितना राकेश मक्कड़ ने पहुँचाया है । रतन सिंह यादव को जानने वाले लोगों का ही कहना है कि रतन सिंह यादव अपनी बातों और अपनी हरकतों से अपना असली 'चरित्र' बताते/दिखाते रहते हैं, जिसमें उन्हें उनकी जीवनसंगिनी देने वाले परिवार के लिए तो उनके पास समय नहीं है, लेकिन इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को कलंकित करने वाले राकेश मक्कड़ की 'सेवा' के लिए वह हर समय तैयार खड़े मिले/दिखे हैं । अपनी बातों और अपने व्यवहार से रतन सिंह यादव ने अपने ही चुनाव को खासा चुनौतीपूर्ण बना लिया है ।

Saturday, August 18, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी करने तथा प्रेसीडेंट बनने के नाम पर चुनाव में उतरे अतुल गुप्ता अपने अवसरवादी व घमंडी व्यवहार से तथा प्रशासनिक अक्षमता की पोल खुलने के कारण मुसीबत में फँसे

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में छठवाँ वर्ष गुजार रहे अतुल गुप्ता को हाल-फिलहाल के दिनों में जिस तरह की प्रतिकूल स्थितियों और आरोपों-शिकायतों का सामना करना पड़ा है, उसने उन्हें सेंट्रल काउंसिल में अपने पुनर्निर्वाचन के प्रति शंकालु बना दिया है; और अपनी ही शंका को दूर करने के लिए उन्होंने सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अपनी सक्रियताओं व उपलब्धियों को लेकर एक लंबा-चौड़ा खत लिखा और लोगों को भेजा है । अतुल गुप्ता के इस खत को लेकर भी लोग मजे ले रहे हैं और चर्चा कर रहे हैं कि अतुल गुप्ता की सक्रियता व उपलब्धियाँ इतनी 'खुफिया' रही हैं क्या, कि किसी को दिखी ही नहीं - और इसीलिए अपनी सक्रियताओं व उपलब्धियों के बारे में उन्हें लोगों को बताना पड़ रहा है । अतुल गुप्ता ने अपने इस खत में 'प्रोफेशन की समृद्धि के लिए मिलजुल कर काम करने' के सिद्धांत को अपनी प्रेरणा के रूप में रेखांकित किया है । लोगों का कहना है कि अतुल गुप्ता काश इस सिद्धांत को व्यवहार में भी उतार पाते, तो उन्हें अपने ही साथी/सहयोगी रहे लोगों के विरोध और आरोप नहीं देखने/सुनने पड़ते । मजे की बात यह है कि एक तरफ तो अतुल गुप्ता की पहचान एक 'पढ़े-लिखे' और 'विषयों' को गंभीरता से समझने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट की रही है, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें बहुत स्वार्थी, घमंडी और अवसरवादी व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है । उनकी खूबियों के कारण बहुत से, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उनसे प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़े; लेकिन जल्दी ही जब उन्होंने अतुल गुप्ता का स्वार्थी, घमंडी और अवसरवादी रूप देखा - तो उन्होंने अतुल गुप्ता के खिलाफ होने में भी देर नहीं लगाई । शुरू के वर्षों में तो अतुल गुप्ता अपने व्यवहार के चलते पैदा हुई नाराजगी को मैनेज करने में सफल रहे, लेकिन समय बढ़ने के साथ-साथ उनके खिलाफ लोगों का, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का गुस्सा उनके खिलाफ और मुखर व संगठित होता गया है ।
इसी का नतीजा रहा कि अंबाला, भटिंडा, लुधियाना, जालंधर आदि में अतुल गुप्ता को अपने ही साथी/सहयोगी रहे लोगों, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से खूब खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी । लोगों ने इस बात को लेकर सवाल पूछे और नाराजगी दिखाई कि पिछले चुनाव से पहले उन्होंने रेलवे का काम आने/निकलने का वास्ता देकर लोगों को काम मिलने/दिलवाने का जो वायदा किया था, बाद में उसकी सुध लेने की कोशिश उन्होंने क्यों नहीं की ? उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव से पहले अतुल गुप्ता ने लोगों को, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रेलवे का काम मिलने/दिलवाने का वास्ता देकर खूब वोट बटोरे थे । उन्हें वोट देने वाले तथा उनकी उम्मीदवारी को वोट दिलवाने के लिए रात-दिन एक करने वाले लोगों ने बाद में लेकिन अपने आप को ठगा हुआ पाया । कईयों की शिकायत रही कि चुनाव के बाद तो अतुल गुप्ता सीधे मुँह बात तक नहीं करने को तैयार होते थे, तथा उनके वायदे की याद दिलाने पर बदतमीजी और करने लगते थे । अपने घमंडी और अवसरवादी व्यवहार के चलते अतुल गुप्ता को चंडीगढ़ में तो बहुत ही बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा । चंडीगढ़ में नॉर्दर्न रीजन की पहली फोरेंसिक लैब के उद्घाटन अवसर पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के साथ अतुल गुप्ता भी इस उम्मीद में गए कि वहाँ उन्हें बड़ी भीड़ के सामने बोलने का मौका मिलेगा, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अतुल गुप्ता का जब बोलने का नंबर आया तो सुनने वालों की संख्या कुल दस/बारह के करीब थी । हालाँकि उक्त कार्यक्रम ही बुरी तरह फ्लॉप रहा । प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के बोलते समय उपस्थित लोगों की संख्या मुश्किल से सौ के करीब थी, जिनमें आधे के लगभग छात्र थे । अतुल गुप्ता के लिए शर्मनाक स्थिति यह बनी/रही कि उन्हें तो एक अच्छे वक्ता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन फिर भी उनको सुनने में किसी ने दिलचस्पी नहीं ली । कुछेक लोगों ने कहा भी कि उन्होंने पहचान लिया है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अतुल गुप्ता एक बहुत मतलबी और धोखेबाज व्यक्ति है, ऐसे व्यक्ति की बातों को सुनने का क्या फायदा ?
अतुल गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि जब चंडीगढ़ में उन्हें सुनने के लिए दस/बारह लोग भी 'मजबूरी' में जुटे, लगभग उसी समय उसी चंडीगढ़ में आयोजित हुई सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में तीन सौ के करीब लोग थे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन सुधीर अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार हैं । उनकी मीटिंग में इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे । सुधीर अग्रवाल की मीटिंग की सफलता के शोर के बीच अतुल गुप्ता को श्रोता न मिलने से जो झटका लगा, उसने वास्तव में अतुल गुप्ता की बुरी हालत का ही सुबूत पेश किया है । इस बीच, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सेक्रेटरी पूजा अग्रवाल बंसल ने सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में प्रस्तुत की गई अपनी उपलब्धियों की रिपोर्ट में रीजनल काउंसिल के स्टॉफ के प्रोवीडेंट फंड व सर्विस टैक्स से जुड़ी वर्ष 2010-11 से चली आ रही समस्या के हल के लिए किए गए उपाय का जिक्र करके अतुल गुप्ता की प्रशासनिक क्षमता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010-11 में अतुल गुप्ता नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे; चेयरमैन के रूप में स्टॉफ की नियुक्ति और उनके अधिकारों से जुड़े कामों की व्यवस्था के लिए अतुल गुप्ता ने एक बेंडर की नियुक्ति की थी, जो स्टाफ के प्रोवीडेंट फंड व सर्विस टैक्स के करीब 25 लाख रुपए लेकर भाग गया था । अतुल गुप्ता अपनी तीन-तिकड़मों से उस बेंडर के खिलाफ कार्रवाई को टलवाते रहे और इंस्टीट्यूट को करीब 25 लाख रुपए की चपत की बात को छिपाए रखने/रखवाने में सफल रहे; लेकिन दो वर्ष पहले कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में काम करते हुए पूजा अग्रवाल बंसल ने वर्षों से लटके चल रहे इस मामले में कार्रवाई की । अपनी कार्रवाई को अपनी उपलब्धियों में शामिल करने और उसे लोगों के सामने लाने की पूजा अग्रवाल बंसल की कार्रवाई ने वास्तव में अतुल गुप्ता की प्रशासनिक अक्षमता को सामने लाने का काम किया है, और इस तरह अतुल गुप्ता के लिए फजीहत वाली स्थिति बनाई है ।
अतुल अग्रवाल इस बार का चुनाव इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट बनने के नाम पर लड़ रहे हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उनके द्वारा की गई 'घपलेबाजी' और फिर उसे छिपाने को लेकर की गई उनकी कार्रवाई ने लेकिन उनकी अक्षमताओं की जो पोल खोली है, उससे उनके सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है । अपने आपको चारों तरफ से संकटों और मुसीबतों से घिरा पाकर अतुल गुप्ता ने अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों का सहारा लेने की सोची है, और लोगों के बीच उनका लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है । अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों के विवरण से अतुल गुप्ता अपने अवसरवादी और घमंडी व्यवहार से पैदा हुई मुसीबतों का मुकाबला सचमुच कर सकेंगे क्या - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Tuesday, August 13, 2013

पवन बंसल कांड में सुनील गुप्ता के ‘पकड़े’ जाने के बाद, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनावी खिलाडि़यों को चंडीगढ़ में अब दूसरे ठिकाने खोजने/बनाने होंगे क्या ?

चंडीगढ़ । रेलमंत्री के रूप में पवन बंसल की कारस्तानियों की पोल खुलने से इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल व नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए चंडीगढ़ में वोट जुटाने की समस्या पैदा हो गई है । दरअसल पवन बंसल अकेले नहीं डूबे हैं, वह अपने साथ सुनील गुप्ता को भी ले डूबे हैं । सुनील गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, और पवन बंसल के साथ उनकी मिलीभगत के तथ्य सामने आये हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में सुनील गुप्ता की चंडीगढ़ में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में खासी धाक रही है । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नार्दर्न रीजन में  सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के जिन उम्मीदवारों को चंडीगढ़ में वोट जुटाने होते हैं, उसके लिए सबसे पहले सुनील गुप्ता के यहाँ माथा टेकना जरूरी माना जाता रहा है । सुनील गुप्ता ने भी प्रायः किसी को निराश नहीं किया है । उनका ‘कारोबार’ दरअसल इतना फैला हुआ रहा है कि वह हर किसी की ‘मदद’ करने में समर्थ रहे हैं । कुछेक लोग हालाँकि कहते रहे हैं कि सुनील गुप्ता मदद नहीं करते, बल्कि मदद का झांसा देते हैं । अब सच चाहे जो हो, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में सुनील गुप्ता का जलवा तो रहा है और वह ‘दिखता’ भी रहा है । एसपी बबूटा की राजनीतिक दुर्गति होने के बाद तो सुनील गुप्ता का जलवा और बढ़ा ही - क्योंकि एसपी बबूटा की राजनीतिक दुर्गति के लिए सुनील गुप्ता को ही जिम्मेदार माना/पहचाना गया था, जिससे सुनील गुप्ता के राजनीतिक भाव और बढ़े ।
मजे की बात यह है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में एसपी बबूटा को आगे बढ़ाने का श्रेय भी सुनील गुप्ता को ही दिया जाता है । वर्ष 1996-97 में जब सुनील गुप्ता चंडीगढ़ ब्रांच के चेयरमैन थे, तो ब्रांच में सेक्रेटरी का पद एसपी बबूटा के पास ही था । एसपी बबूटा चंडीगढ़ ब्रांच में चेयरमैन वर्ष 2002-03 में बन पाये, जब सुनील गुप्ता ने दिलचस्पी ली । सुनील गुप्ता के दिलचस्पी लेने के बाद ही एसपी बबूटा नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चुने जा सके थे । एसपी बबूटा को जिन सुनील गुप्ता ने धूल से उठाया था, उन्हीं सुनील गुप्ता ने फिर वापस धूल में मिला दिया, तो इसका कारण सिर्फ यह रहा कि रीजनल काउंसिल में चुने जाने के बाद एसपी बबूटा ने चंडीगढ़ में सुनील गुप्ता की ‘जगह’ लेने की कोशिश की; अपनी इस कोशिश के कारण एसपी बबूटा को ऐसी बुरी मात खानी पड़ी कि उसके चलते उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति से बाहर ही हो जाना पड़ा । यह प्रसंग इसलिए और भी उल्लेखनीय है कि एसपी बबूटा चंडीगढ़ ब्रांच में जिस वर्ष सुनील गुप्ता से बर्चस्व की निर्णायक लड़ाई लड़ रहे थे, उसमें उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के तत्कालीन प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा का खुला समर्थन प्राप्त था, लेकिन फिर भी सुनील गुप्ता ने उनका ऐसा बाजा बजाया कि एसपी बबूटा के लिए खड़े रह पाना तक मुश्किल हो गया और अंततः उन्हें समर्पण के लिए ही मजबूर होना पड़ा । एसपी बबूटा से निपटने के लिए सुनील गुप्ता ने जो जाल बिछाया, उसमें चंडीगढ़ ब्रांच के अधिकतर पूर्व चेयरमैन सुनील गुप्ता के पक्ष में थे और एसपी बबूटा चंडीगढ़ में लगभग अकेले पड़ गये । एसपी बबूटा के उत्थान और पतन में सुनील गुप्ता की जो भूमिका थी, और इस भूमिका को उन्होंने जिस तरह निभाया उससे उनकी पहचान रॉबिनहुड जैसी बनी । उनकी इसी पहचान के कारण चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की राजनीति में दिल्ली का हर सूरमा चंडीगढ़ पहुँच कर सुनील गुप्ता के सामने भीगी बिल्ली ही बना नजर आता । सुनील गुप्ता भी हर किसी की मदद ‘करते’। चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के चुनाव के समय चंडीगढ़ में जो हैसियत सुनील गुप्ता की होती है, वह चंडीगढ़ में और या दूसरे किसी शहर में और किसी को नसीब नहीं हुई है ।
लेकिन रेलमंत्री के रूप में पवन बंसल की कारस्तानियों के उजागर होने और पवन बंसल की कारस्तानियों में सुनील गुप्ता की मिलीभगत होने के तथ्यों ने सुनील गुप्ता की उक्त हैसियत के बने रहने पर सवाल खड़ा कर दिया है । चंडीगढ़ में सुनील गुप्ता के नजदीक रहे लोगों का ही कहना है कि सुनील गुप्ता ने बिजनेस का लालच देकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने साथ जोड़ा हुआ था, जिसमें अब उनके लिए मुश्किल आयेगी । इन्हीं नजदीकियों का कहना है कि सुनील गुप्ता के राजनीतिक लोगों से अच्छे कामकाजी संबंध रहे हैं, और अपने इन संबंधों के कारण वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के काम भी आते रहे हैं । किन्हीं किन्हीं मौकों पर वह जिस तरह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के काम आये हैं, उनके किस्से इस तरह प्रचारित हुए कि सुनील गुप्ता की छवि ‘पहुँच वाले’ और ‘काम आने वाले’ व्यक्ति की बनी । सुनील गुप्ता पर्दे के पीछे से पूरी राजनीति करते रहे, लेकिन पर्दे के सामने आने की उन्होंने कभी कोई खास कोशिश नहीं की - इसका नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा रखने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से उनका सीधा टकराव नहीं हुआ; और जब-जब उन्हें जरूरत हुई, चंडीगढ़ के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स नेता उनके साथ खड़े हुए । रेलमंत्री के रूप में पवन बंसल की कारस्तानियों की जो पोल खुली और पवन बंसल के साथ सुनील गुप्ता की मिली भगत के जो तथ्य सामने आये हैं, उनसे सुनील गुप्ता को दो तरफा नुकसान हुआ है । एक तरफ तो पवन बंसल के खुले और छिपे कारोबार में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम दिलवाने की सुनील गुप्ता की हैसियत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा; और दूसरी तरफ चंडीगढ़ की राजनीति में पवन बंसल के जिन राजनीतिक विरोधियों के साथ सुनील गुप्ता के कारोबारी किस्म के संबंध थे, वह प्रभावित होंगे । दरअसल अभी तक चंडीगढ़ में यह तो जाना/पहचाना जाता था कि सुनील गुप्ता के पवन बंसल के साथ गहरे संबंध हैं, लेकिन इसका अंदाजा लोगों को नहीं था कि यह संबंध ‘कितने’ गहरे हैं । इस ‘गहराई’ का पवन बंसल के परिवार की कंपनियों में सुनील गुप्ता के ऑडीटर होने की बात से उतना अंदाजा नहीं लगता, जितना पवन बंसल के परिवार की कंपनियों में सुनील गुप्ता की पत्नी के डायरेक्टर होने के तथ्य के उजागर होने से लगता है । पवन बंसल के परिवार की कंपनियों में यदि सुनील गुप्ता की पत्नी को भी डायरेक्टर का पद मिला है, तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पवन बंसल के खुले और ‘छिपे’ कारोबार में सुनील गुप्ता की किस हद तक की ‘हिस्सेदारी’ होगी ।
इस ‘हिस्सेदारी’ के खुलासे ने और पवन बंसल के गर्दिश में जाने के कारण सुनील गुप्ता पर चैतरफा मार पड़ी है । हालाँकि उनके नजदीकियों का कहना है कि सुनील गुप्ता के कई सत्ताधारी नेताओं के साथ नजदीकी और ‘कारोबारी’ संबंध हैं, इसलिए पवन बंसल कांड के कारण सुनील गुप्ता को कोई खास नुकसान नहीं होने वाला है । कुछेक अन्य लोगों का मानना और कहना लेकिन है कि ‘कारोबार’ संबंधी नुकसान सुनील गुप्ता को भले ही न हो, लेकिन इससे उनके राजनीतिक ऑरा (आभामंडल) पर प्रतिकूल असर अवश्य ही पड़ा है । चंडीगढ़ ब्रांच में सक्रिय और या रसूख रखने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर अपने ऑरा का इस्तेमाल करते हुए चंडीगढ़ की चुनावी राजनीति में अपनी चैधराहट चला पाना सुनील गुप्ता के लिए अब आसान नहीं होगा । जो पोल खुली है, ऐसा नहीं है कि उसे कोई जानता नहीं था - सभी इन बातों को पहले से जानते थे; बल्कि जानते होने के कारण ही लोग सुनील गुप्ता के नजदीक थे, या नजदीक होना चाहते थे । पोल खुल जाने के बाद लेकिन उन्हीं लोगों का रवैया और समीकरण बदल जाता है । सुनील गुप्ता और उन पर आश्रित रहने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह जानते/समझते हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रोफेशन में यह आम बात भी है । एंट्री का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ एंट्री का काम करने के कारण ही दूसरे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और उनके क्लाइंट्स जुड़े होते हैं, लेकिन आयकर विभाग की पकड़ में आने के बाद एंट्री का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट से अभी तक काम कराने वाले उसके साथी तथा अन्य लोग बचने लगते हैं । यही कहानी सुनील गुप्ता के साथ है । पवन बंसल के साथ उनकी जो नजदीकी अभी तक उनके लिए वरदान बनी हुई थी, उस नजदीकी के पकड़ में आने के बाद वही नजदीकी अब उनके लिए अभिशाप बन गई है । सुनील गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना है कि सुनील गुप्ता ने ही इस बात का रोना रोया है कि उनके जिन दूसरे सत्ताधारियों के साथ संबंध हैं, अब वह सत्ताधारी उनके साथ संबंधों को लेकर सतर्क हो गये हैं ।
सुनील गुप्ता का क्या होगा - यह हालाँकि काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि पवन बंसल की कारस्तानियों की जांच.पड़ताल किस रास्ते पर जाती है, और उनका क्या होता है ? किंतु वह सब कारोबार संबंधी बातें हैं । हम यहाँ पवन बंसल की कारस्तानियों की पोल खुलने और पवन बंसल के साथ सुनील गुप्ता की मिलीभगत के तथ्य के ‘पकड़े’ जाने के कारण इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल व रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए चंडीगढ़ में वोट जुटाने को लेकर पैदा हुई समस्या को समझने की कोशिश कर रहे हैं । सेंट्रल काउंसिल और रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति के खिलाडि़यों का मानना और कहना है कि जो हुआ है उससे सुनील गुप्ता के कारोबार पर क्या फर्क पड़ेगा, यह तो वह जानें - लेकिन उनके राजनीतिक रसूख पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ेगा । सुनील गुप्ता के लिए समस्या यह भी होगी कि वह अपने ‘कारोबार’ को संभाले या अपनी राजनीति को - ऐसे में, उनकी 'राजनीति' के ही पिछड़ने की ज्यादा संभावना है । इसका मतलब, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाडि़यों को चंडीगढ़ में अब दूसरे ठिकाने खोजने/बनाने पड़ेंगे क्या ?