Friday, September 30, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की अनुपस्थिति ने विशाल सिन्हा की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह से मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के अधिकतर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने जिस तरह से दूरी बना कर रखी, उसे देख/जान कर विशाल सिन्हा का मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने का सपना शुरू में ही चूर चूर होता नजर आ रहा है । हालाँकि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स किसी भी डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में ज्यादा संख्या में नहीं पहुँचे हैं; लेकिन लखनऊ में उनकी अनुपस्थिति पर लोगों का ध्यान इसलिए गया क्योंकि विशाल सिन्हा ने उनकी उपस्थिति को संभव बनाने के लिए एड़ी-चोटी को जोर लगाया हुआ था । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को विशाल सिन्हा की तरफ से विशेष निमंत्रण मिले थे; उनसे बार बार पूछा गया था कि वह कब लखनऊ पहुँचेंगे और कब तक लखनऊ रहना चाहेंगे; उन्हें आश्वस्त किया गया था कि लखनऊ में उनके ठहरने का बढ़िया इंतजाम किया जायेगा । इतनी बातें अन्य आमंत्रितों से नहीं की गईं थीं । विशाल सिन्हा ने अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मल्टीपल के तमाम लोगों को बुलाया हुआ था, और बहुत से लोग समारोह में पहुँचे भी थे; किंतु इस 'शो' के पीछे विशाल सिन्हा का जो वास्तविक उद्देश्य था, उस उद्देश्य को पूरा करने में जिन पदाधिकारियों की निर्णायक भूमिका होगी - उन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने विशाल सिन्हा के निमंत्रण को ठेंगा दिखा दिया ।    
विशाल सिन्हा का प्रयास दरअसल यह था कि नरेश अग्रवाल से लेकर मल्टीपल के दूसरे बड़े नेताओं तथा अन्य प्रमुख लोगों को अपने कार्यक्रम में इकट्ठा करके वह फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच अपना प्रभाव स्थापित करेंगे । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के अनुपस्थित होने के कारण विशाल सिन्हा का यह प्रयास लेकिन विफल हो गया । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के हवाले से यह बात सामने आई है कि विशाल सिन्हा के तौर-तरीकों को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच पसंद नहीं किया जा रहा है; और कोई भी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनके साथ अपना नाम नहीं जोड़ना चाहता है । कई लोगों की शिकायतें हैं कि विशाल सिन्हा इधर की बात उधर करने; फोन के स्पीकर पर दूसरों को बातें सुनवाने तथा दूसरों के द्धारा भेजी गई सूचनाओं को मनमाने तरीके से व्याख्यायित करने का काम धड़ल्ले से करते हैं - इसलिए लोग उनके साथ विश्वास का संबंध बनाने से बचते हैं । बचने की कोशिश में वह विशाल सिन्हा से दूर रहने का ही प्रयास करते हैं । इसी प्रयास के चलते अधिकतर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उनके कार्यक्रम से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/समझी । मल्टीपल के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को हर समय दरअसल यही डर बना रहता है कि उनके द्धारा कही गई किसी बात को विशाल सिन्हा दूसरों के सामने कब कहाँ पता नहीं किस रूप में पेश कर दें ।
इसके अलावा, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को चूँकि अच्छे से पता है कि विशाल सिन्हा को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संदीप सहगल का समर्थन नहीं मिलेगा; इसलिए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है । उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले संदीप सहगल को चुनाव हरवाने के लिए विशाल सिन्हा ने खूब जोर लगाया था - संदीप सहगल उस बात को कोई भूले थोड़े ही होंगे ! विशाल सिन्हा हालाँकि उन्हें पटाने और उन्हें अपने समर्थन के लिए राजी करने के लिए कोशिश तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन उनके नजदीकियों को वह जिस तरह से अपमानित करते रहते हैं - उससे बात बनती हुई दिख नहीं रही है । संदीप सहगल के खासमखास निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता को नीचा दिखाने के लिए विशाल सिन्हा ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी के साथ षड्यंत्र करके जिस तरह से लालजी वर्मा और एचएन सिंह को प्रेसीडेंट पिन दिलवाया - उससे संदीप सहगल के साथ विशाल सिन्हा की दूरी और बढ़ी ही है । अधिष्ठापन कार्यक्रम में विशाल सिन्हा यदि यह हरकत नहीं करते तो हो सकता है कि आगे चल कर संदीप सहगल का समर्थन दिलवाने में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता ही उनकी मदद करते, जिसकी संभावना अब लेकिन पूरी तरह खत्म ही हो गई है ।
विशाल सिन्हा का हर काम किस तरह बेवकूफीभरा और खुद उन्हीं को नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो रहा है - इसका एक दिलचस्प उदाहरण डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग के रवैये से देखा/पहचाना जा सकता है । अधिष्ठापन समारोह में शामिल होने लखनऊ आए विनय गर्ग को विशाल सिन्हा ने एक दिन और लखनऊ में रोका तो इसलिए ताकि वह अगले दिन पड़ने वाले अपने जन्मदिन की पार्टी विनय गर्ग के साथ भी मना लें; विशाल सिन्हा के आग्रह पर विनय गर्ग ने लखनऊ में एक दिन और रुक कर विशाल सिन्हा के साथ पार्टी तो की, लेकिन इस दौरान उन्होंने लखनऊ में विशाल सिन्हा के विरोधियों के साथ मिल कर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में विशाल सिन्हा का काम बिगाड़ने की संभावनाओं को तलाशने व पुख्ता करने का काम भी किया । जाहिर तौर पर इससे यही लग रहा है कि विशाल सिन्हा की हरकतें और कारस्तानियाँ ही नहीं, अच्छी भावना के साथ किए जा रहे 'काम' भी उन्हें ही चोट पहुँचा रहे हैं । अधिष्ठापन समारोह के साथ भी यही हुआ : विशाल सिन्हा ने बड़ी तैयारी के साथ अधिष्ठापन समारोह का आयोजन किया; देखने में आयोजन अच्छे से हुआ भी, बहुत लोग आए भी - लेकिन वह लोग नहीं आए, जिनके आने का विशाल सिन्हा को खासा इंतज़ार था; इसलिए अधिष्ठापन समारोह का कुल नतीजा विशाल सिन्हा की उम्मीदों को ध्वस्त करने वाला ही रहा ।

Wednesday, September 28, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करके संजीव चौधरी अलग-थलग पड़े और भारी फजीहत का शिकार बने

नई दिल्ली । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने के मामले में संजीव चौधरी ने विदेशी फर्मों के समर्थन में शॉट तो जोर का लगाया, लेकिन बहस में वह जिस तरह से अलग-थलग पड़े दिखाई दिए - उससे खुद उन्हें ही डर हो गया है कि उनकी बॉल गोल में जाएगी भी और या उन्हीं को चोट पहुँचाएगी ? अपनी संभावित फजीहत से बचने के लिए उन्होंने बिग फोर के एक अन्य सदस्य एनसी हेगड़े के रूप में हालाँकि एक बलि का बकरा ढूँढ़ लिया है । इससे पहले भी इंस्टीट्यूट के चुनावों में, खासतौर से सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी । उस मामले में भी संजीव चौधरी जोश में होश खो बैठे थे, और उन्होंने अपनी स्वार्थी व्यक्तिवादी सोच काउंसिल व इंस्टीट्यूट पर लादने की कोशिश की थी; इस बार भी उनका रवैया काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को अपनी मर्जी से हाँकने की कोशिश करने वाला था - जिसका नतीजा यह हुआ कि काउंसिल में वह पूरी तरह अकेले पड़ गए; यहाँ तक कि इस मामले में जिन एनसी हेगड़े का समर्थन मिलने की उन्होंने खासी उम्मीद की थी, उन एनसी हेगड़े की तरफ से भी उन्हें सक्रिय व पर्याप्त समर्थन नहीं मिला ।
उल्लेखनीय है कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने को लेकर कंपनी मामलों के मंत्रालय द्धारा माँगी गई सलाह पर विचार के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की पिछली मीटिंग में विचार विमर्श किया गया था । विचार विमर्श शुरू होते ही संजीव चौधरी ने विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के पक्ष में शॉट पर शॉट लगाना शुरू कर दिया । उक्त मीटिंग में मौजूद सदस्यों के अनुसार, संजीव चौधरी के तेवर दिखा/बता रहे थे जैसे कि वह खुद विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को अनुमति देने के आदेश पर दस्तख़त कर दें । संजीव चौधरी के रवैये ने मीटिंग में मौजूद काउंसिल के दूसरे सदस्यों का पारा गर्म किया, और फिर उन्होंने संजीव चौधरी के तर्कों की धज्जियाँ उड़ाईं । नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने खासी मुखरता के साथ विदेशी फर्मों को देश में अनुमति देने से पैदा होने वाले खतरों को रेखांकित किया । इन सभी का अपने अपने तरीके से कहना रहा कि विदेशी फर्मों के देश में काम करने से देश की फर्मों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा तथा उनके सामने अपनी पहचान व प्रतिष्ठा के साथ काम करना संभव ही नहीं रह जायेगा और उनके सामने विदेशी फर्मों में नौकरी करने का ही विकल्प बचा रह जायेगा । इनका कहना रहा कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के देश में काम करने से सिर्फ देश की चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों पर ही असर नहीं पड़ेगा, बल्कि देश के उद्योग जगत को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी - और इस तरह से विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों का देश में प्रवेश देश की जनता के लिए और देश के लिया आत्मघाती होगा ।
मीटिंग में मौजूद बाकी सदस्यों का रवैया भी विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के विरोध का ही था । एनसी हेगड़े ने जरूर मामले को संतुलित ढंग से विवेचित करने का प्रयास किया और उनकी बातों को सुनते हुए वहाँ मौजूद सदस्यों को कभी कभी ऐसा लगा कि जैसे एनसी हेगड़े विदेशी फर्मों की वकालत कर रहे हैं, लेकिन उनकी वकालत का स्वर काफी नीचा था; और इसलिए उनकी वकालत के बावजूद संजीव चौधरी को कोई मदद और सहारा नहीं मिल पाया । संजीव चौधरी की बातों और उनके तर्कों को 'पीटने' में नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने जिस तरह की तेजी और आक्रामकता दिखाई - उससे मीटिंग में खासी गर्मी पैदा हो गई और विचार-विमर्श के लिए समय कम पड़ गया, लिहाज़ा इस विचार-विमर्श को अगली मीटिंग के लिए स्थगित कर दिया गया । पिछली मीटिंग में हुई बातें बाहर आईं तो काउंसिल सदस्यों पर दबाव बनना शुरू हुआ है, और लोग उनसे सवाल पूछने लगे हैं कि प्रोफेशन को विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को बेच ही दोगे क्या ? संजीव चौधरी के रवैये पर तमाम लोगों को नाराजगी है; लोगों का कहना है कि संजीव चौधरी चुनाव के समय तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के भले के लिए न जाने क्या क्या करने की बातें कर रहे थे, और अब वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के 'प्रतिनिधि' के रूप में ऐसे काम कर रहे हैं - जैसे कि काउंसिल में वह उन्हीं की 'नौकरी' बजाने के लिए आए हैं । काउंसिल के भीतर और बाहर आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच संजीव चौधरी की जैसी फजीहत हुई है और हो रही है, उसे देखते हुए लग रहा है कि काउंसिल की मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों की वकालत उन्हें बहुत भारी पड़ रही है ।
इससे पहले, सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों/उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को उस समय बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी, जब उनके नेतृत्व में बनी कमेटी द्धारा की गईं कुछेक खास सिफारिशें काउंसिल सदस्यों के बीच हुई सीक्रेट वोटिंग में समर्थन पाने में विफल रहीं थीं । उस विफलता, और विफलता के कारण होने वाली फजीहत की चर्चा हालाँकि सिर्फ काउंसिल सदस्यों तक ही सीमित थी । इसलिए विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने के मामले में उनकी जो फजीहत हुई है, उसने उन्हें ज्यादा गंभीर चोट पहुँचाई है । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करने के कारण काउंसिल सदस्यों के साथ-साथ आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी प्रोफेशन व चार्टर्ड एकाउंटेंट्स विरोधी जो छवि बनी है, वह उनके भारी मुसीबतें खड़ी कर सकती हैं । संजीव चौधरी के लिए परेशानी की बात यह है कि काउंसिल में बिग फोर के जो दूसरे सदस्य हैं, उनका भी उन्हें वैसा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है, जैसा कि वह चाहते हैं । एनसी हेगड़े के रवैये का जिक्र इस रिपोर्ट में पहले किया ही जा चुका है; दीनल शाह पिछली मीटिंग में तो नहीं थे, लेकिन उनकी तरफ से संजीव चौधरी को ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं जिनसे वह अगली मीटिंग में उनके सहयोग/समर्थन की उम्मीद कर सकें । दीनल शाह को दरअसल अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति करनी है, और वहाँ अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत करना है - इसलिए उम्मीद की जाती है कि वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वैसी खुल्लमखुल्ला वकालत नहीं करेंगे, जैसी वकालत संजीव चौधरी ने की है और अपनी फजीहत करवाई है ।
काउंसिल में अलग-थलग पड़ जाने तथा आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच हो रही फजीहत को देखते हुए उनके नजदीकियों को भी लग रहा है कि संजीव चौधरी ने इस बार बहुत ही गलत शॉट खेल दिया है । इससे संजीव चौधरी कोई सबक लेंगे या नहीं, और काउंसिल की अगली मीटिंग में वह क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Sunday, September 25, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ज़ाहिर किया है क्या ?

नोएडा । दीपक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के समर्थन में जेल में बंद होकर सजा काट रहे 'नेता' के उतर आने से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी माहौल में एक अलग तरह की रंगत तो आ ही गई है - साथ ही लेकिन डिस्ट्रिक्ट की पहचान और छवि पर कलंक लगने का खतरा भी पैदा हो गया है । देश की चुनावी राजनीति में जब तब सुनने/देखने को मिलता है कि किस तरह जेल में बंद अपराधी अपने 'आदमी' को चुनाव जितवाने के लिए जेल से ही फरमान जारी करते हैं; दीपक गुप्ता की मेहरबानी से लगभग वही 'सीन' अब रोटरी में डिस्ट्रिक्ट 3012 की पहचान बनेगा । दीपक गुप्ता और उनके समर्थक खासे उत्साहित हैं कि जेल में बंद असित मित्तल ने जिस तरह से उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में कैम्पेन चलाया है, उसके चलते वह चुनावी जीत के और नजदीक पहुँच गए हैं । असित मित्तल पाँच वर्ष पूर्व, वर्ष 2011-12 में डिस्ट्रक्ट गवर्नर होते थे । किंतु पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के कुछ ही दिनों के भीतर वह अपने बड़े भाई के साथ दिल्ली के तिहाड़ जेल में पहुँच गए । कहने को तो वह बिल्डर कहलाते थे, लेकिन धीरे-धीरे बात खुली और पता चला कि बिल्डर की आड़ में उनका मुख्य धंधा ठगी का था; और उन्होंने व्यक्तियों से लेकर बैंकों व वित्तीय संस्थाओं तक से ठगी व धोखाधड़ी की । कई रोटेरियंस भी उनकी ठगी का शिकार बने हैं । इस कारण से रोटेरियंस के बीच असित मित्तल के प्रति विरोध पैदा हुआ, जो फिर उनकी उपेक्षा में बदल गया । उनके 'राजनीतिक' समर्थन और या असर की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने गवर्नर-काल में उन्होंने संजय खन्ना व रवि चौधरी के बीच हुए चुनाव में रवि चौधरी का बहुत खुल कर समर्थन किया था और उन्हें जितवाने की हर संभव कोशिश की थी, उसके बावजूद लेकिन रवि चौधरी बुरी तरह चुनाव हार गए थे । जेल जाने के बाद तो फिर असित मित्तल का डिस्ट्रिक्ट में कोई नामलेवा भी नहीं रह गया । उन्हें क्लब से निकाल दिया गया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका नाम तक छापना बंद कर दिया । लेकिन फिर भी दीपक गुप्ता और उनके समर्थक असित मित्तल के समर्थन को महत्त्वपूर्ण मान रहे हैं ।
चुनावी राजनीति के संदर्भ में लोग इसे - डूबते को तिनके का सहारा ढूँढ़ने के उदाहरण और सुबूत के रूप में देख रहे हैं ।
दरअसल असित मित्तल पिछले दिनों अपने पिता के निधन के बाद के क्रियाकर्म पूरे करने के लिए कुछेक दिन कुछ कुछ घंटों के लिए पैरोल पर जेल से बाहर निकले थे । उस दौरान अपनी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करने के लिए कुछेक रोटेरियंस उनसे मिले थे, जिनसे बात करते हुए असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता का समर्थन करने की बात कही । असित मित्तल का कहना रहा कि दीपक गुप्ता की जीत ग्रुप को मजबूत करने और बनाए रखने के लिए जरूरी है । दीपक गुप्ता और उनके समर्थकों की तो यह बातें देख/सुन कर बाँछे ही खिल गईं हैं । उन्हें विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट के लोग उनके दूसरे समर्थक नेताओं की बात भले ही न मानें/सुने, लेकिन जेल में बंद एक 'अपराधी' की बात जरूर मानेंगे/सुनेंगे । असित मित्तल के कैम्पेन पर दीपक गुप्ता ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है, उससे हालाँकि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रखने वाले कई लोग चौंके भी हैं । दीपक गुप्ता के इस उत्साह को वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमजोरी के रूप में देख/पहचान रहे हैं । उनके बीच सवाल उठा है कि दीपक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के कैम्पेन को क्या इतना कमजोर पा रहे हैं, कि उन्हें एक सजायाफ़्ता के समर्थन की जरूरत पड़ी - और उसका समर्थन मिलने पर वह खुश हुए हैं ।
यह ठीक है कि चुनावी मुकाबले में कोई भी उम्मीदवार हर किसी का समर्थन पाने का प्रयास करता ही है, और किसी का सक्रिय समर्थन मिलने/दिखने पर खुश होता ही है । किंतु कोई भी होशियार उम्मीदवार किसी बदनाम व्यक्ति का समर्थन खुल्लमखुल्ला लेने और मिलने पर खुश 'दिखने' से बचने की कोशिश भी करता है । दरअसल वह जानता/समझता है कि एक बदनाम व्यक्ति का खुल्ला संग-साथ फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुँचाता है । दीपक गुप्ता इतनी सावधानी नहीं रख सके, जिसका नतीजा यह देखने में आ रहा है कि असित मित्तल के समर्थन पर दीपक गुप्ता द्धारा व्यक्त की गई खुशी ने उनकी उम्मीदवारी की स्थिति को और ज्यादा संदेहास्पद बना दिया है । लोगों का सहज पूछना है कि जिस असित मित्तल के समर्थन को दीपक गुप्ता अपने लिए बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं, वह असित मित्तल जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे और जब उनकी ज्यादा पोल-पट्टी भी नहीं खुली थी, तब वह जब रवि चौधरी को चुनाव नहीं जितवा सके थे - तो फिर अब जब वह अपनी कारस्तानियों के चलते जेल की हवा खा रहे हैं, तब दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की भला क्या मदद कर सकेंगे ? असित मित्तल के समर्थन पर खुशी प्रकट करके दीपक गुप्ता ने वास्तव में अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ही जाहिर किया है; और इस तरह अपना नुक्सान ही किया है ।
असित मित्तल के समर्थन के कारण एक और तथ्य पर लोगों का ध्यान गया है; लोगों के बीच चर्चाभरे सवाल हैं कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के जितने समर्थक नेता हैं, वह सब घपलेबाजियों में क्यों फँसे/घिरे हुए हैं ? असित मित्तल का मामला तो उनके जेल में होने के कारण जगजाहिर है ही; मुकेश अरनेजा भी अपनी कारस्तानियों के कारण अपने ही भाई-भतीजों के द्धारा अपनी कंपनी से निकाले जा चुके हैं । सतीश सिंघल पर नोएडा रोटरी ब्लड बैंक की कमाई हड़पने के गंभीर आरोप हैं । इन चर्चाओं के चलते, समर्थक नेताओं की कारस्तानियों के दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए बड़ी मुसीबत बनने का खतरा पैदा हो गया है । मजे की बात है कि इस खतरे को जेल से कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने खुद ही आमंत्रित किया है ।

Saturday, September 24, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में होने जा रहा डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों का अधिष्ठापन समारोह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण नरेश अग्रवाल के लिए परीक्षा का मौका होगा क्या ?

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण न मिलने का संदर्भ देते हुए जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा पर वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स को अपमानित करने के आरोप लगे, उसे देखते हुए इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने लखनऊ में भी भी वाराणसी जैसे हालात बनते दिख रहे हैं । उल्लेखनीय है कि वाराणसी में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट 321 ई के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए नरेश अग्रवाल को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित किये जाने की शिकायतें मिलीं थीं, जिन्हें लेकिन नरेश अग्रवाल ने गंभीरता से नहीं लिया था । वाराणसी में नरेश अग्रवाल ने जो रवैया दिखाया था, उसे लेकर मल्टीपल में ही नहीं बल्कि मल्टीपल के बाहर के लायंस पदाधिकारियों के बीच उनकी भारी फजीहत और थू थू हुई थी । नरेश अग्रवाल और दूसरे लोग उस किस्से को अभी पूरी तरह से भूल भी नहीं पाए हैं, कि डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा ने नरेश अग्रवाल के लिए फिर से वैसे ही हालात पैदा कर दिए हैं । नरेश अग्रवाल को 25 सितंबर को लखनऊ में आयोजित हो रहे डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने आना/पहुँचना है । विशाल सिन्हा ने उनके स्वागत के लिए अच्छी तैयारी की है; विशाल सिन्हा दरअसल नरेश अग्रवाल को खुश करके लायन व्यवस्था में अपने लिए अच्छी पोजीशन की जुगाड़ में हैं । असल में, विशाल सिन्हा को यह बात बहुत ही अपमानजनक लगती है कि हाल-फिलहाल के वर्षों में उनके आगे-पीछे जो लोग गवर्नर बने हैं, वह तो एक बार में ही गवर्नर बन गए - जबकि उन्हें एक बार पराजित होकर दूसरी बार में गवर्नर बनने का मौका मिल पाया । इस 'कलंक' के दाग को हल्का करने के लिए विशाल सिन्हा को जरूरी लगता है कि वह लायन व्यवस्था में ऐसा कुछ प्राप्त करें, जिससे वह अपने आगे-पीछे गवर्नर बने लोगों के बीच अपना कद ऊँचा कर सकें । यह वह नरेश अग्रवाल की मदद से करना चाहते हैं, और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में वह नरेश अग्रवाल के स्वागत-सम्मान में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं ।
लेकिन डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह से चार दिन पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जो हुआ, उसने विशाल सिन्हा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है । मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने शिकायत की कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अभी तक भी अधिष्ठापन समारोह के निमंत्रण नहीं मिले हैं । यह शिकायत करते हुए विशाल सिन्हा से पूछा गया कि क्या वह कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अधिष्ठापन समारोह से दूर रखना चाहते हैं ? विशाल सिन्हा ने इस सवाल के पीछे छिपे खतरे को पहचानते हुए तुरंत सफाई दी कि उन्होंने तो सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निमंत्रण भेजे हैं; उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि किन्हीं कारणों से हो सकता है कि कुछेक पूर्व गवर्नर्स तक निमंत्रण न पहुँचा हो, इसलिए इस मीटिंग के माध्यम से वह सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से अधिष्ठापन समारोह में शामिल होने का अनुरोध करते हैं । विशाल सिन्हा में यह बड़ा अच्छा हुनर है कि वह किसी को कितनी भी और कैसी भी गालियाँ दे रहे हों, बुरा-भला कह रहे हों - लेकिन जैसे ही उन्हें आभास होता है कि उनकी यह हरकत उन्हें  नुकसान पहुँचाएगी, वह तुरंत से खुशामद में जुट जायेंगे । विशाल सिन्हा कुछेक पूर्व गवर्नर्स के खिलाफ जमकर गालियाँ बकते हैं, उन्हें लायनिज्म से निकालने तक की बात करते हैं - लेकिन अधिष्ठापन समारोह से ठीक पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जैसे ही उन्हें आभास हुआ कि उनकी हरकत अधिष्ठापन समारोह में बबाल कर सकती है और नरेश अग्रवाल के सामने उनकी फजीहत कर/करा सकती है, वह तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदल कर पूर्व गवर्नर्स की खुशामद पर उतर आए ।
विशाल सिन्हा ने मौके की नजाकत को पहचान कर भले ही रंग बदल लिया हो, किंतु विशाल सिन्हा की हरकतों से अपमानित महसूस कर रहे पूर्व गवर्नर्स की नरेश अग्रवाल के सामने उनकी असलियत लाने की कोशिशों का खतरा पूरी तरह टला नहीं है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद को विशाल सिन्हा ने जिस तरह से पैसा बनाने का जरिया बना लिया है; और इस चक्कर में जिस तरह से गैर लायन सदस्यों तक को न सिर्फ अपनी कैबिनेट का सदस्य बना लिया है बल्कि डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में भी शामिल कर लिया - उसे देख कर पूर्व गवर्नर्स के बीच भारी असंतोष व नाराजगी है । विशाल सिन्हा के मनमाने तरीके से काम करने और पूर्व गवर्नर्स के प्रति गाली-गलौच भरे शब्दों का प्रयोग करने के रवैये के कारण ही वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नीरज बोरा ने बीस दिन के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया था । दरअसल नीरज बोरा को पता चला था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में उनके बारे में बहुत ही ख़राब तरीके से बातें होती हैं और उनके लिए गाली-गलौच पूर्ण शब्दों का इस्तेमाल होता है । विशाल सिन्हा ने इस तरह 'सामने कुछ और पीछे कुछ' वाला अपना दो-रंगी रूप दिखाया, तो नीरज बोरा ने व्यस्तता का वास्ता देकर उनके गवर्नर-काल में किसी भी पद पर रहने से तौबा कर ली । किसी डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के व्यवहार व रवैये के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऑनरेरी कमेटी का चेयरमैन एक महीने से भी कम समय में अपना पद छोड़ दे, तो यह डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म के लिए बहुत ही अपमानजनक बात है - इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल इस बात को कैसे लेते हैं, यह देखना अभी बाकी है ।
विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण ही एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ग्लोबल लीडरशिप टीम (जीएलटी) के डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के बावजूद अभी हाल ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट लायन लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल नहीं हुए । मजे की बात यह है कि नीरज बोरा और अनुपम बंसल - दोनों ही विशाल सिन्हा के या तो बहुत खास हैं और या उनकी राजनीति के खेमे के समर्थक हैं । पिछले वर्ष डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो खेमेबाजी थी, उसमें नीरज बोरा उस तरफ थे - जिस तरफ विशाल सिन्हा थे । अनुपम बंसल तो विशाल सिन्हा के 'शाम' के पक्के वाले साथी हैं । इसके बावजूद विशाल सिन्हा ने उनके प्रति कोई रियायत नहीं बरती और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया कि उन्होंने विशाल सिन्हा के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि विशाल सिन्हा अपनी कारस्तानियों से जब अपने ही खास व नजदीकी लोगों के साथ बदतमीजी कर सकते हैं और उन्हें उपेक्षित तथा अपमानित तक कर सकते हैं, तो फिर अपने से असहमत और अपने विरोधियों के प्रति उनका रवैया क्या होता होगा ?
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने कुछेक लोग विशाल सिन्हा के इस रवैये को रखने की तैयारी कर रहे हैं । उनका कहना है कि वह नरेश अग्रवाल को बताना चाहेंगे कि विशाल सिन्हा को किसी भी तरह की तवज्जो देकर वह सिर्फ लायनिज्म को ही बदनाम नहीं करवायेंगे, बल्कि अपनी छवि को भी कलंकित करेंगे । विशाल सिन्हा हालाँकि आश्वस्त हैं; उनका कहना है कि नरेश अग्रवाल को उनके बारे में अच्छी तरह पता है और वह गुरनाम सिंह के साथ उनके रिश्ते को जानते/पहचानते हैं, इसके अलावा वह लखनऊ में नरेश अग्रवाल की सेवा में कोई कमी नहीं रहने देंगे - इसलिए उनकी शिकायत करने वालों की दाल नरेश अग्रवाल के सामने नहीं गलेगी । नरेश अग्रवाल यूँ भी घटिया लोगों को प्रश्रय देने के मामले में खासे बदनाम हैं, और इस चक्कर में अपनी छीछालेदर भी कराते रहते हैं । हालाँकि कुछेक लोगों को लगता है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की तरफ बढ़ रहे नरेश अग्रवाल अब शायद थोड़ा सावधान हों, और लायनिज्म की नहीं तो कम से कम अपनी छवि की तो फ़िक्र करेंगे - और इस फ़िक्र में विशाल सिन्हा के मंसूबों को पूरा करने में सहायक नहीं बनेंगे । इस पृष्ठभूमि में, लखनऊ में होने जा रहा अधिष्ठापन समारोह विशाल सिन्हा के लिए ही नहीं - बल्कि नरेश अग्रवाल के लिए भी परीक्षा की घड़ी है ।

Wednesday, September 21, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इस्तीफ़ा देने के बावजूद बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद पर चिपके दीपक गर्ग के संगी-साथियों को अगले चुनाव की चिंता सताने लगी है

नई दिल्ली । दीपक गर्ग की हरकतों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उन सदस्यों - खासकर सत्ता गिरोह के उन सदस्यों को खासी मुसीबत में फँसा दिया है, जिन्हें अगला चुनाव भी लड़ना है । दरअसल चेयरमैन के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी दीपक गर्ग जिस बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद के फायदे उठा रहे हैं - और बाकी सदस्य या तो गिरोहबंदी के कारण और या स्वार्थपूर्ण चुप्पी के कारण उन्हें फायदे उठाने दे रहे हैं, उसके कारण उनकी तथा रीजनल काउंसिल के सदस्यों की लोगों के बीच भारी फजीहत हो रही है । लोगों का कहना है कि दीपक गर्ग जब अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं, तब फिर वह चेयरमैन पद की भूमिका निभाते हुए उसके फायदे क्यों ले रहे हैं - और काउंसिल के दूसरे सदस्य उन्हें फायदा क्यों उठाने दे रहे हैं ? यह ठीक है कि दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा अभी मंजूर नहीं हुआ है, इसलिए तकनीकी रूप से वह अभी भी चेयरमैन 'हैं' - लेकिन 'इस्तीफित' दीपक गर्ग से आधिकारिक रूप से यह भी तो नहीं कहा गया है कि उनके इस्तीफे पर जब तक अंतिम रूप से फैसला न लिया जाए, तब तक वह चेयरमैन पद की जिम्मेदारियाँ निभाते रहें और उसके फायदे उठाते रहें । नैतिकता के तकाजे के तहत चलन यह है कि जब भी कोई पदाधिकारी अपने पद से इस्तीफ़ा देता है, तो वह इस्तीफे के साथ-साथ मिलने वाली सुविधाओं और पद की जिम्मेदारियों को निभाना भी छोड़ देता है । हाँ, यदि उससे कहा जाता है कि अगली व्यवस्था होने तक वह पद की जिम्मेदारियाँ पहले की ही तरह निभाता रहे, तो फिर बात दूसरी हो जाती है ।
दीपक गर्ग के साथ लेकिन यह दूसरी वाली स्थिति तो आई ही नहीं । स्थिति यह है कि दीपक गर्ग ने इंस्टीट्यूट प्रशासन के असहयोगात्मक रवैए का हवाला देते हुए चेयरमैन के रूप में काम कर सकने में असमर्थता व्यक्त करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया - उनके इस्तीफे पर जिस भी अथॉरिटी को फैसला करना है, उसने अभी फैसला नहीं किया है । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि दीपक गर्ग को इस्तीफ़ा देते ही चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों तथा फायदों को छोड़ देना चाहिए था - किंतु दीपक गर्ग से नैतिक व्यवहार की उम्मीद शायद वही कर सकता है, जो उन्हें जानता नहीं है । दिलचस्प नजारा है कि दीपक गर्ग इस्तीफ़ा देने के बाद भी पूरी बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद से चिपके हुए हैं । दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफे में लिखा/कहा है कि उनके लिए चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों को निभा पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव हो रहा है - और इसीलिए वह इस्तीफ़ा दे रहे हैं । सवाल यही है कि एक तरफ तो वह घोषणा कर रहे हैं कि चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों को निभा पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है, और दूसरी तरफ वह दीमक की तरह चेयरमैन पद से चिपके हुए भी हैं । दीपक गर्ग लेकिन खुशकिस्मत हैं कि उनकी इस बेशर्मी और निर्लज्जता के लिए लोगों के बीच उनकी चाहें जैसी जो थू थू हो रही हो, रीजनल काउंसिल में कोई भी उनकी इस बेशर्मी और निर्लज्जता पर सवाल नहीं उठा रहा है ।
दीपक गर्ग की इस खुशकिस्मती में लेकिन रीजनल काउंसिल के उन सदस्यों को - खासकर सत्ता गिरोह के उन सदस्यों को अपनी मुसीबत नज़र आ रही है, जिन्हें अगला चुनाव भी लड़ना है । दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए हो रहे नाटक को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी है, जाहिर है कि वह चुनावों के समय सवालों के रूप में सामने आएगी और लोग उनसे पूछेंगे ही कि दीपक गर्ग की बेशर्मी और निर्लज्जता का समर्थन करने के पीछे आखिर उनका क्या स्वार्थ था ? मजे की बात यह है कि दीपक गर्ग इस सारे झमेले से मुक्त हैं : दरअसल उन्हें तो अगला चुनाव लड़ना नहीं है, इसलिए उनके लिए तो लोगों की नाराजगी और उनके सवालों का सामना करने की कोई भी स्थिति बनेगी नहीं । कुछेक लोग दीपक गर्ग को हालाँकि सेंट्रल काउंसिल के लिए तैयारी करने के लिए उकसा रहे हैं, लेकिन दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि सेंट्रल काउंसिल के बारे में सोचना दीपक गर्ग की क्षमता में नहीं है । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उनके कामकाज और अभी के इस्तीफ़ा-नाटक को देखते हुए तो उनके नजदीकियों ने उनके राजनीतिक सफ़र के अंत की घोषणा भी कर दी है । वास्तव में इसीलिए दीपक गर्ग को अपनी हरकतों के चलते लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी की कोई फ़िक्र नहीं है ।
दीपक गर्ग को अपनी फ़िक्र भले ही न हो, किंतु रीजनल काउंसिल में उनके संगी-साथियों को अपनी अपनी फ़िक्र जरूर होने लगी है । दरअसल नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो नाटक चल रहा है, उसके मुख्य 'हीरो' भले ही दीपक गर्ग हों - लेकिन सत्ता गिरोह के दूसरे सदस्य भी साईड हीरो की भूमिका निभाते हुए दीपक गर्ग की भूमिका को सपोर्ट करते हुए नजर आ रहे हैं । जाहिर तौर पर लोगों की नाराजगी का ठीकरा उनके सिर पर भी फूटेगा । जो लोग चेयरमैन बन कर चुनावी चक्कर से बाहर निकल जायेंगे और या अन्य किसी कारण से चुनावी पचड़े में नहीं पड़ेंगे, उनके लिए तो समस्या नहीं है - किंतु जिन्हें अगले चुनाव में लोगों के बीच जाना होगा, उन्हें तो लोगों के सवालों का जबाव देना ही होगा न कि छह छह महीने की चेयरमैनी पाने के लिए रचे गए नाटक में उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक को क्यों घसीट लिया ? और इस तरह अपनी हरकत से न सिर्फ कामकाज पर प्रतिकूल असर डाला बल्कि इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को भी बदनाम किया । रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के सदस्य सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा के रवैए को लेकर भी निराश हैं, जिन्होंने पहले तो छह छह महीने की चेयरमैनी का लालच दिखा कर उनसे नाटक करवा लिया, लेकिन अब जब नाटक संकट में फँस गया तो उन्हें फजीहत और बदनामी के बीच मँझदार में छोड़ कर किनारे खड़े हो कर तमाशा देखने लगे हैं ।

Tuesday, September 20, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में बने माहौल पर उनके ही समर्थक नेताओं - मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की स्वार्थपूर्ण 'होशियारी' ने पानी फेरा

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के संदर्भ में की अपनी कमजोरियों व गलतियों से कोई सबक न सीखता देख, दीपक गुप्ता के नए बन सकने वाले समर्थकों को तगड़ा झटका लगा है । उन्हें तगड़ा वाला झटका दरअसल इसलिए भी लगा है क्योंकि वह देख/पा रहे हैं कि दीपक गुप्ता उनकी सलाह व उनके सुझावों पर भी कोई गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं, और अभी भी मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल से ही दिशा निर्देश ले रहे हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता ने अभी पिछले दिनों ही अपने घर पर अपनी उम्मीदवारी के अभियान की दशा-दिशा पर विचार-विमर्श करने को लेकर एक मीटिंग बुलाई थी, जिसमें उन्होंने अपने संभावित समर्थकों व शुभचिंतकों को आमंत्रित किया था । मीटिंग खत्म होते ही मीटिंग को लेकर मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की तरफ से जिस तरह की सक्रियता 'देखने' को मिली, उसने भी मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों को भड़काया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता द्धारा मीटिंग के लिए आमंत्रित किए गए लोगों में दो तरह के लोग थे : एक तो वह लोग थे जो पिछले वर्ष हुए चुनाव में भी उनके समर्थन में थे; और दूसरी तरह के लोगों के रूप में वह थे जो पिछले वर्ष हुए चुनाव में उनके प्रतिद्धंद्धी रहे सुभाष जैन के समर्थन में थे । विचार-विमर्श में लोगों ने जो जो कहा उसमें भी मोटे तौर पर दो खेमे बने : एक खेमे की आवाज़ में 'जीतेगा भई जीतेगा, दीपक गुप्ता जीतेगा' वाला भाव था; दूसरे खेमे में संजीदगी के साथ हालात व स्थिति की जरूरत को समझते हुए एक्शन तय करने का सुझाव था, जिसके तहत कहा/बताया गया कि हमेशा यह आकलन करते रहना चाहिए कि लोगों के बीच धारणा क्या बन रही है और उसके अनुसार ही अपनी सक्रियता की दशा-दिशा को संयोजित करना चाहिए । विचार-विमर्श में कुछेक लोगों ने स्पष्ट रूप से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच दीपक गुप्ता को लेकर बनी नकारात्मक धारणाओं का जिक्र करते हुए सुझाव दिया कि दीपक गुप्ता को इस बारे में सावधान होना/रहना चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि उनके व्यवहार व आचरण से लोगों के बीच कोई नकारात्मक संदेश न जाए । विचार-विमर्श में शामिल लोगों ने महसूस किया कि दीपक गुप्ता ने व्यक्त किए गए सुझावों को सहृदयता से स्वीकार किया और सभी को आश्वस्त किया कि वह सुझावों पर अमल करेंगे ।
उक्त विचार-विमर्श में शामिल कुछेक लोगों को अब लेकिन लग रहा है कि दीपक गुप्ता के अभियान के रवैये में कोई बदलाव नहीं है, तथा वह अपने पुराने ढर्रे पर ही कायम हैं । इस विचार के लोगों को लग रहा है कि दीपक गुप्ता दरअसल जमीनी सच्चाइयों को पहचानने/समझने की कोई कोशिश ही नहीं करते हैं, और अपने नजदीकियों के बहकाए में रहते हैं । इसी रवैए के चलते पिछले वर्ष उन्हें पहले नोमीनेटिंग कमेटी में हुए चुनाव में और फिर सीधे हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था । मजे की बात यह है कि दोनों ही मौकों पर दीपक गुप्ता के नजदीकी और समर्थक नेता उनकी ही जीत के दावे कर रहे थे; दावे जब उलटे साबित हुए तो 'इस' पर और 'उस' पर धोखा देने के आरोप लगा कर अलग खड़े हो गए । दीपक गुप्ता के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि दीपक गुप्ता ने लेकिन पिछले वर्ष के अपने अनुभव से कोई सबक नहीं सीखा है, और अभी भी वह ऐसे लोगों के ही प्रभाव में हैं, जो जमीनी सच्चाई को अनदेखा करते हुए 'जीतेगा भई जीतेगा' वाली रट लगाए रख रहे हैं । कई लोग हैं जो खुल कर कहते हैं कि दीपक गुप्ता ने पिछले वर्ष उनके सुझावों पर कोई तवज्जो नहीं दी, और अपनी फजीहत करवाई; इस वर्ष भी उनका वैसा ही रवैया दिख रहा है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान को लेकर होने वाले विचार-विमर्श में शामिल होने खातिर उनके घर जाने वाले कुछेक लोगों का ही नाराजगी के साथ कहना है कि दीपक गुप्ता को अपनी जीत का यदि इतना ही भरोसा है, तो फिर विचार-विमर्श करने की जरूरत ही क्या है ?
दीपक गुप्ता के घर हुई मीटिंग की जानकारी जिस तत्परता के साथ मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल तक पहुँची और जिस तत्परता के साथ उन्होंने अलग अलग लोगों से फीडबैक लेना और दीपक गुप्ता की जीत का दावा करना शुरू किया, उससे भी दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों को ऐतराज हुआ । उनका कहना है कि दीपक गुप्ता को यदि लगता है कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ही उन्हें चुनाव जितवा देंगे, तो फिर वह उनके ही भरोसे रहें - किसी और से बात करने की उन्हें भला क्या जरूरत है ? ऐसा कहने वाले लोग ध्यान दिलाते हैं कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की हर संभव कोशिशों के बावजूद पिछले वर्ष दीपक गुप्ता अपनी हार और फजीहत को बचा नहीं सके थे - फिर भी वह इन दोनों के चक्कर में पड़े हुए हैं । दीपक गुप्ता इस सच्चाई को या तो देख/पहचान नहीं रहे हैं, और या स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में सतीश सिंघल जो कर रहे हैं, उसके कारण बहुत से लोग नाराज हो रहे हैं - और उसका नुकसान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता को उठाना/भुगतना पड़ सकता है ।
मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल दरअसल दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने की आड़ में अपना अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशों में हैं । उनकी कोशिश है कि दीपक गुप्ता को उनके उम्मीदवार के रूप में पहचाना जाए तथा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाला हर व्यक्ति उनके 'आदमी' के रूप में देखा जाए । समस्या की बात यह है कि दीपक गुप्ता को यदि सचमुच चुनाव जीतना है, तो उन्हें ऐसे लोगों का भी समर्थन चाहिए होगा, जो मुकेश अरनेजा और या सतीश सिंघल को पसंद नहीं करते हैं । ऐसे कई लोग दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति हमदर्दीभरी और समर्थनपूर्ण बातें करते सुने/देखे भी जा रहे हैं; लेकिन ऐसे लोगों को मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल जब अपने पाले में खींचने और अपना 'आदमी' बताने की कोशिशों में जुटते हैं, तो फिर वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने से पीछे हटते हैं - और इससे कुल मिलाकर दीपक गुप्ता का ही नुकसान होता है । दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग के बाद, मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों से मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने जिस अंदाज़ में बातें कीं, उससे उन लोगों को तथा दूसरे लोगों को भी समझ में आ गया है कि दीपक गुप्ता जब तक मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की 'छाया' से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक सफलता के नजदीक पहुँच पाना उनके लिए मुश्किल ही होगा । दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में, पिछले वर्ष दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में रहे लोगों के भी पहुँचने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को जो दम मिलने की उम्मीद बनी दिखी थी - मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की 'होशियारी' ने फिलहाल तो उस दम का दम निकाल दिया है ।

Monday, September 19, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में अपने पद की प्रतिष्ठा के साथ न्याय करने की अनुपम बंसल की कोशिश ने लीडरशिप इंस्टीट्यूट के नाम पर जगदीश गुलाटी, वीएस कुकरेजा और विशाल सिन्हा के तमाशे की पोल खोली

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा के अपमानजनक रवैये के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ने ताशकंद में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट का बहिष्कार किया । ताशकंद से लौटे लोगों से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को यही एक महत्त्वपूर्ण खबर सुनने को मिली है । मजे की बात यह है कि अनुपम बंसल इसी इंस्टीट्यूट में शामिल होने के लिए लखनऊ से ताशकंद गए थे । उल्लेखनीय है कि ग्लोबल लीडरशिप टीम (जीएलटी) के डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के नाते अनुपम बंसल को उक्त कार्यक्रम में प्रमुख भूमिका निभानी थी, लेकिन वह पूरे कार्यक्रम से ही बाहर रहे । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अनुपम बंसल के इस रवैए पर लोगों के सामने ही विशाल सिन्हा ने अनुपम बंसल को खूब कोसा; हालाँकि कार्यक्रम शुरू हो जाने के कुछ देर बाद तक भी विशाल सिन्हा फोन पर अनुपम बंसल से बात करने और उन्हें मनाने की कोशिश करते रहे - पर अनुपम बंसल कार्यक्रम में नहीं ही पहुँचे । वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरनाम सिंह ने भी अनुपम बंसल को कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राजी करने वास्ते प्रयास किया, किंतु उनका प्रयास भी अनुपम बंसल की नाराजगी को दूर नहीं कर सका । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब खाना शुरू हुआ, अनुपम बंसल तब मौके पर पहुँचे ।
ताशकंद से लौटे लोगों के अनुसार, अनुपम बंसल ने दो कारणों से अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया और इसके चलते पैदा हुई नाराजगी के कारण उन्होंने डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट का बहिष्कार किया । पहला कारण तो यह रहा कि इस इंस्टीट्यूट का जो निमंत्रण पत्र छपा, उसमें अनुपम बंसल का नाम ही नहीं छपा । अनुपम बंसल यह देख कर बुरी तरह बौखलाए कि निमंत्रण पत्र में इंस्टीट्यूट के चेयरपरसन के रूप में संजय चोपड़ा का नाम छपा, लेकिन डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के बावजूद उनका नाम नहीं छपा । संजय चोपड़ा वैसे भी अनुपम बंसल से जूनियर पूर्व गवर्नर हैं । इसके अलावा, संजय चोपड़ा की तुलना में अनुपम बंसल को विशाल सिन्हा के ज्यादा नजदीक समझा/देखा जाता है । यानि हर तरह से संजय चोपड़ा से 'भारी' होने के बावजूद अनुपम बंसल का नाम विशाल सिन्हा ने निमंत्रण पत्र पर नहीं छापा । विशाल सिन्हा की तरफ से अनुपम बंसल को दूसरा झटका यह देख कर लगा कि विशाल सिन्हा खुद तो एक अच्छे होटल में ठहरे, किंतु उन्हें दूसरे अपेक्षाकृत सेकेंडग्रेड होटल में ठहरवा दिया । लोगों का कहना है कि इन दो बातों से अनुपम बंसल ने खुद को अपमानित महसूस किया और फिर विरोधस्वरूप उन्होंने उस कार्यक्रम से ही दूर रहने का फैसला किया, जिसके नाम पर वह ताशकंद गए/पहुँचे थे ।
डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट को विशाल सिन्हा ने जिस तरह से आयोजित किया, उसकी ऊपरी रूपरेखा को देख कर ही समझा जा सकता है कि इसके आयोजन को लेकर वह जरा भी गंभीर नहीं थे, और इस आयोजन के जरिए उन्होंने वास्तव में अपना और लायनिज्म का मज़ाक ही बनाया है । कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र ही बताता है कि इंस्टीट्यूट लीडरशिप को लेकर था, लेकिन उसके लिए फैकल्टी मेंबरशिप की बुलाई गई - और वह पट्ठे आकर भाषण भी पेल गए । यह क्या ऐसा ही मामला नहीं है कि चिकनगुनिया और डेंगू जैसी बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए किसी डॉक्टर की बजाए किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट का भाषण करवा दिया जाए ? इस मामले में इसीलिए अकेले विशाल सिन्हा को ही दोष देने का क्या फायदा ? जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा को क्या यह कहते हुए कार्यक्रम में फैकल्टी के रूप में शामिल होने से इंकार नहीं कर देना चाहिए था कि हम लोग जीएमटी के लोग हैं - इस कार्यक्रम में जीएलटी के लोगों को बुलाया जाना चाहिए ? लेकिन जब पता हो कि विदेश घूमने का मौका मिल रहा हो, भाषण पेलने का और नेतागिरी दिखाने का अवसर मिल रहा हो, और बुलाने वाला बिलकुल मूर्खता दिखाने पर ही आमादा हो - तो फिर इंकार करने में कौन सी अक्लमंदी है ? इस तरह अपनी अपनी अक्लमंदी में जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा से मिली शह में विशाल सिन्हा ने फिर लायनिज्म का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा की सरपरस्ती में विशाल सिन्हा ने लीडरशिप इंस्टीट्यूट के नाम पर जो तमाशा किया, उसकी पोल शायद न खुलती - यदि वह अनुपम बंसल को नाराज न करते । ताशकंद में जो लोग उपलब्ध थे, उनमें लीडरशिप इंस्टीट्यूट के लिए अनुपम बंसल सबसे बड़े अधिकृत पदाधिकारी थे - विशाल सिन्हा ने लेकिन उन्हें ही कार्यक्रम की औपचारिक व्यवस्था से अलग-थलग रखा । अनुपम बंसल ने एक सामान्य प्रतिभागी की तरह कार्यक्रम में शामिल होना यदि उचित नहीं समझा, तो इस तरह उन्होंने अपने पद की प्रतिष्ठा के साथ वास्तव में न्याय ही किया है । अनुपम बंसल की इस न्यायप्रियता ने लेकिन लायनिज्म के नाम पर जगदीश गुलाटी, वीएस कुकरेजा और विशाल सिन्हा द्धारा किए गए तमाशे की असलियत को डिस्ट्रिक्ट व मल्टीपल के लोगों के सामने ला देने का काम कर दिया है ।

Thursday, September 15, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पस्त है, उसके पदाधिकारी लेकिन मस्त हैं

नई दिल्ली । किसी के घर में आग लगी हुई हो और या घर पर कब्ज़ा करने के लिए दूसरे लोग जबर्दस्ती आ पहुँचे हुए हों - और घर के सदस्य सेल्फी लेने में व्यस्त हों, तो उन्हें आप क्या कहेंगे ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आजकल ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है । 44 हजार से अधिक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सदस्यों वाली 66 वर्षीय नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल इस समय अभूतपूर्व संकट में है, लेकिन काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच इस संकट को लेकर न तो चिंता/परेशानी है और न ही संकट को लेकर किसी भी तरह का कोई विचार-विमर्श है । पदाधिकारियों और सदस्यों का व्यवहार देख कर ऐसा लग रहा है, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है । वह सेल्फियाँ खींचने में मस्त और व्यस्त हैं - जैसे कि इन्हें इसी काम के लिए चुना गया है । पदाधिकारियों व सदस्यों को तो छोड़िए, जो लोग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पदाधिकारी व सदस्य होने की हसरत रखते हैं, वह भी गर्दन जमीन में घुसा कर बगुला बने हुए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले दिसंबर में हुए चुनाव में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए 58 उम्मीदवार थे; उनमें से जो कामयाब नहीं हुए - उनमें से कुछेक अगले चुनाव में उम्मीदवार बनने की तैयारी में लगे हुए हैं; लेकिन रीजनल काउंसिल को जिस संकट ने घेरा हुआ है, उसे लेकर सभी के मुँह पर जैसे ताले लगे हुए हैं । यह बात इसलिए गंभीर है - क्योंकि मौजूदा संकट ने वास्तव में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अधिकारों और उसकी स्वायत्तता व उसकी पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा संकट को पहचानने/समझने के लिए जो तथ्य रिकॉर्ड पर हैं, सिर्फ उन्हें देखना ही काफी होगा : रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग ने इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के आरोप लगाते हुए चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा दे दिया । उनका तर्क रहा कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के सहयोग न करने के कारण चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है । होना यह चाहिए था कि रीजनल काउंसिल के बाकी पदाधिकारियों व सदस्यों को तथा आगे आने वाले चुनाव में उम्मीदवार होने की इच्छा रखने व तैयारी करने वाले लोगों को - और उनके गॉडफादर की भूमिका निभाने वाले लोगों को दीपक गर्ग के आरोपों को आधार बना कर इंस्टीट्यूट प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए था । इंस्टीट्यूट प्रशासन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के साथ कोई नाइंसाफी न करे, इसे लेकर सार्वजनिक रूप से चर्चा करना चाहिए थी । पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । इसके बाद, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि वह अपनी मीटिंग में चेयरमैन के इस्तीफे को लेकर कोई बात नहीं करेंगे; और चेयरमैन के इस्तीफे के बाद रीजनल काउंसिल में क्या होगा, इसे 'हम' तय करेंगे - रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा पक्ष-विपक्ष के सदस्यों ने इस मामले में भी समर्पण कर दिया । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों ने तो समर्पण किया ही; रीजनल काउंसिल में आने की इच्छा रखने तथा तैयारी करने वाले लोगों ने भी मुँह पर ताले लगा लिए हैं ।
मजेदार सीन यह है कि सोशल मीडिया में बड़ी बड़ी बातें करने/हाँकने - तथा अपनी जागरूकता, अपनी बहादुरी, अपनी नेतागिरी जताने/दिखाने वाले लोगों ने भी इस मामले में चुप्पी साधी हुई है । सबसे ज्यादा नाटकीय और बेचारी हालत सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की हुई । दीपक गर्ग के इस्तीफे के साथ जो नाटक शुरू हुआ, उसके स्क्रिप्ट राईटर और निर्देशक के रूप में राजेश शर्मा को ही पहचाना गया है; वह रीजनल काउंसिल की स्वायत्तता को लेकर लोगों के बीच बहुत बढ़-चढ़ कर बातें भी कर रहे थे; लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने जैसे ही कोड़ा फटकारा - वह भी मुँह बंद करके बैठ गए । दिल्ली के इन नेताओं से ज्यादा 'बहादुर' तो चंडीगढ़ ब्रांच के पदाधिकारी साबित हुए - जिन्होंने ब्रांच की स्वायत्तता को बचाए रखने के लिए एक स्टैंड लेते हुए इंस्टीट्यूट प्रशासन से टकराने का फैसला तो लिया । आगे जो होगा, सो होगा; अभी तो उन्होंने यह 'दिखाया' है कि उन्होंने जो फैसला किया, उस पर उन्होंने अमल भी किया है । दिल्ली में जो सर्कस हुआ, वह तो अपने आप में अनोखा है - दीपक गर्ग इस्तीफ़ा दे चुके हैं, लेकिन फिर भी इस जुगाड़ में हैं कि किसी भी तरह उनकी चेयरमैनी बच जाए । इस्तीफे से पैदा हुई स्थिति पर विचार के लिए जो मीटिंग बुलाई गई, इंस्टीट्यूट प्रशासन की चेतावनी के बाद उस मीटिंग में इस्तीफे की कोई बात ही नहीं हुई ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के इतिहास में इस तथ्य को कॉमेडी और ट्रेजडी - दोनों रूपों में याद रखा जायेगा कि चेयरमैन के इस्तीफे के बाद हुई काउंसिल की मीटिंग में इस्तीफे पर कोई बात ही नहीं हुई ।
कई लोगों का मानना और कहना है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन ने जो किया, वह बिलकुल ठीक किया - अन्यथा दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए शुरू हुए नाटक के कर्ता-धर्ता रीजनल काउंसिल को अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अड्डा बना लेते । मजे की बात यह है कि ऐसा मानने/कहने वाले लोगों ने भी इशारों और फुसफुसाहटों के रूप में ही अपना मत व्यक्त किया है, और उनकी भी बातें कहीं रिकॉर्ड पर नहीं आईं हैं । किसने सही किया, और किसने गलत किया - यह बातें यदि रिकॉर्ड पर नहीं आतीं हैं, तो क्या यह समझा जाए कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी तथा पक्ष-विपक्ष के सदस्य और अगली बार 'यहाँ' आने की तैयारी करने वाले लोग सिर्फ कठपुतलियाँ हैं; जो मुसीबत के समय भी मस्त रहेंगे और सिर्फ सेल्फियाँ खींचने का काम करेंगे ।

Tuesday, September 13, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने एक फर्जी किस्म के आयोजन के जरिए अपनी फजीहत तो करवाई ही, साथ ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की मुसीबतों को भी बढ़ाया

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने अगले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल के असिस्टेंट गवर्नर्स घोषित करके कई लोगों को जिस तरह का झटका दिया है, उसके कारण दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान के लिए भारी समस्या खड़ी हो गई है । सतीश सिंघल के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी के कारण दरअसल दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने उन कई लोगों का समर्थन खोने का खतरा पैदा हो गया है, जिन्होंने पिछले वर्ष के चुनाव में उनका साथ दिया था - और जिन्हें इस वर्ष भी दीपक गुप्ता और उनके समर्थक अपने साथ मान रहे हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का साथ देने वाले लोगों को विश्वास था कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का साथ/समर्थन करने के कारण सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में उन्हें महत्त्वपूर्ण पद मिलेंगे - लेकिन सतीश सिंघल जो और जिस तरह से करते हुए दिखे हैं, उससे उन लोगों का विश्वास भंग हुआ है । कई लोग तो शिकायत करते हुए सुने जा रहे हैं कि सतीश सिंघल ने उन्हें असिस्टेंट गवर्नर का पद देने का वायदा किया था, लेकिन अब जब पद देने का समय आया - तो उनके तेवर ही बदले हुए हैं । इस बिना पर कई लोगों ने सतीश सिंघल पर धोखाधड़ी करने का गंभीर आरोप लगाया है । सबसे ज्यादा फजीहत रोटरी क्लब वैशाली के लोगों की हुई है । पिछले वर्ष इस क्लब में भारी झगड़े का कारण ही यह था कि क्लब के पदाधिकारी सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में असिस्टेंट गवर्नर का पद पाने के बदले में क्लब के वोट दीपक गुप्ता को देने को तैयार हो गए थे । किंतु अब जब पद देने का नंबर आया तो सतीश सिंघल ने रोटरी क्लब वैशाली के लोगों को बाबा जी ठुल्लू थमा दिया है । रोटरी क्लब वैशाली के लोगों की समझ में ही नहीं आ रहा है कि इसका वह करें तो क्या करें ? हाँ, यह उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि सतीश सिंघल ने उन्हें ठगते हुए उन्हें मजाक का विषय जरूर बना दिया है ।
सतीश सिंघल की तरफ से कुछेक लोगों को जब डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट में शामिल होने का निमंत्रण मिला, तब कई लोगों की उम्मीदों ने बड़ी जोरों की अँगड़ाई ली - उन्हें लगा कि सतीश सिंघल के आश्वासन पर पिछले वर्ष उन्होंने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का जो समर्थन किया था, उसके लिए पुरुस्कृत होने का समय आ गया है । इसी उम्मीद और विश्वास के साथ लोग डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट में शामिल होने के लिए पहुँचे । लेकिन डेढ़ दिन के कार्यक्रम के नाम पर वहाँ जो कुछ भी हुआ, उसे देख कर अधिकतर लोगों को यही लगा कि उन्होंने अपना समय और पैसा नाहक ही बर्बाद किया है । पूरा कार्यक्रम जिस तरह से डिजाईन किया गया था, उसे अधिकतर लोगों ने मूर्खता के चरम प्रदर्शन के रूप में ही देखा/पहचाना । कार्यक्रम में शामिल हुए रोटेरियंस को तो छोड़िए, वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रूपक जैन के साथ वहाँ जो सुलूक हुआ - उसमें ही मूर्खता के चरम प्रदर्शन का सुबूत देखा/पाया जा सकता है । रूपक जैन को सतीश सिंघल ने हालाँकि अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट के मार्ग-दर्शक की भूमिका दी है - किंतु डिस्ट्रिक्ट के मार्ग-दर्शक को कोर टीम के तथाकथित सदस्यों को संबोधित करने का मौका सबसे आखिर में बचे-खुचे समय में तब दिया गया, जब कार्यक्रम ख़त्म होने की मनोदशा में आ चुका था, और लोगों ने अपने अपने घर वापस लौटने की तैयारी करना शुरू कर दिया था । रूपक जैन ने स्वयं इस स्थिति का शिकायती स्वर में जिक्र किया और यह शिकायत करते हुए ही आगे कुछ भी कहने से इंकार कर दिया । लोगों ने पाया/देखा कि वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रूपक जैन का ऐसा अपमान इससे पहले शायद ही कभी हुआ हो - और उन्होंने रूपक जैन को इससे पहले शायद ही कभी इतना खिन्न और नाराज देखा हो ।
दरअसल यह पूरा आयोजन ही रोटरी को अपमानित करने वाला फर्जी किस्म का आयोजन था । एक सीधी सी कॉमनसेंस की बात है कि सतीश सिंघल ने अभी जब अपने गवर्नर-काल के लिए कोर टीम तय ही नहीं की है, कोर टीम के बारे में - कौन कौन लोग कोर टीम में होंगे तथा किसके पास क्या पद और क्या जिम्मेदारी होगी आदि इत्यादि - किसी को कुछ अतापता ही नहीं है : तब फिर 'डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट' का मतलब भला क्या है ? कई लोगों ने सतीश सिंघल का उपहास उड़ाते हुए टिप्पणियाँ कीं कि सतीश सिंघल को इतनी सी अक़्ल भी नहीं है क्या कि कोर टीम की मीटिंग करने से पहले वह कोर टीम का गठन तो कम से कम कर लें ? कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट हो जाने के बाद भी - सतीश सिंघल के गवर्नर-काल की कोर टीम का अभी भी कोई अतापता नहीं है ।  
इसी बात ने वास्तव में आयोजन में समय और पैसा खर्च करने वाले लोगों को निराश किया और भड़काया हुआ है । आयोजन में लोग दरअसल शामिल ही इसलिए हुए थे, ताकि वह सतीश सिंघल की कोर टीम में अपनी जगह सुनिश्चित करवा लें और अपने लिए महत्त्वपूर्ण पद का जुगाड़ कर लें । कोर टीम में शामिल होने की इच्छा रखने वाले लोगों को लगा कि वह यदि इस आयोजन में शामिल नहीं होंगे, तो कहीं ऐसा न हो कि कोर टीम में उन्हें जगह ही न मिले और मनचाहा पद कोई और ले उड़े । पद तो छोड़िए, पूरे आयोजन में लेकिन जब कोर टीम की घोषणा ही नहीं हुई - तो लोगों ने अपने आप को पूरी तरह से लुटा-पिटा महसूस किया । लुटे-पिटे लौटे रोटेरियंस का कहना है कि इससे पहले किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट ने रोटेरियंस को इतना बेवकूफ नहीं बनाया होगा, जितना सतीश सिंघल ने बनाया है ।
आयोजन की एकमात्र उपलब्धि यह रही कि अगले रोटरी वर्ष में असिस्टेंट गवर्नर्स का पद सँभालने वाले लोगों के नाम घोषित हुए । इस घोषणा ने लेकिन सतीश सिंघल की मदद के सहारे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने की उम्मीद लगाए दीपक गुप्ता के लिए गंभीर समस्या पैदा कर दी है । पिछले रोटरी वर्ष में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए वोट इकट्ठा करने की मुहिम में सतीश सिंघल ने जिन जिन लोगों को अपने गवर्नर-काल में असिस्टेंट गवर्नर बनाने का ऑफर दिया था, उनमें से अधिकतर को उन्होंने ठेंगा दिखा दिया है । असिस्टेंट गवर्नर के पद की उम्मीद लगाए लोगों ने सतीश सिंघल द्धारा की गई इस धोखाधड़ी का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में बदला लेने की बातें करना शुरू किया है । इस तरह की बातों से संकेत मिल रहा है कि सतीश सिंघल की बातों में आकर जिन लोगों ने पिछले वर्ष दीपक गुप्ता को वोट दिया था, अब की बार वह उसका उल्टा करेंगे । पिछले रोटरी वर्ष में सतीश सिंघल अपने गवर्नर-काल के पदों का सौदा करके भी दीपक गुप्ता को चुनाव नहीं जितवा सके थे - ऐसे में, सतीश सिंघल की अभी की कार्रवाई से तो दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने और ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो जाने का खतरा पैदा हो गया है ।

Monday, September 12, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रवि चौधरी पर चुनावी गिरोहबाजी का वास्ता देकर उम्मीदवारों से स्पॉन्सरशिप झटकने, और इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की चेतावनी को अनदेखा करने का आरोप

नई दिल्ली । रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों पर दबाव बना कर पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप के नाम पर उनसे पैसे झटकने का जो काम किया है, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में किया गया उनका पहला कार्यक्रम ही विवाद के घेरे में आ गया है । संजीव राय मेहरा ने रवि चौधरी के दबाव में आने से इंकार करके इस विवाद को और हवा दी है । जो सुरेश भसीन, रवि दयाल, अतुल गुप्ता, अमरजीत सिंह - रवि चौधरी के दबाव में फँसने से अपने आप को बचा नहीं सके, उन्होंने पेम वन में कोई खास तवज्जो न मिलने के कारण अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है - जिससे विवाद और भड़का है । रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में शायद यह पहला मौका है जब मौजूदा वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के हाथों अपनी 'जेब कटवाई' । रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में चलती आ रही 'प्रथा' के अनुसार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों की जेब पर उस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही 'हक़' माना जाता है; रवि चौधरी पहले ऐसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं, जिन्होंने इस प्रथा को तोड़ने का काम किया है - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'माल' पर ही हाथ साफ कर दिया है । रवि चौधरी ने एक बड़ा काम और किया है : रोटरी और डिस्ट्रिक्ट की प्रथा के अनुसार, उम्मीदवार लोग पेट्स में पैसा लगाते हैं; रवि चौधरी ने लेकिन पेम में ही उम्मीदवारों से पैसा लगवा लिया है । इन बातों पर पेम में उपस्थित लोगों के बीच चर्चा छिड़ी, तो एक गंभीर आरोप यह भी सुनने को मिला कि रवि चौधरी ने कोर टीम के पद 'बेचे' हैं, और कोर टीम के कुछेक सदस्यों से तो एक एक लाख रुपए तक लिए हैं । प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इन चर्चाओं और आरोपों की जानकारी रवि चौधरी को भी मिली, तो पोल खुलने के डर से उनका मूड ऐसा उखड़ा कि फिर वह पेम वन में अपना भाषण भी ठीक से नहीं दे सके ।
चर्चा/आलोचना बढ़ी, तो फिर रवि चौधरी की तरफ से भी मोर्चा संभाला गया और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने जबाव में बताया कि कोर टीम के जिन सदस्यों से एक एक लाख रुपए लिए गए हैं, वह वास्तव में उधार लिए गए हैं - जिसकी जरूरत पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के लिए पड़ी । बताया गया है कि जिन लोगों से एक एक लाख रुपए लिए गए हैं, उन्हें यह बात बता भी दी गई है - इसलिए कोर टीम के पद बेचे जाने का आरोप पूरी तरह झूठा है । रवि चौधरी की बदकिस्मती है कि यह जबाव किसी के गले नहीं उतर रहा है । लोगों का कहना है कि पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चे रवि चौधरी को या तो अपनी जेब से करने चाहिए थे, और या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम को विश्वास में लेकर डिस्ट्रिक्ट फंड से उन खर्चों को पूरा करना चाहिए था - यह पैसे सचमुच में यदि वापस हो जाने थे, तब फिर इन दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करने की बजाए कोर टीम के सदस्यों से पैसे क्यों लिए गए ? डिस्ट्रिक्ट में चूँकि अधिकतर लोगों को रवि चौधरी के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर असित मित्तल के साथ हुए लेनदेन तथा उसके ऑफ्टर इफेक्ट्स की जानकारी है, इसलिए पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के नाम पर लिए गए पैसों को विवाद छिड़ने के बाद उधार बताने के तर्क को हजम कर पाना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है । दरअसल यह विवाद शुरू ही इस कारण से हुआ - क्योंकि पेम वन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के नाम पर कोर टीम के जिन सदस्यों से एक एक लाख रुपए लिए गए, खुद उन्होंने ही मान लिया और लोगों के बीच कहना/बताना शुरू कर दिया कि उनसे तो उन्हें कोर टीम का सदस्य बनाने की कीमत ले ली गई है ।
रवि चौधरी के समर्थकों व शुभचिंतकों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों से पैसे लेने के आरोपों का तकनीकी आधार पर बचाव करते हुए दावा किया कि किसी भी उम्मीदवार से व्यक्तिगत रूप में कोई पैसा नहीं लिया गया है; उम्मीदवारों के क्लब्स ने पेम वन को स्पॉन्सर किया है । तकनीकी रूप से यह बात सही भी है । रोटरी में वास्तव में व्यक्ति का, व्यक्ति के रूप में रोटेरियन का कोई महत्त्व नहीं है; महत्त्व क्लब का है; इसलिए कोई भी काम व्यक्ति ही करते हैं, लेकिन वह होता है क्लब के नाम पर । इसी 'व्यवस्था' का फायदा उठा कर रवि चौधरी के समर्थक व शुभचिंतक रवि चौधरी को आरोपों से बचाने की कोशिश रहे हैं । उनकी इस कोशिश से हालाँकि कोई फायदा होता हुआ दिखा नहीं है, क्योंकि हर कोई इतनी सी बात समझता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का 'इस वर्ष का' कोई भी उम्मीदवार और या उनका क्लब अगले रोटरी वर्ष के क्लब-अध्यक्षों के कार्यक्रम में 'बिना किसी दबाव' के पैसा भला क्यों खर्च करेगा ? जाहिर है कि रवि चौधरी ने यह जता/बता कर कि भले ही वह अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे - लेकिन वह इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए इस वर्ष के उम्मीदवारों को भी उन्हें गंभीरता से लेना होगा - उम्मीदवारों से उन्होंने स्पॉन्सरशिप जुटा ली । रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स दीपक तलवार, सुशील खुराना, विनोद बंसल सहित अन्य कई प्रमुख रोटेरियंस के समर्थन का दावा करते हुए बताते हैं कि अगला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी भी वही बनेगा - जिसे 'हम' समर्थन देंगे । इस तरह के दावों के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के इस बार के उम्मीदवार रवि चौधरी के कार्यक्रम पेम वन को स्पॉन्सर करने के लिए मजबूर हुए, जिसमें हालाँकि उनके लिए फजीहत की बात यह रही कि उन्हें कोई तवज्जो भी नहीं मिली । 
यहाँ इस तथ्य पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि पिछले वर्ष तक पेम वन के आयोजन के लिए छह/आठ और ज्यादा से ज्यादा दस क्लब्स की स्पॉन्सरशिप काफी होती थी; रवि चौधरी ने लेकिन 19 क्लब्स की स्पॉन्सरशिप जुटाई । उनके समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि किसी काम को अच्छे से करने के लिए पैसे तो ज्यादा लगते ही हैं । कुछेक लोगों को यह तर्क उस तर्ज का लगता है, जो अक्सर ही अख़बारों में पढ़ने को मिलता है - जिसके अनुसार गर्लफ्रेंड्स को महँगे गिफ्ट देने की व्यवस्था करने के लिए लड़कों को झपटमारी, चोरी और लूट करने के लिए 'मजबूर' होना पड़ता है । रवि चौधरी के समर्थकों व शुभचिंतकों के तर्क सुन कर लोगों का कहना रहा कि अपने आयोजनों को पहले तो महँगा करने/बनाने और फिर उसके लिए खर्चा जुटाने के लिए रवि चौधरी यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों पर दबाव बनायेंगे और चुनावी गिरोहबाजी करेंगे, तो यह डिस्ट्रिक्ट के लिए बहुत ही आत्मघाती होगा । इस तरह की हरकतों के चलते पिछले रोटरी वर्ष में ही डिस्ट्रिक्ट ने बड़ी बदनामी कमाई है । अभी पिछले सप्ताह ही इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने डिस्ट्रिक्ट में राजनीति करने वाले रोटेरियंस के लिए एक बड़ा कर्रा सा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी है - उसके बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में रवि चौधरी ने चुनावी राजनीति की आड़ में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों से जेब ढीली करवा ली है । जाहिर है कि मनोज देसाई की चेतावनी को रवि चौधरी गीदड़ भभकी समझ रहे हैं, और चेतावनी की उन्हें कोई परवाह नहीं है ।

Saturday, September 10, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में मचे बबाल ने आलोक गर्ग के साथ-साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार अशोक जैन की मीटिंग के आयोजनकर्ता की भूमिका निभाने के कारण आलोक गर्ग अपने ही क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में मुसीबत में फँस गए हैं । क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने इस बात पर नाराजगी और क्षोभ व्यक्त किया है कि उन्हें पूरी तरह से अँधेरे में रख कर आलोक गर्ग ने जिस तरह की सक्रियता के साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन हेतु शहर के एक होटल में मीटिंग आयोजित की, वह सीधे सीधे क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करना है और क्लब को धोखा देना है । आलोक गर्ग को संकेत दे दिया गया है कि इस तरह का काम उन्होंने यदि दोबारा किया, तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी - जिसके तहत क्लब से उनका निष्कासन भी हो सकता है । आलोक गर्ग ने हालाँकि यह तर्क देते हुए अपना बचाव करने की कोशिश की कि उन्होंने जो कुछ भी किया, वह व्यक्तिगत हैसियत में किया और कहीं भी क्लब का नाम इस्तेमाल नहीं किया । उनका कहना रहा कि रोटरी और डिस्ट्रिक्ट को प्रभावित करने वाले किसी भी काम में व्यक्तिगत रूप में शामिल होने का उन्हें पूरा अधिकार है, और इसके लिए क्लब के पदाधिकारियों से अनुमति लेने की और उन्हें सूचित करने की कोई जरूरत नहीं है । आलोक गर्ग ने शिकायती अंदाज़ में यह भी कहा कि क्लब के दूसरे वरिष्ठ सदस्य भी मनमाने तरीके से और क्लब के पदाधिकारियों की अनुमति लिए बिना अपनी अपनी 'राजनीति' करते ही हैं, ऐसे में आखिर सिर्फ़ उन्हें ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है ?
आलोक गर्ग की इन बातों ने मामले को और भड़का दिया है । क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने साफ कह दिया है कि व्यक्तिगत अधिकार के नाम पर किसी को भी निर्णायक और/या 'निर्णायक-से दिखते' काम करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है । उनका कहना है कि रोटरी और डिस्ट्रिक्ट को प्रभावित करने वाले किसी काम को लेकर क्लब का कौन सदस्य क्या सोच रखता है, या डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में सदस्य की क्या राय या पसंद है - इससे क्लब को कोई मतलब नहीं है; क्लब का कौन सदस्य किस राजनीति के साथ है, किससे मिलता/जुलता है, किसके साथ उठता/बैठता है, क्या बात करता है - इससे क्लब को कोई मतलब नहीं है; लेकिन किसी भी काम में निर्णायक और/या 'निर्णायक-से दिखते' रवैए को अपनाने का अधिकार किसी भी सदस्य को नहीं दिया जा सकता है । क्लब के वरिष्ठ सदस्यों पर मनमाने तरीके से और क्लब के पदाधिकारियों की अनुमति लिए बिना 'राजनीति' करने का आलोक गर्ग ने जो आरोप लगाया है, क्लब के पदाधिकारियों ने उसे बहुत गंभीरता से लिया है और आलोक गर्ग से पूछा है कि जिस तरह की भूमिका उन्होंने अशोक जैन की मीटिंग को लेकर निभाई है, वैसी भूमिका क्लब के किस सदस्य ने किस संदर्भ में कब कहाँ निभाई है ? क्लब के पदाधिकारियों की तरफ से आलोक गर्ग को बता दिया गया है कि दूसरों पर झूठा आरोप लगा कर, अपने पर लगे आरोप से बचने की उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाएगी ।
क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों के कड़े रवैए के चलते आलोक गर्ग क्लब में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं, और अन्य कोई सदस्य उनका बचाव करता हुआ नहीं दिख रहा है । क्लब में जिन्हें आलोक गर्ग के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना भी जाता है, उनका भी मानना और कहना है कि आलोक गर्ग को अशोक जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन के संबंध में होने वाली मीटिंग की इस तरह खुल्लमखुल्ला जिम्मेदारी नहीं लेनी/निभानी चाहिए थी; आलोक गर्ग को समझना चाहिए कि रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ की डिस्ट्रिक्ट में एक खास पहचान और प्रतिष्ठा है - अपनी राजनीति के चलते आलोक गर्ग को क्लब की इस पहचान व प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करते हुए उसे दाँव पर लगाने का कोई काम नहीं करना चाहिए । क्लब के सदस्यों का कहना है कि आलोक गर्ग को राजनीति करना है और अशोक जैन की उम्मीदवारी को प्रमोट करना है, तो जरूर करें और खूब करें - लेकिन ऐसी होशियारी से करें कि अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए समर्थन  भी बढ़े और क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा पर भी आँच न आए । क्लब के लोगों ने ही बताया कि क्लब के कुछेक सदस्य दीपक गुप्ता की तो अन्य कुछेक लोग ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन की बातें करते ही हैं, लेकिन कोई भी आलोक गर्ग की तरह अपने समर्थन वाले उम्मीदवार का झंडा नहीं उठाए हुए है - और आलोक गर्ग की तरह क्लब को बदनाम नहीं करवा रहा है ।
आलोक गर्ग पर आरोप है कि अभी हाल ही में गाजियाबाद के एक होटल में अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए 'लाइक मांइडेड' लोगों को 'चार्ज' करने के उद्देश्य से आयोजित हुई मीटिंग के निमंत्रण उन्होंने दिए । उल्लेखनीय है कि कुछेक लोगों को मीटिंग का निमंत्रण अशोक जैन की तरफ से तो मिला ही, आलोक गर्ग की तरफ से यह कहते हुए भी उन्हें निमंत्रण मिला कि 'लाइक माइंडेड' लोग तथा कोर टीम के लोग अशोक जैन की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के तरीकों पर विचार करेंगे । मीटिंग को संयोजित करने का काम भी आलोक गर्ग ही कर रहे थे । मीटिंग में किसी ने चुटकी लेते हुए आलोक गर्ग से पूछा भी कि क्या वह अपने क्लब का वोट अशोक जैन को दिलवा सकेंगे ? प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आलोक गर्ग ने अपने जबाव में विश्वास बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि जब मैं अशोक जैन के साथ हूँ, तो समझिए कि मेरा क्लब भी उनके साथ है । आलोक गर्ग की इस सक्रियता और इस तरह की बातों की जानकारी जब उनके क्लब के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ सदस्यों को लगी, तो उनके बीच नाराजगी पैदा हुई । उनका कहना है कि क्लब में बात और फैसला हुए बिना आलोक गर्ग चुनावी राजनीति में अपनी सक्रियता तथा अपनी बातों से क्लब को जिस तरह एक पक्ष की तरफ 'दिखाने' की कोशिश कर रहे हैं, उसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । आलोक गर्ग की भूमिका को लेकर रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में जो बबाल मचा है, उसने आलोक गर्ग के साथ-साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है ।

Thursday, September 8, 2016

तो क्या सचमुच में रोटरी इंटरनेशनल के मौजूद डायरेक्टर मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता और कमल सांघवी को अगले इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की जिम्मेदारी ले ली है ?

नई दिल्ली । दुबई में 16 से 18 दिसंबर के बीच हो रहे साऊथ एशिया जोन इंस्टीट्यूट के आयोजन में भूमिका निभाने वाले पदाधिकारियों की सूची का यदि कोई 'राजनीतिक मतलब' सचमुच होता है, तो माना जाना चाहिए कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावों में अशोक गुप्ता और कमल सांघवी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । उल्लेखनीय है कि अशोक गुप्ता जोन 4 से तथा कमल सांघवी जोन 6 ए से इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने के लिए कमर कस चुके हैं । दुबई इंस्टीट्यूट के कन्वेनर के रूप में मनोज देसाई ने इन दोनों को कोर कमेटी में काउंसलर का पद तो दिया ही है, कुछेक और कमेटियों में भी इन्हें जगह दी है । मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता पर कुछ ज्यादा ही मेहरबानी बरसाई है : उन्होंने अशोक गुप्ता को तो कई जगहें दी ही हैं, उनके 'आदमी' के रूप में पहचाने जाने वाले अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई को भी विभिन्न कमेटियों में सटाया है । सिर्फ इतना ही नहीं, अशोक गुप्ता के दबाव में मनोज देसाई को अनिल अग्रवाल को कमेटियों से बाहर रखने के लिए मजबूर तक होना पड़ा । अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के ही पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल ने पिछले महीनों में रोटरी इंडिया लिटरेसी मिशन में बहुत ही बढ़-चढ़ कर काम किया है, और इस कारण से वह जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच तो खासतौर से पहचाने जाते हैं । रोटेरियंस के बीच उनकी पहचान अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई से तो बहुत बहुत ज्यादा है - इन तीनों से वह बस एक ही बात में पिछड़े हुए हैं, वह अशोक गुप्ता के 'मैन फ्राइडे' नहीं बन पाए; और इस कारण से वह अशोक गुप्ता को फूटी आँख भी नहीं सुहाते हैं । मनोज देसाई ने किसी किसी से कहा भी कि वह तो अनिल अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की किसी कमेटी में रखना चाहते थे, किंतु अशोक गुप्ता के विरोध को देखते हुए फिर उन्होंने अपना विचार त्याग दिया ।
कमल सांघवी अपने 'आदमियों' को तो कमेटियों में जगह नहीं दिलवा सके - हालाँकि इस बात को वह यह कहते हुए अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं कि कमेटियों में जो लोग हैं, वह सब उन्हीं के तो 'आदमी' हैं - किंतु कमल सांघवी पर मनोज देसाई ने एक अलग तरीके से मेहरबानी की है । जोन 6 ए में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए कमल सांघवी के जो संभावित प्रतिद्धंद्धी हैं, मनोज देसाई ने उन्हें कमेटियों से दूर ही रखा है । इससे कमल सांघवी को अपने मतदाताओं को यह समझाना आसान होगा कि जो लोग इंस्टीट्यूट जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन की करीब 170 सदस्यीय टीम में जगह नहीं बना सके, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर कैसे बनेंगे ? अशोक गुप्ता को यह 'सुविधा' नहीं मिल पाई है । उनके संभावित प्रतिद्धंद्धियों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे भरत पांड्या और रंजन ढींगरा को कमेटियों में जगह मिली है - रंजन ढींगरा को तो कई जगहों के साथ-साथ 28 सदस्यीय कोर टीम में भी जगह मिली है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए टीम गठित करने में मनोज देसाई ने सबसे बड़ा झटका मुकेश अरनेजा को दिया है । पिछले चौदह महीने से, जबसे मनोज देसाई ने इंटरनेशनल डायरेक्टर का पदभार संभाला है - डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा उनके साथ अपनी नजदीकी का बख़ान करते रहे हैं, किंतु अब वह मनोज देसाई को कोसते हुए सुने जा रहे हैं । यह स्वाभाविक भी है । मनोज देसाई ने जिस बेरहमी के साथ मुकेश अरनेजा को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अपनी गुड बुक से निकाल बाहर फेंका है, वह मुकेश अरनेजा के लिए भारी फजीहत की बात है । उनकी फजीहत इस कारण से भी है, क्योंकि आजकल डिस्ट्रिक्ट में उनके चिर प्रतिद्धंद्धी के रूप में देखे/पहचाने जा रहे रमेश अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की टीम में जगह मिली है । मुकेश अरनेजा के लिए इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह हुई है कि जिन निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को वह कुछ समझते ही नहीं हैं और जिन पर कुछेक अहसान करने उन्हें अपनी 'तरफ' करने की कोशिशों में लगे हैं, उन जेके गौड़ तक को इंस्टीट्यूट टीम में जगह मिल गई है । मुकेश अरनेजा दावा करते रहे हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी के अत्यंत सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने मनोज देसाई को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनने/चुनवाने में जो भूमिका निभाई थी, मनोज देसाई उसके लिए उनका बहुत अहसान मानते हैं, और उनके काम आते हैं । मुकेश अरनेजा लेकिन अब मनोज देसाई को अहसान फरामोश की उपाधि देते फिर रहे हैं । समझा जाता है कि पिछले दिनों ही मुकेश अरनेजा ने अपने क्लब में वरिष्ठ पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ जिस तरह की ब्लैकमेलिंग करने की कोशिश की, और जिससे पैदा हुए विवाद के कारण वह अंततः क्लब से निकल भागने के लिए मजबूर हुए - उससे मुकेश अरनेजा की रोटरी समुदाय में बहुत ही बदनामी हुई है, जो अभी तक की उनकी बदनामी पर काफी भारी पड़ी है । मुकेश अरनेजा की इस नई हरकतपूर्ण बदनामी को देखते हुए ही मनोज देसाई ने उन्हें इंस्टीट्यूट की टीम से बाहर रखने में ही अपनी भलाई देखी है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम की सूची विनोद बंसल के लिए भी खतरे की घंटी बजाती हुई सी लगती है । इंस्टीट्यूट टीम में डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को एक कमेटी में हालाँकि को-चेयरमैनी तो मिली है - लेकिन इस पद को रोटरी में उनकी सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं देखा/पहचाना जा रहा है । को-चेयरमैनी तो एक अन्य कमेटी में जेके गौड़ को भी मिली है - जो रोटरी में सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के मामले में उनके सामने कहीं नहीं ठहरते हैं । विनोद बंसल के मनोज देसाई के साथ अच्छे संबंध भी देखे/समझे जाते हैं; इसलिए भी किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि मनोज देसाई की टीम में विनोद बंसल को उनकी उचित जगह आखिर क्यों नहीं मिली ? ऐसे में, विनोद बंसल के साथ हुई इस नाइंसाफी को पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा उन्हें 'चुनावी अपराधी' घोषित करने के फैसले के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का उक्त फैसला लगता है कि अभी विनोद बंसल का पीछा नहीं छोड़ रहा है, और उन्हें अभी वह और परेशान करेगा । दुबई इंस्टीट्यूट की टीम में विनोद बंसल के साथ जो नाइंसाफी हुई है, उसका असर इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए होने वाले चुनाव में उनकी उम्मीदवारी पर भी पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है । उक्त पद के लिए विनोद बंसल का मुकाबला मंजीत साहनी से होने की संभावना दिख रही है । मंजीत साहनी को मनोज देसाई ने दुबई इंस्टीट्यूट के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर्स ट्रेनिंग सेमीनार कमेटी का काउंसलर बनाया है । जाहिर तौर पर इसमें डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए मंजीत साहनी के पक्ष में एक इशारा छिपा है, जो विनोद बंसल के लिए चुनावी मुकाबले को थोड़ा चुनौतीपूर्ण तो बनाता ही है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम में मनोज देसाई की मेहरबानियों की वास्तविक बारिश लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3131 के अभय गाडगिल पर हुई है । अभय गाडगिल हैं तो अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट - लेकिन उन्हें दुबई इंस्टीट्यूट की कोर कमेटी में जगह मिलने के साथ-साथ ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी जैसा प्रमुख पद भी मिला है । सिर्फ इतना ही नहीं, उनकी पत्नी दीपा गाडगिल को भी शर्मिष्ठा देसाई के नेतृत्व वाली सात सदस्यीय स्पाउस प्रोग्राम कमेटी में जगह मिली है । इस तरह मनोज देसाई ने अभय गाडगिल को रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया जोन के रोटेरियंस के बीच बड़ी ऊँचाई पर प्रतिष्ठित करने का काम तो कर दिया है - पर अभय गाडगिल इस ऊँचाई पर बने/टिके रहेंगे, यह देखने की बात होगी ।

Wednesday, September 7, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 की चुनावी राजनीति में मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल को अप्रासंगिक बना देने की रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की कोशिशें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को भी प्रभावित करेंगी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ ने सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए फार्मूला प्रस्तुत करके मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति को तो ठिकाने लगाने का इंतजाम कर ही दिया है, साथ ही साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करने के लिए जाल बिछाया है । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के लोगों ने उक्त दोनों पदों के लिए काउंसिल और गवर्नर्स में वरिष्ठता के आधार पर चयन करने का फार्मूला सुझाया है । यह फार्मूला सुझाते हुए तर्क दिया गया है कि उक्त दोनों पद महत्त्वपूर्ण पद हैं, इसलिए इन पदों के चयन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर रोटरी इंटरनेशनल के बड़े और प्रमुख पदाधिकारियों व नेताओं की निगाह रहती है - इस कारण से इन पदों के चयन को लेकर कोई राजनीति यदि नहीं होगी, तो यह डिस्ट्रिक्ट की पहचान व प्रतिष्ठा के लिए अच्छा होगा । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में वरिष्ठता के आधार पर उक्त दोनों पदों के लिए चयन होने के फार्मूले को यदि स्वीकार कर लिया जाता है, तो उससे डिस्ट्रिक्ट की पहचान और प्रतिष्ठा भले ही बढ़े - लेकिन मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति तो पूरी तरह चौपट हो जाएगी । इन दोनों की निगाह इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता पर है; किंतु वरिष्ठता के अनुसार फैसला होने पर इनका नंबर तो आएगा ही नहीं - और किसी को सीओएल के लिए चुनवा कर अपनी चौधराहट दिखाने का मौका भी इन्हें नहीं मिल पाएगा । वरिष्ठता के आधार पर फैसला हुआ तो एमएल अग्रवाल, एसपी सचदेवा, एसपी मैनी, केके गुप्ता और रूपक जैन के बीच ही उक्त दोनों पद बँट जायेंगे और मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के हाथ में सिर्फ झुनझुना ही बचा रह जाएगा । यदि सचमुच ऐसा हो सका, तो यह 'घटना' डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के अप्रासंगिक होने/पड़ने की शुरुआत का 'उद्घाटन' करेगी ।
उम्मीद है कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल इस फार्मूले का विरोध करेंगे और इसे कामयाब नहीं होने देंगे । समस्या उनके सामने लेकिन यह है कि फिर वह करेंगे क्या ? उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है । ग्यारह सदस्यीय काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में दोनों बुरी तरह से अल्पमत में हैं । मुकेश अरनेजा को रूपक जैन और सतीश सिंघल का समर्थन मिल सकता है; जबकि रमेश अग्रवाल के पास सिर्फ शरत जैन और सुभाष जैन का समर्थन है । एमएल अग्रवाल और केके गुप्ता इन दोनों के ही पूरी तरह खिलाफ हैं । यूँ यह हैं दो ही - लेकिन किसी एक तरफ होकर दूसरे का खेल तो यह बिगाड़ ही सकते हैं । ऐसे में एसपी सचदेवा, एसपी मैनी और जेके गौड़ में से किसी को फुसला/ललचा कर यदि अपने साथ कर भी लेते हैं - तो उससे भी काम तो बनता नहीं है । यह काम बनाने की सोचें भी, तो उसका जबाव भी रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की तरफ से दिया गया है : वरिष्ठता वाला फार्मूला क्रियान्वित न हो पाने की स्थिति में उन्होंने सुझाव रखा है कि बाकी सभी पूर्व गवर्नर्स तो किसी न किसी रूप में डिस्ट्रिक्ट का प्रतिनिधित्व कर ही चुके हैं, इसलिए अब की बार उक्त दोनों पद रूपक जैन और जेके गौड़ के बीच ही तय कर दिए जाएँ । यह सुझाव मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति के लिए और भी ज्यादा खतरनाक है । उक्त दोनों पद यदि रूपक जैन और जेके गौड़ को मिल जाते हैं - और बिना मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के 'समर्थन' के मिल जाते हैं, तो यह बात तो मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की राजनीति के लिए बिलकुल ही डूब मरने वाली बात होगी ।
समझा जाता है कि यह सुझाव रूपक जैन और जेके गौड़ को भी पसंद आ रहा है । रूपक जैन की समस्या यह है कि रोटरी में उनका 'कद' मुकेश अरनेजा से बहुत बड़ा है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में उनकी पहचान मुकेश अरनेजा के 'आदमी' की है । रूपक जैन, मुकेश अरनेजा से ग्यारह वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने थे; पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के साथ उनके बहुत ही नजदीकी और विश्वास के संबंध हैं - लेकिन फिर भी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उन्हें मुकेश अरनेजा के पिछलग्गू के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इस बार उन्हें मौका मिलता दिख रहा है कि वह अपने ऊपर लगे मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के टैग को उतार फेंक सके । जेके गौड़ का मामला तो और भी संगीन व दिलचस्प है : यूँ तो वह रमेश अग्रवाल के खेमे में माने/देखे जाते हैं; लेकिन रमेश अग्रवाल और शरत जैन उन्हें अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं । जेके गौड़ की बदकिस्मती यह है कि इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करते हुए मुकेश अरनेजा और उनके समर्थक भी उन्हें अपनी तरफ मिलाने और उन्हें तवज्जो देने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं - बल्कि जहाँ मौका दिखता है, वहाँ बेइज्जत और कर देते हैं । रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में जेके गौड़ को दोनों खेमों के लोगों ने एकसाथ मिलकर ऐसा 'धोया' था, कि जेके गौड़ को कार्यक्रम के बीच से ही निकल भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ही नहीं, बल्कि उनके समर्थक लोगों ने भी जेके गौड़ को गरीब की ऐसी बछिया समझा हुआ है, कि कोई भी कहीं भी कभी भी उन्हें हुँकार देता है । ऐसा इसलिए है, क्योंकि सभी को लगता है कि जेके गौड़ के बस की कुछ है नहीं, और  अपमानित होते हुए भी वह उनके साथ रहने को मजबूर होंगे । ऐसे में, रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ का सुझाव जेके गौड़ के मन में भी गुदगुदी कर रहा हो - तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी ।
रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के लोगों के सुझावानुसार यदि मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की 'छाया' से बाहर निकल कर रूपक जैन और जेके गौड़ उक्त दोनों पद पा लेते हैं, तो इसका सीधा असर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव पर पड़ेगा - और मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता को तथा रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में अशोक जैन को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा । यह सुझाव किसी और क्लब की तरफ से आता और सफल होता, तो कोई फर्क नहीं पड़ता; लेकिन रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ - जिसके वरिष्ठ सदस्य ललित खन्ना भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी दौड़ में हैं - की तरफ से आने के कारण यह सुझाव और इसकी संभावित सफलता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के समीकरणों पर निश्चित रूप से गुणात्मक असर डालेगी ही । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के पास एक ही रास्ता बचता है, और वह रास्ता है - सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए सीधे चुनाव का रास्ता; इन दोनों पदों के लिए काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में वह कोई फैसला होने ही न दें और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के साथ-साथ वह इन दोनों पदों के लिए भी चुनाव की स्थितियाँ पैदा करें ।
रमेश अग्रवाल पहले एक बार इस तरह का दुस्साहस कर मजा चख चुके हैं, और सीओएल के चुनाव में आशीष घोष से पराजित होकर अपनी फजीहत करवा चुके हैं - इसलिए उम्मीद है कि उस फजीहत को याद करते/रखते हुए वह दोबारा से उस तरह की हरकत नहीं करेंगे । मुकेश अरनेजा को भी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी राजनीतिक 'हैसियत' का अंदाजा है; पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनके उम्मीदवार दीपक गुप्ता को मिली करारी हार में उस 'हैसियत' का सुबूत भी उनके सामने है - इसलिए उम्मीद है कि वह भी चुनाव का रास्ता शायद ही अपनाना चाहें । इससे जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी अहमियत और प्रासंगिकता बचाने/दिखाने के लिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के पास वास्तव में कोई मौका/तरीका नहीं रह गया है; और इन्हें इस दशा में पहुँचाने का काम चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार ललित खन्ना के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की तरफ से हुआ है, इसलिए इनकी यह दशा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करेगी ही । कैसे और कितना प्रभावित करेगी - यह आने वाले दिनों में पता चलेगा ।

Tuesday, September 6, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विजय झालानी के साथ मिलकर तिकड़म लगाने की राकेश मक्कड़ की कोशिशों के बावजूद दीपक गर्ग के 'इस्तिफित चेयरमैन' बने रहने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 'इस्तिफित चेयरमैन' दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी रौनक को देख कर लोगों ने अनुमान लगाया है कि उन्हें अपनी कुर्सी बचने का पूरा भरोसा हो गया है । समझा जाता है कि दीपक गर्ग के इस्तीफे से शुरू हुए नाटक की रूपरेखा तैयार करने वाले मुख्य सूत्रधार राजेश शर्मा को इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी के कड़े रवैए के कारण अपनी योजना समेटनी पड़ रही है, और मामले को 'जहाँ जो जैसा है उसे वहीं पड़ा रहने देने' के लिए मजबूर होना पड़ा है । राजेश शर्मा के पीछे हटने से पंकज पेरिवाल के चेयरमैन बनने की संभावना पर तो ग्रहण लग ही गया है, चेयरमैन बनने की जुगाड़ में लगे दूसरे लोगों को भी अपनी दाल गलती हुई नहीं दिख रही है - और इसलिए वह भी अपनी अपनी कोशिशों को विराम देते हुए नहीं लग रहे हैं । राकेश मक्कड़ को हालाँकि अभी भी उम्मीद लगाए 'उम्मीदवार' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल पिछले दिनों उन्हीं की तरफ से यह बात लोगों को सुनने को मिली थी कि वह अभी हाल ही में सेंट्रल काउंसिल में नोमिनेट हुए विजय झालानी को नौ सितंबर की मीटिंग में लायेंगे तथा सत्ता गिरोह के बहुमत को और बढ़ायेंगे । उस बात से तथा उनकी कुछेक दूसरी बातों से लोगों को लगता है कि विजय झालानी के जरिए वह कोई चक्कर चलाने की फ़िराक में हैं और प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद नया चेयरमैन चुनवाने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं । राकेश मक्कड़ को लगता है कि प्रेसीडेंट के कोड़ा फटकारने के बाद चेयरमैन बनने/बनवाने वाले सारे सूरमा जब बिलों में दुबक गए हैं, तब सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी की मदद से वह चेयरमैन पद पा सकते हैं ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी के नोमीनेट होने से इंस्टीट्यूट की राजनीति में और 'रंगीनियत' व रोचकता आ गई है । इंस्टीट्यूट की राजनीति में नोमिनेटेड सदस्यों की और या उनकी किसी भूमिका की कभी कोई चर्चा नहीं सुनी गई, किंतु विजय झालानी नोमीनेट होते ही चर्चा में आ गए हैं - इससे ही साबित है कि विजय झालानी की बात ही कुछ खास है । वर्ष 1999-2000 में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके विजय झालानी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में काफी सक्रिय रहे हैं, और एनडी गुप्ता खेमे के 'आदमी' के रूप में पहचाने जाते हैं । सेंट्रल काउंसिल के पिछले तीनों चुनावों में उन्होंने एनडी गुप्ता के बेटे नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जमकर काम किया था । अगले चुनाव में उन्हें एनडी गुप्ता खेमे के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । विजय झालानी ने लेकिन सामने के रास्ते से आने की बजाए चोरी-छिपे खिड़की के रास्ते से सेंट्रल काउंसिल में आने का फैसला किया, और आ पहुँचे । इसके लिए उन्हें अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट रजिस्ट्रेशन को छोड़ने की जरूरत थी - जिसे छोड़ने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई । यानि जिस प्रोफेशन से उन्हें नाम और पहचान मिली, उस प्रोफेशन की गवर्निंग बॉडी में पद पाने के लिए उन्होंने उस प्रोफेशन को ही लात मार देने में देर नहीं लगाई । यह कुछ थोड़े से तथ्य जानना इसलिए जरूरी हैं, ताकि इस बात को समझा जा सके कि नोमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी की मौजूदगी क्यों कुछ खास है ? खास होने के कारण ही विजय झालानी के सहारे राकेश मक्कड़ यदि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने की तिकड़म लगा रहे हैं, तो यह बहुत स्वाभाविक सी बात है ।
विजय झालानी के साथ मिलकर राकेश मक्कड़ जो खिचड़ी पकाने की कोशिश कर रहे हैं, दीपक गर्ग और उनके नजदीकी उसे लेकिन गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग के नियमित संपर्क में रहने वाले लोगों में से उन कुछेक का, जिनसे बात हो सकी है, कहना है कि दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी खुशी से संकेत मिल रहा है कि चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर बने रहने का भरोसा मिल गया है । राजेश शर्मा की योजना में पंक्चर हो जाने को दीपक गर्ग अपनी एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं । दीपक गर्ग के चेयरमैन बने रहने की 'स्थितियाँ' बनाए रखने के लिए जो फार्मूला अपनाए जाने की चर्चा है, उसके अनुसार नौ सितंबर को होने वाली मीटिंग में दीपक गर्ग के इस्तीफे पर विचार ही नहीं किया जाएगा : इस तरफ न इस्तीफ़ा अस्वीकार करने की जरूरत पड़ेगी, और न दीपक गर्ग के लिए इस्तीफ़ा वापस लेने की नौबत होगी; और इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग चेयरमैन पर बने रहेंगे । दीपक गर्ग ने इस्तीफ़ा देने के लिए पाँच पृष्ठों में जो कारण बताए हैं, उन्हें देखते हुए तो दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर एक भी दिन बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है; लेकिन जहाँ पद पाने के लिए लोग ईमान और प्रोफेशन छोड़ने को तैयार बैठे हों, वहाँ दीपक गर्ग को नैतिकता की परवाह करने की जरूरत ही क्या है ?
राजेश शर्मा द्धारा संयोजित और निर्देशित नाटक को फेल करने के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट द्धारा जो फार्मूला बताया गया है, उसे नौ सितंबर की मीटिंग में यदि सफलतापूर्वक अपना लिया जाता है; और दीपक गर्ग के चेयरमैन पद पर बने रहने का रास्ता यदि साफ हो जाता है तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में एक नया पद देखने को मिलेगा : इंस्टीट्यूट में चेयरमैन अभी तक दो ही तरह के हैं - एक 'चेयरमैन' और दूसरा 'भूतपूर्व चेयरमैन'; दीपक गर्ग लेकिन तीसरी तरह के चेयरमैन होंगे - 'इस्तिफित चेयरमैन' यानि इस्तीफ़ा देने के बावजूद बना रहने वाला चेयरमैन । इंस्टीट्यूट के इतिहास में ऐसा चेयरमैन पहली बार देखने को मिलेगा ।

Saturday, September 3, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में अधिष्ठापन समारोह के प्रभावी तरीके से हो जाने के कारण योगेश सोनी की बनी धाक ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी लड़ाई में विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान के सामने मुश्किल खड़ी की

लुधियाना । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में जिस तरह से लायंस पदाधिकारियों तथा आम सदस्यों की भीड़ जुटी और समारोह में उपस्थित हुए लोगों ने समारोह की व्यवस्था की जैसी भूरि भूरि प्रशंसा की - उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में योगेश सोनी को अपने डिस्ट्रिक्ट में भी और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों से भी काफी तारीफ सुनने को मिली है । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच तथा उनके जरिए योगेश सोनी को मिल रही इस तारीफ ने लेकिन मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी लड़ाई की अभी तक दबी-छुपी सी सुलग रही आग को भड़काने का काम किया है । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को गरिमापूर्ण तथा प्रभावी तरीके से संपन्न कर लेने के कारण योगेश सोनी को मल्टीपल के प्रमुख लोगों के बीच जो तारीफ मिल रही है, उसके कारण मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनके 'भाव' अचानक से बढ़े हुए 'दिखने' लगे हैं । यह सीन 'बनने' का कारण दरअसल यह रहा कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अन्य जिन दो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर - विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान का नाम सुना जा रहा है, उन दोनों को अपने अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह के कारण भारी फजीहत का सामना करना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि लायनिज्म में डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह पहला ऐसा कार्यक्रम होता है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की लीडरशिप क्वालिटी और संगठन क्षमता की परीक्षा होती है; ऐसे में डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की सफलता/असफलता से ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की 'काबिलियत' का संकेत मिलता है । काबिलियत दिखाने के इस मौके का 'वह' डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अच्छे से फायदा उठाते हैं, जो मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की दौड़ में अपने आप को 'दिखाना' चाहते हैं । मौजूद लायन वर्ष में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अभी तक विनय गर्ग, अनिल तुल्सियान और योगेश सोनी के नाम चर्चा में हैं - इसलिए मल्टीपल के लोगों की इनके डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोहों पर खास निगाह रही है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि उनके डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह - होने से पहले ही विवादों व आरोपों के घेरे में फँस गया । विनय गर्ग के नजदीकियों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को दुबई में करने का फैसला करके विनय गर्ग ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । दुबई में अधिष्ठापन समारोह की तैयारी करने के कारण विनय गर्ग को लायनिज्म में अधिष्ठापन समारोह के महत्त्व तथा उसके बुनियादी उद्देश्य की ही ऐसीतैसी करने के आरोप का सामना करना पड़ा । दुबई के तुलनात्मक रूप से महँगे दिखने वाले पैकेज के कारण उन पर पैसे बनाने के आरोप लगे; कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि दुबई की बुकिंग के लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन पर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार यशपाल अरोड़ा सहित अन्य कुछेक लोगों पर दबाव बनाने के आरोप लगे । इतने गंभीर आरोपों के चलते पैदा हुए विवाद में डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर बनने वाला उत्साह ख़त्म सा ही हो गया है, और उसमें अब सिर्फ तमाशेबाजों की तथा लायनिज्म को तफ़रीह का अड्डा समझने वालों की ही दिलचस्पी बची रह गई नजर आ रही है । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम की इस फजीहत के लिए विनय गर्ग को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । उनके नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि विनय गर्ग लायनिज्म जैसे महत्त्वपूर्ण अभियान को जिस हल्केपन से ले रहे हैं, उसका ही नतीजा है कि उनके डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह सबसे ज्यादा महँगा/खर्चीला और - अगर माना जाए तो - ग्लैमरस होने के बावजूद सबसे ज्यादा फजीहत का शिकार हुआ है; और यह विनय गर्ग की लीडरशिप क्वालिटी को संदेहास्पद बनाता है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 ई के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान की कहानी और भी विचित्र है : हालाँकि अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को बहुत ही प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने वास्तव में कल्पनाशील और रचनात्मक दिमाग लगाया था । इसे साबित करने के लिए एक ही उदाहरण देना काफी होगा : और वह यह कि उन्होंने महीनों पहले ही अधिष्ठापन समारोह की मंच सज्जा की रूपरेखा तैयार कर ली थी, मंच पर बैठने वाले लोगों के लिए ड्रेस कोड सोच लिया था और ड्रेस कोड का कपड़ा अपनी तरफ से मंच के लोगों को उपलब्ध करवा दिया था - ताकि वह समय रहते अपनी नाप की ड्रेस सिलवा लें । इस एक उदाहरण से जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर अनिल तुल्सियान की सोच, योजना और तैयारी कितनी परफेक्ट थी । लेकिन अधिष्ठापन समारोह का दिन नजदीक आते-आते पता नहीं उनका दिमाग खुद पलटा और या उन्हें किसी ने उकसाया - कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल को नीचा दिखाने को ही उन्होंने अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया । इसके चलते जो हालात बने, वह अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि नरेश अग्रवाल के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित करने वाले रवैये में प्रकट हुए - और अधिष्ठापन समारोह की सारी तैयारी तथा भव्यता बर्बाद हो गई । वाराणसी में नरेश अग्रवाल का जो रवैया लोगों को देखने को मिला, उसने लायनिज्म की महान परंपरा और प्रतिष्ठा को तो तार-तार किया ही, नरेश अग्रवाल का भी वास्तविक रूप लोगों को 'दिखाया' - और अनिल तुल्सियान के कार्यक्रम पर जो कालिख पोती, वह अलग । अनिल तुल्सियान और उनके नजदीकियों ने अधिष्ठापन समारोह को कीचड़ बना देने के लिए फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन अधिकतर लोगों का मानना और कहना यही रहा कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल के प्रति निजी खुन्नसबाजी में अनिल तुल्सियान ने अपने ही अधिष्ठापन समारोह को फजीहत का शिकार बना दिया । जो हुआ, उससे लोगों को यही संदेश मिला है कि बेशक अनिल तुल्सियान में काम अच्छे से कर लेने की तैयारी करने का हुनर है - लेकिन साथ साथ बनते हुए काम को अपनी ही हरकत से बिगाड़ लेने की अनोखी काबिलियत भी उनमें है; जिसके चलते उन पर भरोसा करना आत्मघाती भी हो सकता है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी के लिए हालात चुनौतीपूर्ण हैं । पिछले लायन वर्ष में उनके डिस्ट्रिक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए खासा घमासानभरा चुनाव हुआ है, और इस वर्ष के लिए भी चुनावी रणभेरी बज चुकी है । जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट में जबर्दस्त खेमेबाजी है । स्वाभाविक रूप से योगेश सोनी को भी एक खेमे के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इसी बिना पर उनके डिस्ट्रिक्ट में अधिष्ठापन समारोह पर संकट के गहरे बादलों को मंडराते/गरजते 'देखा' जा रहा था । उनके नजदीकियों व शुभचिंतकों के साथ-साथ, डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ लायन सदस्यों को भी डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर चिंता थी । उनकी चिंता यह देख/जान कर और बढ़ी थी कि इस वर्ष मल्टीपल के जिन भी डिस्ट्रिक्ट में अधिष्ठापन समारोह हुए हैं, सभी किसी न किसी कारण से आरोपों व विवादों के घेरे में रहे हैं : कहीं अव्यवस्था का प्रदर्शन था; कहीं डिस्ट्रिक्ट की खेमेबाज़ी अपना रंग दिखा रही थी; कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अपनी खुन्नस और या प्रदर्शनप्रियता बबाल काटे/कटवाए हुए थी । डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में तो बबाल होने के स्पष्ट कारण थे । लेकिन यहाँ अधिष्ठापन समारोह जिस शालीनता, लोगों की संलग्नता और भव्यता के साथ संपन्न हुआ - उसने हर किसी को वास्तव में चौंकाया । इस सफलता के लिए हर किसी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी को जिम्मेदार बताया । दरअसल योगेश सोनी ने अपने आप को किसी एक खेमे के नेता के तौर पर नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर के तौर पर लोगों के बीच प्रस्तुत किया - और हर किसी को उचित सम्मान और तवज्जो दी । अधिष्ठापन समारोह में ज्यादा से ज्यादा लोगों की शिरकत को संभव बनाने के लिए योगेश सोनी ने खुद प्रयत्न किए । इसका उन्हें सुफल मिला - डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने खेमेबाजी की हदों को तोड़ कर और पिछले लड़ाई-झगड़ों को भूल कर भारी रिकॉर्ड संख्या में अधिष्ठापन समारोह में अपनी अपनी भागीदारी को और अपनी संलग्नता को जाहिर किया । डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में अधिष्ठापन समारोह अच्छे से संपन्न हो सका - इसमें यूँ तो बहुत से लोगों की भूमिका रही; किंतु लोगों की भूमिका को संभव करने तथा व्यवस्थित करने का श्रेय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी को ही मिला ।
अधिष्ठापन समारोह को अच्छे से संपन्न कर/करा लेने के कारण मल्टीपल के पदाधिकारियों व नेताओं के बीच योगेश सोनी को जो प्रशंसा मिल रही है, और उनकी लीडरशिप क्षमता का लोहा जिस तरह से माना जा रहा है - उसके बावजूद मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की तरफ के रास्ते विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान के लिए एकदम से बंद नहीं हो गए हैं । मल्टीपल की राजनीति में दखल रखने वाले नेताओं का कहना है कि इन दोनों में ही अच्छी एनर्जी है, और यह अभी हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं - लेकिन इसके लिए इन्हें अपनी गलतियों से सबक सीखना होगा और आगे की अपनी योजनाओं को किंचित होशियारी के साथ लागू करना होगा । विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान ऐसा कर पायेंगे या नहीं, और योगेश सोनी द्धारा प्रस्तुत की गई चुनौती से निपट सकेंगे या नहीं - यह देखना दिलचस्प होगा ।


Thursday, September 1, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सत्ता गिरोह की मनमानी को रोकने में सचमुच सफल हो सकेंगे, और या गिरोह के लोगों की चालबाज़ियों का खुद ही शिकार हो जायेंगे ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग के इस्तीफे से शुरू हुए 'नाटक' पर जो सख़्त रवैया अपनाया है, उससे नाटक के रचयिता और उसके कलाकारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है - और उन्हें अपना नाटक पिटता हुआ दिख रहा है । नाटक के कुछेक कलाकारों ने हालाँकि यह कहते हुए नाटक को अंजाम तक पहुँचाने का दावा तो किया है - कि नाटक की जब अच्छे से रिहर्सल हो चुकी है, नाटक के कलाकार अपनी अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं; और 'दर्शक' भी, चाहे खुशी से और चाहे मजबूरी से, नाटक देखने के लिए तैयार हैं - तो फिर हम नाटक को बीच में ही क्यों रोक दें ? लेकिन सुना जा रहा है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट ने कोड़ा जोर से फटकारा है - और यह स्पष्ट कर दिया है कि वह नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को ऐसी स्टेज नहीं बनने देंगे, जहाँ कोई भी मनमाने तरीके से कैसा भी नाटक खेल जाए । 'दर्शकों' को लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मामला जहाँ है - वहाँ नाटक तो होगा ही; देखने की बात सिर्फ यह है कि किसकी स्क्रिप्ट के अनुसार होगा ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट के अनुसार शुरू हुए नाटक से पैदा हुए बबाल ने हालात तो ऐसे बना ही दिए हैं - कि अब यहाँ से आगे जो कुछ भी होगा, वह खासा नाटकीय और अभूतपूर्व होगा ।
राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट को पसंद न करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने नाटक के अगले दृश्य के लिए अपनी स्क्रिप्ट दी है - जिसके अनुसार या तो दीपक गर्ग अपना इस्तीफ़ा बिना शर्त वापस लें और चेयरमैन पद का अपना कार्यकाल पूरा करें; अन्यथा इंस्टीट्यूट प्रशासन रीजनल काउंसिल को एक प्रशासक के सहारे चलायेगा । देवराज रेड्डी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दीपक गर्ग के इस्तीफ़े के जरिए चेयरमैन पद के कार्यकाल को छह-छह महीने कर देने की जिस योजना को क्रियान्वित करने की बात सुनी जा रही है, उसे किसी भी दशा में क्रियान्वित नहीं होने दिया जायेगा । रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के लोग प्रेसीडेंट के इस रवैए को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं : इस संबंध में उनका बड़ा मासूम सा तर्क है और वह यह कि चेयरमैन यदि अपने पद पर नहीं बने रहना चाहता है और वह अपना पद छोड़ देता है, तो बाकी सदस्य काउंसिल का नया चेयरमैन चुनेंगे ही न ? इसमें गलत क्या है ? चालाकी भरी इस मासूमियत को दरअसल भरोसा है कि चेयरमैन के चुनाव में बहुमत का ही पलड़ा भारी होता है, और बहुमत उनके पास है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट का मानना और कहना किंतु यह है कि बहुमत के नाम पर किसी को भी नंगा नाच करने का अधिकार तो लेकिन नहीं दिया जा सकता है न ? देवराज रेड्डी को एक कठोर प्रशासक के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और माना जाता है कि वह एक बार जो करने की ठान लेते हैं, उसे फिर पूरा करके ही दम लेते हैं । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो सत्ता गिरोह है, उसकी मनमानी नहीं चल पायेगी और उन्होंने जो नाटक शुरू किया है, वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के कारण पूरा नहीं हो पायेगा ।
मजे की बात यह भी है कि रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के कुछेक सदस्य देवराज रेड्डी के इस सुझाव को स्वीकार कर लेने की भी बात करने लगे हैं, जिसमें दीपक गर्ग के इस्तीफ़े के वापस होने का विकल्प दिया गया है । दीपक गर्ग भी यही चाहते हैं, और सत्ता गिरोह के सदस्यों में उन्हें कुछेक समर्थक भी मिल गए हैं । यहाँ इस बात को याद करना प्रासंगिक होगा कि दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफ़े के साथ ही इस तरह का माहौल बनाना और लोगों को यह बताना शुरू कर दिया था कि उनसे जबर्दस्ती इस्तीफ़ा लिखवाया गया है । दीपक गर्ग ने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा नहीं दिया है, और देवराज रेड्डी के रवैए से उन्हें अपना चेयरमैन का पद बचता हुआ दिख रहा है - लेकिन वह सचमुच पद बचा पायेंगे, इसमें कुछ मुश्किलें हैं । उनके नजदीकियों के बीच ही सवाल है कि दीपक गर्ग अपना इस्तीफ़ा यदि वापस लेते हैं, तो क्या लोगों के बीच इसे अपने ही थूके हुए को चाटने जैसे मामले के रूप में नहीं देखा जायेगा ? दीपक गर्ग के लिए इस्तीफ़ा वापस लेने का सिर्फ एक ही 'रास्ता' है - और वह यह कि अपने इस्तीफ़े के लिए उन्होंने जिस इंस्टीट्यूट प्रशासन यानि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को जिम्मेदार ठहराया है, वह उनसे माफी माँगे और इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए अनुरोध करे । ऐसा हो पाना असंभव है । दीपक गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह है कि अपने इस्तीफ़े में उन्होंने जिस इंस्टीट्यूट प्रशासन यानि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को जिम्मेदार ठहराया है - वह उनके आरोपों को सच मानने, स्वीकार करने तथा माफी माँगने की बजाए उनसे कह रहा है कि - बकवास बंद करो, इस्तीफ़ा वापस लो और अपना काम करो । ऐसे में, दीपक गर्ग यदि काउंसिल के चेयरमैन पद से अपना इस्तीफ़ा वापस लेते हैं, तो यह उनके लिए और भी ज्यादा फजीहत की बात होगी ।
ऐसे में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को इंस्टीट्यूट प्रशासन द्धारा थोपे गए किसी प्रशासक के हाथों में जाने से रोकने के एक सम्मानजनक तरीके के रूप में कुछेक लोगों की तरफ से आए इस सुझाव की चर्चा भी जोरों पर है - जिसमें कहा गया है कि रीजनल काउंसिल का सत्ता गिरोह बहुमत में होने का घमंड छोड़े और रीजन के सभी चुने हुए सदस्यों की आपसी सहमति से चेयरमैन का चुनाव करे, तथा उस चुनाव को स्वीकार करने के लिए प्रेसीडेंट को राजी करे । यह सुझाव देने/रखने वाले लोगों का विश्वास है कि रीजन के सभी चुने हुए सदस्य जब मिलजुल कर लिए गए अपने किसी फैसले के साथ प्रेसीडेंट से बात करेंगे, तो प्रेसीडेंट उनके फैसले को स्वीकार करने के लिए राजी हो जायेंगे । इस तरीके से सभी का सम्मान भी बचा/बना रहेगा, और रीजनल काउंसिल किसी प्रशासक के हाथों में जाने से भी बच जाएगी । यह देखना दिलचस्प होगा कि रीजनल काउंसिल का सत्ता गिरोह अपने आपको और ज्यादा फजीहत से बचाने के लिए इस तरह के किसी सर्वसम्मत फैसले पर पहुँचने के सुझाव पर काम करेगा, या बहुमत की दादागिरी के नाम पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी से दो-दो हाथ करने की तैयारी करेगा ?