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Sunday, June 28, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के खुले सहयोग व समर्थन के बावजूद, जोन 7 में डायरेक्टर पद का चुनाव जीते रवि वदलमानी, पराजित हुए उम्मीदवार सैम मोव्वा की तरफ से हुई चुनावी शिकायत का शिकार होने से नहीं बच सके और जीता-जिताया इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद खो बैठे

नई दिल्ली । सैम मोव्वा (के क्लब) की शिकायत ने इंटरनेशनल डायरेक्टर इलेक्ट रवि वदलमानी को तो 'डुबोया' ही, खुद सैम मोव्वा को भी ले डूबी - और इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी को भी बदनामी के छींटों से भिगो बैठी । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने जोन 7 में हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव और उसके नतीजे को रद्द कर दिया है, और फिर से चुनाव करवाने का फैसला सुनाया है । उक्त चुनाव में पराजित हुए सैम मोव्वा के क्लब की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत की गई थी कि चुनाव जीतने के लिए रवि वदलमानी ने कैम्पेन चलाया, और इस तरह रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का उल्लंघन किया है । रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से एक जाँच-टीम बनाई गई, जिसने अपनी जाँच-पड़ताल में पाया कि उम्मीदवार के रूप में न सिर्फ रवि वदलमानी ने - बल्कि सैम मोव्वा ने भी कैम्पेन किया था । इस रिपोर्ट के आधार पर, रोटरी इंटरनेशनल ने उक्त चुनाव को तथा उसके नतीजे को अमान्य घोषित कर दिया - तथा दोबारा चुनाव करवाने का फैसला सुनाया । रवि वदलमानी तथा सैम मोव्वा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने दोबारा होने वाले चुनाव में इन दोनों के उम्मीदवार बनने पर रोक लगा दी है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का यह फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के लिए इसलिए झटके वाला माना/समझा जा रहा है, क्योंकि रवि वदलमानी के कैम्पेन में कमल सांघवी ने खूब बढ़चढ़ कर भाग लिया था - कमल सांघवी चूँकि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के सदस्य हैं, इसलिए माना/समझा जा रहा था कि सैम मोव्वा (के क्लब) की शिकायत पर बोर्ड में रवि वदलमानी को नुकसान पहुँचाने वाला फैसला नहीं हो सकेगा । दरअसल इसीलिए, रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के लिए भी झटके वाला साबित हुआ है ।
इस फैसले के पीछे रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन को देखा/पहचाना जा रहा है, और माना जा रहा है कि रवि वदलमानी रोटरी लीडरशिप की खेमेबाजी की 'लड़ाई' के शिकार बन गए हैं । उल्लेखनीय है कि सैम मोव्वा को पूर्व प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन के तथा रवि वदलमानी को भावी प्रेसीडेंट शेखर मेहता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - और इस तरह से, उक्त चुनाव के जरिये वास्तव में केआर रविंद्रन व शेखर मेहता की राजनीतिक 'ताकत' को आँकने की तैयारी हो रही थी । चुनावी प्रक्रिया के पहले चरण में, नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा सैम मोव्वा को अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से केआर रविंद्रन का पलड़ा भारी साबित हुआ; लेकिन रवि वदलमानी से चेलैंज करवा कर शेखर मेहता खेमे ने पहले चरण में हारी हुई बाजी को दूसरे चरण में जीतने की तैयारी की । रवि वदलमानी की जीत को सुनिश्चित करने के लिए ही शेखर मेहता खेमे की तरफ कमल सांघवी ने रवि वदलमानी की उम्मीदवारी की कमान संभाली । समझा जाता है कि इसी बात से चिढ़ कर केआर रविंद्रन खेमे के नेताओं ने, चुनाव में विजयी हुए रवि वदलमानी की जीत पर ग्रहण लगाने के उद्देश्य से सैम मोव्वा (के क्लब) की तरफ से शिकायत दर्ज करवाई गई । रवि वदलमानी और उनके समर्थकों ने उक्त शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया; उन्हें विश्वास रहा कि कमल सांघवी ने जैसे उनके कैम्पेन को संभाला, वैसे ही इंटरनेशनल बोर्ड में शिकायत को भी 'संभाल' लेंगे । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, वह इसलिए भी निश्चिंत रहे, क्योंकि उन्हें यकीन रहा कि यह मामला अगले रोटरी वर्ष में होने वाली मीटिंग में आयेगा - जब शेखर मेहता भी बोर्ड में होंगे, और तब रवि वदलमानी के खिलाफ कोई फैसला नहीं हो सकेगा । रवि वदलमानी और उनके छोटे-बड़े समर्थकों को यह उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी कि उक्त मामला मौजूदा रोटरी वर्ष में ही रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की कार्रवाई में आ जायेगा, और उनकी चुनावी जीत के लिए मुसीबत बन जायेगा ।
रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले से झटका खाए रवि वदलमानी और उनके समर्थकों के लिए राहत की बात यही है कि 'सजा' यदि रवि वदलमानी को मिली है, तो सैम मोव्वा भी अपनी ही शिकायत के शिकार हुए हैं; और इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद यदि रवि वदलमानी से छिना है, तो सैम मोव्वा के लिए भी उक्त पद पाने की संभावना समाप्त हुई है । इस फैसले के सामने आने के बाद से, मजे की बात यह देखने/सुनने को मिल रही है कि कमल सांघवी के नजदीकी यह बताने/जताने/दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि कमल सांघवी यदि रवि वदलमानी का डायरेक्टर पद नहीं बचा सके हैं, तो उन्होंने सैम मोव्वा के लिए भी डायरेक्टर पद की कुर्सी पाने की संभावना नहीं बची रहने दी है - और इस तरह, मामले को 'बराबर' का बना दिया है । इस बताने/जताने/दिखाने को कमल सांघवी की तरफ से 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । कमल सांघवी के नजदीकियों का कहना है कि उनकी कोशिश है कि जोन 7 में हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर हुई उठापटक उनकी 'स्थिति' पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले, और रोटेरियंस उन्हें 'कमजोर' न समझने लगें । वैसे, रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के इस फैसले ने अधिकतर रोटेरियंस को हैरान ही किया है - क्योंकि वह तो हर चुनाव में उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को कैम्पेन करते हुए 'देखते' और सुनते हैं । रोटरी में होने वाले छोटे से छोटे चुनाव में बड़े बड़े नेताओं और पदाधिकारियों को कैम्पेन करते हुए देखा और सुना जाता है - उसकी शिकायतें भी होती हैं, लेकिन कार्रवाई होते हुए कभी-कभार ही देखा गया है । ऐसे में, रोटेरियंस को यही लग रहा है कि कैम्पेन करने जैसी शिकायतों पर कार्रवाई तभी होती है - जब बड़े नेताओं और पदाधिकारियों को अपने 'स्कोर सेटल' करने होते हैं ।  

Sunday, September 17, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर कमल सांघवी की जीत तो निश्चित रूप से उनकी ही जीत है; लेकिन भरत पांड्या की जीत वास्तव में अशोक गुप्ता की हार है और अशोक गुप्ता को भरत पांड्या ने नहीं, बल्कि खुद अशोक गुप्ता ने ही हराया है

नई दिल्ली । रोटरी इंटरनेशनल के जोन 6 ए में कमल सांघवी तथा जोन 4 में भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में जो जीत मिली है, वह अप्रत्याशित तो नहीं है - लेकिन इन दोनों 'जीतों' की कहानी है बहुत दिलचस्प, जो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के भावी उम्मीदवारों के लिए एक सबक भी है । कमल सांघवी के लिए सफलता सुनिश्चित थी, हालाँकि पिछले तीन-चार माह उम्मीदवार के रूप में उनके लिए काफी मुसीबत भरे थे; उधर भरत पांड्या के लिए जीत आसान तो नहीं थी, लेकिन उनके मुख्य प्रतिद्धंद्धी अशोक गुप्ता द्वारा की गई गलतियों पर गलतियों ने उनके लिए मुकाबले को आसान बना दिया था । कमल सांघवी के मामले में तो यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि उनकी जीत वास्तव में उनकी ही जीत है; लेकिन भरत पांड्या के मामले में सच यह है कि उनकी जीत वास्तव में अशोक गुप्ता की हार है और अशोक गुप्ता को भरत पांड्या ने नहीं, बल्कि खुद अशोक गुप्ता ने ही हराया है । इन दोनों चुनावों का एक बड़ा सबक यह है कि इन दोनों चुनावों में बड़े नेताओं की भूमिका नतीजों को प्रभावित करने में पूरी तरह फेल रही और यहाँ हुई हार/जीत उम्मीदवारों की अपनी अपनी 'कोशिशों' का ही नतीजा रही ।
कहने को तो कमल सांघवी को सुशील गुप्ता, शेखर मेहता और मनोज देसाई की तिकड़ी का समर्थन था; तथा भरत पांड्या को अशोक महाजन और राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की 'लड़ाई' जब निर्णायक दौर में पहुँच रही थी, तब इन नेताओं ने 'अपने' उम्मीदवारों का साथ छोड़ दिया था । राजा साबू ने तो चुनाव से 27 दिन पहले दिल्ली में पोलियो मीटिंग के आयोजन की आड़ में दीपक कपूर की उम्मीदवारी का झंडा उठा कर भरत पांड्या को बीच मँझदार में ही छोड़ दिया था । चुनाव की तारीख से ऐन पहले राजा साबू से मिले इस धोखे से भरत पांड्या की स्थिति काफी कमजोर हो गई थी, लेकिन उनकी खुशकिस्मती यह थी कि उनके मुकाबले पर अशोक गुप्ता थे - जो तमाम अनुकूलताओं में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे थे और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में अपने खुद के दुश्मन साबित हो रहे थे ।
कमल सांघवी और भरत पांड्या की सफलता का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इस सफलता को पाने के लिए उन्होंने बहुत पहले से तैयारी शुरू कर दी थी, और अपनी तैयारी में एक निरंतरता बनाए रखी थी - अन्य किसी उम्मीदवार की तरफ से लेकिन तैयारी की निरंतरता नहीं दिखाई पड़ी । वर्ष 2011 में कोलकाता में हुए जोन इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में कमल सांघवी ने 'मछली की आँख' की तरह इंटरनेशनल पद पर निशाना लगाने की तैयारी की जो शुरुआत की, तो उसके बाद फिर कभी उन्हें चुप बैठे हुए नहीं देखा गया; भरत पांड्या सक्रियता और संलग्नता के मामले में कमल सांघवी के सामने तो नहीं टिकते हैं, लेकिन पिछले चुनाव में मनोज देसाई से पिछड़ जाने के बाद उन्होंने तुरंत से ही अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी । भरत पांड्या की तैयारी की चाल हालाँकि कछुए की चाल की तरह थी, और उनके लिए चुनौती की बात यह थी कि उनके मुख्य प्रतिद्धंद्धी अशोक गुप्ता बीच बीच में खरगोश की तरह कुलाँचे भरते दिख रहे थे - भरत पांड्या के लिए लेकिन फायदे की बात यह रही कि अशोक गुप्ता 'कछुए और खरगोश की दौड़' की मशहूर कहानी वाले खरगोश का अनुसरण करते नजर आए । पिछले से पिछले वर्ष, जयपुर में हुए जोन इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बना कर अशोक गुप्ता को तत्कालीन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने एक बड़ा मौका दिया था - अशोक गुप्ता ने इंस्टीट्यूट का आयोजन किया भी बहुत शानदार तरीके से था और इसके लिए उन्होंने हर किसी से प्रशंसा भी बटोरी थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में इस प्रशंसा को लेकिन वह राजनीतिक समर्थन में नहीं बदल सके - बदल क्या नहीं सके; सच यह है कि उन्होंने इस संबंध में कोई प्रयास तक नहीं किया ।
अशोक गुप्ता को वास्तव में बहुत मौके मिले; इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में मनोज देसाई की उन पर बहुत ही कृपा रही - इंटरनेशनल डायरेक्टर के अपने दो वर्षों के कार्यकाल के पहले वर्ष के जोन इंस्टीट्यूट का उन्होंने अशोक गुप्ता को चेयरमैन बनाया, और दूसरे वर्ष में दुबई में हुए जोन इंस्टीट्यूट का काउंसलर का पद तो उन्होंने अशोक गुप्ता को दिया ही, साथ ही और कई पद भी दिए । मनोज देसाई से मिलने वाली कृपा का इस्तेमाल करने में अशोक गुप्ता ने अपना जो रवैया दिखाया, उससे उन्होंने अपनी छोटी सोच का ही परिचय दिया । पिछली दिसंबर में दुबई में आयोजित हुए जोन इंस्टीट्यूट में अशोक गुप्ता ने अपने 'आदमियों' के रूप में पहचाने जाने वाले अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई को तो विभिन्न कमेटियों में सटवाया - लेकिन अपनी खुन्नस के चलते अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल को किसी भी कमेटी में जगह नहीं लेने दी । रोटेरियंस के बीच अनिल अग्रवाल की पहचान अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई से बहुत ज्यादा है - अशोक गुप्ता थोड़ा उदार रवैया अपनाते और बड़ी सोच का परिचय देते तो अनिल अग्रवाल की पहचान का फायदा उठा सकते थे; लेकिन वह अपनी छोटी सोच का शिकार होने से खुद को बचा नहीं सके । इस प्रसंग का यहाँ जिक्र करने का उद्देश्य यह बताना नहीं है कि अशोक गुप्ता, अनिल अग्रवाल की वजह से चुनाव हार गए; उद्देश्य सिर्फ यह बताना है कि एक बड़े चुनाव की तैयारी के दौरान अशोक गुप्ता कैसी कैसी बेवकूफियाँ कर रहे थे । अशोक गुप्ता की बदकिस्मती यह भी रही कि उन्हें नजदीकी और सलाहकार भी अपने जैसी छोटी सोच के लोग ही मिले - जो उन्हें बरगलाने और भड़काने में ही लगे रहे ।
रोटरी के बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की टोपी 'पहनाने' के किस्से हों, या मनोज देसाई की कृपा पाने के उदाहरण हों - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवारों में अकेले अशोक गुप्ता ही 'बेहतर' स्थिति में थे; लेकिन इसके बावजूद वह नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों का पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा सके - तो इसकी वजहें उनके अपने व्यवहार और रवैये में ही हैं । उनके व्यवहार और रवैये का अध्ययन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के आगामी उम्मीदवारों के लिए सबक का काम कर सकता है ।

Wednesday, September 13, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की पगड़ी पहनने में दिलचस्पी न होने की खुद से कही जा रही बात अशोक गुप्ता की बेवकूफी है या फिर इसके पीछे उनकी कोई गहरी चाल है ?

जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में एक उम्मीदवार के रूप में अशोक गुप्ता का व्यवहार और रवैया ही उनका दुश्मन बन गया है । उनके समर्थक और शुभचिंतक तक हैरान हैं कि अशोक गुप्ता हर किसी से यह क्यों कहते हैं कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में उनकी तो कोई दिलचस्पी नहीं है, और उन्होंने तो बस अपने नजदीकियों के कहने में आकर नामाँकन भर दिया है । उनकी इस बात से लोगों ने यही अनुमान लगाया है कि अशोक गुप्ता ने चुनाव होने से पहले ही अपनी हार को स्वीकार कर लिया है और अपनी हार को पचाने के लिए अभी से कहना शुरू कर दिया है कि उन्हें तो इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में कोई दिलचस्पी है ही नहीं । अशोक गुप्ता के लिए एक मुसीबत की बात यह भी हुई है कि अपने डिस्ट्रिक्ट में ही उनके विरोध का झंडा उठाए घूम रहे पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल को उन्होंने 'पटा' लिया है, तो उसके कारण उनके खासमखास पूर्व गवर्नर रत्नेश कश्यप उनसे नाराज हो गए हैं । रत्नेश कश्यप को भय है कि अनिल अग्रवाल के संबंध यदि अशोक गुप्ता के साथ सुधर गए, तो अशोक गुप्ता के 'दरबार' में उनकी पोजीशन और पीछे हो जाएगी । रत्नेश कश्यप इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में डिस्ट्रिक्ट का प्रतिनिधित्व करेंगे - और नोमीनेटिंग कमेटी में अपनी दाल गलवाने के लिए अशोक गुप्ता को एक अकेले रत्नेश कश्यप का ही सहारा है । इसलिए रत्नेश कश्यप की नाराजगी अशोक गुप्ता के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं हैं ।
अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के संयोजक विजय गुप्ता के 'रंग-ढंग' भी कुछ अच्छे नहीं लग रहे हैं; इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अलग अलग कारणों से दिलचस्पी रखने वाले अन्य कई लोगों की तरह अशोक गुप्ता को भी लगता है कि नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग पंचकुला में रखवा कर विजय गुप्ता ने पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू को चुनाव में हस्तक्षेप करने का मौका दिया है - जो अशोक गुप्ता के लिए परेशानी की बात है । उल्लेखनीय है कि उक्त मीटिंग पहले दिल्ली में होने की बात हुई थी, लेकिन दिल्ली को इस बिना पर खारिज कर दिया गया कि तब चुनाव पर पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की छाया पड़ती । चुनाव को सुशील गुप्ता की छाया से बचाने के लिए राजा साबू की छाया में 'डाल' देने का विजय गुप्ता का तर्क किसी को भी हजम नहीं हो पा रहा है । हालाँकि विजय गुप्ता ने पंचकुला में मीटिंग करने/रखने का फैसला अपनी खुद की सुविधा के लिए किया बताया है; उनके इस दावे को लेकिन उनकी बहानेबाजी के रूप में देखा जा रहा है - लोगों का कहना है कि एक अपनी सुविधा के लिए उन्होंने नोमीनेटिंग कमेटी के कई सदस्यों के लिए परेशानी पैदा कर दी, जिनके लिए दिल्ली के मुकाबले पंचकुला पहुँचना परेशानी भरा होगा । दरअसल इस लचर दावे के कारण ही नोमीनेटिंग कमेटी के संयोजक के रूप में विजय गुप्ता की भूमिका संदिग्ध हो गई है ।
विजय गुप्ता की इस संदिग्ध भूमिका के कारण ही लगता है कि अशोक गुप्ता को अपनी सफलता की उम्मीद घटती हुई लगी है, और इसी नाउम्मीदी में उन्होंने लोगों से कहना/बताना शुरू कर दिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में उनकी तो वास्तव में कोई दिलचस्पी है नहीं - बन गए तो ठीक है, काम कर लेंगे । अशोक गुप्ता के इस रवैए से उनकी उम्मीदवारी को सफल होते देखने वाले उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को तगड़ा झटका लगा है । उन्हें लगा है कि इस तरह की बातों से तो अशोक गुप्ता अपनी पराजय को सुनिश्चित ही कर लेंगे । नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को लगेगा कि वह यदि अशोक गुप्ता को वोट करेंगे, तो अशोक गुप्ता तो उनका कोई अहसान मानेंगे ही नहीं - और इसलिए अशोक गुप्ता को दिया गया उनका वोट तो बट्टे-खाते में ही जाएगा । माना जाता है कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के भिन्न भिन्न तरह के 'स्वार्थ' होते हैं, और अपने उन स्वार्थों के पूरा होने के आश्वासन के भरोसे ही वह अपने वोट की 'दिशा' और 'दशा' निर्धारित करते हैं । ऐसे में, अशोक गुप्ता यदि यह कह रहे हैं कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है - तो नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को अपना स्वार्थ उनसे पूरा होता नहीं 'दिखेगा' और इसलिए वह उन्हें वोट देने के बारे में सोचेंगे भी नहीं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में दिलचस्पी रखने वाले कुछेक नेता हालाँकि 'इस' रवैये को अशोक गुप्ता की चाल के रूप में भी देख रहे हैं । इनका तर्क है कि अशोक गुप्ता ने कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं और वह बड़ा बारीक 'काटने' वाले व्यक्ति हैं - इसलिए यह मान लेना बेवकूफी ही होगी कि वह जो 'कह' रहे हैं, उससे हो सकने वाले नुकसान को वह नहीं समझ/पहचान रहे होंगे । ऐसा मानने और कहने वाले नेताओं का अनुमान है कि अशोक गुप्ता ने नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला अपने पक्ष में करवाने के लिए एक अलग रणनीति बनाई है, और उस रणनीति को छिपा कर रखने तथा लोगों का ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने यह कहना शुरू किया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में उनकी तो कोई दिलचस्पी नहीं है । दरअसल अशोक गुप्ता ने अपने मुखर विरोधी अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल को चुप करने/कराने का जो काम किया है, उसे जान/पहचान कर ही कुछेक लोगों को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता द्वारा अपनाई जा रही दोहरी रणनीति का शक हुआ है ।
उल्लेखनीय है कि अनिल अग्रवाल वास्तव में अशोक गुप्ता को फूटी आँख भी नहीं सुहाते हैं; अशोक गुप्ता के बारे में मशहूर है कि जो उन्हें नहीं सुहाता है, वह उसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करके ही दम लेते हैं - अनिल अग्रवाल के प्रति भी उनका यही रवैया था, जिसके चलते अपने ही डिस्ट्रिक्ट में अनिल अग्रवाल के लिए बहुत थोड़ी सी ही जगह बची रह गई है । ऐसे में, अपने स्वभाव के विपरीत अशोक गुप्ता ने जिस तरह अनिल अग्रवाल को गले लगा लिया है - उससे उनके नजदीकियों के साथ साथ उनके विरोधियों को भी हैरानी हुई है; और इस हैरानी में ही कुछेक लोगों ने अशोक गुप्ता की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति की 'जरूरत' को देखा/पहचाना है । उन्हें लगता है कि अशोक गुप्ता ने इस तथ्य को समझ लिया है कि अनिल अग्रवाल के बस की और कुछ कर पाना भले ही न हो, लेकिन वह उनकी दोहरी रणनीति की पोल जरूर खोल सकेंगे । इसलिए अनिल अग्रवाल को 'चुप' करने के लिए अशोक गुप्ता ने अपने स्वभाव के विपरीत अनिल अग्रवाल को गले लगा लिया - जिसके बाद अशोक गुप्ता के खिलाफ छेड़े गए अपने अभियान को अनिल अग्रवाल ने भी रोक दिया है । अशोक गुप्ता द्वारा अनिल अग्रवाल के साथ किए गए इस मेल मिलाप की बात को जानते/समझते हुए ही लोगों को लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में दिलचस्पी न होने की कही जा रही बात के पीछे अशोक गुप्ता की कोई गहरी चाल है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की पगड़ी पहनने में अशोक गुप्ता को सचमुच कोई दिलचस्पी नहीं है, और या ऐसा कह कर वह अपनी किसी छिपी चाल को सफल बनाने का प्रयास कर रहे हैं - यह बात जल्दी ही सामने आ जाएगी; लेकिन उनके इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में दिलचस्पी न होने की खुद उनके द्वारा ही कही जा रही बात ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावी परिदृश्य को रोमांचक जरूर बना दिया है ।

Monday, August 28, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 के मेंबरशिप सेमीनार में अशोक गुप्ता के चीफ गेस्ट बनने में चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन देख रहे केआर रवींद्रन ने दीपक कपूर द्वारा पोलियो मीट कराए जाने पर अपनी आँखें बंद क्यों कर ली हैं ?

नई दिल्ली/जयपुर । अशोक गुप्ता ने दिल्ली में आयोजित हुई 'नेशनल पोलियोप्लस ओरियेंटेशन एण्ड प्लानिंग मीट' के आयोजन को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए दीपक कपूर की उम्मीदवारी को प्रमोट करने की कोशिश के रूप में रेखांकित करते हुए रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों - खासकर केआर रवींद्रन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं । अशोक गुप्ता की शिकायत है कि डिस्ट्रिक्ट 3080 में हो रहे डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप सेमीनार में चीफ गेस्ट के रूप में शामिल होने से उन्हें तो केआर रवींद्रन ने रोक दिया, लेकिन पोलियो कमेटी के चेयरमैन के रूप में दीपक कपूर को एक ऐसी मीटिंग करने दी गयी जिसमें सभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा कई डिस्ट्रिक्ट्स के दूसरे प्रमुख रोटरी नेता शामिल हुए ।
अशोक गुप्ता की यह शिकायत इसलिए और गंभीर हो गई है, क्योंकि इस मीटिंग में शामिल होने वाले अधिकतर पदाधिकारियों का अनुभव और कहना रहा कि दो दिन मीटिंग में शामिल रहने के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आया कि यह मीटिंग बुलाई क्यों गई थी ? पोलियो को लेकर इसका एजेंडा आखिर था क्या ? अधिकतर लोगों ने इस मीटिंग को रोटरी के पैसे के दुरूपयोग के रूप में ही देखा/पहचाना । इसी अनुभव के आधार पर, रोटरी की चुनावी राजनीति के तानेबाने और सत्ता समीकरणों को जानने/समझने वाले रोटरी नेताओं का आरोप रहा कि इस मीटिंग के बहाने दरअसल दीपक कपूर ने रोटरी के पैसे पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी का प्रमोशन किया ।
उल्लेखनीय है कि पोलियो कमेटी के चेयरमैन के रूप में दीपक कपूर पर रोटरी के संसाधनों के दुरूपयोग के गंभीर आरोप पहले से ही रहे हैं । लेकिन उनका नया  कारनाम इसलिए ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इसमें रोटरी के पैसे पर रोटरी की ही चुनावी राजनीति करने का आरोप है । एक अकेले अशोक गुप्ता को ही नहीं, कई दूसरों को भी हैरानी है कि रोटरी की चुनावी राजनीति में होने वाली किसी भी तरह की 'बेईमानी' के प्रति सख्त रवैया दिखाने वाले पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन को दीपक कपूर की यह हरकत 'दिखाई' क्यों नहीं दी ? शायद इसका कारण यह रहा हो कि पिछले सप्ताह हुई इस आरोपी मीटिंग के लिए दीपक कपूर को पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू का साफ समर्थन और सहयोग मिला । उल्लेखनीय है कि उक्त मीटिंग से रोटरी के अधिकतर बड़े नेता और पदाधिकारी दूर ही रहे; बड़े नेताओं और पदाधिकारियों में पूर्व प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तथा मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ही थोड़े थोड़े समय के लिए मीटिंग में शामिल हुए - सिर्फ राजा साबू ही पूरे समय मीटिंग में मौजूद रहे । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के अन्य उम्मीदवारों में भी एक अकेले रंजन ढींगरा तो थोड़े समय के लिए यहाँ लोगों को दिखाई पड़े - बाकी उम्मीदवारों को लेकिन इस मीटिंग से दूर रखा गया ।
इस मीटिंग के जरिए राजा साबू का 'दोहरा चरित्र' एक बार फिर सामने आया । अपने ही डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार अशोक गुप्ता के आने को प्रतिबंधित करवाने वाले राजा साबू इस मीटिंग में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के दूसरे उम्मीदवार दीपक कपूर को निर्लज्ज तरीके से प्रमोशन का पूरा मौका देते हुए नजर आए । उल्लेखनीय है कि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी जितेंद्र ढींगरा के क्लब - रोटरी क्लब कुरुक्षेत्र ने तीन सितंबर को डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप सेमीनार के आयोजन की तैयारी की हुई है । इस आयोजन में चीफ गेस्ट के रूप में अशोक गुप्ता को आमंत्रित किया गया था । अशोक गुप्ता की स्वीकृति मिलने के बाद उक्त सेमीनार के निमंत्रण पत्र में अशोक गुप्ता को चीफ गेस्ट दर्शाते हुए उनकी तस्वीर प्रकाशित कर दी गई । इस पर अशोक गुप्ता को केआर रवींद्रन की तरफ से आपत्ति मिली, और उक्त सेमीनार में उनके चीफ गेस्ट बनने को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की आचारसंहिता के उल्लंघन के रूप में बताया गया । इसके बाद, अशोक गुप्ता ने उक्त सेमीनार में चीफ गेस्ट बनने से इंकार कर दिया; फलस्वरूप सेमीनार के आयोजकों को चीफ गेस्ट के लिए कोई और प्रमुख व्यक्ति खोजना पड़ा और निमंत्रण पत्र दोबारा तैयार करवाना पड़ा । अशोक गुप्ता और सेमीनार की तैयारी से जुड़े लोगों ने यह सब करवाने के लिए राजा साबू और उनके साथी पूर्व गवर्नर्स को जिम्मेदार ठहराया । अशोक गुप्ता तथा दूसरे कई लोगों की शिकायत लेकिन यह है कि एक डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप सेमीनार में अशोक गुप्ता के चीफ गेस्ट बनने में चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन देख रहे केआर रवींद्रन ने दीपक कपूर द्वारा पोलियो मीट कराए जाने पर अपनी आँखें बंद क्यों कर ली हैं ?

Saturday, August 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं, तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल कर अशोक गुप्ता ने फुल रौनक का माहौल बनाया

जयपुर । अशोक गुप्ता की तरफ से नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार न चुने जाने की स्थिति में चेलैंज करने की बात आने से जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव का परिदृश्य खासा रोमांचक हो गया है । अशोक गुप्ता की तरफ से इस तरह की बात आने से लोगों को लगा है कि अशोक गुप्ता ने नोमीनेटिंग कमेटी में अपनी पराजय अभी से स्वीकार कर ली है, और उन्होंने उसके आगे की तैयारी शुरू कर दी है । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना है कि चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने वास्तव में नोमीनेटिंग कमेटी में अपने लिए समर्थन बनाने/बढ़ाने की चाल चली है । इन नजदीकियों का कहना है कि नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों से बात करने में मिले/हुए अनुभवों से अशोक गुप्ता को इस बात का आभास तो हो ही गया है कि नोमीनेटिंग कमेटी में उनकी दाल नहीं गलने वाली है; ऐसे में उन्हें लगा है कि चेलैंज करने की बात करके वह नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को 'प्रभावित' कर सकते हैं । अशोक गुप्ता को लगता है कि उनके द्वारा चेलैंज करने की बात सुन कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को अपनी अपनी निरर्थकता का अहसास होगा; उन्हें लगेगा कि उनके द्वारा चुना गया अधिकृत उम्मीदवार यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही नहीं पायेगा, तो फिर वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए किसी और की बजाए अशोक गुप्ता को ही अधिकृत उम्मीदवार क्यों न चुनें ?
अशोक गुप्ता की यह चाल सफल होगी या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - चाल के तहत अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की बात फैला/फैलवा कर अशोक गुप्ता ने लेकिन अभी चुनावी माहौल को गर्म जरूर कर दिया है । अशोक गुप्ता के कुछेक अन्य नजदीकियों का मानना/कहना यह भी है कि चेलैंज करने की बात एक झाँसापट्टी ही है, क्योंकि अपने डिस्ट्रिक्ट में वह भले ही बड़े तुर्रमखाँ हों - लेकिन दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी कोई पहचान ही नहीं है; और यह बात खुद अशोक गुप्ता को भी समझ में आ रही है । नोमीनेटिंग सदस्यों के बीच अपने लिए अजनबीपन पाकर अशोक गुप्ता को तगड़ा झटका लगा है; नोमीनेटिंग कमेटी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ही हैं - इसलिए विचार करने की बात यही है कि जब जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स ही अशोक गुप्ता को ज्यादा नहीं जानते/पहचानते हैं, तो क्लब्स के लोग ही उन्हें क्या और कितना जानते होंगे ? अशोक गुप्ता की सक्रियता व उनकी गतिविधियों से परिचित लोगों का कहना है कि अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की टोपी पहना पहना कर उनके बीच तो अपने आप को परिचित करवाया है, लेकिन बाकी रोटेरियंस को उन्होंने कभी कोई तवज्जो नहीं दी; अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति और व्यवस्था में पकड़ बनाए रखने की चालबाजियों में तो अशोक गुप्ता ने खूब मन लगाया है, लेकिन रोटरी में वह ऐसा कोई योगदान नहीं दे/कर सके हैं - जो दूसरों को प्रभावित और प्रेरित कर सके ।
दरअसल इसीलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में अशोक गुप्ता को सबसे कमजोर 'व्यक्तित्व' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों में सुरेंद्र सेठ जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के खास और आम लोगों के बीच एक प्रभावी वक्ता के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं; दीपक कपूर का पोलियो के काम के चलते नाम है; रंजन ढींगरा ने जल-संरक्षण के काम के जरिए तथा एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान और साख तो बनाई हुई है ही, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन के चलते भी लोगों के बीच उन्हें गंभीरता से लिया जाता है; भरत पांड्या के साथ पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन - और अशोक महाजन के कारण पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू का समर्थन है । एक अकेले अशोक गुप्ता ऐसे हैं, जिनका न तो कोई 'काम' है और न जिनके समर्थन में कोई नेता है । वास्तव में यह अशोक गुप्ता के छोटे नजरिए और अव्यावहारिक रवैए का परिणाम है । अशोक गुप्ता ने यूँ तो रोटरी को अपना बहुत समय, अपनी बहुत एनर्जी और अपने बहुत 'साधन' दिए हैं - लेकिन उनका नजरिया और उनका रवैया ऐसा रहा है कि सब कुछ 'लुटाने' के बाद भी वह रोटरी समुदाय में किसी को प्रभावित नहीं कर सके हैं - और यही कारण है कि रोटरी के बड़े नेताओं के साथ-साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच उनकी न तो कोई पहचान बन सकी, और न वह अपना कोई खैरख्वाह बना सके हैं ।
इस सच्चाई से सामना होते ही अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की अपनी उम्मीदवारी के अभियान में पैंतरा बदलने की जरूरत महसूस हुई; और लगता है कि इसी जरूरत के चलते उन्होंने 'अधिकृत उम्मीदवार' नहीं - तो 'चेलैंज' का जुमला उछाल दिया है । उनकी दशा को जानने/पहचानने वाले लोगों का कहना है कि चेलैंज करना - यानि चेलैंज करने के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाना तो अशोक गुप्ता के लिए असंभव ही होगा और यह बात वह भी जानते/समझते हैं; इसलिए लगता यही है कि चेलैंज की बात दरअसल उनकी तरफ से गीदड़ भभकी ही है - अशोक गुप्ता उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी इस गीदड़ भभकी से 'डर' कर नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य उन्हें ही अधिकृत उम्मीदवार चुन लेंगे । मजे की बात यह सुनने/देखने को मिल रही है कि अशोक गुप्ता की देखादेखी दूसरे उम्मीदवार भी चेलैंज करने की बात करने लगे हैं - यानि जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में फुल रौनक देखने को मिलेगी ।

Sunday, July 23, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल क्या सचमुच बड़ी मुसीबत बन गए हैं ?

जयपुर । अशोक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में जिन अनिल अग्रवाल को ठुड्डे लाइन लगा रखा है, वही अनिल अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में अशोक गुप्ता के लिए मुसीबत बन गए हैं - और अशोक गुप्ता के लिए यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि अनिल अग्रवाल से वह कैसे निपटें ? अभी पिछले दिनों ही रोटरी क्लब जयपुर बापूनगर के अधिष्ठापन समारोह में अशोक गुप्ता के 'मैन फ्राईडे' के रूप में पहचाने जाने वाले अजय काला ने अनिल अग्रवाल से इस मामले में बात करने का प्रयास भी किया, किंतु अजय काला का प्रयास सफल नहीं हो सका । मनीपाल यूनिवर्सिटी के ऑडीटोरियम में आयोजित हुए रोटरी क्लब जयपुर बापूनगर के अधिष्ठापन समारोह में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अजय काला इंस्टॉलेशन ऑफीसर के रूप में तथा तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल अग्रवाल इंडक्शन ऑफीसर के रूप में मौजूद थे । अजय काला इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में डिस्ट्रिक्ट का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने गए हैं । अजय काला और अनिल अग्रवाल की वैसे तो बिलकुल नहीं बनती है, लेकिन रोटरी क्लब जयपुर बापूनगर के आयोजन में जब दोनों के लिए एक दूसरे के नजदीक आने का मौका बना, तो अजय काला ने अशोक गुप्ता के प्रति अनिल अग्रवाल की नाराजगी को कम करने के लिए कोशिश की - लेकिन जैसा कि पहले ही बता दिया गया है कि उनकी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी ।
अशोक गुप्ता और उनके संगी-साथी यूँ तो अनिल अग्रवाल को कुछ मानते/समझते नहीं हैं और लोगों के बीच लगातार यह बताते/जताते रहते हैं कि अनिल अग्रवाल के बस की कुछ है ही नहीं, और डिस्ट्रिक्ट से लेकर ऊपर की रोटरी तक में अनिल अग्रवाल के लिए कोई जगह नहीं है । पिछले रोटरी वर्ष में दुबई में हुए जोन इंस्टीट्यूट का निमंत्रण पाने के लिए अनिल अग्रवाल ने एड़ी-चोटी को जोर लगा लिया था, लेकिन अशोक गुप्ता ने उनकी ऐसी घेराबंदी करवाई हुई थी कि अनिल अग्रवाल इंस्टीट्यूट में फटक तक नहीं सके । अशोक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में और डिस्ट्रिक्ट के बाहर अनिल अग्रवाल को बेइज्जत तो बहुत किए रखा, लेकिन अब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उन्हीं अनिल अग्रवाल ने अशोक गुप्ता के लिए खासी फजीहत खड़ी की हुई है । अशोक गुप्ता को दरअसल उस समय तगड़ा झटका लगा, जब अलग अलग जगहों से उन्हें पता चला कि अनिल अग्रवाल अलग अलग डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों से, खासतौर से इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चुने गए पूर्व गवर्नर्स से बात कर रहे हैं और उन्हें अशोक गुप्ता के कई कारनामों से परिचित कराते हुए उनके खिलाफ भड़का रहे हैं । शुरू में तो अशोक गुप्ता ने इन बातों को ध्यान देने लायन नहीं समझा; उन्होंने माना/समझा कि अनिल अग्रवाल हैं क्या, जो लोग उनकी बात को गंभीरता से लेंगे - लेकिन उन्हें जब लगातार इस तरह की बातें सुनने को मिली हैं, तो उनका माथा ठनका है ।
अनिल अग्रवाल अपने आप को पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू के बड़े खासमखास के रूप में 'दिखाते' हैं, इससे कुछेक लोग उन्हें गंभीरता से ले भी लेते हैं । अशोक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि अनिल अग्रवाल के छेड़े अभियान ने नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों के बीच अजय काला को खासा बदनाम कर दिया हुआ है, जिस कारण बाकी सदस्य अजय काला को अशोक गुप्ता के जासूस के रूप में देखते हैं और उनसे राजनीतिक बात करने से बचते हैं, जिस कारण अशोक गुप्ता को उचित फीडबैक नहीं मिल पा रहा है । अशोक गुप्ता के साथ समस्या की बात यह है कि दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में उनका कोई एक्सपोजर नहीं है; वहाँ बल्कि उनकी एक नकारात्मक पहचान है, उन्हें एक घमंडी व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है; हद की बात तो यह कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के मौके पर उनकी वकालत करने वाला कोई नहीं है । उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स उनके खिलाफ भले ही कुछ न कहते हों, लेकिन उनकी वकालत भी नहीं करते हैं । अशोक गुप्ता ने अजय काला को नोमीनेटिंग कमेटी के लिए जिस तरह चुनवाया है, उससे उनके अपने समझे जाने वाले कई पूर्व गवर्नर्स खफा हैं । उन्हें लगता है कि अशोक गुप्ता को हर जगह आगे करने के लिए अजय काला ही मिलते हैं, तो अजय काला से ही फिर अपना काम करवा लें । इस परिदृश्य के चलते अनिल अग्रवाल का अशोक गुप्ता विरोधी अभियान विश्वसनीय बन जाता है - और इस तरह अशोक गुप्ता को भी लग रहा है कि अनिल अग्रवाल कुछ न होते हुए भी उनके लिए बड़ी मुसीबत बन गए हैं ।

Friday, July 21, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की कुर्सी तक पहुँचने के लिए कमल सांघवी को पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन सबसे बड़ी बाधा क्यों लग रहे हैं ?

धनबाद । कमल सांघवी ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की गहमागहमी के बीच अचानक से पर्दे के पीछे छिप कर अपने समर्थकों के साथ-साथ अपने विरोधियों को भी खासे अचरज में डाल दिया है । रोटरी जोन 6 ए के चुनावबाज नेताओं के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि ऐसे समय जबकि कमल सांघवी को सबसे ज्यादा सक्रिय होना चाहिए था, वह बिलकुल चुपचाप क्यों बैठ गए हैं ? कमल सांघवी बहुत ही सक्रिय रोटेरियन रहे हैं, और फिर अब तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए होने वाला उनका चुनाव बिलकुल सिर पर है - ऐसे में अपनी स्वाभाविक सक्रियता और चुनावी जरूरत को दरकिनार करके चुपचाप बैठ जाने की उनकी कार्रवाई ने हर किसी को हैरान किया हुआ है । ऐसे में उनके विरोधियों को कहने का मौका मिला है कि कमल सांघवी को लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों को चूँकि उन्होंने साध ही लिया है, और वह पक्का उन्हें ही चुनेंगे - इसलिए अब उन्हें सक्रिय होने/दिखने की कोई जरूरत नहीं है । लेकिन जो लोग कमल सांघवी को जानते हैं, उनका कहना है कि कमल सांघवी इतने अवसरवादी नहीं हैं कि अपनी जीत को सुनिश्चित समझ लेने के बाद वह सक्रियता छोड़ दें - दरअसल इसीलिए कमल सांघवी को जानने वालों को उनकी चुप्पी ज्यादा उलझाए हुए है ।
कमल सांघवी के नजदीकियों के बीच उनके इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । उनके कुछेक नजदीकियों की तरफ से सुनने को मिल रहा है कि रोटरी के बड़े नेताओं ने कमल सांघवी को आगाह किया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपने प्रचार अभियान में वह ऐसा कोई काम न कर दें, जिससे कि केआर रवींद्रन को उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का मौका मिल जाए । कमल सांघवी को साफ-साफ बता दिया गया है कि वह केआर रवींद्रन के 'राडार' पर हैं, और केआर रवींद्रन उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मौके की तलाश में हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी में केआर रवींद्रन एक बड़े सख्त प्रशासक के रूप में कुख्यात/विख्यात हैं; और उन्होंने कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स तथा कई एक गवर्नर्स का बड़ी निर्ममता से 'शिकार' किया हुआ है । केआर रवींद्रन पिछले से पिछले रोटरी वर्ष में प्रेसीडेंट थे, लेकिन रोटरी में उनका जलवा और आतंक अभी भी बना हुआ है । रोटरी के बड़े नेताओं ने कमल सांघवी को समझाया है कि पता नहीं क्यों उन पर केआर रवींद्रन की कड़ी निगाह बनी हुई है, इसलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने तक उन्हें बहुत ही सावधानी से रहने की जरूरत है ।
कमल सांघवी ने इसी जरूरत को पूरा करने के लिए अपनी सक्रियता को विराम दे दिया है । उनके नजदीकियों के अनुसार, उन्होंने समझा है कि वह जब कुछ करेंगे ही नहीं तो केआर रवींद्रन को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का कोई मौका ही नहीं मिलेगा । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के लिए कमल सांघवी को अब ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं लग रही है; उनके नजदीकियों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में उन्होंने अपने पक्ष में पक्का इंतजाम कर लिया है; इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में या तो उनके 'आदमी' ही चुने गए हैं - और जिन डिस्ट्रिक्ट्स में दूसरे लोग चुने गए हैं, कमल सांघवी ने उनकी घेराबंदी कर/करवा ली है । कमल सांघवी ने अपनी कामयाबी के लिए जोन के डिस्ट्रिक्ट्स में जो फील्डिंग सजाई, उसे देख कर ही कई संभावशील उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी से ही पीछे हटने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । इस कारण से कमल सांघवी के लिए चुनावी मुकाबला और आसान हो गया है । उनके सामने बस केआर रवींद्रन के निशाने पर आने से बचने की ही चुनौती है, इसलिए उन्होंने तय किया है कि वह उड़ेंगे ही नहीं - वह जब उड़ेंगे नहीं, तो केआर रवींद्रन के राडार पर भी नहीं 'दिखेंगे' और बचे रहेंगे । केआर रवींद्रन के खौफ के चलते कमल सांघवी के सक्रियता से बचने और पीछे हटने ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी रौनक को खत्म करने के साथ-साथ चुनावी परिदृश्य को एक अलग तरीके से रोचक भी बना दिया है ।

Friday, June 30, 2017

रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की 'टोपी' पहना पहना कर रोटरी में ऊँचा उठने का अशोक गुप्ता का फार्मूला, इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में भी उनके काम आएगा क्या ?

जयपुर । राजेंद्र उर्फ राजा साबू को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के मामले में रोटरी इंटरनेशनल पदाधिकारियों से जो झटका लगा है, उससे अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की अपनी राजनीति आसान होती हुई दिख रही है । उल्लेखनीय है कि जोन 4 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए होने वाले चुनाव में पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजा साबू का समर्थन भरत पांड्या को मिलने की चर्चा है, और यही चर्चा अशोक गुप्ता के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है । अशोक गुप्ता को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन की बात सुनी/कही तो जाती है, लेकिन सुशील गुप्ता के बहुत ही खासमखास के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी अशोक गुप्ता को सुशील गुप्ता का समर्थन मिल सकने की बात को संदेहास्पद बनाती है । किसी भी बड़े नेता के साफ समर्थन के अभाव में अशोक गुप्ता को इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में सिर्फ इस कारण से उम्मीद है कि पिछले वर्षों में उन्होंने रोटरी के जिन बड़े नेताओं को 'टोपी' पहनाई है, वह उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने में उनकी मदद करेंगे । ध्यातव्य है कि अशोक गुप्ता ने रोटरी में ऊँचा उठने के लिए एक बहुत आसान रास्ता अपनाया हुआ है - जिसमें वह रोटरी के बड़े नेताओं को अपनी यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट की 'टोपी' पहना देते हैं । उनका यह फार्मूला हिट भी है - रोटरी का जो बड़ा नेता उनकी टोपी पहन लेता है, वह तो उनका अहसान उतारने की कोशिश में उनके काम आता ही है; दूसरे बड़े नेता भी उनको इस उम्मीद में तवज्जो देने लगते हैं कि उनकी तवज्जो से खुश होकर अशोक गुप्ता किसी वर्ष उनके सिर को भी डॉक्टरेट की टोपी पहना देंगे ! टोपीबाजी से अशोक गुप्ता रोटरी में कुछेक असाइनमेंट पाने में चूँकि सफल रहे हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद रही है कि टोपीबाजी के इसी खेल से वह इंटरनेशनल डायरेक्टर भी बन जायेंगे ।
किंतु राजा साबू उनकी इस उम्मीद को ध्वस्त करते दिखे हैं । बेचारे अशोक गुप्ता ने तो उन्हें भी डॉक्टरेट की टोपी पहनाई हुई है, लेकिन अशोक गुप्ता ने पाया/देखा है कि राजा साबू ने उनकी पहनाई टोपी की लाज नहीं रखी है - और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वह उनकी बजाए भरत पांड्या के समर्थन में दिख रहे हैं । राजा साबू की तरफ से दिखी इस अहसानफरामोशी ने अशोक गुप्ता को बुरी तरह आहत और क्रोधित किया हुआ था । दरअसल इसीलिए राजा साबू को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के मामले में रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से झटका मिलने की खबर ने अशोक गुप्ता को उत्साहित किया है । उल्लेखनीय है कि राजा साबू को पहले तो यह जानकार झटका लगा कि रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय उनके डिस्ट्रिक्ट में वर्ष 2017-18 के गवर्नर पद पर टीके रूबी को नियुक्त कर रहा है; राजा साबू ने इस फैसले को बदलवाने के लिए अपना सारा जोर लगा दिया - लेकिन यह देख कर उनकी सारी 'हवा' निकल गयी कि उनके डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तय करने के मामले में उनकी राय/सलाह को किसी ने भी तवज्जो नहीं दी । अशोक गुप्ता को लगता है कि राजा साबू को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के मामले में यह जो जोर का झटका लगा है, उसका असर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनकी भूमिका पर भी पड़ेगा - और राजा साबू अब भरत पांड्या के लिए कुछ कर नहीं पायेंगे । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का मानना और कहना है कि राजा साबू जब अपना 'जरूरी' काम नहीं करवा सके, तो वह भरत पांड्या के लिए क्या कर/करवा सकेंगे ?
अशोक गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अशोक गुप्ता इस संयोग पर भी खुश हैं और इसे अपने लिए एक शुभ-संकेत के रूप में देख रहे हैं कि राजा साबू की फजीहत करने/करवाने में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जॉन जर्म को भी पिछले दिनों उन्होंने डॉक्टरेट की टोपी पहना/पहनवा दी थी । हालांकि रोटरी के जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में जॉन जर्म की कोई सीधी भागीदारी और या भूमिका नहीं है, लेकिन उनके हाथों राजा साबू की जो फजीहत हुई है - उसके चलते वह राजा साबू के विरोधियों के भावनात्मक 'सहयोगी' तो बन ही गए हैं । अशोक गुप्ता को उम्मीद बनी है कि जॉन जर्म को डॉक्टरेट की टोपी पहनाने के चलते - जॉन जर्म के भावनात्मक सहयोगी बने राजा साबू विरोधी लोग इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनके मददगार बनेंगे । कई लोगों को लेकिन यह भी लगता है कि अपने डिस्ट्रिक्ट के मामले में राजा साबू को भले ही तगड़ा वाला झटका लगा हो, लेकिन रोटरी की चुनावी राजनीति से उन्हें पूरी तरह बाहर हुआ नहीं मान लेना चाहिए; जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स में राजा साबू के भक्तों की अभी भी कमी नहीं है - और इसलिए जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनकी भूमिका को कम नहीं आँकना चाहिए ।
जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में राजा साबू की भूमिका कितनी क्या रहती है, यह तो आने वाले दिनों में पता चल ही जायेगा - लेकिन इससे भी ज्यादा यह देखना दिलचस्प होगा कि अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े नेताओं को डॉक्टरेट की टोपी पहना पहना कर रोटरी में ऊँचा उठने का जो फार्मूला अपनाया है, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में उनके काम आता है या नहीं ?
अशोक गुप्ता की डॉक्टरेट की 'टोपी' पहने हुए राजा साबू, कल्याण बनर्जी तथा एक अन्य पूर्व प्रेसीडेंट :

Thursday, September 8, 2016

तो क्या सचमुच में रोटरी इंटरनेशनल के मौजूद डायरेक्टर मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता और कमल सांघवी को अगले इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की जिम्मेदारी ले ली है ?

नई दिल्ली । दुबई में 16 से 18 दिसंबर के बीच हो रहे साऊथ एशिया जोन इंस्टीट्यूट के आयोजन में भूमिका निभाने वाले पदाधिकारियों की सूची का यदि कोई 'राजनीतिक मतलब' सचमुच होता है, तो माना जाना चाहिए कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावों में अशोक गुप्ता और कमल सांघवी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । उल्लेखनीय है कि अशोक गुप्ता जोन 4 से तथा कमल सांघवी जोन 6 ए से इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने के लिए कमर कस चुके हैं । दुबई इंस्टीट्यूट के कन्वेनर के रूप में मनोज देसाई ने इन दोनों को कोर कमेटी में काउंसलर का पद तो दिया ही है, कुछेक और कमेटियों में भी इन्हें जगह दी है । मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता पर कुछ ज्यादा ही मेहरबानी बरसाई है : उन्होंने अशोक गुप्ता को तो कई जगहें दी ही हैं, उनके 'आदमी' के रूप में पहचाने जाने वाले अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई को भी विभिन्न कमेटियों में सटाया है । सिर्फ इतना ही नहीं, अशोक गुप्ता के दबाव में मनोज देसाई को अनिल अग्रवाल को कमेटियों से बाहर रखने के लिए मजबूर तक होना पड़ा । अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के ही पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल ने पिछले महीनों में रोटरी इंडिया लिटरेसी मिशन में बहुत ही बढ़-चढ़ कर काम किया है, और इस कारण से वह जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच तो खासतौर से पहचाने जाते हैं । रोटेरियंस के बीच उनकी पहचान अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई से तो बहुत बहुत ज्यादा है - इन तीनों से वह बस एक ही बात में पिछड़े हुए हैं, वह अशोक गुप्ता के 'मैन फ्राइडे' नहीं बन पाए; और इस कारण से वह अशोक गुप्ता को फूटी आँख भी नहीं सुहाते हैं । मनोज देसाई ने किसी किसी से कहा भी कि वह तो अनिल अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की किसी कमेटी में रखना चाहते थे, किंतु अशोक गुप्ता के विरोध को देखते हुए फिर उन्होंने अपना विचार त्याग दिया ।
कमल सांघवी अपने 'आदमियों' को तो कमेटियों में जगह नहीं दिलवा सके - हालाँकि इस बात को वह यह कहते हुए अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं कि कमेटियों में जो लोग हैं, वह सब उन्हीं के तो 'आदमी' हैं - किंतु कमल सांघवी पर मनोज देसाई ने एक अलग तरीके से मेहरबानी की है । जोन 6 ए में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए कमल सांघवी के जो संभावित प्रतिद्धंद्धी हैं, मनोज देसाई ने उन्हें कमेटियों से दूर ही रखा है । इससे कमल सांघवी को अपने मतदाताओं को यह समझाना आसान होगा कि जो लोग इंस्टीट्यूट जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन की करीब 170 सदस्यीय टीम में जगह नहीं बना सके, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर कैसे बनेंगे ? अशोक गुप्ता को यह 'सुविधा' नहीं मिल पाई है । उनके संभावित प्रतिद्धंद्धियों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे भरत पांड्या और रंजन ढींगरा को कमेटियों में जगह मिली है - रंजन ढींगरा को तो कई जगहों के साथ-साथ 28 सदस्यीय कोर टीम में भी जगह मिली है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए टीम गठित करने में मनोज देसाई ने सबसे बड़ा झटका मुकेश अरनेजा को दिया है । पिछले चौदह महीने से, जबसे मनोज देसाई ने इंटरनेशनल डायरेक्टर का पदभार संभाला है - डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा उनके साथ अपनी नजदीकी का बख़ान करते रहे हैं, किंतु अब वह मनोज देसाई को कोसते हुए सुने जा रहे हैं । यह स्वाभाविक भी है । मनोज देसाई ने जिस बेरहमी के साथ मुकेश अरनेजा को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अपनी गुड बुक से निकाल बाहर फेंका है, वह मुकेश अरनेजा के लिए भारी फजीहत की बात है । उनकी फजीहत इस कारण से भी है, क्योंकि आजकल डिस्ट्रिक्ट में उनके चिर प्रतिद्धंद्धी के रूप में देखे/पहचाने जा रहे रमेश अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की टीम में जगह मिली है । मुकेश अरनेजा के लिए इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह हुई है कि जिन निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को वह कुछ समझते ही नहीं हैं और जिन पर कुछेक अहसान करने उन्हें अपनी 'तरफ' करने की कोशिशों में लगे हैं, उन जेके गौड़ तक को इंस्टीट्यूट टीम में जगह मिल गई है । मुकेश अरनेजा दावा करते रहे हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी के अत्यंत सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने मनोज देसाई को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनने/चुनवाने में जो भूमिका निभाई थी, मनोज देसाई उसके लिए उनका बहुत अहसान मानते हैं, और उनके काम आते हैं । मुकेश अरनेजा लेकिन अब मनोज देसाई को अहसान फरामोश की उपाधि देते फिर रहे हैं । समझा जाता है कि पिछले दिनों ही मुकेश अरनेजा ने अपने क्लब में वरिष्ठ पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ जिस तरह की ब्लैकमेलिंग करने की कोशिश की, और जिससे पैदा हुए विवाद के कारण वह अंततः क्लब से निकल भागने के लिए मजबूर हुए - उससे मुकेश अरनेजा की रोटरी समुदाय में बहुत ही बदनामी हुई है, जो अभी तक की उनकी बदनामी पर काफी भारी पड़ी है । मुकेश अरनेजा की इस नई हरकतपूर्ण बदनामी को देखते हुए ही मनोज देसाई ने उन्हें इंस्टीट्यूट की टीम से बाहर रखने में ही अपनी भलाई देखी है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम की सूची विनोद बंसल के लिए भी खतरे की घंटी बजाती हुई सी लगती है । इंस्टीट्यूट टीम में डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को एक कमेटी में हालाँकि को-चेयरमैनी तो मिली है - लेकिन इस पद को रोटरी में उनकी सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं देखा/पहचाना जा रहा है । को-चेयरमैनी तो एक अन्य कमेटी में जेके गौड़ को भी मिली है - जो रोटरी में सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के मामले में उनके सामने कहीं नहीं ठहरते हैं । विनोद बंसल के मनोज देसाई के साथ अच्छे संबंध भी देखे/समझे जाते हैं; इसलिए भी किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि मनोज देसाई की टीम में विनोद बंसल को उनकी उचित जगह आखिर क्यों नहीं मिली ? ऐसे में, विनोद बंसल के साथ हुई इस नाइंसाफी को पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा उन्हें 'चुनावी अपराधी' घोषित करने के फैसले के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का उक्त फैसला लगता है कि अभी विनोद बंसल का पीछा नहीं छोड़ रहा है, और उन्हें अभी वह और परेशान करेगा । दुबई इंस्टीट्यूट की टीम में विनोद बंसल के साथ जो नाइंसाफी हुई है, उसका असर इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए होने वाले चुनाव में उनकी उम्मीदवारी पर भी पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है । उक्त पद के लिए विनोद बंसल का मुकाबला मंजीत साहनी से होने की संभावना दिख रही है । मंजीत साहनी को मनोज देसाई ने दुबई इंस्टीट्यूट के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर्स ट्रेनिंग सेमीनार कमेटी का काउंसलर बनाया है । जाहिर तौर पर इसमें डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए मंजीत साहनी के पक्ष में एक इशारा छिपा है, जो विनोद बंसल के लिए चुनावी मुकाबले को थोड़ा चुनौतीपूर्ण तो बनाता ही है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम में मनोज देसाई की मेहरबानियों की वास्तविक बारिश लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3131 के अभय गाडगिल पर हुई है । अभय गाडगिल हैं तो अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट - लेकिन उन्हें दुबई इंस्टीट्यूट की कोर कमेटी में जगह मिलने के साथ-साथ ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी जैसा प्रमुख पद भी मिला है । सिर्फ इतना ही नहीं, उनकी पत्नी दीपा गाडगिल को भी शर्मिष्ठा देसाई के नेतृत्व वाली सात सदस्यीय स्पाउस प्रोग्राम कमेटी में जगह मिली है । इस तरह मनोज देसाई ने अभय गाडगिल को रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया जोन के रोटेरियंस के बीच बड़ी ऊँचाई पर प्रतिष्ठित करने का काम तो कर दिया है - पर अभय गाडगिल इस ऊँचाई पर बने/टिके रहेंगे, यह देखने की बात होगी ।

Wednesday, September 30, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर बास्कर चॉकलिंगम् को जितवा कर पीटी प्रभाकर ने वास्तव में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन को तगड़ा वाला झटका दिया है

चेन्नई । पीटी प्रभाकर ने बास्कर चॉकलिंगम् को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवा कर रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन को जो तगड़ी राजनीतिक चोट दी है, उससे केआर रवींद्रन के सहारे रोटरी में आगे बढ़ने वाले नेताओं के बीच खासी खलबली मच गई है । पीटी प्रभाकर के उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3000 के बास्कर चॉकलिंगम् इंटरनेशनल डायरेक्टर न सिर्फ चुने गए हैं, बल्कि अच्छे मार्जन से चुने गए हैं - और इसी तथ्य ने रोटरी की राजनीति में उनका कद बढ़ा दिया है, तथा केआर रवींद्रन के भरोसे रहने वाले नेताओं के लिए समस्या खड़ी कर दी है । बास्कर चॉकलिंगम् की जीत को वास्तव में पीटी प्रभाकर की जीत और केआर रवींद्रन की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए केआर रवींद्रन डिस्ट्रिक्ट 3201 के सुनील जचारिया का समर्थन कर रहे थे; और उन्होंने अपने कई नजदीकियों को सुनील जचारिया के लिए समर्थन जुटाने के काम पर लगाया हुआ था । इसके बावजूद 15 सदस्यों वाली नोमीनेटिंग कमेटी में सुनील जचारिया को सिर्फ तीन वोट मिले । सुनील जचारिया की इतनी बुरी हार की उम्मीद उनके विरोधियों को भी नहीं थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के खुले समर्थन को देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि वह बास्कर चॉकलिंगम् को अच्छी टक्कर देंगे, लेकिन केआर रवींद्रन का खुला समर्थन उनके किसी काम नहीं आया । केआर रवींद्रन के नजदीकियों के अनुसार, केआर रवींद्रन ने सुनील जचारिया की इस हार के लिए राजा साबू, कल्याण बनर्जी, शेखर मेहता, मनोज देसाई आदि से मिले धोखे को जिम्मेदार ठहराया है ।  
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए यूँ तो बास्कर चॉकलिंगम् की स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही थी । पीटी प्रभाकर जब इंटरनेशनल डायरेक्टर थे, तभी से वह बास्कर चॉकलिंगम् की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हुए थे; और अपने कई कार्यक्रमों में उन्हें आगे आगे किए हुए थे । पीटी प्रभाकर और बास्कर चॉकलिंगम् का रिश्ता काफी पुराना है । पीटी प्रभाकर जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार थे, तब बास्कर चॉकलिंगम् ने उनके लिए खूब काम किया था । पीटी प्रभाकर के चुनाव की बागडोर एक तरह से बास्कर चॉकलिंगम् के हाथ  थी । उसी समय से चर्चा थी कि अपने जोन में पीटी प्रभाकर अपने बाद बास्कर चॉकलिंगम् को ही इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवायेंगे । इस तरह की चर्चाओं और तैयारियों के कारण ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए बास्कर चॉकलिंगम् का पलड़ा भारी दिख रहा था । किंतु सुनील जचारिया की उम्मीदवारी को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन का समर्थन मिलने से बास्कर चॉकलिंगम् के लिए स्थिति थोड़ी मुश्किल होती दिखने लगी थी । पीटी प्रभाकर और केआर रवींद्रन के संबंध चूँकि अच्छे नहीं रहे हैं, इसलिए केआर रवींद्रन के लिए पीटी प्रभाकर के उम्मीदवार के रूप में पहचाने जाने वाले बास्कर चॉकलिंगम् को चुनाव हरवाना साख का मामला बन गया । इसके चलते मुख्यतः बास्कर चॉकलिंगम् व सुनील जचारिया के बीच होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को दिलचस्पी के साथ देखा जाने लगा था । 
केआर रवींद्रन की पक्षपातपूर्ण सक्रियता के कारण सुनील जचारिया की उम्मीदवारी में दम पैदा होता हुआ देखा जाने लगा था । इसका कारण भी है । रोटरी की चुनावी राजनीति मूलतः निजी स्वार्थों पर टिकी नजर आती है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में डिस्ट्रिक्ट्स के महत्वाकांक्षी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स होते हैं, जिनके बारे में माना/कहा जाता है कि जो इंटरनेशनल असाइनमेंट के बदले में अपना वोट 'बेचने' के लिए तैयार रहते हैं । इसी बिना पर माना जा रहा था कि केआर रवींद्रन अवश्य ही सुनील जचारिया के लिए पर्याप्त वोटों की व्यवस्था कर लेंगे । लेकिन चुनावी नतीजा आया तो पता चला कि केआर रवींद्रन का इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होना और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के रूप में उनका समर्थन भी सुनील जचारिया के काम नहीं आया । अब इसका कारण यह माना/बताया जा रहा है कि केआर रवींद्रन ने पीटी प्रभाकर की राजनीतिक ताकत को कम करके आँका और सुनील जचारिया के लिए समर्थन जुटाने की व्यवस्था करने में चूक की ।
केआर रवींद्रन के नजदीकियों का कहना है कि केआर रवींद्रन ने सुनील जचारिया की हार के लिए राजा साबू, कल्याण बनर्जी, शेखर मेहता, मनोज देसाई आदि को जिम्मेदार ठहराया है । इस मामले में केआर रवींद्रन मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई से तो बुरी तरह खफा बताए जा रहे हैं । उनका कहना है कि सुनील जचारिया के लिए समर्थन जुटाने हेतु उन्होंने इन बड़े नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी थी, जिसका इन्होंने ठीक से निर्वाह नहीं किया । केआर रवींद्रन ने अपने नजदीकियों के बीच मनोज देसाई के रवैये को लेकर तो भारी नाराजगी दिखाई है । उनका कहना रहा है कि मनोज देसाई यदि ठीक से काम करते, तो सुनील जचारिया के लिए जीतने लायक समर्थन जुटाया जा सकता था । मनोज देसाई तथा बाकी नेताओं की तरफ से अपनी अपनी सफाई में कहा जा रहा है कि दक्षिण भारत के डिस्ट्रिक्ट्स में उनका कोई खास दखल नहीं है, और वहाँ की चुनावी राजनीति के समीकरण उनकी समझ और उनकी कार्यनीति से बिलकुल बाहर हैं; इसलिए बहुत चाहने और करने की कोशिश करने के बाद भी उनके लिए कुछ कर पाना संभव नहीं हो सका । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में सुनील जचारिया की हार से इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की जो भद्द पिटी है, और पीटी प्रभाकर की जो धाक जमी है - उसे देख कर केआर रवींद्रन के सहारे और भरोसे रोटरी में आगे बढ़ने की कोशिशें करने वाले रोटरी नेताओं को खासा तगड़ा झटका लगा है । 

Saturday, May 9, 2015

रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद प्राप्त करने के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के विनोद बंसल की संभावित उपस्थिति क्या सचमुच में खासी वजनदार बन गई है ?

नई दिल्ली । विनोद बंसल के रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बनने की खबर से रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए सज रहे 'बहादुरों' तथा दूसरे खिलाड़ियों के बीच हड़कंप मच गया है । दरअसल रोटरी की चुनावी राजनीति में रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के पद को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद तक पहुँचने की सीढ़ी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इंटरनेशनल कन्वेंशन में करीब साढ़े पाँच सौ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को ट्रेंड करने के लिए विभिन्न देशों से करीब चालीस पूर्व गवर्नर्स को ट्रेनिंग लीडर के रूप में चुना जाता है । भारत से दो पूर्व गवर्नर्स को इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के रूप में चुना जाता है - एक दक्षिण भारत से और दूसरा गैर दक्षिण भारत से । माना/समझा जाता है कि रोटरी राजनीति के बड़े खिलाड़ी ऐसे पूर्व गवर्नर्स को ही इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर चुनते हैं, जिन्हें वह आगे बढ़ाना चाहते हैं । इसीलिए विनोद बंसल के इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर चुने जाने पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों की नींद उड़ जाना स्वाभाविक ही है । यह नींद उड़ना इसलिए भी स्वाभाविक है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अभी जो लोग दौड़ लगाते दिख रहे हैं, उनमें विनोद बंसल को तो काफी पीछे माना/समझा जा रहा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में आगे दिखने वाले लोगों में भरत पांड्या, अशोक गुप्ता, दीपक कपूर, सुरेंद्र सेठ आदि का नाम लिया जा रहा है; तो इनके बाद के लोगों में जेटी व्यास, गुलाम वाहनवती, आलोक बिलौरे, विनय कुलकर्णी, राजीव प्रधान आदि का नाम लिया/सुना जा रहा है । विनोद बंसल का नाम तो इनके बाद कहा/बताया जाता है । कुछेक लोग तो यहाँ तक कहते/मानते हैं कि विनोद बंसल तो वास्तव में अगली से अगली बार के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं । 
विनोद बंसल को लेकिन लंबी छलांग के खिलाड़ी के रूप में भी देखा/पहचाना जाता है । बहुत सी पोजिशंस उन्होंने बहुत ही जल्दी प्राप्त की हैं । जिन पोजिशंस को प्राप्त करने में दूसरों को लंबा इंतजार करना पड़ा है तथा काफी एड़ियाँ रगड़नी पड़ी हैं, उन्हें विनोद बंसल ने चमत्कारिक तरीके से बहुत ही कम समय में हासिल किया है । रोटरी के बड़े पदाधिकारियों तथा नेताओं के साथ नजदीक व विश्वास के संबंध बनाने में विनोद बंसल ने जो कामयाबी हासिल की है, उसके चलते तो वह कई लोगों के बीच ईर्ष्या के पात्र भी बन गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होते हुए ही विनोद बंसल को दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने का जो मौका मिल रहा था, उसकी आहट से उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स तो इतना जल-भुन गए थे कि उन्होंने दिल्ली में इंस्टीट्यूट होने की संभावना में ही मट्ठा डाल दिया था । दिल्ली की बजाये चेन्नई में हुए इंस्टीट्यूट में विनोद बंसल को हालाँकि वाइस चेयरमैन के पद से ही संतोष करना पड़ा था, लेकिन दूसरे वाइस चेयरमैनों की तुलना में वह काफी 'जूनियर' ही थे । बहुत ही कम समय में तथा तेज रफ्तार के साथ विनोद बंसल ने रोटरी में जो कुछ पाया है, उसे देखते/जानते हुए रोटरी की राजनीति में वह बहुतों के लिए चुनौती बन गए हैं - कईयों को तो उन्होंने पीछे धकेल दिया है । 
रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बन कर विनोद बंसल ने अपने डिस्ट्रिक्ट - जो अभी डिस्ट्रिक्ट 3010 ही है, डिस्ट्रिक्ट 3011 तो एक जुलाई से होगा  - के ही कई तुर्रमखाओं को जैसे जमीन सुँघा दी है । डिस्ट्रिक्ट 3010 में अभी तक सुशील गुप्ता, राजेश बत्रा, रंजन ढींगरा ही इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बने हैं । विनोद बंसल के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3010 को कई वर्षों के बाद इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद मिला है । दूसरे महत्वाकांक्षी व आगे बढ़ने के लिए तिकड़में और जुगाड़ लगाते रहने वाले, तथा खुद को डिस्ट्रिक्ट का 'चौधरी' समझने/बताने वाले नेताओं को विनोद बंसल की इस उपलब्धि से खासा तगड़ा झटका लगा है । उन्हें झटका इस कारण से भी लगा है, क्योंकि वह भी जान/समझ रहे हैं कि इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर के रूप में विनोद बंसल को अगले रोटरी वर्ष में जयपुर में होने जा रहे रोटरी इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को ट्रेनिंग देने का मौका मिलेगा और इस वजह से रोटरी इंस्टीट्यूट में उन्हें खासी अहमियत मिलेगी । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक चौधरियों की नींद लेकिन यह जान/देख कर और भी ज्यादा उड़ी हुई है कि इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर का पद प्राप्त करने के चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में विनोद बंसल की संभावित उपस्थिति खासी वजनदार बन गई है ।  
रोटरी इंटरनेशनल ट्रेनिंग लीडर बन कर विनोद बंसल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में शामिल नेताओं के बीच जिस तरह से खलबली मचाई है, उसके कारण रोटरी की चुनावी राजनीति खासी दिलचस्प भी हो गई है । 

Saturday, November 23, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की मनोज देसाई की राह में रोड़ा अटका कर सुशील गुप्ता ने अपने लिए रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी के पद का रास्ता साफ किया

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी का पद प्राप्त करने में अंततः कामयाब हो गए हैं और जैसे ही उन्हें यह पद मिलना कंफर्म हुआ वैसे ही रवि प्रकाश लांगेर ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मनोज देसाई की अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज करने की तैयारी से अपने आप को अलग कर लिया । इस तरह 'अंत भला, तो सब भला' वाले फलसफे की तर्ज पर पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता भी खुश हुए और भावी इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की भी चुनाव लड़ने से जान बची ।
यूँ तो ये दो मामले हैं - एक मामला रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी पद का है और दूसरा मामला रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का है - और इनमें सिर्फ एक ही चीज कॉमन है और वह है रोटरी; इसके अलावा इन दोनों मामलों का आपस में कोई संबंध नहीं है; किंतु रोटरी की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि इस बार इन दोनों मामलों में एक चीज और कॉमन हो गई और वह है पद पाने की तिकड़म का खेल ।
उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मनोज देसाई के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के बाद जब डिस्ट्रिक्ट 3040 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि प्रकाश लांगेर द्धारा उन्हें चेलैंज करने की तैयारी करने की ख़बरें सुनी गईं तो सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ । यह आश्चर्य एक तो इस कारण हुआ कि रवि प्रकाश लांगेर को रोटरी की चुनावी राजनीति में कभी भी इतना सक्रिय नहीं देखा/पाया गया कि उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाये । दूसरा कारण लेकिन ज्यादा 'गंभीर' था और वह यह कि रवि प्रकाश लांगेर को रोटरी की दुनिया में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के आदमी के रूप में देखा'पहचाना जाता है । रोटरी में यह सहज विश्वास किया जाता है कि रवि प्रकाश लांगेर रोटरी में जो कुछ भी करते हैं वह सुशील गुप्ता से पूछ कर करते हैं । इसी बिना पर माना गया कि रवि प्रकाश लांगेर यदि मनोज देसाई की उम्मीदवारी को चेलैंज करने की तैयारी कर रहे हैं तो यह निश्चित ही सुशील गुप्ता का कोई खेल है । इस 'खेल' को लेकर रोटरी नेताओं के बीच में आश्चर्य इसी वजह से था कि सुशील गुप्ता जब एक तरफ मनोज देसाई की उम्मीदवारी के समर्थन में भी रहे दिखे हैं तो दूसरी तरफ रवि प्रकाश लांगेर के जरिये उनके चुने जाने में बाधा पहुँचाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं ?
सुशील गुप्ता के इस 'खेल' को देख कर हैरान हुए लोगों ने पड़ताल की तो उन्होंने पाया कि रवि प्रकाश लांगेर के जरिये उन्होंने दरअसल रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी पद की अपनी कुर्सी पक्की करने का दाँव चला है । उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी पद की कुर्सी पर सुशील गुप्ता की नज़र बहुत समय से है । उन्हें उम्मीद थी कि कल्याण बनर्जी जब इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की लाइन में होंगे तब वह किसी वर्ष उन्हें उक्त कुर्सी पर बैठा देंगे, लेकिन कल्याण बनर्जी ने उनकी उम्मीद पूरी नहीं की । कल्याण बनर्जी ने उन्हें जिस तरह इग्नोर किया, उससे उन्हें तगड़ा झटका लगा । सुशील गुप्ता को यह देख/जान कर तो और भी करेंट लगा कि कल्याण बनर्जी उनकी बजाये शेखर मेहता को तवज्जो दे रहे हैं और आगे बढ़ा रहे हैं । रोटरी और रोटरी की राजनीति में अभी हाल तक शेखर मेहता हर काम के लिए सुशील गुप्ता पर निर्भर रहा करते थे, लेकिन अब शेखर मेहता उन्हें पीछे छोड़ कर उनसे आगे बढ़ते हुए दिख रहे हैं । कई लोगों का मानना और कहना है कि शेखर मेहता चूँकि सुशील गुप्ता से ज्यादा 'विज़नरी' और सक्रिय हैं इसलिए वह सुशील गुप्ता से आगे निकल रहे हैं; लेकिन सुशील गुप्ता को लगता है कि शेखर मेहता के उनसे आगे होने का कारण कल्याण बनर्जी का उनकी बजाये शेखर मेहता पर ज्यादा ध्यान देना है । सुशील गुप्ता ने पाया/समझा कि कल्याण बनर्जी सिर्फ शेखर मेहता को आगे बढ़ाने का ही काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि शेखर मेहता को आगे बढ़ने में कोई दिक्कत न हो इसके लिए सुशील गुप्ता के रास्ते में रोड़े डालने का भी काम कर रहे हैं ।
इसी कारण से सुशील गुप्ता को डर हुआ कि इस बार ट्रस्टी पद की कुर्सी पाने के लिए उन्होंने जो जुगाड़ किया है कहीं कल्याण बनर्जी और शेखर मेहता की जोड़ी उसमें अपनी टाँग न अड़ा दे । सुशील गुप्ता ने ट्रस्टी पद के लिए अपना नाम प्रस्तावित करने के लिए इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट गैरी सीके हुआँग को तैयार कर लिया था । दरअसल गैरी सीके हुआँग को चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में सुशील गुप्ता थे और लगता है कि उन्होंने पहले ही उनका समर्थन करने के बदले में ट्रस्टी पद का सौदा कर लिया था । इसी कारण से यह चर्चा पहले से ही थी कि गैरी सीके हुआँग रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग में ट्रस्टी पद के लिए सुशील गुप्ता का नाम प्रस्तावित करेंगे । सुशील गुप्ता को डर बस कल्याण बनर्जी और शेखर मेहता की जोड़ी से था कि कहीं ये लोग गैरी सीके हुआँग को कुछ उल्टी-सीधी पट्टी न पढ़ा दें । मिलते दिख रहे ट्रस्टी पद में ये दोनों किसी तरह से अपनी टाँग न अड़ा दें - इसके लिए सुशील गुप्ता ने रवि प्रकाश लांगेर के जरिये मनोज देसाई की टाँग पकड़ ली ।
मनोज देसाई और उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर बनवाने के अभियान में लगे कल्याण बनर्जी और शेखर मेहता को अशोक महाजन की तरफ से तो खतरा था, लेकिन यह खतरा सुशील गुप्ता की तरफ से खड़ा हो जायेगा - इसकी उन्होंने तो क्या, अन्य किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मनोज देसाई को सुशील गुप्ता का सहयोग और समर्थन भी था ही और उस समर्थन को देखा भी जा रहा था । लेकिन फिर भी सुशील गुप्ता ने रवि प्रकाश लांगेर के जरिये मनोज देसाई के लिए बखेड़ा खड़ा कर दिया । पर्दे के पीछे जो खेल चल रहा था, उसकी भनक/खबर रखने वाले लोगों का कहना रहा कि सुशील गुप्ता को रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी का पद यदि इस बार नहीं मिला तो मनोज देसाई को रवि प्रकाश लांगेर से चुनाव लड़ना ही पड़ेगा । रवि प्रकाश लांगेर के जरिये सुशील गुप्ता ने दरअसल मनोज देसाई के सामने नहीं, कल्याण बनर्जी और शेखर मेहता के सामने चुनौती पेश की थी । मनोज देसाई को तो सिर्फ बलि का बकरा बनना था । सुशील गुप्ता की ट्रिक काम कर गई । हालात की नजाकत समझ कर कल्याण बनर्जी और शेखर मेहता ने या तो प्रयास ही नहीं किया और या उनकी चली नहीं - गैरी सीके हुआँग का पलड़ा भारी रहा और ट्रस्टी पद की कुर्सी पर बैठने के लिए हरी झंडी पाने का सुशील गुप्ता का इंतज़ार ख़त्म हुआ तथा इसकी आधिकारिक घोषणा होते ही रवि प्रकाश लांगेर ने भी मनोज देसाई को चेलैंज करने की अपनी तैयारी को समेट लिया ।
स्वाभाविक रूप से सुशील गुप्ता भी खुश हैं और मनोज देसाई भी खुश हैं । खुशी मनवांछित पद पाने की तो है ही, इस बात की भी है कि 'घर का झगड़ा' घर में ही सुलट गया है ।  

Monday, August 12, 2013

अशोक महाजन अपनी फजीहत का बदला लेने और मनोज देसाई की जीत को हार में बदलने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को चैलेंज करवायेंगे क्या ?

दिल्ली/मुंबई । वर्ष 2015-16 के रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव में केआर रवींद्रन से अशोक महाजन को मिली पराजय के बाद इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भी अशोक महाजन को झटका लगने की जो संभावना बनी थी, वह अंततः सही साबित हुई । लेकिन उन्हें लगने वाला झटका इतना तगड़ा होगा, यह किसी को उम्मीद नहीं थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार के चुनाव में अशोक महाजन के समर्थित उम्मीदवार भरत पांड्या की इतनी बुरी गत बनेगी कि वह ऑल्टरनेट उम्मीदवार भी नहीं बन सकेंगे, यह किसी ने नहीं सोचा था । भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनवाने के लिए अशोक महाजन ने यूँ तो हर संभव हथकंडा अपनाया, लेकिन उनका कोई भी हथकंडा काम नहीं आया । मनोज देसाई की उम्मीदवारी का झंडा उठाये पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को रोटरी इंस्टीट्यूट 2014 के दिल्ली में होने को लेकर अपने ही डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह मात खानी पड़ी, उससे भी अशोक महाजन को 'अपना काम' बनने की उम्मीद बनी थी - लेकिन अपने मुकाबले पर खड़े सुशील गुप्ता की दुर्गति होने के बावजूद अशोक महाजन 'अपना काम' नहीं बना/बनवा सके और उन्हें बुरी तरह मुहँकी खानी पड़ी ।
अशोक महाजन/भरत पांड्या का सारा खेल डिस्ट्रिक्ट 3100 के राजीव रस्तोगी के कारण बिगड़ा बताया जा रहा है । भरत पांड्या के लिए अशोक महाजन ने फील्डिंग हालाँकि अच्छी जमाई थी - पाँच वोट उनके पास पक्के थे; उन पाँच के अलावा राजीव रस्तोगी को भी उनके साथ माना/पहचाना जा रहा था । राजीव रस्तोगी के गवर्नर-काल में हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में भरत पांड्या रोटरी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि बन कर आये थे, और तभी से राजीव रस्तोगी उनके 'नजदीक' थे । राजीव रस्तोगी ने भरत पांड्या/अशोक महाजन को अपने समर्थन के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट 3053 के क्रांति चंद्र मेहता का समर्थन दिलवाने का भी विश्वास दिलाया हुआ था । राजीव रस्तोगी और क्रांति चंद्र मेहता के बीच अच्छी दोस्ती बताई जाती है । इस दोस्ती के भरोसे राजीव रस्तोगी द्धारा जताये गए विश्वास के बावजूद अशोक महाजन/भरत पांड्या ने राजीव रस्तोगी के वोट को अपने पक्के वाले वोटों में नहीं गिना था, तो इसका कारण यह था कि क्रांति चंद्र मेहता ने मनोज देसाई को राजीव रस्तोगी का समर्थन दिलवाने का विश्वास दिया/दिलाया हुआ था । इनके अलावा, डिस्ट्रिक्ट 3010 के मुकेश अरनेजा पर दोनों खेमों के नेताओं की निगाह थी । मुकेश अरनेजा का वोट सबसे ज्यादा ढुलमुल वोट था - कोई नहीं जानता था कि मुकेश अरनेजा किससे क्या सौदा कर लेंगे ? अपने आप को मुकेश अरनेजा के नजदीक बताने वाले कुछेक लोगों का यह कहना जरूर था कि मुकेश अरनेजा को ऐन मौके पर जो जीतता हुआ 'दिखेगा', मुकेश अरनेजा उसके साथ हो लेंगे । 14 सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी में मनोज देसाई को छह सदस्यों के समर्थन का पक्का भरोसा था । इन छह के अलावा, मनोज देसाई को भरोसा क्रांति चंद्र मेहता के समर्थन का भी था - लेकिन राजीव रस्तोगी के कारण क्रांति चंद्र मेहता की स्थिति संदेहास्पद और सवालों के घेरे में भी थी !
रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के अधिकृत उम्मीदवार के लिए प्रमुख दावेदारों के रूप में पहचाने जाने वाले मनोज देसाई और भरत पांड्या तथा उनके समर्थक नेताओं ने सारा जोर इन्हीं तीन वोटों - राजीव रस्तोगी, क्रांति चंद्र मेहता और मुकेश अरनेजा - पर लगाया हुआ था । जब तक वर्ष 2015-16 के रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव का नतीजा घोषित नहीं हुआ था, तब तक इन तीन वोटों पर अशोक महाजन का अधिकार ज्यादा 'देखा' जा रहा था, किंतु उस चुनाव का नतीजा आते ही अशोक महाजन का अधिकार ढीला पड़ता दिखा । आख़िरी क्षणों में जो 'खेल' हुआ उससे भेद यह खुला कि इस खेल के तार रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय तक जुड़े हुए थे और रोटरी इंटरनेशनल के बड़े अधिकारी और पदाधिकारी नेता तक इस चुनाव को प्रभावित करने की दौड़ में थे । ठीक अंतिम क्षणों में मनोज देसाई खेमे की तरफ से राजीव रस्तोगी को अपनी तरफ करने के लिए जो ब्रह्मास्त्र चला गया - उसने सारा खेल मनोज देसाई के पक्ष में स्थिर कर दिया । सुनी गई चर्चा के अनुसार, ठीक अंतिम क्षणों में राजीव रस्तोगी को मय सबूतों के साथ बताया/दिखाया गया कि उनके गवर्नर-काल में हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में रोटरी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि के रूप में पधारे भरत पांड्या ने रोटरी इंटरनेशनल को जो रिपोर्ट भेजी थी, उसमें उनके खिलाफ प्रतिकूल बातें कहीं/लिखी गईं थीं । करीब ढाई वर्ष पहले की इस रिपोर्ट के लीक होने से राजीव रस्तोगी ने क्रांति चंद्र मेहता के साथ दोस्ती निभाना ज्यादा ठीक समझा । पाँच वोटों वाले भरत पांड्या के मुकाबले आठ वोटों के साथ मनोज देसाई का पलड़ा दूसरों के साथ-साथ मुकेश अरनेजा को भी जब भारी दिखा, तब एक चतुर सौदागर की तरह वह भी मनोज देसाई के पक्ष में आ गए । नोमीनेटिंग कमेटी में मनोज देसाई ने 9 - 5 से अधिकृत उम्मीदवार की बाजी जीत ली ।
मनोज देसाई खेमे के लोग सिर्फ इस जीत से संतुष्ट नहीं थे - वह अशोक महाजन की अभी और फजीहत करने/कराने के मूड में थे । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए ऑल्टरनेट उम्मीदवार के लिए भरत पांड्या और डिस्ट्रिक्ट 3131 के विनय कुलकर्णी के बीच जो चुनाव हुआ, उसमें मनोज देसाई के समर्थन में रहे लोगों ने विनय कुलकर्णी को वोट दिया । अशोक महाजन/भरत पांड्या की बदकिस्मती यह रही कि अधिकृत उम्मीदवार के चुनाव में उन्हें जो पाँच वोट मिले थे, उन्हें वह ऑल्टरनेट उम्मीदवार के चुनाव में अपने साथ बनाये नहीं रख सके और यहाँ उन्हें कुल चार वोट ही मिले । ऑल्टरनेट उम्मीदवार का चुनाव भरत पांड्या 4 - 9 से हार गए - उन विनय कुलकर्णी से हार गए जिनका कहीं कोई नामलेवा तक नहीं था । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार के चुनाव में मिली पराजय भरत पांड्या/अशोक महाजन के लिए उतना बड़ा झटका नहीं रही, लेकिन ऑल्टरनेट उम्मीदवार के चुनाव में मिली पराजय ने अशोक महाजन की राजनीति के लिए ज्यादा बड़ा संकट खड़ा कर दिया है ।
अशोक महाजन को जानने वाले लोगों का कहना लेकिन यह भी है कि अशोक महाजन इतनी आसानी से हार स्वीकार करने वाले नहीं हैं । कुछेक लोगों को लगता है कि अशोक महाजन अधिकृत उम्मीदवार के रूप में मनोज देसाई को चुनौती दिलवायेंगे । दरअसल नोमीनेटिंग कमेटी में बने जिस समीकरण के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा है, उसी समीकरण में उन्हें भरत पांड्या के लिए जीत के आसार नज़र आ रहे हैं । उल्लेखनीय है कि नोमीनेटिंग कमेटी में मनोज देसाई को जो जीत मिली है, वह जोन 4 ए के डिस्ट्रिक्ट्स की बदौलत मिली है, जोन 4 बी के डिस्ट्रिक्ट्स का समर्थन जुटाने में मनोज देसाई बुरी तरह फेल रहे हैं । इस आधार पर कह सकते हैं कि जोन 4 बी के डिस्ट्रिक्ट्स में अशोक महाजन का जलवा अभी बाकी है । मनोज देसाई के लिए मुसीबत की बात यह है कि उनकी अधिकृत उम्मीदवारी को यदि चुनौती मिलती है, तो फिर होने वाले चुनाव में सिर्फ जोन 4 बी के डिस्ट्रिक्ट्स के लोग ही वोट करेंगे, उस चुनाव में जोन 4 ए के लोगों की कोई भूमिका नहीं होगी । इसी आधार पर, अशोक महाजन के नजदीकी लोगों को लगता है कि अशोक महाजन अपनी हुई फजीहत का बदला अवश्य ही लेंगे और अपनी हार को जीत में बदलने का जो एक मौका उनके लिए अभी खुला है, उसका अवश्य ही उपयोग करेंगे ।

Wednesday, August 7, 2013

केआर रवींद्रन को रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए हरी झंडी मिलने की खबर ने मनोज देसाई और भरत पांड्या के बीच होते दिख रहे रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को खासा दिलचस्प बना दिया है

मुंबई । अशोक महाजन को वर्ष 2015-16 के रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव में केआर रवींद्रन से मिली पराजय ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव की दशा और दिशा बदल दी है । अशोक महाजन की पराजय की खबर ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार मनोज देसाई के समर्थकों और शुभचिंतकों को राहत और खुशी पहुँचाई है, क्योंकि अशोक महाजन की इस पराजय से उनके बीच उम्मीद बनी है कि अशोक महाजन अब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को प्रभावित नहीं कर पाएंगे । उल्लेखनीय है कि अशोक महाजन ने भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने का बीड़ा उठाया हुआ है और वह हर संभव हथकंडा अपना कर भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने के अभियान में लगे हुए हैं, और इस अभियान के संदर्भ में चले गए उनके कुछेक 'मूव' सफल भी हुए हैं । दरअसल उनके कुछेक 'मूव' के सफल हो जाने के कारण ही मनोज देसाई के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच निराशा और डर पैदा हो गया था । लेकिन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद की दौड़ में अशोक महाजन के पिछड़ने की खबर ने उनकी निराशा और उनके डर को ख़त्म कर दिया है । मनोज देसाई के कई समर्थक और शुभचिंतक यह कहते हुए सुने गए हैं कि जो अशोक महाजन अपना खुद का चुनाव नहीं जीत सके, वह दूसरे किसी को क्या चुनाव जितवायेंगे ? इस बात में दम भी है । रोटरी में अशोक महाजन की छवि और पहचान तिकड़म में माहिर एक चतुर नेता की है; और जिनके बारे में विश्वास किया जाता है कि काम कराना/निकालना उन्हें खूब आता है । लेकिन वर्ष 2015-16 के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों से अपने पक्ष में 'काम' कराने के मामले में उन्हें जो मात खानी पड़ी है, उसने उनके पक्ष में बने 'विश्वास' को ध्वस्त कर दिया है । अशोक महाजन के पक्ष में रोटरी में बने हुए 'विश्वास' के ध्वस्त होने से मनोज देसाई के समर्थकों व शुभचिंतकों में खुशी की लहर पैदा होना/बनना स्वाभाविक ही है ।
रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अशोक महाजन के समर्थन पर सवार भरत पांड्या के समर्थक व शुभचिंतक अशोक महाजन की पराजय को लेकिन एक भिन्न नजरिये से देख/पहचान रहे हैं - और अशोक महाजन की हार को मनोज देसाई के फायदे के रूप में देखने/समझने से इंकार कर रहे हैं । उनका कहना है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अशोक महाजन ने इस बार अपनी उम्मीदवारी को बहुत गंभीरता से लिया ही नहीं था, और उन्होंने इस बार तो अपनी उम्मीदवारी सिर्फ इसलिए प्रस्तुत की थी ताकि अगली बार के लिए उनका दावा मजबूत हो सके । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद पर चूँकि सुशील गुप्ता और शेखर मेहता की 'नज़र' को भी देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए उन दोनों से आगे रहने/'दिखने' के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अशोक महाजन ने इस बार अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया था । इस तथ्य के सहारे अशोक महाजन और भरत पांड्या के समर्थक तर्क दे रहे हैं कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के चुनाव में अशोक महाजन की पराजय के कोई मतलब नहीं निकालने चाहिए । उनके अनुसार, सच बल्कि यह है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए इस बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अशोक महाजन ने जो 'प्राप्त' करना चाहा था, उसे उन्होंने हासिल कर लिया है - और इस तरह अशोक महाजन ने एक बार फिर यह साबित किया है कि अपने 'लक्ष्य' प्राप्त करना उन्हें आता है । जो लोग इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर भरत पांड्या को देखना चाहते हैं, उनके अनुसार इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अशोक महाजन को मिली हार वास्तव में उनकी जीत है - और इसलिए मनोज देसाई के समर्थकों व शुभचिंतकों को उनकी नसीहत है कि अशोक महाजन की हार का ढोल पीटकर खुश होने ही जरूरत नहीं है ।
अशोक महाजन के नजदीकियों का कहना है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अशोक महाजन ने अपनी उम्मीदवारी को इसलिए भी गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि केआर रवींद्रन के साथ उनके न सिर्फ भरोसे के और सहयोग के संबंध रहे हैं, बल्कि रोटरी की खेमेबाजी में भी वह दोनों एक ही खेमे में हैं । देश में इस खेमे का नेतृत्व कर रहे राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के साथ दोनों के ही अच्छे और व्यवहार के संबंध हैं । वर्ष 2015-16 के प्रेसीडेंट पद के लिए जो 'लड़ाई' चल रही थी, उसमें राजा साबू खेमे की तरफ से अशोक महाजन कवरिंग उम्मीदवार के रूप में ही मैदान में थे । राजा साबू खेमे की तरफ से वर्ष 2015-16 के प्रेसीडेंट पद के लिए जो फील्डिंग सजाई गई थी, उसका मुख्य उद्देश्य केआर रवींद्रन को चुनवाना ही था । अशोक महाजन की उम्मीदवारी तो इसलिए प्रस्तुत करवाई गई थी कि कहीं किसी कारण से केआर रवींद्रन का काम बिगड़ा तो अशोक महाजन को आगे किया जायेगा । केआर रवींद्रन का काम चूँकि नहीं बिगड़ा, इसलिए अशोक महाजन के साथ वही हुआ जिसके होने की पहले से ही 'तैयारी' थी । अशोक महाजन के नजदीकियों के अनुसार, इसलिए वर्ष 2015-16 के प्रेसीडेंट पद पर केआर रवींद्रन के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने को अशोक महाजन की पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए ।
अशोक महाजन और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उनका समर्थन पा रहे भरत पांड्या तथ्यों व तर्कों का हवाला देकर चाहें कितना ही दावा क्यों न करें कि वर्ष 2015-16 के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए केआर रवींद्रन के चुने जाने को अशोक महाजन की पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए - लेकिन मनोज देसाई के समर्थक और शुभचिंतक अशोक महाजन की इस 'हार' को उनके खेल के ख़त्म होने के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं । उनका तर्क है कि राजनीति में तथ्यों से ज्यादा परसेप्शन (अवधारणा) का महत्व होता है - और परसेप्शन यही बन रहा है कि अशोक महाजन को वर्ष 2015-16 के प्रेसीडेंट पद के लिए दूसरों की तो छोड़िये, अपने लोगों से भी मदद नहीं मिली । वर्ष 2015-16 के प्रेसीडेंट पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में अशोक महाजन अपनी उम्मीदवारी के लिए कोई समर्थन नहीं पा सके, तो मनोज देसाई के समर्थकों व शुभचिंतकों के अनुसार इसका मतलब यही है कि रोटरी की चुनावी राजनीति में फैसलों को प्रभावित कर सकने का उनका रुतबा खत्म हो चुका है और इसी को देखते हुए कहा जा सकता है कि रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में अशोक महाजन की कोई भी सक्रियता और तिकड़म काम नहीं करेगी । वर्ष 2015-16 के रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए केआर रवींद्रन को हरी झंडी मिलने की खबर ने मनोज देसाई और भरत पांड्या के बीच होते दिख रहे रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Friday, June 28, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भरत पांड्या के समर्थन में अशोक महाजन की सक्रियता ने मनोज देसाई के लिये गंभीर चुनौती पैदा की; सुशील गुप्ता को मुकेश अरनेजा से धोखा मिलने का डर

मुंबई/नई दिल्ली । मधु रूघवानी की इंटरनेशनल रोटरी फाउंडेशन में नियुक्ति को रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ को प्रभावित करने की पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन की एक चाल के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3030 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु रूघवानी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ के एक तेज ‘दौड़ाक’ के रूप में लोगों के सामने आये थे । लेकिन जल्दी ही लोगों ने देखा/पाया कि मधु रूघवानी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में जितनी तेजी से शामिल हुए थे, उतनी ही तेजी से वह उस दौड़ से बाहर भी हो गये । इंटरनेशनल डायेरक्टर पद की चुनावी दौड़ से बाहर होते समय लेकिन उनके हाथ में रोटरी फाउंडेशन में तीन वर्ष के लिए हुई नियुक्ति का एक पत्र था । इसी पत्र ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में पर्दे के पीछे चलने वाले दांवपेंचों की पोल खोलने का काम किया है । लोगों के बीच चर्चा है कि मधु रूघवानी की यह नियुक्ति उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ से बाहर करने के लिए ही मिली है । मधु रूघवानी हालाँकि इस तरह की ‘डील’ होने की बात से इंकार करते हैं । इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए उन्होंने कहा कि रोटरी फाउंडेशन में नियुक्ति के ऑफर को उन्होंने रोटरी को और नजदीक से तथा गहराई से समझने के एक मौके के रूप में देखा और इसीलिए उन्होंने फिर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी को छोड़ने का निश्चय किया । मधु रूघवानी की बात अपनी जगह है, दूसरे लोगों को लेकिन रोटरी फाउंडेशन में उनकी नियुक्ति के पीछे ‘डील’ ही दिखाई दे रही है - और इस डील के पीछे अशोक महाजन । कहा/बताया जा रहा है कि अशोक महाजन ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या की राह आसान बनाने के लिए ही मधु रूघवानी को रास्ते से हटाने के लिए रोटरी फाउंडेशन में उन्हें नियुक्ति दिलवाई है ।
अशोक महाजन ने जिस चतुराई से मधु रूघवानी का 'शिकार' किया है, उसे देख कर एक दूसरे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने मुकेश अरनेजा को अपने हाथ से निकल गया समझ लिया है । सुशील गुप्ता दरअसल जानते हैं कि मुकेश अरनेजा चूँकि बहुत ही लालची और स्वार्थी किस्म के रोटेरियन हैं इसलिए अशोक महाजन उन्हें किसी भी पद का लालच देकर बहुत ही आसानी से अपना शिकार बना लेंगे । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में मुकेश अरनेजा भी एक सदस्य हैं, और उम्मीद की जाती है कि मुकेश अरनेजा नोमीनेटिंग कमेटी में सुशील गुप्ता के फैसले को ही दर्ज करेंगे । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए यूँ तो कई उम्मीदवार हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला डिस्ट्रिक्ट 3140 के भरत पांड्या तथा डिस्ट्रिक्ट 3060 के मनोज देसाई के बीच ही देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, भरत पांड्या की उम्मीदवारी की कमान अशोक महाजन के हाथ में तथा मनोज देसाई की उम्मीदवारी की कमान सुशील गुप्ता के हाथ में है । अशोक महाजन और सुशील गुप्ता अपने-अपने तरीके से क्रमशः भरत पांड्या और मनोज देसाई के लिए समर्थन जुटाने की तरकीबें लगा रहे हैं । अशोक महाजन की सक्रियता से जोन 4 बी के डिस्ट्रिक्ट्स में भरत पांड्या का पलड़ा भारी दिख रहा है, तो सुशील गुप्ता की सक्रियता के चलते जोन 4 ए के डिस्ट्रिक्ट्स में मनोज देसाई की उम्मीदवारी को अच्छा समर्थन देखा/समझा जा रहा है ।
सभी जानते हैं कि रोटरी की राजनीति में अशोक महाजन और सुशील गुप्ता सिर्फ दो नाम नहीं हैं, बल्कि यह दो ग्रुप्स का प्रतिनिधित्व करते हैं । अशोक महाजन को राजेंद्र उर्फ राजा साबू खेमे का और सुशील गुप्ता को कल्याण बनर्जी खेमे के प्रतिनिधि के रूप में देखा/पहचाना जाता है । कल्याण बनर्जी पद दिलवाने वाली राजनीति तो कर लेते हैं, लेकिन ‘सड़क’ की राजनीति में कमजोर पड़ते हैं; राजा साबू दोनों तरह की राजनीति के उस्ताद हैं । राजा साबू इस मामले में भी खुशकिस्मत हैं कि उन्हें अपने ही जैसा उस्ताद अशोक महाजन के रूप में मिल गया है - और इसीलिए उन्होंने अपने खेमे की कमान अशोक महाजन को सौंप दी है । कल्याण बनर्जी खेमा अराजकता का शिकार है । वहाँ वही जाता है, जिसे राजा साबू खेमे में जगह नहीं मिलती - और फिर उसे अपने तरीके से लड़ाई लड़नी पड़ती है । सुशील गुप्ता जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार थे, तब राजा साबू ने उनकी राह में काँटे तो बहुत बिछाये थे, लेकिन सुशील गुप्ता ने अपने भरोसे अपना चुनाव ‘मैनेज’ किया था - कल्याण बनर्जी से तो उन्हें सिर्फ भावनात्मक सहारा मिला था । यही हाल शेखर मेहता का हुआ था । शेखर मेहता का बनता-बनता काम खराब करने के लिए उनके डिस्ट्रिक्ट में से ही उनके लिए चुनौती पैदा करवा दी गई थी, और शेखर मेहता ने अपने दम पर ही उस चुनौती का मुकाबला किया था । पिछले दिनों संपन्न हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में पीटी प्रभाकर का खेल बिगाड़ने की भी राजा साबू खेमे ने हर संभव कोशिश की, जिससे पीटी प्रभाकर को खुद ही निपटना पड़ा और उन्हें कल्याण बनर्जी से कोई मदद नहीं मिली । दोनों खेमों के बीच सबसे संगीन लड़ाई - अशोक महाजन और मनोज देसाई के बीच हुए चुनाव में हुई थी । मनोज देसाई ने अशोक महाजन को नाको चने तो चबवा दिए थे, लेकिन राजा साबू खेमे की संगठित ताकत के सामने अंततः उन्हें हार का सामना ही करना पड़ा था । उस समय भी यह कहने/मानने वालों की कमी नहीं थी कि कल्याण बनर्जी यदि सक्रियता दिखाते तो अशोक महाजन की जगह मनोज देसाई इंटरनेशनल डायरेक्टर बनते । कल्याण बनर्जी लेकिन अपने स्वार्थ में राजा साबू से सीधे टकराने को तैयार नहीं हुए । कल्याण बनर्जी को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनना था, जिसमें राजा साबू लगातार रोड़े अटका रहे थे । कल्याण बनर्जी ने समझ लिया था कि उन्हें यदि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनना है तो राजा साबू से पंगा लेने से बचना होगा - और इसीलिए उन्होंने मनोज देसाई की उम्मीदवारी की बलि ले ली थी ।
मनोज देसाई अब की बार फिर से उसी चक्रव्यूह में फंसे हैं - कल्याण बनर्जी के नजदीक समझे जाने के बावजूद उन्हें कल्याण बनर्जी का समर्थन तो नहीं ही मिल रहा है, शेखर मेहता ने भी हाथ उँचे कर दिए हैं । शेखर मेहता को रोटरी में अभी और ‘यात्रा’ करनी है, और इसलिए वह राजा साबू और उनके सिपहसालारों से बिगाड़ना नहीं चाहते हैं । रोटरी में आगे की यात्रा सुशील गुप्ता को भी करनी है, लेकिन सुशील गुप्ता ने जान/समझ लिया है कि राजा साबू और उनके सिपहसालारों का उन्हें कभी भी समर्थन नहीं मिलेगा और उन्हें उनसे लड़ कर ही यहाँ कुछ पाना है । सो, एक वही मनोज देसाई के लिए कुछ करते हुए दिख रहे हैं । लेकिन मनोज देसाई के लिए सुशील गुप्ता जो कर रहे हैं, वह भरत पांड्या के लिए अशोक महाजन के किए.धरे के सामने कुछ भी नहीं है । अशोक महाजन ने मधु रूघवानी को जिस तरह से रास्ते से हटाया है, वह तो सिर्फ एक बानगी है । चुनावी चर्चाओं के अनुसार, अशोक महाजन का अगला निशाना मुकेश अरनेजा हैं । रोटरी में मुकेश अरनेजा को पदों के मामले में एक लालची व्यक्ति के रूप में जाना/पहचाना जाता है । उन्हें हरेक पद चाहिए होता है, और पद पाने के लिए वह किसी की भी खुशामद करने के लिए और किसी के साथ भी धोखाधड़ी करने को तैयार रहते हैं । उनकी इसी फितरत को देख कर सुशील गुप्ता को डर हुआ है कि अशोक महाजन कभी भी उनका शिकार कर सकते हैं । मुकेश अरनेजा को सुशील गुप्ता अभी अपने कहे में मान/समझ रहे हैं और विश्वास करते हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी में वह मनोज देसाई को वोट देंगे । लेकिन अशोक महाजन जिस तरह से शिकारी बने घूम रहे हैं, उसे देख/जान कर सुशील गुप्ता को लगने लगा है कि मुकेश अरनेजा का शिकार तो वह पक्का कर ही लेंगे । नोमीनेटिंग कमेटी में समर्थन जुटाने के लिए मनोज देसाई जोन 4 ए के डिस्ट्रिक्ट्स के समर्थन के भरोसे हैं - ऐसे में, मुकेश अरनेजा ने उनके साथ यदि कोई धोखा किया तो उनका खेल बिगड़ सकता है । जोन 4 बी के डिस्ट्रिक्ट्स में भरत पांड्या का पलड़ा शुरू से ही भारी दिख रहा है - ऐसे में, मधु रूघवानी की उम्मीदवारी से मनोज देसाई को अपना काम आसान होता हुआ नजर आ रहा था । उन्हें लगा था कि मधु रूघवानी जो कुछ भी पायेंगे, वह भरत पांड्या को ही नुकसान पहुँचायेगा । जो बात मनोज देसाई देख/समझ रहे थे, वही बात भरत पांड्या और अशोक महाजन भी देख/समझ  रहे थे । इसीलिए अशोक महाजन ने जब मधु रूघवानी को रास्ते से हटा लेने में सफलता प्राप्त कर ली, तो भरत पांड्या के  समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी और मनोज देसाई के समर्थकों को निराशा ने घेर लिया था । मनोज देसाई के समर्थक नेता नोमीनेटिंग कमेटी में के अपने लोगों को अशोक महाजन का शिकार बनने से बचाने की मुहिम में जुटे हैं - ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि अशोक महाजन उनकी मुहिम को कैसे धता बताते हैं; धता बता पाते भी हैं या नहीं ?

Tuesday, April 23, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3250 में चर्चा है कि कमल सांघवी को रोटरी में इवेंट मैनेज करने का काम करना है या रोटरी के वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने का

धनबाद । रोटरी क्लब ऑफ धनबाद चेरीटेबल ट्रस्ट द्धारा पिछले तीस वर्ष से भी अधिक समय से चलाये जा रहे जीवन ज्योति स्कूल के मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को उनके घरों से लाने -लेजाने के लिए आवश्यक बस को खरीदने के लिए तैयार किये गए मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट के निरस्त हो जाने के कारण कमल सांघवी गंभीर आरोपों में घिर गए हैं । उल्लेखनीय है कि कमल सांघवी का क्लब रोटरी क्लब धनबाद इस मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट का प्राइमरी होस्ट पार्टनर था और खुद कमल सांघवी की देखरेख में यह प्रोजेक्ट तैयार किया गया था और उनपर ही इस प्रोजेक्ट को संभव करने की जिम्मेदारी थी । इस प्रोजेक्ट से संबद्ध जो दस्तावेज 'रचनात्मक संकल्प' के पास हैं, उनके अनुसार 13286 अमेरिकी डॉलर के इस प्रोजेक्ट के लिए 500 अमेरिकी डॉलर रोटरी क्लब धनबाद से और 2000 अमेरिकी डॉलर डिस्ट्रिक्ट 3250 के डीडीएफ एकाउंट से लेने की संस्तुति प्राप्त कर ली गई थी । बाकी बची रकम में से 5095 अमेरिकी डॉलर रोटरी फाउंडेशन से लेने की बात तय हुई थी और 5691 अमेरिकी डॉलर के लिए मैचिंग पार्टनर खोजना था । इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी चूँकि कमल सांघवी ने ली थी, इसलिए किसी को भी इसके पूरा हो पाने को लेकर जरा सा भी संदेह नहीं था । कमल सांघवी की रोटरी में जैसी धाक है; कल्याण बनर्जी के 'ब्ल्यू-आयड ब्यॉय' की उनकी जैसी पहचान है - उसके बाद इस प्रोजेक्ट की सफलता को लेकर किसी के पास भी शक/संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी । लेकिन फिर भी प्रोजेक्ट ड्रॉप हो गया । मजे की बात यह है कि इस प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने के लिए ट्रस्ट के, क्लब के और डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से कमल सांघवी को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । आरोप लगाया जा रहा है कि कमल सांघवी की रोटरी के वास्तविक कामों में नहीं बल्कि रोटरी के नाम पर इवेंट मैनेज करने में ज्यादा दिलचस्पी हो गई है ।
कमल सांघवी को लेकर लोगों के बीच चर्चा है कि कमल सांघवी को चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है और उन्होंने समझ लिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए रोटरी के वास्तविक काम करना जरूरी नहीं है, बल्कि रोटरी के बड़े नेताओं को खुश करना/रखना जरूरी है इसलिए वह अब 'उसमें' जुट गए हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के लोगों का ही कहना है कि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता को खुश करने/रखने के लिए उनके आयोजनों को सफल बनाने में कमल सांघवी ने जितनी सक्रियता दिखाई है, उसके सौवें अंश की सक्रियता भी वह यदि मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के स्कूल के लिए दिखा पाते तो उक्त प्रोजेक्ट सफल हो जाता । इससे भी ज्यादा मजे की और दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने क्लब के अपनी ही देखरेख में बने प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने का कमल सांघवी को कोई अफ़सोस भी नहीं है । उनका कहना है कि जीवन ज्योति स्कूल का काम सुचारू रूप से चल रहा है और इस प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने से बच्चों को किसी भी तरह की असुविधा नहीं हो रही है । यदि सचमुच ऐसा ही है तो फिर 13286 अमेरिकी डॉलर का यह प्रोजेक्ट बनाया ही क्यों गया था ? इस प्रोजेक्ट में बच्चों को लाने-लेजाने के लिए एक मिनी बस खरीदनी थी तथा विशेष सॉफ्टवेयर के साथ दो कंप्यूटर सिस्टम और एक एलसीडी प्रोजेक्टर भी खरीदा जाना था । उम्मीद की जानी चाहिए कि कमल सांघवी की देखरेख में यदि उक्त प्रोजेक्ट तैयार किया गया था तो सचमुच में शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही उक्त प्रोजेक्ट तैयार किया गया होगा । लेकिन अब कमल सांघवी कह रहे हैं कि प्रोजेक्ट ड्रॉप होने से बच्चों की जरूरतों पर कोई असर नहीं पड़ा है । कमल सांघवी का यह भी कहना है कि प्रोजेक्ट की रकम ऐसी नहीं है जिसे जुटाना उनके लिए मुश्किल हो - वह चार फोन घुमायेंगे, उक्त रकम इकठ्ठा हो जायेगी ।
कमल सांघवी की इस बात पर कोई भी शक नहीं कर सकता है - क्योंकि उनका रुतबा ऐसा ही है । सवाल लेकिन यही है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के स्कूल की जरूरतों को पूरा करने के लिए जितनी रकम की गणना आपने की, उसे चार फोन घुमा कर ही जुटा लेना चाहिए था - उसके लिए मैचिंग ग्रांट जुटाने के पचड़े में पड़ने की कोशिश ही आपने क्यों की और जब की तो उसे सफल बनाने में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? कमल सांघवी के क्लब के ही ट्रस्ट द्धारा चलाये जा रहे जीवन ज्योति स्कूल के मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को उनके घरों से लाने -लेजाने के लिए आवश्यक बस को खरीदने के लिए तैयार किये गए मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट के निरस्त हो जाने का कमल सांघवी को भले ही कोई अफ़सोस न हो, लेकिन इससे उनके डिस्ट्रिक्ट के उनके विरोधियों को अच्छा मसाला मिल गया है । कमल सांघवी ने पिछले कुछ वर्षों में रोटरी के बड़े नेताओं से अच्छे संबंध बना लिए हैं, जिसके चलते रोटरी में उनकी अच्छी साख और धाक बनी है - जो उनके डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों को पसंद नहीं आ रही है । मौजूदा इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता के साथ उनकी जो जोड़ी बनी है - वह कईओं की आँखों की किरकिरी बनी है । कोलकाता में वर्ष 2011 में शेखर मेहता की देखरेख में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में तथा इस वर्ष हैदराबाद में शेखर मेहता की देखरेख में आयोजित हो रहे रोटरी साउथ एशिया सम्मिट में कमल सांघवी को जो प्रमुख जिम्मेदारी मिली है, वह कई प्रमुख रोटेरियंस को बुरी तरह खटक रही है ।
यह इसलिए भी खटक रही है क्योंकि कमल सांघवी उक्त जिम्मेदारियों को निभाने में बहुत सफल हो रहे हैं और उस सफलता के लिए उनकी तारीफ भी हो रही है । उनकी इस सफलता को लेकिन उनके क्लब के प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने से जोड़ कर सवाल किया जा रहा है कि रोटरी में कमल सांघवी को इवेंट मैनेज करने का काम करना है या रोटरी के वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने का काम करना है ? इस सवाल का जबाव भी दिया जा रहा है और वह यह कि कमल सांघवी जानते हैं कि उनके क्लब के द्धारा तीस वर्षों से भी अधिक समय से चलाये जा रहे स्कूल के शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर बच्चे उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर थोड़े ही बनवा सकते हैं, वह तो शेखर मेहता बनवा सकते हैं इसलिए उन्हें शेखर मेहता की 'सेवा' में जुटना ज्यादा जरूरी लगा है - इस चक्कर में उनके खुद के द्धारा तैयार किया गया प्रोजेक्ट ड्रॉप हो गया तो उनकी बला से ।


Friday, January 4, 2013

सुधीर मंगला की शिकायत का रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार होना इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव का साइड इफेक्ट है क्या

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल द्धारा मनमाने तरीके से कोंक्रेंसेज को निरस्त करने की सुधीर मंगला की शिकायत के रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार हो जाने ने सभी को हैरान किया है । अपनी हार से बौखलाये सुधीर मंगला हालाँकि रमेश अग्रवाल के फैसले को चेलैंज करने की बात तो शुरू से कर रहे थे, किंतु उनकी बात को कोई गंभीरता से ले नहीं रहा था । हर किसी को लग रहा था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद पर जेके गौड़ के चुने जाने की औपचारिक घोषणा के बाद सुधीर मंगला जिस तरह अलग-थलग पड़ गए हैं, और उनका समर्थन करने वाले पूर्व गवर्नर नेताओं ने भी उनसे दूरी बना ली है - उसके बाद सुधीर मंगला के लिए करने-धरने को कुछ बचा नहीं है । इससे भी बड़ी बात यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने चुनाव को लेकर जो फैसला किया, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास को दिखा/बता कर - उन्हें विश्वास में लेकर किया; जिसके बाद रोटरी इंटरनेशनल द्धारा किसी शिकायत को तवज्जो देने की कोई सूरत ही नहीं बची रह जाती है । इसी कारण से सभी - यहाँ तक की सुधीर मंगला के समर्थक छोटे-बड़े नेता भी यह मान बैठे थे कि खेल पूरा हो चुका है और सुधीर मंगला के लिए करने को न तो कुछ बचा है और न उनकी कहीं कोई सुनवाई होगी ।
लेकिन रोटरी इंटरनेशनल ने सुधीर मंगला की शिकायत को स्वीकार करके न सिर्फ सभी को हैरान कर दिया है, बल्कि यह भी जता दिया है कि रमेश अग्रवाल ने फैसला भले ही यश पाल दास को विश्वास में लेकर किया हो - मामला लेकिन फिर भी ख़त्म नहीं मान लिया जा सकता । रोटरी इंटरनेशनल द्धारा सुधीर मंगला की शिकायत को स्वीकार करने के साथ ही वह किस्से महत्वपूर्ण हो उठे हैं, जिनमें कहा/बताया जा रहा था कि रमेश अग्रवाल के फैसलों पर यश पाल दास की सहमति उन पर दबाव बना कर, उन्हें घेर-घार कर ली गई है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल के कई मनमाने फैसलों को यश पाल दास ने पलटा है । कुछेक मामलों में तो पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन के बाद भी रमेश अग्रवाल के लिए यश पाल दास के कोप से बचना संभव नहीं हुआ । कहा/बताया जाता है कि इसके बाद ही रमेश अग्रवाल और सुशील गुप्ता की जोड़ी ने यश पाल दास को तरह-तरह से घेरा और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव के संदर्भ में लिए अपने फैसलों में उन्हें साझीदार बनाया । इस मामले में यश पाल दास के नजदीक रहे कुछेक लोगों का दावा रहा कि रमेश अग्रवाल और सुशील गुप्ता ने यश पाल दास से जो 'करवाया', उससे यश पाल दास ने अपने आपको बहुत अपमानित-सा भी महसूस किया ।
रोटरी इंटरनेशनल द्धारा सुधीर मंगला की शिकायत स्वीकार करने को यश पाल दास द्धारा अपमानित महसूस करने की बात से जोड़ कर देखने से मामला गंभीर हो जाता है । यह गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव को लेकर सुशील गुप्ता तक को रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा की धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ रहा है । सुधीर मंगला की शिकायत के रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार होने की टाईमिंग महत्वपूर्ण है और यह बड़े उथल-पुथल का संकेत करती है । डिस्ट्रिक्ट के जो कई बड़े नेता अभी दो दिन पहले तक सुधीर मंगला को शिकायत को लेकर हतोत्साहित कर रहे थे, अचानक से सुधीर मंगला की शिकायत के प्रति गंभीर नज़र आने लगे हैं । सुधीर मंगला के कुछेक नजदीकियों का कहना/बताना है कि किसी का भी समर्थन न मिलता देख सुधीर मंगला ने तो शिकायत करने का इरादा छोड़ ही दिया था; लेकिन फिर अचानक ही उनमें 'हवा भरती हुई' दिखी । यह हवा तब से भरती हुई दिखी जब से इंटरनेशनल डायरेक्टर की नोमीनेटिंग कमेटी को लेकर रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट के और ऊपर के नेताओं को ठेंगा दिखाना शुरू किया । रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने रंग बदल कर पहले तो जेके गौड़ की जीत का श्रेय लेने की बेशर्म-सी कोशिश की, और फिर नोमीनेटिंग कमेटी की राजनीति में दूसरों को - यहाँ तक की सुशील गुप्ता तक को नीचा दिखाने की कोशिश की; जिससे राजनीतिक समीकरण बुरी तरह गड़बड़ा गए हैं । नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में मुकेश अरनेजा और उनके अकेले समर्थक रमेश अग्रवाल के रवैये ने रोटरी के बड़े नेताओं को भी नाराज किया है ।
रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के खिलाफ बने इस माहौल ने सुधीर मंगला के लिए कुछ करने को उत्सुक नेताओं को प्रेरित किया और इसके साथ ही सुधीर मंगला में हवा भरी और उनकी शिकायत रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार हो गई । रोटरी के बड़े नेताओं की हरी झंडी मिले बिना इस शिकायत का दर्ज होना मुश्किल ही नहीं असंभव ही था । इसी कारण से सुधीर मंगला की शिकायत के दर्ज होने को नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के साइड इफेक्ट के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । यह सभी जानते हैं कि रोटरी इंटरनेशनल में फैसले तथ्यों के आधार पर नहीं, राजनीतिक समीकरणों के आधार पर होते हैं । राजनीतिक समीकरणों के चलते ही पिछले रोटरी वर्ष में दो डिस्ट्रिक्ट में चुनावी नतीजों को निरस्त कर दिया गया था । रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने अपनी अपनी बेवकूफीपूर्ण और जिदभरी मनमानियों से जो जो बदनामी कमाई है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव की लगभग बंद हो चुकी फाइल फिर से खुल गई है ।