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Friday, May 3, 2013

हैदराबाद में आयोजित हो रही 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' के आयोजन के जरिये शेखर मेहता और कमल सांघवी क्या एक-दूसरे को इस्तेमाल कर रहे हैं

धनबाद/कोलकाता । कमल सांघवी हैदराबाद में आयोजित हो रही 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' के जरिये क्या रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद तक पहुँचने की तिकड़म बना/लगा रहे हैं ? अभी तक यह सवाल उनके डिस्ट्रिक्ट के लोगों की जुबान पर था, लेकिन अब यह दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच भी चर्चा का विषय है । कमल सांघवी खुशकिस्मत हैं कि जो लोग उन्हें नहीं भी जानते हैं और/या उनके इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने में जिनकी कहीं कोई भूमिका नहीं होनी है, वह भी इस सवाल के जबाव में उनके समर्थक बन जाते हैं और प्रश्न का जबाव देने की बजाये प्रतिप्रश्न करते हैं कि कमल सांघवी यदि ऐसा कर भी रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं ? लेकिन इन नादान किस्म के लोगों की इस तरह की पैरवी कमल सांघवी की इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की तिकड़म की बात को और पुष्ट करने का ही काम कर रही है । ऐसे में, कमल सांघवी के लिए इस 'आरोप' के घेरे से खुद को बाहर निकालना और मुश्किल हो गया है ।
हैदराबाद में आयोजित हो रही 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' को कमल सांघवी की इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की तिकड़म से जोड़ने की बात को दरअसल इसलिए हवा मिली क्योंकि रोटरी के तमाम बड़े नेता इस आयोजन की प्रासंगिकता और जरूरत को समझने/पहचानने में असफल रहे हैं । चूँकि इस तरह के किसी आयोजन की बात रोटरी इंटरनेशनल की व्यवस्था में नहीं है इसलिए तमाम बड़े नेताओं के लिए यह समझना बड़ा मुश्किल हुआ कि यह समिट आखिर हो किसलिए रही है । रोटरी के कई एक बड़े नेताओं ने इन पंक्तियों के लेखक का ध्यान इस तथ्य की तरफ दिलाया कि रोटरी इंटरनेशनल के प्रत्येक कार्यक्रम का एक खास डिजाइन है, उसका एक उद्देश्य है और इस कारण उसका एक टारगेट ऑडिएंस होता है । तथाकथित 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' एक ऐसा आयोजन है, जिसका कोई डिजाइन नहीं है और इसलिए उसका कोई निश्चित उद्देश्य नहीं है और यही कारण है कि उसका कोई टारगेट ऑडिएंस नहीं है । समिट में कौन रोटेरियन शामिल होने का अधिकारी है, इसका कोई मापदण्ड तय नहीं किया गया है । यह इसीलिये नहीं किया गया क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य यह 'दिखाना' है कि आयोजक लोग कितनी भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं । इसी वजह से हैदराबाद में आयोजित हो रही समिट में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जिनके लिए रोटरी तफरीह का दूसरा नाम है । यहाँ तमाम लोग ऐसे हैं जो अपने क्लब की मीटिंग्स में ही कभी-कभार जाते हैं और डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में तो शायद ही कभी गए होंगे - यानि उन्हें न तो रोटरी में कोई दिलचस्पी है और न ही कभी उन्हें प्रेरित करने की जरूरत ही समझी गई ।
समझा जा सकता है कि जो रोटेरियन बेचारा कभी डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में नहीं गया वह यहाँ - तथाकथित रोटरी साऊथ एशिया समिट में क्या करने आया होगा ? जाहिर है कि वह आया नहीं है, उसे 'लाया गया' है । समिट के आयोजकों की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के नेताओं से पूछा गया कि कितने लोग हैदराबाद लाओगे - डिस्ट्रिक्ट के नेताओं ने अपनी हैसियत और आयोजकों के निगाह में चढ़ने की जरूरत के हिसाब से लोगों की संख्या बता दी; कुछेक डिस्ट्रिक्ट के नेताओं ने अपनी बताई संख्या के हिसाब से रजिस्ट्रेशन का पैसा भी अपनी ही जेब से भर दिया । डिस्ट्रिक्ट 3120 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतपाल गुलाटी बेचारे को यह अहसान उतारने के एवज में करना पड़ा । उल्लेखनीय है कि सतपाल गुलाटी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के लिए पिछले रोटरी वर्ष में हुए चुनाव में हार गए थे । उन्हें चुनाव लड़ाने वाले डिस्ट्रिक्ट के उनके आका जब उन्हें सीधे मुकाबले में चुनाव नहीं जितवा सके तो उन्होंने चोर दरवाजे से सतपाल गुलाटी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनवाने का बीड़ा उठाया । उनके आकाओं के तार चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता से जुड़े हैं, इसलिए शेखर मेहता की मदद से एक 'शिकायती खेल' हुआ और सतपाल गुलाटी को हारी हुई बाजी जितवा दी गई । शेखर मेहता का उन पर यह अहसान था, इसलिए 'रोटरी साउथ एशिया समिट' के प्रमुख कर्ता-धर्ता के रूप में शेखर मेहता ने जब उनसे पूछा कि कितने लोग हैदराबाद लाओगे तो उन्होंने झट से कई लोगों के रजिस्ट्रेशन का पैसा उन्हें भेज दिया । बाद में वह उतने लोगों का जुगाड़ करने में जुटे । यह पता हालाँकि अभी नहीं लग पाया है कि उन्होंने जितने लोगों का रजिस्ट्रेशन करवाया था, उतने लोगों का जुगाड़ वह कर पाए या नहीं ? इस 'तरकीब' से जो आयोजन हो रहा हो उसके बारे में लोगों का यह सोचना स्वाभाविक ही है कि इसके पीछे असल उद्देश्य क्या है ?
हैदराबाद में आयोजित हो रही 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' में जिस तरह से और जिस तरह के लोगों को जुटाया गया है उससे 'दिखा' यही है कि इस तथाकथित समिट के आयोजकों का मुख्य उद्देश्य भीड़ इकट्ठी करके अपना उल्लू सीधा करना है । यह समिट शेखर मेहता के दिमाग की उपज है और इसे संभव करने के लिए उन्होंने कमल सांघवी पर भरोसा किया । शेखर मेहता ने वर्ष 2011 में कोलकाता में आयोजित किये रोटरी इंस्टीट्यूट के आयोजन में भी कमल सांघवी पर भरोसा किया था । उस समय भी कुछेक लोगों के जहन में यह बात आई थी कि शेखर मेहता इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का लालच दिखा कर कमल सांघवी को इस्तेमाल कर रहे हैं । इस समिट में शेखर मेहता ने जब एक बार फिर कमल सांघवी को 'आगे' रखा - तो वही बात साबित होती हुई दिखी । हालाँकि कमल सांघवी के नजदीकियों का कहना है कि शेखर मेहता उन्हें इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह शेखर मेहता को इस्तेमाल कर रहे हैं । उनका कहना है कि कमल सांघवी ने रोटरी के बड़े नेताओं के बीच इतनी जड़ें जमाई हुई हैं कि वह इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए शेखर मेहता की मदद के मोहताज नहीं हैं । कई लोगों को लगता है कि दोनों को एक दूसरे की जरूरत है - शेखर मेहता को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनना है और कमल सांघवी को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है, इसलिए दोनों एक दूसरे की मदद से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं । हैदराबाद में आयोजित हो रही 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' के आयोजन को उन दोनों के इसी संयुक्त प्रयास के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 

Tuesday, April 23, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3250 में चर्चा है कि कमल सांघवी को रोटरी में इवेंट मैनेज करने का काम करना है या रोटरी के वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने का

धनबाद । रोटरी क्लब ऑफ धनबाद चेरीटेबल ट्रस्ट द्धारा पिछले तीस वर्ष से भी अधिक समय से चलाये जा रहे जीवन ज्योति स्कूल के मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को उनके घरों से लाने -लेजाने के लिए आवश्यक बस को खरीदने के लिए तैयार किये गए मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट के निरस्त हो जाने के कारण कमल सांघवी गंभीर आरोपों में घिर गए हैं । उल्लेखनीय है कि कमल सांघवी का क्लब रोटरी क्लब धनबाद इस मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट का प्राइमरी होस्ट पार्टनर था और खुद कमल सांघवी की देखरेख में यह प्रोजेक्ट तैयार किया गया था और उनपर ही इस प्रोजेक्ट को संभव करने की जिम्मेदारी थी । इस प्रोजेक्ट से संबद्ध जो दस्तावेज 'रचनात्मक संकल्प' के पास हैं, उनके अनुसार 13286 अमेरिकी डॉलर के इस प्रोजेक्ट के लिए 500 अमेरिकी डॉलर रोटरी क्लब धनबाद से और 2000 अमेरिकी डॉलर डिस्ट्रिक्ट 3250 के डीडीएफ एकाउंट से लेने की संस्तुति प्राप्त कर ली गई थी । बाकी बची रकम में से 5095 अमेरिकी डॉलर रोटरी फाउंडेशन से लेने की बात तय हुई थी और 5691 अमेरिकी डॉलर के लिए मैचिंग पार्टनर खोजना था । इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी चूँकि कमल सांघवी ने ली थी, इसलिए किसी को भी इसके पूरा हो पाने को लेकर जरा सा भी संदेह नहीं था । कमल सांघवी की रोटरी में जैसी धाक है; कल्याण बनर्जी के 'ब्ल्यू-आयड ब्यॉय' की उनकी जैसी पहचान है - उसके बाद इस प्रोजेक्ट की सफलता को लेकर किसी के पास भी शक/संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी । लेकिन फिर भी प्रोजेक्ट ड्रॉप हो गया । मजे की बात यह है कि इस प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने के लिए ट्रस्ट के, क्लब के और डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से कमल सांघवी को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । आरोप लगाया जा रहा है कि कमल सांघवी की रोटरी के वास्तविक कामों में नहीं बल्कि रोटरी के नाम पर इवेंट मैनेज करने में ज्यादा दिलचस्पी हो गई है ।
कमल सांघवी को लेकर लोगों के बीच चर्चा है कि कमल सांघवी को चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है और उन्होंने समझ लिया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए रोटरी के वास्तविक काम करना जरूरी नहीं है, बल्कि रोटरी के बड़े नेताओं को खुश करना/रखना जरूरी है इसलिए वह अब 'उसमें' जुट गए हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के लोगों का ही कहना है कि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता को खुश करने/रखने के लिए उनके आयोजनों को सफल बनाने में कमल सांघवी ने जितनी सक्रियता दिखाई है, उसके सौवें अंश की सक्रियता भी वह यदि मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के स्कूल के लिए दिखा पाते तो उक्त प्रोजेक्ट सफल हो जाता । इससे भी ज्यादा मजे की और दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने क्लब के अपनी ही देखरेख में बने प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने का कमल सांघवी को कोई अफ़सोस भी नहीं है । उनका कहना है कि जीवन ज्योति स्कूल का काम सुचारू रूप से चल रहा है और इस प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने से बच्चों को किसी भी तरह की असुविधा नहीं हो रही है । यदि सचमुच ऐसा ही है तो फिर 13286 अमेरिकी डॉलर का यह प्रोजेक्ट बनाया ही क्यों गया था ? इस प्रोजेक्ट में बच्चों को लाने-लेजाने के लिए एक मिनी बस खरीदनी थी तथा विशेष सॉफ्टवेयर के साथ दो कंप्यूटर सिस्टम और एक एलसीडी प्रोजेक्टर भी खरीदा जाना था । उम्मीद की जानी चाहिए कि कमल सांघवी की देखरेख में यदि उक्त प्रोजेक्ट तैयार किया गया था तो सचमुच में शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही उक्त प्रोजेक्ट तैयार किया गया होगा । लेकिन अब कमल सांघवी कह रहे हैं कि प्रोजेक्ट ड्रॉप होने से बच्चों की जरूरतों पर कोई असर नहीं पड़ा है । कमल सांघवी का यह भी कहना है कि प्रोजेक्ट की रकम ऐसी नहीं है जिसे जुटाना उनके लिए मुश्किल हो - वह चार फोन घुमायेंगे, उक्त रकम इकठ्ठा हो जायेगी ।
कमल सांघवी की इस बात पर कोई भी शक नहीं कर सकता है - क्योंकि उनका रुतबा ऐसा ही है । सवाल लेकिन यही है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के स्कूल की जरूरतों को पूरा करने के लिए जितनी रकम की गणना आपने की, उसे चार फोन घुमा कर ही जुटा लेना चाहिए था - उसके लिए मैचिंग ग्रांट जुटाने के पचड़े में पड़ने की कोशिश ही आपने क्यों की और जब की तो उसे सफल बनाने में दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? कमल सांघवी के क्लब के ही ट्रस्ट द्धारा चलाये जा रहे जीवन ज्योति स्कूल के मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को उनके घरों से लाने -लेजाने के लिए आवश्यक बस को खरीदने के लिए तैयार किये गए मैचिंग ग्रांट प्रोजेक्ट के निरस्त हो जाने का कमल सांघवी को भले ही कोई अफ़सोस न हो, लेकिन इससे उनके डिस्ट्रिक्ट के उनके विरोधियों को अच्छा मसाला मिल गया है । कमल सांघवी ने पिछले कुछ वर्षों में रोटरी के बड़े नेताओं से अच्छे संबंध बना लिए हैं, जिसके चलते रोटरी में उनकी अच्छी साख और धाक बनी है - जो उनके डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों को पसंद नहीं आ रही है । मौजूदा इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता के साथ उनकी जो जोड़ी बनी है - वह कईओं की आँखों की किरकिरी बनी है । कोलकाता में वर्ष 2011 में शेखर मेहता की देखरेख में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में तथा इस वर्ष हैदराबाद में शेखर मेहता की देखरेख में आयोजित हो रहे रोटरी साउथ एशिया सम्मिट में कमल सांघवी को जो प्रमुख जिम्मेदारी मिली है, वह कई प्रमुख रोटेरियंस को बुरी तरह खटक रही है ।
यह इसलिए भी खटक रही है क्योंकि कमल सांघवी उक्त जिम्मेदारियों को निभाने में बहुत सफल हो रहे हैं और उस सफलता के लिए उनकी तारीफ भी हो रही है । उनकी इस सफलता को लेकिन उनके क्लब के प्रोजेक्ट के ड्रॉप होने से जोड़ कर सवाल किया जा रहा है कि रोटरी में कमल सांघवी को इवेंट मैनेज करने का काम करना है या रोटरी के वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने का काम करना है ? इस सवाल का जबाव भी दिया जा रहा है और वह यह कि कमल सांघवी जानते हैं कि उनके क्लब के द्धारा तीस वर्षों से भी अधिक समय से चलाये जा रहे स्कूल के शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर बच्चे उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर थोड़े ही बनवा सकते हैं, वह तो शेखर मेहता बनवा सकते हैं इसलिए उन्हें शेखर मेहता की 'सेवा' में जुटना ज्यादा जरूरी लगा है - इस चक्कर में उनके खुद के द्धारा तैयार किया गया प्रोजेक्ट ड्रॉप हो गया तो उनकी बला से ।


Wednesday, February 27, 2013

विनोद बंसल को सुशील गुप्ता की नाराजगी के कारण शेखर मेहता के 'दरबार' से बाहर होना पड़ा है क्या ?

नई दिल्ली । शेखर मेहता ने हैदराबाद में आयोजित हो रही रोटरी साउथ एशिया समिट 2013 की तैयारियों से विनोद बंसल को जिस तरह दूर रखा है, उसे देख कर विनोद बंसल और उनके शुभचिंतकों को गहरा धक्का लगा है । धक्का लगने का कारण यह है कि अभी पिछले रोटरी वर्ष में ही कोलकाता में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में शेखर मेहता ने विनोद बंसल को काफी तवज्जो दी थी । विनोद बंसल के लिए भी और दूसरे लोगों के लिए भी हैरानी की बात यही है कि करीब डेढ़ वर्ष की अवधि में ऐसा क्या हो गया जो इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता ने विनोद बंसल को अपनी 'कोटरी' से बाहर कर दिया है । विनोद बंसल के लिए ज्यादा तगड़े झटके की बात यह है कि शेखर मेहता ने इस बार मुकेश अरनेजा को अपेक्षाकृत ज्यादा तवज्जो दी है । मुकेश अरनेजा के पास समिट के प्रमोशन की जिम्मेदारी है । विनोद बंसल की शेखर मेहता द्धारा की गई उपेक्षा को देख/जान कर ही मुकेश अरनेजा ने समिट के प्रमोशन से विनोद बंसल को अलग-थलग रखा हुआ है और सिर्फ रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को आगे करके ही समिट को प्रमोट करने का काम कर रहे हैं ।
विनोद बंसल आने वाले वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे और इस नाते से समिट के प्रमोशन में उनकी अपील ज्यादा कारगर होगी - लेकिन मुकेश अरनेजा ने उन्हें पूरी तरह अलग-थलग रखा हुआ है । किन्हीं-किन्हीं लोगों ने उनसे इस बारे में पूछा भी तो उन्होंने यह कहते हुए कि विनोद बंसल डीटीटीएस की तैयारी में व्यस्त होने के कारण समिट के प्रमोशन के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, ठीकरा विनोद बंसल के सिर पर ही फोड़ दिया है । विनोद बंसल और शेखर मेहता के बीच की नजदीकियों की जिन भी लोगों को जानकारी हैं, उनके लिए यह समझना सचमुच मुश्किल हो रहा है कि आखिर क्यों शेखर मेहता ने खुद तो विनोद बंसल को किनारे लगाया ही है, साथ ही नए-नए बने अपने खुशामदिये मुकेश अरनेजा से भी विनोद बंसल को अपमानित करवा रहे हैं ? डिस्ट्रिक्ट में ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट से बाहर के भी कई लोग जानते हैं कि विनोद बंसल ने खुद से आगे बढ़-बढ़ कर शेखर मेहता की मदद की है - पिछले रोटरी वर्ष में शेखर मेहता की देख-रेख में कोलकाता में हुए रोटरी इंस्टीट्यूट के लिए शेखर मेहता को विनोद बंसल ने स्पोंसरशिप के जरिये बड़ी रकम तो दिलवाई ही थी, शेखर मेहता के हर दिल्ली दौरे पर वह उनकी सेवा में भी हाजिर रहते रहे हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में शेखर मेहता ने भी प्रायः हमेशा ही विनोद बंसल को सेवा के बदले 'मेवा' उपलब्ध करवाई है । लेकिन अब अचानक से लोगों ने शेखर मेहता को विनोद बंसल से दूरी बनाते/रखते देखा है ।
शेखर मेहता ने पिछले रोटरी वर्ष में कोलकाता में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में विनोद बंसल को जो अतिरिक्त तवज्जो दी थी, उसके चलते उन्होंने डीजीएन होने के बावजूद विनोद बंसल को एक कमेटी में लिया था । अलग-अलग कमेटियों के सदस्यों में पीडीजी स्तर के लोग ही थे, एक अकेले विनोद बंसल ही थे तो पीडीजी नहीं थे, लेकिन फिर भी वह एक कमेटी में थे । कमेटी में तो शेखर मेहता ने उन्हें इस बार भी रखा है, लेकिन उनका परिचय तक गलत दिया गया है - समिट की साइट पर उन्हें पीडीजी बताया गया है, जबकि पीडीजी होने में उन्हें अभी सोलह महीने हैं; अभी तो वह डीजी भी नहीं बने हैं । शेखर मेहता ने अभी भी विनोद बंसल को फंड जुटाने की ही जिम्मेदारी दी है । विनोद बंसल और उनके नजदीकियों को इसी बात का अफ़सोस है कि शेखर मेहता ने उन्हें बस एटीएम मशीन भर माना हुआ है ।
शेखर मेहता की 'कोटरी' से विनोद बंसल के बाहर होने के कारणों की पड़ताल करने वाले लोगों ने जाना/समझा है कि इस स्थिति के लिए खुद विनोद बंसल भी जिम्मेदार हैं । विनोद बंसल ने अपनी महत्वाकांक्षा में सिर्फ शेखर मेहता के साथ ही नजदीकी नहीं बनाई, बल्कि हर 'बड़े' आदमी के नजदीक होने की कोशिश की । उनकी इस कोशिश को देख/जान कर शेखर मेहता ने समझ लिया कि विनोद बंसल पर विश्वास नहीं किया जा सकता और उन्हें अपनी 'कोटरी' का सदस्य नहीं बनाया जा सकता । इस तरह, हर किसी के नजदीक होने की विनोद बंसल की कोशिश ने उन्हें शेखर मेहता से दूर कर दिया है । कुछेक बड़े नेताओं का कहना है कि शेखर मेहता की 'कोटरी' से पत्ता कटवाने का काम पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने किया है । सुशील गुप्ता को विनोद बंसल का राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना दरअसल पसंद नहीं आया । सुशील गुप्ता को हर वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से कुछ फेबर लेने होते हैं - विनोद बंसल को राजेश बत्रा के नजदीक देख कर सुशील गुप्ता ने समझ लिया कि उन्हें विनोद बंसल के गवर्नर-काल में उक्त फेबर नहीं मिल पाएंगे; लिहाजा उन्होंने शेखर मेहता के दरबार से विनोद बंसल की छुट्टी करवा दी । शेखर मेहता चूँकि सुशील गुप्ता के 'आदमी' माने जाते हैं, इसलिए सुशील गुप्ता का आदेश मान लेने में शेखर मेहता ने कोई देर नहीं की ।