Monday, June 29, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में विभिन्न कमेटियों के पद पाने और बचाने की कोशिश में दीपक तलवार तथा तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों व समर्थकों ने नए बने मल्टीपल चेयरमैन क्षितिज शर्मा से संपर्क तो साधा है, लेकिन उम्मीद नहीं है कि डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के चुनाव को 'गंदा' करने/बनाने वाले लोगों के पद बचेंगे या उन्हें मिलेंगे

नई दिल्ली । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में विभिन्न पदों के पदाधिकारियों को बड़े उलटफेर की आशंका लग रही है, और कुछेक पदाधिकारियों को पद छिनने का डर सताने लगा है; इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के लिए हुए चुनाव में दीपक तलवार की उम्मीदवारी का समर्थन करने वालों को पद छिनने/खोने और न मिलने का सबसे ज्यादा डर लग रहा है - इस डर को दूर करने के लिए उन्होंने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन क्षितिज शर्मा से तार जोड़ने शुरू तो किए हैं, लेकिन खुद उन्हें ही विश्वास नहीं है कि क्षितिज शर्मा कोई फैसला कर सकेंगे । दीपक तलवार के नजदीकियों और समर्थकों को लग रहा है कि दीपक तलवार की उम्मीदवारी के कारण जितेंद्र चौहान और उनके समर्थकों को जो मुश्किलें उठानी पड़ी हैं, उसका बदला अब दीपक तलवार के नजदीकियों और समर्थकों से लिया जायेगा, और उन्हें मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में पद नहीं दिए जायेंगे - जिनके पास पद हैं, उनसे ले लिए जायेंगे । हालाँकि, यदि सचमुच ऐसा होता है तो यह कोई हैरानी की और या कोई अनोखी बात नहीं होगी - क्योंकि हर सत्ताधारी यह कोशिश करता ही है कि वह अपने 'अधीन' पदों को अपने नजदीकियों और समर्थकों को सौंपे । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के पद देने/बाँटने/सौंपने का अवसर यदि जितेंद्र चौहान को मिला है, तो यह बहुत स्वाभाविक ही है कि वह उनकी उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने वाले लोगों को उक्त पद दें/दिलवाएँ । उनके प्रतिद्वंद्वी रहे दीपक तलवार तथा तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों और समर्थकों को यह उम्मीद करना भी भला क्यों चाहिए कि जितेंद्र चौहान उन्हें पद दिलवायेंगे । यह कोई अच्छी और आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन सच्चाई यही है - और विडंबना यह है कि हर किसी ने इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है । ऐसे में, दीपक तलवार के नजदीकियों व समर्थकों का पद छिनने और न मिलने को लेकर आशंकित होने का कोई कारण समझ में नहीं आता है ।
हालाँकि मामला इतना सीधा व सरल भी नहीं है । पदों को देने/दिलवाने में खेमेबाजी होने के बावजूद, कुछेक लोगों के लिए खेमेबाजी दीवार नहीं बनती है, लेकिन इस बार खेमेबाजी से ऊपर देखे जाने वाले लोग भी खेमेबाजी का 'शिकार' होते देखे/सुने जा रहे हैं - लेकिन इसके लिए भी 'उन्हें' ही दोषी ठहराया/माना जा रहा है । लोगों का सीधा आरोप है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के लिए हुए इस बार के चुनाव में दीपक तलवार की तरफ से खासी 'गंदगी' हुई, और उस गंदगी के लिए कीचड़ तैयार करने में उन लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया, जो मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में पदाधिकारी हैं तथा लोगों के बीच जिनकी साफ-सुथरी इमेज रही है । दीपक तलवार का कैम्पेन पूरी तरह नकारात्मकता पर केंद्रित रहा, जिसमें दीपक तलवार की खूबियों की बात कम थी - जितेंद्र चौहान पर व्यक्तिगत छींटाकशी ज्यादा थी । शुरू में जरूर दीपक तलवार की खूबियों की बात हुई - जिसमें उनके पढ़े-लिखे होने और अंग्रेजी बोल सकने की क्षमता पर जोर था, उनकी बढ़ी उम्र का भी जिक्र था, और लायन लीडर्स के साथ काम करने के उनके अनुभव की बात थी; लेकिन जल्दी ही दीपक तलवार और उनके समर्थकों को समझ में आ गया कि इन खूबियों के भरोसे वोट नहीं मिल सकेंगे । इन बातों को लेकर दीपक तलवार का बल्कि मजाक और बना । लोगों ने कहा/पूछा कि डायरेक्टर बनने के लिए दीपक तलवार ने अपनी उम्र बढ़ने का इंतजार क्यों किया, वह पहले उम्मीदवार क्यों नहीं बने ? पीछे जो लोग डायरेक्टर बने, वह क्या दीपक तलवार से ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, उनसे अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं - दीपक तलवार इसलिए उनके सामने उम्मीदवार नहीं बने थे क्या ?
लोगों के बीच इस तरह की बातों के होने से दीपक तलवार की तरफ से उनकी खूबियों की बात होना बंद हो गया, और उनकी तरफ का कैम्पेन पूरी तरफ नकारात्मक हो गया । दीपक तलवार और उनके समर्थकों का सारा जोर जितेंद्र चौहान का मजाक बनाने पर, उनकी उम्मीदवारी के नामांकन में कमिया खोजने तथा किसी भी तरह से चुनाव को रद्द करवाने पर आ टिका । मजे की बात यह रही कि चुनाव-अभियान के गंदा होने की आशंका तेजपाल खिल्लन की तरफ से थी, लेकिन तेजपाल खिल्लन ने चुनाव बड़ी गरिमा के साथ लड़ा और चुनावी नतीजे को भी बड़े बड़प्पन के साथ स्वीकार किया । दीपक तलवार के समर्थकों ने लेकिन चुनाव को गटर-छाप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी - और विडंबना यह रही कि ऐसा करने में उन लोगों की भी खासी सक्रिय भूमिका रही, जिन्हें भले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है । दरअसल इसीलिए, मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के पदों पर होने वाली नियुक्ति के मामले में जितेंद्र चौहान और उनके नजदीकी उन लोगों के प्रति कोई रियायत बरतने को तैयार नहीं हैं, जिन्होंने चुनाव को गंदा करने/बनाने में भूमिका निभाई है । दीपक तलवार और तेजपाल खिल्लन की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन क्षितिज शर्मा पर पदों के लिए दबाव बनाने का काम तो शुरू किया है, लेकिन लगता नहीं है कि जितेंद्र चौहान से विचार-विमर्श किए बिना क्षितिज शर्मा पदों को लेकर कोई फैसला करेंगे ।

Sunday, June 28, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के खुले सहयोग व समर्थन के बावजूद, जोन 7 में डायरेक्टर पद का चुनाव जीते रवि वदलमानी, पराजित हुए उम्मीदवार सैम मोव्वा की तरफ से हुई चुनावी शिकायत का शिकार होने से नहीं बच सके और जीता-जिताया इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद खो बैठे

नई दिल्ली । सैम मोव्वा (के क्लब) की शिकायत ने इंटरनेशनल डायरेक्टर इलेक्ट रवि वदलमानी को तो 'डुबोया' ही, खुद सैम मोव्वा को भी ले डूबी - और इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी को भी बदनामी के छींटों से भिगो बैठी । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने जोन 7 में हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव और उसके नतीजे को रद्द कर दिया है, और फिर से चुनाव करवाने का फैसला सुनाया है । उक्त चुनाव में पराजित हुए सैम मोव्वा के क्लब की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत की गई थी कि चुनाव जीतने के लिए रवि वदलमानी ने कैम्पेन चलाया, और इस तरह रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का उल्लंघन किया है । रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से एक जाँच-टीम बनाई गई, जिसने अपनी जाँच-पड़ताल में पाया कि उम्मीदवार के रूप में न सिर्फ रवि वदलमानी ने - बल्कि सैम मोव्वा ने भी कैम्पेन किया था । इस रिपोर्ट के आधार पर, रोटरी इंटरनेशनल ने उक्त चुनाव को तथा उसके नतीजे को अमान्य घोषित कर दिया - तथा दोबारा चुनाव करवाने का फैसला सुनाया । रवि वदलमानी तथा सैम मोव्वा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने दोबारा होने वाले चुनाव में इन दोनों के उम्मीदवार बनने पर रोक लगा दी है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का यह फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के लिए इसलिए झटके वाला माना/समझा जा रहा है, क्योंकि रवि वदलमानी के कैम्पेन में कमल सांघवी ने खूब बढ़चढ़ कर भाग लिया था - कमल सांघवी चूँकि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के सदस्य हैं, इसलिए माना/समझा जा रहा था कि सैम मोव्वा (के क्लब) की शिकायत पर बोर्ड में रवि वदलमानी को नुकसान पहुँचाने वाला फैसला नहीं हो सकेगा । दरअसल इसीलिए, रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर कमल सांघवी के लिए भी झटके वाला साबित हुआ है ।
इस फैसले के पीछे रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन को देखा/पहचाना जा रहा है, और माना जा रहा है कि रवि वदलमानी रोटरी लीडरशिप की खेमेबाजी की 'लड़ाई' के शिकार बन गए हैं । उल्लेखनीय है कि सैम मोव्वा को पूर्व प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन के तथा रवि वदलमानी को भावी प्रेसीडेंट शेखर मेहता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - और इस तरह से, उक्त चुनाव के जरिये वास्तव में केआर रविंद्रन व शेखर मेहता की राजनीतिक 'ताकत' को आँकने की तैयारी हो रही थी । चुनावी प्रक्रिया के पहले चरण में, नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा सैम मोव्वा को अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से केआर रविंद्रन का पलड़ा भारी साबित हुआ; लेकिन रवि वदलमानी से चेलैंज करवा कर शेखर मेहता खेमे ने पहले चरण में हारी हुई बाजी को दूसरे चरण में जीतने की तैयारी की । रवि वदलमानी की जीत को सुनिश्चित करने के लिए ही शेखर मेहता खेमे की तरफ कमल सांघवी ने रवि वदलमानी की उम्मीदवारी की कमान संभाली । समझा जाता है कि इसी बात से चिढ़ कर केआर रविंद्रन खेमे के नेताओं ने, चुनाव में विजयी हुए रवि वदलमानी की जीत पर ग्रहण लगाने के उद्देश्य से सैम मोव्वा (के क्लब) की तरफ से शिकायत दर्ज करवाई गई । रवि वदलमानी और उनके समर्थकों ने उक्त शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया; उन्हें विश्वास रहा कि कमल सांघवी ने जैसे उनके कैम्पेन को संभाला, वैसे ही इंटरनेशनल बोर्ड में शिकायत को भी 'संभाल' लेंगे । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, वह इसलिए भी निश्चिंत रहे, क्योंकि उन्हें यकीन रहा कि यह मामला अगले रोटरी वर्ष में होने वाली मीटिंग में आयेगा - जब शेखर मेहता भी बोर्ड में होंगे, और तब रवि वदलमानी के खिलाफ कोई फैसला नहीं हो सकेगा । रवि वदलमानी और उनके छोटे-बड़े समर्थकों को यह उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी कि उक्त मामला मौजूदा रोटरी वर्ष में ही रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की कार्रवाई में आ जायेगा, और उनकी चुनावी जीत के लिए मुसीबत बन जायेगा ।
रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले से झटका खाए रवि वदलमानी और उनके समर्थकों के लिए राहत की बात यही है कि 'सजा' यदि रवि वदलमानी को मिली है, तो सैम मोव्वा भी अपनी ही शिकायत के शिकार हुए हैं; और इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद यदि रवि वदलमानी से छिना है, तो सैम मोव्वा के लिए भी उक्त पद पाने की संभावना समाप्त हुई है । इस फैसले के सामने आने के बाद से, मजे की बात यह देखने/सुनने को मिल रही है कि कमल सांघवी के नजदीकी यह बताने/जताने/दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि कमल सांघवी यदि रवि वदलमानी का डायरेक्टर पद नहीं बचा सके हैं, तो उन्होंने सैम मोव्वा के लिए भी डायरेक्टर पद की कुर्सी पाने की संभावना नहीं बची रहने दी है - और इस तरह, मामले को 'बराबर' का बना दिया है । इस बताने/जताने/दिखाने को कमल सांघवी की तरफ से 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । कमल सांघवी के नजदीकियों का कहना है कि उनकी कोशिश है कि जोन 7 में हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर हुई उठापटक उनकी 'स्थिति' पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले, और रोटेरियंस उन्हें 'कमजोर' न समझने लगें । वैसे, रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के इस फैसले ने अधिकतर रोटेरियंस को हैरान ही किया है - क्योंकि वह तो हर चुनाव में उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को कैम्पेन करते हुए 'देखते' और सुनते हैं । रोटरी में होने वाले छोटे से छोटे चुनाव में बड़े बड़े नेताओं और पदाधिकारियों को कैम्पेन करते हुए देखा और सुना जाता है - उसकी शिकायतें भी होती हैं, लेकिन कार्रवाई होते हुए कभी-कभार ही देखा गया है । ऐसे में, रोटेरियंस को यही लग रहा है कि कैम्पेन करने जैसी शिकायतों पर कार्रवाई तभी होती है - जब बड़े नेताओं और पदाधिकारियों को अपने 'स्कोर सेटल' करने होते हैं ।  

Friday, June 26, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति तथा उनके भुगतान में घपलेबाजी के काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर, चुप्पी साध कर बचने की चेयरमैन शशांक अग्रवाल की कोशिश ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से मुश्किल में पड़ी; लेकिन शशांक अग्रवाल को भरोसा है कि वह पंकज गुप्ता को 'मैनेज' कर लेंगे   

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पहले अविनाश गुप्ता और गौरव गर्ग ने आरोप लगाए कि चेयरमैन शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव नहीं देते है, और अब चेयरमैन शशांक अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि ट्रेजरर पंकज गुप्ता चेक साइन नहीं कर रहे हैं - जिसके चलते वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान नहीं हो पा रहे हैं । आज आयोजित हुई एक ऑनलाइन मीटिंग में शशांक अग्रवाल ने पहले तो नितिन कँवर, गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता को मीटिंग में शामिल होने से रोका; लेकिन सुमित गर्ग ने उनसे जब इन तीनों को भी मीटिंग में शामिल करने का अनुरोध किया - तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि यह तीनों यदि मीटिंग में शामिल हुए, तो वह मीटिंग से निकल जायेंगे । पंकज गुप्ता मीटिंग में शामिल ही नहीं हुए । इन आरोपों और बातों से जाहिर है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूरी तरह से अराजकता का माहौल है, और शशांक अग्रवाल पिछले चेयरमैन हरीश जैन के ही नक्शेकदम पर हैं - जिनसे इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कार्यभार छीन लिया था, और वह बस नाम के ही चेयरमैन रह गए थे । हरीश जैन की जो गत बनी, और जिसके चलते रीजनल काउंसिल महीनों तक सस्पेंड रही - उसके चलते उम्मीद की गई थी कि शशांक अग्रवाल सबक लेंगे और अपने साथी पदाधिकारियों तथा सदस्यों के साथ तालमेल बना कर काम करेंगे । लेकिन लग ऐसा रहा है कि जैसे शशांक अग्रवाल खुद को हरीश जैन से भी 'बुरा' साबित करने की 'कोशिशों' में जुट गए हैं । शशांक अग्रवाल हालाँकि खुशकिस्मत रहे कि कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण बने हालात की वजह से उनकी कारगुजारियाँ अभी तक ढकी/छिपी रही थीं, लेकिन जो अब धीरे-धीरे खुल रही हैं, और सामने आ रही हैं ।
रीजनल काउंसिल को विभिन्न सर्विस मुहैया करवाने वाले वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान को लेकर शशांक अग्रवाल की स्थिति पिछले चेयरमैन हरीश जैन जैसी ही है । इन्हें होने वाले भुगतान करीब तीन महीनों से रुके पड़े हैं । उल्लेखनीय है कि हरीश जैन के चेयरमैन रहते हुए भी यही हाल था; और मजे की बात यह है कि हरीश जैन की तरह शशांक अग्रवाल भी इसके लिए ट्रेजरर को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । आज हुई एक मीटिंग में यह सवाल उठा तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि उन्होंने तो सब हिसाब बना दिए हैं, लेकिन चेक्स पर ट्रेजरर पंकज गुप्ता के साइन न हो पाने के कारण भुगतान नहीं हो सके हैं । मीटिंग में चूँकि पंकज गुप्ता उपस्थित नहीं थे, इसलिए उनका पक्ष सामने नहीं आ सका है; लेकिन मीटिंग में मौजूद उनके नजदीकी शशांक अग्रवाल के इस जबाव पर चुप रहे - जिससे शशांक अग्रवाल की बात को बल मिला । मीटिंग के बाद हुई अनौपचारिक चर्चाओं में बात सामने आई कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को शशांक अग्रवाल के बनाए/दिए हिसाब में कई विवरण आपत्तिजनक लगे, जिन पर उन्होंने स्पष्टीकरण माँगे - लेकिन जो उन्हें नहीं मिले, इसलिए भुगतान अटक गए । हरीश जैन की ही तरह, शशांक अग्रवाल पर भी मनमाने तरीके से वेंडर्स व फैकल्टीज नियुक्त करने तथा उन्हें अनाप-शनाप तरीके से भुगतान करने की कोशिश करने के आरोप हैं । काउंसिल सदस्यों के ही आरोप हैं कि शशांक अग्रवाल ने अपने जानने वालों तथा अपने नजदीकियों को फायदा पहुँचाने का काम किया है । समझा जाता है कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को भी चूँकि इस तरह के आरोपों में सच्चाई नजर आई, और इसीलिए उन्होंने आँख मूँद कर चेक्स पर साइन करने से इंकार कर दिया; शशांक अग्रवाल ने मीटिंग में यह तो बता दिया कि ट्रेजरर द्वारा चेक्स साइन नहीं करने के कारण भुगतान नहीं हो पा रहे हैं - किंतु इस बात को वह छिपा गए कि ट्रेजरर साइन कर क्यों नहीं रहे हैं ?
शशांक अग्रवाल को डर हुआ कि जिस सच्चाई को वह छिपा रहे हैं, उस सच्चाई को कहीं नितिन कँवर, गौरव गर्ग व अविनाश गुप्ता न जाहिर कर दें - इसीलिए उन्होंने इन तीनों को मीटिंग में शामिल करने से इंकार कर दिया; और इन्हें मीटिंग में शामिल करने के सुमित गर्ग के अनुरोध को भी नहीं माना - उलटे धमकी और दी कि मीटिंग में यदि यह तीनों शामिल हुए, तो वह मीटिंग में मौजूद नहीं रहेंगे । गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए हैं कि शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव तक नहीं देते हैं । समझा जाता है कि गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति में होने वाली मनमानी तथा उन्हें होने वाले भुगतान की घपलेबाजी को लेकर सवाल पूछे हैं, इसलिए शशांक अग्रवाल ने जबाव देने की बजाये - चुप रहने का रास्ता अपनाया है । चेयरमैन के रूप में शशांक अग्रवाल को लग रहा है कि काउंसिल के ही सदस्यों के सवालों को अनसुना करके और सवाल उठाने वाले सदस्यों को मीटिंग में शामिल नहीं होने देकर वह आरोपों से बच जायेंगे, लेकिन ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से लगता है कि उनकी मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं । शशांक अग्रवाल ने हालाँकि अपने नजदीकियों को आश्वस्त किया है कि पंकज गुप्ता को वह 'मैनेज' कर लेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि पंकज गुप्ता चेक्स पर साइन करने के संबंध में अपनी जाँच-पड़ताल व आपत्तियों पर टिके रहेंगे, या फिर शशांक अग्रवाल के सामने अंततः समर्पण कर देंगे ?

Thursday, June 25, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन्स की मौजूदा सदस्यों व पदाधिकारियों के साथ मिलीभगत का आयोजन फ्लॉप होने से, चेयरमैन शशांक अग्रवाल को राहत तो मिली; लेकिन अविनाश गुप्ता व गौरव गर्ग के सार्वजनिक रोने ने उनकी मुसीबत व चुनौती को बढ़ाया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों की तीन पूर्व चेयरमैन्स के साथ मिल कर रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं को हल करने की तैयारी को अपेक्षित समर्थन न मिलने के कारण खासा तगड़ा झटका लगा है । रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि तीन नाकारा साबित हुए चेयरमैन्स की मदद से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं को हल करने की बात करना/कहना भी एक भद्दा मजाक है । उल्लेखनीय है कि नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा और अविनाश गुप्ता ने दीपक गर्ग, राकेश मक्कड़ और हरीश जैन के साथ मिलकर रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की मौजूदा समस्याओं का निवारण करने के उद्देश्य से आज एक ऑनलाइन मीटिंग की, जिसमें गिनती के लोगों ने ही दिलचस्पी ली । लोगों का कहना है कि दीपक गर्ग, राकेश मक्कड़ और हरीश जैन जब चेयरमैन थे, तब अपनी जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वाह नहीं कर सके और नाकारा साबित हुए - तो अब वह क्या कर सकेंगे ? दीपक गर्ग चेयरमैन तो बन गए थे, लेकिन अपनी फजीहत होती देख छह महीने में ही इस्तीफा देकर भाग खड़े हुए थे - और उस वर्ष के बाकी छह महीनों में कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में पूजा बंसल को कमान संभालना पड़ी थी । राकेश मक्कड़ के लिए तो चेयरमैन के रूप में लोगों का सामना करना ही मुश्किल होता था, उन्होंने शायद ही कभी मंच से लोगों को मुद्दों पर संबोधित किया हो - उन्हें देख कर लोगों को यही लगता था कि यह आदमी चेयरमैन आखिर बना क्यों है ? हरीश जैन का मामला तो सबसे निराला ही रहा, पहले दिन से ही उनका चेयरमैन-काल अराजकता का शिकार बना और इंस्टीट्यूट प्रशासन को उनके कार्यकाल को सस्पेंड ही कर देना पड़ा था । लोगों का कहना है कि ऐसे महानुभावों के सहारे रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं को हल करने की बात करना चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की आँखों में धूल झोंकने जैसा है, और इसीलिए आज का आयोजन बुरी तरह फ्लॉप हुआ ।
मजे की बात यह रही कि आयोजन से जुड़े रीजनल काउंसिल के तीनों सदस्यों को भी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की आलोचना का शिकार होना पड़ा है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि यह तीनों काउंसिल के सदस्य और पदाधिकारी होते/रहते हुए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं को समझने तथा हल करने की बजाये, काउंसिल के दूसरे पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ लड़ने-झगड़ने में व्यस्त रहते रहे हैं - और अब पूर्व चेयरमैन्स के साथ मिल कर समस्याओं को हल करने/करवाने की बात कर रहे हैं । नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा को पिछले टर्म में भी और इस टर्म में भी सबसे झगड़ालु सदस्यों के रूप में देखा/पहचाना गया है; काउंसिल की मीटिंग्स में उनके व्यवहार के चलते कई एक मौकों पर काउंसिल सदस्यों द्वारा ही पुलिस बुलाने तक की नौबत आई है । अविनाश गुप्ता से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं, और कई मौकों पर उन्होंने बड़ी तथा उदार सोच व व्यवहार को प्रदर्शित भी किया और बड़प्पन दिखाया - लेकिन कुछेक अवसरों पर उनके रवैये को काउंसिल के माहौल को बिगाड़ने का काम करते हुए भी देखा/पाया गया । अविनाश गुप्ता को नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के साथ नजदीकी बनाते देख, उनके नजदीकियों तथा उन्हें जानने वालों को अफसोस हुआ है । अविनाश गुप्ता को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में तीन टर्म सदस्य रहे संजय अग्रवाल के नजदीक देखा/पहचाना जाता है, जिन्होंने सेंट्रल काउंसिल के अगले चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के साथ नजदीकी बनाने/रखने की अविनाश गुप्ता की कोशिश संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाली हो सकती है । अविनाश गुप्ता की संलग्नता वाले आज के आयोजन की विफलता ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की तरफ से रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं को सुनने तथा हल करने के बाबत चेयरमैन शशांक अग्रवाल के नेतृत्व में कल एक अधिकृत कार्यक्रम करने की घोषणा की गई है, जिसके प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने अच्छी उत्सुकता दिखाई है । इसका कारण शायद यही है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को लगता है कि उनकी समस्याओं को काउंसिल के अधिकृत पदाधिकारी ही हल कर सकते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अधिकृत कार्यक्रम को लेकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की उत्सुकता ने चेयरमैन शशांक अग्रवाल को राहत व बढ़त तो दी है, लेकिन उनके सामने इस कारण चुनौती भी आ खड़ी हुई है कि रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच यह पोल भी खुल चुकी है कि काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच संबंध अच्छे नहीं हैं, और उनके बीच गंभीर टकराव के कारण मौजूद हैं । शशांक अग्रवाल ने कल के कार्यक्रम के बारे में सोशल मीडिया में जानकारी दी, तो अविनाश गुप्ता तथा गौरव गर्ग ने सोशल मीडिया में ही अपना दुखड़ा रोना शुरू कर दिया कि काउंसिल के पदाधिकारी उनकी ईमेल्स के जबाव तक नहीं देते हैं । इनके रोने से काउंसिल के कामकाज की असलियत ही लोगों के सामने आई है, जो चेयरमैन के रूप में शशांक अग्रवाल के लिए मुसीबत व चुनौती दोनों है ।

Wednesday, June 24, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू की तरफ से मल्टीपल ड्यूज जमा करवाने को लेकर आनाकानी करती आ रहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु सिंह ने पारस अग्रवाल के खिलाफ मोर्चा खोल कर अपनी खुन्नस को ही जाहिर किया है क्या ?

आगरा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु सिंह ने मल्टीपल ड्यूज जमा न करने/करवाने के मामले में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बीके गुप्ता को शर्मिंदा करने के लिए जैसे चादर बिछवाई थी, ठीक वैसे ही मधु सिंह के लिए भी चादर बिछवाने की तैयारी सुनी जा रही है - क्योंकि बीके गुप्ता की तरह ही मधु सिंह ने भी मल्टीपल ड्यूज जमा नहीं करवाए हैं, और जिसके कारण मल्टीपल काउंसिल के नए पदाधिकारियों की चुनावी प्रक्रिया में उनके डिस्ट्रिक्ट को प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं मिला है । उल्लेखनीय है कि बीके गुप्ता द्वारा मल्टीपल ड्यूज जमा न करने/करवाने के मामले को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालते ही मधु सिंह ने बड़े जोरशोर से उठाया था, और इसे डिस्ट्रिक्ट की बदनामी के तौर पर रेखांकित किया था । मधु सिंह के उस रवैये को याद करते हुए लोगों को हैरानी है कि बीके गुप्ता के पदचिन्हों पर चलते हुए मधु सिंह खुद भी मल्टीपल ड्यूज जमा न करवा कर डिस्ट्रिक्ट की बदनामी क्यों करवा रही हैं ? सुना/बताया जाता है कि मल्टीपल ड्यूज जमा न करने/करवाने के मामले में बीके गुप्ता को शर्मिंदा करने के उद्देश्य से मधु सिंह ने अपनी शुरू की एक मीटिंग में यह कहते हुए लोगों के सामने एक चादर बिछवाई थी, कि मल्टीपल ड्यूज के रूप में इकट्ठा हुई रकम तो बीके गुप्ता ने अपने घर-खर्च में इस्तेमाल कर ली है, इसलिए उनसे यह कहने की जरूरत नहीं है कि वह उक्त रकम जमा करवाएँ - लेकिन डिस्ट्रिक्ट को बदनामी से बचाने के लिए उक्त रकम हमें चंदा करके जमा करनी/करवानी चाहिए । यह तो किसी को नहीं पता कि उस चादर में कोई रकम इकट्ठा हुई थी, या नहीं हुई थी - और यदि हुई थी, तो उसका हुआ क्या ? लेकिन वह घटना लोगों को याद रह गई । उस घटना का संदर्भ लेकर ही, ठीक उसी तर्ज पर डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोग मधु सिंह के लिए भी चंदा इकट्ठा करने हेतु चादर बिछाने/बिछवाने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट में सुना जा रहा है कि सदस्यों से मल्टीपल ड्यूज ले लेने के बाद भी मधु सिंह इकट्ठा हुई रकम को मल्टीपल में जमा नहीं करवा रही हैं, उससे लगता है कि उक्त रकम उन्होंने अपने घर-खर्च में इस्तेमाल कर ली है । लोगों का कहना है कि अब जब उनके गवर्नर-काल को पूरा होने में मुश्किल से पाँच-छह दिन बचे हैं, और उन्होंने अभी भी मल्टीपल ड्यूज जमा नहीं करवाए हैं, उससे लगता है कि उनकी कोई आर्थिक मजबूरी होगी - इसलिए उनसे कहने की बजाये, चादर बिछवा कर चंदे के जरिये उक्त रकम इकट्ठा कर लेंगे और डिस्ट्रिक्ट को बदनामी से बचा लेंगे । उल्लेखनीय है कि तरह तरह की बहानेबाजी करके मल्टीपल ड्यूज जमा करवाने से बचने की मधु सिंह की कोशिशों को पहले उनकी राजनीतिक चाल के रूप में देखा/समझा गया था । समझा जा रहा था कि मल्टीपल कन्वेंशन से पहले वह इसलिए मल्टीपल ड्यूज नहीं जमा करवा रही हैं, ताकि उनके डिस्ट्रिक्ट के सदस्यों को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के चुनाव में वोट देने का अधिकार न मिले, और उम्मीदवार के रूप में जितेंद्र चौहान को झटका लगे । जितेंद्र चौहान लेकिन उनसे ज्यादा चतुर निकले, और लायंस इंटरनेशनल के नियम का सहारा लेकर डिस्ट्रिक्ट के सदस्यों के वोटिंग अधिकार ले आए और भारी मतों से विजयी हुए । माना/समझा गया था कि मधु सिंह उसके बाद मल्टीपल ड्यूज जमा करा देंगी, लेकिन मल्टीपल कन्वेशन हुए तीन सप्ताह का समय बीत चुका है - और मधु सिंह ने वह अभी तक जमा नहीं करवाए हैं, और उसके चलते डिस्ट्रिक्ट की बदनामी हो रही है । इसीलिए डिस्ट्रिक्ट में लोगों को कहने का मौका मिला है कि सदस्यों से इकट्ठा हुई मल्टीपल ड्यूज की रकम लगता है कि मधु सिंह ने अपने घर-खर्च में इस्तेमाल कर ली है, इसलिए ड्यूज जमा न करने को लेकर डिस्ट्रिक्ट को बदनामी से बचाने के लिए लोगों के सामने चादर बिछानी/बिछवानी ही पड़ेगी । 
मजे की बात लेकिन यह है कि तरह तरह की बहानेबाजी से मल्टीपल ड्यूज जमा करने/करवाने से बचती/छिपती, और इस तरह से डिस्ट्रिक्ट की बदनामी करवा रहीं मधु सिंह ने निवर्त्तमान मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पारस अग्रवाल के हिसाब-किताब को लेकर मोर्चा खोला हुआ है, और तरह तरह के सवालों के जरिये वह पारस अग्रवाल को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं - और इस काम में उन्हें लगातार कुछेक बड़े नेताओं का सहयोग व समर्थन भी मिल रहा है । उनके अधिकतर सवाल 'बाल की खाल निकालने' वाली प्रवृत्ति के हैं, और सभी का मानना है कि इस प्रवृत्ति के आधार पर हिसाब-किताब यदि देखे गए तो क्लब से लेकर इंटरनेशनल तक के सभी पदाधिकारी 'अपराधी' साबित होंगे । मधु सिंह के सवालों से आभास होता है कि वह पदाधिकारी के रूप में पारस अग्रवाल से उच्च नैतिक आदर्शों की उम्मीद करती हैं । इसमें ऐतराज की कोई बात नहीं है । हर पदाधिकारी से ... हर पदाधिकारी से उच्च नैतिक आदर्शों की उम्मीद की ही जानी चाहिए - लेकिन यहाँ मजेदार सीन यह देखने को मिल रहा है कि उच्च नैतिक आदर्शों की ऐसीतैसी कर रहीं मधु सिंह दूसरे पदाधिकारी से इसकी उम्मीद कर रही हैं । एक 'पापी' दूसरे 'पापी' से पूछ रहा है कि तू पापी क्यों है ? इस मामले में मधु सिंह का सहयोग व समर्थन करने वाले बड़े नेताओं का रवैया और भी शर्मनाक है - उनके मुँह से एक बार भी नहीं फूटा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मधु सिंह को समय से मल्टीपल ड्यूज जमा करवाने चाहिएँ । जाहिर है कि मधु सिंह की सारी 'सक्रियता' निजी खुन्नस से संचालित है । डिस्ट्रिक्ट की राजनीति और व्यवस्था में मधु सिंह को चूँकि पारस अग्रवाल व जितेंद्र चौहान की जोड़ी से मात पर मात मिलती रही है, इसलिए उससे पैदा हुए फ्रस्ट्रेशन को निकालने के लिए उन्होंने पारस अग्रवाल के हिसाब-किताब को मुद्दा बना लिया है । दिलचस्प बात यह है कि मधु सिंह के और पारस अग्रवाल के नजदीकियों की तरफ से एक जैसा ही तर्क सुनने को मिल रहा है, दोनों ही तरफ के लोगों का मानना और कहना है कि दोनों के ही द्वारा बेईमानी करने के सुबूत अभी तक सामने नहीं आए हैं; जो तथ्य सामने हैं उनके आधार पर यही कहा जा सकता है कि दोनों ने ही प्रक्रियागत गलतियाँ की हैं । मधु सिंह यदि समय पर मल्टीपल ड्यूज जमा कर देतीं, और पारस अग्रवाल यदि समय पर अकाउंट दे देते - तो दोनों को ही सवालों और आरोपों का सामना न करना पड़ता । अपनी कमी और गलती को छिपा कर, पारस अग्रवाल को निशाने पर लेकर मधु सिंह ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट से लेकर मल्टीपल तक में  अपना मजाक बनवा लिया है । चादर वाले किस्से से लगता है कि उन्हें लेकर अभी और तमाशे देखने को मिलेंगे ।

Tuesday, June 23, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में मल्टीपल के नियम-कानूनों का खुल्लमखुल्ला मजाक बनाने वाले डिस्ट्रिक्ट 321 डी के गवर्नर गुरमीत सिंह मक्कड़ के मल्टीपल का वाइस चेयरमैन बनने में संस्था की पहचान व साख के खराब होने का कारण देखा/बताया जा रहा है

गाजियाबाद । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अगले लायन वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट 321 डी के गवर्नर गुरमीत सिंह मक्कड़ यदि सचमुच वाइस चेयरमैन बने, जैसी कि चर्चा है - तो यह मल्टीपल के इतिहास की अनोखी विरोधाभासी घटना होगी, जिसमें कि एक ऐसा गवर्नर मल्टीपल पदाधिकारी बनेगा, जिसने गवर्नर के रूप में मल्टीपल के नियमों का मजाक बनाने का काम किया है । इसे दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है कि जिन गुरमीत सिंह मक्कड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की चुनावी प्रक्रिया में अभी करीब डेढ़/दो महीने पहले ही मल्टीपल के नियम-कानून को ठेंगा दिखाया था, वह मल्टीपल के पदाधिकारी बनेंगे । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 321 डी में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए ऐन मौके पर अचानक से प्रस्तुत हुई बलराज कुमार की उम्मीदवारी को लेकर शिकायत थी, कि नियमानुसार वह उम्मीदवार होने की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं और इसलिए उनके नामांकन को रद्द किया जाना चाहिए । इस मामले में डिस्ट्रिक्ट में सुनवाई न होती देख शिकायतकर्ताओं ने मल्टीपल के पदाधिकारियों तक भी शिकायत पहुँचाई, जहाँ उनकी शिकायत को सही माना/पाया गया ।
मल्टीपल की कॉन्स्टीट्यूशन एंड बॉयलॉज कमेटी के चेयरमैन एमआर शर्मा ने रिकॉर्ड्स देख कर साफ शब्दों में कहा कि मल्टीपल व इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार, बलराज कुमार की उम्मीदवारी नहीं बनती है, और यदि उनकी उम्मीदवारी के लिए नामांकन हुआ है तो उसे तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में गुरमीत सिंह मक्कड़ ने लेकिन इतने साफ शब्दों में दिए गए फैसले को रद्दी की टोकरी के हवाले किया और बलराज कुमार की उम्मीदवारी को बना रहने दिया । गुरमीत सिंह मक्कड़ के इस रवैये को रेखांकित करते हुए ही सवाल उठ रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जिस व्यक्ति ने मल्टीपल के फैसले का सम्मान करने/रखने की कोई जरूरत नहीं समझी, उसे मल्टीपल का पदाधिकारी क्यों बनाया जाना चाहिए ? गुरमीत सिंह मक्कड़ के खिलाफ पैसों के गड़बड़ी तथा लूट-खसोट के भी कई गंभीर आरोप हैं । चुनावी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए ऑनलाइन हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में रजिस्ट्रेशन के नाम पर प्रति प्रतिनिधि 1250 रुपए बसूलने की उनकी कार्रवाई को 'अपनी जेब भरने' की कार्रवाई के रूप में देखा/पहचाना गया है । ड्यूज के नाम पर अन्य गड़बड़झाले करने को लेकर भी गुरमीत सिंह मक्कड़ के खिलाफ गंभीर आरोप हैं ।
गुरमीत सिंह मक्कड़ के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 डी के कई पूर्व गवर्नर्स के साथ-साथ मल्टीपल के अन्य डिस्ट्रिक्ट्स के भी कई लोगों का मानना और कहना है कि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों का चयन/चुनाव करने वाले वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों को कम से कम इतना ध्यान तो रखना ही चाहिए कि लायनिज्म के नाम पर पैसे बनाने तथा नियम-कानूनों की खुली अवहेलना करने वाले लोगों को न चुने - क्योंकि इससे अंततः संस्था की पहचान और साख ही खराब होती है । मजे की बात यह है कि गुरमीत सिंह मक्कड़ का मल्टीपल काउंसिल में वाइस चेयरमैन बनना अभी हाल ही में तब तय हुआ, जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के लिए गुरमीत सिंह मक्कड़ ने जितेंद्र चौहान को वोट दिलाने की जिम्मेदारी ली । उससे पहले मल्टीपल के वाइस चेयरमैन पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनोज रुहेला का नाम चल रहा था । लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के चुनाव में जितेंद्र चौहान के लिए ज्यादा फायदेमंद होकर गुरमीत सिंह मक्कड़ ने मल्टीपल काउंसिल के वाइस चेयरमैन का पद मनोज रुहेला से छीन लिया । गुरमीत सिंह मक्कड़ शायद पहले गवर्नर होंगे, जो मल्टीपल के नियम-कानूनों की सीधे-सीधे ऐसीतैसी करने के बावजूद, मल्टीपल के पदाधिकारी बनेंगे !

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में बड़ी और एकतरफा जीत पाने वाले सुधीर मंगला ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल के दिशा-निर्देशन में, अमित जैन को नहीं - वास्तव में, उनकी उम्मीदवारी का नामांकन वापस करवाने की कोशिश करने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन तथा अन्य पूर्व गवर्नर्स नेताओं को हराया है

नई दिल्ली । सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में अमित जैन के मुकाबले सुधीर मंगला का पलड़ा भारी तो पहले दिन से ही माना/पहचाना जा रहा था, लेकिन किसी को भी - खुद सुधीर मंगला और उनके समर्थकों को भी - सुधीर मंगला की इतनी बड़ी और एकतरफा जीत की उम्मीद नहीं थी । कुल 156 वोटों में से 119 वोट प्राप्त करके सुधीर मंगला ने जो छप्परफाड़ जीत हासिल की है, वह इसलिए और भी बड़ी जीत है - क्योंकि अमित जैन की उम्मीदवारी के पक्ष में गवर्नर्स की खासी बड़ी फौज समर्थन जुटाने के अभियान में लगी हुई थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए तैयारी कर रहे पूर्व गवर्नर विनोद बंसल ने अमित जैन की उम्मीदवारी की कमान संभाली हुई थी, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए विनोद बंसल के उम्मीदवार के उम्मीदवार के रूप में तैयारी कर रहे निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया ने अमित जैन को वोट दिलवाने का जिम्मा लिया हुआ था - और उन्हें रवि चौधरी सहित कुछेक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स के साथ-साथ मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव राय मेहरा का सक्रिय समर्थन मिला हुआ था; इतने सारे नेता मिलकर अमित जैन को लेकिन कुल 37 वोट ही दिलवा सके । इस चुनाव में सबसे शर्मनाक भूमिका डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन की देखी/सुनी गई । नामांकन वापसी के समय तक सुरेश भसीन ने सुधीर मंगला पर यह कहते हुए नाम वापस लेने के लिए खासा दबाव बनाया कि उनके जीतने की तो कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए पराजय की शर्मिंदगी से बचने के लिए अच्छा होगा कि वह अपनी उम्मीदवारी छोड़ दें ।
सुधीर मंगला लेकिन सुरेश भसीन के किसी दबाव में नहीं आए । सुधीर मंगला को कुछेक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स का समर्थन था तो, लेकिन उनके समर्थन में कोई पूर्व गवर्नर सक्रिय नहीं दिख रहा था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल को जरूर उनके समर्थन में सक्रिय सुना जा रहा था । लेकिन अपने पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए वह भी पर्दे के पीछे रहते हुए ही काम करते सुने जा रहे थे ।डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों को हालाँकि लगता है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की कमान अनूप मित्तल के हाथ में ही थी, और उन्होंने बड़ी होशियारी से सुधीर मंगला के लिए वोट जुटाने का काम किया । सीओएल प्रतिनिधि के चुनावी परिदृश्य में मजे की बात यह थी कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच - खासकर प्रेसीडेंट्स के बीच सुधीर मंगला की पहचान और सक्रियता ज्यादा थी, जबकि बड़े नेताओं और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के समर्थन के रूप में 'शोर' अमित जैन का ज्यादा था । ऐसे में अनूप मित्तल और सुधीर मंगला की जोड़ी ने चुपचाप तरीके से काम करने पर ध्यान केंद्रित किया और अपने संपर्कों व समर्थकों से व्यावहारिक काम लिया । अनूप मित्तल ने अपने खेमे के पूर्व गवर्नर्स की गरिमा को बनाये/बचाये रखते हुए उनके समर्थन तथा उनके संपर्कों का फायदा सुधीर मंगला को दिलवाया और साथ-साथ 'कमजोर जगहों' की पहचान करते हुए उन्हें मजबूती देने का काम सुधीर मंगला से करवाया । सुधीर मंगला की इस बड़ी और एकतरफा चुनावी जीत के पीछे अनूप मित्तल की सुनियोजित रणनीति को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार माना/समझा जा रहा है ।
दरअसल अनूप मित्तल और सुधीर मंगला की जोड़ी ने पहले ही भाँप लिया था कि अमित जैन को चूँकि सक्रिय गवर्नर्स का समर्थन है, इसलिए 'शोर' उनका ही ज्यादा बनेगा/रहेगा । ऐसे में, अनूप मित्तल और सुधीर मंगला ने 'शोर' की पिच पर खेलने की बजाये एक अलग रणनीति बनाई और चुपचाप काम करने पर जोर दिया - जिसके तहत अनूप मित्तल ने पर्दे के पीछे से मोर्चा संभाला और सुधीर मंगला मैदान में डटे । इन्होंने बड़ी होशियारी से संपर्क, सक्रियता और पहचान के मामले में अमित जैन की कमजोरी को मुद्दा बनाया - अमित जैन के समर्थक नेता इस मुद्दे पर असहाय नजर आये । उन्हें लोगों की इस शिकायत का कोई जबाव ही नहीं सूझा कि अमित जैन तो डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की गतिविधियों में कहीं नजर ही नहीं आते हैं, और कई प्रेसीडेंट्स तो अमित जैन को पहचानते भी नहीं हैं । अमित जैन और सुधीर मंगला के बायोडेटाज को देखने/पढ़ने वाले लोगों ने भी देखा/पाया और जाना/समझा कि अमित जैन के मुकाबले सुधीर मंगला की डिस्ट्रिक्ट और रोटरी में कहीं ज्यादा सक्रियता है, और सुधीर मंगला डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ जोन व इंटरनेशनल स्तर के आयोजनों में भी लगातार शामिल होते रहे हैं । अमित जैन के समर्थक नेता इस सच्चाई के सामने निरुत्तर ही रहे और सिर्फ इस बात की कोशिश करते रहे कि लोग उनके कहने से अमित जैन को वोट दे दें । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट तथा पूर्व गवर्नर्स नेताओं की भारी-भरकम फौज अपने कहने पर लेकिन अमित जैन को कुल 37 वोट ही दिलवा सकी । इसी आधार पर डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोगों का मानना और कहना है कि सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में सुधीर मंगला ने अमित जैन को नहीं - वास्तव में, उनकी उम्मीदवारी का नामांकन वापस करवाने की कोशिश करने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन तथा अन्य पूर्व गवर्नर्स नेताओं को हराया है ।

Sunday, June 21, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अगले वाइस चेयरमैन पद को लेकर नेताओं के बीच बने असमंजस में मनोज रुहेला की जगह गुरमीत सिंह मक्कड़ का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आ रहा है

लखनऊ । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अगले लायन वर्ष के वाइस चेयरमैन पद पर डिस्ट्रिक्ट 321 डी के गवर्नर गुरमीत सिंह मक्कड़ की ताजपोशी होने की चर्चाओं से डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के गवर्नर मनोज रुहेला के नजदीकियों और समर्थकों को तगड़ा झटका लगा है । यह झटका इसलिए लगा है, क्योंकि अभी तक अगले वाइस चेयरमैन के रूप में मनोज रुहेला के नाम की चर्चा सुनी जा रही थी । समझा जा रहा था कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में जितेंद्र चौहान के नाम को एंडोर्स करवाने के लिए मनोज रुहेला इसीलिए जोरशोर से लगे हुए थे । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के लिए जितेंद्र चौहान के पक्ष में बिछाई गई चौसर की तैयारी मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के भावी पदाधिकारियों के चयन/चुनाव से ही शुरू हुई थी । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जितेंद्र चौहान की चुनावी व्यूह रचना में डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन को थोड़ा 'टफ' समझा जा रहा था, क्योंकि इस डिस्ट्रिक्ट के दो बड़े नेताओं में एक गुरनाम सिंह को विनोद खन्ना के साथ नजदीकी के चलते दीपक तलवार के तथा दूसरे नेता केएस लूथरा को तेजपाल खिल्लन के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । ऐसे में, जितेंद्र चौहान की तरफ से इस डिस्ट्रिक्ट में पकड़ बनाने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनोज रुहेला को 'साधा' गया । समझा जाता है कि साधने की इसी प्रक्रिया के तहत मनोज रुहेला को अगले वाइस चेयरमैन का पद ऑफर हुआ होगा ।
मनोज रुहेला और उनके नजदीकियों व समर्थकों ने जितेंद्र चौहान के लिए कस कर काम किया, और इस चक्कर में मनोज रुहेला को 'गड़बड़ी करते सुने गए' गुरनाम सिंह से भी भिड़ना पड़ा था । जितेंद्र चौहान की बंपर जीत में मनोज रुहेला की भूमिका को उल्लेखनीय माना/पहचाना गया था । दरअसल इसीलिए, मनोज रुहेला के नजदीकियों और समर्थकों को अब जब यह सुनने को मिल रहा है कि वह अगली मल्टीपल काउंसिल में वाइस चेयरमैन नहीं बन रहे हैं, तो उन्हें झटका लगा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट को लेकर मची आपाधापी में व्यस्त रहने के चलते दरअसल मल्टीपल काउंसिल की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं को भी इसका पता नहीं चल पाया कि वाइस चेयरमैन पद के लिए कब मनोज रुहेला की जगह गुरमीत सिंह मक्कड़ का नाम आ गया । इस बारे में, नेताओं ने भावी चेयरमैन क्षितिज शर्मा और भावी सेक्रेटरी राजीव अग्रवाल से टोह लेने की भी कोशिश की, लेकिन इन दोनों ने मामले से अनभिज्ञता जाहिर करते हुए अपने मुँह बंद ही रखे । इन दोनों के इस रवैये से नेताओं को यह अहसास तो हुआ ही है कि 'खेल' ऊपर के लेबल पर हुआ है, जिसकी जानकारी खेल से जुड़े दूसरे खिलाड़ियों को या तो सचमुच है नहीं, या वह अपना मुँह बंद रखने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं ।
जितनी जो जानकारी मिली है, उसे जोड़कर देखने से अनुमान लगाया जा रहा है कि यह खेल इंटरेनशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट के लिए हुई वोटिंग से आठ/दस दिन पहले के दिनों का है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट 321 डी के पूर्व गवर्नर और पूर्व मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन एसएल कपूर को दीपक तलवार के समर्थन में अचानक से सक्रिय हुआ देख कर जितेंद्र चौहान और उनके नजदीकियों का माथा ठनका था । एसएल कपूर को चूँकि पूर्व प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के खास नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है, इसलिए एसएल कपूर की सक्रियता के पीछे नरेश अग्रवाल की किसी 'योजना' की आशंका का डर बना । इस डर से निपटने के लिए जितेंद्र चौहान की तरफ से डिस्ट्रिक्ट 321 डी के गवर्नर गुरमीत सिंह मक्कड़ की मदद ली गई । समझा जाता है कि उसी मदद के चक्कर में अगली मल्टीपल काउंसिल में वाइस चेयरमैन के पद से मनोज रुहेला की छुट्टी होने का मौका बन गया था । मनोज रुहेला के कुछेक नजदीकियों और समर्थकों को हालाँकि अभी भी उम्मीद है कि अगली मल्टीपल काउंसिल में वाइस चेयरमैन मनोज रुहेला ही बनेंगे, लेकिन मल्टीपल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच जोरदार चर्चा गुरमीत सिंह मक्कड़ के वाइस चेयरमैन बनने की ही है । 

Friday, June 19, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई अजय सिन्हा की उम्मीदवारी को अगले दो/तीन वर्षों में संभावित राकेश छारिया की उम्मीदवारी का रास्ता रोकने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; तथा इस कारण कोई भी अजय सिन्हा की उम्मीदवारी को गंभीरता से लेता नहीं दिख रहा है 

गाजियाबाद । अजय सिन्हा की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में सक्रियता दिखाने के कारण उनके अपने क्लब - रोटरी क्लब साहिबाबाद - के कई सदस्य हैरान हुए हैं । उनका कहना है कि क्लब में निवर्त्तमान प्रेसीडेंट राकेश छारिया को अगले दो/तीन वर्ष में उम्मीदवार बनाने की बात चल रही है, हालाँकि राकेश छारिया उम्मीदवार बनने से इंकार कर रहे हैं - लेकिन क्लब के सदस्यों को उम्मीद है कि वह राकेश छारिया को उम्मीदवारी के लिए राजी कर लेंगे । क्लब के सदस्यों का कहना है कि इसीलिए उन्हें हैरानी है कि अजय सिन्हा अपनी उम्मीदवारी को बीच में कहाँ ले आए हैं ? क्लब के कुछेक सदस्यों का तो यहाँ तक कहना है कि अजय सिन्हा दरअसल राकेश छारिया की उम्मीदवारी की संभावना को रोकने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करने लगे हैं; उन्हें डर है कि लोगों के दबाव के चलते कहीं राकेश छारिया ने अपना मन बदल लिया और उम्मीदवार बनने के लिए राजी हो गए - तो उनके लिए तो रास्ता बंद ही हो जायेगा । मजे की बात यह है कि अजय सिन्हा पिछले वर्षों में दो/तीन बार अपनी उम्मीदवारी को लेकर उत्सुकता दिखा चुके हैं - लेकिन वास्तव में वह उम्मीदवार कभी नहीं बने । किन्हीं किन्हीं मौकों पर उनकी तरफ से सुना गया कि उम्मीदवार की सक्रियता को वह समय और पैसे की बर्बादी समझते/मानते हैं, इसलिए ही इच्छा रखने के बावजूद वह उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की हिम्मत नहीं कर सके । वास्तव में, इसीलिए क्लब के सदस्यों ने उम्मीद छोड़ दी थी कि अजय सिन्हा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी पचड़े में कभी पड़ेंगे - और इसी कारण से अजय सिन्हा के उम्मीदवार के रूप में 'टेलीफोनिक सक्रियता' दिखाने पर क्लब के सदस्यों को हैरानी है ।
अजय सिन्हा की उम्मीदवारी ने उनके नजदीकियों को भी आश्चर्य में डाला है । नजदीकियों के अनुसार, अजय सिन्हा की अपने प्रोफेशन में जैसी सक्रियता है, उसके चलते उनके पास रोटरी की चुनावी प्रक्रिया के लिए समय निकाल पाना संभव ही नहीं है । रोटरी में काम करना एक अलग बात है, लेकिन एक उम्मीदवार से होने वाली अपेक्षाओं को पूरा कर पाना उनके लिए बहुत ही मुश्किल है । नजदीकियों का कहना है कि असल में उन मुश्किलों का ख्याल करके ही अजय सिन्हा पिछले वर्षों में उम्मीदवार बनने की ओर बढ़ते कदमों को फिर वापस पीछे खींचते रहे हैं । इस बात को जानते/पहचानते रहे नजदीकियों को इसीलिए आश्चर्य है कि इस बार आखिर अजय सिन्हा ने उम्मीदवार बनने का फैसला क्या सोच कर, कर लिया है ? कई लोगों को लग रहा है कि अजय सिन्हा ने शायद यह सोचा होगा कि कोरोना के प्रकोप के चलते बने हालात में चूँकि मिलने/जुलने तथा इकट्ठा होने की स्थितियाँ नहीं बनेंगी, इसलिए इस बार उम्मीदवार को लोगों की अपेक्षाओं का ज्यादा सामना नहीं करना पड़ेगा - और इस कारण से इस बार चुनाव लड़ना आसान होगा और पैसा भी खर्च नहीं होगा, इसलिए वह चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं । 
अजय सिन्हा के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि एक तरफ तो उनकी उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है, और दूसरी तरफ उनके अपने क्लब के सदस्य उनकी उम्मीदवारी को राकेश छारिया की उम्मीदवारी का रास्ता रोकने की कोशिश के रूप में देख और प्रचारित कर रहे हैं । पिछले रोटरी वर्ष में, प्रेसीडेंट के रूप में राकेश छारिया के कामों की चूँकि व्यापक तारीफ हुई है और उन्हें कई अवॉर्ड मिले हैं - इसलिए उनके अपने क्लब में भी और डिस्ट्रिक्ट के दूसरे क्लब्स के लोगों के बीच भी चर्चा चली है कि अगले दो/तीन वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राकेश छारिया को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए तैयार करना चाहिए । अजय सिन्हा के उम्मीदवार बन जाने से लेकिन राकेश छारिया को उम्मीदवार बनने/बनाने की तैयारी करने वाले लोगों को झटका लगा है । लोगों का कहना है कि अजय सिन्हा की कोशिश दरअसल यह है कि आने वाले वर्षों में उनके क्लब से कोई और उम्मीदवार न बन सके । लोगों का कहना है कि अजय सिन्हा को यदि सचमुच उम्मीदवार बनना होता, तो पिछले वर्षों में वह बन गए होते; वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर यदि  इस बार भी गंभीर होते, तो पहले से उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने का काम शुरू करते - लेकिन उन्होंने अब जब देखा कि कोरोना के प्रकोप के चलते हालात जल्दी सुधरने वाले नहीं हैं, और ऐसे में उम्मीदवार के रूप में उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ेगा, तो वह उम्मीदवार बन गए हैं । लोगों के बीच इस तरह की 'सोच' होने के कारण कोई भी अजय सिन्हा की उम्मीदवारी को गंभीरता से लेता नहीं दिख रहा है, और अचानक से अपनी उम्मीदवारी को लेकर बनी अजय सिन्हा की सक्रियता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य में कोई हलचल पैदा करती हुई नहीं लग रही है । 

Thursday, June 18, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अगले चुनाव के संदर्भ में अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर तैयारियाँ शुरू होती 'दिखने' के बावजूद, वेद जैन खेमे में अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर बने संशय के पीछे डर आखिर क्या है ?

नई दिल्ली । अंकित जैन की सक्रियता के अचानक बढ़ने से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा एक बार फिर गर्म हो उठी है कि इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन ने अपने बेटे को सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उतारने की तैयारी शुरू कर दी है । इस चर्चा ने सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी की संभावना को लेकर होने वाली चर्चाओं को तगड़ा झटका दिया है - और उनके बीच यह सवाल खासा महत्त्वपूर्ण हो उठा है कि वेद जैन यदि अपने बेटे को उम्मीदवार बनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब फिर सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी का क्या होगा ? इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने की भले ही उम्मीद हो, लेकिन खुद सुधीर अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा नहीं की है - बल्कि जब जब भी किसी ने सुधीर अग्रवाल से उम्मीदवारी को लेकर सवाल किया है, तो उसे सुधीर अग्रवाल की तरफ से इंकार ही सुनने को मिला है । मजे की बात यह है कि सुधीर अग्रवाल भले ही अपनी उम्मीदवारी की बात से इंकार कर रहे हों, लेकिन लोगों को पक्का यकीन है कि सुधीर अग्रवाल अवश्य ही उम्मीदवार होंगे । संजय अग्रवाल का उदाहरण देते हुए लोगों का कहना है कि जैसे संजय अग्रवाल इंकार करते करते उम्मीदवारी की घोषणा कर बैठे हैं, वैसे ही अभी इंकार कर रहे सुधीर अग्रवाल भी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर देंगे । ऐसा सोचने, मानने और कहने वाले लोगों को लेकिन अंकित जैन की उम्मीदवार बनने की तैयारी देख कर झटका लगा है - वह सुधीर अग्रवाल के इंकार को लेकर थोड़ा गंभीर हुए हैं । दरअसल सुधीर अग्रवाल और वेद जैन की नजदीकियत को जानने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि सुधीर अग्रवाल और अंकित जैन में से कोई एक ही उम्मीदवार होगा ।
हालाँकि वेद जैन या अंकित जैन या सुधीर अग्रवाल की तरफ से अभी अंकित जैन की उम्मीदवारी की पुष्टि नहीं हुई है । उनकी तरफ से यही कहा/बताया जा रहा है कि अंकित जैन की जिस सक्रियता के आधार पर उनकी उम्मीदवारी का कयास लगाया जा रहा है, वह कोई बड़ा आधार नहीं है । वेद जैन ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सर्टीफिकेट ऑफ प्रैक्टिस को जब वापस कर दिया है, और वकील बन गए हैं तो उनकी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्म के काम अंकित जैन के नाम से ही होंगे - और इसमें कोई राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए । लोग लेकिन राजनीति 'देखने' से इसलिए बाज नहीं आ रहे हैं, क्योंकि लंबी-चौड़ी सफाई के बावजूद, वेद जैन के ऑफिस की तरफ से अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर दो-टूक तरीके से बात नहीं की जा रही है । बातों की जलेबी सी बना कर जो कहा जा रहा है, उससे यह साफ नहीं हो रहा है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत होगी या नहीं । वेद जैन के एक नजदीकी ने इस संबंध में बड़ी मजेदार बात बताई कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर अभी घोषणा नहीं की जायेगी - क्योंकि उन्हें डर है कि घोषणा होते ही काम करवाने तथा नौकरी चाहने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की लाइन लग जायेगी; और जिसके काम नहीं होंगे, वह नाराज हो जायेगा और नकारात्मक प्रचार करेगा; इसलिए अंकित जैन की उम्मीदवारी की घोषणा चुनाव से छह/सात महीने पहले ही की जाएगी । अब वेद जैन को हक है कि वह अंकित जैन की उम्मीदवारी की घोषणा कब करें, ठीक इसी तरह दूसरों को भी हक है कि अंकित जैन की सक्रियता को देखते हुए वह अंकित जैन की उम्मीदवारी के बारे में कयास लगाएँ ।
वेद जैन के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना/बताना है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को लेकर तैयारी तो शुरू हो गई है, लेकिन अंतिम रूप से फैसला तैयारियों का जायेजा लेने के बाद ही किया जायेगा । ऐसे में, लोगों के बीच सवाल यह भी है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी की तैयारियों को यदि अनुकूल नहीं पाया गया, और उसके चलते अंकित जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं हुई - तो क्या अगले चुनाव में वेद जैन खेमे की तरफ से कोई उम्मीदवार नहीं होगा; क्योंकि सुधीर अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी की संभावना से इंकार कर चुके हैं । सुधीर अग्रवाल के समर्थकों का कहना हालाँकि यह है कि अंकित जैन की उम्मीदवारी को हरी झंडी न मिलने की स्थिति में उन्हें उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी कर लिया जायेगा । सुधीर अग्रवाल के नजदीकियों का लेकिन दावा है कि उम्मीदवारी को लेकर सुधीर अग्रवाल में दरअसल जोश या उत्साह बचा नहीं दिख रहा है, इसलिए राजी करने की समर्थकों की कोशिशों का कोई नतीजा निकलेगा - इसमें शक है । साथ ही साथ उनका कहना हालाँकि यह भी है कि राजनीति में कब कौन क्या फैसला कर बैठे - यह कहना बड़ा मुश्किल है । एक बात लेकिन हर कोई बहुत साफगोई से कह रहा है कि वेद जैन खेमे ने अपने उम्मीदवार की घोषणा करने में यदि ज्यादा समय लिया और देर की, तो चुनावी नतीजे पर उसका प्रतिकूल प्रभाव अवश्य ही पड़ेगा ।

Tuesday, June 16, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में हुए चुनाव के खिलाफ पिटीशन दायर करने के बाद जगदीश अग्रवाल द्वारा फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर बहाली के लिए पूर्व गवर्नर्स की तरफ से ज्ञापन भिजवाने को लेकर शुरू किया गया तमाशा, विशाल सिन्हा की ठगी का कोई नया जुगाड़ है क्या ?

लखनऊ । नेगेटिव वोट के चलते फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न चुने जा सके जगदीश अग्रवाल के लिए विडंबना यह बनी है कि जिन विशाल सिन्हा को उनकी 'दुर्गति' के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जगदीश अग्रवाल ने उन्हीं विशाल सिन्हा को अपनी स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी सौंप दी है । विशाल सिन्हा ने मौके का फायदा उठाते हुए जगदीश अग्रवाल को बरगलाना शुरू कर दिया है, जिसे देख कर डिस्ट्रिक्ट में लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि जगदीश अग्रवाल एक बार फिर विशाल सिन्हा से ठगे जायेंगे - और पायेंगे कुछ नहीं । विशाल सिन्हा ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की तरफ से लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को संबोधित एक ज्ञापन भिजवाये जाने की तैयारी करने का एक नया तमाशा शुरू किया है, जिसमें जगदीश अग्रवाल को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनाने' का अनुरोध किया जायेगा । विशाल सिन्हा ने जगदीश अग्रवाल को आश्वस्त किया है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की तरफ से जैसे ही यह ज्ञापन लायंस इंटरनेशनल कार्यालय पहुँचेगा, कार्यालय के पदाधिकारी तुरंत से जगदीश अग्रवाल को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित कर देंगे । विशाल सिन्हा ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि वरिष्ठ पूर्व गवर्नर गुरनाम सिंह, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनोज रुहेला तथा अन्य दो-चार पूर्व गवर्नर्स से उक्त ज्ञापन पर वह हस्ताक्षर करवा देंगे । विशाल सिन्हा के झाँसे में आकर बेचारे जगदीश अग्रवाल ने पूर्व गवर्नर्स से मिलना/जुलना शुरू कर दिया है, ताकि इंटरनेशनल कार्यालय भेजे जाने वाले ज्ञापन पर उनके हस्ताक्षर लिए जा सकें । कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने लेकिन इस बात को 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' के रूप में देखा/समझा है । उनका कहना है कि पूर्व गवर्नर्स के कहने से फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनाने का लायंस इंटरनेशनल में कोई प्रावधान नहीं है; और ऐसा बता/समझा कर विशाल सिन्हा वास्तव में जगदीश अग्रवाल को ठगने की ही तैयारी कर रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि जगदीश अग्रवाल ने अपनी चुनावी पराजय को लेकर लायंस इंटरनेशनल में पिटीशन भी डाला हुआ है, और चुनावी प्रक्रिया पर आरोप लगाते हुए चुनाव में बेईमानी होने की शिकायत की हुई है । उस पिटीशन के पीछे भी विशाल सिन्हा की सलाह को ही देखा/पहचाना जा रहा है । पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि जगदीश अग्रवाल ने जब पिटीशन डाली हुई है, तब उन्हें लायंस इंटरनेशनल के फैसले का इंतजार करना चाहिए - और उस फैसले का सम्मान करने के लिए तैयार रहना चाहिए । पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि उन्हें हैरानी है कि पिटीशन करने के बाद - फैसले का इंतजार करने की बजाये, जगदीश अग्रवाल ने पूर्व गवर्नर्स की तरफ से ज्ञापन भिजवाने का यह तमाशा क्यों शुरू कर दिया है ? जगदीश अग्रवाल की तरफ से ही लोगों को पता चला है कि पिटीशन और इस नए तमाशे के पीछे विशाल सिन्हा ही हैं । दरअसल विशाल सिन्हा को पता है कि जगदीश अग्रवाल की पिटीशन में कोई दम नहीं है, और उसे रिजेक्ट ही होना है - इसलिए पिटीशन पर होने वाले फैसले का इंतजार करने की बजाये विशाल सिन्हा ने जगदीश अग्रवाल को पूर्व गवर्नर्स से मिलने और उन्हें ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी करने के काम में लगा दिया है । इसके चलते, जगदीश अग्रवाल को उन पूर्व गवर्नर्स से भी मिलना पड़ रहा है, जो उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नहीं थे - और इस कारण सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जगदीश अग्रवाल ने उनसे मिलना तो दूर, उनसे बात करना भी जरूरी नहीं समझा था । ऐसे में, अब जरूरत पड़ने पर जगदीश अग्रवाल के मिलने से वह पूर्व गवर्नर्स फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर जगदीश अग्रवाल को बहाल करने की मांग वाले ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे - इसमें संदेह है । इसलिए यह तमाशा भी फ्लॉप होना निश्चित ही है ।
जगदीश अग्रवाल को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर बहाल करने की मांग वाले ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से कई पूर्व गवर्नर्स इसलिए भी बचना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनके हस्ताक्षर कर देने के बाद जगदीश अग्रवाल और विशाल सिन्हा डिस्ट्रिक्ट में प्रचारित करेंगे कि उन्होंने पैसे लेकर हस्ताक्षर किए हैं । दरअसल जगदीश अग्रवाल और विशाल सिन्हा ने इसी तरह की हरकत से डिस्ट्रिक्ट में आम और खास लोगों को अपने खिलाफ कर लिया है, जिसके नतीजे में जगदीश अग्रवाल के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग हुई और जगदीश अग्रवाल फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नहीं बन सके । लोगों के आरोप तो यहाँ तक हैं कि विशाल सिन्हा ने कई लोगों के नाम पर जगदीश अग्रवाल से पैसे ले लिए, और लोगों को सिर्फ बदनामी मिली । इसलिए ही, जगदीश अग्रवाल के नजदीकियों ने जगदीश अग्रवाल को बार-बार विशाल सिन्हा से सावधान रहने के लिए चेताया है - लेकिन जगदीश अग्रवाल की बदकिस्मती ऐसी है कि वह बेचारे विशाल सिन्हा के साथ ही जा फँसे हैं । विशाल सिन्हा ने जगदीश अग्रवाल को 'दिखाने' के लिए इन दिनों गुरनाम सिंह और मनोज रुहेला के चक्कर लगाने पर जोर दिया हुआ है, जिसके जरिये वह इन दोनों को जगदीश अग्रवाल के पक्ष में राजी कर लेने का भरोसा जगदीश अग्रवाल और उनके नजदीकियों को देने की कोशिश कर रहे हैं । दूसरों को लेकिन लग रहा है कि गुरनाम सिंह और मनोज रुहेला के चक्कर लगाने के जरिये विशाल सिन्हा वास्तव में जगदीश अग्रवाल का नहीं, बल्कि अपना 'काम' बनाने के जुगाड़ में लगे हुए हैं - जिसके चलते जगदीश अग्रवाल का ठगा जाना निश्चित ही है ।

Monday, June 15, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नीतिगत तथा प्रशासनिक फैसलों को कॉपी और पेस्ट करके, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी फर्म की वेबसाइट के जरिये पहुँचाने का काम करने के चलते सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रमोद जैन आरोपों में घिरे

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने' की सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रमोद जैन की लगातार की जा रही कार्रवाईयों को लेकर इंस्टीट्यूट में कई बार शिकायतें की गई हैं, लेकिन लगता है कि प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता सहित इंस्टीट्यूट के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की प्रमोद जैन को रोकने/टोकने की हिम्मत नहीं हो रही है - या प्रमोद जैन उनके रोकने/टोकने को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । प्रमोद जैन को जानने वाले लोगों को हैरानी इस बात की है कि प्रमोद जैन जैसा व्यक्ति ऐसी टुच्ची सी हरकत कर क्यों रहा है ? उन्हें जानने वाले लोगों का पूछने के अंदाज में कहना है कि प्रमोद जैन भले व्यक्ति हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में वह जेनुइन तरीके से काम करते हैं, उनके पास एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर है, उनके साथ काम करने वाले लोगों की अच्छी टीम है - उसके बावजूद वह इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने' का 'ठगी' किस्म का काम क्यों कर रहे हैं ? कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को शिकायत है कि इंस्टीट्यूट के नीतिगत संबंधी फैसलों की घोषणा को वह जिस तरह से अपनी फर्म के बैनर से प्रचारित करते हैं, वह नैतिक मापदंडों के अनुरूप नहीं है - और प्रमोद जैन जैसे जिम्मेदार व्यक्ति से इसकी उम्मीद नहीं की जाती है । प्रमोद जैन खुद इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य हैं - इस नाते तो उन्हें ऐसी हरकत बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तमाम शिकायतों और आरोपों के बाद भी प्रमोद जैन इंस्टीट्यूट के 'सामान' पर कब्जा करने का 'अपना काम' जारी रखे हुए हैं ।
इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने का प्रमोद जैन का खेल बड़ा आसान-सा है - इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक फैसलों के जो पीडीएफ प्रसारित होते हैं, प्रमोद जैन उन्हें कॉपी करके, अपनी फर्म की वेबसाइट पर पेस्ट कर लेते हैं - और फिर अपनी वेबसाइट की उक्त पोस्ट के लिंक सोशल मीडिया में शेयर करते हैं । ऐसा करके, प्रमोद जैन लोगों के बीच यह दिखाने/जताने का करतब करते हैं कि उक्त नीतिगत और या प्रशासनिक फैसला उनकी फर्म के सौजन्य से लोगों के सामने आ रहा है । इस तरह, इंस्टीट्यूट के 'सामान' को प्रमोद जैन पहले तो कॉपी और पेस्ट करके अपना बना लेते हैं, और फिर सोशल मीडिया के अपने प्लेटफॉर्म्स के जरिये लोगों के बीच उसे अपने 'सामान' के रूप में प्रस्तुत करते हैं -  यानि 'हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा चोखा।' कई मौकों पर वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने भी कहा कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए तो प्रमोद जैन का ऐसा करना शोभा नहीं देता है; उन्हें लोगों तक इंस्टीट्यूट के नीतिगत और प्रशासनिक फैसले पहुँचाने का काम करना ही है - तो सीधे इंस्टीट्यूट के लिंक ही भेजने चाहिए । यह तो कंफर्म नहीं है कि वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के यह सुझाव प्रमोद जैन तक पहुँचे या नहीं, लेकिन यह कंफर्म है कि प्रमोद जैन ने इंस्टीट्यूट के 'सामान' पर अपनी फर्म का ठप्पा लगा कर उसे अपने 'सामान' के रूप में लोगों के बीच प्रस्तुत करना जारी रखा हुआ है ।   
प्रमोद जैन की निरंतर जारी इस हरकत को लेकर इंस्टीट्यूट में शिकायतें भी की गई हैं, लेकिन उनका भी कोई असर नहीं हुआ है । मजे की बात यह है कि प्रमोद जैन के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि प्रमोद जैन यह जो कर रहे हैं, इसमें किसी नियम-कानून का उल्लंघन भले ही न हो रहा हो - लेकिन नैतिकता के तकाजे के तहत यह गलत है, और प्रमोद जैन को ऐसा नहीं करना चाहिए; इसके बावजूद, लेकिन प्रमोद जैन का कार्यक्रम जारी है । प्रमोद जैन के समर्थकों और शुभचिंतकों का ही कहना और बताना है कि प्रमोद जैन के इस कार्यक्रम से उनकी अच्छी-भली साख पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है, लेकिन फिर भी प्रमोद जैन पता नहीं किस स्वार्थ में इस कार्यक्रम को जारी रखे हुए हैं ?    

Saturday, June 13, 2020

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता की पद्मश्री पाने की कोशिशों पर, रोटरी के बेईमानों के साथ 'दिखती' उनकी नजदीकी के चलते कहीं पानी न फिर जाए !

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता की केंद्र सरकार के मंत्रियों के नजदीक घूम घूम कर रोटरी 'करने' की सक्रियता को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री पाने के उनके जुगाड़ के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उनके नजदीकियों का तो कहना/बताना है कि शेखर मेहता ने पद्मश्री पाने की पूरी व्यवस्था कर ली है, और कभी भी राष्ट्रपति भवन से उन्हें बुलावा आ सकता है । लेकिन कुछेक लोगों को आशंका है कि रोटरी के तरह तरह के बेईमानों को शेखर मेहता के यहाँ जिस तरह का संरक्षण मिलता 'दिख' रहा है, उसके चलते पद्मश्री पाने की उनकी कोशिशों को झटका भी लग सकता है । शेखर मेहता के कुछेक नजदीकियों के अनुसार, उन्हें बार बार सावधान किया गया है कि रोटरी के बेईमानों से उन्हें दूरी बना कर रखना चाहिए, लेकिन शेखर मेहता ने पता नहीं क्यों इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद शेखर मेहता जब पहली बार कोलकाता एयरपोर्ट पर उतरे थे, तब वहाँ उनके स्वागत में मौजूद रोटेरियंस में वह पूर्व गवर्नर भी कभी उनके दाएँ तो कभी उनके बाएँ खड़े हो कर तस्वीरें खिंचवा रहा था, जो बूढ़ों, बीमारों, गरीबों और अनपढ़ों के नाम पर ली गई ग्लोबल ग्रांट की रकम में घपलेबाजी करने के आरोप में रोटरी इंटरनेशनल से सजा पाया हुआ था । कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में रोटरी के नियम-कानूनों तथा रोटरी के पैसों का मनमाना इस्तेमाल करने के आरोपियों को बार-बार शेखर मेहता के नजदीक देखा/पहचाना गया । वरिष्ठ रोटेरियंस ने बार-बार माना/कहा कि इस तरह की 'नजदीकियों' से शेखर मेहता की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा - लेकिन शेखर मेहता इस तरह की बातों की परवाह करते हुए कभी नजर नहीं आए ।
ऐसे में, शेखर मेहता के नजदीकियों को डरभरी आशंका यही है कि शेखर मेहता ने जिन बातों की परवाह नहीं की है, कहीं वही बातें पद्मश्री पाने की उनकी कोशिशों में बाधा न बन जाएँ ? शेखर मेहता को लेकिन अपने उद्यम पर भरोसा है ! शायद उन्हें लगता है कि रोटरी में होने वाली बेईमानियों के बारे में जब अधिकतर रोटेरियंस को ही पता नहीं चल पाता है, और कुछ ही किस्से चर्चा में आ पाते हैं - तब सरकार के लोगों को भला कैसे उनके बारे में पता चलेगा ? इसलिए शेखर मेहता का सारा जोर रोटरी के सहारे सरकार के विभिन्न मंत्रियों और प्रमुख सरकारी विभागों के बड़े पदाधिकारियों के साथ संबंध बनाने पर है । इसके लिए उन्होंने पीएम कोविड 19 केयर्स फंड में रोटरी की तरफ से 25 करोड़ देने/दिलवाने का काम भी किया । हालाँकि इसके लिए शेखर मेहता की बड़ी आलोचना भी हुई । कई वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स ने कहा कि रोटरी एक सेवा संगठन है, जो अपने काम के लिए लोगों से, संस्थाओं से व सरकारों से पैसा लेता है - सरकार को पैसा देना उसका उद्देश्य या काम नहीं है; और शेखर मेहता जो कर रहे हैं, वह उल्टी गंगा बहाना है तथा रोटरी को सिर के बल खड़ा करना है । लेकिन पद्मश्री के लिए 'रास्ता बनाने' में लगे शेखर मेहता ने इस तरह की आलोचनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया । उनका सारा ध्यान पद्मश्री पाने पर है । वह इसलिए भी है, क्योंकि उनसे पहले जो भी भारतीय रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बने हैं, उन सभी को पद्मश्री या उससे ऊपर के नागरिक सम्मान मिले हैं ।
उल्लेखनीय है कि कल्याण बनर्जी तथा राजेंद्र उर्फ राजा साबू को देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री मिला हुआ है, जबकि रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने वाले पहले भारतीय नितीश चंद्र लहरी को तो देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण मिला था । यहाँ तक कि प्रेसीडेंट न बन पाने वाले, लेकिन प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने गए सुशील गुप्ता भी पद्मश्री से सुशोभित हैं । हालाँकि इन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने और इनके प्रेसीडेंट(नॉमिनी) होने में कोई सीधा संबंध दिखता नहीं है - संयोग सिर्फ इतना ही है कि सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले जो चार रोटेरियन हैं, वह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट(नॉमिनी) भी रहे हैं । राजेंद्र उर्फ राजा साबू वर्ष 1991-92 में प्रेसीडेंट थे, पद्मश्री लेकिन उन्हें वर्ष 2006 में मिला; कल्याण बनर्जी प्रेसीडेंट वर्ष 2011-12 में बने, जबकि पद्मश्री उन्हें वर्ष 2009 में ही मिल चुका था । कल्याण बनर्जी को मेडिसिन में काम करने के लिए उक्त सम्मान मिला था, और वह देश के पहले होम्योपैथ हैं, जिन्हें उक्त सम्मान मिला । सुशील गुप्ता इस्तीफा न देते, तो वर्ष 2020-21 में प्रेसीडेंट बनते, लेकिन पद्मश्री से वह 2007 में ही सम्मानित हो चुके हैं । नितीश चंद्र लहरी के साथ जरूर यह संयोग बना कि वर्ष 1962-63 में वह प्रेसीडेंट बने, और 1963 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान मिला । लेकिन नितीश चंद्र लहरी वास्तव में बड़े 'आदमी' थे - उन्होंने नोबेल पुरुस्कार प्राप्त रबीन्द्रनाथ टैगोर के साथ साहित्यिक गतिविधियों में भाग लिया था, और बंगला फिल्मों के उत्थान/विकास में उनका अप्रतिम योगदान था । वह पहली बंगला मोशन फिल्म के निर्माता थे । उनकी सक्रियता और संलग्नता देख कर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्हें यूनाइटेड एस्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ डिफेन्स की आधिकारिक इकाई आर्म्ड फोर्सेस एंटरटेनमेंट का वाइस चेयरमैन बनाया गया था । जाहिर है कि अपनी पहचान के लिए वह रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के मोहताज नहीं थे - और यही कारण है कि उन्हें पद्मभूषण के लिए चुना गया था ।
शेखर मेहता के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यह है कि नितीश चंद्र लहरी के बाद, कोलकाता के वह दूसरे रोटेरियन हैं - जो रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बने हैं । ऐसे में, स्वाभाविक रूप से कोलकाता के लोगों की नजर इस बात पर है कि शेखर मेहता को पद्मभूषण न सही - पद्मश्री भी मिल पाता है, या नहीं । इसीलिए शेखर मेहता रोटरी के बहाने से मंत्रियों के नजदीक होने और रहने के जरिये पद्मश्री पाने की कोशिशों में कोई कोर-कसर तो नहीं छोड़ रहे हैं - बस डर यही है कि रोटरी के बेईमानों के साथ 'दिखती' उनकी नजदीकी कहीं उनकी कोशिशों पर पानी न फेर दे ?

Friday, June 12, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने रोटरी फाउंडेशन में बड़ी रकम जमा करवा कर रोटरी के बड़े नेताओं की शाबासी पाने के चक्कर में डीडीएफ अकाउंट की वास्तविक रकम से कहीं ज्यादा रकम अलॉट करके क्लब्स के पदाधिकारियों को धोखाधड़ी का शिकार बनाया 

गाजियाबाद । झूठे दावे/वायदे करते हुए धोखाधड़ी करने के सिलसिले को जारी रखते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने रोटरी फाउंडेशन के लिए बड़ी रकम इकट्ठा करने के लिए क्लब्स के पदाधिकारियों के साथ धोखाधड़ी का एक बड़ा कांड कर डाला है । डीडीएफ अकाउंट में करीब 32 हजार डॉलर का बैलेंस होने की जानकारी होने के बावजूद, दीपक गुप्ता ने करीब एक लाख 60 हजार डॉलर की रकम क्लब्स को अलॉट कर दी है । अब जब अकाउंट में पैसा ही नहीं है, तो क्लब्स को पैसे मिलेंगे कहाँ से ? क्लब्स के पदाधिकारियों को लेकिन दीपक गुप्ता की इस धोखाधड़ी के बारे में तब पता चलेगा, जब रकम न होने कारण उनके प्रोजेक्ट्स निरस्त होंगे - तब तक दीपक गुप्ता पूर्व गवर्नर हो चुके होंगे और रोटरी फाउंडेशन के लिए बड़ी रकम इकट्ठा करने के लिए रोटरी के बड़े पदाधिकारियों और नेताओं से वाहवाही ले चुके होंगे । मजे की बात यह है कि दीपक गुप्ता की इस धोखाधड़ी का शिकार होने वाले क्लब्स में - रोटरी क्लब गाजियाबाद ग्रेटर भी है, जिसमें दो दो गवर्नर हैं; एक पूर्व गवर्नर जेके गौड़, तथा दूसरे भावी गवर्नर अशोक अग्रवाल । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह है कि जेके गौड़ तो डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) हैं, और इस नाते यह उम्मीद की जाती है कि दीपक गुप्ता की इस धोखाधड़ी की जानकारी उन्हें होगी ही । हालाँकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि दीपक गुप्ता ने अपने शातिरपने में जेके गौड़ का 'मामू' बना दिया है, या जेके गौड़ किसी 'मजबूरी' में चुप बने हुए हैं - और अपने ही क्लब के पदाधिकारियों के साथ धोखा होने दे रहे हैं । भावी गवर्नर अशोक अग्रवाल को दीपक गुप्ता ने 'सर्विस अबव सेल्फ' का अवॉर्ड दिलवाया हुआ है, इसलिए वह दीपक गुप्ता की 'सर्विस' में हैं - और अपने ही क्लब के पदाधिकारियों के ठगे जाने के मामले में चुप हैं । क्लब के कुछेक वरिष्ठ सदस्यों को हालाँकि लगता है कि इन्होंने दीपक गुप्ता के साथ इतनी सेटिंग तो कर ली होगी कि क्लब के लोगों का सारा पैसा न 'डूबे' ।
रोटरी फाउंडेशन के लिए ज्यादा से ज्यादा रकम इकट्ठा करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स डीडीएफ अकाउंट का पैसा धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, और उसे 'बेचते' हैं - लेकिन दीपक गुप्ता ने तो कमाल ही कर दिया है; डीडीएफ अकाउंट का पैसा ठिकाने लगाने के बाद उन्होंने फर्जी तरीके से डीडीएफ अकाउंट का 'वह पैसा' भी इस्तेमाल कर लिया, जो वास्तव में है ही नहीं । समाज में ऐसे किस्से खूब सुनने/देखने को मिलते हैं, जिनमें कि लोग अकाउंट में पैसा न होने के बावजूद चेक काट देते हैं - और फिर चेक पाने वाला परेशान भटकता रहता है और उसे पता चलता है कि वह धोखाधड़ी का शिकार बन गया है । दीपक गुप्ता ने ठीक इसी तर्ज पर काम किया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता से इतनी छोटी सी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह जानते होंगे कि वह अपने गवर्नर-वर्ष के डीडीएफ अकाउंट की रकम ही क्लब्स को अलॉट कर सकते हैं, उससे ज्यादा नहीं । वह अक्सर तरह तरह से अपने आपको जितना होशियार, रोटरी का ज्ञाता और नियमों का पालन करने वाला बताते/जताते हैं - उसके बाद कोई भी यह विश्वास नहीं करेगा कि दीपक गुप्ता ने अनजाने में करीब एक लाख 30 हजार डॉलर की रकम के ऐसे चेक काट दिए हैं, जो बैलेंस न होने के कारण बाउंस होंगे ही । जाहिर है कि दीपक गुप्ता ने यह काम जानते-बूझते हुए और योजनाबद्ध तरीके से किया है । दीपक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट टीम के उनके कुछेक नजदीकी पदाधिकारियों ने उन्हें आगाह भी किया कि उन्हें इस तरह की धोखाधड़ी नहीं करना चाहिए, लेकिन दीपक गुप्ता ने यह कहते हुए उन्हें चुप कर दिया कि वह कुछ जुगाड़ कर लेंगे ।
ग्लोबल ग्रांट्स से जुड़ी रोटरी फाउंडेशन की व्यवस्था में लेकिन किसी जुगाड़ के लिए कोई मौका ही नहीं है । ग्लोबल ग्रांट्स की व्यवस्था का बड़ा सुनिश्चित फार्मूला है - जिसमें प्रोजेक्ट की कुल रकम में क्लब, डीडीएफ अकाउंट, मैचिंग क्लब और रोटरी फाउंडेशन की हिस्सेदारी होती है; इनमें से किसी भी एक हिस्से के न होने से प्रोजेक्ट रिजेक्ट हो जाता है । ऐसे में, दीपक गुप्ता ने डीडीएफ अकाउंट में पैसा न होने के बावजूद - करीब एक लाख 30 हजार डॉलर की रकम जिन जिन प्रोजेक्ट्स के लिए अलॉट की है, उन प्रोजेक्ट्स को रिजेक्ट ही होना है; और प्रोजेक्ट की उम्मीद में रोटरी फाउंडेशन को पैसे देने वाले क्लब्स को हाथ मलते हुए ही रह जाना है । डीडीएफ अकाउंट में पैसे न होने के बावजूद दीपक गुप्ता ने जिन प्रमुख क्लब्स के साथ धोखा किया है, उनमें रोटरी क्लब गाजियाबाद ग्रेटर के साथ-साथ रोटरी क्लब पिलखुवा सिटी, रोटरी क्लब दिल्ली सिटी, रोटरी क्लब दिल्ली यूनिवर्सिटी, रोटरी क्लब दिल्ली इम्पीरियल जैसे डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख क्लब्स भी हैं । इन क्लब्स की डिस्ट्रिक्ट में अच्छी सक्रियता और साख है, लेकिन दीपक गुप्ता इनके साथ भी धोखाधड़ी करने से बाज नहीं आए हैं । दीपक गुप्ता ने फर्जी रूप में करीब एक लाख 30 हजार डॉलर की जो रकम अलॉट कर दी है, उसके चलते वास्तव में कौन-कौन से क्लब्स धोखाधड़ी का शिकार बनेंगे और अपने अपने प्रोजेक्ट्स को लेकर हाथ मलते रह जायेंगे - यह तो बाद में पता चलेगा; तब तक लेकिन दीपक गुप्ता रोटरी फाउंडेशन में जमा रकम को लेकर अपनी पोजीशन बना चुके होंगे, और रोटरी के बड़े पदाधिकारियों और नेताओं से शाबासी पा चुके होंगे ।

Tuesday, June 9, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले में प्रियतोष गुप्ता से बड़े अंतर से पिछड़ते दिख रहे दीपक गुप्ता की चुनावी मुकाबले में अपने आप को बनाये रखने के लिए सोनीपत में दो नए क्लब बनाने की कार्रवाई को मजाक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है

सोनीपत । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी को मजबूती देने के लिए दीपक गुप्ता ने सोनीपत में दो नए क्लब बना/बनवा कर अपनी स्थिति का मजाक और उड़वा लिया है । सोनीपत में ही लोगों का कहना है कि फर्जी तरीकों से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने की दीपक गुप्ता की तिकड़मी कोशिशों से वास्तव में उनकी निराशा और बौखलाहट ही जाहिर हो रही है । दीपक गुप्ता के प्रति हमदर्दी और समर्थन का भाव रखने वाले रोटेरियंस का भी कहना/बताना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता को अपनी सक्रियता में जो निरंतरता रखना चाहिए, उस पर तो उनका कोई ध्यान है नहीं - नए क्लब बना कर वोट गढ़ने/बनाने के जरिये चुनाव जीतने की उनकी कोशिश वास्तव में उनकी कमजोरी को ही दिखा रही है । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनावी लड़ाई में दो/चार वोटों का भी बड़ा महत्त्व होता है; उनका दावा है कि लॉकडाउन पीरियड में डिस्ट्रिक्ट में जो पाँच/छह नए क्लब बने हैं, उन्हें भी दीपक गुप्ता के क्लब्स के रूप में देखा/पहचाना जाना चाहिए और सिर्फ सोनीपत के दो क्लब्स को ही नहीं देखना चाहिए । वास्तव में, इस तरह की बातों ने दीपक गुप्ता की स्थिति को मजाक विषय बनाया हुआ है । लोगों का कहना है कि चुनावी लड़ाई में महत्त्व तो एक वोट का भी होता है, लेकिन यह तब होता है - जब लड़ाई बराबर की हो; दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की हालत अभी भी जितनी पतली नजर आ रही है, उसमें यदि डिस्ट्रिक्ट में इस वर्ष बने सभी ग्यारह क्लब्स के वोट भी उनके खाते में पड़ जाएँ, तब भी दीपक गुप्ता का कोई भला नहीं होने वाला है ।
दीपक गुप्ता दरअसल खासतौर से गाजियाबाद और आमतौर से उत्तर प्रदेश व पूर्वी दिल्ली में समर्थन जुटाने की कोशिशों में जिस तरह से विफल हुए हैं, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट में कोई भरोसा नहीं बन पा रहा है । दूसरों की तो छोड़िये, उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों को यह भरोसा नहीं है कि उनकी उम्मीदवारी चुनाव तक बनी भी रह पायेगी या नहीं । दीपक गुप्ता ने पिछले महीनों में, लॉकडाउन से पहले गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों के रोटेरियंस के बीच संपर्क अभियान चलाया था और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन खोजने/बनाने के प्रयास किए थे - लेकिन उनके प्रयासों को जिस बुरी तरह से असफलता मिली, उससे उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को खासा तगड़ा झटका लगा है । दीपक गुप्ता के लिए झटके वाली बात दरअसल यह रही कि अलग अलग कारणों से उन्हें जिन जिन लोगों के समर्थन की उम्मीद थी, उन्होंने भी उनकी उम्मीदवारी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से जुड़ने का 'कारण' रखने वाले लोगों को भी लग रहा है कि प्रियतोष गुप्ता के मुकाबले दीपक गुप्ता की स्थिति बहुत ही कमजोर है, और इसीलिए वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ जुड़ने से बचते दिख रहे हैं । मजे की बात है कि इससे प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी की स्थिति और मजबूत हुई है । खासतौर से गाजियाबाद और आमतौर से उत्तर प्रदेश व पूर्वी दिल्ली के क्लब्स में प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति जिस तरह का समर्थन-भाव दिख रहा है, उसी के चलते दीपक गुप्ता के लिए अपनी उम्मीदवारी के प्रति समर्थन के उद्देश्य से यहाँ सेंध लगा पाना मुश्किल हुआ है ।
इस स्थिति के लिए दीपक गुप्ता के व्यवहार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । दीपक गुप्ता को जानने वाले लोगों का ही कहना/बताना है कि दीपक गुप्ता की किसी से भी ज्यादा दिनों तक बनती नहीं है । यही कारण है कि दीपक गुप्ता कभी जिन लोगों के बड़े खास और नजदीक हुआ करते थे, अब वही लोग उनकी उम्मीदवारी के विरोधी बने हुए हैं । दूसरी तरफ, प्रियतोष गुप्ता के साथ मामला बिलकुल उल्टा है - वह जिस किसी के नजदीक और खास हुए, उसके नजदीकी और खास बन कर टिक गए । कई उदाहरण हैं, जहाँ किन्हीं दो नेताओं का एक-दूसरे के साथ तगड़ा विरोध है, लेकिन प्रियतोष गुप्ता के दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं - और यही बात प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी को मजबूत बना रही है; और इसी के चलते दीपक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाना मुश्किल हो रहा है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यह बनी है कि उनके लिए न तो प्रियतोष गुप्ता के समर्थकों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे खासतौर से गाजियाबाद और आमतौर से उत्तर प्रदेश व पूर्वी दिल्ली के क्लब्स में समर्थन जुटा पाना संभव हो रहा है, और न उन्हें सोनीपत में ही अपने समर्थन-आधार को सुदृढ़ बनाये रख पाने में सफलता मिल रही है । प्रियतोष गुप्ता ने अपनी निरंतर सक्रियता से सोनीपत के क्लब्स में अपने लिए समर्थन जुटाने में जो कामयाबी पाई है, उसने उन्हें दीपक गुप्ता के मुकाबले अच्छी बढ़त दिलाने का काम किया है । इसीलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी मुकाबले में अपने आप को बनाये रखने के लिए सोनीपत में दो नए क्लब बनाने की दीपक गुप्ता की कार्रवाई को मजाक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।

Sunday, June 7, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में वोटिंग का पहला दिन अमित जैन की उम्मीदवारी के लिए खासा झटके वाला रहा है, और इसके लिए अमित जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों और शुभचिंतकों ने पूर्व गवर्नर विनय भाटिया तथा अन्य बड़े समर्थक नेताओं को जिम्मेदार ठहराया है

नई दिल्ली । सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव के लिए वोटिंग शुरू होते ही रोहतक और आसपास की जगहों के क्लब्स के वोट सुधीर मंगला के पक्ष में पड़ने की खबर जिस तेजी से फैली है, उसने अमित जैन के समर्थकों और शुभचिंतकों को चिंतित करने का काम किया है । रोहतक से हालाँकि अमित जैन की उम्मीदवारी के लिए कोई अच्छे संकेत मिल भी नहीं रहे थे । पिछले दिनों जिन भी लोगों ने अमित जैन की उम्मीदवारी को लेकर रोहतक में बात की थी, उन्हें यही जबाव सुनने को मिला था कि अमित जैन तो वर्षों से रोहतक नहीं आये हैं और न ही उन्होंने रोहतक के लोगों में या रोहतक की रोटरी गतिविधियों में कभी कोई रूचि दिखाई है; जबकि सुधीर मंगला लगातार संपर्क बनाये रहे हैं और क्लब्स के आयोजनों में भी शामिल होते रहे हैं । रोहतक के लोगों से नाराजगीभरी प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के मिलने के बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन ने अमित जैन की उम्मीदवारी के पक्ष में मोर्चा संभाला, लेकिन उससे बात बनने की बजाये बिगड़ और गई । दरअसल रोहतक में सुरेश भसीन के प्रति खासी नाराजगी है, और उसी नाराजगी के चलते सुरेश भसीन की वकालत भी अमित जैन को वोट दिलवा सकने में असफल रही । अमित जैन की तरफ से लगातार पड़  रहे दबावों को देखते हुए रोहतक के क्लब्स के पदाधिकारियों ने वोटिंग लाइन खुलते ही सुधीर मंगला के पक्ष में वोट करके अमित जैन के लिए रास्ते ही बंद कर दिए । रोहतक में वोट न मिलने से अमित जैन की उम्मीदवारी को जो नुकसान हुआ, वह तो हुआ ही - डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच इस बात के प्रचार से लेकिन ज्यादा नुकसान हुआ लग रहा है ।
रोहतक से भी बड़ा झटका लेकिन अमित जैन की उम्मीदवारी को फरीदाबाद में लगा सुना जा रहा है । रोहतक में हालात मुश्किल होने का तो पहले से आभास था, किंतु फरीदाबाद में तो अमित जैन को एकतरफा वोट मिलने की उम्मीद की जा रही थी । उसके बावजूद, फरीदाबाद के कुछेक क्लब्स की तरफ से सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के पक्ष में हुई वोटिंग की बात जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट में फैली है, उसने अमित जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों और शुभचिंतकों को बुरी तरह से निराश किया है । इसके लिए पूर्व गवर्नर विनय भाटिया को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और उनके प्रति नाराजगी के स्वर भी सुनाई देने लगे हैं । अमित जैन की उम्मीदवारी के एक सक्रिय समर्थक ने इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए विनय भाटिया पर सीधे सीधे धोखा देने का आरोप तक लगाया है । उनका कहना है कि विनय भाटिया ने फरीदाबाद के क्लब्स के वोट दिलवाने की जिम्मेदारी ली हुई थी, लेकिन उन्हें फीडबैक मिल रहा है कि वह कुछ नहीं कर रहे हैं । फरीदाबाद में अमित जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे कुछेक अन्य लोग भी उतने सक्रिय नहीं हैं, जितने सक्रिय होने की उनसे उम्मीद की जा रही थी । यही कारण रहा कि फरीदाबाद के जिन क्लब्स के वोट अमित जैन को मिलने की उम्मीद की जा रही थी, उनके सुधीर मंगला के पक्ष में पड़ने की सूचनाएँ मिल रही हैं । 
इस तरह, वोटिंग का पहला दिन अमित जैन की उम्मीदवारी के लिए खासा झटके वाला रहा है । अमित जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों और शुभचिंतकों को ज्यादा चिंता लेकिन इस बात से हुई है कि जिन लोगों से उन्हें वोट दिलवाने की उम्मीद थी, वह या तो प्रभावी तरीके से काम करते हुए नहीं दिख रहे हैं, और या उनके काम करने का कोई असर नहीं हो रहा है । दरअसल अमित जैन के लिए वोट जुटाने के अभियान में जो लोग जुटे हैं, उन्हें लोगों की इस शिकायत का कोई जबाव नहीं सूझ पाया है कि अमित जैन तो डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की गतिविधियों में कहीं नजर ही नहीं आते हैं । कई प्रेसीडेंट्स ने तो साफ साफ कहा भी कि वह तो अमित जैन को पहचानते भी नहीं हैं । संपर्क, सक्रियता और पहचान के मामले में सुधीर मंगला का पलड़ा भारी बैठता है । अमित जैन और सुधीर मंगला के बायोडेटाज को देखने/पढ़ने वाले लोगों ने भी जाना/समझा है और रेखांकित किया है कि अमित जैन के मुकाबले सुधीर मंगला की रोटरी में सक्रियता कहीं ज्यादा है - और हर स्तर पर है । सुधीर मंगला डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों के साथ साथ जोन व इंटरनेशनल स्तर के आयोजनों में भी लगातार शामिल होते रहे हैं, और इसलिए सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए ज्यादा उपर्युक्त माने/समझे जा रहे हैं । वोटिंग शुरू होने के पहले दिन, सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच जैसा जो उत्साह देखा/सुना जा रहा है - देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में उन्हें कैसी/क्या सूचनाएँ मिलती हैं ?   

Saturday, June 6, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनोज रुहेला की हसरतों में, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में जितेंद्र चौहान की बड़ी जीत के चलते, आए उछाल ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अगले लायन वर्ष की चुनावी लड़ाई को खासा मजेदार बना दिया है

लखनऊ । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जितेंद्र चौहान के भारी मतों से मल्टीपल एंडॉर्सी चुने जाने के 'साइड इफेक्ट्स' दिखने शुरू हो गए हैं, और पहला केस लायंस क्लब शाहजहाँपुर विशाल के वरिष्ठ सदस्य तेजेंद्रपाल सिंह पर हक जताने को लेकर वरिष्ठ पूर्व गवर्नर गुरनाम सिंह और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनोज रुहेला के बीच खींचतान बढ़ने के रूप में सामने आया है । तेजेंद्रपाल सिंह को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । वह यूँ तो गुरनाम सिंह के नजदीक हैं; लेकिन अगले वर्ष की अपनी उम्मीदवारी की तैयारी करते हुए उन्होंने इस वर्ष मनोज रुहेला के साथ भी अपनी अच्छी नजदीकियत बना ली है, और इसके लिए उन्होंने इस वर्ष अच्छे-खासे पैसे भी खर्च किए । लेकिन यही बात अब तेजेंद्रपाल सिंह के लिए मुसीबत बन गई है । मनोज रुहेला उन्हें 'अपने उम्मीदवार' के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि तेजेंद्रपाल सिंह को भी लगता है कि वह गुरनाम सिंह के उम्मीदवार के रूप में ही कामयाब हो सकते हैं । यह मामला अभी तक दबे-ढके रूप में चल रहा था; लेकिन जितेंद्र चौहान की जीत के चलते मनोज रुहेला का जो राजनीतिक रुतबा बढ़ा है - उसने मामले को बड़ा और गंभीर बना दिया है । असल में, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मल्टीपल एंडॉर्सी के चुनाव में मनोज रुहेला तो जितेंद्र चौहान को वोट दिलाने के अभियान में लगे थे, जबकि खुद मनोज रुहेला का ही आरोप था कि गुरनाम सिंह गुपचुप रूप से दीपक तलवार को वोट दिलवाने की व्यवस्था में जुटे थे । उक्त चुनाव में चूँकि जितेंद्र चौहान की भारी मतों से जीत हुई है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में उसका एक अर्थ यह भी लगाया जा  कि वोट जुटाने के खेल में मनोज रुहेला का पलड़ा भारी हो चला है ।
इसलिए मनोज रुहेला की यह चाहत अब और बढ़ गई है कि डिस्ट्रिक्ट में जिसे चुनाव जीतना हो, उसे उनके उम्मीदवार के रूप में आना/रहना - और 'दिखना' होगा । हालाँकि किसी को विश्वास नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट पर अपने नेतृत्व को गुरनाम सिंह आसानी से छोड़ेंगे । जगदीश अग्रवाल वाले मामले में उन्होंने दिखाया ही है कि जो उनके साथ 'टेढ़ा' चलेगा, उसका क्या हाल होगा । ऐसे में, तेजेंद्रपाल सिंह के साथ मुसीबत यह खड़ी हो गई है कि वह किसके उम्मीदवार के रूप में 'दिखें' । उनकी यह मुसीबत इसलिए और बड़ी है, क्योंकि शाहजहाँपुर के दोनों पूर्व गवर्नर्स - प्रमोद सेठ और संजय चोपड़ा उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ हैं । हालाँकि तेजेंद्रपाल सिंह की गुरनाम सिंह के साथ नजदीकियत को जानते/पहचानते हुए वह अभी खिलाफत करते नजर नहीं आ रहे हैं - लेकिन वह इस ताक में जरूर लगते हैं कि तेजेंद्रपाल सिंह का खेल कुछ बिगड़े, तो वह उसे और बिगाड़ने में जुटें । तेजेंद्रपाल सिंह के लिए मुसीबत की बात यह भी है कि गुरनाम सिंह के भरोसे लायंस क्लब काशीपुर सिटी के वरिष्ठ सदस्य सुखविंदर सिंह भी अगले लायन वर्ष में उम्मीदवार होने की इच्छा रखते हैं । लेकिन चूँकि उनके नजदीकियों को ही लगता है कि एक उम्मीदवार के रूप में सक्रियता दिखा पाना उनके लिए मुश्किल होगा, इसलिए उनकी उम्मीदवारी का दावा कमजोर पड़ जाता है ।
गुरनाम सिंह और मनोज रुहेला के बीच तेजेंद्रपाल सिंह की उम्मीदवारी के झंडे पर कब्जे को लेकर जो खींचतान है, उसमें काशीपुर ग्रेटर के वरिष्ठ सदस्य अपूर्व मेहरोत्रा अपने लिए रास्ता बनता देखने लगे हैं, और इस चक्कर में उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है । अपूर्व मेहरोत्रा को पूर्व गवर्नर केएस लूथरा के नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । मनोज रुहेला को भी चूँकि 'बुनियादी रूप से' केएस लूथरा खेमे के सदस्य के रूप में ही जाना/पहचाना जाता है, इसलिए अपूर्व मेहरोत्रा को उम्मीद है कि तेजेंद्रपाल सिंह के साथ मामला गड़बड़ाने पर मनोज रुहेला उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर सकते हैं - और तब उम्मीदवार के रूप में उनका पलड़ा और भारी हो जायेगा । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई में जितेंद्र चौहान की बड़ी जीत, और उनकी इस जीत में मनोज रुहेला की हिस्सेदारी के चलते - मनोज रुहेला डिस्ट्रिक्ट में अब 'बड़ी भूमिका' निभाने के लिए अपने आपको तैयार कर रहे हैं; और इसके लिए डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओं से भिड़ने के लिए भी तैयार हैं । इसका संकेत उन्होंने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में दीपक तलवार का सहयोग/समर्थन करने के मुद्दे पर गुरनाम सिंह पर दबाव बना कर दे भी दिया है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर पहले जितेंद्र चौहान की उम्मीदवारी का समर्थन करने को लेकर - और फिर उनकी बड़ी जीत के बाद मनोज रुहेला की हसरतों में जो उछाल आया है, उसने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अगले लायन वर्ष की चुनावी लड़ाई को खासा मजेदार बना दिया है ।  

Thursday, June 4, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू का क्लब सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए पारित मधुकर मल्होत्रा के नाम का प्रस्ताव डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय भेजना 'भूल' गया, और इस तरह टीके रूबी निर्विरोध सीओएल प्रतिनिधि चुन लिए गए

चंडीगढ़ । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू ने सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए टीके रूबी की उम्मीदवारी के लिए 'सेफ पैसेज' बना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जितेंद्र ढींगरा के साथ अपनी नजदीकियत को और मजबूती दे दी है । इनके बीच नजदीकियत की ठोस जमीन हालाँकि तभी तैयार हो गई थी, जब राजा साबू के मेडीकल मिशन के प्रोजेक्ट को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जितेंद्र ढींगरा और डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) के रूप में टीके रूबी ने हरी झंडी दे दी थी । इनके बीच बनती हुई नजदीकियत का एक बड़ा सुबूत यह भी है कि पूर्व गवर्नर मनप्रीत सिंह गंधोके द्वारा डिस्ट्रिक्ट एकाउंट से अनधिकृत रूप से लिए गए करीब 15 लाख रुपये वापस लेने के लिए तो जितेंद्र ढींगरा ने जमीन-आसमान एक किया हुआ है, लेकिन टीके रूबी के गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट सर्विस ट्रस्ट से उत्तराखंड के स्कूल प्रोजेक्ट में अनधिकृत रूप से ट्रांसफर किए गए करीब 20 लाख रुपये के तथा रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के करीब तीन करोड़ रुपये के राजा साबू के मामले को वह कतई भूल गए लग रहे हैं । जितेंद्र ढींगरा और टीके रूबी के इन्हीं अहसानों का बदला चुकाने के लिए राजा साबू ने अपने क्लब के पदाधिकारियों को - सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए क्लब में पारित हो चुके पूर्व गवर्नर मधुकर मल्होत्रा के नाम के प्रस्ताव को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय भेजना - भूल जाने को कह दिया, और इस तरह उन्होंने सीओएल प्रतिनिधि के पद पर टीके रूबी के निर्विरोध चुन लिए जाने का रास्ता बना दिया ।
राजा साबू और जितेंद्र ढींगरा व टीके रूबी के पिछली बातों को भूलने और डिस्ट्रिक्ट में एक नई शुरुआत करने के 'खेल' में ताजा शिकार बने मधुकर मल्होत्रा लेकिन थोड़े दुखी हैं । लेकिन उन की समस्या यह है कि वह अपना दुखड़ा ज्यादा 'रो' भी नहीं पा रहे हैं । अपने क्लब के अपने नजदीकियों से यह कहते हुए उन्होंने अपना दुःख हल्का करने का प्रयास जरूर किया है, कि राजा साबू को अपने 'खेल' में उन्हें मोहरा नहीं बनाना चाहिए था । मधुकर मल्होत्रा के साथ, समस्या दरअसल यह हुई कि रोटरी के देशी-विदेशी बड़े नेताओं के बीच यह खबर फैल चुकी थी कि सीओएल प्रतिनिधि के लिए राजा साबू ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है, और उनके नाम का प्रस्ताव उनके क्लब में पास भी हो गया है । लेकिन उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय तक नहीं पहुँचा । यह बात जब सामने आई, तो लोगों ने मधुकर मल्होत्रा से पूछा कि आखिर हुआ क्या ? मधुकर मल्होत्रा की तरफ से इसका बड़ा मासूम सा जबाव सुनने को मिला कि उनके क्लब की प्रेसीडेंट सुरिंदर कौर उक्त प्रस्ताव डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय भेजना भूल गईं । सुरिंदर कौर एक गंभीर और जिम्मेदार अधिकारी के तौर पर जानी/पहचानी जाती हैं । क्लब के संयुक्त उपक्रम रोटरी एंड ब्लड बैंक सोसायटी रिसोर्स सेंटर का कामकाज देखने की जिम्मेदारी राजा साबू ने उन्हें ही सौंपी हुई है । किसी को विश्वास नहीं हो रहा है कि कोई प्रेसीडेंट - और वह भी सुरिंदर कौर जैसी जिम्मेदार प्रेसीडेंट इस तरह के मामले में भूल कर सकती हैं । और फिर चलो, मान लो कि वह सचमुच भूल गईं - तब भी सवाल यह है कि मधुकर मल्होत्रा खुद क्या कर रहे थे ? क्या उन्हें जरूरी नहीं लगा कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर क्लब में पास हुआ प्रस्ताव डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय पहुँचे - या वह भी भूल गए ?
रोटरी क्लब चंडीगढ़ में चर्चा यही है कि राजा साबू के कहने पर ही सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए सुरिंदर कौर ने मधुकर मल्होत्रा की उम्मीदवारी के प्रस्ताव को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय तक नहीं पहुँचाया, ताकि टीके रूबी के सीओएल प्रतिनिधि चुने जाने में कोई समस्या न खड़ी हो । कुछेक लोगों का कहना/पूछना है कि राजा साबू को जब यही करना था, तो उन्होंने मधुकर मल्होत्रा की उम्मीदवारी का प्रस्ताव पास ही क्यों होने दिया ? क्लब के लोगों की तरफ से ही सुनने को मिला है कि राजा साबू दरअसल टीके रूबी की मदद सिर्फ करना ही नहीं चाहते थे, बल्कि मदद करते हुए 'दिखना' भी चाहते थे; उन्हें आशंका थी कि वह ऐसा यदि नहीं करते तो लोगों के बीच यही मैसेज जाता कि राजा साबू की तरफ से सीओएल प्रतिनिधि पद के लिए कोई प्रयास ही नहीं हुआ । जो हुआ - या जो किया गया, उसके जरिये राजा साबू ने दिखाने/बताने की कोशिश की है कि जब जितेंद्र ढींगरा और टीके रूबी उनके हितों को पूरा करने के लिए और उनके साथ नजदीकी बनाने के लिए बातों को भूल सकते हैं, तो वह भी मधुकर मल्होत्रा की उम्मीदवारी के कागज डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय भिजवाना भूल सकते हैं । राजा साबू, जितेंद्र ढींगरा, टीके रूबी की इस भूल-भुलैय्या को देखते हुए मनप्रीत सिंह गंधोके ने राजा साबू से सिफारिश करना शुरू किया है कि उन्होंने जैसे जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट सर्विस ट्रस्ट और उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ फंड के पैसों के मामलों को भुलवा दिया है, वैसे ही उनके मामले को भी भुलवा दें । देखना दिलचस्प होगा कि भूलने के - फिलहाल सेलेक्टिव - चल रहे खेल में और क्या क्या भूला जायेगा ?  

Wednesday, June 3, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में चौतरफा हमलों और दबावों का सामना करने के बावजूद जितेंद्र चौहान का पलड़ा लगातार भारी बना हुआ है, और चुनावी नतीजा उनके ही पक्ष में एकतरफा तौर पर झुका हुआ लग रहा है

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में वोटिंग शुरू होने में अब जब कुछ घंटों का समय बचा है, तब दीपक तलवार की उम्मीदवारी के कमान सँभाले पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना वोट जुटाने तथा अपने वोटों को पक्का करने की बजाये डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू की गवर्नर मधु सिंह को आगे करके मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन विनय मित्तल को घेरने/फँसाने की चाल चल रहे हैं । इन बातों से लग रहा है कि विनोद खन्ना ने वोटिंग शुरू होने से पहले ही अपनी हार मान ली है, और उनकी वोट जुटाने तथा अपने वोट डलवाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है । मजे की बात यह रही है कि विनोद खन्ना के कारण ही दीपक तलवार की उम्मीदवारी का ग्राफ तेजी से ऊँचा उठा और तेजपाल खिल्लन चुनावी दौड़ से बाहर ही हो गए लग रहे हैं, लेकिन विनोद खन्ना के कारण ही दीपक तलवार की उम्मीदवारी जितेंद्र चौहान से पिछड़ गई है । दरअसल विनोद खन्ना यह समझने में असफल रहे कि उन्हें जितेंद्र चौहान से लड़ना है, या विनय मित्तल से । उनकी तरफ से कभी जितेंद्र चौहान के 'देशी व्यक्तित्व' तथा अंग्रेजी ज्ञान को निशाना बनाने के प्रयास दिखे तो कभी उनके निशाने पर विनय मित्तल रहे । विनय मित्तल को तरह तरह से घेरने की उनकी कोशिशें विफल होती रहीं, लेकिन फिर भी वह अपनी एनर्जी, अपना समय और अपनी प्रतिभा विनय मित्तल पर ही खर्च करते रहे । इस के चलते, दीपक तलवार के लिए वोट जुटाने का काम करने का उन्हें मौका ही नहीं मिला और वह जितेंद्र चौहान के लिए कोई मुश्किल पैदा नहीं कर सके । 
जितेंद्र चौहान को उनके ही डिस्ट्रिक्ट में घेरा जा सकता था; क्योंकि वहाँ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से लेकर कई एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स जितेंद्र चौहान के खिलाफ हैं; विनोद खन्ना यदि कोशिश करते तो वह जितेंद्र चौहान के डिस्ट्रिक्ट में दीपक तलवार को अच्छे खासे वोट दिलवाने का इंतजाम कर सकते थे - विनोद खन्ना लेकिन इस पर ध्यान देने की बजाये डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के जरिये विनय मित्तल को घेरने की कोशिशों में जुटे रहे । विनय मित्तल के डिस्ट्रिक्ट में विरोधी नेताओं की खुन्नस विनय मित्तल से है, विनोद खन्ना ने लेकिन इस तथ्य पर ध्यान ही नहीं दिया और विनय मित्तल को निशाना बनाने की अपनी कोशिशों में उनके विरोधियों के साथ तालमेल बनाने का कोई प्रयास नहीं किया । इस चक्कर में विनोद खन्ना न तो विनय मित्तल को दबाव में ले पाए और न दीपक तलवार के लिए वोटों की व्यवस्था कर सके । इसका नतीजा यह है कि जितेंद्र चौहान को दोनों डिस्ट्रिक्ट्स में ही पाँच सौ से अधिक वोट मिलने की संभावना बन रही है, और दीपक तलवार को चिल्लर वोटों से ही काम चलाना पड़ेगा । जितेंद्र चौहान और विनय मित्तल ने शुरू से ही अपने समर्थकों को एकजुट करने, उनके वोट पक्के करने तथा उनके वोट पड़ने की व्यवस्था करने के काम पर ध्यान दिया । विनय मित्तल यह सब करने में बड़े माहिर हैं । कुछेक लोगों को लगता भी है कि विनोद खन्ना ने विनय मित्तल को निशाने पर दरअसल इसलिए ही लिया हुआ था, ताकि उन्हें उलझाए रखा जाये और उन्हें अपने समर्थकों को एकजुट करने/रखने तथा उनके वोट पक्के करने व उन्हें डलवाने की व्यवस्था करने का काम करने का मौका ही न मिल सके ।
विनय मित्तल लेकिन राजनीति करने तथा व्यवस्था बनाने का 'कॉम्बो' हैं । यह बड़ा दुर्लभ गुण है और बहुत ही कम लोगों में ऐसा हुनर मिलता है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की मौजूदा चुनावी लड़ाई में उनके लिए काम आसान इसलिए भी रहा, क्योंकि यह काम उन्हें जितेंद्र चौहान के लिए करना रहा - जिनका पहले से एक बड़ा और प्रभावी नेटवर्क है । जितेंद्र चौहान और विनय मित्तल की जोड़ी - एक और एक मिलकर दो नहीं, बल्कि ग्यारह बनते/बनाते हैं । इसीलिए चौतरफा हमलों और दबावों का सामना करने के बावजूद इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में जितेंद्र चौहान का पलड़ा लगातार भारी बना रहा है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव उनके ही पक्ष में एकतरफा तौर पर झुका हुआ लग रहा है । एक उम्मीदवार के रूप में जितेंद्र चौहान का व्यक्तित्व और बायोडाटा दीपक तलवार के मुकाबले कमजोर पड़ता है, लेकिन जितेंद्र चौहान और विनय मित्तल ने चुनाव की ऐसी पिच तैयार की कि जितेंद्र चौहान की कमजोरी मुद्दा ही नहीं बन सकी । कुछेक लोगों को लगता है कि विनय मित्तल ने जानबूझ कर कुछेक ऐसी 'कार्रवाइयाँ' की, जिससे कि विरोधियों के निशाने पर वह आ जाएँ और जितेंद्र चौहान की कमजोरियाँ मुद्दा न बन सकें । इस बार के इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव का मजेदार सीन यह है कि उम्मीदवार जितेंद्र चौहान हैं, उनके विरोधियों को लड़ना उनसे है - लेकिन लड़ वह विनय मित्तल से रहे हैं ।
विनोद खन्ना के प्रभाव से दीपक तलवार को डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन, 321 बी टू, 321 डी और 321 ई में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है, लेकिन जितेंद्र चौहान और विनय मित्तल की जोड़ी की रणनीति इन डिस्ट्रिक्ट्स में दीपक तलवार को अच्छी टक्कर देती हुई दिख रही है - जिस कारण दीपक तलवार का 321 सी वन और 321 सी टू में जितेंद्र चौहान को मिलने वाली एकतरफा बढ़त के सामने टिक पाना मुश्किल दिख रहा है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में करीब ढाई हजार वोटों को मान्यता मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है । उम्मीद की जा रही है कि 2000 से 2200 के बीच वोट पड़ेंगे । जितेंद्र चौहान के नजदीकियों और समर्थकों को उम्मीद है कि करीब 55 प्रतिशत वोट जितेंद्र चौहान को मिल जायेंगी और जितेंद्र चौहान एक बड़े अंतर से चुनाव जीत लेंगे ।   

Tuesday, June 2, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी से इंकार करते रहने के बाद, अचानक से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके संजय अग्रवाल ने संजीव सिंघल के लिए तो मुसीबत खड़ी कर ही दी है, लेकिन खुद उनके सामने भी सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने की चुनौती आसान नहीं है

नई दिल्ली । अगले वर्ष होने वाले इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करके संजय अग्रवाल ने लॉकडाउन के कारण ठंडी पड़ी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है, और सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्य संजीव सिंघल के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है । संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी संजीव सिंघल के लिए सीधा खतरा दरअसल वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट गिरीश आहुजा के कारण बनी है । संजीव सिंघल मौजूदा सेंट्रल काउंसिल में वास्तव में गिरीश आहुजा के सक्रिय समर्थन के कारण ही हैं; और इन्हीं गिरीश आहुजा के सक्रिय समर्थन के कारण संजय अग्रवाल लगातार तीन टर्म सेंट्रल काउंसिल में रहे हैं । अगले चुनाव में गिरीश आहुजा का समर्थन किसे मिलेगा, यह तो गिरीश आहुजा ही तय करेंगे और बतायेंगे/दिखाएंगे - लेकिन लोगों को यह जरूर लग रहा है कि संजय अग्रवाल के भी चुनावी मैदान में होने के कारण गिरीश आहुजा अगले चुनाव में संजीव सिंघल का वैसी सक्रियता से तो समर्थन नहीं ही कर सकेंगे, जैसी सक्रियता से उन्होंने पिछले चुनाव में किया था । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई लोगों को तो यह भी लगता है कि गिरीश आहुजा से हरी झंडी मिलने के बाद ही संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की होगी, और इसलिए संजीव सिंघल को अगली बार गिरीश आहुजा का समर्थन मिलना मुश्किल ही होगा - और इस कारण उनके लिए सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर पाना खासा कठिन हो सकता है । 
इस आशंका को दरअसल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच संजीव सिंघल के प्रति बढ़ती नाराजगी और शिकायत के कारण भी बल और चर्चा मिल रही है । उल्लेखनीय है कि संजीव सिंघल के प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की आम शिकायत है कि उम्मीदवार के रूप में तो वह बड़ा भला सा व्यवहार करते थे और खुशामदी टोन में रहते थे, लेकिन चुनाव जीतते ही उनका रूप पूरी तरह बदल गया और उनका रवैया अहंकारी किस्म का हो गया - वह अपनी समस्याएँ लेकर आने वाले तथा उनकी मदद चाहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने और बात करने से बचने लगे; यहाँ तक कि वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के फोन भी नहीं उठाते, और कॉल बैक भी नहीं करते । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को तो छोड़िये, वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रति भी संजीव सिंघल ने यही रवैया दिखाया । वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने संजीव सिंघल के इस रवैये की शिकायत गिरीश आहुजा से भी की और उन्हें उलाहना दिया कि आपने कैसे व्यक्ति का वोट दिलवा दिए और सेंट्रल काउंसिल में पहुँचवा दिया है, जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं व मुश्किलों को सुनने और हल करवाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं लेते हैं, और यहाँ तक कि फोन भी नहीं उठाते हैं । भुक्तभोगियों का कहना/बताना रहा है कि संजीव सिंघल के रवैये पर गिरीश आहुजा ने भी नाराजगी दिखाई, और माना कि संजीव सिंघल के इस रवैये के चलते उनकी साख व विश्वसनीयता को भी चोट पहुँची है । गिरीश आहुजा को यह देख/जान कर और झटका लगा कि उनके हस्तक्षेप के बाद संजीव सिंघल ने कुछेक वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को कॉल बैक तो की, लेकिन उनके रवैये में कोई सुधार होता हुआ नहीं हुआ । 
संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी की पृष्ठभूमि में संजीव सिंघल के इसी रवैये और उनके रवैये के प्रति गिरीश आहुजा की नाराजगी को समझा/पहचाना जा रहा है । दरअसल कोई भी यह मानने तैयार नहीं है कि गिरीश आहुजा से हरी झंडी मिले बिना संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी है । लोगों को लग रहा है कि पर्दे के पीछे जरूर ही कोई खिचड़ी पकी है । संजय अग्रवाल के व्यवहार से भी इस बात को बल मिला है । उल्लेखनीय है कि पिछला चुनाव होने के बाद से संजय अग्रवाल लगातार सक्रिय हैं और विभिन्न ब्रांचेज में आयोजित होने वाले सेमिनार्स में शामिल होते रहे हैं । उनकी सक्रियता देख/जान कर अगले चुनाव में उनके उम्मीदवार होने को लेकर सवाल उठने लगे थे - लेकिन संजय अग्रवाल लगातार अपनी उम्मीदवारी से इंकार कर रहे थे । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना/बताना था कि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर संजय अग्रवाल का मन भी है और उनकी तैयारी भी है, लेकिन अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने से पहले वह अपने कुछेक 'बड़े समर्थकों' से आश्वासन ले लेना चाहते हैं । इसी आधार पर माना/समझा जा रहा है कि 'बड़े समर्थकों' की तरफ से आश्वस्त हो लेने के बाद ही संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है । संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी ने संजीव सिंघल के लिए भले ही मुसीबत खड़ी कर दी है, लेकिन इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के अनुसार - खुद संजय अग्रवाल के लिए भी सेंट्रल काउंसिल में वापसी करना आसान नहीं होगा । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए पहली जीत संजय अग्रवाल को बहुत मामूली अंतर से मिली थी, लेकिन दूसरी जीत उनके लिए बहुत शानदार रही थी - किंतु तीसरी जीत उन्हें बहुत झटके के साथ मिली थी; तीसरी जीत में उनकी पोजीशन जिस तरह से पिछड़ी थी, उससे वह खुद बहुत निराश हुए थे । ऐसे में, एक तरफ तो उन्हें यह जानना/समझना है कि सेंट्रल काउंसिल में होते हुए तथा प्रभावी तरीके से परफॉर्म करने के बावजूद उनके वोट ज्यादा बढ़े क्यों नहीं - और दूसरी तरफ नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ कनेक्ट होने की चुनौती उनके सामने है । संजय अग्रवाल के नजदीकियों और समर्थकों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की चुनौतियों का उन्हें आभास है, और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा पहले से कर दी है ।