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Monday, June 15, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नीतिगत तथा प्रशासनिक फैसलों को कॉपी और पेस्ट करके, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी फर्म की वेबसाइट के जरिये पहुँचाने का काम करने के चलते सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रमोद जैन आरोपों में घिरे

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने' की सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रमोद जैन की लगातार की जा रही कार्रवाईयों को लेकर इंस्टीट्यूट में कई बार शिकायतें की गई हैं, लेकिन लगता है कि प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता सहित इंस्टीट्यूट के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की प्रमोद जैन को रोकने/टोकने की हिम्मत नहीं हो रही है - या प्रमोद जैन उनके रोकने/टोकने को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । प्रमोद जैन को जानने वाले लोगों को हैरानी इस बात की है कि प्रमोद जैन जैसा व्यक्ति ऐसी टुच्ची सी हरकत कर क्यों रहा है ? उन्हें जानने वाले लोगों का पूछने के अंदाज में कहना है कि प्रमोद जैन भले व्यक्ति हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में वह जेनुइन तरीके से काम करते हैं, उनके पास एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर है, उनके साथ काम करने वाले लोगों की अच्छी टीम है - उसके बावजूद वह इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने' का 'ठगी' किस्म का काम क्यों कर रहे हैं ? कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को शिकायत है कि इंस्टीट्यूट के नीतिगत संबंधी फैसलों की घोषणा को वह जिस तरह से अपनी फर्म के बैनर से प्रचारित करते हैं, वह नैतिक मापदंडों के अनुरूप नहीं है - और प्रमोद जैन जैसे जिम्मेदार व्यक्ति से इसकी उम्मीद नहीं की जाती है । प्रमोद जैन खुद इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य हैं - इस नाते तो उन्हें ऐसी हरकत बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तमाम शिकायतों और आरोपों के बाद भी प्रमोद जैन इंस्टीट्यूट के 'सामान' पर कब्जा करने का 'अपना काम' जारी रखे हुए हैं ।
इंस्टीट्यूट के 'सामान' को अपने 'सामान' के रूप में 'दिखाने का प्रमोद जैन का खेल बड़ा आसान-सा है - इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक फैसलों के जो पीडीएफ प्रसारित होते हैं, प्रमोद जैन उन्हें कॉपी करके, अपनी फर्म की वेबसाइट पर पेस्ट कर लेते हैं - और फिर अपनी वेबसाइट की उक्त पोस्ट के लिंक सोशल मीडिया में शेयर करते हैं । ऐसा करके, प्रमोद जैन लोगों के बीच यह दिखाने/जताने का करतब करते हैं कि उक्त नीतिगत और या प्रशासनिक फैसला उनकी फर्म के सौजन्य से लोगों के सामने आ रहा है । इस तरह, इंस्टीट्यूट के 'सामान' को प्रमोद जैन पहले तो कॉपी और पेस्ट करके अपना बना लेते हैं, और फिर सोशल मीडिया के अपने प्लेटफॉर्म्स के जरिये लोगों के बीच उसे अपने 'सामान' के रूप में प्रस्तुत करते हैं -  यानि 'हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा चोखा।' कई मौकों पर वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने भी कहा कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए तो प्रमोद जैन का ऐसा करना शोभा नहीं देता है; उन्हें लोगों तक इंस्टीट्यूट के नीतिगत और प्रशासनिक फैसले पहुँचाने का काम करना ही है - तो सीधे इंस्टीट्यूट के लिंक ही भेजने चाहिए । यह तो कंफर्म नहीं है कि वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के यह सुझाव प्रमोद जैन तक पहुँचे या नहीं, लेकिन यह कंफर्म है कि प्रमोद जैन ने इंस्टीट्यूट के 'सामान' पर अपनी फर्म का ठप्पा लगा कर उसे अपने 'सामान' के रूप में लोगों के बीच प्रस्तुत करना जारी रखा हुआ है ।   
प्रमोद जैन की निरंतर जारी इस हरकत को लेकर इंस्टीट्यूट में शिकायतें भी की गई हैं, लेकिन उनका भी कोई असर नहीं हुआ है । मजे की बात यह है कि प्रमोद जैन के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि प्रमोद जैन यह जो कर रहे हैं, इसमें किसी नियम-कानून का उल्लंघन भले ही न हो रहा हो - लेकिन नैतिकता के तकाजे के तहत यह गलत है, और प्रमोद जैन को ऐसा नहीं करना चाहिए; इसके बावजूद, लेकिन प्रमोद जैन का कार्यक्रम जारी है । प्रमोद जैन के समर्थकों और शुभचिंतकों का ही कहना और बताना है कि प्रमोद जैन के इस कार्यक्रम से उनकी अच्छी-भली साख पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है, लेकिन फिर भी प्रमोद जैन पता नहीं किस स्वार्थ में इस कार्यक्रम को जारी रखे हुए हैं ?    

Friday, March 13, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ बढ़ती नाराजगी तथा अतुल गुप्ता की सीट के खाली होने के कारण अगले वर्ष होने वाले चुनाव में कुछेक बनिया उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी करता देख सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता को अभी से अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए सक्रिय होना जरूरी लगा है 

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का सदस्य बनने के एक वर्ष के अंदर ही संजीव सिंघल तथा प्रमोद जैन के प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की बढ़ती नाराजगी ने इनके नजदीकियों और समर्थकों को अगले चुनाव में इनकी जीत के प्रति सशंकित कर दिया है, और उन्हें लग रहा है कि इसी का फायदा उठाने के लिए सुधीर अग्रवाल व विजय गुप्ता ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है । संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ आम शिकायत है कि यह फोन ही नहीं उठाते हैं, और कॉल बैक भी नहीं करते हैं । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तो छोड़िये, वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रति भी इनका यही रवैया है । संजीव सिंघल के मामले में तो उनके समर्थक रहे वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट गिरीश आहुजा तक को लोगों की शिकायतें सुनना पड़ रही हैं । भुक्तभोगियों का कहना/बताना है कि संजीव सिंघल के रवैये पर गिरीश आहुजा ने भी नाराजगी दिखाई/जताई है, और लोगों के बीच माना है कि संजीव सिंघल के इस रवैये के चलते उनकी साख व विश्वसनीयता को चोट पहुँची है । दरअसल कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने गिरीश आहुजा को उलाहना दिया कि 'हमने तो आपकी सिफारिश पर' संजीव सिंघल को वोट दिया था; हमें विश्वास था कि 'आप' जिसकी सिफारिश कर रहे हैं, चुनाव जीतने के बाद वह हमारी मुश्किलों व समस्याओं को हल करने/करवाने में दिलचस्पी लेंगे - लेकिन संजीव सिंघल तो फोन भी नहीं उठाते हैं । कुछेक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि उन्हें तो गिरीश आहुजा के हस्तक्षेप करने के बाद संजीव सिंघल की तरफ से कॉल आई । प्रमोद जैन के 'शिकार' लोगों की तो समस्या यह भी है कि वह शिकायत भी करें तो किस से करें ?
उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में संजीव सिंघल को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, और प्रमोद जैन विजेता 6 उम्मीदवारों में तीसरे नंबर पर रहे थे । इन्हें जो छप्परफाड़ जीत मिली थी, उसकी दूसरों को तो क्या - खुद इन्हें भी उम्मीद नहीं थी । ठीक इसी तरह से, दूसरों को तो क्या, खुद इन्हें भी उम्मीद नहीं रही होगी कि भारीभरकम जीत हासिल करने के एक वर्ष के भीतर ही इन्हें वोट देने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इनके खिलाफ शिकायतें करने लगेंगे । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की शिकायतों को सुनते/देखते हुए वह कहावत चरितार्थ होती हुई लग रही है कि 'जो जितनी तेजी से ऊपर चढ़ता है, वह उससे ज्यादा तेज गति से नीचे उतरता है ।' संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के प्रति मुखर होती शिकायतों ने सुधीर गुप्ता और विजय गुप्ता को अभी से चुनावी तैयारी शुरू करने के लिए प्रेरित किया है, और उनकी तरफ से अपने समर्थकों को सक्रिय करने तथा नए समर्थक खोजने/बनाने का काम शुरू होने की चर्चा है । पिछले चुनाव में सुधीर अग्रवाल करीब डेढ़ सौ वोटों की कमी के चलते सेंट्रल काउंसिल में आने से रह गए थे, और विजय गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट खोना पड़ी थी । इन दोनों को उम्मीद है कि संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ लोगों की नाराजगी जिस तरह से बन/बढ़ रही है, और खासी मुखर हो रही है, उसके कारण इन्हें वोटों का भारी नुकसान होगा; इन्हें होने वाले नुकसान का फायदा उठाने के लिए अगले वर्ष होने वाले सेंट्रल काउंसिल चुनाव के लिए सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता को अभी से सक्रिय होने की जरूरत लग रही है ।
दरअसल, संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के वोटों में कमी होने के आकलन तथा अतुल गुप्ता की सीट के खाली होने के कारण अगले वर्ष होने वाले चुनाव में कुछेक बनिया उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की संभावना व्यक्त की जा रही है । चुनावी अनुभव के कारण, सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता का पलड़ा अगले चुनावों के संदर्भ में भारी तो दिखता है, लेकिन कोई नया उम्मीदवार आ कर इनका 'खेल' बिगाड़ न दे - संभवतः इसलिए ही इन्हें अभी से सक्रिय होना जरूरी लगा होगा । संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के कुछेक समर्थकों को हालाँकि लगता है कि इनके रवैये से लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी के चलते, हो सकता है कि इन्हें मिलने वाले वोटों में कुछ कमी हो जाये - लेकिन अपनी सीट निकालना इनके लिए मुश्किल नहीं होगा । कुछेक समर्थकों का यह भरोसा, लेकिन पिछले चुनाव में विजय गुप्ता और संजय वासुदेवा के साथ घटी 'घटना' को याद करते हुए ज्यादा भरोसे का नहीं रह जाता है । पिछले चुनाव में, सेंट्रल काउंसिल में होने के बावजूद विजय गुप्ता और संजय वासुदेवा का अपनी अपनी सीटों को न बचा पाना इस बात का सुबूत है कि सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होना जीत की गारंटी नहीं है । और फिर, विजय गुप्ता व संजय वासुदेवा के खिलाफ तो वैसी मुखर नाराजगी भी नहीं दिखती थी, जैसी कि संजीव सिंघल व प्रमोद जैन के प्रति दिख रही है । देखना दिलचस्प होगा कि संजीव सिंघल और प्रमोद जैन अपने खिलाफ बढ़ती नाराजगी को सचमुच खतरे के रूप में देखेंगे और अपने व्यवहार में सुधार करेंगे - या छप्परफाड़ जीत के 'नशे' में आश्वस्त रहेंगे और लोगों की नाराजगी की परवाह नहीं करेंगे ?

Sunday, December 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं - और यही बात प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के लिए खतरे की घंटी बजाती है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चॉर्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए हुए चुनाव में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला फैसला संजय वासुदेवा की पराजय का रहा । हालाँकि सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह, वेस्टर्न रीजन में मंगेश किनरे, और नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के साथ-साथ विजय गुप्ता भी सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा पाने में नाकाम रहे हैं - लेकिन संजय वासुदेवा की पराजय ने हर किसी को आश्चर्य में डाला है । दरअसल नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के पिता एससी वासुदेवा का खासा नाम है । उनके पिता द्वारा स्थापित फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी को प्रोफेशन में बिग फोर फर्म्स जैसी 'हैसियत' प्राप्त है, और पूरे रीजन के हर प्रमुख शहर में उनके लाभार्थियों की अच्छी-खासी संख्या मौजूद है । एससी वासुदेवा चूँकि खुद भी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं, और सेंट्रल काउंसिल में सदस्य भी रहे हैं - इसलिए उनकी प्रोफेशनल हैसियत का एक राजनीतिक आयाम भी रहा है; जिसका फायदा संजय वासुदेवा को पिछले चुनाव में मिला था । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में संजय वासुदेवा का रिकॉर्ड कोई बहुत सक्रियता भरा तो नहीं रहा, लेकिन उनके खिलाफ कहीं कोई आवाज भी नहीं पैदा हुई - इसलिए माना/समझा जा रहा था कि वह अपनी सीट आसानी से बचा लेंगे । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खानदानी परंपरा का सम्मान करने का रिवाज चूँकि है, जिसके चलते नवीन गुप्ता और नीलेश विकमसे जैसे लोग भी चुनाव जीतते गए और प्रेसीडेंट तक बन गए; और जिस रिवाज के चलते अभी संपन्न हुए चुनाव में वेस्टर्न रीजन में अनिकेत तलति तक सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत गए - उसी रिवाज के भरोसे संजय वासुदेवा के भी जीतने का विश्वास सभी को था । संजय वासुदेवा की चुनावी स्थिति को फायदा पहुँचाने वाली एक बड़ी बात इसी वर्ष अप्रैल में यह हुई थी कि उनकी फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी तथा एक और बड़ी फर्म एसपी पुरी एंड कंपनी का विलय हुआ था, जिसके चलते माना/समझा जा रहा था कि संजय वासुदेवा की राजनीतिक ताकत और बढ़ी है । लेकिन फिर भी संजय वासुदेवा हार गए । वैसे संजय वासुदेवा यदि जीत जाते तो सेंट्रल काउंसिल में एक दिलचस्प नजारा यह बनता कि चरनजोत सिंह नंदा तथा अनुज गोयल को ऐसे सदस्यों के रूप में पहचान मिलती जिन्होंने पिता एससी वासुदेवा के साथ 19वीं काउंसिल में संगत की थी और अब 24वीं काउंसिल में पुत्र संजय वासुदेवा के साथ वह संगत करते ।
'जो जीता वह सिकंदर, बाकी सब बंदर' की तर्ज पर जीतने वालों को बड़ा जेनुइन व काबिल तथा हारने वालों को बेईमान व नाकारा मानने/बताने की सड़कछाप प्रवृत्ति की बजाये यदि गंभीरता के साथ चुनावी नतीजों का विश्लेषण करें, तो प्राप्त चुनावी नतीजे कोई 'पैटर्न' नहीं पेश करते हैं । चुनावी नतीजों में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं । सेंट्रल काउंसिल का यह परिदृश्य संसद के उस परिदृश्य की याद दिलवाता है, जिसमें अटलबिहारी वाजपेयी के साथ फूलन देवी भी होती है । संसदीय चुनावों के मतदाताओं के बारे में कहा/माना जाता है कि उनमें बहुत से लोग अनपढ़ व भावुक व लालची होते हैं, जिसका फायदा फूलन देवी जैसे लोग उठा लेते हैं; लेकिन इंस्टीट्यूट के चुनावों के मतदाता तो पढ़े-लिखे जागरुक लोग होते हैं तथा प्रोफेशन में होने वाली ऊँच/नीच और काउंसिल सदस्यों की क्षमताओं व उनकी कारस्तानियों को नजदीक से देखते/पहचानते रहते हैं - फिर भी वह फूलन देवी किस्म के उम्मीदवारों को क्यों चुन लेते हैं ? इस 'क्यों' का जबाव मिलना आसान नहीं है, लेकिन फिर भी यह 'क्यों' इंस्टीट्यूट के सदस्य चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समझ व जागरुकता तथा प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है । यह ठीक है कि किसी भी चुनाव में मतदाताओं को प्रायः 'बुरे' और 'कम बुरे' में से ही चुनने का विकल्प मिलता है; और 'कम बुरे' की तुलना में 'बुरे' उम्मीदवार मतदाताओं की आँखों में धूल झोंकने में ज्यादा होशियार साबित होते हैं - लेकिन ऐसी ही होशयारियों के बीच मतदाताओं के विवेक और उनकी समझदारी की परीक्षा होती है । ऐसे में, माना/कहा जा सकता है कि प्रोफेशन के लोग यदि संजय वासुदेवा की बजाये राजेश शर्मा व चरनजोत सिंह नंदा जैसे लोगों को तरजीह देते हैं, तो प्रोफेशन की विश्वसनीयता व प्रतिष्ठा को बनाये/बचाये रखने का काम ईश्वर भी नहीं कर सकेगा - क्योंकि माना/कहा जाता है कि ईश्वर भी उन्हीं को बचाने में मदद करता है, जो खुद को बचाने का प्रयास करते हैं ।
सेंट्रल काउंसिल के चुनावी नतीजे कुछ महत्त्वपूर्ण सबक भी देते हैं । संजय वासुदेवा की पराजय में उनके अति-आत्मविश्वास का भी योगदान है । चुनावी राजनीति में मतदाता के पास जाने के काम को एक बहुत जरूरी काम के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिस पर संजय वासुदेवा ने ध्यान नहीं दिया । दूसरों की तरह वह भी इस भरोसे रहे कि उनके पिता और उनकी फर्म का जो आभामंडल है, वही उन्हें चुनाव जितवा देगा - और धोखा खा बैठे । चुनाव को चुनौती की तरह लेने का काम सिर्फ दो लोगों ने किया - संजीव सिंघल और हंसराज चुग ने; और दोनों को अच्छे/खासे वोट मिले । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों को भी इतनी बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं थी - यदि होती तो उनके एक बड़े समर्थक के रूप में गिरीश आहुजा जैसे बड़े व्यक्ति को छोटी छोटी जगहों पर भी अपनी फजीहत नहीं कराना पड़ती । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जिस तरह से हर हथकंडा अपनाया, उसका उन्हें अच्छा सुफल भी मिला । हंसराज चुग के साथ कोई बड़ा नाम तो नहीं था, लेकिन छोटे छोटे ग्रुपों और नेताओं के बीच प्रभावी तालमेल बना कर उन्होंने अपने चुनाव अभियान को जिस तरह से संयोजित किया, उससे लगा कि उन्होंने हर चुनावी जरूरत का ध्यान रखा और खतरे वाली हर जगह पर ध्यान दिया और वहाँ हालात को साधने की कोशिश की - और अच्छा नतीजा पाया । संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता की सीट को भी कोई खतरा नहीं समझा/पहचाना जा रहा था, लेकिन संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता अति-आत्मविश्वास का शिकार नहीं हुए । अतुल गुप्ता को जो झटके लग रहे थे, वह उन्हें कोई बड़ा नुकसान पहुँचाते हुए नहीं दिख रहे थे, लेकिन फिर भी उन्होंने झटकों से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के पुरजोर इंतजाम किए और जिनके चलते वह अपनी सीट बचा सकने में सफल रहे । विजय गुप्ता ने संजय वासुदेवा जैसी लापरवाही तो नहीं दिखाई, किंतु अतुल गुप्ता जैसी होशियारी भी वह नहीं दिखा सके; उन्होंने बँधे/बँधाये फार्मूले पर काम किया, जिसके तहत वह चुनाव से कुछ पहले सक्रिय हुए और उसमें भी उन्होंने खतरे वाली जगहों को पहचानने की जरूरत नहीं समझी - हंसराज चुग, प्रमोद जैन, सुधीर अग्रवाल की तरफ से मिलने वाली चुनौती को समझने/पहचानने में वह चूक कर बैठे और अपनी सीट गँवा बैठे । चुनावी नतीजों ने यह बात भी स्पष्ट कर दी है कि सिर्फ ज्ञान बाँट कर और या सिर्फ पार्टियाँ आयोजित करके ही चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं, जो लोग इन दोनों चीजों में बेहतर तालमेल बनायेंगे - जीत उन्हीं को मिलेगी ।

Wednesday, May 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के द्वारका स्टडी सर्किल में स्पीकर का पद 'बेचने' के आरोप के चलते स्टडी सर्किल, ब्रांचेज और रीजनल काउंसिल के सेमिनार्स में उम्मीदवारों को स्पीकर बनाने का 'धंधा' एक बार फिर प्रोफेशन के लोगों के बीच चर्चा में

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के द्वारका स्टडी सर्किल में पैसे लेकर संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को स्पीकर बनाए जाने के आरोप की इंस्टीट्यूट में शिकायत हो जाने से रीजनल काउंसिल, ब्रांचेज व स्टडी सर्किल द्वारा आयोजित कराये जाने वाले सेमिनार्स में पैसे लेकर उम्मीदवारों को स्पीकर बनाए जाने का आरोप एक बार फिर गर्माता हुआ दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के प्रत्येक चुनाव में यह आरोप जोरशोर से उठता है, और इसके चलते हर बार यह माँग उठती है कि चुनावी वर्ष में होने वाले सेमिनार्स में उन लोगों को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किए जाने पर रोक लगनी चाहिए, जिन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी हो । चुनाव के बाद लेकिन हर कोई इस माँग को भूल जाता है, और फिर मामला जहाँ का तहाँ ही बना रहता है । कई बार रीजनल काउंसिल, ब्रांचेज व स्टडी सर्किल के सदस्य सेमिनार्स में उम्मीदवारों को स्पीकर के रूप में बुलाये जाने का विरोध करते हैं, लेकिन सेमिनार्स के आयोजक उनकी सुनते ही नहीं हैं । लोगों का आरोप है कि उम्मीदवार आयोजकों पर तरह तरह से दबाव बना कर सेमिनार्स में अपने आपको आमंत्रित करने/करवाने के लिए 'मजबूर' कर ही लेते हैं । दरअसल उम्मीदवारों को लगता है कि सेमिनार्स में स्पीकर के रूप में शामिल होने से उन्हें लोगों तक पहुँचने का एक आसान और प्रभावी मौका मिल जाता है । वह अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए अपनी तरफ से मीटिंग या कार्यक्रम आयोजित करने के झँझट में पड़े, इसकी तुलना में सेमिनार्स में स्पीकर बन जाना उन्हें बढ़िया और 'सस्ता' सौदा लगता है । आरोप सुने जाते रहे हैं कि इसके लिए उम्मीदवार सेमिनार्स के आयोजकों की जेबें भी भरते हैं ।
अभी हाल ही में हुए सेमीनार में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किए जाने को लेकर द्वारका स्टडी सर्किल ऐसे ही आरोप के घेरे में आ फँसा है । इंस्टीट्यूट को लिखे/भेजे एक शिकायती पत्र में कहा/बताया गया है कि द्वारका स्टडी सर्किल के ही कुछेक लोगों ने संयोजक रतन सिंह यादव को समझाया था कि वह सेमीनार में स्पीकर के रूप में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को आमंत्रित न करें, क्योंकि उससे नाहक ही स्टडी सर्किल की बदनामी होगी । उन लोगों का कहना था कि बेशक संजीव सिंघल और प्रमोद जैन अपने अपने विषय के एक्सपर्ट हैं, लेकिन चूँकि उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी घोषित की हुई है - इसलिए सेमीनार में स्पीकर के रूप में उन्हें बुलाने से विवाद होगा और इस विवाद से बचने के लिए स्पीकर के रूपमें ऐसे लोग आमंत्रित किये जाएँ जो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सीधे सीधे हिस्सेदार नहीं हैं । शिकायती पत्र के अनुसार, लेकिन रतन सिंह यादव ने किसी की नहीं सुनी और मनमाने तरीके से संजीव सिंघल व प्रमोद जैन को स्पीकर के रूप में आमंत्रित करने के अपने फैसले पर वह अड़े रहे । मजे की बात यह रही कि सेमीनार में शामिल होने आये लोगों ने भी रतन सिंह यादव से कहा कि स्पीकर बनाये जाने के ऐवज में तुमने जब संजीव सिंघल और प्रमोद जैन से पैसे लिए ही हैं, तो सेमीनार फीस के रूप में प्रत्येक से छह सौ रुपए क्यों ले रहे हो ? कार्यक्रम के दौरान होने वाली इस तरह की चर्चाओं को रतन सिंह यादव ने अनसुना करने में ही भलाई देखी और कार्यक्रम के दौरान इस मामले में वह लगातार चुप ही बने रहे ।
कार्यक्रम के दौरान होने वाली चर्चाओं को तो रतन सिंह यादव ने अनसुना कर दिया, लेकिन इस संबंध में इंस्टीट्यूट में की गई शिकायत से मामला गर्म हो गया है । शिकायत में माँग की गई है कि द्वारका स्टडी सर्किल की जिम्मेदारी रतन सिंह यादव से वापस ली जाए और यह सुनिश्चित किया जाये कि आगे किसी सेमीनार में किसी उम्मीदवार को स्पीकर के रूप में नहीं बुलाया जायेगा । रतन सिंह यादव के प्रति-आरोपों ने भी मामले को गर्माने में मदद की । उनकी तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी घोषित करने वाले कुछेक उम्मीदवार उनके पीछे पड़े हुए थे कि वह उन्हें स्पीकर बनाएँ, और चूँकि उन्हें स्पीकर बनने का मौका नहीं मिला - इसलिए वही लोग अब इस तरह के आरोप लगा कर उन्हें बदनाम करने का काम कर रहे हैं । उनकी इस सफाई से लोगों के बीच यह चर्चा और छिड़ गई है कि रतन सिंह यादव ने स्पीकर बनने के लिए उनके पीछे पड़े उम्मीदवारों को स्पीकर न बना कर संजीव सिंघल व प्रमोद जैन को ही स्पीकर आखिर क्यों बनाया ? लोग यह भी माँग कर रहे हैं कि रतन सिंह यादव को उन उम्मीदवारों के नाम भी बताना चाहिए, जो सेमीनार में स्पीकर बनने के लिए उनके पीछे पड़े थे । द्वारका स्टडी सर्किल के सेमीनार को लेकर छिड़े विवाद के संदर्भ में कई लोगों का यह भी मानना/कहना है कि यह सिर्फ इसी स्टडी सर्किल की बात नहीं है, कई स्टडी सर्किल और ब्रांचेज के पदाधिकारी तथा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी तक उम्मीदवारों को स्पीकर बनाने के 'धंधे' में लगे हुए हैं, और इंस्टीट्यूट को इस धंधे को रोकने के लिए जल्दी ही कुछ नियम बनाने चाहिएँ ।

Friday, May 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत प्रमोद जैन की उम्मीदवारी का चुनावी रास्ता, बैंक के झमेले में फँसे विनोद जैन की 'बदनामी' के कारण काँटों भरा हो गया दिख रहा है

नई दिल्ली । विनोद जैन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से बाहर होने के 'कारण' प्रमोद जैन को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का जो मौका मिला है, वही कारण प्रमोद जैन की उम्मीदवारी के लिए चुनौती और मुसीबत बन गया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को विनोद जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत/घोषित होने का इंतजार था; लेकिन इंतजार करने वाले लोगों को यह जानकर तगड़ा झटका लगा कि विनोद जैन तो एक बैंक खोलने की कोशिशों में लगे हैं और उसके लिए अनुमति प्राप्त करने की तिकड़मों में लगे हुए हैं । ऐसे में, लोगों के बीच यह माथापच्ची हो ही रही थी कि यदि विनोद जैन नहीं, तो फिर उनके ग्रुप का कौन सा सदस्य सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए आयेगा - कि प्रमोद जैन का नाम सामने आ गया । प्रमोद जैन को उस ग्रुप के एक अत्यंत सक्रिय सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, जिस ग्रुप के उम्मीदवार के रूप में विनोद जैन पिछले कई वर्षों से उम्मीदवार बनते तथा जीतते व हारते रहे हैं । ग्रुप के लोगों में प्रमोद जैन को प्रोफेशन के साथ सचमुच में जुड़े व्यक्ति के रूप में मान्यता मिलती रही है, और इसी मान्यता के चलते लोगों को हैरानी भी रही कि प्रमोद जैन जैसे 'पढ़े-लिखे' और प्रोफेशन में ईमानदारी के साथ जुड़े व्यक्ति विनोद जैन के साथ क्यों 'रहते' हैं । विनोद जैन की उम्मीदवारी की अनुपस्थिति में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रमोद जैन को उम्मीदवार होने का मौका मिला, जिससे यह भी साबित हुआ कि प्रमोद जैन, ग्रुप में विनोद जैन के बड़े खास हैं । विनोद जैन के साथ 'दिखती' यह नजदीकी ही प्रमोद जैन के लिए मुसीबत बनी है । 
उल्लेखनीय है कि विनोद जैन की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच यूँ भी कोई अच्छी छवि नहीं थी, बैंक वाले किस्से ने तो उनकी छवि को और भी नकारात्मक बना दिया है । मीडिया रिपोर्ट्स में भी बैंक खोलने की विनोद जैन की कोशिशों को आश्चर्य व संदेह के साथ देखा गया है । मीडिया रिपोर्ट्स में विनोद जैन को एक 'लो प्रोफाइल चार्टर्ड एकाउंटेंट' के रूप में पहचानते हुए प्रस्तावित बैंक के लिए आवश्यक पूँजी की उपलब्धता को लेकर संदेह और सवाल खड़े किए गए । संदेहों और सवालों को बढ़ाने का काम विनोद जैन के रवैये ने भी किया । मीडिया रिपोर्ट्स में कहा/बताया गया है कि विनोद जैन ने आवश्यक पूँजी के बाबत पूछे गए सवालों से हमेशा ही बचने की कोशिश की और कभी भी पूँजी सोर्सेज के बारे में जबाव नहीं दिया । इससे मीडिया में अनुमान लगाया गया कि प्रस्तावित बैंक के लिए आवश्यक पूँजी विनोद जैन अपनी जेब से ही लगायेंगे । मीडिया रिपोर्ट्स के संदेहों, सवालों और अनुमानों के आधार पर ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा बनी और बढ़ी कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में विनोद जैन ने मोटा माल बनाया है, और उसी माल से अब वह बैंक खोल रहे हैं । विनोद जैन को लेकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चल रही यह चर्चा ही प्रमोद जैन की उम्मीदवारी के लिए बड़ी चुनौती बनी है । 
प्रमोद जैन के लिए चुनौती और मुसीबत की बात यह है कि अपने चुनाव अभियान के लिए उन्हें विनोद जैन पर ही निर्भर रहना है । चुनावी राजनीति के समीकरणों को समझने/साधने का जो अनुभव विनोद जैन को है, प्रमोद जैन स्वाभाविक रूप से उसका फायदा उठाना ही चाहेंगे और इसके लिए अपनी उम्मीदवारी का झंडा विनोद जैन के हाथों में सौंपना ही उन्हें सुविधाजनक लगेगा । विनोद जैन की 'बदनामी' को देखते हुए प्रमोद जैन का ऐसा करना आत्मघाती ही होगा । समस्या यह भी है कि विनोद जैन की 'बदनामी' के कारण प्रमोद जैन उन्हें अपने चुनाव-अभियान से यदि दूर रखते हैं तो विनोद जैन इसका बुरा मान सकते हैं और तब प्रमोद जैन के लिए अपने ग्रुप के लोगों का समर्थन जुटाना/पाना ही मुश्किल हो जायेगा - क्योंकि ग्रुप में तो विनोद जैन की ही पकड़ है । यानि प्रमोद जैन यदि अपने चुनाव अभियान में विनोद जैन का सहयोग व संग-साथ लेते हैं, तो मुसीबत में फँसते हैं; और यदि नहीं लेते हैं, तो आफत को आमंत्रित करते हैं । 
प्रमोद जैन के लिए यह स्थिति विडंबनापूर्ण इसलिए है क्योंकि लोगों के बीच उनकी अपनी छवि बहुत अच्छी है । प्रोफेशन के साथ उनका गहरा और जेनुइन लगाव है, इसलिए लोगों को उम्मीद और विश्वास है कि प्रमोद जैन यदि सेंट्रल काउंसिल में आते हैं तो यह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही अच्छी बात होगी । कुछेक लोगों ने इन पँक्तियों लेखक से कहा भी है कि सेंट्रल काउंसिल में गैर प्रोफेशनल काम करने वाले और फर्जी एंट्री का काम करने वाले लोग हों - इससे अच्छा है कि प्रमोद जैन जैसे जेनुइन व प्रोफेशन को समझने वाले लोग हों । यह विडंबना ही है कि जिन प्रमोद जैन को लोग सेंट्रल काउंसिल में देखना चाहते हैं, और प्रमोद जैन को यह मौका जिन विनोद जैन के कारण मिला है - उन्हीं विनोद जैन के कारण प्रमोद जैन का चुनावी रास्ता काँटों भरा दिख रहा है । इस विडंबनापूर्ण स्थिति को प्रमोद जैन किस तरह हैंडल करते हैं, यह देखने की बात होगी ।