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Friday, May 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत प्रमोद जैन की उम्मीदवारी का चुनावी रास्ता, बैंक के झमेले में फँसे विनोद जैन की 'बदनामी' के कारण काँटों भरा हो गया दिख रहा है

नई दिल्ली । विनोद जैन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से बाहर होने के 'कारण' प्रमोद जैन को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का जो मौका मिला है, वही कारण प्रमोद जैन की उम्मीदवारी के लिए चुनौती और मुसीबत बन गया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को विनोद जैन की उम्मीदवारी प्रस्तुत/घोषित होने का इंतजार था; लेकिन इंतजार करने वाले लोगों को यह जानकर तगड़ा झटका लगा कि विनोद जैन तो एक बैंक खोलने की कोशिशों में लगे हैं और उसके लिए अनुमति प्राप्त करने की तिकड़मों में लगे हुए हैं । ऐसे में, लोगों के बीच यह माथापच्ची हो ही रही थी कि यदि विनोद जैन नहीं, तो फिर उनके ग्रुप का कौन सा सदस्य सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए आयेगा - कि प्रमोद जैन का नाम सामने आ गया । प्रमोद जैन को उस ग्रुप के एक अत्यंत सक्रिय सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, जिस ग्रुप के उम्मीदवार के रूप में विनोद जैन पिछले कई वर्षों से उम्मीदवार बनते तथा जीतते व हारते रहे हैं । ग्रुप के लोगों में प्रमोद जैन को प्रोफेशन के साथ सचमुच में जुड़े व्यक्ति के रूप में मान्यता मिलती रही है, और इसी मान्यता के चलते लोगों को हैरानी भी रही कि प्रमोद जैन जैसे 'पढ़े-लिखे' और प्रोफेशन में ईमानदारी के साथ जुड़े व्यक्ति विनोद जैन के साथ क्यों 'रहते' हैं । विनोद जैन की उम्मीदवारी की अनुपस्थिति में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रमोद जैन को उम्मीदवार होने का मौका मिला, जिससे यह भी साबित हुआ कि प्रमोद जैन, ग्रुप में विनोद जैन के बड़े खास हैं । विनोद जैन के साथ 'दिखती' यह नजदीकी ही प्रमोद जैन के लिए मुसीबत बनी है । 
उल्लेखनीय है कि विनोद जैन की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच यूँ भी कोई अच्छी छवि नहीं थी, बैंक वाले किस्से ने तो उनकी छवि को और भी नकारात्मक बना दिया है । मीडिया रिपोर्ट्स में भी बैंक खोलने की विनोद जैन की कोशिशों को आश्चर्य व संदेह के साथ देखा गया है । मीडिया रिपोर्ट्स में विनोद जैन को एक 'लो प्रोफाइल चार्टर्ड एकाउंटेंट' के रूप में पहचानते हुए प्रस्तावित बैंक के लिए आवश्यक पूँजी की उपलब्धता को लेकर संदेह और सवाल खड़े किए गए । संदेहों और सवालों को बढ़ाने का काम विनोद जैन के रवैये ने भी किया । मीडिया रिपोर्ट्स में कहा/बताया गया है कि विनोद जैन ने आवश्यक पूँजी के बाबत पूछे गए सवालों से हमेशा ही बचने की कोशिश की और कभी भी पूँजी सोर्सेज के बारे में जबाव नहीं दिया । इससे मीडिया में अनुमान लगाया गया कि प्रस्तावित बैंक के लिए आवश्यक पूँजी विनोद जैन अपनी जेब से ही लगायेंगे । मीडिया रिपोर्ट्स के संदेहों, सवालों और अनुमानों के आधार पर ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा बनी और बढ़ी कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में विनोद जैन ने मोटा माल बनाया है, और उसी माल से अब वह बैंक खोल रहे हैं । विनोद जैन को लेकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चल रही यह चर्चा ही प्रमोद जैन की उम्मीदवारी के लिए बड़ी चुनौती बनी है । 
प्रमोद जैन के लिए चुनौती और मुसीबत की बात यह है कि अपने चुनाव अभियान के लिए उन्हें विनोद जैन पर ही निर्भर रहना है । चुनावी राजनीति के समीकरणों को समझने/साधने का जो अनुभव विनोद जैन को है, प्रमोद जैन स्वाभाविक रूप से उसका फायदा उठाना ही चाहेंगे और इसके लिए अपनी उम्मीदवारी का झंडा विनोद जैन के हाथों में सौंपना ही उन्हें सुविधाजनक लगेगा । विनोद जैन की 'बदनामी' को देखते हुए प्रमोद जैन का ऐसा करना आत्मघाती ही होगा । समस्या यह भी है कि विनोद जैन की 'बदनामी' के कारण प्रमोद जैन उन्हें अपने चुनाव-अभियान से यदि दूर रखते हैं तो विनोद जैन इसका बुरा मान सकते हैं और तब प्रमोद जैन के लिए अपने ग्रुप के लोगों का समर्थन जुटाना/पाना ही मुश्किल हो जायेगा - क्योंकि ग्रुप में तो विनोद जैन की ही पकड़ है । यानि प्रमोद जैन यदि अपने चुनाव अभियान में विनोद जैन का सहयोग व संग-साथ लेते हैं, तो मुसीबत में फँसते हैं; और यदि नहीं लेते हैं, तो आफत को आमंत्रित करते हैं । 
प्रमोद जैन के लिए यह स्थिति विडंबनापूर्ण इसलिए है क्योंकि लोगों के बीच उनकी अपनी छवि बहुत अच्छी है । प्रोफेशन के साथ उनका गहरा और जेनुइन लगाव है, इसलिए लोगों को उम्मीद और विश्वास है कि प्रमोद जैन यदि सेंट्रल काउंसिल में आते हैं तो यह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही अच्छी बात होगी । कुछेक लोगों ने इन पँक्तियों लेखक से कहा भी है कि सेंट्रल काउंसिल में गैर प्रोफेशनल काम करने वाले और फर्जी एंट्री का काम करने वाले लोग हों - इससे अच्छा है कि प्रमोद जैन जैसे जेनुइन व प्रोफेशन को समझने वाले लोग हों । यह विडंबना ही है कि जिन प्रमोद जैन को लोग सेंट्रल काउंसिल में देखना चाहते हैं, और प्रमोद जैन को यह मौका जिन विनोद जैन के कारण मिला है - उन्हीं विनोद जैन के कारण प्रमोद जैन का चुनावी रास्ता काँटों भरा दिख रहा है । इस विडंबनापूर्ण स्थिति को प्रमोद जैन किस तरह हैंडल करते हैं, यह देखने की बात होगी । 

Monday, May 11, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी ने संजीव चौधरी, विजय गुप्ता, विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए एक साथ मुश्किलें तो खड़ी कर दी हैं; लेकिन खुद संजय वासुदेवा के लिए भी मामला उतना आसान नहीं दिख रहा है, जितना कि समझा जा रहा है

नई दिल्ली । एससी वासुदेवा ने अपने बेटे संजय वासुदेवा को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनवाने का बीड़ा जिस तरह उठा लिया है, उसके कारण उन्होंने संजीव चौधरी, विजय गुप्ता, विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए एक साथ मुश्किलें खड़ी कर दी हैं । एससी वासुदेवा का प्रोफेशन के लोगों के बीच जो ऑरा (आभामंडल) है तथा उन्होंने संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के पक्ष में जो सक्रियता दिखाई है; उसके चलते एक तरफ जहाँ संजीव चौधरी और विजय गुप्ता के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी मौजूदा सीट की रक्षा कर पाना मुश्किल हो गया है, वहीं दूसरी तरफ विनोद जैन और विशाल गर्ग के लिए सेंट्रल काउंसिल में घुसने का दरवाजा लोगों को और दूर हो गया लग रहा है । ऑडिट और कन्सल्टिंग क्षेत्र में नामी फर्म होने के नाते एससी वासुदेव का कंपनियों में जो वोट है, उस पर अच्छा प्रभाव है । संजीव चौधरी और विनोद जैन भी चूँकि कंपनियों के वोटों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए इनके सामने कंपनियों के वोटों के छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है । गौर करने वाला तथ्य यही है कि पिछली बार वासुदेवा खेमे का समर्थन मिलने के कारण ही संजीव चौधरी को जीत मिली थी; और संजीव चौधरी को वासुदेवा खेमे का समर्थन मिलने के कारण ही विनोद जैन सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट खो बैठे थे । इसीलिए लोगों को लग रहा है कि इस बार जब वासुदेवा खेमे से संजय वासुदेवा उम्मीदवार हो रहे हैं, तो विनोद जैन के लिए तो हालात और बुरे हो ही जाते हैं, संजीव चौधरी के लिए भी मुसीबत खड़ी हो जाती है । 
वासुदेवा फर्म का ब्राँच ऑफिस लुधियाना में होने के कारण लुधियाना तथा आसपास के शहरों में संजय वासुदेवा को अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है - यही उम्मीद विजय गुप्ता और विशाल गर्ग के लिए खतरे की घंटी बजाती है । उल्लेखनीय है कि विजय गुप्ता को पिछली बार लुधियाना से ही संजीवनी मिली थी; संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी और उनकी उम्मीदवारी को लुधियाना में मिलने वाले समर्थन की चर्चा ने विजय गुप्ता से वह संजीवनी छीन लेने का खतरा पैदा कर दिया है । विशाल गर्ग तो लुधियाना के भरोसे ही सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर रहे हैं । लोगों का पूछना लेकिन यह है कि लुधियाना में जब संजय वासुदेवा का डंका बजेगा, तब विशाल गर्ग के लिए बचेगा क्या ?
संजय वासुदेवा के लिए इस तरह ऊपरी तौर पर तो मामला बड़ा आसान लगता है, किंतु इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गणित तथा उसकी केमिस्ट्री को जानने/समझने वाले लोगों का यह भी मानना और कहना है कि संजय वासुदेवा के लिए मामला उतना आसान नहीं है, जितना कि समझा जा रहा है । संजय वासुदेवा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोगों के बीच उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है, वह एससी वासुदेवा के बेटे के रूप में ही पहचाने जाते हैं । यह सच है कि लोगों के बीच एससी सचदेवा की अच्छी साख, पहचान और प्रतिष्ठा है - किंतु इस साख, पहचान और प्रतिष्ठा को वोटों में बदलने का मैकेनिज्म भी उनके पास है, यह बात कोई भी विश्वास के साथ नहीं कह पा रहा है । वासुदेवा खेमे के एक प्रमुख सदस्य ने इन पँक्तियों के लेखक से साफ कहा कि एससी वासुदेवा के कारण संजय वासुदेवा को प्लेटफॉर्म तो अच्छा मिला है, लेकिन इस पर 'गाड़ी चलाने' का काम संजय वासुदेवा को ही करना पड़ेगा । वासुदेवा खेमे के जो बड़े नेता या लोग हैं, वह वास्तव में एससी वासुदेवा के साथ अपने को कनेक्ट करते हैं; उनका सक्रिय समर्थन संजय वासुदेवा को मिल सके - इसके लिए प्रयास संजय वासुदेवा को ही करने पड़ेंगे । यह प्रयास संजय वासुदेवा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सक्रिय राजनीति से वर्ष 2006 में एससी वासुदेवा के अलग होने के बाद से वासुदेवा खेमे के लिए 'अपने' उम्मीदवार को जितवा पाना और ला पाना मुश्किल हुआ है । 
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में वासुदेवा खेमे से सुनील अरोड़ा उम्मीदवार बने थे, लेकिन कामयाब नहीं हो सके थे; और उसके बाद  चुनावों में वासुदेवा खेमे से कोई उम्मीदवार नहीं आया । आरोप की शक्ल में चर्चा यह रही है कि खेमे का पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण सुनील अरोड़ा कामयाब नहीं हो सके थे, और बाद के चुनावों में भी खेमे का पर्याप्त समर्थन न मिलने के डर से ही खेमे से कोई उम्मीदवार नहीं बना । हालाँकि खुद सुनील अरोड़ा इस तरह की बातों को गलत और बेबुनियाद बताते रहे हैं । कई मौकों पर सुनील अरोड़ा ने कहा है कि 2006 में यदि वह कामयाब नहीं हो सके थे, तो इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार थे । एक तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने में बहुत देर लगा दी थी, और दूसरे फिर वह अपने चुनाव अभियान के लिए भी आवश्यक समय नहीं दे पाए थे । सुनील अरोड़ा के अनुसार, खेमे के नेताओं ने तो वर्ष 2006 में भी उनको भरपूर सहयोग व समर्थन दिया था, तथा वर्ष 2009 में भी उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए खूब प्रेरित किया था - लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण वह ही उम्मीदवार नहीं बने थे । अब कारण चाहें जो रहे हों, सच्चाई यही है कि इंस्टीट्यूट के पिछले तीन चुनावों में वासुदेवा खेमे की जो 'प्रत्यक्ष' अनुपस्थिति रही है, उससे जो गैप बना है उसकी भरपाई करने की चुनौती एक उम्मीदवार के रूप में संजय वासुदेवा के सामने हैं । 
संजय वासुदेवा के जो कुछेक समर्थक नवीन गुप्ता के उदाहरण के साथ तर्क देते हैं कि जिस तरह 'सिर्फ' एनडी गुप्ता के बेटे होने के नाते नवीन गुप्ता इंस्टीट्यूट का चुनाव जीत सकते हैं, उसी तरह संजय वासुदेवा भी एससी वासुदेवा के बेटे होने के कारण चुनाव जीत लेंगे; वह एक तथ्य मिस कर रहे हैं कि जब नवीन गुप्ता पहली बार उम्मीदवार बने थे, तब तक एनडी गुप्ता की राजनीतिक सक्रियता में कोई गैप नहीं बना था और उनका खेमा वेद जैन को कामयाब करवा चुका था । एक बड़ा फर्क और है तथा वह यह कि एनडी गुप्ता का लोगों के बीच जो इन्वॉल्वमेंट और या प्रभाव रहा है उसमें राजनीतिक पुट ज्यादा रहा है; जबकि एससी वासुदेवा का लोगों के बीच जो इन्वॉल्वमेंट और या प्रभाव रहा है, उसमें एकेडमिक व कैरियर वाला पुट ज्यादा रहा है । इस एकेडमिक व कैरियर वाले पुट को राजनीति में - सीधे सीधे कहें तो वोटों में बदलने का काम संजय वासुदेवा को ही करना पड़ेगा, जो नवीन गुप्ता को नहीं करना पड़ा था । नवीन गुप्ता को तो बिना कुछ किए-धरे, अपने पिताजी के भरोसे जीत मिल गई थी - लेकिन संजय वासुदेवा को शायद उतनी आसानी से जीत न मिल सके । एससी वासुदेवा इस बात को बखूबी समझ रहे हैं और इसीलिए उन्होंने खुद भी मोर्चा सँभाला है तथा अपनी तरफ से पहल करके अपने लोगों को संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय होने के लिए प्रेरित करने में लगे हैं । 
संजय वासुदेवा की उम्मीदवारी के समर्थकों ने विश्वास व्यक्त किया है कि संजय वासुदेवा निश्चित रूप से एक उम्मीदवार की जिम्मेदारी निभायेंगे और वासुदेवा खेमे में चुनावी राजनीति के खिलाड़ी जो नेता हैं उनके सहयोग से संजय वासुदेवा चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में कर लेंगे । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि अपनी उम्मीदवारी के समर्थकों के इस विश्वास को बनाये रखने के लिए संजय वासुदेवा क्या करते हैं और कैसे करते हैं ? 

Saturday, December 1, 2012

काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में नवीन गुप्ता फिसड्डी, तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल फर्स्ट

नई दिल्ली । नवीन गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाने के लिए उनके पापा ने तो दिन-रात एक किया हुआ है, लेकिन नवीन गुप्ता को काउंसिल की मीटिंग में शामिल होना ही पसंद नहीं है । नवीन गुप्ता के पापा एनडी गुप्ता से पूछा जाना चाहिए कि उनके बेटे को जब काउंसिल की मीटिंग्स में कोई दिलचस्पी ही नहीं है और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होना वह जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें काउंसिल में चुनवाने को लेकर वह इतना परेशान क्यों हो रहे हैं ? एनडी गुप्ता इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं; इस लिहाज से उनसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह अपने बेटे को काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहने की आवश्यकता और अहमियत बताते/समझाते । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति को लेकर नवीन गुप्ता का जो रिकार्ड है, उसे देख कर लगता है कि या तो उनके पापा ने उन्हें मीटिंग्स में उपस्थित होने की आवश्यकता और अहमियत बताई नहीं है और या पापा के बताये जाने के बावजूद उन्होंने उसे एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया है । यही कारण है कि फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच काउंसिल की कुल हुईं 15 मीटिंग्स में से नवीन गुप्ता नौ मीटिंग्स में गायब रहे ।
'रचनात्मक संकल्प' के पास फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच हुईं 15 मीटिंग्स का ब्यौरा है । नवीन गुप्ता इनमें से कुल छह मीटिंग्स में उपस्थित हुए । इन 15 में से जो 5 मीटिंग्स वर्ष 2011 तथा 2012 में हुईं हैं, उनमें से तो एक में भी नवीन गुप्ता शामिल नहीं हुए । यह जान कर हो सकता है कि उन लोगों की नाराजगी कुछ कम हो जाये, जिन्हें शिकायत रही है कि नवीन गुप्ता उनके फोन तक नहीं उठाते हैं और जरूरत पड़ने पर जिनसे संपर्क करना तक मुश्किल होता है । इस तरह की शिकायत रखने वाले लोगों को संतोष हो सकता है कि नवीन गुप्ता को जब काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उनके फोन उठाने में वह क्यों दिलचस्पी लें ? नवीन गुप्ता को पूरा हक़ है कि वह किसी के फोन न उठाये और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल न हों - लेकिन तब उन्हें और उनके पापा को लोगों को यह तो बताना ही चाहिए न कि उन्हें काउंसिल के लिए दोबारा क्यों चुना जाये ? स्कूल-कॉलिज तक में नियम है कि उपस्थिति कम होने पर छात्र को परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाता है । लेकिन इन बाप-बेटे ने इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की हैसीयत ऐसी बना दी है कि इसे स्कूल-कॉलिज से भी गई-बीती हालत में पहुँचा दिया है ।
इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ऐसी दशा करने के लिए अकेले यही बाप-बेटे जिम्मेदार नहीं हैं - कुछेक दूसरे काउंसिल सदस्यों का रिकॉर्ड भी नवीन गुप्ता से कुछ ही बेहतर है । संदर्भित 15 मीटिंग्स में चरनजोत सिंह नंदा कुल आठ में और पंकज त्यागी नौ में उपस्थित रहे । विनोद जैन ग्यारह मीटिंग्स में उपस्थित हुए, जबकि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल का 13 उपस्थिति के साथ रिकॉर्ड सबसे अच्छा रहा । अमरजीत चोपड़ा भी 13 मीटिंग्स में उपस्थित रहे । काउंसिल की मीटिंग्स का इस कारण से महत्त्व होता है कि उनमें खास मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है जिनके आधार पर नीतिगत फैसले होते हैं । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में फिसड्डी रहने के बावजूद अपनी सदस्यता को बचाये रखने के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वह जब काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहना जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें फिर से क्यों चुना जाये ?