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Monday, November 30, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए हालात के साथ-साथ हरियाणा व पंजाब की कई ब्रांचेज के पदाधिकारियों से मिल रहे समर्थन से संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग ही मुकाम मिला है और वह बाकी सब पर भारी साबित हो रहे हैं

नई दिल्ली । अतुल गुप्ता, संजीव चौधरी, नवीन गुप्ता और विजय गुप्ता को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए जिस तरह की जद्दोजहद करना पड़ रही है - उससे लोगों को लग रहा है कि संजय अग्रवाल की तो जैसे निकल पड़ी है और रीजन में सबसे ज्यादा वोट उन्हें ही मिलेंगे । संजय अग्रवाल जिस तरह विवादों से बचने में और अपने आप को विवादों से बचाए रखने में कामयाब रहे हैं, उसके चलते एक उम्मीदवार के रूप में उनका ऑरा(आभामंडल) तो बढ़ा ही - साथ ही उनका समर्थन आधार भी फैला है । विवादों व नकारात्मकता से बचे रहने से संजय अग्रवाल को दोतरफा फायदा हुआ - एक तरफ तो उनके पहले से जो समर्थक थे, वह उनके साथ ही न सिर्फ बने रहे बल्कि उनके पक्ष में और ज्यादा सक्रिय हुए; दूसरी तरफ, यह सब देख/जान कर बहुत बड़ी संख्या में नए लोग उनके साथ जुड़े । हरियाणा व पंजाब की कई ब्रांचेज के पदाधिकारी जिस तरह खुलकर संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं, और उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के काम में दिन-रात एक किए हुए हैं - उससे इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग ही मुकाम मिला है और वह बाकी सब पर भारी साबित हो रहे हैं । 
अपनी उम्मीदवारी के लिए एक अलग मुकाम बनाने तथा सब पर भारी साबित होने के लिए संजय अग्रवाल को किस्मत और परिस्थितियों का भी बहुत सहयोग/समर्थन मिला । यह एक दिलचस्प नजारा है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में वापसी के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों में एक संजय अग्रवाल को छोड़ कर बाकी सभी अपनी अपनी मुसीबतों में घिरे/फँसे हुए हैं, और उन्हें निहायत प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है । प्रायः सभी के मामलों में प्रतिकूल स्थितियाँ उनकी चूँकि खुद की बनाई हुई हैं, इसलिए उनसे निपटने में उन्हें जिस तरह की जद्दोजहद करना पड़ रही है - उसके कारण संजय अग्रवाल के लिए स्थितियाँ खासी अनुकूल हो उठी हैं । नवीन गुप्ता और संजीव चौधरी को अपने रूखे व्यवहार तथा लोगों से दूर दूर रहने का भुगतान भुगतना पड़ रहा है; तो अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता ने बेमतलब की लड़ाईयाँ मोल लेकर अपने अपने विरोधी खड़े कर लिए हैं और उनके निशाने पर बने हुए हैं । नवीन गुप्ता का रवैया देख/जान कर लोगों को लगता है कि वह सार्वजनिक जीवन जीने के लायक ही नहीं हैं, और उनके पिताजी ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्हें नाहक ही यहाँ फँसा दिया है । लोगों के बीच नवीन गुप्ता की खासी बुरी हालत को देख कर उनके पिता एनडी गुप्ता को खुद मोर्चा सँभालना पड़ा है और नवीन गुप्ता के रवैये से खफा लोगों की खुशामद व मिन्नतें करते हुए नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी को अपनी इज्जत का सवाल बनाना पड़ा है । संजीव चौधरी सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में इस 'नशे' में रहे कि बिग फोर का होने के चलते उन्हें लोगों के संपर्क में रहने की कोई जरूरत ही नहीं है, लेकिन अब चुनाव के मौके पर उन्होंने जब लोगों को उनके 'जैसा' रवैया अपनाते और उनकी उम्मीदवारी के प्रति बेरुखी दिखाते/जताते पाया तो उनके तो तोते ही उड़ गए हैं । नवीन गुप्ता को तो बचाने के लिए उनके पिताजी मैदान में आ गए; बेचारे संजीव चौधरी को तो बचने के लिए खुद ही हाथ-पैर मारने पड़ रहे हैं । संजीव चौधरी के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि दूसरे लोगों को तो छोड़िए, खुद बिग फोर कंपनियों के लोगों से उन्हें उचित सहयोग/समर्थन नहीं मिल पा रहा है, जिसके चलते कई लोगों को सेंट्रल काउंसिल की उनकी सीट जाती दिख रही है । 
अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता का मामला बिलकुल जुदा किस्म का है । दोनों लोग बहुत एनर्जेटिक हैं, बहुत महत्वाकांक्षी हैं, बड़ा विजन रखते हैं, लोगों के बीच रहना चाहते हैं और रहते भी हैं, मौका बनाने व मौकों का उपयोग करने का हुनर रखते हैं - एक बड़ा नेता 'बनने' के लिए जिन जिन खूबियों की जरूरत होती है, वह सब खूबियाँ इनमें जैसे कूट-कूट कर भरी हैं; लेकिन इन दोनों को एक बड़ा भारी 'शौक' दुश्मन बनाने व पालने का भी है, और इनका यही शौक अब इन्हें भारी पड़ रहा है । इनके बनाए और पाले दुश्मन इनके खिलाफ सक्रिय हुए पड़े हैं और इनके लिए मुसीबत खड़ी किए हुए हैं । इनमें विजय गुप्ता अनुभवी व होशियार हैं और उन्हें दुश्मनों से निपटने की कला भी आती है, लिहाजा उन्होंने तो अपने दुश्मनों को काफी हद तक काबू में कर लिया है - लेकिन अतुल गुप्ता ने अनुभवहीनता के चलते अपने भाई/भतीजों को आगे करके दबंगई से दुश्मनों से निपटने की जैसी जो कोशिश की, उससे बात सँभलने की बजाए बिगड़ और गई है । अतुल गुप्ता अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके खिलाफ लोगों ने खुले मोर्चे खोले हुए हैं और घोषित किया हुआ है कि उनकी सक्रियता का एकमात्र उद्देश्य अतुल गुप्ता को हराना है । मजे की, लेकिन साथ ही गंभीर बात यह है कि जिन लोगों ने अतुल गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है, उनमें ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो पीछे किसी न किसी रूप में अतुल गुप्ता के साथ जुड़े रहे हैं । इस कारण से अतुल गुप्ता के लिए चुनाव काफी टफ हो गया है । इंस्टीट्यूट के इस बार के चुनावी परिदृश्य में नाटकीय परिवर्तन यह हुआ है कि अभी कुछ दिन पहले तक जो विजय गुप्ता खतरे में देखे/पहचाने जा रहे थे, वह विजय गुप्ता तो खतरे से बाहर आते नजर आ रहे हैं; लेकिन जिन अतुल गुप्ता को सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़/दौड़ में गिना जा रहा था, लोगों को वही अतुल गुप्ता अब अपनी सीट खोते हुए नजर आ रहे हैं । 
नवीन गुप्ता, संजीव चौधरी, विजय गुप्ता व अतुल गुप्ता की जद्दोजहद ने संजय अग्रवाल के लिए हालात को अनुकूल बनाने का काम किया है । संजय अग्रवाल को सिर्फ हालात का ही फायदा नहीं मिला है, उन्होंने हालात का फायदा उठाने के लिए सुचिंतित किस्म के प्रयास भी किए - और चूँकि अपने प्रयासों में उन्होंने अपनी यूएसपी (यूनिक सेलिंग प्रोपोजीशन) को भी बचाए रखा, इसलिए उनकी स्थिति में गुणात्मक सुधार देखा गया । उनके प्रतिस्पर्द्धी दूसरे उम्मीदवारों के नजदीकियों व समर्थकों ने भी माना और कहा कि संजय अग्रवाल ने जिस तरह से पिछले छह वर्षों से काउंसिल सदस्य के रूप में लोगों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा हुआ है और प्राथमिकता के आधार पर लोगों के साथ जुड़े रहे हैं, उसके कारण उन्होंने अपनी एक भरोसेपूर्ण फॉलोइंग बनाई है । काउंसिल सदस्य के रूप में संजय अग्रवाल ने लिखने-पढ़ने पर ज्यादा जोर दिया है, और विशेष रूप से लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी रखने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच ही अपनी पैठ बनाई है । इसमें उन्हें लोगों से न तो झूठे व बड़बोले किस्म के वायदे करने पड़े और न फिर वायदों पर खरे न उतरने के चलते आलोचना का उन्हें शिकार होना पड़ा । इससे एक फायदा उन्हें अपने आप मिला और वह यह कि वह विवादों में नहीं फँसे । कभी जहाँ कहीं विवादों वाली स्थितियाँ आईं भी, तो वह या तो उनकी अनदेखी करते हुए और या उन्हें होशियारी के साथ हैंडल करते हुए उनसे बच निकले । काउंसिल सदस्य के रूप में अपनाई गई अपनी यूएसपी का उन्होंने अपने चुनाव अभियान में भी सख्ती से पालन किया और इस कारण विवादों से बचे रह पाने में कामयाब हुए । पिछले दिनों अपनी तीन पुस्तकों को उन्होंने लोगों के बीच जिस तरह से प्रस्तुत किया, उससे उनकी लिखने-पढ़ने वाली छवि व पहचान और समृद्ध ही हुई और एक उम्मीदवार के रूप में उनकी साख व विश्वसनीयता में और इजाफा ही हुआ । पुस्तकें प्रस्तुत करके हालाँकि कुछेक और उम्मीदवारों ने लोगों के बीच पैठ बनाने के प्रयास किए, लेकिन उनके प्रयास इतने घालमेल वाले रहे कि उनके प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं बन सका । संजय अग्रवाल की पुस्तकों की प्रस्तुति चूँकि उनकी यूएसपी के अनुरूप रही, इसलिए उनकी प्रस्तुति ने अच्छा प्रभाव जमाया । इसी प्रभाव में संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी औरों की उम्मीदवारी से आगे बढ़ गई है और माना जा रहा है कि नॉर्दर्न रीजन में उन्हें ही सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे । 

Saturday, December 1, 2012

संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में गिरीश आहुजा की सक्रियता ने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में खासी खलबली पैदा कर दी है

नई दिल्ली । गिरीश आहुजा ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाले चुनाव में संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके चुनावी माहौल को खासा गर्मा दिया है । संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में गिरीश आहुजा ने जिस तरह निरंतर अभियान चलाया है, उसे और उसके प्रभाव को देख/जान कर दूसरे उम्मीदवार हक्के-बक्के रह गए हैं, और उनके लिए यह समझ पाना मुश्किल हुआ है कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में लगे इस मास्टर स्ट्रोक से बने राजनीतिक माहौल में वह क्या करें ? कुछेक उम्मीदवारों ने कोशिश की कि गिरीश आहुजा उनके समर्थन में भी कहीं कुछ अच्छा कह दें, ताकि लोगों को यह बताया/दिखाया जा सके कि गिरीश आहुजा अकेले संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ ही नहीं हैं - बल्कि उनके साथ भी हैं । गिरीश आहुजा को इसके लिए राजी करने में असफल रहने के बाद उन्होंने चाल चली कि गिरीश आहुजा लोगों के बीच यह कह दें कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ उन्होंने पिछले दिनों जो प्लेटफॉर्म शेयर किया, वह उनकी एक बिजनेस और इंस्टीट्यूशनल एक्सरसाइज थी और उस एक्सरसाइज का सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से या संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी से कोई संबंध नहीं था । गिरीश आहुजा ने लेकिन ऐसा कुछ भी करने से साफ इंकार कर दिया और उनके इस इंकार ने स्पष्ट कर दिया कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में चलाया गया उनका अभियान एक सोचा-समझा अभियान है जिसे उन्होंने प्रोफेशनल तैयारी के साथ क्रियान्वित किया है ।
उल्लेखनीय है कि गिरीश आहुजा पहले भी सेंट्रल काउंसिल के चुनावों में कभी इस तो कभी उस उम्मीदवार का समर्थन करते और उन्हें जिताते रहे हैं - लेकिन अभी तक उन्होंने कभी भी सघन रूप से किसी उम्मीदवार के पक्ष में चुनावी अभियान नहीं चलाया । पहली बार, इस बार गिरीश आहुजा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के समर्थन में जैसा अभियान संयोजित किया है - उसने सभी को हैरान और सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों को परेशान किया है । पंजाब के विभिन्न प्रमुख शहरों में गिरीश आहुजा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ जो साझा मीटिंग्स कीं और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को संबोधित किया, उसने पूरे रीजन में अपना प्रभाव डाला । पूरे रीजन में प्रभाव इसलिए पड़ा, क्योंकि गिरीश आहुजा और संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साझा कार्यक्रम का फायदा उठाने के उद्देश्य से नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कई उम्मीदवार उन मीटिंग्स में शामिल हुए । मजे की बात यह हुई कि सेंट्रल काउंसिल के दूसरे-दूसरे उम्मीदवारों के साथ 'जुड़े' हुए रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार इन मीटिंग्स में शामिल होने के लिए संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ जुड़ने की कोशिश करते देखे/सुने गए । रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की भागीदारी के चलते संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाली गिरीश आहुजा की मीटिंग्स को जोरदार प्रचार मिला ।
संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के समर्थन में गिरीश आहुजा ने जो मीटिंग्स कीं, उसके साथ-साथ उन्होंने चूँकि अपनी क्लासेस के लिए भी कैम्पेन किया - जिसके चलते जिन भी शहरों में उनके आयोजन हुए वहाँ वह बहुत गहमागहमी के साथ हुए और उनके आयोजनों को अच्छा-खासा प्रचार मिला । गिरीश आहुजा की छात्रों के बीच जो लोकप्रियता और प्रतिष्ठा है, उसका संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल ने जमकर फायदा उठाया । दरअसल गिरीश आहुजा के बहुत से पुराने छात्र जो अब चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के रूप में काम कर रहे हैं, गिरीश आहुजा के शहर में आने/होने की बात सुनकर उनके कार्यक्रमों में आये, जिसका फायदा सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल को मिला । गिरीश आहुजा की डायरेक्ट टैक्सेस में खास विशेषज्ञता है, जिसके चलते डायरेक्ट टैक्सेस में काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनके कार्यक्रम में जुटे । गिरीश आहुजा से अलग-अलग कारणों से प्रभावित होने/रहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने गिरीश आहुजा को जब संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा - तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति उनके बीच भी समर्थन का भाव पैदा हुआ । गिरीश आहुजा के समर्थन के कारण संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग तरह का ऑरा (आभामंडल), एक अलग तरह की विश्वसनीयता और एक अलग तरह की स्वीकार्यता मिली । दरअसल इसीलिये संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी को मिले गिरीश आहुजा के समर्थन ने चुनाव में खासी खलबली पैदा कर दी है ।

काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में नवीन गुप्ता फिसड्डी, तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल फर्स्ट

नई दिल्ली । नवीन गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाने के लिए उनके पापा ने तो दिन-रात एक किया हुआ है, लेकिन नवीन गुप्ता को काउंसिल की मीटिंग में शामिल होना ही पसंद नहीं है । नवीन गुप्ता के पापा एनडी गुप्ता से पूछा जाना चाहिए कि उनके बेटे को जब काउंसिल की मीटिंग्स में कोई दिलचस्पी ही नहीं है और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होना वह जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें काउंसिल में चुनवाने को लेकर वह इतना परेशान क्यों हो रहे हैं ? एनडी गुप्ता इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं; इस लिहाज से उनसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह अपने बेटे को काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहने की आवश्यकता और अहमियत बताते/समझाते । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति को लेकर नवीन गुप्ता का जो रिकार्ड है, उसे देख कर लगता है कि या तो उनके पापा ने उन्हें मीटिंग्स में उपस्थित होने की आवश्यकता और अहमियत बताई नहीं है और या पापा के बताये जाने के बावजूद उन्होंने उसे एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया है । यही कारण है कि फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच काउंसिल की कुल हुईं 15 मीटिंग्स में से नवीन गुप्ता नौ मीटिंग्स में गायब रहे ।
'रचनात्मक संकल्प' के पास फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच हुईं 15 मीटिंग्स का ब्यौरा है । नवीन गुप्ता इनमें से कुल छह मीटिंग्स में उपस्थित हुए । इन 15 में से जो 5 मीटिंग्स वर्ष 2011 तथा 2012 में हुईं हैं, उनमें से तो एक में भी नवीन गुप्ता शामिल नहीं हुए । यह जान कर हो सकता है कि उन लोगों की नाराजगी कुछ कम हो जाये, जिन्हें शिकायत रही है कि नवीन गुप्ता उनके फोन तक नहीं उठाते हैं और जरूरत पड़ने पर जिनसे संपर्क करना तक मुश्किल होता है । इस तरह की शिकायत रखने वाले लोगों को संतोष हो सकता है कि नवीन गुप्ता को जब काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उनके फोन उठाने में वह क्यों दिलचस्पी लें ? नवीन गुप्ता को पूरा हक़ है कि वह किसी के फोन न उठाये और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल न हों - लेकिन तब उन्हें और उनके पापा को लोगों को यह तो बताना ही चाहिए न कि उन्हें काउंसिल के लिए दोबारा क्यों चुना जाये ? स्कूल-कॉलिज तक में नियम है कि उपस्थिति कम होने पर छात्र को परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाता है । लेकिन इन बाप-बेटे ने इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की हैसीयत ऐसी बना दी है कि इसे स्कूल-कॉलिज से भी गई-बीती हालत में पहुँचा दिया है ।
इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ऐसी दशा करने के लिए अकेले यही बाप-बेटे जिम्मेदार नहीं हैं - कुछेक दूसरे काउंसिल सदस्यों का रिकॉर्ड भी नवीन गुप्ता से कुछ ही बेहतर है । संदर्भित 15 मीटिंग्स में चरनजोत सिंह नंदा कुल आठ में और पंकज त्यागी नौ में उपस्थित रहे । विनोद जैन ग्यारह मीटिंग्स में उपस्थित हुए, जबकि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल का 13 उपस्थिति के साथ रिकॉर्ड सबसे अच्छा रहा । अमरजीत चोपड़ा भी 13 मीटिंग्स में उपस्थित रहे । काउंसिल की मीटिंग्स का इस कारण से महत्त्व होता है कि उनमें खास मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है जिनके आधार पर नीतिगत फैसले होते हैं । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में फिसड्डी रहने के बावजूद अपनी सदस्यता को बचाये रखने के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वह जब काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहना जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें फिर से क्यों चुना जाये ?

     

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।

Wednesday, November 21, 2012

संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की लगातार तारीफ करके अमरजीत चोपड़ा ने उनके समर्थन का दावा करने वाले दूसरे उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ दिया है

नई दिल्ली । अमरजीत चोपड़ा के रवैये ने सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास करने में लगे एमके अग्रवाल, विजय कुमार गुप्ता और संजीव चौधरी को हैरान और परेशान किया हुआ है । इनकी हैरानी और परेशानी का कारण यह है कि अमरजीत चोपड़ा ने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में समर्थन का 'दिखावा' तो इनसे कर रखा है; लेकिन लोगों के बीच अपने प्रेसीडेंट काल की उपलब्धियों की बात करते हैं तो तारीफ संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की करते हैं । सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्य संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल चूंकि अगली सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए भी उम्मीदवार हैं इसलिए अमरजीत चोपड़ा द्धारा की जाने वाली उनकी तारीफ उनकी उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाती है और अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करने वाले एमके अग्रवाल, विजय गुप्ता और संजीव चौधरी अपने आप को ठगा हुआ पाते हैं । उल्लेखनीय है कि अमरजीत चोपड़ा जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे तब संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल उनके बड़े नजदीकी सहयोगी थे और अमरजीत चोपड़ा की प्रायः प्रत्येक कार्रवाई में मुख्य भूमिका निभाया करते थे । कुछ लोग सहजता में तो कुछ खुन्नस में कहा भी करते थे कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की मदद के बिना तो अमरजीत चोपड़ा कुछ कर ही नहीं सकते हैं । कुछेक लोगों ने अमरजीत चोपड़ा को संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल से दूर करने की बहुत कोशिश भी की, लेकिन अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया ।
अमरजीत चोपड़ा ने प्रेसीडेंट के पद पर रहते हुए भी और उसके बाद भी प्रेसीडेंट के रूप में प्राप्त की गईं अपनी उपलब्धियों की जब भी बात की, संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल से मिले सहयोग की, हर काम में दिलचस्पी लेने में उनकी तत्परता की और उनकी सक्रिय भूमिका की लगातार तारीफ की । अमरजीत चोपड़ा द्धारा संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की लगातार की जा रही इस तारीफ से लोगों के बीच अनुमान लगाया गया कि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अमरजीत चोपड़ा इस बार संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । लेकिन जब चुनाव का समय आया तो अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करते हुए एमके अग्रवाल को, विजय कुमार गुप्ता को और संजीव चौधरी को सुना गया । मजे की बात यह है कि खुद अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी उम्मीदवार के समर्थन की बात नहीं कही है - लेकिन अलग-अलग तरह की परिस्थितियों का 'हवाला' देकर उनके समर्थन का दावा किया जा रहा है । जैसे अमरजीत चोपड़ा ने चूंकि एमके अग्रवाल के एक उपक्रम 'प्रोफेशनल टाइम्स' की टीम का चेयरमैन बनना स्वीकार किया - तो उसका हवाला देकर एमके अग्रवाल ने उनके समर्थन का दावा कर दिया; और विजय कुमार गुप्ता ने अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा इसलिए किया हुआ है क्योंकि अमरजीत चोपड़ा के नजदीक समझे जाने वाले मधुसुदन गोयल उनका समर्थन कर रहे हैं । अमरजीत चोपड़ा के कुछेक नजदीकी चूँकि संजीव चौधरी का समर्थन कर रहे हैं तो उसका हवाला देकर संजीव चौधरी उनके समर्थन का दावा करने लगे हैं । इन्हें लगा कि ऐसा करके यह लोगों के बीच गलतफहमी पैदा कर लेंगे और फायदा उठा लेंगे ।
इसका मौका इन्हें अमरजीत चोपड़ा ने ही दिया - क्योंकि उन्होंने यह कभी भी स्पष्ट नहीं किया कि उनका समर्थन किसके साथ है । दरअसल वह किसी को नाराज नहीं करना चाहते और हरेक से फायदा उठाना चाहते हैं । एमके अग्रवाल ने अपने उपक्रम 'प्रोफेशनल टाइम्स' का मुखिया बना कर उन्हें सार्वजानिक रूप से दिखने का मौका दिया है; संजीव चौधरी के जरिये अमरजीत चोपड़ा को बिग फोर में काम लेने का जुगाड़ बैठाना है । अमरजीत चोपड़ा को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले कहते/बताते हैं कि अमरजीत चोपड़ा को इस बात का बड़ा मलाल है कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट होने पर जितना पैसा एनडी गुप्ता ने और वेद जैन ने कमाया, उतना पैसा वह नहीं कमा पाए हैं । इसकी भरपाई अब वह बिग फोर की मदद से करना चाहते हैं । अमरजीत चोपड़ा के साथ मुश्किल यह रही कि इंस्टीट्यूट में प्रेसीडेंट के पद पर रहते हुए उन्होंने बातें और फैसले बिग फोर के खिलाफ किये, जिसके चलते बिग फोर ने उन्हें तवज्जो नहीं दी । अमरजीत चोपड़ा लेकिन अब बिग फोर से अपने संबंध सुधारना चाहते हैं और इसीलिये अपने कुछेक लोगों को उन्होंने संजीव चौधरी के साथ लगा दिया है । अमरजीत चोपड़ा ने खुद संजीव चौधरी के लिए कुछ नहीं किया या कहा है - क्योंकि उन्हें डर है कि संजीव चौधरी की जीत के बाद यदि बिग फोर ने उनका अहसान नहीं माना तो वह तो मुफ्त में ही बदनाम होंगे । इसलिए वह खुद कुछ नहीं कह रहे हैं और अपने लोगों के जरिये ही अपने मतलब साधने का जुगाड़ बैठा रहे हैं ।
विजय कुमार गुप्ता के साथ उनका मामला खासा दिलचस्प है । एक समय विजय कुमार गुप्ता उनके बड़े खास हुआ करते थे, लेकिन पिछले चुनाव में विजय कुमार गुप्ता की हार के बाद बात बिगड़ गई । विजय कुमार गुप्ता ने अपनी हार को लेकर कोर्ट-कचहरी करना चाही थी और उम्मीद की थी कि प्रेसीडेंट के रूप में अमरजीत चोपड़ा उनकी मदद करेंगे । हारे हुए विजय कुमार गुप्ता की मदद करने से अमरजीत चोपड़ा ने लेकिन साफ इंकार कर दिया । अमरजीत चोपड़ा के इस रवैये की विजय कुमार गुप्ता को जरा भी उम्मीद नहीं थी । उन्हें तगड़ा झटका लगा और फिर उन्होंने अमरजीत चोपड़ा के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया । विजय कुमार गुप्ता उन दिनों लोगों को अमरजीत चोपड़ा की धोखेबाजियों के किस्से सुनाया करते थे । दूसरे कई लोगों के साथ-साथ अमरजीत चोपड़ा ने पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति के साथ किस तरह की धोखेबाजी की थी, इसे लोगों ने विजय कुमार गुप्ता के जरिये ही जाना था । अमरजीत चोपड़ा के नजदीकी कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना था कि विजय कुमार गुप्ता को सबक सिखाने के लिए ही अमरजीत चोपड़ा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल को अपने साथ जोड़ा और आगे बढ़ाया । लेकिन तब मधुसुदन गोयल इस चुनाव में विजय कुमार गुप्ता के साथ क्यों हैं ? मधुसुदन गोयल के नजदीकियों का कहना है कि मधुसुदन गोयल अपने कारण से विजय कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ हैं - न कि अमरजीत चोपड़ा के नजदीकी होने के कारण; और वह लोगों से यह कह/बता भी रहे हैं । यही कारण है कि अमरजीत चोपड़ा के दूसरे नजदीकियों का समर्थन विजय कुमार गुप्ता को दिलवाने का वह कोई भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं । विजय कुमार गुप्ता के साथ होकर मधुसुदन गोयल दरअसल अगली बार सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की 'तैयारी' कर रहे हैं । इस तैयारी में वह विजय कुमार गुप्ता के नजदीकियों के साथ अपनी नजदीकी बनाते हुए तो खूब नजर आ रहे हैं, लेकिन विजय कुमार गुप्ता के लिए कुछ खास करते हुए नहीं दिख रहे हैं । लोगों को यह सफाई देकर वह विजय कुमार गुप्ता का काम और बिगाड़ रहे हैं कि विजय कुमार गुप्ता को उनके समर्थन का मतलब यह नहीं है कि अमरजीत चोपड़ा का समर्थन विजय कुमार गुप्ता को है ।
अमरजीत चोपड़ा का समर्थन फिर किसको है ? यह बड़ा रहस्य है । क्योंकि अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करने की घोषणा नहीं की है । उनकी इस चुप्पी या तटस्थता का फायदा उठाने के उद्देश्य से एमके अग्रवाल ने, विजय कुमार गुप्ता ने और संजीव चौधरी ने कुछेक परिस्थितियों का इस्तेमाल करते हुए लोगों के बीच उनके समर्थन का दावा किया हुआ है । उनकी इस दावे को लेकिन अमरजीत चोपड़ा ने जगह-जगह संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की तारीफ कर कर के बेमानी बना दिया है । अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करने वाले इन लोगों से पूछा भी जाता है कि अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा तो आप कर रहे हो, लेकिन अमरजीत चोपड़ा तो कभी भी आपका जिक्र नहीं करते - वह तो हमेशा ही संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की तारीफ करते हैं; इसलिए क्या माना जाये कि वह किसका समर्थन करते हैं ?