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Saturday, November 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को लिखे विजय गुप्ता के पत्र से 'भेद' खुला कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता ने दिया और निशाना बने विजय गुप्ता

फरीदाबाद/नई दिल्ली । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले की जाँच कराये जाने की माँग करते हुए विजय गुप्ता ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को जो पत्र लिखा है, उसने पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता को बुरी तरह बेचैन कर दिया है । विजय गुप्ता के उक्त पत्र को सरसरी तौर पर पढ़ने वालों को तो उक्त पत्र के पीछे विजय गुप्ता की अपने को बचाने व पाक-साफ दिखाने की कोशिश नजर आती है; लेकिन पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता ने पत्र की बिटविन-द-लाइंस को पढ़ा है, और यह समझने में देर नहीं की है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिखे इस पत्र के जरिए विजय गुप्ता ने दरअसल उन्हें निशाने पर लेने का प्रयास किया है । मजे की बात यही है कि विजय गुप्ता ने अपने पत्र में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं किया है, लेकिन फिर भी विजय गुप्ता के उक्त पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से इन दोनों के होश उड़े हुए हैं । अपने पत्र में विजय गुप्ता ने इस तथ्य को खास तौर से रेखांकित करके बाजी पलटने तथा पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता को निशाने पर लाने की जमीन तैयार की है कि 2010 से 2012 के बीच जब ब्रांच बिल्डिंग का काम हुआ था, तब वह न तो काउंसिल के सदस्य थे और न ही किसी अन्य रूप में ब्रांच में संबद्ध थे - यानि बिल्डिंग के काम से उनका किसी भी तरह का कोई लेना-देना नहीं था । इस तथ्य के जरिए विजय गुप्ता दरअसल फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने वाले लोगों के बीच इस सवाल को उकसाने की कोशिश करते नजर आते हैं कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से कौन सुपरवाइज कर रहा था ? इस सवाल में ही पंकज त्यागी और अतुल गुप्ता के लिए फजीहत के मौके छिपे हैं । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने तथा सवाल उठाने वाले लोगों में से किसी ने भी अभी तक इस सवाल पर चूँकि गौर नहीं किया था, इसलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता इस मामले में मजे ले रहे थे और फरीदाबाद में विजय गुप्ता की मुसीबत के बीच वह अपनी अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने व बढ़ाने के काम में लगे थे । 
विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र ने लेकिन उनके मजे को अब किरकिरा कर दिया है । विजय गुप्ता तो अपने पत्र के जरिए सवाल उकसा कर किनारे हो गए, सवाल का जबाव दूसरों ने प्राप्त कर लिया और पाया/जाना कि उस दौरान हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से सुपरवाइज करने की जिम्मेदारी पंकज त्यागी को सौंपी गई थी, और उस दौरान पंकज त्यागी बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन थे । ऐसे में, उस दौरान हुए घपले की जिम्मेदारी और जबावदेही क्या पंकज त्यागी की नहीं बनती है ? मजे की और पंकज त्यागी के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर आरोपों-प्रत्यारोपों के मोटे तौर पर जो दो खेमे बने नजर आये, उनमें से किसी ने भी घपले में पंकज त्यागी की भूमिका को लेकर सवाल नहीं उठाया । ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर जो लोग विजय गुप्ता को घेरने की कोशिशों में जुटे, उन्होंने तो पंकज त्यागी की भूमिका पर गौर नहीं ही किया और पंकज त्यागी के 'अपराध' भी विजय गुप्ता के सिर मढ़ दिए; मजे की तथा हैरान करने की बात लेकिन यह रही कि विजय गुप्ता और उनके समर्थकों की तरफ से भी जो सफाईयाँ आईं, उनमें भी इस तथ्य का कोई जिक्र नहीं हुआ । पर अब जब इस मामले में बात काफी आगे बढ़ गई है, तब इस मामले की अभी तक ढकी/छिपी परतें खुलने लगीं हैं और इस प्रक्रिया में पंकज त्यागी की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग का ऑडिट करने के लिए इंस्टीट्यूट द्वारा नियुक्त की गई एलसी कैलाश एंड कंपनी ने जिन वित्तीय अनियमितताओं को रेखांकित किया है, उसके लिए बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन के नाते पंकज त्यागी भी जिम्मेदार और जबावदेह हैं । इस तथ्य के खुल जाने से पंकज त्यागी के लिए समस्या और मुसीबत की बात यह हो गई है कि उनके जिस 'अपराध' के लिए अभी तक विजय गुप्ता को 'पीटा' जा रहा था, उसके लिए अब उन्हें लपेटे में लिया जायेगा । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से जुड़ी यह परत खुली है तो इसके पीछे की राजनीति की परतें भी खुलने लगी हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच पर प्रमोद माहेश्वरी, एमएस लड्ढा, संजय चांडक, संतोष गुप्ता ग्रुप का कब्जा था - जो ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव करने से लेकर ब्रांच में क्या/कैसे होगा तक के फैसले कर रहे थे । वर्ष 2009 के चुनाव में इस ग्रुप ने पंकज त्यागी का समर्थन किया था । उस चुनाव में पंकज त्यागी जीत गए थे, और विजय गुप्ता हार गए थे । इसका नतीजा यह रहा कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच में इस ग्रुप का कब्जा पूरी तरह रहा, और इन्होंने विजय गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों को पीछे धकेले रखा । पंकज त्यागी ने ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी लेकर इस ग्रुप के साथ अपनी मिलीभगत का रिश्ता और मजबूत कर लिया; ब्रांच बिल्डिंग के घपले की बंदरबाँट में मिलीभगत का यह रिश्ता भी सवालों के घेरे में है । वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग का निर्माण हो गया, उसमें घपला हो गया और उसकी बंदरबाँट भी हो गयी - लेकिन इस ग्रुप के साथ बदकिस्मती यह हुई कि 2012 के चुनाव में इनके समर्थन के बावजूद पंकज त्यागी चुनाव हार गए और विजय गुप्ता चुनाव जीत गए । इनकी बदकिस्मती ने इनका और पीछा किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2013 में ब्रांच बिल्डिंग में हुए घपले की पोल खुल गई । ऐसे में, घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में एक मददगार की जरूरत महसूस हुई । यह जरूरत इन्हें अतुल गुप्ता के पास ले गई । अतुल गुप्ता को फरीदाबाद में अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की जरूरत थी ही, लिहाजा वह इनके साथ तालमेल बनाने के लिए तुरंत तैयार हो गए ।
मजे की बात यह रही कि फरीदाबाद बिल्डिंग के घपलों के लिए जिम्मेदार लोगों को अतुल गुप्ता से जिस मदद की दरकार थी, उनकी वह मदद विजय गुप्ता ने ही कर दी । घपले के जिम्मेदार लोगों पर इंस्टीट्यूट की जो तलवार गिर सकती थी, उसे विजय गुप्ता ने ही गिरने से रोक लिया । कुछेक लोगों को लगता है कि विजय गुप्ता ने ऐसा होशियारी के चलते किया, जो अंततः उनकी बेवकूफी साबित हुआ; अन्य कुछेक लोगों का मानना/कहना लेकिन यह है कि विजय गुप्ता ने जो किया वह उनका बेवकूफीभरा फैसला ही था और वह अंततः वही साबित भी हुआ । फरीदाबाद की राजनीति को नजदीक से देखने/समझने वाले लोगों का मानना/कहना है कि विजय गुप्ता दूसरों के 'अपराधों' के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की राजनीति के चलते आज जिस मुसीबत में फँसे हुए हैं, वह अपनी खुद की करनी से ही फँसे हैं । दिलचस्प नजारा यह है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता दे रहे हैं, और आरोपों व सवालों का सामना विजय गुप्ता को करना पड़ रहा है । यह परिदृश्य देख कर विजय गुप्ता के विरोधियों को भी यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि राजनीतिक चतुराई के मामले में विजय गुप्ता के विरोधी उन पर भारी पड़े हैं; और विजय गुप्ता अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता की कीमत चुका रहे हैं । पर अब लगता है कि जैसे विजय गुप्ता के सितारे जाग रहे हैं । दरअसल उनके तमाम विरोधी जो अभी तक एकजुट थे, अब बिखरते दिख रहे हैं - और उनके बिखरने में ही विजय गुप्ता को अपने लिए उम्मीद की किरण नजर आ रही है । 
फरीदाबाद की राजनीति में विजय गुप्ता विरोधी जो लोग पहले पंकज त्यागी के साथ थे और फिर अतुल गुप्ता के साथ आ गए थे, उनमें से कुछ को पंकज त्यागी पुनः अपने साथ जोड़ने में सफल हुए हैं । इनमें कुछेक लोग राजेश शर्मा की वकालत करते हुए भी सुने/देखे गए हैं । इस तरह, फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोग अतुल गुप्ता, पंकज त्यागी व राजेश शर्मा के साथ खड़े दिख रहे हैं - जो अभी तक तो विजय गुप्ता को ही निशाने पर लिए हुए थे; लेकिन जो अब एक-दूसरे को भी गिराने के प्रयत्नों में भी लग गए हैं । मनोज फडनिस को विजय गुप्ता द्वारा लिखे गए पत्र ने उनके विरोधियों के बीच जो खलबली मचाई है, उससे उनके बीच के अंतर्विरोध और तल्ख होने लगे हैं; तथा उन्होंने अपनी अपनी खाल बचाने के उद्देश्य से विजय गुप्ता को भूल/छोड़ कर एक दूसरे को निशाना बनाना शुरू कर दिया है । इससे विजय गुप्ता के लिए राहत की स्थिति बनी है; लेकिन देखने की बात यह होगी कि इस स्थिति का वह कोई फायदा सचमुच में उठा पाते हैं या नहीं ? फरीदाबाद में ब्रांच बिल्डिंग के घपले की आड़ को लेकर विजय गुप्ता, पंकज त्यागी, अतुल गुप्ता, राजेश शर्मा के बीच जो राजनीति हो रही है - उसमें नवीन गुप्ता और संजय अग्रवाल के लिए मजे की स्थिति बनी हुई है । फरीदाबाद में इन दोनों का जो समर्थन-आधार है, वह चूँकि इस झमेले से अलग है - इसलिए इन्हें इस झमेले से नुकसान तो कुछ होना नहीं है; इस झमेले के कारण जो नए समीकरण बनेंगे उनमें फायदा बनाने का मौका उन्हें जरूर मिल सकता है । विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र से इसीलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता के सामने समस्या आ खड़ी हुई है ।

Saturday, December 1, 2012

काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में नवीन गुप्ता फिसड्डी, तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल फर्स्ट

नई दिल्ली । नवीन गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाने के लिए उनके पापा ने तो दिन-रात एक किया हुआ है, लेकिन नवीन गुप्ता को काउंसिल की मीटिंग में शामिल होना ही पसंद नहीं है । नवीन गुप्ता के पापा एनडी गुप्ता से पूछा जाना चाहिए कि उनके बेटे को जब काउंसिल की मीटिंग्स में कोई दिलचस्पी ही नहीं है और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होना वह जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें काउंसिल में चुनवाने को लेकर वह इतना परेशान क्यों हो रहे हैं ? एनडी गुप्ता इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं; इस लिहाज से उनसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह अपने बेटे को काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहने की आवश्यकता और अहमियत बताते/समझाते । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति को लेकर नवीन गुप्ता का जो रिकार्ड है, उसे देख कर लगता है कि या तो उनके पापा ने उन्हें मीटिंग्स में उपस्थित होने की आवश्यकता और अहमियत बताई नहीं है और या पापा के बताये जाने के बावजूद उन्होंने उसे एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया है । यही कारण है कि फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच काउंसिल की कुल हुईं 15 मीटिंग्स में से नवीन गुप्ता नौ मीटिंग्स में गायब रहे ।
'रचनात्मक संकल्प' के पास फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच हुईं 15 मीटिंग्स का ब्यौरा है । नवीन गुप्ता इनमें से कुल छह मीटिंग्स में उपस्थित हुए । इन 15 में से जो 5 मीटिंग्स वर्ष 2011 तथा 2012 में हुईं हैं, उनमें से तो एक में भी नवीन गुप्ता शामिल नहीं हुए । यह जान कर हो सकता है कि उन लोगों की नाराजगी कुछ कम हो जाये, जिन्हें शिकायत रही है कि नवीन गुप्ता उनके फोन तक नहीं उठाते हैं और जरूरत पड़ने पर जिनसे संपर्क करना तक मुश्किल होता है । इस तरह की शिकायत रखने वाले लोगों को संतोष हो सकता है कि नवीन गुप्ता को जब काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उनके फोन उठाने में वह क्यों दिलचस्पी लें ? नवीन गुप्ता को पूरा हक़ है कि वह किसी के फोन न उठाये और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल न हों - लेकिन तब उन्हें और उनके पापा को लोगों को यह तो बताना ही चाहिए न कि उन्हें काउंसिल के लिए दोबारा क्यों चुना जाये ? स्कूल-कॉलिज तक में नियम है कि उपस्थिति कम होने पर छात्र को परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाता है । लेकिन इन बाप-बेटे ने इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की हैसीयत ऐसी बना दी है कि इसे स्कूल-कॉलिज से भी गई-बीती हालत में पहुँचा दिया है ।
इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ऐसी दशा करने के लिए अकेले यही बाप-बेटे जिम्मेदार नहीं हैं - कुछेक दूसरे काउंसिल सदस्यों का रिकॉर्ड भी नवीन गुप्ता से कुछ ही बेहतर है । संदर्भित 15 मीटिंग्स में चरनजोत सिंह नंदा कुल आठ में और पंकज त्यागी नौ में उपस्थित रहे । विनोद जैन ग्यारह मीटिंग्स में उपस्थित हुए, जबकि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल का 13 उपस्थिति के साथ रिकॉर्ड सबसे अच्छा रहा । अमरजीत चोपड़ा भी 13 मीटिंग्स में उपस्थित रहे । काउंसिल की मीटिंग्स का इस कारण से महत्त्व होता है कि उनमें खास मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है जिनके आधार पर नीतिगत फैसले होते हैं । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में फिसड्डी रहने के बावजूद अपनी सदस्यता को बचाये रखने के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वह जब काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहना जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें फिर से क्यों चुना जाये ?

     

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।