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Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव अभियान में फरीदाबाद में आयोजित हुए सुधीर अग्रवाल के आयोजन को फेल करने की कोशिश में राजेश शर्मा खुद ही फजीहत का शिकार हो गए

फरीदाबाद । सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाने/जुटाने के उद्देश्य से फरीदाबाद में आयोजित होने वाले आयोजन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को जाने से रोकने के इरादे से राजेश शर्मा ने चाल तो अच्छी चली थी, लेकिन उनकी चाल उन्हें ही उल्टी पड़ गई और उनकी ही फजीहत करा बैठी । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली नॉर्दर्न इंडिया सीए फेडरेशन ने अभी हाल ही में फरीदाबाद के जिमखाना क्लब में एक प्रोफेशनल मीटिंग का आयोजन किया, जिसमें इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन तथा फरीदाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट केके गुप्ता को चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ बातचीत की । कहने के लिए तो बातचीत इनकम टैक्स नियमों में हुए संशोधनों पर हुई, लेकिन लोगों के बीच यह कोई दबी/छिपी बात नहीं थी कि इस मीटिंग का वास्तविक उद्देश्य सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन जुटाने के लिए प्रमोट करना था । मीटिंग के बाद डिनर के आयोजन की बात तो निमंत्रण पत्र में दर्ज थी ही, निमंत्रण पाने वाले लोगों का कहना था कि 'ड्रिंक' की बात मुँहजबानी बताई गई थी । सुधीर अग्रवाल और उनके समर्थकों ने इस मीटिंग में फरीदाबाद के ज्यादा से ज्यादा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को इकट्ठा करने की तैयारी की थी । उनकी तैयारी को देख कर सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाने के लिए प्रयास कर रहे राजेश शर्मा को फरीदाबाद में अपना समर्थन-आधार खिसकता और घटता हुआ नजर आया, जिसे बचाने के लिए उन्होंने सुधीर अग्रवाल के इस आयोजन को फेल करने की योजना बनाई ।
राजेश शर्मा को अपनी योजना को सफल बनाने में फरीदाबाद ब्रांच के पदाधिकारी अमित पुनिआनी व जितेंद्र चावला का समर्थन भी मिल गया । सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से होने वाली मीटिंग को फेल करने के लिए इन्होंने आनन-फानन में उसी दिन और उसी समय ब्रांच में एक सेमीनार के आयोजन की तैयारी कर ली । राजेश शर्मा, अमित पुनिआनी, जितेंद्र चावला की तिकड़ी ने सोचा था कि सुधीर अग्रवाल की मीटिंग के समय पर ब्रांच में सेमीनार होगा, तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उसमें शामिल होंगे और सुधीर अग्रवाल की मीटिंग कम उपस्थिति का शिकार होकर फेल हो जायेगी । राजेश शर्मा, अमित पुनिआनी, जितेंद्र चावला की तिकड़ी अपनी उक्त सोच को सफल बनाने में तो कामयाब हो गई - और सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में उतने लोग नहीं जुट सके, जितने लोगों को उनकी तरफ से जुटाने की तैयारी की गई थी । लेकिन तिकड़ी की हरकत की हुई आलोचना ने उनके किए-धरे पर पानी फेर दिया । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच राजेश शर्मा की इस बात के लिए जोरदार आलोचना हो रही है कि चुनावी मुकाबले में वह इतना नीचे गिर कर व्यवहार कर रहे हैं, और इंस्टीट्यूट के चुनाव को वह अपनी ओछी हरकतों से सड़कछाप स्तर का बना दे रहे हैं । पिछले वर्ष सीए डे पर दिल्ली में हुए आयोजन में राजेश शर्मा द्वारा की गईं हरकतों को याद करते हुए कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि उन हरकतों के कारण हुई बदनामी व फजीहत से राजेश शर्मा ने कोई सबक आखिर क्यों नहीं लिया ? कुछेक लोगों ने तो कहा भी कि जैसे कुत्ते की पूँछ लाख कोशिशों के बाद भी सीधी नहीं की जा सकती है, वैसे ही लाख लानत-मलानत के बाद भी राजेश शर्मा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ सकते हैं । 
फरीदाबाद के कुछेक वरिष्ठ लोगों ने राजेश शर्मा की हरकत को फरीदाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स केके गुप्ता के अपमान से जोड़ कर भी देखने/दिखाने की कोशिश की है । केके गुप्ता चुनावी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं, इसलिए फरीदाबाद में अपनी वरिष्ठता के चलते वह हर किसी के लिए सम्मान के पात्र हैं । उनकी वरिष्ठता के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए फरीदाबाद के कुछेक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि राजेश शर्मा ने अपनी ओछी राजनीति के चक्कर में फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को केके गुप्ता से मिलने और बात करने के अवसर से वंचित कर दिया - और इस तरह फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ तो नाइंसाफी की ही, साथ ही केके गुप्ता को भी अपमानित करने का प्रयास किया है । राजेश शर्मा के प्रति नाराजगी दिखाते हुए लोगों का कहना है कि राजेश शर्मा यदि यह समझते हैं कि दूसरे उम्मीदवारों के आयोजनों को फेल करने के षड्यंत्रों के जरिये वह सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा लेंगे, तो वह बड़े भ्रम में हैं और इसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ेगा । इस किस्से में मजे की बात यह सुनी जा रही है कि सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में लोगों को जाने से रोकने के लिए राजेश शर्मा की योजनानुसार सेमीनार आयोजित करने वाले अमित पुनिआनी व जितेंद्र चावला खुद सुधीर अग्रवाल की मीटिंग के अंत में होने वाले ड्रिंक व डिनर कार्यक्रम में जा पहुँचे थे, और इसके लिए उन्होंने ब्रांच में हो रहे सेमीनार के खत्म होने का भी इंतजार नहीं किया । कुछेक लोगों का अनुमान है कि वह वहाँ यह देखने पहुँचे थे कि लोगों को जाने से रोकने की उनकी तैयारी के बावजूद कौन और कितने लोग सुधीर अग्रवाल के आयोजन में पहुँचे हैं, तो कईयों का कहना रहा कि और लोगों को तो सुधीर अग्रवाल के आयोजन में जाने से रोकने के लिए उन्होंने सेमीनार का आयोजन कर दिया, लेकिन ड्रिंक व डिनर के लालच में वह खुद को वहाँ पहुँचने से नहीं रोक सके । लोगों का कहना है कि ऐसे लोगों के भरोसे/सहारे राजेश शर्मा सिर्फ इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को गंदा कर सकते हैं, लोगों का समर्थन व वोट नहीं पा सकेंगे - और इस तरह सुधीर अग्रवाल के आयोजन में अड़ंगा डाल कर राजेश शर्मा ने अपनी स्वयं की फजीहत करवा ली है ।

Saturday, November 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को लिखे विजय गुप्ता के पत्र से 'भेद' खुला कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता ने दिया और निशाना बने विजय गुप्ता

फरीदाबाद/नई दिल्ली । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले की जाँच कराये जाने की माँग करते हुए विजय गुप्ता ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को जो पत्र लिखा है, उसने पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता को बुरी तरह बेचैन कर दिया है । विजय गुप्ता के उक्त पत्र को सरसरी तौर पर पढ़ने वालों को तो उक्त पत्र के पीछे विजय गुप्ता की अपने को बचाने व पाक-साफ दिखाने की कोशिश नजर आती है; लेकिन पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता ने पत्र की बिटविन-द-लाइंस को पढ़ा है, और यह समझने में देर नहीं की है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिखे इस पत्र के जरिए विजय गुप्ता ने दरअसल उन्हें निशाने पर लेने का प्रयास किया है । मजे की बात यही है कि विजय गुप्ता ने अपने पत्र में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं किया है, लेकिन फिर भी विजय गुप्ता के उक्त पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से इन दोनों के होश उड़े हुए हैं । अपने पत्र में विजय गुप्ता ने इस तथ्य को खास तौर से रेखांकित करके बाजी पलटने तथा पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता को निशाने पर लाने की जमीन तैयार की है कि 2010 से 2012 के बीच जब ब्रांच बिल्डिंग का काम हुआ था, तब वह न तो काउंसिल के सदस्य थे और न ही किसी अन्य रूप में ब्रांच में संबद्ध थे - यानि बिल्डिंग के काम से उनका किसी भी तरह का कोई लेना-देना नहीं था । इस तथ्य के जरिए विजय गुप्ता दरअसल फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने वाले लोगों के बीच इस सवाल को उकसाने की कोशिश करते नजर आते हैं कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से कौन सुपरवाइज कर रहा था ? इस सवाल में ही पंकज त्यागी और अतुल गुप्ता के लिए फजीहत के मौके छिपे हैं । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने तथा सवाल उठाने वाले लोगों में से किसी ने भी अभी तक इस सवाल पर चूँकि गौर नहीं किया था, इसलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता इस मामले में मजे ले रहे थे और फरीदाबाद में विजय गुप्ता की मुसीबत के बीच वह अपनी अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने व बढ़ाने के काम में लगे थे । 
विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र ने लेकिन उनके मजे को अब किरकिरा कर दिया है । विजय गुप्ता तो अपने पत्र के जरिए सवाल उकसा कर किनारे हो गए, सवाल का जबाव दूसरों ने प्राप्त कर लिया और पाया/जाना कि उस दौरान हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से सुपरवाइज करने की जिम्मेदारी पंकज त्यागी को सौंपी गई थी, और उस दौरान पंकज त्यागी बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन थे । ऐसे में, उस दौरान हुए घपले की जिम्मेदारी और जबावदेही क्या पंकज त्यागी की नहीं बनती है ? मजे की और पंकज त्यागी के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर आरोपों-प्रत्यारोपों के मोटे तौर पर जो दो खेमे बने नजर आये, उनमें से किसी ने भी घपले में पंकज त्यागी की भूमिका को लेकर सवाल नहीं उठाया । ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर जो लोग विजय गुप्ता को घेरने की कोशिशों में जुटे, उन्होंने तो पंकज त्यागी की भूमिका पर गौर नहीं ही किया और पंकज त्यागी के 'अपराध' भी विजय गुप्ता के सिर मढ़ दिए; मजे की तथा हैरान करने की बात लेकिन यह रही कि विजय गुप्ता और उनके समर्थकों की तरफ से भी जो सफाईयाँ आईं, उनमें भी इस तथ्य का कोई जिक्र नहीं हुआ । पर अब जब इस मामले में बात काफी आगे बढ़ गई है, तब इस मामले की अभी तक ढकी/छिपी परतें खुलने लगीं हैं और इस प्रक्रिया में पंकज त्यागी की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग का ऑडिट करने के लिए इंस्टीट्यूट द्वारा नियुक्त की गई एलसी कैलाश एंड कंपनी ने जिन वित्तीय अनियमितताओं को रेखांकित किया है, उसके लिए बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन के नाते पंकज त्यागी भी जिम्मेदार और जबावदेह हैं । इस तथ्य के खुल जाने से पंकज त्यागी के लिए समस्या और मुसीबत की बात यह हो गई है कि उनके जिस 'अपराध' के लिए अभी तक विजय गुप्ता को 'पीटा' जा रहा था, उसके लिए अब उन्हें लपेटे में लिया जायेगा । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से जुड़ी यह परत खुली है तो इसके पीछे की राजनीति की परतें भी खुलने लगी हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच पर प्रमोद माहेश्वरी, एमएस लड्ढा, संजय चांडक, संतोष गुप्ता ग्रुप का कब्जा था - जो ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव करने से लेकर ब्रांच में क्या/कैसे होगा तक के फैसले कर रहे थे । वर्ष 2009 के चुनाव में इस ग्रुप ने पंकज त्यागी का समर्थन किया था । उस चुनाव में पंकज त्यागी जीत गए थे, और विजय गुप्ता हार गए थे । इसका नतीजा यह रहा कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच में इस ग्रुप का कब्जा पूरी तरह रहा, और इन्होंने विजय गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों को पीछे धकेले रखा । पंकज त्यागी ने ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी लेकर इस ग्रुप के साथ अपनी मिलीभगत का रिश्ता और मजबूत कर लिया; ब्रांच बिल्डिंग के घपले की बंदरबाँट में मिलीभगत का यह रिश्ता भी सवालों के घेरे में है । वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग का निर्माण हो गया, उसमें घपला हो गया और उसकी बंदरबाँट भी हो गयी - लेकिन इस ग्रुप के साथ बदकिस्मती यह हुई कि 2012 के चुनाव में इनके समर्थन के बावजूद पंकज त्यागी चुनाव हार गए और विजय गुप्ता चुनाव जीत गए । इनकी बदकिस्मती ने इनका और पीछा किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2013 में ब्रांच बिल्डिंग में हुए घपले की पोल खुल गई । ऐसे में, घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में एक मददगार की जरूरत महसूस हुई । यह जरूरत इन्हें अतुल गुप्ता के पास ले गई । अतुल गुप्ता को फरीदाबाद में अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की जरूरत थी ही, लिहाजा वह इनके साथ तालमेल बनाने के लिए तुरंत तैयार हो गए ।
मजे की बात यह रही कि फरीदाबाद बिल्डिंग के घपलों के लिए जिम्मेदार लोगों को अतुल गुप्ता से जिस मदद की दरकार थी, उनकी वह मदद विजय गुप्ता ने ही कर दी । घपले के जिम्मेदार लोगों पर इंस्टीट्यूट की जो तलवार गिर सकती थी, उसे विजय गुप्ता ने ही गिरने से रोक लिया । कुछेक लोगों को लगता है कि विजय गुप्ता ने ऐसा होशियारी के चलते किया, जो अंततः उनकी बेवकूफी साबित हुआ; अन्य कुछेक लोगों का मानना/कहना लेकिन यह है कि विजय गुप्ता ने जो किया वह उनका बेवकूफीभरा फैसला ही था और वह अंततः वही साबित भी हुआ । फरीदाबाद की राजनीति को नजदीक से देखने/समझने वाले लोगों का मानना/कहना है कि विजय गुप्ता दूसरों के 'अपराधों' के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की राजनीति के चलते आज जिस मुसीबत में फँसे हुए हैं, वह अपनी खुद की करनी से ही फँसे हैं । दिलचस्प नजारा यह है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता दे रहे हैं, और आरोपों व सवालों का सामना विजय गुप्ता को करना पड़ रहा है । यह परिदृश्य देख कर विजय गुप्ता के विरोधियों को भी यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि राजनीतिक चतुराई के मामले में विजय गुप्ता के विरोधी उन पर भारी पड़े हैं; और विजय गुप्ता अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता की कीमत चुका रहे हैं । पर अब लगता है कि जैसे विजय गुप्ता के सितारे जाग रहे हैं । दरअसल उनके तमाम विरोधी जो अभी तक एकजुट थे, अब बिखरते दिख रहे हैं - और उनके बिखरने में ही विजय गुप्ता को अपने लिए उम्मीद की किरण नजर आ रही है । 
फरीदाबाद की राजनीति में विजय गुप्ता विरोधी जो लोग पहले पंकज त्यागी के साथ थे और फिर अतुल गुप्ता के साथ आ गए थे, उनमें से कुछ को पंकज त्यागी पुनः अपने साथ जोड़ने में सफल हुए हैं । इनमें कुछेक लोग राजेश शर्मा की वकालत करते हुए भी सुने/देखे गए हैं । इस तरह, फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोग अतुल गुप्ता, पंकज त्यागी व राजेश शर्मा के साथ खड़े दिख रहे हैं - जो अभी तक तो विजय गुप्ता को ही निशाने पर लिए हुए थे; लेकिन जो अब एक-दूसरे को भी गिराने के प्रयत्नों में भी लग गए हैं । मनोज फडनिस को विजय गुप्ता द्वारा लिखे गए पत्र ने उनके विरोधियों के बीच जो खलबली मचाई है, उससे उनके बीच के अंतर्विरोध और तल्ख होने लगे हैं; तथा उन्होंने अपनी अपनी खाल बचाने के उद्देश्य से विजय गुप्ता को भूल/छोड़ कर एक दूसरे को निशाना बनाना शुरू कर दिया है । इससे विजय गुप्ता के लिए राहत की स्थिति बनी है; लेकिन देखने की बात यह होगी कि इस स्थिति का वह कोई फायदा सचमुच में उठा पाते हैं या नहीं ? फरीदाबाद में ब्रांच बिल्डिंग के घपले की आड़ को लेकर विजय गुप्ता, पंकज त्यागी, अतुल गुप्ता, राजेश शर्मा के बीच जो राजनीति हो रही है - उसमें नवीन गुप्ता और संजय अग्रवाल के लिए मजे की स्थिति बनी हुई है । फरीदाबाद में इन दोनों का जो समर्थन-आधार है, वह चूँकि इस झमेले से अलग है - इसलिए इन्हें इस झमेले से नुकसान तो कुछ होना नहीं है; इस झमेले के कारण जो नए समीकरण बनेंगे उनमें फायदा बनाने का मौका उन्हें जरूर मिल सकता है । विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र से इसीलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता के सामने समस्या आ खड़ी हुई है ।

Friday, November 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की गुमनाम कोशिश से साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं

फरीदाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में ऑडीटोरियम बनाने में हुए घपले की जिम्मेदारी थोपने को लेकर फरीदाबाद में आरोपों-प्रत्यारोपों का जो खेल चल रहा है, वह अब उस मुकाम तक जा पहुँचा है - जहाँ 'नंगे' हुए लोग यह साबित करने का प्रयास करने में जुट गए हैं कि 'हमाम में तो सभी नंगे थे'; और अपने इस प्रयास में वह हमाम से बाहर आने को भी तैयार हो गए हैं - यानि उनका जो नंगापन अभी तक दूसरे लोग दिखा रहे थे, उसे अब वह खुद ही दिखाने को तैयार हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में आर्थिक घपलों को लेकर अभी तक विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज निशाने पर थे; लेकिन अभी हाल में सामने आए एक गुमनाम पत्र में दावा किया गया है कि इन बेचारों ने तो इंस्टीट्यूट की गाइडलाइंस के अनुसार ही काम किया था, और घपलों के लिए वास्तव में जिम्मेदार तो विपिन शर्मा हैं । गौर करने वाला तथ्य यह है कि फरीदाबाद ब्रांच में घपलों के लिए जो लोग विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को जिम्मेदार ठहराते हैं - वह जाने/पहचाने लोग हैं और जो अपनी पहचान के साथ आरोप लगाते रहे हैं तथा सुबूत पेश करते रहे हैं; किंतु जिन लोगों ने घपलों के लिए विपिन शर्मा को जिम्मेदार ठहराया है, उन्होंने अपनी पहचान छिपा कर यह काम किया है । यानि उनमें न तो अपनी पहचान बताने का साहस है, और न उन्होंने सीधे विपिन शर्मा का नाम लिया है । इस तरह से उन्होंने साबित किया है कि जो बेईमान और कायर थे, वह बेईमान और कायर ही रहेंगे । यह कौन लोग हैं ? गुमनाम पत्र में जिस तरह से विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की फूहड़ सी कोशिश की गई है, उससे स्पष्ट रूप से जाहिर/साबित है कि इस गुमनाम पत्र के पीछे यही लोग हैं ।
उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन चारों लोगों में विजय गुप्ता सेंट्रल काउंसिल की तथा दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल की सीट बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं, और यह दोनों गुरु-चेले के रूप में पहचाने जाते हैं; तेजेंद्र भारद्वाज और विपिन शर्मा रीजनल काउंसिल में प्रवेश करने के लिए प्रयासरत हैं । तेजेंद्र भारद्वाज एक समय विजय गुप्ता गिरोह के सदस्य हुआ करते थे, लेकिन गिरोह में नंबर दो की दौड़ में दीपक गर्ग से पिछड़ जाने के कारण वह हालाँकि गिरोह से अलग हो गए थे, किंतु ब्रांच में मची लूट में चूँकि उनकी भी भागीदारी को रेखांकित किया जाता है, इसलिए उन्हें भी विजय गुप्ता गिरोह के साथ ही देखा जाता है ।  विपिन शर्मा अपने आप को प्रोफेशन में 'ट्रू सेवक' के रूप में प्रस्तुत करते हैं । मजे की बात यह है कि फरीदाबाद में जो लोग विजय गुप्ता गिरोह की कारस्तानियों को उद्घाटित करते हैं, उन्हें विपिन शर्मा के समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । विजय गुप्ता और उनके गिरोह के सदस्यों के लिए मुसीबत की बात यह है कि करीब दो हजार की सदस्यता वाली फरीदाबाद ब्रांच में उन्हें एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो अपनी पहचान के साथ उनकी करतूतों की वकालत कर सके, और इसलिए ही उन्हें गुमनाम पत्र का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा । यानि जिन लोगों पर बेईमान और कायर होने के आरोप रहे, वह बेईमान और कायर ही साबित हुए । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपलों का मामला मुख्य रूप से पिछली टर्म से शुरू हुआ, जबकि ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में दूसरे कुछेक लोगों के साथ विजय गुप्ता के पार्टनर महेश गोयल, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज व विपिन शर्मा भी होते थे । ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के अध्यक्ष विजय गुप्ता रहे हैं । ऑडिट रिपोर्ट में ब्रांच बिल्डिंग में अनियमितता/फ्रॉड बताया गया । एक तर्क यह बनता है कि ब्रांच बिल्डिंग में यदि घपला हुआ, तो ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी सदस्य उसके लिए जिम्मेदार हुए । यह तर्क घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने का काम करता है; क्योंकि जब सभी को जिम्मेदार बता दिया गया तो मामले को रफा-दफा करना आसान हो जाता है । और यदि इस तर्क को सच मान भी लिया जाए, तो यह सवाल तो फिर भी बचा रह जाता है कि घपले के जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की/करवाई गई ? इसलिए देखने/समझने की बात यह है कि जब घपले का मामला सामने आया, तो किस किस का क्या क्या रवैया था ? कौन मामले को छिपाना/दबाना चाहता था, और कौन घपलेबाजों को पकड़ना/पकड़वाना चाहता था ? इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग के घपले का मामला संजीव चौधरी ने उठाया था, और उन्होंने फंड रोक देने की सिफारिश की थी - जिसका विजय गुप्ता ने जोरदार तरीके से विरोध किया था । विजय गुप्ता का कहना था कि ऑडिट रिपोर्ट में जिसे अनियमितता कहा गया है - उसका संबंध पैसों की हेराफेरी से नहीं है, बल्कि व्यवस्थासंबंधी ऊँच-नीच से है; और इस आधार पर फंड रोकना अन्याय होगा । 
यह विजय गुप्ता ही हैं, जिनकी शह पर ब्रांच के फंड इस्तेमाल करने की प्रक्रिया से ट्रेजरर को बाहर करने/रखने के काम हुए । तेजेंद्र भारद्वाज के चेयरमैन-काल में ट्रेजरर रहे विपिन मंगला ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिख कर आरोप लगाया था कि उन्हें ट्रेजरर की जिम्मेदारी नहीं निभाने दी जा रही हैं । विजय गुप्ता की लॉबीइंग के चलते तत्कालीन प्रेसीडेंट ने इस शिकायत पर कान नहीं दिया । उसके अगले वर्ष, सेक्रेटरी के रूप में विपिन मंगला ने ऑडिटोरियम के खर्चे का स्पेशल ऑडिट करने की माँग करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को फिर एक पत्र लिखा था, लेकिन विजय गुप्ता ने उसकी भी कोई सुनवाई नहीं होने दी । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में मोटे तौर पर दो ग्रुप बन गए थे - एक ग्रुप का नेतृत्व विजय गुप्ता के हाथ में था; और विजय गुप्ता ने हमेशा यह प्रयास किया कि चेयरमैन पद उनके गिरोह के पास ही रहे, जिससे कि वह अपनी बेईमानियों पर पर्दा डाले रह सकें और बेईमानियों को करने का मौका बनाए रख सकें । दूसरे ग्रुप में वह लोग थे जो समय समय पर आरोप लगाते रहे और जाँच कराए जाने की माँग करते रहे । विपिन शर्मा इस दूसरे ग्रुप में थे । चेयरमैन पद अपने हाथ में रखने के लिए विजय गुप्ता को जब भी जरूरी लगा, एक्स-ऑफिसो सदस्य के रूप में उन्होंने अपने वोट का इस्तेमाल किया । अपने वोट का इस्तेमाल करते हुए विजय गुप्ता ने विपिन शर्मा को दरअसल इसीलिए चेयरमैन नहीं बनने दिया, क्योंकि उन्हें डर रहा कि विपिन शर्मा चेयरमैन बन गए तो ब्रांच बिल्डिंग के घपले सामने आ जायेंगे, और वह तथा उनके साथी फँसेंगे । विजय गुप्ता को चूँकि पत्थर पर अपना नाम लिखवाना था, इसलिए उन्होंने हर धतकर्म किया और अपने साथियों से साथ भी फरेब करने से नहीं चूके । विजय गुप्ता, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज की तिकड़ी ने ब्रांच बिल्डिंग के घपले के मामले को कभी भी ब्रांच की एजीएम में नहीं उठने/आने दिया; और विजय गुप्ता ने सेंट्रल काउंसिल में कभी इस मामले को उठाने का प्रयास तक नहीं किया । जैसा कि पहले बताया गया है कि सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग में संजीव चौधरी ने मामला उठाया भी, तो विजय गुप्ता ने उनका विरोध किया ।  
इन तथ्यों से जाहिर है कि विजय गुप्ता और उनके गिरोह के लोगों ने न सिर्फ ब्रांच बिल्डिंग में घपला किया, बल्कि घपले को छिपाने व दबाए रखने के लिए अनैतिक किस्म की राजनीति भी की; और अब कायरों की तरह अपनी पहचान छिपा कर लोगों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि घपला तो उन्होंने किया था, जो बार-बार जाँच कराए जाने की माँग करते रहे हैं । विपिन शर्मा, विपिन मंगला आदि का यह दोष तो माना जा सकता है कि उन्होंने घपलेबाजों को रोकने/पकड़ने का और और ज्यादा प्रयास नहीं किया - उन्हें और ज्यादा प्रयास करना चाहिए था; लेकिन इस दोष के कारण उन्हें घपलेबाजों से भी बड़ा दोषी मानना घपलेबाजों को सम्मान देने जैसा काम है । यह काम भी लेकिन जिस तरह गुमनाम रह कर किया जा रहा है, उससे साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं । 

Friday, October 30, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते की गई विजय गुप्ता की मीटिंग का बहिष्कार करके फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने विजय गुप्ता की स्थिति को और मुश्किल बनाया

फरीदाबाद । विजय गुप्ता की सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से फरीदाबाद में आयोजित की गई मीटिंग के बुरी तरह फ्लॉप होने से विजय गुप्ता के बचे-खुचे समर्थकों का हौंसला भी पस्त होता दिख रहा है । उनके नजदीकियों व समर्थकों ने बताया कि उन्हें यह आभास तो पहले से था कि विजय गुप्ता के लिए इस बार मामला मुश्किल बना हुआ है; लेकिन यह अंदाज उन्हें बिलकुल नहीं था कि उनके लिए हालात सिर्फ मुश्किल नहीं, बल्कि वास्तव में बहुत ही बुरे बन गए हैं । फरीदाबाद में लोग उनसे खफा हैं, यह चर्चा तो रही है; लेकिन लोग उनसे इतने खफा हैं कि उनके द्वारा लगातार खुशामद करते रहने के बावजूद लोग उनके साथ खड़े तक दिखने के लिए तैयार नहीं हुए - तो विजय गुप्ता के लिए खतरे की घंटी को उनके नजदीकियों व समर्थकों ने भी साफ साफ सुन लिया है । विजय गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार ही, विजय गुप्ता ने फरीदाबाद की मीटिंग के लिए फरीदाबाद के करीब छह सौ लोगों को खुद फोन करके निमंत्रित किया था । कई लोगों से उन्होंने साफ साफ कहा भी था कि मेरी हालत इस बार बहुत टाइट है, इसलिए तुम्हें आना जरूर है ताकि मैं दूसरे शहरों के लोगों को बता/दिखा सकूँ कि मेरी हालत उतनी खस्ता नहीं है, जितनी की बताई जा रही है । कई लोगों से उन्होंने यह भी कहा कि अपने साथ जिसे चाहो उसे भी ले आओ, तुम लोगों की पार्टी हो जायेगी और मेरा काम बन जायेगा । मीटिंग शुरू होने के समय तक वह लोगों को फोन करके मीटिंग में आने की बात याद दिलाते रहे और पूछते रहे कि अभी तक निकले नहीं, कहाँ तक पहुँचे, कितनी देर में पहुँच रहे हो, आदि-इत्यादि । लेकिन मीटिंग में पहुँचने वालों की संख्या पचास-साठ के बीच तक ही पहुँच पाई । उनके समर्थकों ने हालाँकि करीब अस्सी लोगों के मीटिंग में पहुँचने का दावा किया ।
फरीदाबाद की मीटिंग के फ्लॉप होने का विजय गुप्ता पर दोहरा असर पड़ा है । इससे एक तरफ तो उनके सामने 'अपने घर' को संभालने की जरूरत पैदा हुई है, और दूसरी तरफ दूसरे शहर के लोगों को यह समझाने में दिक्कत खड़ी हुई है कि जब उनके अपने शहर के लोग उनके साथ नहीं हैं, तो वह क्यों उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करें ? उल्लेखनीय है कि पिछले महीनों में विजय गुप्ता से दूसरे शहरों में लगातार यह पूछा जाता रहा है कि फरीदाबाद में तुम्हारी स्थिति के खराब होने की बातें क्यों हो रही हैं ? विजय गुप्ता लोगों को आश्वस्त करते रहे कि यह सब दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों का झूठा प्रचार है, जो उन्हें बदनाम करने के लिए किया जा रहा है । विजय गुप्ता दूसरे शहरों के लोगों को आश्वस्त करते रहे कि फरीदाबाद में लोग उनके साथ पहले भी थे और अब भी हैं; जब भी मैं फरीदाबाद में मीटिंग करूँगा तब यह बात साबित हो जायेगी । लेकिन अब जब फरीदाबाद में की गई उनकी मीटिंग बुरी तरह फ्लॉप हो गई है, तो दूसरे शहरों के लोगों का सामना करना उनके लिए मुश्किल हो गया है । दूसरे शहरों के उन लोगों का सामना करना तो उनके लिए और भी मुश्किल हो गया है, जिनसे वह यह दावा कर चुके थे कि फरीदाबाद में लोग पूरी तरह उनके साथ हैं । फरीदाबाद की मीटिंग के फ्लॉप होने से वास्तव में यह साबित हो गया है कि फरीदाबाद में अपनी बुरी स्थिति को छिपाने के लिए वह लगातार झूठ पर झूठ बोले जा रहे थे, और दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों पर नाहक ही आरोप मढ़ रहे थे । 
फरीदाबाद में अपनी बुरी स्थिति का विजय गुप्ता को आभास तो था; यह दावा करते हुए उनके नजदीकियों ने बताया कि लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि वह जब मीटिंग में लोगों को आमंत्रित करेंगे तो मीटिंग में तो लोग आ ही जायेंगे । विजय गुप्ता ने चालाकी यह खेली कि लोगों से सहयोग/समर्थन की सीधी बात करने की बजाए उन्हें मीटिंग में आने का निमंत्रण दिया । उन्हें पता था कि वह पहले यदि सहयोग/समर्थन की बात करेंगे, तो लोग भड़केंगे और अपना गुस्सा निकालेंगे; इससे बचने के लिए उन्होंने मीटिंग में आने का निमंत्रण दिया । उनका सोचना यह था कि मीटिंग में खाने-पीने के चक्कर में लोग आ जायेंगे और वह जब वहाँ खाते-पीते हुए लोगों की भीड़ देखेंगे, तो उनका गुस्सा खुद-ब-खुद ठंडा पड़ जायेगा । फरीदाबाद में मीटिंग करने के जरिए विजय गुप्ता ने एक तीर से दो निशाने लगाने की योजना बनाई थी - उन्हें उम्मीद थी कि उनकी इस योजना से एक तरफ तो फरीदाबाद में उनके प्रति लोगों के बीच जो गुस्सा है, वह शांत हो जायेगा; तथा दूसरी तरफ इस मीटिंग में जुटी भीड़ को दिखा/बता कर वह दूसरे शहरों के लोगों को समझा सकेंगे कि फरीदाबाद में उनकी पतली हालत की जो बातें हो रही हैं, वह दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहें हैं । लेकिन फरीदाबाद में हुई उनकी मीटिंग जिस बुरी तरह से पिटी, और फरीदाबाद में लोगों ने उनकी मीटिंग का जिस संगठित तरीके से बहिष्कार किया - उससे साबित हुआ है कि फरीदाबाद में लोग उनकी चालों व कारस्तानियों से अब सावधान हो गए हैं तथा उनमें फँसने को तैयार नहीं हैं । 
विजय गुप्ता को फरीदाबाद में सार्वजनिक रूप से पहला झटका कुछेक महीने पहले तब लगा था जब फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य विपिन मंगला ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की ई डायरेक्टरी इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन के हाथों रिलीज करवा दी थी । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की डायरेक्टरी छापना और चुनाव से पहले उसे रिलीज करना विजय गुप्ता का पुराना फंडा रहा है; लेकिन विपिन मंगला ने जिस तरह विजय गुप्ता से उनका यह फंडा छीन लिया - उसके कारण वह न केवल फंडा-विहीन हो गए, बल्कि उनकी भारी किरकिरी भी हुई । इस मामले को लेकर फरीदाबाद में और फरीदाबाद के बाहर भी लोगों को यह कहने का मौका मिला कि फरीदाबाद में विजय गुप्ता का यह कैसा हाल है कि उनकी नाक के नीचे फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी के एक सदस्य ने उनसे उनका फंडा छीन लिया, और उन्हें भनक तक नहीं मिली । विपिन मंगला ने जिस कार्यक्रम में वेद जैन के हाथों ई डायरेक्टरी रिलीज करवाई थी, उस कार्यक्रम में विजय गुप्ता भी मौजूद थे; और विपिन मंगला द्वारा ई डायरेक्टरी प्रस्तुत करने पर वह हक्के-बक्के रह गए थे । विजय गुप्ता भुनभुनाए तो बहुत थे, लेकिन विपिन मंगला ने उन्हें जो चोट पहुँचाई - उसके दर्द से वह बच नहीं सके । उनके समर्थक मानते हैं और कह भी रहे हैं कि विपिन मंगला ने उन्हें जो चोट पहुँचाई थी, उससे उन्हें सावधान हो जाना चाहिए था - और स्थिति को सँभालने की कोशिश करना चाहिए थी । विजय गुप्ता ने लेकिन सच्चाई को ठीक से समझा/पहचाना नहीं, और यह मान लिया कि वह अपनी चालबाजियों से स्थिति को अपने पक्ष में ले आयेंगे । फरीदाबाद में मीटिंग के जरिए विजय गुप्ता ने वास्तव में यही करने की कोशिश की थी - लेकिन जो उन्हें उलटी पड़ी है और जिसने पलट कर उनकी स्थिति को और मुश्किल बना दिया है । 

Monday, October 5, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अपनी सीट बचाने के लिए दीपक गर्ग की विजय गुप्ता पर निर्भरता सचमुच उनके काम आयेगी क्या ?

फरीदाबाद । दीपक गर्ग के शुभचिंतकों ने उस तस्वीर को देख कर अंततः राहत की साँस ली, जिसमें नए नए चार्टर्ड एकाउंटेंट बने बच्चों के लिए हो रहे एक कार्यक्रम में दीपक गर्ग पीछे की सीट पर एक किनारे 'अकेले से' बैठे हुए उन्हें दिखे । दीपक गर्ग पिछले कई दिनों से अपने राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता के साथ गायब से चल रहे थे । विजय गुप्ता के गायब होने को लेकर तो लोगों को ज्यादा चिंता नहीं थी - कोई कह रहा था कि वह वित्तीय धोखाधड़ी में फँसे अपने एक क्लाइंट को बचवाने की कार्रवाई में लगे हैं; कोई कहता हुआ सुना जा रहा था कि वह उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की सीट का जुगाड़ करने गए हुए हैं; उनके समर्थक लेकिन बता रहे थे कि सेंट्रल काउंसिल की सीट जीतने के लिए वह अंडरग्राउंड रह कर काम कर रहे हैं । लेकिन दीपक गर्ग को लेकर उनके शुभचिंतक भी तथा कई दूसरे लोग भी बहुत चिंतित थे । इसका कारण भी है । शुभचिंतकों के लिए चिंता का कारण यह बना कि चुनाव सिर पर आ चुके हैं, और दीपक गर्ग की सीट खतरे में भी देखी जा रही है - ऐसे में दीपक गर्ग ऐसे कहाँ जा छिपे हैं, कि उनके नजदीकियों को भी उनकी कोई खोज-खबर नहीं है । ऐसे समय में, जबकि उन्हें सभी के सामने होना/ दिखना चाहिए - वह अपने समर्थकों व शुभचिंतकों से भी बचते/छिपते फिर रहे हैं । उनका फोन भी उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को या तो बंद मिलता था, और या पहुँच से बाहर मिलता । किसी का फोन लग भी जाता, तो उठता नहीं; और जिनका उठ जाता, उन्हें सुनने को मिलता कि बाद में बात करता हूँ । ऐसे में हर किसी के लिए समझना मुश्किल हो रहा था कि दीपक गर्ग आखिर हैं कहाँ और क्या कर रहे हैं ?   
दीपक गर्ग तो नहीं मिले, लेकिन एक तस्वीर मिली जो शिमला के किसी रिसोर्ट में चल रहे एक कार्यक्रम की बताई गई - जिसमें दीपक गर्ग बैठे हुए दिखे । इस तस्वीर को देख कर शुभचिंतकों को खुशी भी हुई और लेकिन साथ साथ निराशा भी हुई । खुशी का कारण तो यह रहा कि आखिरकार दीपक गर्ग दिखे तो; निराशा लेकिन इस तस्वीर में उनकी पोजीशन देख कर हुई । इस तस्वीर में वह जिस 'पोजीशन' में बैठे हुए दिख रहे हैं, उसमें कहीं से यह नहीं लग रहा है कि वह एक रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं । तस्वीर यंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के रेजिडेंशियल रिफ्रेशर कोर्स की है । यूँ तो दीपक गर्ग भी अभी यंग ही हैं, लेकिन प्रोफेशन में जिन्हें यंग कहा/समझा जाता है - 'वह वाले' यंग दीपक गर्ग अब नहीं रहे हैं; तो फिर वह प्रोफेशनल 'यंग' लोगों के इस कार्यक्रम में क्या कर रहे हैं ? और तस्वीर में नजर आ रही बेचारगी वाली हालत में क्यों बैठे हुए हैं ? इन सवालों के जबाव दीपक गर्ग ही दे सकते हैं, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई है । उनके समर्थक लेकिन जो बता रहे हैं, उससे नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में मामला खासा दिलचस्प बन गया है । 
तस्वीर में दीपक गर्ग जिस बेचारगी वाली हालत में बैठे दिख रहे हैं, उसका एक अर्थ तो लोगों ने यही लगाया है कि अपने चुनाव को लेकर दीपक गर्ग अपने राजनीतिक गुरु पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं । दरअसल यंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के रेजिडेंशियल रिफ्रेशर कोर्स को उनके राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता के राजनीतिक हथकंडे के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । विजय गुप्ता को लग रहा है कि रेजिडेंशियल आयोजन में वह यंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को हर तरह से प्रभावित करने का मौका पा/बना सकते हैं; और यहाँ प्रभावित हुए यंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का वोट उनके लिए पक्का ही हो जायेगा । विजय गुप्ता ने अपने लिए वोट पाने का यह जो जुगाड़ किया है, उसी जुगाड़ में दीपक गर्ग ने भी अपने लिए वोट जुटाने का मौका बनाने का काम देखा है । दीपक गर्ग को लग रहा है कि विजय गुप्ता के इस तरह के आयोजन में शामिल रह कर वह दो तरह से फायदा उठा लेंगे - एक तो वह विजय गुप्ता के लिए काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नजदीक आयेंगे, और दूसरे 'यंग' चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से जुड़ने का मौका उन्हें मिलेगा । अपने आयोजनों की व्यवस्था के लिए विजय गुप्ता अपने साथ कुछेक ऐसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रखते हैं, जिन्हें वह कुछ कुछ काम दिलाते रहते हैं और या काम दिलाने का झाँसा दिए होते हैं; ऐसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स विजय गुप्ता के आयोजनों में व्यवस्था संबंधी मदद तो करते ही हैं, साथ ही उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में हवा बनाने का काम भी करते हैं । दीपक गर्ग को लगता है कि विजय गुप्ता के साथ चिपके चिपके रह कर वह भी अपने चुनावी अभियान में ऐसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से काम ले सकते हैं ।
दीपक गर्ग ने कुछ तो अपने व्यवहार व रवैये से और कुछ अपने राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता के नजदीक दिखने से अपने विरोधियों की संख्या को बढ़ाया ही है । इस बढ़ी हुई संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने पिछली बार उनके चुनाव में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था - और उनके लिए समर्थन जुटवाया था । दीपक गर्ग ने लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकारोक्ति के भाव को तो घटाया ही है, साथ ही अपने कई अच्छे समर्थकों को भी खो दिया है । अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच पनपे/फैले विरोध के भाव को देखते हुए ही दीपक गर्ग के लिए लोगों के बीच खुलकर अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अभियान चलाना तक मुश्किल हो रहा है । इसीलिए अपनी चुनावी नैय्या पार लगाने के लिए दीपक गर्ग के सामने विजय गुप्ता पर निर्भर होने की मजबूरी आ पड़ी है । उल्लेखनीय है कि विजय गुप्ता के साथ दीपक गर्ग अभी तक अपने मिलेजुले से संबंध 'दिखाते' रहे हैं : उन्हें जब जब जहाँ जैसे विजय गुप्ता की मदद की जरूरत पड़ी, और उनकी जरूरत में विजय गुप्ता को भी अपनी दाल गलती हुई दिखी - तब तब विजय गुप्ता उनकी मदद करते हुए नजर आये । किंतु जहाँ कहीं उन्हें विजय गुप्ता के साथ होने के कारण अपना नुकसान होता हुआ नजर आया; वहाँ कहीं दीपक गर्ग ने विजय गुप्ता के साथ अपना किसी भी तरह का संबंध होने की बात से इंकार किया । दीपक गर्ग को इस बात पर सख्त ऐतराज रहा है कि कोई उन्हें विजय गुप्ता का 'आदमी' कहे । लेकिन अब जब वह विजय गुप्ता के एक कार्यक्रम में - जिसमें उनकी कोई आधिकारिक भूमिका स्पष्ट नहीं है - पीछे की सीट पर 'बेचारगी की हालत' में बैठे दिखे हैं, तो लोगों ने मान लिया है कि दीपक गर्ग अपने चुनाव के संदर्भ में विजय गुप्ता पर पूरी तरह निर्भर हो चले हैं । दीपक गर्ग के रूप में रीजनल काउंसिल के एक सदस्य की यह बेचारगी भरी सच्चाई इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य का एक नजारा तो पेश करती ही है, साथ ही दीपक गर्ग के लिए चुनाव को और चुनौतीपूर्ण भी बना देती है । चुनौतीपूर्ण इसलिए भी, क्योंकि ऐसे में जबकि विजय गुप्ता के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाना मुश्किल हो रहा है, दीपक गर्ग की सीट का बोझ उनके सिर और आ पड़ा है ।

Sunday, September 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों पर मनमाने तरीके से थोपी गई लायब्रेरी फीस मामले में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी से अपने आप को बचाने के लिए विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने फरीदाबाद में लोगों से छिप कर रहने का फार्मूला अपनाया

फरीदाबाद । इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों से लायब्रेरी फीस लेने के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि सेंट्रल काउंसिल और रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद से 'भाग' खड़े होने में ही अपनी खैर समझी है । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद में अपने खिलाफ माहौल देख/पहचान कर विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो पहले से ही फरीदाबाद में लोगों से मुँह छिपाते फिर रहे हैं, और सिर्फ अपने अपने खास लोगों के ही फोन उठा रहे हैं । जो लोग एसएमएस और ईमेल जैसे संवाद के व्यक्तिगत माध्यमों के जरिए, तथा फेसबुक जैसे खुले/सार्वजनिक मंच से इनसे सवाल पूछ रहे हैं - उन्हें भी जबाव देने से यह कन्नी काट रहे हैं । तेजिंदर भारद्वाज और विपिन शर्मा के लिए भी माहौल चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है - फलस्वरूप इन दोनों ने भी कभी जबाव देने तो कभी चुप लगा जाने वाला फार्मूला अपना लिया है । इनके किन्हीं किन्हीं समर्थकों ने साहस करके सवाल उठाने वाले लोगों से अनुरोध भी किया कि इंस्टीट्यूट की समस्याओं पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं की जानी चाहिए - किंतु उन्हें भी लोगों से जब लताड़ सुनने को मिली, तो वह भी पीछे हट गए । 
उल्लेखनीय है कि यह चारों फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सदस्य हैं - और इस नाते यदि यह चाहें तो सेकेंड्स में छात्रों से फीस बसूलने का फरमान वापिस हो सकता है । चारों को छोड़िये, एक अकेले विजय गुप्ता फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों के साथ हो रही 'लूट' को रोक सकते हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता अक्सर दावा करते हुए सुने गए हैं कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस तो उनके इशारे पर नाचते हैं, और फरीदाबाद के मामले में तो मनोज फडनिस ने उन्हें ही प्रेसीडेंट 'बना' दिया है । यंग मेंबर्स एम्पॉवरमेंट कमेटी के चेयरमैन के रूप में विजय गुप्ता जिस तरह की मनमानियाँ करते चल रहे हैं, और उनकी मनमानियों पर मनोज फडनिस जिस तरह से आँखें बंद करके बैठे हुए हैं, उससे विजय गुप्ता का उक्त दावा लोगों को सच भी जान पड़ता है । इसके बावजूद विजय गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की सुध नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल में होने के कारण फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की फीस वाली समस्या को सीधे और तुरंत हल कर/करवा सकते हैं; रीजनल काउंसिल जब दूसरी जगहों पर छात्रों से फीस नहीं ले रही है, तो फिर फरीदाबाद में छात्रों से फीस बसूलने का वैसे भी कोई तर्क तो बनता नहीं है । दीपक गर्ग ने भी लेकिन अपने राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता की तरह मामले पर चुप्पी ही साध ली है - और फरीदाबाद के लोगों से बचते/छिपते ही फिर रहे हैं । फरीदाबाद में कई लोगों की शिकायत है कि विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो उनके फोन ही नहीं उठा रहे हैं; और यदि कभी उठा भी लेते हैं तो यह कह कर बात सुनने/करने से बच लेते हैं कि अभी मैं बाहर हूँ या मीटिंग में हूँ, बाद में फोन करता हूँ - और उनका 'बाद में' कभी आता ही नहीं है । 
तेजिंदर भारद्वाज का मामला फरीदाबाद ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने खराब कर दिया । दरअसल तेजिंदर भारद्वाज ने बाहर तो अपना मत व्यक्त किया कि छात्रों से लायब्रेरी की फीस नहीं लेनी चाहिए, किंतु ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने यह कह कर उनकी पोल खोल दी कि फीस बसूलने के फैसले में तेजिंदर भारद्वाज की पूरी सहमति थी । लायब्रेरी फीस को लेकर तेजिंदर भारद्वाज का 'नेताओं वाला' दोहरा रवैया सामने आया, तो उनके लिए भारी मुसीबत खड़ी हो गई । इस मुसीबत से निपटने के लिए उन्होंने जो तरीका अपनाया, उससे बात वास्तव में और बिगड़ गई । इस मामले में बात करने/उठाने वाले लोगों पर उन्होंने आरोप लगाया कि वह राजनीति कर रहे हैं । इस पर उन्हें सुनने को मिला कि वह रीजनल काउंसिल में चुने जाने के लिए जो जो तिकड़में लगा रहे हैं, उसे क्या सत्संग करना कहते हैं; वह भी राजनीति ही है - और जिस तरह उन्हें राजनीति करने का हक़ है, ठीक उसी तरह दूसरों को भी राजनीति करने का हक है । तेजिंदर भारद्वाज ने यह तर्क देकर भी जान छुड़ाने की कोशिश की कि इस मामले में सवाल सिर्फ चार लोगों से ही क्यों किए जा रहे हैं, ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी ग्यारह सदस्यों से क्यों नहीं किए जा रहे हैं ? इसका जबाव उन्हें यह मिला कि जो चार लोग इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं, उनसे ही खासतौर पर इस मामले में सवाल यह जानने/समझने के लिए किए जा रहे हैं, जिससे कि उनका 'असली वाला चेहरा' लोगों के सामने आ सके । लायब्रेरी फीस मामले में तेजिंदर भारद्वाज चूँकि बाहर कुछ और भीतर कुछ और कहने के आरोपी बने, तो उसके कारण सवालों का फंदा उन पर कुछ ज्यादा कसता हुआ दिखा - इस फंदे से बचने की कोशिश में फिर उन्होंने चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई देखी । 
विपिन शर्मा के रवैये ने लेकिन लोगों को, और खासतौर से उनके समर्थकों को ज्यादा निराश किया है । यह निराशा दरअसल इसलिए भी है, क्योंकि लोगों को उन्हीं से उम्मीद भी ज्यादा थी । ब्रांच में अपनी सक्रियता तथा सभी को विश्वास में लेकर काम करने के अपने तरीके से विपिन शर्मा ने फरीदाबाद में अपनी अच्छी साख बनाई है; जिसमें लायब्रेरी फीस मामले में विरोधी रवैया अपनाने के चलते उन्होंने और इजाफा ही किया है । लायब्रेरी फीस लागू करने के फैसले के प्रति अपना विरोध जता कर विपिन शर्मा ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी अच्छी पैठ बनाई है । किंतु इस मामले में वह चूँकि जुबानी जमा-खर्च से आगे बढ़ते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए वह लोगों के निशाने पर आ रहे हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों ने उन्हें सलाह दी है कि उनके लिए मौका अच्छा है, जिसमें कि वह अपने समर्थन-आधार को और बढ़ा व मजबूत कर सकते हैं; उन्हें लायब्रेरी फीस मामले में आक्रामक रुख अपनाना चाहिए और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के सामने सक्रियताभरा प्रतिनिधित्व करना चाहिए । समर्थकों को यह देख कर लेकिन निराशा हो रही है कि विपिन शर्मा इस मामले में ज्यादा सक्रियता दिखाने से बचने की ही कोशिश कर रहे हैं, और सिर्फ जुबानी समर्थन देने तक ही अपने को सीमित रखे हुए हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि लायब्रेरी फीस मामले में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजिंदर भारद्वाज जिस तरह अलग-थलग पड़े हैं; उसे देखते हुए इस मामले के जरिए फरीदाबाद की राजनीति में अपना अच्छा मुकाम बनाने का विपिन शर्मा के पास बढ़िया मौका है । उनके बीच निराशा लेकिन इस बात को लेकर है कि विपिन शर्मा मौके का फायदा उठाने का प्रयास करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । इस मामले में पड़ने और पड़ सकने वाले दबाव से बचने के लिए विपिन शर्मा ने भी इस मामले में ज्यादा बात करने से बचने वाला रवैया अपना लिया है ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों पर थोपी गई लायब्रेरी फीस के मामले में जिस तरह से पूरी तरह उपेक्षा का, दोहरेपन का और सिर्फ बातों का रवैया अपनाया है - उससे लग रहा है कि यह मामला उनके गले में एक ऐसी हड्डी की तरह से फँस गया है, जिसे उनके लिए न उगलते बन रहा है और न निगलते ही बन रहा है । 

Tuesday, August 18, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव - यानि फुल ड्रामा; उर्फ़ अभी तो पार्टी शुरू हुई है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव के लिए उम्मीदवारों ने कमर पूरी तरह कस ली है, और उनमें कइयों तथा उनके समर्थकों व शुभचिंतकों की हरकतों ने सी ग्रेड हिंदी फिल्मों का सा नजारा पेश किया हुआ है । इस नजारे में गीत/संगीत की महफिलें हैं, देशभक्ति के नारे हैं, डबल मीनिंग डायलॉग हैं, हिंसा उकसाने वाली परिस्थितियाँ हैं, माँ-बहन की गालियाँ हैं, फैमिली शो है, मजबूरियाँ हैं, लाचारियाँ हैं - यानि कुल मिलाकर यहाँ हर वह मसाला मौजूद है, जिसे किसी सीग्रेड मुंबईया फिल्म को कामयाब बनाने के लिए जरूरी समझा जाता है ।  
डांस पार्टियों के जरिए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को लुभाने वाले विजय गुप्ता एक बार फिर अपने इसी फार्मूले को आजमाने निकल पड़े हैं, और उन्होंने तरह-तरह के बहानों से गीत-संगीत की महफिलों को सजाना शुरू कर दिया है । राजीव सिंह ने वोट माँगते हुए 'गाँधी जी की जय', 'नेहरू जी की जय' का उद्घोष करके चुनावी ड्रामे में देशभक्ति का डोज डाल दिया है । योगिता आनंद ने डबल मीनिंग वाला डायलॉग - 'आप को दूसरे तरीके से समझाना पड़ेगा' बोल कर माहौल में खासी गर्मी पैदा कर दी है । डबल मीनिंग वाले डायलॉग का फायदा यही होता है कि दूसरे लोग अपने अपने नजरिए से उसका अर्थ लगाते हैं । योगिता आनंद ने यह डायलॉग जिन प्रदीप महापात्रा से बोला, वह प्रदीप महापात्रा तो इस बात को धमकी के रूप में ले रहे हैं; किंतु योगिता आनंद के शुभचिंतक लग रहे सुनील अरोड़ा उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि नहीं, यह धमकी नहीं है । सुनील अरोड़ा को लोग यूँ तो नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी राजेश कुमार अग्रवाल के पार्टनर के रूप में जानते/पहचानते हैं, लेकिन उनका आग्रह यह रहता है कि उन्हें 'कपड़े फाड़ देने वाले' के रूप में जाना/पहचाना जाए । योगिता आनंद का पक्ष लेते हुए सुनील अरोड़ा ने प्रदीप महापात्रा को फोन करके जो धमकी दी, और जिसमें उन्होंने सुधीर कत्याल को भी शामिल कर लिया - वह पूरी बातचीत किसी सी ग्रेड फिल्म को सफल बनाने के लिए अपनाया जाने वाला पिता/पिटाया फार्मूला है । करीब साढ़े सोलह मिनट की इस टेलीफोनिक बातचीत में सुनील अरोड़ा बात तो मर्यादा की और महिलाओं की इज्जत की करते हैं -  लेकिन 'तुम मुझे जानते नहीं हो, मैं कपड़े फाड़ देता हूँ' जैसे संवाद बार बार बोलते हैं और माँ-बहन की ऐसी गालियाँ निकालते हैं, जिन्हें यहाँ लिखा जाना संभव नहीं है । माँ-बहन की गालियाँ निकालते हुए माँ-बहनों की इज्जत की और मर्यादा की फिक्र करने का वाकया चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य को सचमुच रोमांचपूर्ण बना देता है । इसे अतिथि भूमिका में आए सुधीर कत्याल और तनावपूर्ण बना देते हैं, जब वह सुनील अरोड़ा को ही 'चोरों का साथ देने वाला' और 'लुच्चा' ठहरा देते हैं । 
ऐसा न समझा जाए कि इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य में सिर्फ गालियाँ व धमकियाँ ही हैं - यहाँ पारिवारिक मिलन के पवित्र भावनात्मक दृश्य भी है, जिन्हें प्रस्तुत करने का श्रेय अतुल गुप्ता को है । अतुल गुप्ता ने महीन किस्म की होशियारी दिखाते हुए अपनी वैवाहिक वर्षगाँठ के दिन अपनी कमेटी का एक आधिकारिक कार्यक्रम तय कर लिया, जिसे शाम/रात को अपनी पत्नी को शामिल करके अपनी वैवाहिक वर्षगाँठ की पार्टी के रूप में कन्वर्ट कर लिया और लोगों को एक सुखद पारिवारिक माहौल वाली फीलिंग दी । चर्चा रही कि पार्टी में मौजूद कुछेक लोगों ने आहें भी भरी कि काश वह भी इस्टीट्यूट की किसी कमेटी के चेयरमैन होते, तो वह भी इंस्टीट्यूट के पैसे पर अपनी वैवाहिक वर्षगाँठ की पार्टी दे पाते । पर सब की किस्मत अतुल गुप्ता जैसी थोड़े ही होती है ! ग्लैमर और रोमांच से भरपूर इन दृश्यों के बीच मजबूरियों वाले सीन भी हैं, जिनमें पैसों की कमी का वास्ता देकर बंद कर दी गई इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच की लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर पढ़ने को मजबूर बच्चे दिखाई दे रहे हैं - जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है । जिस फरीदाबाद ब्रांच के एक्सऑफिसो सदस्य विजय गुप्ता सेमीनारों के नाम पर इंस्टीट्यूट का पैसा पानी की तरह बहा रहे हों और ब्रांच के चेयरमैन के चुनाव में अपने वोट का इस्तेमाल करते रहे हों, उस फरीदाबाद ब्रांच में पैसों की कमी के चलते लाइब्रेरी बंद हो जाती है और विजय गुप्ता के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती है, और बच्चे परेशानी उठाने के लिए मजबूर होते हैं ।
मुंबईया हिंदी फिल्म जिस तरह एक लाचार बूढ़ी माँ या लाचार बूढ़े बाप के बिना पूरी नहीं होती है, तो उसी तर्ज पर यहाँ - इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य में लाचारी वाला रोल निभाने के लिए इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष मनोज फडनिस हैं, जो एक कुशल अभिनेता की तरह अपनी 'लाचारी' वाली भूमिका को बड़ी खूबी से निभाते 'दिख' रहे हैं ।    
इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य ने अभी जो सीन दिखाए हैं, उनसे आभास मिलता है कि जैसे जैसे चुनाव की गर्मी और बढ़ेगी, वैसे वैसे ड्रामा और ज्यादा दिलचस्प होता जायेगा - क्योंकि 'अभी तो पार्टी शुरू हुई है ।'

Friday, July 31, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में जिस तरह से पैसों के घपलों और लूट-खसोटों की बातें सामने आ रही हैं, और उनमें विजय गुप्ता व उनके नजदीकियों की मिलीभगत के संकेत मिल रहे हैं - उस पर पर्दा डालने की जिम्मेदारी क्या प्रेसीडेंट मनोज फडनिस ने सचमुच ले ली है

फरीदाबाद । विजय गुप्ता ने इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल तथा सेक्रेटरी प्रदीप कौशिक को भरोसा दिया है कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को पूरी तरह से सेट कर लिया है कि वह तीन अगस्त की मीटिंग के उनके एजेंडे में कोई रूकावट पैदा करने के बारे में सोचेंगे भी नहीं ।उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी की तीन अगस्त की प्रस्तावित मीटिंग का प्रमुख एजेंडा ब्रांच के बैंक एकाउंट्स से पैसा निकालने की प्रक्रिया में ट्रेजरार की भूमिका को वैकल्पिक बना देने का नियम पास कराना है । मौजूदा नियम के अनुसार, बैंक से पैसा निकालने में ट्रेजरार की भूमिका जरूरी है, और उसके साथ चेयरमैन या सेक्रेटरी के हस्ताक्षर होने की व्यवस्था है । तीन अगस्त की प्रस्तावित मीटिंग के एजेंडे में चेयरमैन की भूमिका को जरूरी बना देने तथा सेक्रेटरी व ट्रेजरार की भूमिका को वैकल्पिक कर देने की तैयारी है । फरीदाबाद ब्रांच के ट्रेजरार डीसी गर्ग ने इस तैयारी को इंस्टीट्यूट के मान्य निर्देशों का उल्लंघन करने तथा ब्रांच के पैसों का मनमाने तरीके से दुरूपयोग करने के लिए रास्ता बनाने के प्रयास के रूप में रेखांकित किया है; तथा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस से गुहार लगाई है कि वह हस्तक्षेप करके फरीदाबाद ब्रांच में बैंक एकाउंट्स की देखभाल में छेड़खानी करने की इस तैयारी को सफल न होने दें । इस संबंध में डीसी गर्ग ने मनोज फडनिस को तथ्यों का विस्तार से हवाला देते हुए एक लंबा पत्र लिखा है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह से ब्रांच के चेयरमैन और सेक्रेटरी ब्रांच के पैसों का मनमाना इस्तेमाल करना चाहते हैं - जिसमें ट्रेजरार के रूप में चूँकि वह बाधा बन रहे हैं, इसलिए अब वह उन्हें ही रास्ते से हटा देना चाहते हैं । 
मनोज फडनिस को संबोधित अपने पत्र की प्रति डीसी गर्ग ने चूँकि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल, रीजनल काउंसिल के सदस्यों तथा फरीदाबाद के लोगों को भी भेजी है - इसलिए फरीदाबाद ब्रांच में पैसों की 'लूट-खसोट की व्यवस्था' बनाने की तैयारी पर थोड़ा दबाव महसूस किया जा रहा है । इस दबाव के कारण ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल और सेक्रेटरी प्रदीप कौशिक कहीं कमजोर न पड़ जाएँ, इसलिए उन्हें ढ़ाढ़स देने के लिए विजय गुप्ता को खुद सामने आना पड़ा है । विजय गुप्ता इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य हैं, और इस नाते से वह फरीदाबाद की ब्रांच में एक्सऑफिसो सदस्य हैं । फरीदाबाद ब्रांच को अपने कब्जे में रखने के लिए वह ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाते हैं - और भूमिका निभाने की प्रक्रिया में जब भी जरूरत होती है, तब वह पर्दे के सामने आने में भी नहीं हिचकते हैं । ब्रांच के चेयरमैन के चुनाव में जब उन्हें लगता है कि उनके वोट के बिना उनके उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा, तब वह ब्रांच के चुनाव में अपना वोट डालने के लिए आगे आ जाते हैं । इंस्टीट्यूट की महान आदर्श परंपरा में इसे अच्छा नहीं माना जाता है - लेकिन विजय गुप्ता प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट की महान आदर्श परंपराओं की बजाए अपने स्वार्थों को तवज्जो देते हैं; और जब कभी आदर्श परंपराएँ उनके स्वार्थ में बाधा बनती हैं, तो वह उन्हें कुचल कर अपने स्वार्थ पूरे करते हैं । फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी की तीन अगस्त की मीटिंग के मुख्य एजेंडा के मास्टर माइंड के रूप में विजय गुप्ता को ही देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल इसीलिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को लिखे डीसी गर्ग के पत्र के कारण उक्त एजेंडे के खतरे में पड़ने के संकेत मिले, तो विजय गुप्ता पर्दा हटा कर सामने आ गए हैं । 
विजय गुप्ता ने उक्त एजेंडे को सफल बनाने की तैयारी में लगे फरीदाबाद ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल व सेक्रेटरी प्रदीप कौशिक को तो आश्वस्त किया ही है कि उन्हें मनोज फडनिस की तरफ से डरने की जरूरत नहीं है; फरीदाबाद के अपने दूसरे समर्थकों को भी बताया है कि डीसी गर्ग बेकार में ही अपनी एनर्जी और समय खराब कर रहे हैं - उन्हें नहीं पता कि मनोज फडनिस फरीदाबाद के किसी मामले में उनके खिलाफ कोई काम कर ही नहीं सकते हैं । विजय गुप्ता लोगों को याद दिला रहे हैं कि पिछले वर्ष ब्रांच के तत्कालीन सेक्रेटरी विपिन मंगला ने तत्कालीन प्रेसीडेंट को ऑडीटोरियम से संबंधित घपलों का हवाला देते हुए खर्चों का ऑडिट कराने के लिए पत्र लिखा था, जिसका लेकिन उन्हें आज तक जबाव भी नहीं मिला है । उल्लेखनीय है कि ब्रांच की बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में विजय गुप्ता पर उन घपलों में शामिल होने का आरोप है । विजय गुप्ता का दावा है कि जैसे विपिन मंगला की माँग पर इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट ऑफिस चुप बना रहा है, वैसे ही डीसी गर्ग को भी प्रेसीडेंट ऑफिस से कोई जबाव नहीं मिलेगा । विजय गुप्ता का कहना है कि प्रेसीडेंट के पद पर चाहें कोई भी बैठा हो, किसी में उनके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर की बात, उनके खिलाफ हुई शिकायत का संज्ञान लेने तक की हिम्मत नहीं है । विजय गुप्ता का कहना है कि फरीदाबाद से और खासतौर से उनसे संबंधित मामलों में इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट उन्हें ही समझा/माना जाए । लोगों का कहना है कि इस तरह की बातों से विजय गुप्ता दरअसल अपने नजदीकियों और समर्थकों का हौंसला बनाये रखने का प्रयास कर रहे हैं । फरीदाबाद ब्रांच में जिस तरह से पैसों के घपलों और लूट-खसोटों की बातें सामने आ रही हैं, और उनमें विजय गुप्ता व उनके नजदीकियों की मिलीभगत के संकेत मिल रहे हैं - उससे विजय गुप्ता के सामने अपने नजदीकियों व समर्थकों के उखड़ने/बिदकने का खतरा पैदा हो गया है । इसलिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि वह अपने नजदीकियों व समर्थकों को विश्वास दिलाएँ कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट पूरी तरह उनकी 'पकड़' में है ।
फरीदाबाद ब्रांच में बैंक से पैसे निकालने की प्रक्रिया से ट्रेजरार को अलग कर देने की कार्रवाई को जरूरी बताते हुए ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल व सेक्रेटरी प्रदीप कौशिक ने तर्क दिया है कि ट्रेजरार के रूप में डीसी गर्ग ने कई भुगतान करने से इंकार कर दिया है, जिस कारण ब्रांच के संचालन में बाधा पड़ रही है । उनका कहना है कि यह कदम उन्होंने बहुत मजबूरी में उठाया है, क्योंकि डीसी गर्ग के रवैये के चलते ब्रांच में कामकाज कर पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव होता जा रहा है । डीसी गर्ग ने लेकिन प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को लिखे अपने विस्तृत पत्र में बताया है कि उन्होंने अधिकतर भुगतान किए ही हैं, और जो कुछेक भुगतान रोके हैं - वह ऐसे मामले हैं जिनमें नियम-कानूनों का पालन नहीं किया गया है और जो खर्चे संदेहास्पद हैं । डीसी गर्ग का कहना है कि ऐसे मामलों में भी उन्होंने सुझाव दिया है कि इन मामलों में ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी सदस्यों की सलाह लेकर फैसला किया जाए । डीसी गर्ग का कहना है कि ब्रांच के खर्चों को लेकर इंस्टीट्यूट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं, जिनका पालन हर हाल में होना ही चाहिए; और यदि कहीं थोड़ा इधर-उधर होने की जरूरत हो तो ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों को विश्वास में लेकर ही खर्चों का फैसला करना चाहिए । डीसी गर्ग का कहना है कि ट्रेजरार के रूप में उन्होंने सिर्फ उन्हीं खर्चों के भुगतान को करने से इंकार किया है, जिन खर्चों में न तो नियम-कानून व दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है, और न ही ब्रांच की सामूहिक भागीदारी को सुनिश्चित किया गया है । डीसी गर्ग का कहना है कि वह ब्रांच के खर्चों में पारदर्शिता रखने की बात कर रहे हैं, और उनकी यह बात चेयरमैन व सेक्रेटरी तथा 'उनके आका' को इतनी बुरी लग रही है कि वह उन्हें प्रक्रिया से ही अलग कर देने पर आमादा हो गए हैं । इसे बिडंवना ही कहा जायेगा कि चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे प्रोफेशन की संस्था में हिसाब-किताब में पारदर्शिता बनाये रखने की बात को दबाने के लिए संस्था की सर्वोच्च कमेटी के एक सदस्य - विजय गुप्ता ने कमर कस ली है । यह देखना दिलचस्प होगा कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस इस मामले में न्याय कर पायेंगे और या विजय गुप्ता के 'दावे' को सही साबित करेंगे ।

Saturday, July 25, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए फरीदाबाद से प्रस्तुत विपिन शर्मा की उम्मीदवारी ने विजय गुप्ता के संग-साथ की बदनामी झेल रहे दीपक गर्ग के लिए जो मुसीबत और चुनौती खड़ी की है, उसमें तजेंद्र भारद्वाज को अपनी दाल भी पकती हुई दिख रही है

फरीदाबाद । विजय गुप्ता के साथ गठजोड़ के बाबत दीपक गर्ग की कन्फ्यूज्ड स्थिति को रीजनल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में तजेंद्र भारद्वाज ने अपने लिए संभावनाओं के दरवाजों को खुलता हुआ पाया/देखा है, और स्थिति का पूरा पूरा फायदा उठाने की तैयारी दिखाई है । दरअसल दीपक गर्ग के लिए यह तय कर पाना खासा मुश्किल हो रहा है कि विजय गुप्ता के साथ अपने गठजोड़ को वह बनाये रखें या उससे पीछा छुड़ा लें । उनका यह असमंजस इस बात से जाहिर है कि कभी तो वह विजय गुप्ता के साथ अपनी दूरी दिखाने/जताने लगते हैं, और शिकायत करते हैं कि लोग फिजूल में ही उनका नाम विजय गुप्ता के साथ जोड़े रखते हैं; किंतु फिर कुछ ही दिन बाद वह विजय गुप्ता के साथ सक्रिय नजर आने लगते हैं । पिछले कई महीनों से चल रहा दीपक गर्ग का 'कभी दूर कभी पास' का यह खेल लोग खासी दिलचस्पी के साथ देख रहे हैं; और इसे देखते हुए दीपक गर्ग की कन्फ्यूज्ड मनःस्थिति को पहचान व समझ रहे हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि असल में होता यह है कि जब विजय गुप्ता की बदनामियों के कारण दीपक गर्ग को नुकसान होता हुआ नजर आता है, तब वह उनसे दूरी बनाने/दिखाने लगते हैं; लेकिन जब उन्हें विजय गुप्ता से फायदा उठाना होता है, तब वह उनके पास मंडराने लगते हैं । रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की कोशिश में पिछले दो अवसरों पर दीपक गर्ग ने यही नाटक किया था । पहली बार विजय गुप्ता की मदद से चेयरमैन बनने का प्रयास करते हुए उन्होंने रीजनल काउंसिल में अपने 'साथियों' से धोखाधड़ी करने में भी परहेज नहीं किया; किंतु अपने प्रयास में असफल होने पर जब उन्हें पता चला कि उनकी असफलता में विजय गुप्ता की बदनामी का बड़ा रोल है, तो उन्होंने विजय गुप्ता से दूर होने का ऐलान कर डाला । दूसरी बार, यानि इस वर्ष के लिए चेयरमैन बनने खातिर वह लेकिन फिर से विजय गुप्ता की छाया में खड़े दिखे । रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने के प्रयास में दीपक गर्ग दोबारा असफल हुए, तो वह फिर से विजय गुप्ता को कोसते नजर आए । 
दीपक गर्ग के सामने अब जब रीजनल काउंसिल के लिए दोबारा चुने जाने की चुनौती है, तो विजय गुप्ता के साथ 'कभी दूर कभी पास' का उनका यह खेल और ज्यादा तेज हो गया है । लोगों के बीच जब वह विजय गुप्ता के प्रति विरोध के स्वर सुनते हैं तो वह विजय गुप्ता से दूर रहने की कसमें खाने लगते हैं; किंतु इसके साथ साथ वह विजय गुप्ता के आयोजनों में दिलचस्पीपूर्ण सक्रियता निभाते भी दिखाई पड़ते हैं - इस सक्रियता के जरिए चूँकि उन्हें लोगों तक पहुँचने का अवसर मिलता दिखता है, इसलिए इसका फायदा उठाने के लालच में वह यह भूल ही जाते हैं कि लोगों के बीच उन्होंने विजय गुप्ता से दूर रहने की बातें कहीं हैं । जम्मू में पिछले दिनों लोगों ने उनसे जब सवाल पूछे कि उन्होंने और विजय गुप्ता ने प्रोफेशन व प्रोफेशन से जुड़े लोगों के लिए क्या किया है, तो दीपक गर्ग ने पहले तो यह कह कर पीछा छुड़ाने की कोशिश की कि वह इस वर्ष निकासा चेयरमैन हैं, इसलिए उससे संबंधित सवाल ही पूछे जाएँ; इस पर उन्हें सुनने को मिला कि निकासा चेयरमैन तो वह पाँच महीने से हैं, सवाल तो उनसे 29 महीने के कामकाज के बारे में पूछे जा रहे हैं । इसके बाद उन्होंने विजय गुप्ता से पूछे जाने वाले सवाल उनसे पूछे जाने का विरोध किया - उनका तर्क रहा कि विजय गुप्ता ने प्रोफेशन के लिए क्या किया है, यह विजय गुप्ता से पूछिए । इस पर जब उन्हें यह सुनने को मिला कि चूँकि आप हर काम में विजय गुप्ता के साथ नजर आते हैं, तो उनके बारे में पूछे गए सवालों का जबाव भी आपको देना चाहिए - तब दीपक गर्ग ने ट्रेक बदला और दावा करने लगे कि कुछेक लोग झूठे ही विजय गुप्ता के साथ उनका नाम जोड़ते रहते हैं और कि उनका विजय गुप्ता के साथ कोई गठजोड़ नहीं है । जम्मू से लौटते ही किंतु वह विजय गुप्ता के आयोजनों में सक्रिय सहभागिता दिखाने में जुट गए । 
दीपक गर्ग का यह कन्फ्यूजन दरअसल इसलिए है क्योंकि रीजनल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में एक तरफ तो वह विजय गुप्ता की बदनामी के छीटों से बचना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वह विजय गुप्ता के 'इंतजामों' का फायदा भी उठाना चाहते हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों को हैरानी इस बात की है कि पिछली बार विजय गुप्ता के 'इंतजामों' पर निर्भर हुए बिना रीजनल काउंसिल का चुनाव जीत लेने वाले दीपक गर्ग इस बार विजय गुप्ता के इंतजामों पर इतने मजबूर क्यों हो गए हैं कि रोज रंग बदलते नजर आते हैं ? रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में दीपक गर्ग की पिछली बार की तथा इस बार की स्थिति की तुलना करने वाले लोगों का कहना है कि पिछली बार दीपक गर्ग ने अपने व्यवहार और अपनी बातों से लोगों के बीच विश्वास बनाया था और उम्मीद पैदा की थी, लेकिन पिछले करीब ढाई वर्षों में उन्होंने उस विश्वास को तो खत्म कर ही दिया है - अपने प्रति लोगों के बीच कोई उम्मीद भी बचा कर नहीं रखी है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010-12 वाले कार्यकाल में फरीदाबाद ब्रांच में उन्हें एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में प्रमोद माहेश्वरी ने बहुत परेशान किया था, जिस कारण से 2012 के रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें लोगों की अच्छी सहानुभूति मिली थी - और प्रथम वरीयता के वोटों में उनकी स्थिति प्रमोद माहेश्वरी से बहुत अच्छी और ऊपर थी । रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में लेकिन दीपक गर्ग का जो रवैया रहा, उसके कारण लोगों ने यही महसूस किया है कि दीपक गर्ग के साथ सहानुभूति दिखा कर उन्होंने बड़ी गलती की थी । दीपक गर्ग के रवैये से फरीदाबाद के लोगों ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है । विजय गुप्ता के साथ उन्होंने जिस तरह का गठजोड़ बनाया, उसने उनका और बंटाधार किया है । 
रही सही कसर विपिन शर्मा की उम्मीदवारी ने पूरी कर दी है । फरीदाबाद ब्रांच में विपिन शर्मा की जिस तरह की परफॉर्मेंस रही है, उससे उन्होंने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी प्रभावी पहचान बनाई है और साथ में वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी अपने लिए विश्वास व उम्मीद पैदा की है । इससे उनकी लोकप्रियता में और इजाफा हुआ । ब्रांच के एक उत्साही व सक्रिय सदस्य के रूप में विपिन शर्मा की लोगों के बीच साख इसलिए भी बढ़ी, क्योंकि ब्रांच के चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले थे । इस बढ़ी साख के भरोसे ही दूसरे/तीसरे वर्ष में उन्हें ब्रांच के चेयरमैन पद के प्रबल दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - किंतु विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने षड्यंत्र करके लोगों की भावनाओं को कामयाब नहीं होने दिया । दीपक गर्ग को खतरा था कि चेयरमैन बनने के बाद विपिन शर्मा फिर रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ेंगे और उनके लिए मुसीबत खड़ी करेंगे; इसलिए उन्होंने फार्मूला अपनाया कि वह विपिन शर्मा को चेयरमैन ही नहीं बनने देंगे - जिससे कि न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी । दीपक गर्ग ने अपने इस फार्मूले को कामयाब बनाने के लिए विजय गुप्ता का सहयोग लिया । फरीदाबाद ब्रांच में राजनीति करते हुए विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने जिस तरह की हरकतें की हैं उससे लोगों के बीच इनके प्रति नाराजगी तथा विपिन शर्मा के प्रति हमदर्दी का भाव बना है । पिछली बार और इस बार की स्थिति की तुलना करते हुए लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार जो स्थिति दीपक गर्ग की थी इस बार वह स्थिति तो विपिन शर्मा की है; और पिछली बार जो दशा प्रमोद माहेश्वरी की थी, इस बार वह दशा दीपक गर्ग की है ।  
दीपक गर्ग के लिए विपिन शर्मा ने जो खतरा खड़ा किया है, उसमें तजेंद्र भारद्वाज को अपनी दाल पकती हुई दिख रही है । दरअसल कई लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार दीपक गर्ग ने प्रमोद माहेश्वरी को जो टक्कर दी थी, उसमें प्रमोद माहेश्वरी ने तो जैसे-तैसे करके अपनी सीट बचा ली थी - इस बार लेकिन विपिन शर्मा से दीपक गर्ग को जो टक्कर मिलती दिख रही है, उसमें दीपक गर्ग के लिए अपनी सीट बचा पाना मुश्किल लग रहा है । तजेंद्र भारद्वाज इसी स्थिति का लाभ उठाना चाहते हैं । मजे की बात है कि दीपक गर्ग और तजेंद्र भारद्वाज, दोनों ही विजय गुप्ता के साथी/सहयोगी रहे हैं - लेकिन विजय गुप्ता के संगसाथ की बदनामी दीपक गर्ग को ज्यादा मिली; और इस बदनामी के कारण ही दीपक गर्ग अक्सर ही विजय गुप्ता से दूर दिखने का प्रयास करते हैं । उनके इस प्रयास से विजय गुप्ता के कई समर्थक दीपक गर्ग से भड़के और चिढ़े हुए हैं । इस बिना पर तजेंद्र भारद्वाज को लगता है कि विजय गुप्ता के समर्थक लोगों के बीच उन्हें ज्यादा समर्थन मिल जायेगा । तजेंद्र भारद्वाज के इस बीच संजय वासुदेवा से भी तार जोड़ने की खबरें हैं, जिससे तजेंद्र भारद्वाज को अपने समर्थन-आधार को बढ़ाए जाने का भरोसा है । तजेंद्र भारद्वाज ने जो जाल फैलाया है, उसमें उनके द्वारा दीपक गर्ग का शिकार करने की तैयारी देखी जा रही है । तजेंद्र भारद्वाज की यह तैयारी यदि सचमुच कामयाब रही, तो दीपक गर्ग के लिए वास्तव में भारी मुसीबत हो जाएगी । दीपक गर्ग के समर्थक व शुभचिंतक समझे जाने वाले लोगों का कहना है कि दीपक गर्ग ने विजय गुप्ता के साथ अपने गठजोड़ को लेकर एक स्पष्ट व पारदर्शी रवैया यदि नहीं दिखाया, तो दीपक गर्ग के लिए भारी मुसीबत हो जानी है ।