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Thursday, September 14, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में कभी सक्रिय न दिखे विपिन शर्मा ने अचानक से उम्मीदवारी प्रस्तुत करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के तापमान को बढ़ाया

नई दिल्ली । विपिन शर्मा को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बना कर सुरेश बिंदल और नरेश गुप्ता की जोड़ी ने राजीव अग्रवाल और ओंकार सिंह रेनु के सामने गंभीर चुनौती पैदा करते हुए डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी बढ़ा दी है । इनमें भी ओंकार सिंह रेनु के लिए मामला ज्यादा संगीन हो गया है - क्योंकि अपने क्लब के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह में उन्होंने सुरेश बिंदल को तवज्जो दे/दिलवा कर अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने की जो तैयारी की थी, सुरेश बिंदल ने उसी दिन विपिन शर्मा की उम्मीदवारी घोषित करके उनकी सारी तैयारी पर पानी फेर दिया है । ओंकार सिंह रेनु ने अपने नजदीकियों के बीच रोना भी रोया कि सुरेश बिंदल के चक्कर में उन्होंने दिल्ली के कई पूर्व गवर्नर्स को नाराज भी किया, जिसके चलते चुनावी राजनीति में महत्त्व रखने वाले दिल्ली के चार पूर्व गवर्नर्स ने उनके क्लब के कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया - लेकिन सुरेश बिंदल ने भी उन्हें धोखा दे दिया, जिसके बाद वह 'न घर के रहे हैं और न घाट के' । राजीव अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि जिस क्षेत्र विशेष को अपने समर्थक-आधार के रूप में दिखा/बता कर वह अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट कर रहे थे, उस क्षेत्र विशेष से ही विपिन शर्मा के भी चुनावी मैदान में कूद पड़ने से उनका 'आधार-क्षेत्र' कमजोर पड़ गया है ।
फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को लेकर डिस्ट्रिक्ट में जो गहमागहमी चल रही है, उसमें विपिन शर्मा की उम्मीदवारी के प्रवेश से लेकिन जो राजनीतिक समीकरण बना है - उसने राजीव अग्रवाल के लिए राजनीतिक अनुकूलता भी बनाई है । दरअसल दिल्ली में चुनावी नजरिए से पूर्व गवर्नर्स का जो ताकतवर खेमा है, उसके रवैये से लगता है कि वह न तो ओंकार सिंह रेनु की उम्मीदवारी को समर्थन देगा और न विपिन शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थन में खड़ा होगा; ऐसे में राजीव अग्रवाल के सामने मौका है कि वह उक्त खेमे का समर्थन प्राप्त कर लें । राजीव अग्रवाल ने उक्त खेमे के नेताओं का समर्थन जुटाने के प्रयास तो किए हैं, लेकिन हाँ या न में उन्हें कोई साफ जबाव अभी नहीं मिला है । उक्त खेमे के नेता असल में राजीव अग्रवाल में उस मैच्योरिटी का अभाव पा/देख रहे हैं, जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए उन्हें जरूरी लगती है - इसलिए वह राजीव अग्रवाल को 'हाँ' नहीं कह पा रहे हैं, और 'न' इसलिए नहीं कह रहे हैं कि कहीं उन्हें कोई मैच्योर उम्मीदवार यदि नहीं मिला - तो फिर उन्हें राजीव अग्रवाल की उम्मीदवारी का ही झंडा उठाना पड़ेगा । आरके शाह इस खेमे का समर्थन प्राप्त कर पाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें समर्थन देने के मामले में खेमे के नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पा रही है । इसीलिए राजीव अग्रवाल के सामने चुनौती के साथ-साथ उम्मीद की किरण भी है ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री पिछले दो वर्षों से नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में है और उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अगले लायन वर्ष से उसका डिस्ट्रिक्ट स्टेटस बहाल होने की घोषणा हो जाएगी । चर्चा है कि अगले वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की नियुक्ति तो लायंस इंटरनेशनल कार्यालय करेगा, और फर्स्ट व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए इस वर्ष चुनाव हो जायेगा । ओंकार सिंह रेनु पिछले कुछ वर्षों से डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में काफी सक्रिय हैं और विभिन्न मंचों पर उन्होंने प्रभावी सक्रियता और संलग्नता दिखाई है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में नकारात्मक सोच रखने वाले नेताओं के साथ निकटता के चलते उन्हें वह मुकाम हासिल नहीं हो सका है - जिसके कि वास्तव में वह हकदार हैं । राजीव अग्रवाल ने पिछले कुछ समय में अपने आप को सक्रिय किया है और उन्होंने हर किसी की गुडबुक में शामिल होने का प्रयास किया है; अभी तक पक्के तौर पर तो वह किसी की गुडबुक में 'दर्ज' नहीं हो पाए हैं, लेकिन चुनावी नजरिए से दिल्ली में पूर्व गवर्नर्स का जो खेमा है - वह उन्हें एक विकल्प के रूप में जरूर देखने लगा है । विपिन शर्मा की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने सभी को चौंकाया है । यूँ तो इस वर्ष वह रीजन चेयरमैन हैं, लेकिन एक लायन सदस्य के रूप में उन्हें कभी सक्रिय नहीं देखा गया है और डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोग उन्हें पहचानते भी नहीं हैं । फिर भी अचानक से प्रस्तुत हुई उनकी उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के तापमान को बढ़ा तो दिया ही है ।

Friday, November 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की गुमनाम कोशिश से साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं

फरीदाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में ऑडीटोरियम बनाने में हुए घपले की जिम्मेदारी थोपने को लेकर फरीदाबाद में आरोपों-प्रत्यारोपों का जो खेल चल रहा है, वह अब उस मुकाम तक जा पहुँचा है - जहाँ 'नंगे' हुए लोग यह साबित करने का प्रयास करने में जुट गए हैं कि 'हमाम में तो सभी नंगे थे'; और अपने इस प्रयास में वह हमाम से बाहर आने को भी तैयार हो गए हैं - यानि उनका जो नंगापन अभी तक दूसरे लोग दिखा रहे थे, उसे अब वह खुद ही दिखाने को तैयार हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में आर्थिक घपलों को लेकर अभी तक विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज निशाने पर थे; लेकिन अभी हाल में सामने आए एक गुमनाम पत्र में दावा किया गया है कि इन बेचारों ने तो इंस्टीट्यूट की गाइडलाइंस के अनुसार ही काम किया था, और घपलों के लिए वास्तव में जिम्मेदार तो विपिन शर्मा हैं । गौर करने वाला तथ्य यह है कि फरीदाबाद ब्रांच में घपलों के लिए जो लोग विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को जिम्मेदार ठहराते हैं - वह जाने/पहचाने लोग हैं और जो अपनी पहचान के साथ आरोप लगाते रहे हैं तथा सुबूत पेश करते रहे हैं; किंतु जिन लोगों ने घपलों के लिए विपिन शर्मा को जिम्मेदार ठहराया है, उन्होंने अपनी पहचान छिपा कर यह काम किया है । यानि उनमें न तो अपनी पहचान बताने का साहस है, और न उन्होंने सीधे विपिन शर्मा का नाम लिया है । इस तरह से उन्होंने साबित किया है कि जो बेईमान और कायर थे, वह बेईमान और कायर ही रहेंगे । यह कौन लोग हैं ? गुमनाम पत्र में जिस तरह से विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की फूहड़ सी कोशिश की गई है, उससे स्पष्ट रूप से जाहिर/साबित है कि इस गुमनाम पत्र के पीछे यही लोग हैं ।
उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन चारों लोगों में विजय गुप्ता सेंट्रल काउंसिल की तथा दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल की सीट बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं, और यह दोनों गुरु-चेले के रूप में पहचाने जाते हैं; तेजेंद्र भारद्वाज और विपिन शर्मा रीजनल काउंसिल में प्रवेश करने के लिए प्रयासरत हैं । तेजेंद्र भारद्वाज एक समय विजय गुप्ता गिरोह के सदस्य हुआ करते थे, लेकिन गिरोह में नंबर दो की दौड़ में दीपक गर्ग से पिछड़ जाने के कारण वह हालाँकि गिरोह से अलग हो गए थे, किंतु ब्रांच में मची लूट में चूँकि उनकी भी भागीदारी को रेखांकित किया जाता है, इसलिए उन्हें भी विजय गुप्ता गिरोह के साथ ही देखा जाता है ।  विपिन शर्मा अपने आप को प्रोफेशन में 'ट्रू सेवक' के रूप में प्रस्तुत करते हैं । मजे की बात यह है कि फरीदाबाद में जो लोग विजय गुप्ता गिरोह की कारस्तानियों को उद्घाटित करते हैं, उन्हें विपिन शर्मा के समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । विजय गुप्ता और उनके गिरोह के सदस्यों के लिए मुसीबत की बात यह है कि करीब दो हजार की सदस्यता वाली फरीदाबाद ब्रांच में उन्हें एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो अपनी पहचान के साथ उनकी करतूतों की वकालत कर सके, और इसलिए ही उन्हें गुमनाम पत्र का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा । यानि जिन लोगों पर बेईमान और कायर होने के आरोप रहे, वह बेईमान और कायर ही साबित हुए । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपलों का मामला मुख्य रूप से पिछली टर्म से शुरू हुआ, जबकि ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में दूसरे कुछेक लोगों के साथ विजय गुप्ता के पार्टनर महेश गोयल, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज व विपिन शर्मा भी होते थे । ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के अध्यक्ष विजय गुप्ता रहे हैं । ऑडिट रिपोर्ट में ब्रांच बिल्डिंग में अनियमितता/फ्रॉड बताया गया । एक तर्क यह बनता है कि ब्रांच बिल्डिंग में यदि घपला हुआ, तो ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी सदस्य उसके लिए जिम्मेदार हुए । यह तर्क घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने का काम करता है; क्योंकि जब सभी को जिम्मेदार बता दिया गया तो मामले को रफा-दफा करना आसान हो जाता है । और यदि इस तर्क को सच मान भी लिया जाए, तो यह सवाल तो फिर भी बचा रह जाता है कि घपले के जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की/करवाई गई ? इसलिए देखने/समझने की बात यह है कि जब घपले का मामला सामने आया, तो किस किस का क्या क्या रवैया था ? कौन मामले को छिपाना/दबाना चाहता था, और कौन घपलेबाजों को पकड़ना/पकड़वाना चाहता था ? इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग के घपले का मामला संजीव चौधरी ने उठाया था, और उन्होंने फंड रोक देने की सिफारिश की थी - जिसका विजय गुप्ता ने जोरदार तरीके से विरोध किया था । विजय गुप्ता का कहना था कि ऑडिट रिपोर्ट में जिसे अनियमितता कहा गया है - उसका संबंध पैसों की हेराफेरी से नहीं है, बल्कि व्यवस्थासंबंधी ऊँच-नीच से है; और इस आधार पर फंड रोकना अन्याय होगा । 
यह विजय गुप्ता ही हैं, जिनकी शह पर ब्रांच के फंड इस्तेमाल करने की प्रक्रिया से ट्रेजरर को बाहर करने/रखने के काम हुए । तेजेंद्र भारद्वाज के चेयरमैन-काल में ट्रेजरर रहे विपिन मंगला ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिख कर आरोप लगाया था कि उन्हें ट्रेजरर की जिम्मेदारी नहीं निभाने दी जा रही हैं । विजय गुप्ता की लॉबीइंग के चलते तत्कालीन प्रेसीडेंट ने इस शिकायत पर कान नहीं दिया । उसके अगले वर्ष, सेक्रेटरी के रूप में विपिन मंगला ने ऑडिटोरियम के खर्चे का स्पेशल ऑडिट करने की माँग करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को फिर एक पत्र लिखा था, लेकिन विजय गुप्ता ने उसकी भी कोई सुनवाई नहीं होने दी । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में मोटे तौर पर दो ग्रुप बन गए थे - एक ग्रुप का नेतृत्व विजय गुप्ता के हाथ में था; और विजय गुप्ता ने हमेशा यह प्रयास किया कि चेयरमैन पद उनके गिरोह के पास ही रहे, जिससे कि वह अपनी बेईमानियों पर पर्दा डाले रह सकें और बेईमानियों को करने का मौका बनाए रख सकें । दूसरे ग्रुप में वह लोग थे जो समय समय पर आरोप लगाते रहे और जाँच कराए जाने की माँग करते रहे । विपिन शर्मा इस दूसरे ग्रुप में थे । चेयरमैन पद अपने हाथ में रखने के लिए विजय गुप्ता को जब भी जरूरी लगा, एक्स-ऑफिसो सदस्य के रूप में उन्होंने अपने वोट का इस्तेमाल किया । अपने वोट का इस्तेमाल करते हुए विजय गुप्ता ने विपिन शर्मा को दरअसल इसीलिए चेयरमैन नहीं बनने दिया, क्योंकि उन्हें डर रहा कि विपिन शर्मा चेयरमैन बन गए तो ब्रांच बिल्डिंग के घपले सामने आ जायेंगे, और वह तथा उनके साथी फँसेंगे । विजय गुप्ता को चूँकि पत्थर पर अपना नाम लिखवाना था, इसलिए उन्होंने हर धतकर्म किया और अपने साथियों से साथ भी फरेब करने से नहीं चूके । विजय गुप्ता, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज की तिकड़ी ने ब्रांच बिल्डिंग के घपले के मामले को कभी भी ब्रांच की एजीएम में नहीं उठने/आने दिया; और विजय गुप्ता ने सेंट्रल काउंसिल में कभी इस मामले को उठाने का प्रयास तक नहीं किया । जैसा कि पहले बताया गया है कि सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग में संजीव चौधरी ने मामला उठाया भी, तो विजय गुप्ता ने उनका विरोध किया ।  
इन तथ्यों से जाहिर है कि विजय गुप्ता और उनके गिरोह के लोगों ने न सिर्फ ब्रांच बिल्डिंग में घपला किया, बल्कि घपले को छिपाने व दबाए रखने के लिए अनैतिक किस्म की राजनीति भी की; और अब कायरों की तरह अपनी पहचान छिपा कर लोगों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि घपला तो उन्होंने किया था, जो बार-बार जाँच कराए जाने की माँग करते रहे हैं । विपिन शर्मा, विपिन मंगला आदि का यह दोष तो माना जा सकता है कि उन्होंने घपलेबाजों को रोकने/पकड़ने का और और ज्यादा प्रयास नहीं किया - उन्हें और ज्यादा प्रयास करना चाहिए था; लेकिन इस दोष के कारण उन्हें घपलेबाजों से भी बड़ा दोषी मानना घपलेबाजों को सम्मान देने जैसा काम है । यह काम भी लेकिन जिस तरह गुमनाम रह कर किया जा रहा है, उससे साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं । 

Sunday, September 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों पर मनमाने तरीके से थोपी गई लायब्रेरी फीस मामले में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी से अपने आप को बचाने के लिए विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने फरीदाबाद में लोगों से छिप कर रहने का फार्मूला अपनाया

फरीदाबाद । इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों से लायब्रेरी फीस लेने के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि सेंट्रल काउंसिल और रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद से 'भाग' खड़े होने में ही अपनी खैर समझी है । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद में अपने खिलाफ माहौल देख/पहचान कर विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो पहले से ही फरीदाबाद में लोगों से मुँह छिपाते फिर रहे हैं, और सिर्फ अपने अपने खास लोगों के ही फोन उठा रहे हैं । जो लोग एसएमएस और ईमेल जैसे संवाद के व्यक्तिगत माध्यमों के जरिए, तथा फेसबुक जैसे खुले/सार्वजनिक मंच से इनसे सवाल पूछ रहे हैं - उन्हें भी जबाव देने से यह कन्नी काट रहे हैं । तेजिंदर भारद्वाज और विपिन शर्मा के लिए भी माहौल चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है - फलस्वरूप इन दोनों ने भी कभी जबाव देने तो कभी चुप लगा जाने वाला फार्मूला अपना लिया है । इनके किन्हीं किन्हीं समर्थकों ने साहस करके सवाल उठाने वाले लोगों से अनुरोध भी किया कि इंस्टीट्यूट की समस्याओं पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं की जानी चाहिए - किंतु उन्हें भी लोगों से जब लताड़ सुनने को मिली, तो वह भी पीछे हट गए । 
उल्लेखनीय है कि यह चारों फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सदस्य हैं - और इस नाते यदि यह चाहें तो सेकेंड्स में छात्रों से फीस बसूलने का फरमान वापिस हो सकता है । चारों को छोड़िये, एक अकेले विजय गुप्ता फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों के साथ हो रही 'लूट' को रोक सकते हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता अक्सर दावा करते हुए सुने गए हैं कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस तो उनके इशारे पर नाचते हैं, और फरीदाबाद के मामले में तो मनोज फडनिस ने उन्हें ही प्रेसीडेंट 'बना' दिया है । यंग मेंबर्स एम्पॉवरमेंट कमेटी के चेयरमैन के रूप में विजय गुप्ता जिस तरह की मनमानियाँ करते चल रहे हैं, और उनकी मनमानियों पर मनोज फडनिस जिस तरह से आँखें बंद करके बैठे हुए हैं, उससे विजय गुप्ता का उक्त दावा लोगों को सच भी जान पड़ता है । इसके बावजूद विजय गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की सुध नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल में होने के कारण फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की फीस वाली समस्या को सीधे और तुरंत हल कर/करवा सकते हैं; रीजनल काउंसिल जब दूसरी जगहों पर छात्रों से फीस नहीं ले रही है, तो फिर फरीदाबाद में छात्रों से फीस बसूलने का वैसे भी कोई तर्क तो बनता नहीं है । दीपक गर्ग ने भी लेकिन अपने राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता की तरह मामले पर चुप्पी ही साध ली है - और फरीदाबाद के लोगों से बचते/छिपते ही फिर रहे हैं । फरीदाबाद में कई लोगों की शिकायत है कि विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो उनके फोन ही नहीं उठा रहे हैं; और यदि कभी उठा भी लेते हैं तो यह कह कर बात सुनने/करने से बच लेते हैं कि अभी मैं बाहर हूँ या मीटिंग में हूँ, बाद में फोन करता हूँ - और उनका 'बाद में' कभी आता ही नहीं है । 
तेजिंदर भारद्वाज का मामला फरीदाबाद ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने खराब कर दिया । दरअसल तेजिंदर भारद्वाज ने बाहर तो अपना मत व्यक्त किया कि छात्रों से लायब्रेरी की फीस नहीं लेनी चाहिए, किंतु ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने यह कह कर उनकी पोल खोल दी कि फीस बसूलने के फैसले में तेजिंदर भारद्वाज की पूरी सहमति थी । लायब्रेरी फीस को लेकर तेजिंदर भारद्वाज का 'नेताओं वाला' दोहरा रवैया सामने आया, तो उनके लिए भारी मुसीबत खड़ी हो गई । इस मुसीबत से निपटने के लिए उन्होंने जो तरीका अपनाया, उससे बात वास्तव में और बिगड़ गई । इस मामले में बात करने/उठाने वाले लोगों पर उन्होंने आरोप लगाया कि वह राजनीति कर रहे हैं । इस पर उन्हें सुनने को मिला कि वह रीजनल काउंसिल में चुने जाने के लिए जो जो तिकड़में लगा रहे हैं, उसे क्या सत्संग करना कहते हैं; वह भी राजनीति ही है - और जिस तरह उन्हें राजनीति करने का हक़ है, ठीक उसी तरह दूसरों को भी राजनीति करने का हक है । तेजिंदर भारद्वाज ने यह तर्क देकर भी जान छुड़ाने की कोशिश की कि इस मामले में सवाल सिर्फ चार लोगों से ही क्यों किए जा रहे हैं, ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी ग्यारह सदस्यों से क्यों नहीं किए जा रहे हैं ? इसका जबाव उन्हें यह मिला कि जो चार लोग इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं, उनसे ही खासतौर पर इस मामले में सवाल यह जानने/समझने के लिए किए जा रहे हैं, जिससे कि उनका 'असली वाला चेहरा' लोगों के सामने आ सके । लायब्रेरी फीस मामले में तेजिंदर भारद्वाज चूँकि बाहर कुछ और भीतर कुछ और कहने के आरोपी बने, तो उसके कारण सवालों का फंदा उन पर कुछ ज्यादा कसता हुआ दिखा - इस फंदे से बचने की कोशिश में फिर उन्होंने चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई देखी । 
विपिन शर्मा के रवैये ने लेकिन लोगों को, और खासतौर से उनके समर्थकों को ज्यादा निराश किया है । यह निराशा दरअसल इसलिए भी है, क्योंकि लोगों को उन्हीं से उम्मीद भी ज्यादा थी । ब्रांच में अपनी सक्रियता तथा सभी को विश्वास में लेकर काम करने के अपने तरीके से विपिन शर्मा ने फरीदाबाद में अपनी अच्छी साख बनाई है; जिसमें लायब्रेरी फीस मामले में विरोधी रवैया अपनाने के चलते उन्होंने और इजाफा ही किया है । लायब्रेरी फीस लागू करने के फैसले के प्रति अपना विरोध जता कर विपिन शर्मा ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी अच्छी पैठ बनाई है । किंतु इस मामले में वह चूँकि जुबानी जमा-खर्च से आगे बढ़ते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए वह लोगों के निशाने पर आ रहे हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों ने उन्हें सलाह दी है कि उनके लिए मौका अच्छा है, जिसमें कि वह अपने समर्थन-आधार को और बढ़ा व मजबूत कर सकते हैं; उन्हें लायब्रेरी फीस मामले में आक्रामक रुख अपनाना चाहिए और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के सामने सक्रियताभरा प्रतिनिधित्व करना चाहिए । समर्थकों को यह देख कर लेकिन निराशा हो रही है कि विपिन शर्मा इस मामले में ज्यादा सक्रियता दिखाने से बचने की ही कोशिश कर रहे हैं, और सिर्फ जुबानी समर्थन देने तक ही अपने को सीमित रखे हुए हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि लायब्रेरी फीस मामले में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजिंदर भारद्वाज जिस तरह अलग-थलग पड़े हैं; उसे देखते हुए इस मामले के जरिए फरीदाबाद की राजनीति में अपना अच्छा मुकाम बनाने का विपिन शर्मा के पास बढ़िया मौका है । उनके बीच निराशा लेकिन इस बात को लेकर है कि विपिन शर्मा मौके का फायदा उठाने का प्रयास करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । इस मामले में पड़ने और पड़ सकने वाले दबाव से बचने के लिए विपिन शर्मा ने भी इस मामले में ज्यादा बात करने से बचने वाला रवैया अपना लिया है ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों पर थोपी गई लायब्रेरी फीस के मामले में जिस तरह से पूरी तरह उपेक्षा का, दोहरेपन का और सिर्फ बातों का रवैया अपनाया है - उससे लग रहा है कि यह मामला उनके गले में एक ऐसी हड्डी की तरह से फँस गया है, जिसे उनके लिए न उगलते बन रहा है और न निगलते ही बन रहा है । 

Saturday, July 25, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए फरीदाबाद से प्रस्तुत विपिन शर्मा की उम्मीदवारी ने विजय गुप्ता के संग-साथ की बदनामी झेल रहे दीपक गर्ग के लिए जो मुसीबत और चुनौती खड़ी की है, उसमें तजेंद्र भारद्वाज को अपनी दाल भी पकती हुई दिख रही है

फरीदाबाद । विजय गुप्ता के साथ गठजोड़ के बाबत दीपक गर्ग की कन्फ्यूज्ड स्थिति को रीजनल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में तजेंद्र भारद्वाज ने अपने लिए संभावनाओं के दरवाजों को खुलता हुआ पाया/देखा है, और स्थिति का पूरा पूरा फायदा उठाने की तैयारी दिखाई है । दरअसल दीपक गर्ग के लिए यह तय कर पाना खासा मुश्किल हो रहा है कि विजय गुप्ता के साथ अपने गठजोड़ को वह बनाये रखें या उससे पीछा छुड़ा लें । उनका यह असमंजस इस बात से जाहिर है कि कभी तो वह विजय गुप्ता के साथ अपनी दूरी दिखाने/जताने लगते हैं, और शिकायत करते हैं कि लोग फिजूल में ही उनका नाम विजय गुप्ता के साथ जोड़े रखते हैं; किंतु फिर कुछ ही दिन बाद वह विजय गुप्ता के साथ सक्रिय नजर आने लगते हैं । पिछले कई महीनों से चल रहा दीपक गर्ग का 'कभी दूर कभी पास' का यह खेल लोग खासी दिलचस्पी के साथ देख रहे हैं; और इसे देखते हुए दीपक गर्ग की कन्फ्यूज्ड मनःस्थिति को पहचान व समझ रहे हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि असल में होता यह है कि जब विजय गुप्ता की बदनामियों के कारण दीपक गर्ग को नुकसान होता हुआ नजर आता है, तब वह उनसे दूरी बनाने/दिखाने लगते हैं; लेकिन जब उन्हें विजय गुप्ता से फायदा उठाना होता है, तब वह उनके पास मंडराने लगते हैं । रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की कोशिश में पिछले दो अवसरों पर दीपक गर्ग ने यही नाटक किया था । पहली बार विजय गुप्ता की मदद से चेयरमैन बनने का प्रयास करते हुए उन्होंने रीजनल काउंसिल में अपने 'साथियों' से धोखाधड़ी करने में भी परहेज नहीं किया; किंतु अपने प्रयास में असफल होने पर जब उन्हें पता चला कि उनकी असफलता में विजय गुप्ता की बदनामी का बड़ा रोल है, तो उन्होंने विजय गुप्ता से दूर होने का ऐलान कर डाला । दूसरी बार, यानि इस वर्ष के लिए चेयरमैन बनने खातिर वह लेकिन फिर से विजय गुप्ता की छाया में खड़े दिखे । रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने के प्रयास में दीपक गर्ग दोबारा असफल हुए, तो वह फिर से विजय गुप्ता को कोसते नजर आए । 
दीपक गर्ग के सामने अब जब रीजनल काउंसिल के लिए दोबारा चुने जाने की चुनौती है, तो विजय गुप्ता के साथ 'कभी दूर कभी पास' का उनका यह खेल और ज्यादा तेज हो गया है । लोगों के बीच जब वह विजय गुप्ता के प्रति विरोध के स्वर सुनते हैं तो वह विजय गुप्ता से दूर रहने की कसमें खाने लगते हैं; किंतु इसके साथ साथ वह विजय गुप्ता के आयोजनों में दिलचस्पीपूर्ण सक्रियता निभाते भी दिखाई पड़ते हैं - इस सक्रियता के जरिए चूँकि उन्हें लोगों तक पहुँचने का अवसर मिलता दिखता है, इसलिए इसका फायदा उठाने के लालच में वह यह भूल ही जाते हैं कि लोगों के बीच उन्होंने विजय गुप्ता से दूर रहने की बातें कहीं हैं । जम्मू में पिछले दिनों लोगों ने उनसे जब सवाल पूछे कि उन्होंने और विजय गुप्ता ने प्रोफेशन व प्रोफेशन से जुड़े लोगों के लिए क्या किया है, तो दीपक गर्ग ने पहले तो यह कह कर पीछा छुड़ाने की कोशिश की कि वह इस वर्ष निकासा चेयरमैन हैं, इसलिए उससे संबंधित सवाल ही पूछे जाएँ; इस पर उन्हें सुनने को मिला कि निकासा चेयरमैन तो वह पाँच महीने से हैं, सवाल तो उनसे 29 महीने के कामकाज के बारे में पूछे जा रहे हैं । इसके बाद उन्होंने विजय गुप्ता से पूछे जाने वाले सवाल उनसे पूछे जाने का विरोध किया - उनका तर्क रहा कि विजय गुप्ता ने प्रोफेशन के लिए क्या किया है, यह विजय गुप्ता से पूछिए । इस पर जब उन्हें यह सुनने को मिला कि चूँकि आप हर काम में विजय गुप्ता के साथ नजर आते हैं, तो उनके बारे में पूछे गए सवालों का जबाव भी आपको देना चाहिए - तब दीपक गर्ग ने ट्रेक बदला और दावा करने लगे कि कुछेक लोग झूठे ही विजय गुप्ता के साथ उनका नाम जोड़ते रहते हैं और कि उनका विजय गुप्ता के साथ कोई गठजोड़ नहीं है । जम्मू से लौटते ही किंतु वह विजय गुप्ता के आयोजनों में सक्रिय सहभागिता दिखाने में जुट गए । 
दीपक गर्ग का यह कन्फ्यूजन दरअसल इसलिए है क्योंकि रीजनल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में एक तरफ तो वह विजय गुप्ता की बदनामी के छीटों से बचना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वह विजय गुप्ता के 'इंतजामों' का फायदा भी उठाना चाहते हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों को हैरानी इस बात की है कि पिछली बार विजय गुप्ता के 'इंतजामों' पर निर्भर हुए बिना रीजनल काउंसिल का चुनाव जीत लेने वाले दीपक गर्ग इस बार विजय गुप्ता के इंतजामों पर इतने मजबूर क्यों हो गए हैं कि रोज रंग बदलते नजर आते हैं ? रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में दीपक गर्ग की पिछली बार की तथा इस बार की स्थिति की तुलना करने वाले लोगों का कहना है कि पिछली बार दीपक गर्ग ने अपने व्यवहार और अपनी बातों से लोगों के बीच विश्वास बनाया था और उम्मीद पैदा की थी, लेकिन पिछले करीब ढाई वर्षों में उन्होंने उस विश्वास को तो खत्म कर ही दिया है - अपने प्रति लोगों के बीच कोई उम्मीद भी बचा कर नहीं रखी है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010-12 वाले कार्यकाल में फरीदाबाद ब्रांच में उन्हें एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में प्रमोद माहेश्वरी ने बहुत परेशान किया था, जिस कारण से 2012 के रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें लोगों की अच्छी सहानुभूति मिली थी - और प्रथम वरीयता के वोटों में उनकी स्थिति प्रमोद माहेश्वरी से बहुत अच्छी और ऊपर थी । रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में लेकिन दीपक गर्ग का जो रवैया रहा, उसके कारण लोगों ने यही महसूस किया है कि दीपक गर्ग के साथ सहानुभूति दिखा कर उन्होंने बड़ी गलती की थी । दीपक गर्ग के रवैये से फरीदाबाद के लोगों ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है । विजय गुप्ता के साथ उन्होंने जिस तरह का गठजोड़ बनाया, उसने उनका और बंटाधार किया है । 
रही सही कसर विपिन शर्मा की उम्मीदवारी ने पूरी कर दी है । फरीदाबाद ब्रांच में विपिन शर्मा की जिस तरह की परफॉर्मेंस रही है, उससे उन्होंने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी प्रभावी पहचान बनाई है और साथ में वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी अपने लिए विश्वास व उम्मीद पैदा की है । इससे उनकी लोकप्रियता में और इजाफा हुआ । ब्रांच के एक उत्साही व सक्रिय सदस्य के रूप में विपिन शर्मा की लोगों के बीच साख इसलिए भी बढ़ी, क्योंकि ब्रांच के चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले थे । इस बढ़ी साख के भरोसे ही दूसरे/तीसरे वर्ष में उन्हें ब्रांच के चेयरमैन पद के प्रबल दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - किंतु विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने षड्यंत्र करके लोगों की भावनाओं को कामयाब नहीं होने दिया । दीपक गर्ग को खतरा था कि चेयरमैन बनने के बाद विपिन शर्मा फिर रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ेंगे और उनके लिए मुसीबत खड़ी करेंगे; इसलिए उन्होंने फार्मूला अपनाया कि वह विपिन शर्मा को चेयरमैन ही नहीं बनने देंगे - जिससे कि न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी । दीपक गर्ग ने अपने इस फार्मूले को कामयाब बनाने के लिए विजय गुप्ता का सहयोग लिया । फरीदाबाद ब्रांच में राजनीति करते हुए विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने जिस तरह की हरकतें की हैं उससे लोगों के बीच इनके प्रति नाराजगी तथा विपिन शर्मा के प्रति हमदर्दी का भाव बना है । पिछली बार और इस बार की स्थिति की तुलना करते हुए लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार जो स्थिति दीपक गर्ग की थी इस बार वह स्थिति तो विपिन शर्मा की है; और पिछली बार जो दशा प्रमोद माहेश्वरी की थी, इस बार वह दशा दीपक गर्ग की है ।  
दीपक गर्ग के लिए विपिन शर्मा ने जो खतरा खड़ा किया है, उसमें तजेंद्र भारद्वाज को अपनी दाल पकती हुई दिख रही है । दरअसल कई लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार दीपक गर्ग ने प्रमोद माहेश्वरी को जो टक्कर दी थी, उसमें प्रमोद माहेश्वरी ने तो जैसे-तैसे करके अपनी सीट बचा ली थी - इस बार लेकिन विपिन शर्मा से दीपक गर्ग को जो टक्कर मिलती दिख रही है, उसमें दीपक गर्ग के लिए अपनी सीट बचा पाना मुश्किल लग रहा है । तजेंद्र भारद्वाज इसी स्थिति का लाभ उठाना चाहते हैं । मजे की बात है कि दीपक गर्ग और तजेंद्र भारद्वाज, दोनों ही विजय गुप्ता के साथी/सहयोगी रहे हैं - लेकिन विजय गुप्ता के संगसाथ की बदनामी दीपक गर्ग को ज्यादा मिली; और इस बदनामी के कारण ही दीपक गर्ग अक्सर ही विजय गुप्ता से दूर दिखने का प्रयास करते हैं । उनके इस प्रयास से विजय गुप्ता के कई समर्थक दीपक गर्ग से भड़के और चिढ़े हुए हैं । इस बिना पर तजेंद्र भारद्वाज को लगता है कि विजय गुप्ता के समर्थक लोगों के बीच उन्हें ज्यादा समर्थन मिल जायेगा । तजेंद्र भारद्वाज के इस बीच संजय वासुदेवा से भी तार जोड़ने की खबरें हैं, जिससे तजेंद्र भारद्वाज को अपने समर्थन-आधार को बढ़ाए जाने का भरोसा है । तजेंद्र भारद्वाज ने जो जाल फैलाया है, उसमें उनके द्वारा दीपक गर्ग का शिकार करने की तैयारी देखी जा रही है । तजेंद्र भारद्वाज की यह तैयारी यदि सचमुच कामयाब रही, तो दीपक गर्ग के लिए वास्तव में भारी मुसीबत हो जाएगी । दीपक गर्ग के समर्थक व शुभचिंतक समझे जाने वाले लोगों का कहना है कि दीपक गर्ग ने विजय गुप्ता के साथ अपने गठजोड़ को लेकर एक स्पष्ट व पारदर्शी रवैया यदि नहीं दिखाया, तो दीपक गर्ग के लिए भारी मुसीबत हो जानी है ।