Wednesday, August 31, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने अधिष्ठापन समारोह में बदइंतजामी का जो 'इंतजाम' किया, उसने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवार मधु सिंह की मुश्किलों को बढ़ाया

आगरा । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी को प्रमोट करने का कोई मौका तो हालाँकि नहीं छोड़ा गया, किंतु अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी ने सारा गुड़ - गोबर कर दिया । भूख की बात तो छोड़िए, अधिष्ठापन समारोह में पहुँचे लोगों का प्यास के मारे जो बुरा हाल हुआ, उसका नतीजा रहा कि तमाम लोग अधिष्ठापन समारोह की व्यवस्था करने वाले पदाधिकारियों को तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल को बुरी तरह कोसते नज़र आए । समारोह में पहुँची महिलाओं का तो बदइंतजामी के कारण और भी बुरा हाल हुआ - और वह तथा उनके पति बेबस नज़र आए । यूँ तो किसी भी कार्यक्रम में - जिसमें चार/पाँच सौ लोग हों, थोड़ी बहुत बदइंतजामी तो हो ही जाती है, और कुछेक लोगों को परेशानी होती ही है; किंतु क्लार्क शिराज़ में आयोजित हुए इस बार के डिस्ट्रिक्ट अधिष्ठापन समारोह में जो नज़ारा देखने को मिला - वह अभूतपूर्व है । यही कारण है कि अधिष्ठापन समारोह के भुक्तभोगियों ने वॉट्स ऐप पर अपने गुस्से का इज़हार किया है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि बदइंतजामियों की शिकायतें लायंस पदाधिकारी आपसी बातचीत में तो करते रहते हैं, लेकिन अपनी शिकायतों को रिकॉर्ड पर लाने से वह बचते रहते हैं; पहली बार देखने में आया है कि लायंस पदाधिकारी अपनी शिकायतें रिकॉर्ड पर ला रहे हैं - इससे यही जाहिर हुआ है कि इस बार लोग बहुत ही परेशान हुए हैं, और उनके लिए अपने गुस्से और अपनी नाराजगी को दबा/छिपा पाना मुश्किल हो रहा है; और वह खुल कर अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी की तथा उसके लिए जिम्मेदार लोगों की लानत-मलानत कर रहे हैं ।
लायंस पदाधिकारियों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि अधिष्ठापन समारोह में लोगों को शाम चार बजे से बुला लिया गया, लेकिन रात नौ बजे तक चले कार्यक्रम के बीच पानी की सर्विस भी नहीं होने दी गई । होटल स्टॉफ के लोगों ने पानी माँग रहे लायंस को साफ साफ कह दिया कि आयोजनकर्ताओं ने कार्यक्रम के बीच में खाने-पीने की सर्विस खोलने से मना किया है - और चेतावनी के साथ मना किया है । कार्यक्रम के बीच में प्यास से व्याकुल हो रहे लोगों को यह देख/जान कर और परेशानी हुई कि हॉल से बाहर जाने के रास्ते/दरवाजे बंद हैं, और आने व जाने के लिए सिर्फ एक ही दरवाजा खुला हुआ है । सुरक्षा कारणों से इसे और भी ज्यादा खतरनाक माना/बताया गया । अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी को लेकर लिखी गईं एक वाट्स ऐप पोस्ट्स में कहा गया है कि समारोह की व्यवस्था देख रहे पदाधिकारियों की लापरवाही से कोई छोटी सी दुर्घटना बड़े हादसे में बदल सकती थी । समारोह के मंच संचालन में कोई व्यवस्था थी ही नहीं, और वक्ता लोग फालतू की तथा बेसिरपैर की बातें करते हुए और बेहूदा व अशालीन किस्म की चुटकुलेबाजी व शायरी करते हुए कार्यक्रम को लंबा खींच रहे थे - मंच संचालन करने वाले रोटरी नेताओं ने यह सब होने दिया, और इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि फालतू में लंबे खिंचते कार्यक्रम से लोगों की परेशानियाँ और बढ़ रही हैं । इसी का नतीजा रहा कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब पानी और खाना खुला तो उसे लेने के लिए लोगों के बीच भारी अफरातफरी फैल गई और लोगों के बीच झगड़े तक की नौबतें आईं । डिस्ट्रिक्ट के पुराने लायन सदस्यों का कहना रहा कि बदइंतजामी से भरा इतना घटिया आयोजन डिस्ट्रिक्ट में इससे पहले कभी नहीं हुआ ।
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी की राजनीतिक चोट लेकिन मधु सिंह पर पड़ी । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की बदइंतजामी और उसके कारण लायन सदस्यों व पदाधिकारियों को हुई परेशानी के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सहित जो लायन नेता व पदाधिकारी जिम्मेदार हैं, वही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत मधु सिंह की उम्मीदवारी की बागडोर सँभाले हुए हैं; इसलिए अपनी अपनी परेशानी का गुस्सा उतारने तथा बदला लेने के लिए लोगों को मधु सिंह की उम्मीदवारी के रूप में एक 'निशाना' मिल गया है । बदइंतजामी और परेशानियों का शिकार हुए लायन सदस्यों व पदाधिकारियों का गुस्सा मधु सिंह की उम्मीदवारी पर इसलिए भी फूट रहा है, क्योंकि उनकी परेशानियों को बढ़ाने में मधु सिंह की उम्मीदवारी को प्रमोट करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल की कोशिश की भी बड़ी भूमिका रही । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे उम्मीदवार सुमित गुप्ता को कार्यक्रम स्थल के नजदीक फैलोशिप स्टॉल लगाने की अनुमति नहीं दी; अनुमति तो उन्होंने इसलिए नहीं दी, ताकि सुमित गुप्ता डिस्ट्रिक्ट के लायन सदस्यों व पदाधिकारियों के बीच अपनी पहचान व पैठ न बना लें - लेकिन नतीजा उल्टा निकला । अब लोग सीपी सिंघल तथा मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक दूसरे नेताओं को कोस रहे हैं कि उनकी छोटी सोच ने लोगों को परेशानी में डाल दिया । लोगों का मानना और कहना है कि सुमित गुप्ता को फैलोशिप स्टॉल यदि लगाने दिया होता, तो कार्यक्रम में बदइंतजामी का शिकार हुए लोगों को इतनी परेशानी नहीं हुई होती ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल और मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक अन्य नेताओं की इस बेवकूफीपूर्ण हरकत से सुमित गुप्ता को बहुत फायदा हुआ - उन्होंने होटल के एक कमरे में फैलोशिप की व्यवस्था करके लोगों को यह संदेश भी दे दिया कि वह तो लोगों को सुविधा उपलब्ध करवाना चाहते थे, और लोगों की सहानुभूति भी जुटा ली । मधु सिंह की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच विरोध फैला/बढ़ा - यह सुमित गुप्ता के लिए बोनस पाने जैसा मामला रहा । इस सारे प्रकरण को देखते/समझते हुए मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तक ने कहना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक सीपी सिंघल तथा दूसरे नेताओं ने अधिष्ठापन समारोह को जिस तरह से अंजाम दिया है, उससे उम्मीदवार के रूप में मधु सिंह की मुश्किलें काफी बढ़ गईं हैं - और यदि आगे भी इसी तरह की बेवकूफियाँ होती रहीं, तो मधु सिंह पिछली बार तो करीब 80 वोटों से हारी थीं - अब की बार और ज्यादा वोटों से हारेंगी ।

Tuesday, August 30, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दीपक गर्ग के इस्तीफ़े से शुरू हुए नाटक के अंजाम तक पहुँचने से पहले ही आलोचना का शिकार हो जाने से पूजा बंसल का कोई फायदा हो सकेगा क्या ?

नई दिल्ली । दीपक गर्ग के इस्तीफे के कारण खाली हुए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन पद पर कब्ज़े को लेकर पॉवर ग्रुप में सुबह-शाम नए समीकरण बन/बिगड़ तो रहे हैं, लेकिन किसी समीकरण पर बात बन नहीं पा रही है - और इस स्थिति में लोगों को पूजा बंसल की दाल गलती हुई नजर आ रही है । पूजा बंसल दरअसल इस तर्क के आधार पर चेयरपरसन पद पर अपना दावा जता रही हैं कि चेयरपरसन पद के लिए चुनाव तो एक वर्ष में एक बार ही होने की परंपरा है; इसलिए दीपक गर्ग के इस्तीफे से खाली हुए पद को भरने के लिए चुनाव कराना - उस परंपरा को तोड़ने जैसा होगा; इसलिए परंपरा को तोड़ने की बजाए वाइस चेयरपरसन को ही चेयरपरसन बना देना चाहिए । वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल खुद हैं और उम्मीद करती हैं कि शांता क्लॉज उन्हें चेयरपरसन का पद का गिफ्ट दिलवा देंगे । उनके इस तर्क में दम इस कारण से और भर गया है - क्योंकि दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा तथा रीजनल काउंसिल के उनके समर्थक लोगों ने अपनी कठपुतली बनाने का जो कांड किया है, उसकी चौतरफा निंदा ही हो रही है । इस चौतरफा निंदा ने राजेश शर्मा तथा उनके समर्थकों की भारी फजीहत की है, और उन्हें अपनी योजना में पंक्चर होता हुआ नजर आ रहा है । हालाँकि यह उनकी खुशकिस्मती है कि उनकी इस फजीहत का फायदा उठाने के लिए उनके विरोधी आपसी एकता नहीं बना पा रहे हैं । विरोधियों के बीच बने बिखराव ने पॉवर ग्रुप के सदस्यों को एकजुट बने रहने के लिए 'मजबूर' किया हुआ है ।
 रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप से बाहर के सदस्यों को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों से 'मदद' की उम्मीद थी, किंतु सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के अपने लफड़े हैं : नवीन गुप्ता कभी किसी भी काम में कोई दिलचस्पी लेते ही नहीं हैं; संजीव चौधरी और संजय वासुदेवा विवादास्पद मामलों से दूर रहने का प्रयास करते हैं; संजय अग्रवाल और विजय गुप्ता वाइस प्रेसीडेंट चुनाव के मद्देनजर मामले से दूर रहने में अपनी भलाई देख रहे है; अतुल गुप्ता को बेपेंदी के लौटे के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिनके बारे में कोई भी आश्वस्त भाव से यह नहीं कह/बता सकता है कि वह लुढ़क कर कब किस तरफ पहुँच जायेंगे । लिहाजा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मदद के सहारे रीजनल काउंसिल में चेयरपरसन का पद पाने की योजना बनाने वाले विरोधी खेमे के लोगों को तगड़ा झटका लगा है, और राजेश शर्मा एण्ड टीम ने राहत महसूस की है ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप में अभी एकजुटता तो बनी हुई दिख रही है, लेकिन इस एकजुटता की दीवारों में से मट्ठा भी रिसता हुआ नजर आ रहा है : पॉवर ग्रुप के सदस्यों के नजदीकियों का कहना है कि पॉवर ग्रुप के सदस्यों के बीच परस्पर अविश्वास के बीज पड़ चुके हैं, और हर सदस्य दूसरे सदस्य पर शक कर रहा है । मजेदार बात यह है कि अभी तक कोई भी चेयरपरसन पद के लिए अपनी दावेदारी पेश नहीं कर रहा है, लेकिन हर कोई यह सुनिश्चित कर लेने में लगा हुआ है कि चेयरपरसन का पद किसी दूसरे को न मिल जाए । पॉवर ग्रुप का हर सदस्य उम्मीद कर रहा है कि चेयरपरसन पद के लिए दूसरा कोई उसका नाम प्रस्तावित करे और आगे बढ़ाए; पर कोई भी किसी दूसरे का नाम आगे करने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है । इस उठापटक में सबसे ज्यादा नुकसान पंकज पेरिवाल का होता दिख रहा है । लोगों के बीच यह बात चर्चा में आई थी कि दीपक गर्ग के अचानक हुए इस्तीफे के नाटक के मास्टरमाइंड राजेश शर्मा हैं, जिन्होंने छह छह महीने के चेयरपरसन बनवाने का जिम्मा उठाया है - और जो अगला चेयरपरसन पंकज पेरिवाल को बनवायेंगे; लेकिन दीपक गर्ग के इस्तीफे से साथ ही जो बबाल पैदा हुआ है, उसके कारण राजेश शर्मा ने फिलहाल चुप्पी साध ली है । राजेश शर्मा को दबाव में देख पॉवर ग्रुप के सदस्यों के बीच भी पंकज पेरिवाल के 'भाव' एकदम से गिर गए हैं । पॉवर ग्रुप की चौकड़ी में पंकज पेरिवाल पहले भी अलग-थलग ही पड़े हुए थे । 
इस बीच एक संभावना यह भी पैदा हुई कि दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा मंजूर ही न हो और उनसे अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए कह दिया जाए - और उन्हें ही चेयरपरसन बने रहने दिया जाए । दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि दीपक गर्ग खुद भी यही चाहते हैं । वास्तव में इसीलिए इस्तीफ़े के साथ ही उन्होंने अपने नजदीकियों के जरिए इस्तीफ़े के पीछे की अंतर्कथा को जगजाहिर कर दिया - जो बबाल का कारण बना । लेकिन पॉवर ग्रुप के सदस्यों का मानना है कि दीपक गर्ग ने यदि अपना इस्तीफ़ा वापस लिया, तो उनके साथ-साथ पॉवर ग्रुप की और ज्यादा फजीहत होगी । माना यही जायेगा कि दीपक गर्ग ने पॉवर ग्रुप को ब्लैकमेल कर लिया है । रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप के सदस्यों के नजदीकियों का कहना है कि दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफ़े में इंस्टीट्यूट प्रशासन पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उनके लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन माफी माँगे तो ही दीपक गर्ग को अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए तैयार होना चाहिए - अन्यथा, इस्तीफ़ा वापस लेने पर उनके साथ-साथ पॉवर ग्रुप के दूसरे सदस्यों की भी भारी किरकिरी होगी । इस तरह की बातों के जरिए, पॉवर ग्रुप के सदस्य दरअसल दीपक गर्ग की इस्तीफ़ा-वापसी की संभावना को ख़त्म करने का काम कर रहे हैं ।  
विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप के पास वास्तव में अभी भी पॉवर है, और अपनी एकजुटता के जरिए उन्होंने अपने संख्याबल को बदस्तूर बनाए रखा हुआ है; उन्हें इस बात से भी ताकत मिली है कि विरोधी खेमे में एकजुटता का नितांत अभाव है और सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मामले को दूर से ही देखते रहने में मशगूल हैं - लेकिन फिर भी पॉवर ग्रुप के सदस्यों ने प्रोफेशन के लोगों के बीच अपनी प्रेस्टीज खो दी है । दरअसल इसीलिए जो भी सदस्य अगला चेयरपरसन बनना भी चाहता है, वह भी किसी से यह कहने का साहस नहीं कर पा रहा है । इसी स्थिति में यह सुझाव आया है कि रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप की लोगों के बीच जो फजीहत हो रही है, उसे देखते हुए चेयरपरसन पद के लिए चुनाव के पचड़े को छोड़ ही देना बेहतर होगा - और वाइस चेयरपरसन को ही चेयरपरसन बना देना चाहिए । पूजा बंसल खुद भी दबे-छिपे तरीके से तथा उनके नजदीकी भी इस तर्क के आधार पर माहौल बनाने में जुटे हुए हैं । उनका कहना है कि सिर्फ यही एक तरीका है जिसके जरिए पॉवर ग्रुप अपनी फजीहत के दागों को साफ कर सकता है । दीपक गर्ग के इस्तीफे के द्धारा जिस नाटक को अंजाम देने की तैयारी की गई थी, उस नाटक के आलोचना का शिकार हो जाने के कारण पटकथा में जो बदलाव होता नजर आ रहा है - वह बदलाव शांता क्लॉज की भूमिका निभाते हुए पूजा बंसल के लिए गिफ्ट लाने का काम सचमुच करेगा क्या; यह देखना दिलचस्प होगा ।

Sunday, August 28, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार्यता व विश्वसनीयता मिलती देख डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं की मुसीबत बढ़ी

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के परिदृश्य में ललित खन्ना का यूँ तो कोई सक्रिय खेमा नहीं है - किंतु दीपक गुप्ता और अशोक जैन के खेमे के नेताओं ने जिस तरह से उन्हें अपनी अपनी तरफ खींचने की कोशिशें चलाई हुई हैं, उसके चलते ललित खन्ना की उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को असमंजसपूर्ण तथा दिलचस्प बनाया हुआ है । मजे का सीन यह है कि दोनों खेमे के नेता दिखावे के लिए तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी को तवज्जो देने से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसके साथ साथ वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को वापस कराने तथा अपनी अपनी तरफ करने के जुगाड़ लगाते हुए भी देखे/सुने जाते है - ऐसे में, लोगों के बीच यही सवाल उठता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में यदि सचमुच कोई दम नहीं है, तो फिर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं को उनकी उम्मीदवारी की उपस्थिति से परेशान क्यों होना पड़ रहा है ? खास बात यह है कि दोनों खेमे के नेता लोग ललित खन्ना को - दूसरे खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में भी पोर्ट्रेट करने की कोशिश करते हैं; इसका नतीजा यह निकल रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में ललित खन्ना को दोनों खेमे के वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस तरह से, होता यह दिख रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को 'मिटाने' की कोशिशें बूमरेंग करते हुए वास्तव में उनकी उम्मीदवारी को 'जमाने' का काम कर रही हैं ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी का 'शोर' जरूर कम है, लेकिन क्लब्स के अध्यक्षों के बीच उनकी पैठ जिस तरह से बनती नजर आ रही है - वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का मैदान मार लेने की कोशिशों में जुटे दोनों खेमे के नेताओं के लिए परेशानी का सबब बनी है । चुनावी राजनीति में खेमेबाजी का जो प्रभाव होता है, उस प्रभाव को जमाने/दिखाने में ललित खन्ना भले ही कमजोर पड़ रहे हों - लेकिन उम्मीदवार का जो अपना एक 'प्रभाव' होता/पड़ता है, उस मामले में ललित खन्ना किसी भी तरह से पीछे नहीं हैं । वह वर्षों मुकेश अरनेजा के अच्छे-बुरे समय के साथी/सहयोगी रहे हैं, और इस नाते से राजनीति की तरकीबें अच्छे से जानते/पहचानते भी हैं - और उन्हें इस्तेमाल करने के हुनर से भी परिचित हैं । राजनीति की तरकीबों को जानने/पहचानने की अपनी काबिलियत के चलते ही ललित खन्ना ने बिना किसी के सहयोग/समर्थन के बावजूद डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के गणित को उलझा दिया है । ललित खन्ना अकेले ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों से टक्कर ले रहे हैं, और अपनी उम्मीदवारी के लिए 'मौके' बना रहे हैं - इस बात ने भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों की उत्सुकता को बढ़ाया है; और उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ती इसी उत्सुकता ने डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों के सामने मुसीबत खड़ी कर दी है ।
इस तरह, ललित खन्ना की उम्मीदवारी पर किसी की 'छतरी' न होने के जिस तथ्य को उनकी बड़ी कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था - उस तथ्य को उन्होंने अपनी ही छतरी तान कर अपनी ताकत बना लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के जाने-पहचाने सीन में हर उम्मीदवार किन्हीं दूसरों की छतरी में आगे बढ़ता दिखाई देता है; ललित खन्ना ने लेकिन इस जाने-पहचाने सीन को बदलने का प्रयास किया है - और वह किन्हीं दूसरों की नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी ही छतरी में अपने राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाना शुरू किया । इसका उन्हें सुफल भी मिलता दिखा है । वास्तव में, अधिकतर लोग - और इन अधिकतर लोगों में क्लब्स के अध्यक्ष भी आते हैं - उम्मीदवार में 'लीडर' के गुण देखते हैं और उन गुणों को पसंद करते हैं; लीडर जब 'इसके' या 'उसके' 'आदमी' के रूप में सामने आता है, तो वह लोगों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़/बना पाता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना ने लोगों के बीच इस कारण से अपनी पैठ बनाई है - क्योंकि वह किसी नेता के 'आदमी' के रूप में लोगों के बीच नहीं हैं । क्लब्स के पदाधिकारी नेताओं की दखलंदाजी और लगातार पड़ते रहने वाले तरह तरह के उनके दबावों से प्रायः परेशान और दुखी रहते हैं, इसलिए भी ललित खन्ना के साथ वह अपने आप को कंफर्टेबल पाते हैं । क्लब्स के पदाधिकारियों की इस कंफर्टेबिलिटी को वोट में बदलने की चुनौती ललित खन्ना के सामने हालाँकि अभी बाकी है; किंतु ललित खन्ना की अभी तक की उपलब्धि ने ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी नेताओं की परेशानी को बढ़ा दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी को उनकी पत्नी नीलू खन्ना की सक्रियता के चलते और व्यापकता व स्वीकार्यता मिल रही है । दरअसल नीलू खन्ना की पहचान सिर्फ ललित खन्ना की पत्नी के रूप में ही नहीं है; बल्कि इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन के रूप में एक लीडर की भी है । अभी करीब दो महीने पहले तक वह इंटरनेशनल इनरव्हील डिस्ट्रिक्ट 301 की चेयरपरसन के रूप में सक्रिय थीं, और उनकी सक्रियता को चूँकि कई प्रमुख रोटेरियंस की पत्नियों ने नजदीक से देखा/पहचाना है; इसलिए जब वह ललित खन्ना के साथ क्लब्स के और डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल होती हैं - तो ललित खन्ना के अभियान को और नजदीकियत तथा विश्वसनीयता मिलती है । नीलू खन्ना रोटरी परिवार में एक बड़े पद पर रही हैं, इस कारण से क्लब्स के पदाधिकारियों तथा दूसरे लोगों के बीच उनका एक 'ऑरा' बनता/दिखता है, जिसका फायदा स्वतः ललित खन्ना के अभियान को मिलता ही है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को उनके क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण की सक्रियता से भी मनोवैज्ञानिक फायदा मिल रहा है । विजय भूषण उनके साथ भी लोगों के बीच जाते हैं, और खुद अकेले भी अपनी सक्रियता लोगों - खासकर क्लब्स के अध्यक्षों के बीच रखते हैं । दीपक गुप्ता और अशोक जैन के क्लब के अध्यक्ष चूँकि इस तरह की सक्रियता के मामले में ढीले-ढाले दिखते हैं, इसलिए विजय भूषण की सक्रियता ललित खन्ना की उम्मीदवारी के काम भी आती है ।
ललित खन्ना की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले रोटेरियंस को उनसे बस एक बड़ी शिकायत यही है कि वह कभी भी सीन से गायब हो जाते हैं; हालाँकि उनके नजदीकियों का दावा है कि वह गायब कहीं नहीं होते - वह निरंतर सक्रिय हैं, होता सिर्फ यह है कि कभी कभी उनकी सक्रियता 'दिखना' बंद हो जाती है । जाहिर है कि सक्रिय होने के साथ साथ, सक्रिय 'दिखने' की जरूरत तथा अहमियत को उन्हें अभी समझना है । दीपक गुप्ता और अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने जिस तरह से बहला-फुसला कर और तरह तरह के ऑफर देकर उन्हें इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए राजी करने तथा अपने अपने साथ आने के लिए 'तैयार' करने का काम शुरू किया है, उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के सक्रिय खिलाड़ी नेताओं के लिए भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी को इग्नोर करना संभव नहीं रह गया है; और वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को अपने लिए और अपने उम्मीदवार के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं ।

Friday, August 26, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग के अचानक से प्रस्तुत हुए इस्तीफे ने राजेश शर्मा के लिए चौतरफा मुसीबत खड़ी की

नई दिल्ली । दीपक गर्ग के नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद से अचानक से हुए इस्तीफे ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा को खासी मुसीबत में फँसा दिया है और उनके लिए फजीहत खड़ी कर दी है । दीपक गर्ग ने पाँच पृष्ठों के हाथ से लिखे अपने इस्तीफे में तो ठीकरा इंस्टीट्यूट प्रशासन के सिर फोड़ा है, लेकिन अपने नजदीकियों के जरिए अपने इस्तीफे की अंतर्कथा के मुख्य खलनायक के रूप में वह राजेश शर्मा को निशाना बना रहे हैं, और राजेश शर्मा को सारी समस्या की जड़ के रूप में पोर्ट्रेट कर रहे हैं । दीपक गर्ग के नजदीकियों के हवाले से जो सूचनाएँ लोगों को मिल रही हैं, उनमें कहा/सुना जा रहा है कि राजेश शर्मा ने दीपक गर्ग को अपने ऑफिस बुला कर तरह तरह की बातों से उन पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया; राजेश शर्मा ने उन्हें साफ धमकी दी कि उन्होंने यदि इस्तीफा नहीं दिया तो वह रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लगवायेंगे - और तब उन्हें चेयरमैन पद से भी हटना पड़ेगा और उनकी बदनामी भी होगी । दीपक गर्ग ने अपने आप को घिरा हुआ पाया और और समझ लिया कि इस्तीफा देने में ही उनकी भलाई है । राजेश शर्मा ने उनके इस्तीफे को जरूरी बताते हुए तर्क दिया कि चेयरमैन के रूप में उनकी परफॉर्मेंस बहुत ही खराब है, और चूँकि उन्हें चेयरमैन बनवाने में 'मेरी ही निर्णायक भूमिका थी, इसलिए तुम्हारे खराब परफॉर्मेंस के कारण मेरी भी बदनामी हो रही है ।' दीपक गर्ग अपने इस्तीफे का कारण क्या बताएँ - यह भी राजेश शर्मा ने ही उन्हें बताया । पिछले छह महीनों में नॉर्दर्न इंडिया रीजन में जो जो कबाड़ा हुआ, उसके लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन को जिम्मेदार ठहराकर दीपक गर्ग ने अपने आप को भी आरोपों से बचा लिया, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा भी इस आरोप से बच गए कि दीपक गर्ग को चेयरमैन बनवा कर उन्होंने नॉर्दर्न रीजन को गर्त में धकेल दिया है ।
दीपक गर्ग अपने नजदीकियों के बीच और उनके जरिए अपने इस्तीफे की लेकिन एक अलग कहानी बता रहे हैं । इस कहानी के अनुसार, राजेश शर्मा ने रीजनल काउंसिल के कई सदस्यों को चेयरमैन बनाने/बनवाने की गोली दे रखी है - समस्या की बात लेकिन यह है कि चेयरमैन तो तीन ही लोग बन सकेंगे; राजेश शर्मा को खतरा यह महसूस हो रहा है कि ऐसे में जो लोग चेयरमैन नहीं बन सकेंगे, वह अंतिम और तीसरे वर्ष में अपना गुस्सा निकालेंगे - जिससे उनके सामने चुनाव में मुसीबत खड़ी होगी । विवेक खुराना, राकेश मक्कड़, पंकज पेरिवाल, नितिन कँवर आदि तो राजेश शर्मा से उम्मीद लगाए हुए हैं ही; सुमित गर्ग और राजेंद्र अरोड़ा को भी लगने लगा है कि अपनी राजनीति जमाने के लिए राजेश शर्मा उनसे सहयोग/समर्थन ले रहे हैं, तो इसके बदले में वह उनके लिए क्या 'सोच' रहे हैं ? जाहिर है कि राजेश शर्मा ने इनका समर्थन जुटा तो लिया है, लेकिन इनका समर्थन अपने साथ बनाए रखना उनके लिए बड़ी चुनौती भी है । अपने अगले चुनाव को सुरक्षित बनाए रखने के लिए राजेश शर्मा को इस चुनौती से निपटना ही है । पिछली बार का चुनाव तो वह चरणजोत सिंह नंदा के समर्थन के भरोसे किसी तरह जीत गए थे; किंतु अगली बार जब चरणजोत सिंह नंदा खुद उम्मीदवार होंगे, तब राजेश शर्मा का क्या होगा - इसकी चिंता औरों के साथ-साथ खुद राजेश शर्मा को भी बहुत है । इसलिए राजेश शर्मा को दोस्तों की ज्यादा जरूरत है, दुश्मनों की संख्या यदि बढ़ी - तो अगले चुनाव में उनके लिए मुसीबत होगी । इस परिप्रेक्ष्य में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के जिन सदस्यों को उन्होंने चेयरमैन बनवाने की गोली दे रखी है, उन्हें चेयरमैन बनवाना उन्हें जरूरी लग रहा है । दीपक गर्ग ने अपने नजदीकियों से और उनके जरिए जो मुख्य बात लोगों तक पहुँचवाई है, वह यह है कि राजेश शर्मा सभी को खुश करने/रखने की कोशिश में सभी को चेयरमैन बनवायेंगे - भले ही वह चार-चार छह-छह महीने के लिए ही चेयरमैन बने/रहें । अपनी इसी योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजेश शर्मा ने दीपक गर्ग की चेयरमैनी की बलि ली है ।
दीपक गर्ग के सूचनाओं के पिटारे से अभी जो सूचनाएँ निकल कर आ रही हैं, उनमें बताया जा रहा है कि राजेश शर्मा ने पंकज पेरिवाल को अगला चेयरमैन बनवाने का फैसला कर लिया है । पंकज पेरिवाल रीजनल काउंसिल की सत्ता चौकड़ी द्धारा उपेक्षित रहे हैं, और इस कारण अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हुए सत्ताधारी पॉवर ग्रुप से अलग-थलग रहे हैं । राजेश शर्मा को पंकज पेरिवाल के जरिए पंजाब में अपने अभियान को साधना है, इसलिए उन्हें पंकज पेरिवाल की नाराजगी के चलते हो सकने वाले नुकसान से अपने अभियान को बचाना है । पंकज पेरिवाल को राजेश शर्मा ने ही रीजनल काउंसिल के मौजूदा पॉवर ग्रुप में शामिल होने के लिए राजी किया था । पंकज पेरिवाल इस कारण से राजेश शर्मा से बुरी तरह नाराज थे कि उन्होंने पॉवर ग्रुप में शामिल करके अपना काम तो निकाल लिया, लेकिन फिर बाद में उनकी कोई सुध नहीं ली और उन्हें चौकड़ी द्धारा उपेक्षित व अपमानित होने के लिए अकेला छोड़ दिया । राजेश शर्मा अब उनकी सारी नाराजगी दूर कर देना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने पंकज पेरिवाल को अगला चेयरमैन बनाने की तैयारी कर ली है ।
दीपक गर्ग की तरफ से हो रहे इन खुलासों ने राजेश शर्मा के लिए खासी दोतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है । एक तरफ तो दीपक गर्ग के इस्तीफे का जो अप्रत्याशित नाटक हुआ है, उसे न तो इंस्टीट्यूट प्रशासन ने पसंद किया है और न रीजन के बाकी सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने । इस नाटक के असली सूत्रधार के रूप में राजेश शर्मा को चिन्हित करते हुए सभी ने अपने अपने तरीके से यही संकेत दिए हैं कि इंस्टीट्यूट में इस तरह की हरकतें नहीं चलने दी जायेंगी । दूसरी तरफ, रीजनल काउंसिल में जो सदस्य राजेश शर्मा के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, वह अपने आप को अपमानित महसूस करने लगे हैं : उन्हें लग रहा है कि यह तो तमाशा हुआ है और इस तमाशे के पीछे की जो कहानियाँ सामने आ रही हैं, उससे ऐसा लग रहा है जैसे कि वह राजेश शर्मा के सहयोगी या समर्थक नहीं - बल्कि उनकी कठपुतलियाँ हैं । इंस्टीट्यूट के जीवन में शायद पहली बार कुछ ऐसा हुआ है - जिसने अलग अलग कारणों से सभी को 'शॉक' दिया है, और सभी हतप्रभ हैं, और अपने अपने कारणों से सभी महसूस कर रहे हैं कि जो हुआ है तथा उसके पीछे के जो कारण बताए/सुने जा रहे हैं - वह अच्छा नहीं है । सभी 'चुप' हैं और सिर्फ फुसफुसाहटों के रूप में ही बातें कर रहे हैं; सभी अभी देखना चाहते हैं कि यह नाटक किस दिशा में आगे बढ़ता है ? राजेश शर्मा के लिए मुसीबत की बात यह है कि दीपक गर्ग के इस्तीफे के नाटक के लिए सभी राजेश शर्मा को ही जिम्मेदार मान रहे हैं, और राजेश शर्मा की भूमिका हर किसी के लिए संदेहास्पद हो गई है - इसलिए इस नाटक को अपनी स्क्रिप्ट के अनुसार आगे बढ़ाना और अपनी 'योजना' को क्रियान्वित करना उनके लिए खासा चुनौतीपूर्ण हो गया है ।
राजेश शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, राजेश शर्मा को दरअसल यह उम्मीद नहीं थी कि दीपक गर्ग को जितना 'अभिनय' करने के लिए कहा जायेगा - वह उससे ज्यादा अभिनय कर लेंगे । दीपक गर्ग का इस्तीफा तो राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट के अनुसार ही हुआ, इसलिए वहाँ तक का नाटक तो ठीक चला - लेकिन इस्तीफा देने के बाद दीपक गर्ग ने स्क्रिप्ट से बाहर जाकर जो 'अभिनय' किया है, उसने राजेश शर्मा के लिए चौतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है । उनकी यह मुसीबत नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आगे क्या गुल खिलायेगी - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, August 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में झूठे तथ्यों के आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को मिली इमरजेंसी ग्रांट में नरेश अग्रवाल व नेविल मेहता की 'हिस्सेदारी' की चर्चा से ग्रांट का मामला गंभीर हुआ

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर झूठ बोल कर एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट की पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की जो रकम डकारने का काम किया है, उसमें नरेश अग्रवाल और नेविल मेहता जैसे बड़े नेताओं की संलिप्तता की आशंका ने मामले को खासा गंभीर बना दिया है । दरअसल शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन किया था, उसमें ऐसी तथ्यात्मक गलतियाँ हैं कि उनके कारण पहली नजर में ही शिव कुमार चौधरी का फ्रॉड पकड़ में आ जाता है - उसके बावजूद जिस तरह से उन्हें फौरन से इमरजेंसी ग्रांट के पाँच हजार डॉलर मिल गए, उससे संदेह हुआ है कि उन्हें यह ग्रांट दिलवाने में बड़े नेताओं का हाथ है । इन बड़े नेताओं में फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल तथा लायंस इंटरनेशनल के मुंबई स्थित कार्यालय के मुखिया नेविल मेहता का नाम आता है । लोगों को लगता यह है कि इमरजेंसी ग्रांट के लिए तैयार किए गए अपने आवेदन में शिव कुमार चौधरी ने जो झूठ बोला, उसके बारे में उन्हें आभास रहा होगा कि उनका यह झूठ एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट्स का काम देख रहे विदेशियों के लिए तो पकड़ पाना संभव नहीं होगा - लेकिन नेविल मेहता उनका झूठ पकड़ सकते हैं; इसलिए उन्हें नेविल मेहता को साधना जरूरी लगा होगा, और यह काम उन्होंने नरेश अग्रवाल के थ्रू किया होगा । एलसीआईएफ (लायंस क्लब्स इंटरनेशनल फाउंडेशन) से ग्रांट लेने की प्रक्रिया का जिन लोगों को पता है, उनके लिए इस बात को हजम कर पाना मुश्किल हो रहा है कि नेविल मेहता के होते हुए शिव कुमार चौधरी ने एलसीआईएफ से पाँच हजार अमेरिकी डॉलर कैसे ठग लिए ?
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन किया, वह झूठ और फ्रॉड की तैयारी का एक पुलंदा है । कैसे ? इसे जानने/समझने के लिए पहले कृपया उनके आवेदन पत्र का पहला पैराग्राफ पढ़िए और उत्तराखंड का नक्शा देखिए :



इमरजेंसी ग्रांट के लिए दिए गए आवेदन पत्र की पहली लाइन ही इस झूठ से शुरू होती है कि पूरा उत्तराखंड राज्य लायंस डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन का हिस्सा है । सच्चाई यह है कि उत्तराखंड राज्य का बहुत छोटा सा हिस्सा ही डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में है; और राज्य का ज्यादा बड़ा भाग डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में है । इमरजेंसी ग्रांट पाने के लिए जिन पिथौरागढ़ और चमोली डिस्ट्रिक्ट्स में बादल फटने और लगातार बारिश होते रहने से हुए नुकसान को आधार बनाया गया है, नक्शे में देखा जा सकता है कि वह जिले डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन वाले देहरादून और हरिद्धार क्षेत्र से कितने दूर हैं । उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चमोली जिले न तो डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के हिस्से में आते हैं और न यहाँ डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन का कोई क्लब है । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के हरिद्धार, कोटद्धार, ऋषिकेश, मसूरी, देहरादून, रुड़की आदि के क्लब्स के लिए पिथौरागढ़ और चमोली जिले इतने दूर हैं, कि उनके लिए वहाँ जा पाना और कुछ कर पाना संभव ही नहीं है । इमरजेंसी ग्रांट पाने के लिए शिव कुमार चौधरी ने पूरी तरह एक झूठी कहानी गढ़ी और आवेदन कर दिया ।
लायंस इंटरनेशनल में इमरजेंसी ग्रांट पाने का जो सामान्य तरीका है, वह क्लब के आवेदन से शुरू होता है । वास्तव में क्लब इमरजेंसी ग्रांट की जरूरत पहचानता है, और उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को एप्रोच करता है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उसकी जरूरत को एलसीआईएफ तक पहुँचाता है । शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी ग्रांट के लिए जो आवेदन दिया, उसमें किसी भी क्लब की तरफ से प्रस्तुत हुई डिमांड का जिक्र तक नहीं है । क्लब की डिमांड रिपोर्ट के बिना प्रस्तुत हुए शिव कुमार चौधरी के आवेदन पर मुंबई कार्यालय से इमरजेंसी ग्रांट के पाँच हजार अमेरिकी डॉलर के समतुल्य तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए का चेक - नेविल मेहता की मिलीभगत के बिना रिलीज हो सकता है, यह बात किसी के गले उतर नहीं रही है ।
आपदा राहत के नाम पर अपनी जेब भरने के लिए शिव कुमार चौधरी ने योजना तो हालाँकि और भी बड़ी बनाई थी : उन्होंने अपने आवेदन में कुल 17 लाख पाँच हजार रुपए यानि करीब 25 हजार अमेरिकी डॉलर की राहत योजना की 'कहानी' गढ़ी थी; अपनी कहानी को विश्वसनीय रूप देने के लिए उन्होंने एलसीआईएफ को लिखा/बताया कि इसमें से 15 हजार डॉलर तो वह डिस्ट्रिक्ट में इकट्ठा कर लेंगे, और बाकी दस हजार डॉलर आप दे दीजिए । नोट करने की बात यह है कि आपदा राहत के लिए 15 हजार अमेरिकी डॉलर की रकम डिस्ट्रिक्ट में इकट्ठी करने का दावा करने वाले शिव कुमार चौधरी ने वास्तव में इकन्नी भी इकट्ठा नहीं की है । यह कहानी तो उन्होंने दरअसल एलसीआईएफ से दस हजार अमेरिकी डॉलर ऐंठने के लिए उन्हें सुनाई/बताई । एलसीआईएफ पदाधिकारियों ने ऐसे बड़े राहत अभियान की जमीनी हकीकत की पड़ताल किए बिना - जिसमें करीब 25 हजार अमेरिकी डॉलर खर्च हो रहे हों और जिसके लिए डिस्ट्रिक्ट में 15 हजार अमेरिकी डॉलर इकट्ठे किए जा रहे हों - पाँच हजार अमेरिकी डॉलर तुरंत से रिलीज कर दिए ।
कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि एलसीआईएफ का कामकाज देख रहे पदाधिकारी इतने बड़े गधे हैं कि कोई भी उन्हें हजारों डॉलर खर्च होने की झूठी कहानी सुनायेगा, और वह उसे तुरंत से कुछ हजार डॉलर दे देंगे । जाहिर है कि शिव कुमार चौधरी को उनकी झूठी कहानी पर जो पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की रकम मिली है, उसमें कुछेक बड़े लायन नेताओं व पदाधिकारियों का हिस्सा होगा ही ।
शिव कुमार चौधरी ने एलसीआईएफ से पाँच हजार अमेरिकी डॉलर के समतुल्य तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए प्राप्त करने में तो सफलता हासिल कर ली; किंतु उनके सामने इस रकम को ठिकाने लगाने का 'नाटक' करने की चुनौती अभी बाकी थी । इस चुनौती से निपटने में उन्होंने 'इमरजेंसी' शब्द का ही मजाक बना कर रख दिया । गौर करने वाली बात यह है कि शिव कुमार चौधरी ने इमरजेंसी बताते हुए राहत के लिए 9 जुलाई को आवेदन किया; एलसीआईएफ ने राहत की इमरजेंसी समझते हुए मात्र पाँच दिन में, 14 जुलाई को मल्टीसिटी चेक (नंबर 174415) रिलीज कर दिया - किंतु जरूरतमंदों को 'इमरजेंसी' राहत पहुँचाने में शिव कुमार चौधरी ने 39 दिन लगा दिए । राहत पहुँचाने का आयोजन उन्होंने 22 अगस्त को किया, और बड़े गुपचुप रूप से किया । 'इमरजेंसी' राहत पहुँचाने में इतने दिन उन्हें इसलिए लगे, क्योंकि इस राहत कार्यक्रम को वह स्थानीय पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा फर्स्ट व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से छिपा कर करना चाहते थे और उसके लिए मौका देख रहे थे । दरअसल आपदा पीड़ितों को इमरजेंसी राहत पहुँचाने की उनकी कोई नीयत या योजना थी ही नहीं, उन्हें तो इमरजेंसी राहत के नाम पर एलसीआईएफ से रुपए ऐंठने थे । उन्होंने एक मजाकभरी धोखाधड़ी और की : एलसीआईएफ इमरजेंसी ग्रांट उन्होंने पिथौरागढ़ व चमोली जिले के पीड़ितों के लिए ली थी, राहत सामग्री लेकिन उन्होंने इन जिलों से सैंकड़ों किलोमीटर दूर ऋषिकेश के नजदीक नरेंद्रनगर में बाँटी । तस्वीर में जो राहत सामग्री दिख रही है, कोई भी उसका दाम तीस-चालीस हजार रुपए से ज्यादा नहीं बता रहा है; शिव कुमार चौधरी को इसके लिए एलसीआईएफ से लेकिन तीन लाख चालीस हजार पचास रुपए मिले हैं ।
एलसीआईएफ में हुई इस लूट में नरेश अग्रवाल व नेविल मेहता की भूमिका को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उससे इस इमरजेंसी ग्रांट (EMR 15237/321C1) का मामला खासा संगीन हो गया है ।

Wednesday, August 24, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में ऑर्गेन डोनेशन को लेकर चलाई जा रही संजीव वर्मा की गतिविधियाँ और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की चुप्पी सवालों के घेरे में

नई दिल्ली । संजीव वर्मा के ट्रस्ट 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' की संदेहास्पद गतिविधियों के कारण रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ फँसा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट अपने कुछेक सदस्यों व पदाधिकारियों की कारस्तानी के चलते पिछले कुछ समय से आरोपों व विवादों में घिरा हुआ है । संजीव वर्मा की हरकत ने इस घेरे को थोड़ा और कस दिया है । संजीव वर्मा इस वर्ष क्लब के अध्यक्ष हैं - इसलिए उनकी हरकत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की भूमिका को भी लपेटे में ले लिया है । दिल्ली के प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल में अभी पिछले दिनों ही डॉक्टर्स की मिलीभगत से चलने वाले किडनी रैकेट का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें कुछेक लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है । इस फर्दाफाश ने मानव अंगों की तस्करी के धंधे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है । इन परिस्थितियों में, संजीव वर्मा के ट्रस्ट की गंभीर अनियमितताओं ने उनकी भूमिका को प्रश्नाकुल बना दिया है - और चूँकि संजीव वर्मा की तरफ से उन प्रश्नों को अनसुना किया जा रहा है; इसलिए उनकी भूमिका खासी संदेहास्पद हो जाती है । 
संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' नाम से एक संस्था चलाते हैं, जिसे लोगों के बीच वह ट्रस्ट बताते हैं । इसका एक पैम्फलेट वह अक्सर रोटेरियंस के बीच बाँटते रहते हैं; और इस नाम से उन्होंने एक बेवसाइट भी बनाई हुई है । बेवसाइट में अपना परिचय उन्होंने रोटेरियन के रूप में ही दिया हुआ है और अपने आप को इसके मुख्य व अकेले कर्ता-धर्ता के रूप में दर्शाया है । उनके द्धारा वितरित किए जाने वाले पैम्फलेट में तथा बेवसाइट में उनके क्लब और या उनके डिस्ट्रिक्ट का कहीं कोई नाम नहीं है । अभी तक उपलब्ध नई डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी - सुधीर मंगला के गवर्नर काल की डायरेक्टरी में पृष्ठ 217 पर डिस्ट्रिक्ट में मान्यता प्राप्त ट्रस्ट्स व सोसायटीज की जो सूची प्रकाशित है, उसमें 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' का नाम नहीं है । इससे यही आभास मिलता है कि यह एक निजी ट्रस्ट है, जो रोटरी के नाम और उसके चिन्ह का नाजायज व गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल कर रहा है ।


डिस्ट्रिक्ट के नियम-कानून के अनुसार, कहीं भी किसी भी काम में रोटरी का नाम तथा उसका चिन्ह इस्तेमाल करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अनुमति जरूरी है, और यह अनुमति देने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में प्रस्ताव पास कराना भी जरूरी होता है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन इस नियम और प्रक्रिया का कोई पालन नहीं हुआ है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियाँ पिछले दो-तीन वर्ष से चला रहे हैं, और खुले आम चला रहे हैं - डिस्ट्रिक्ट बायलॉज बनाने वाले 'महान' लोगों का ध्यान लेकिन उनकी इस अवैध हरकत पर नहीं गया; और यदि गया भी तो उन्हें संजीव वर्मा की हरकत पर कार्रवाई करने की जरूरत महसूस नहीं हुई ।
ऐसे में सवाल उठता है कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज क्या सिर्फ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में छापने के लिए बनाए जाते है ? उन्हें बनाने वालों को उन्हें लागू करवाने की जरूरत क्या सचमुच महसूस नहीं होती ? और या संजीव वर्मा के हाथ इतने लंबे हैं कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज लागू करवाने की जिम्मेदारी निभाने वाले लोगों की गर्दन तक पहुँचे हुए हैं, और उन बेचारों की हिम्मत ही नहीं हो पाई उन्हें रोकने की ?
रोटरी का नाम और चिन्ह इस्तेमाल करने वाले ट्रस्ट्स व सोसायटीज के लिए कानूनन यह भी जरूरी है कि वह अपनी संस्था का वार्षिक लेखा-जोखा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को दें, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पहले जिसे काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सामने रखे तथा फिर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत करे । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के सारे लेखा-जोखा को पूरी तरह से छिपाए हुए हैं - और कोई नहीं जानता कि इसके कामकाज को संभव बनाने के लिए वह कहाँ कहाँ से कितना पैसा इकट्ठा करते हैं, और उसे कैसे कैसे कहाँ कहाँ खर्च करते हैं ? रोटरी ऑर्गेन डोनेशन से संबंधित जितने रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, उन पर तो एक अकेले संजीव वर्मा का ही नाम है; लेकिन इसका काम करने में कई मौकों पर रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के वरिष्ठ सदस्य अजीत जालान को उनके साथ देखा गया है - जिन पर रोटरी के नाम पर कई तरह की घपलेबाजियों में संलग्न रहने का आरोप है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के काम में संजीव वर्मा के साथ अजीत जालान की संलग्नता ने रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियों को और भी संदेहास्पद बना दिया है । 
संजीव वर्मा इस वर्ष रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के अध्यक्ष हैं; इसलिए उनकी और भी ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वह रोटरी के नाम पर जो भी काम करें - उसमें पूरी पारदर्शिता हो, तथा नियमों का पूरी तरह से पालन हो । लोगों का कहना है कि संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के नाम पर जो काम कर रहे हैं, वह बहुत अच्छा और बहुत जरूरी काम है; समस्या की बात किंतु यह है कि उनका काम जितना है, 'शोर' उसकी तुलना में उसका कई गुना है; और हिसाब-किताब छिपा हुआ है, काम करने के तरीकों में नियमों का उल्लंघन है; और हिसाब-किताब के मामले में पहले से ही बदनाम चले आ रहे अजीत जालान का संगसाथ है - जिसके कारण संजीव वर्मा निशाने पर आ गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डॉक्टर सुब्रमणियम ने 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के मनमाने तरीके से सक्रिय होने पर जो आँखें बंद की हुई हैं, उससे भी मामला गंभीर हुआ है । यह एक बहुत ही बुरा संयोग है कि डॉक्टर सुब्रमणियम जिस अपोलो अस्पताल से संबद्ध रहे हैं, उस अपोलो अस्पताल का नाम मानव अंगों की तस्करी के संबंध में चर्चा में है; और डॉक्टर सुब्रमणियम अपने एक क्लब अध्यक्ष की संदेहास्पद रूप से चलाई जा रही ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधि पर चुप्पी साधे बैठे हैं ।

Tuesday, August 23, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया

आगरा । पारस अग्रवाल ने 'दल बदल' करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को तो बदलने का काम किया ही है, साथ ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी यह समझने का प्रयास करना पड़ रहा है कि पिछले लायन वर्ष में पारस अग्रवाल के समर्थन के बावजूद मधु सिंह को जब करारी हार का सामना करना पड़ा था, तब इस वर्ष पारस अग्रवाल के विरोध के चलते उन्हें जितवा पाना कैसे संभव होगा ? कई लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल कोई इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके समर्थन और विरोध से जीतने/हारने के फैसले होते हों, इसलिए इस बात से चुनावी राजनीति के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पारस अग्रवाल किसके साथ हैं और किसके खिलाफ । लेकिन कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल - और पारस अग्रवाल ही क्यों, कोई भी - किसी चुनावी लड़ाई में निर्णायक फैक्टर नहीं हो सकते हैं; लेकिन समर्थन और विरोध बनाने में तो हर किसी की भूमिका होती ही है - वह भूमिका चाहें छोटी हो और या बड़ी; और इस लिहाज से पारस अग्रवाल के 'दल बदल' की भी भूमिका होगी ही, जो अभी तो मधु सिंह की उम्मीदवारी के खिलाफ जाती नजर आ रही है । यही कारण है कि पारस अग्रवाल के दल बदल से मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच निराशा पैदा हुई है, और उन्हें मधु सिंह की उम्मीदवारी पर खतरा मँडराता दिखने लगा है । उनके समर्थक कुछेक नेताओं ने तो इस बात पर भी विचार करना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की बजाए वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए किसी और को उम्मीदवार बनाएँ, तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उन्हें कामयाबी मिल सकती है क्या ?
मजे की बात यह है कि पारस अग्रवाल को दल बदलने के लिए मजबूर करने का आरोप मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल पर ही लगाया जा रहा है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के इशारे पर काम कर रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने कई फैसलों और मीटिंग्स आदि में पारस अग्रवाल को शामिल ही नहीं किया और उन्हें अलग-थलग करने/रखने की कोशिशें कीं, जिन्हें देख/जान कर पारस अग्रवाल के पास फिर दल बदल कर दूसरे खेमे में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि सीपी सिंघल और दूसरे नेताओं ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए पारस अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया तथा पारस अग्रवाल पर जासूसी करने का व धोखेबाजी करने का आरोप लगा कर उन्हें अलग-थलग करने/रखने का रवैया अपनाया । ऐसे में, पारस अग्रवाल दूसरे खेमे में न जाएँ, तो क्या करें ? नजदीकियों का कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल का सुमित गुप्ता के साथ पुराना परिचय और संबंध है, लेकिन सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से उनका कोई संबंध नहीं है - यह संबंध जोड़ कर मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने दरअसल अपनी कमजोरी को ही जाहिर किया है, और अपनी कमजोरी का ठीकरा पारस अग्रवाल के सिर पर फोड़ दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले वरिष्ठ लायन सदस्यों का कहना है कि पिछले लायन वर्ष के चुनावी नतीजे ने वास्तव में पारस अग्रवाल को अपनी भूमिका के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मधु सिंह और बीके गुप्ता के बीच चुनाव में पारस अग्रवाल ने मधु सिंह का समर्थन किया था । बीके गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को समझाने की बहुत कोशिश भी की थी कि वह खुद चूँकि सभी के समर्थन से निर्विरोध सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए हैं, इसलिए अब उन्हें किसी एक उम्मीदवार के समर्थन में खुल कर सक्रिय नहीं होना/दिखना चाहिए - लेकिन पारस अग्रवाल पर उनकी समझाइस का कोई असर नहीं पड़ा । वह तो जब चुनाव का नतीजा आया, तब पारस अग्रवाल की आँखें खुलीं । मधु सिंह खुद तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में बुरी तरह से हारी हीं - उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की सजा नेगेटिव वोट के रूप में सीपी सिंघल और पारस अग्रवाल को भी मिली ।
इसी से सबक लेकर पारस अग्रवाल ने 'पक्षपाती' भूमिका निभाने से बचने की कोशिशें शुरू कीं । उनकी इन कोशिशों का ही नतीजा था कि मल्टीपल काउंसिल की चंडीगढ़ में हुई कॉन्फ्रेंस में अम्बरीष सरीन की जो फजीहत हुई और जिसके बाद अम्बरीष सरीन व सीपी सिंघल ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के खिलाफ जो मोर्चा खोला - पारस अग्रवाल उससे दूर रहे । सीपी सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं को पारस अग्रवाल का यह रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने पारस अग्रवाल पर धोखेबाजी करने का आरोप तो लगाया ही; साथ ही यह आरोप भी मढ़ दिया कि पारस अग्रवाल 'यहाँ' की खबरें 'वहाँ' पहुँचाते हैं । इसके बाद, लायंस क्लब आगरा आदर्श के सुमित गुप्ता की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने मधु सिंह के खेमे में पारस अग्रवाल को और भी संदेहास्पद बना दिया । मधु सिंह के खेमे में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में तथा डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों से संबंधित फैसलों  तक में पारस अग्रवाल को शामिल नहीं किया, जिसकी चर्चा वाट्स ऐप तक में हुई । इस तरह से मधु सिंह के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को पूरी तरह से प्रतिद्धंद्धी खेमे में धकेल दिया है । धकेल तो दिया है, किंतु अब वह पछता भी रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि इससे उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है ।
मधु सिंह की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को हालाँकि उम्मीद है कि पारस अग्रवाल अपने पिछले लायन वर्ष के रवैये के कारण 'उस' खेमे के लोगों के बीच भी भरोसा नहीं बना पायेंगे - और तब वह वापस 'यहीं' लौटने के लिए मजबूर होंगे । आगे क्या होगा - यह तो आगे पता चलेगा, अभी लेकिन पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया है ।

Saturday, August 20, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में राकेश अग्रवाल के केएस लूथरा के साथ जा मिलने के कारण गुरनाम सिंह की राजनीति को तगड़ा झटका

लखनऊ । वरिष्ठ लायन सदस्य राकेश अग्रवाल ने गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के नजदीक होने का ऐलान क्या किया, गुरनाम सिंह के लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवारों का जैसे अकाल पड़ गया है । गुरनाम सिंह के उम्मीदवार का ठप्पा लगवाने के लिए जिन बिश्वनाथ चौधरी तथा सुधाकर रस्तोगी के बीच कुछ दिन पहले तक भयंकर होड़ मची थी, वह दोनों तो चुनावी मैदान से हटने की घोषणा कर ही चुके हैं - तीसरा भी कोई गुरनाम सिंह का उम्मीदवार होने का ठप्पा लगवाने को तैयार नहीं हो रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गुरनाम सिंह ने यूँ तो पहले भी झटके खाए हैं, लेकिन अब की बार उन्हें जो झटका मिला है - वह अभूतपूर्व है । केएस लूथरा ने - जब विशाल सिन्हा को हरवाकर शिव कुमार गुप्ता को चुनाव जितवाया था; जब संदीप सहगल को चुनाव जितवाया था; और जब इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चुनाव में अनुपम बंसल को हराया था; तब भी गुरनाम सिंह की चुनावी राजनीति को ऐसा झटका नहीं लगा था । राकेश अग्रवाल को अपनी तरफ मिलाकर केएस लूथरा ने लेकिन गुरनाम सिंह की राजनीति की जैसे कमर ही तोड़ दी है । सचमुच, गुरनाम सिंह ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में इतने बुरे दिन कभी नहीं देखे कि उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार ही न मिलें ।
उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चुनाव में गुरनाम सिंह के उम्मीदवार अनुपम बंसल को केएस लूथरा से जो करारी मात मिली थी, उसके बाद भी डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गुरनाम सिंह का राजनीतिक जलवा कम नहीं हुआ था । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए बिश्वनाथ चौधरी के रूप में गुरनाम सिंह को एक उम्मीदवार आसानी से मिल गया था । यह गुरनाम सिंह की राजनीति का जलवा ही था कि सुधाकर रस्तोगी ने भी अपनी उम्मीदवारी के लिए उनकी सरपरस्ती पाने के प्रयास शुरू कर दिए थे; और उन्हें विश्वास था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा के क्लब का सदस्य होने के नाते वह गुरनाम सिंह के हाथों से बिश्वनाथ चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा फिंकवा देंगे और गुरनाम सिंह के हाथों में उनकी ही उम्मीदवारी का झंडा रहेगा । लेकिन राकेश अग्रवाल के गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ जा मिलने से सारा नजारा एकदम से ही बदल गया है । दरअसल राकेश अग्रवाल का क्लब एक बड़ा क्लब है, और उसके पंद्रह वोट हैं । किसी भी चुनावी मुकाबले में पंद्रह वोट बहुत मायने रखते हैं । हालाँकि किसी भी चुनाव में पंद्रह वोट एकमुश्त मिलने से भी चुनावी जीत की गारंटी नहीं मिलती है - राकेश अग्रवाल के क्लब के पंद्रह वोट मिलने के बावजूद गुरनाम सिंह के उम्मीदवार कई बार चुनाव हारे ही हैं; लेकिन पंद्रह वोट यदि प्रतिपक्षी खेमे में चले जाएँ, तब तो हार की पक्की गारंटी है । राकेश अग्रवाल ने गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ होने का जो फैसला किया है, उसके कारण हालात लेकिन निर्णायक रूप से बदल गए हैं; और गुरनाम सिंह के उम्मीदवार होने का अर्थ - निश्चित पराजय हो गया है । अब निश्चित पराजय का वरण तो कोई भी नहीं करना चाहेगा । सो, जो बिश्वनाथ चौधरी और सुधाकर रस्तोगी जोरशोर से अपनी अपनी उम्मीदवारी का झंडा गुरनाम सिंह को थमा देने की होड़ में लगे थे, वह तो अपने अपने झंडे लपेट कर चुपचाप बैठ ही गए हैं; अन्य जिसे भी गुरनाम सिंह की तरफ से उम्मीदवार बनने के लिए कहा जा रहा है, वह चुपचाप पतली गली पकड़ ले रहा है ।
बिश्वनाथ चौधरी तथा सुधाकर रस्तोगी की तरफ से उम्मीदवारी वापस होने का कारण स्वास्थ्य ठीक न होना बताया गया है । यह सच है कि इन दोनों को हाल ही के दिनों में स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है; पर उम्मीदवारी से पीछे हटने के संदर्भ में यह आधा सच है । स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का यह ईलाज करवा रहे हैं, और जल्दी ही ठीक हो जायेंगे । स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों के बावजूद बिश्वनाथ चौधरी ने चीफ डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट सेक्रेटरी का और सुधाकर रस्तोगी ने डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट सेक्रेटरी एडमिनिट्रेशन का पद तो नहीं छोड़ा है न ! जाहिर है कि उम्मीदवारी छोड़ने में स्वास्थ्य को कारण बताना सिर्फ बहाना है । इनके ही नजदीकियों का कहना है कि अभी यदि केएस लूथरा इनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की घोषणा कर दें, तो यह अपनी बीमारी को भूल कर फौरन से उम्मीदवार हो जायेंगे । गुरनाम सिंह और उनके नजदीकी भी इस सच्चाई को समझ/पहचान रहे हैं, और इसीलिए वह बार-बार माफी/आफी माँगते हुए राकेश अग्रवाल को फिर से अपने साथ लाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं - राकेश अग्रवाल अभी तक तो उनकी माफी से पिघलते हुए दिख नहीं रहे हैं ।
राकेश अग्रवाल को गुरनाम सिंह से आखिर ऐसी क्या चोट पड़ी है, जिसके 'घाव' माफी से भी नहीं भर रहे हैं ? राकेश अग्रवाल का कहना है कि उन्हें गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो एके सिंह की उम्मीदवारी को लेकर धोखे में रखा, और फिर एके सिंह का नाम लेकर लोगों के बीच उन्हें बदनाम करने की कोशिश की । गुरनाम सिंह तथा उनके नजदीकियों ने ही लोगों के बीच उड़ाया कि एके सिंह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनता देख राकेश अग्रवाल को अच्छा नहीं लगा है । राकेश अग्रवाल का कहना है कि एके सिंह को लायनिज्म से परिचित करवाने का काम उन्होंने किया; एके सिंह को लायनिज्म में और डिस्ट्रिक्ट में सक्रिय व संलग्न करने तथा पहचान दिलाने का काम उन्होंने किया; एके सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित करने का काम उन्होंने किया; एके सिंह की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में वह उस हालत में भी उनके साथ गए, जब एक दुर्घटना का शिकार होने के चलते वह बुरी तरह चोटिल थे और ठीक तरह से कपड़े भी नहीं पहन सकते थे; ऐसे में एके सिंह को कामयाब होता देख उन्हें अच्छा भला क्यों नहीं लगेगा ? राकेश अग्रवाल ईमानदारी से इस बात को भी स्वीकार करते और बताते हैं कि हाँ, एके सिंह के कुछेक फैसलों को लेकर उनकी नाराजगी थी - लेकिन वह नाराजगी इतनी बड़ी नहीं थी कि वह एके सिंह की राह में रोड़ा बनने की कोशिश करते । राकेश अग्रवाल की शिकायत यह है कि गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो एके सिंह की उम्मीदवारी को समर्थन देने के मामले में उनसे झूठ बोला और बराबर उन्हें अँधेरे में रखा; और फिर डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच उन्हें ही बदनाम करने का काम किया । राकेश अग्रवाल का कहना है कि लायनिज्म में और डिस्ट्रिक्ट में उनका कोई स्वार्थ नहीं है; कौन गवर्नर बन रहा है और उसे कौन बनवा रहा है; कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है; उन्हें इस सबसे कोई मतलब नहीं है - वह तो बस आपसी विश्वास और सम्मान के साथ लोगों के साथ रहना चाहते हैं और जो बन पड़े, उसे करते रहना चाहते हैं; गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने इसके बावजूद उनके साथ पहले तो धोखा किया, और फिर उन्हें ही बदनाम करने का प्रयास किया । इसके चलते ही उन्होंने बहुत विनम्रता से गुरनाम सिंह को बता दिया कि वह अब आगे उनके साथ नहीं रह पायेंगे ।
मजे की बात यह रही कि गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो राकेश अग्रवाल की इस 'बाय-बाय' को गंभीरता से नहीं लिया; लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा/पाया कि राकेश अग्रवाल के उनका साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ जा मिलने के बाद डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के बदले समीकरणों के चलते उनके उम्मीदवार 'बीमार' पड़ रहे हैं, और उनसे बचने लगे हैं - तब उनके तोते उड़े । अपने 'तोतों' को बचाने के लिए गुरनाम सिंह तथा उनके नजदीकियों ने राकेश अग्रवाल को मनाने और अपने खेमे में वापस लाने के लिए प्रयास तो तेज किए हैं, लेकिन उनके प्रयासों को अभी तो कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है ।

Thursday, August 18, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास के मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जॉन जर्म को एक रोटेरियन का खुला पत्र

श्री जॉन जर्म जी,
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को लिखा आपका पत्र पढ़ने का मौका मिला, तो यह जानकर वास्तव में अच्छा लगा कि आपने प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का संज्ञान लिया और अपनी तरफ से पहल करके एक मामले में स्पष्टीकरण दिया । आप शायद पहले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट हैं, जिन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का संज्ञान लिया । मुझे लगता है कि यह किया जाना चाहिए, क्योंकि प्रेस रिपोर्ट्स ही हैं - जो हमें आईना दिखाती हैं और हमें सच्चाई के सामने ला खड़ा करती हैं : हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स बात को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हों; हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स कुछ सच और कुछ झूठ का घालमेल करती हों; यह भी हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स बिलकुल झूठ बात ही कहती हों - लेकिन फिर भी यह प्रेस रिपोर्ट्स ही हैं, जो हमें सच्चाई की तरफ जाने के लिए प्रेरित करती हैं या मजबूर करती हैं । अन्यथा आप तो जानते ही हैं कि हम रोटेरियंस पीठ पीछे तो एक दूसरे की बुराई करते हैं और सामने पड़ने पर चापलूसी करते हैं । प्रेस के प्रति भी हमारा रवैया धूर्ततापूर्ण व पाखंडभरा है - हम यह प्रयास तो खूब करते हैं कि प्रेस हमारे कामकाज को और हमारी तस्वीरों को अच्छे से छापे; इसके लिए हम प्रेस के लोगों को अपनी मीटिंग्स में बुलाते हैं, उन्हें खिलाते-पिलाते हैं, उन्हें गिफ्ट्स देते हैं; लेकिन प्रेस के जो लोग हमारी गलतियों, हमारी कमजोरियों, हमारी बेईमानियों की बात करते हैं, हमें हमारी असलियत बताने/दिखाने की कोशिश करते हैं - उन्हें हम अपना दुश्मन मान लेते हैं । हम इस सच्चाई को समझने व स्वीकार करने से बचते/छिपते हैं कि प्रेस का काम हमारी तारीफ करना और या हमारा प्रचार करना नहीं है; प्रेस का काम सच सामने लाने का है - यदि हम कभी पाते हैं कि किन्हीं प्रेस रिपोर्ट्स में सच की बजाए झूठ कहा/लिखा जा रहा है, तो हमें उनसे संवाद करना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि सच वह नहीं है जो लिखा/छापा जा रहा है, बल्कि सच 'यह' है । पर, लगता है कि हम चाहते ही नहीं हैं कि सच सामने आए -  और इसीलिए हमारी गलतियों, हमारी कमजोरियों व हमारी बेईमानियों की बात करने वाली प्रेस को हम 'दुश्मन' घोषित कर देते हैं और समझ लेते हैं कि ऐसा करके हम सच्चाई पर पर्दा डाल देंगे ।
श्रीमान जॉन जर्म, इसीलिए मुझे यह 'देख' कर अच्छा लगा कि प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का आपने संज्ञान लिया और एक मामले में उसका स्पष्टीकरण दिया ।
श्री जॉन जर्म, अब आपके स्पष्टीकरण पर दो बात करना चाहूँगा । आपका कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल की इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता तथा उसके चेयरमैन पद से हटने का फैसला यशपाल दास का अपना फैसला है; और आपने या अन्य किसी ने उन्हें हटने के लिए नहीं कहा था । यह बताते हुए आपने लेकिन एक बात स्पष्ट नहीं की कि यशपाल दास यदि उक्त कमेटी से खुद नहीं हटते तो क्या वह उक्त कमेटी के सदस्य और चेयरमैन बने रहते ? रोटरी के अपने करीब बीस वर्षों के जीवन में अर्जित किए ज्ञान और समझ के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि रोटरी इंटरनेशनल यशपाल दास को उस कमेटी का सदस्य और चेयरमैन नहीं बने रहने देता, जिस कमेटी को यशपाल दास की मिलीभगत के आरोप लगाने वाली उनके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी शिकायत पर विचार और कार्रवाई करना है । मेरा विश्वास है कि रोटरी इंटरनेशनल नैसर्गिक न्याय की इस माँग का पुरजोर समर्थन करता है कि आरोपी को ही जज नहीं बनाया जा सकता है । इस आधार पर यशपाल दास को उक्त कमेटी से हटना ही था । ऐसे में, यदि आपकी बात को सच भी मान लें कि यशपाल दास अपने आप उक्त कमेटी से हटे हैं - तो यह बात उनके 'हाई करैक्टर' को कैसे दर्शाती है ? एक अपराधी अपराध करने के बाद पकड़े जाने से बचने की कोशिश में छिपता/भागता है, लेकिन यह समझ लेने के बाद कि वह ज्यादा दिन तक छिप/भाग नहीं सकेगा और कभी भी पकड़ा जायेगा - वह सरेंडर कर देता है; तो उसका सरेंडर करना उसके 'हाई करैक्टर' का सुबूत कैसे हो सकता है ?
श्री जॉन जर्म, अपने करीब बीस वर्षों के रोटरी जीवन में मैं यह जानने/समझने में सर्वथा असमर्थ रहा हूँ कि इलेक्शन रिव्यू कमेटी और या अन्य कमेटियों के लिए सदस्य व पदाधिकारी चुनने के मापदंड या पैमाने आखिर हैं क्या ? बीस वर्षों में मुझे जो बात समझ में आई वह यह कि इन कमेटियों में सदस्यता और पद फैसला करने वाले बड़े पदाधिकारियों के परिचय के चलते होने वाली सिफारिश, उनकी चापलूसी और तिकड़मों से मिलते हैं । यशपाल दास को भी इनमें से ही किसी कारण से इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता व चेयरमैन का पद मिला होगा; मैंने सुना है कि इस कमेटी में जगह पाने वाले की रोटरी में राजनीति बहुत चमकती है और उसके सामने पैसे बनाने के मौके भी होते हैं, इसलिए इस कमेटी में जगह पाने के लिए रोटेरियंस के बीच बड़ी मारामारी रहती है । ऐसे में, यह सहज समझा जा सकता है कि इस कमेटी में जगह पाने के लिए यशपाल दास ने पता नहीं किस किस की सिफारिश जुटाई होगी, किस किस की चापलूसी की होगी और न जानें कैसी कैसी तिकड़में की होंगी ? लेकिन उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट के रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में दर्ज हुई चुनावी शिकायत ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया । स्वाभाविक सी बात है कि अपनी मेहनत पर पानी पड़ता देख उन्होंने अपनी मेहनत की 'कमाई' को बचाने की कोशिश की होगी । कोई भी ऐसा करेगा ही । कौन होगा जो अपनी मेहनत को पानी में बहते जाते हुए चुपचाप देखता रहेगा ? हर कोई अपनी तरफ से अपनी मेहनत की 'कमाई' को बचाने की हर संभव कोशिश करेगा ही ।
श्री जॉन जर्म, आप चाहते हैं कि सभी लोग लेकिन आपकी इस बात पर विश्वास कर लें कि यशपाल दास ने अपनी मेहनत की कमाई को बचाने की कोई कोशिश नहीं की; और अपना 'हाई करैक्टर' दिखाते हुए खुशी खुशी अपनी 'कमाई' छोड़ दी । चलिए, आप कहते हैं तो मान लेते हैं; लेकिन कृपया इतना तो बता दीजिए कि अपना 'हाई करैक्टर' दिखाने में यशपाल दास को खासा लंबा समय क्यों लगा और उन्होंने 22 जून को चुनावी शिकायत दर्ज होते ही इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता व चेयरमैनी क्यों नहीं छोड़ दी थी ? 20 जुलाई तक किसी को यह नहीं पता था कि यशपाल दास उक्त कमेटी के सदस्य और चेयरमैन नहीं हैं । खुद यशपाल दास ने, या आपने या अन्य किसी ने यह जानकारी देने की जरूरत आखिर क्यों नहीं समझी ? 20 जुलाई तक भी रोटरी इंटरनेशनल की बेवसाइट यशपाल दास को ही उक्त कमेटी का चेयरमैन क्यों दिखा रही थी ? संभवतः इसी आधार पर टीके रूबी ने आपको ईमेल लिखा होगा; और जैसा कि आपने अपने पत्र में बताया है कि 20 जुलाई के टीके रूबी के ईमेल का जबाव में आपने उन्हें बताया - और पहली बार यह बात सामने आई कि यशपाल दास उक्त कमेटी छोड़ चुके हैं । यह बात यदि पहले से लोगों को पता होती, तो टीके रूबी को आपको उक्त मेल लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती । दरअसल इन्हीं बातों के चलते लोगों के बीच संदेह है कि आप जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा छिपा रहे हैं - और इस कारण से लोगों के बीच यशपाल दास की और भी ज्यादा फजीहत हो रही है, जिसके लपेटे में आप भी आते जा रहे हैं । यशपाल दास के चक्कर में आप अपनी फजीहत क्यों करवा रहे हैं, यह आप ही बेहतर बता सकते हैं ।
श्री जॉन जर्म, दो बातों लिए मैं आपसे माफी भी माँगना चाहूँगा । पहली बात तो यह कि अपना यह पत्र मैं आपको प्रेस के जरिये भेज रहा हूँ । इसका कारण यह है कि इस पत्र में मैंने जो बातें की हैं, वह कोई मेरे और आपके बीच का मामला तो है नहीं; यह तो रोटेरियंस के बीच का मामला है - इसलिए यह बातें लोगों के बीच आनी चाहिएँ । आप इंटरनेशनल प्रेसीडेंट हैं, आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा से कह सकते हैं कि वह लोगों के सामने आपके पत्र में कहीं गईं बातें लाएँ; मेरी तो ऐसी हैसियत है नहीं, लिहाजा मुझे प्रेस की ही मदद लेनी पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि मैं अपनी पहचान छिपाते हुए यह पत्र लिख रहा हूँ । आप तो जानते ही हैं कि मेरे डिस्ट्रिक्ट में बड़े पॉवरफुल रोटरी नेता हैं, जो सिर्फ चापलूसों को पसंद करते हैं और वह जिसे पसंद नहीं करते हैं उसका रोटरी कैरियर तबाह कर देते हैं । मुझे अभी रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में रहना है, इसलिए मुझे उनकी चापलूसी ही करनी है और इस पत्र के लेखक के रूप में उनकी नजरों में आने की मेरी हिम्मत नहीं है । उम्मीद है कि आप मेरी मजबूरी समझेंगे ।
रोटरी अभिवादन सहित
आपका
एक रोटेरियन 
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रमन अनेजा को संबोधित जॉन जर्म का पत्र :


Tuesday, August 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की अकर्मणता और पक्षपाती रवैये से उत्साहित होकर अजीत जालान ने 'पत्थर' फेंका तो अनूप मित्तल की तरफ, किंतु 'घायल' उन्होंने अपनी पत्नी अंजु जालान को कर लिया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम के अकर्मणता और या पक्षपाती रवैये के चलते रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की वित्तीय धांधलियों का मामला डिस्ट्रिक्ट के दो प्रमुख रोटेरियंस - अनूप मित्तल व अजीत जालान के बीच तू तू मैं मैं में तब्दील होता जा रहा है; और इसके चलते यह रोटरी तथा डिस्ट्रिक्ट 3011 के लिए बदनामी भरा सबब बनता जा रहा है । इस मामले में बड़ी खास बात लेकिन यह है कि डॉक्टर सुब्रमणियम को ज्यादा कुछ काम करना भी नहीं है । निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला मामले से जुड़े सारे तथ्य डॉक्टर सुब्रमणियम को सौंप कर उनसे उचित कार्रवाई करने की सिफारिश कर चुके हैं । हो सकता है कि आरोपों को अपनी जाँच पड़ताल में सही पाते हुए सुधीर मंगला ने क्लब को निलंबित करने की जो सिफारिश की है, डॉक्टर सुब्रमणियम उसे उचित न मानते हों - लेकिन वह इस बात को कहते हुए अपना फैसला तो दें, ताकि मामला निपटने की और बढ़े । डॉक्टर सुब्रमणियम लेकिन मामले पर कुंडली मारे बैठे हैं । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट में की धांधलियों पर कार्रवाई करने की सुधीर मंगला की सिफारिश पर डॉक्टर सुब्रमणियम चुप्पी क्यों बनाए हुए हैं ? सुधीर मंगला ने अपनी कार्रवाई - मामले की पड़ताल करने से लेकर डॉक्टर सुब्रमणियम को की गई सिफारिश तक की कार्रवाई - के दस्तावेज चूँकि रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय को भी भेजे हुए हैं; जिस कारण रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की घपलेबाजी का मामला खासा गंभीर हो गया है - जिसकी अनदेखी करना डिस्ट्रिक्ट को खासा महँगा पड़ सकता है । लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियम का मामले पर कोई ध्यान नहीं है ।
डॉक्टर सुब्रमणियम के इस रवैये पर कुछेक लोगों का कहना है कि वह फैसला लेने की क्षमता ही नहीं रखते हैं; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वह बन जरूर गए हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी निभा सकने की काबिलियत उनमें नहीं है और इसीलिए वह मामले को लटकाए हुए हैं । अन्य कुछ लोगों को आशंका लेकिन यह है कि डॉक्टर सुब्रमणियम के गवर्नर-काल के अभी तक के खर्चों को लेकर अजीत जालान उन्हें 'ब्लैकमेल' कर रहे हैं, जिस कारण वह सुधीर मंगला की सिफारिश पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं; घपलों के सुबूत इतने पुख़्ता हैं कि वह सुधीर मंगला के निष्कर्षों को ख़ारिज भी नहीं कर सकते हैं - इसलिए उन्होंने फैसला न करने वाला रवैया अपना लिया है । समस्या से मुँह चुरा लेने से समस्या हल तो नहीं हो जाती है - बल्कि वह अपने साईड इफेक्ट्स और प्रकट करती है । इस मामले में भी यही हो रहा है । डॉक्टर सुब्रमणियम के चुप्पी साध लेने के बावजूद मामला चूँकि शांत नहीं पड़ा, तो मोर्चा अजीत जालान ने संभाला । अजीत जालान क्लब के प्रमुख सदस्यों में हैं और क्लब में जिन घपलों का आरोप है, उनमें कुछेक में उनकी परोक्ष/अपरोक्ष मिलीभगत के संकेत व सुबूत हैं । अभी तक वह पर्दे के पीछे से मोर्चा सँभाले हुए थे तथा क्लब के खिलाफ हो सकने वाली कार्रवाई को 'रोके' हुए थे; मामले को शांत होता न देख उन्होंने पर्दा हटा दिया और खुल कर सामने आ डटे ।
अजीत जालान ने क्लब की घपलेबाजियों को पर्सनल झगड़े में बदलने का प्रयास करते हुए अनूप मित्तल को निशाना बनाया । डिस्ट्रिक्ट में कई कई पदों पर रहते हुए अनूप मित्तल रोटरी की सेवा करते रहे हैं और कई उल्लेखनीय रिकॉर्ड बनाते रहे हैं । प्रसंगवश एक रिकॉर्ड का यहाँ जिक्र करना मामले को समझने में मदद करेगा : पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट ने रोटरी फाउंडेशन में 1057 अमेरिकी डॉलर दिए थे, जिनमें 1000 अमेरिकी डॉलर अनूप मित्तल के थे । बाकी 57 अमेरिकी डॉलर में रोटरी की बड़ी बड़ी बातें करने वाले अजीत जालान का कितना हिस्सा था, इस रहस्य पर पर्दा पड़ा ही रहे तो ज्यादा अच्छा है । बहरहाल, अजीत जालान ने आरोपों और उनके सुबूतों का सीधा जबाव देने की बजाए अनूप मित्तल को निशाना बनाया । यह सच है कि घपलेबाजियों को सामने लाने का काम अनूप मित्तल ने किया है; किंतु उन्होंने तो हिसाब-किताब को लेकर आरोप लगाए थे; जिनकी जाँच-पड़ताल करने पर निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला ने आरोपों को सही पाया । इससे जाहिर है कि अनूप मित्तल कोई पर्सनल झगड़ा नहीं कर रहे थे; किंतु अजीत जालान ने उन्हें निशाना बना कर मामले को पर्सनल बनाने का प्रयास किया । अजीत जालान के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि वह 'चोट' तो अनूप मित्तल को पहुँचाना चाहते थे, लेकिन अपनी इस हरकत से वह 'घायल' अपनी पत्नी को कर बैठे । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के घपलेबाजों को बचाने के प्रयासों का साईड इफेक्ट यह हुआ है कि इस मामले में अब अजीत जालान की पत्नी अंजु जालान का नाम भी जुड़ गया है ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के वर्ष 2014-15 के हिसाब-किताब में गड़बड़ी के गंभीर आरोप हैं, और इस आरोप के लिए अजीत जालान पर उस वर्ष क्लब के ट्रेजरार पद का कामकाज संभाले होने का हवाला देते हुए जिम्मेदारी डाली गई है । अनूप मित्तल को निशाना बनाते हुए लिखे पत्र में अजीत जालान ने दावा किया कि वह कभी भी रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के ट्रेजरार नहीं रहे हैं । तकनीकी रूप से अजीत जालान का दावा बिलकुल सच है; लेकिन उन्होंने यह दावा एक 'व्यावहारिक सच' को छिपाने की नीयत से किया, और उनकी यही होशियारी मामले में उनकी पत्नी का नाम आ जाने के कारण उन्हें उल्टी पड़ी । वास्तव में वर्ष 2014-15 में क्लब की ट्रेजरार उनकी पत्नी अंजु जालान थीं । क्लब में जो लोग जालान दंपति को जानते हैं, उनका कहना है कि अंजु जालान एक भली सीधी सादी महिला हैं, जिन्हें अपने राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थ में 'इस्तेमाल' करते हुए अजीत जालान ने क्लब का ट्रेजरार बनवा दिया था । तकनीकी रूप से क्लब की ट्रेजरार अंजु जालान थीं, लेकिन ट्रेजरार का काम अजीत जालान ही करते थे । वर्ष 2014-15 का क्लब का हिसाब-किताब क्लब के सदस्यों को यदि अभी तक नहीं मिला है, तो इसका कारण यही माना/समझा जा रहा है कि उस वर्ष के हिसाब-किताब में भारी घपलेबाजी है । उस वर्ष अजीत जालान की पत्नी क्लब की ट्रेजरार थीं, तब अजीत जालान घपलेबाजी के आरोप से इस तर्क से भला कैसे बच सकते हैं कि वह कभी क्लब के ट्रेजरार नहीं रहे ? अपने इस दावे के जरिए अजीत जालान क्या यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि वर्ष 2014-15 की घपलेबाजी के लिए मुझे मत पकड़ो, मेरी पत्नी को पकड़ो ? अजीत जालान को शायद इस बात का आभास नहीं रहा होगा कि आरोपों से बचने की उनकी होशियारी उनके साथ-साथ उनकी पत्नी को भी आरोपों के दलदल में घसीट लेगी ।
इस मामले में और गंद फैले, इससे बचने का एक ही उपाय है कि लंबित पड़े इस मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम तुरंत से फैसला करें - जो ठीक समझें, वह फैसला करें; ताकि मामला निर्णायक दिशा में आगे बढ़े । इस मामले में फैसला करने के डॉक्टर सुब्रमणियम के रवैये को लेकर उनके एक नजदीकी ने एक कहानी 'बनाई' है, जिसका 'संदेश' खासा दिलचस्प और प्रासंगिक है । कहानी के अनुसार, अनूप मित्तल एक शाम डॉक्टर सुब्रमणियम से मिले और उन्हें रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के घपलों के बारे में विस्तार से बताया और उचित करवाई करने की माँग की । डॉक्टर सुब्रमणियम ने उनकी पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी और कहा : 'अनूप, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' अगले दिन शाम को अजीत जालान उनसे मिले और उन्होंने तमाम आरोपों को तरह तरह के तर्क देते हुए झूठा बताया और क्लब के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का उनसे अनुरोध किया । डॉक्टर सुब्रमणियम ने उनकी भी पूरी बात बड़े ध्यान से सुनी और बोले : अजीत, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' अजीत जालान जब चले गए, तब डॉक्टर सुब्रमणियम की पत्नी डॉक्टर ललिता उन पर बहुत बिगड़ी कि तुम कैसे व्यक्ति हो; दोनों को राईट और एब्सोल्यूट्ली राईट बता रहे हो; दोनों में से राईट तो कोई एक ही होगा न । डॉक्टर ललिता ने डॉक्टर सुब्रमणियम से कहा कि आपको फैसला करना चाहिए कि दोनों में से कौन सचमुच राईट है । डॉक्टर ललिता ने कहा कि आपको याद रखना चाहिए कि आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हो; और आपको किसी एक के पक्ष में फैसला करना चाहिए । डॉक्टर सुब्रमणियम ने अपनी पत्नी की नाराजगी भरी और सलाहपूर्ण बातों को ध्यान से सुना और कहा : 'ललिता, तुम बिलकुल ठीक कह रही हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' यह सुनकर डॉक्टर ललिता ने अपना सिर पीट लिया ।
कहानी में डॉक्टर ललिता ने अपना सिर पीट लिया; तो डिस्ट्रिक्ट में डॉक्टर सुब्रमणियम के टालू रवैये से उत्साहित होकर अजीत जालान ने अनूप मित्तल की तरफ जो पत्थर फेंका था, उससे अपनी पत्नी को ही घायल कर लिया है । देखना दिलचस्प होगा कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की घपलेबाजियों का मामला और क्या क्या तमाशे दिखवायेगा ?

Sunday, August 14, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के संदर्भ में दीपक गुप्ता की तैयारी की कमजोरियों का अशोक जैन ने पूरा पूरा फायदा उठा कर अपनी उम्मीदवारी को टक्कर का बना लिया है

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की बुरी दशा ने दीपक गुप्ता के चुनाव अभियान को जो चोट पहुँचाई है, अशोक जैन उसका पूरा पूरा फायदा उठाने की कोशिश करते देखे जा रहे हैं - और दीपक गुप्ता के ही समर्थकों व शुभचिंतकों को लगने लगा है कि दीपक गुप्ता ने यदि स्थिति की गंभीरता को जल्दी से नहीं समझा - तो वह अभी की अपनी बढ़त को खो देंगे । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान के ढीले पड़ते संकेतों ने भी अशोक जैन का पलड़ा भारी किया है, जिसके चलते दीपक गुप्ता के लिए चुनौती और ज्यादा गंभीर हो गई है । सुभाष जैन की सक्रियता - प्रभाव और असर बनाती/दिखाती सक्रियता दीपक गुप्ता के लिए एक अलग समस्या बनाए हुए है, जिससे निपटने की दीपक गुप्ता की अभी तक की तमाम कोशिशें तो विफल ही रही हैं । दीपक गुप्ता और अशोक जैन के अभियान की 'दशा/दिशा' का आकलन करने वाले लोगों ने पाया है कि अशोक जैन ने अपने अभियान की कमजोरियों को पहचाना/पकड़ा है और उन्हें काफी हद तक दूर करने का प्रयास शुरू किया है; इसके ठीक विपरीत दीपक गुप्ता का अपने अभियान की कमजोरियों पर तथा पल पल बदलती स्थितियों पर कोई ध्यान नहीं है और वह अपने पुराने ढर्रे पर ही चले जा रहे हैं और इस बात की कोई परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं कि धीरे धीरे उनकी बढ़त का फासला कम होता जा रहा है ।
रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में जेके गौड़ की जैसी जो फजीहत हुई, वह इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि दीपक गुप्ता और उनके समर्थक उनकी उम्मीदवारी के अभियान को लेकर कितने लापरवाह बने हुए हैं । उनकी इसी लापरवाही का फायदा उठाने में अशोक जैन ने फुर्ती दिखाई है । अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान में पिछले दिनों एक बड़ा अंतर लोगों ने यह महसूस किया है कि उन्होंने रमेश अग्रवाल की बदनामी की छाया और शरत जैन के संरक्षण से 'बाहर' निकल कर अपने अभियान की बागडोर को खुद सँभाला है । कई लोगों ने इस बात को नोट किया है कि अशोक जैन एक उम्मीदवार के रूप में पहले के मुकाबले ज्यादा कॉन्फीडेंट हुए हैं । पहले वह रमेश अग्रवाल और शरत जैन पर पूरी तरह निर्भर नजर आ रहे थे : लोगों के बीच रमेश अग्रवाल की बदनामी लेकिन उनका काम खराब कर रही थी; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन उनकी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के नाम पर जो पक्षपात कर रहे थे, उससे फायदा होने की बजाए नुकसान ज्यादा हो रहा था । अशोक जैन ने इस स्थिति को पहचानने में देर नहीं की, और जल्दी से यह समझ लिया कि अपनी लड़ाई उन्हें खुद ही लड़नी पड़ेगी । उन्हें जानने वाले लोगों का भी मानना और कहना रहा कि रोटरी में उन्हें करीब करीब तीस वर्ष होने जा रहे हैं, और इन वर्षों में एक लीडर नहीं तो एक कार्यकर्ता के रूप में लोगों के बीच उनकी अच्छी सक्रियता और पहचान रही है; इसलिए अपनी उम्मीदवारी के अभियान की बागडोर यदि वह खुद सँभालेंगे तो ज्यादा असर छोड़ेंगे । अशोक जैन ने यही किया । इसके दो फायदे होते हुए दिख रहे हैं : एक तो यह कि रमेश अग्रवाल की बदनामी तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन के प्रति पैदा होने वाली नाराजगी से होने वाले नुकसान की मात्रा घटी, और दूसरा यह कि लोगों ने 'असली' अशोक जैन को जानना/पहचानना शुरू किया - जिससे उनके बारे में एक सकारात्मक परसेप्शन बनना शुरू हुआ । 
दीपक गुप्ता की समस्या यह है कि एक उम्मीदवार के रूप में वह अभी भी पूरी तरह मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के समर्थन के भरोसे बने हुए हैं । एक कॉमन सेंस की बात है कि पिछली बार इन दोनों ने दीपक गुप्ता को जितवाने के लिए अपने सारे घोड़े खोल लिए थे, लेकिन फिर भी बुरी पराजय को प्राप्त हुए थे - सो अबकी बार यह दोनों क्या नया कर लेंगे ? इसके अलावा, बुरी बात यह और हुई है कि पिछली बार की तुलना में इन दोनों की ही स्थिति और ज्यादा खराब व कमजोर हुई है । मुकेश अरनेजा को जिन स्थितियों में जिस तरह से अपना क्लब छोड़ कर 'भागना' पड़ा और एक फर्जी किस्म का क्लब बना कर उसमें शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है, उससे लोगों के बीच उनका बचा-खुचा असर और कम ही हुआ है । सतीश सिंघल नोएडा ब्लड बैंक में की 'बेईमानी' के आरोपों के कारण इतनी फजीहत में हैं कि उन्हें अपनी पेम फर्स्ट को स्पोंसर करने के लिए पर्याप्त क्लब नहीं मिल रहे हैं, जिन्हें जुटाने में उन्हें एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है । ऐसे में, दीपक गुप्ता को इन दोनों से भला क्या सहयोग और फायदा मिलेगा ? दीपक गुप्ता लेकिन इन्हीं की मदद के भरोसे अपनी उम्मीदवारी का अभियान चलाए हुए हैं । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को ललित खन्ना की उम्मीदवारी से फायदा मिल रहा था, क्योंकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी सीधे सीधे अशोक जैन की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचा रही थी । ललित खन्ना की सक्रियता को देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि लोगों के बीच अशोक जैन से बेहतर स्थिति बना लेंगे; किंतु पिछले कुछ दिनों में उनकी सक्रियता ढीली पड़ती दिखी है, जिसका फायदा अशोक जैन को मिला और यह बात दीपक गुप्ता के लिए मुसीबतभरी साबित हुई है । 
दीपक गुप्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती सुभाष जैन साबित हो रहे हैं । दरअसल सुभाष जैन ने अपने व्यवहार, अपने आचरण और अपनी सक्रियता से लोगों के बीच अच्छी और असरदार पैठ बनाई है । लोगों के बीच उनकी जिस तरह की संलग्नता है, और लोगों की तरफ से भी उन्हें जिस तरह की लगावपूर्ण प्रतिक्रिया मिल रही है - उसके कारण डिस्ट्रिक्ट में उनका कद और उनकी पहचान बड़ी हो गई है, जिसका निश्चित रूप से एक राजनीतिक अर्थ और पक्ष भी होगा ही । लोगों को यह आभास तो है कि सुभाष जैन का समर्थन अशोक जैन को मिलेगा, लेकिन सुभाष जैन की तरफ से इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा/सुना गया है । वृंदावन स्थित बाँके बिहारी मंदिर जाने के उनके आयोजन में डिस्ट्रिक्ट के तमाम लोगों के बीच अशोक जैन की अनुपस्थिति का यही अर्थ निकाला/लगाया गया है कि सुभाष जैन वैसी बेवकूफी करने से बच रहे हैं, जैसी बेवकूफी सतीश सिंघल ने पिछले रोटरी वर्ष में की - और जिसके चलते अपनी फजीहत करवाई । इस तथ्य में दीपक गुप्ता के लिए एक उम्मीद भी है, और एक चुनौती भी - लोगों के बीच आभास होने के बावजूद सुभाष जैन यदि खुलकर अशोक जैन के साथ नहीं दिख रहे हैं, तो इससे दीपक गुप्ता का काम आसान ही होता है; चुनौती की बात लेकिन यह है कि लोगों के बीच आभास यह भी है कि दीपक गुप्ता को 'रोकने' के लिए सुभाष जैन जरूरत पड़ने पर कुछ भी करेंगे । सुभाष जैन के नजदीकियों के अनुसार, पिछले रोटरी वर्ष में कुछेक मौकों पर दीपक गुप्ता का जो व्यवहार रहा - उसने सुभाष जैन को गहरे से आहत किया हुआ है, और उसे वह जल्दी से भूलने को तैयार नहीं हैं । सुभाष जैन साधारण रूप से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी होते तो उनकी नाराजगी ज्यादा मायने नहीं रखती; लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी होने के बावजूद उन्होंने लोगों के बीच अपनी जो पैठ बनाई है, उसके चलते उनकी भूमिका निर्णायक असर डालने वाली हो सकती है । इस तथ्य ने दीपक गुप्ता के लिए चुनावी मुकाबले को और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है ।
दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात हालाँकि यह चुनौतियाँ उतनी नहीं हैं, जितनी कि उनकी तैयारी की कमजोरियाँ हैं । उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों का ही कहना है कि दीपक गुप्ता इस गलतफहमी में हैं कि पिछली बार जिन क्लब्स के वोट उन्हें मिले थे, उनके वोट तो उन्हें मिलेंगे ही और उन्हें तो बस जो कमी रह गई थी, सिर्फ उसे ही पूरा करना है - इसलिए ज्यादा कुछ करने की उन्हें जरूरत ही नहीं है । उनकी इसी सोच ने उनकी उम्मीदवारी के सामने पैदा होने वाली चुनौतियों को और बड़ा बना दिया है । अशोक जैन ने इसका पूरा पूरा फायदा उठाया है और अभी कुछ समय पहले तक वह दीपक गुप्ता के मुकाबले जहाँ कहीं टिकते हुए नजर नहीं आ रहे थे, वहीं लेकिन अब वह उन्हें कड़ी टक्कर देते हुए दिख रहे हैं ।

Friday, August 12, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी की ठगी के शिकार लोगों को पैसा वापस दिलवा कर पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी लायनिज्म की पहचान व प्रतिष्ठा को बचाए/बनाए रखने का प्रयास वास्तव में करेंगे क्या ?

गाजियाबाद । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के अधिष्ठापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना स्वीकार करने के बाद से एक अजीब सी मुसीबत में फँस गए हैं । मुसीबत यह कि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के कई एक लायन सदस्यों ने उन्हें फोन करके कहा है कि वह जब शिव कुमार चौधरी की कैबिनेट के सदस्यों को अधिष्ठापित करने आयेंगे, तब जरा शिव कुमार चौधरी से उनके पैसे वापस करवाने का काम भी कर दें । लोगों ने उनसे अनुरोध किया है कि उन्होंने जब शिव कुमार चौधरी के गवर्नर-काल के एक प्रमुख कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना स्वीकार किया है, तो इसका मतलब है कि शिव कुमार चौधरी उनकी जरूर सुनेंगे - और इसलिए अब वही हैं जो शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों की मदद कर सकते हैं । लोगों ने राजू मनवानी से कहा है कि मुख्य अतिथि की जिम्मेदारी निभाने जब वह गाजियाबाद आयेंगे, तब शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों से मिलने, उनकी शिकायतें सुनने और उनके साथ न्याय करने का काम करने के लिए समय जरूर निकालें । राजू मनवानी ने इस मामले में फँसने/पड़ने से बचने की कोशिश में बहुत से तर्क भी दिए; किंतु एक प्रति-तर्क का जबाव उनसे भी नहीं बन पड़ा - उनसे कहा गया कि एक अत्यंत सक्रिय पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते क्या उन्हें यह जरूरी नहीं लगता कि लायंस इंटरनेशनल के शताब्दी वर्ष में वह किसी एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को अपनी ठगी-हरकतों से लायनिज्म का नाम खराब न करने दें ? राजू मनवानी इस सवाल का जबाव नहीं दे पाए; किंतु उनके लिए मुसीबत की बात यह है कि वह शिव कुमार चौधरी से लोगों को पैसे वापस दिलवाने के लिए करें तो क्या करें ?
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी से जिन लोगों को अपने पैसे वापस लेने हैं, वह पिछले कुछ समय से बहुत सक्रिय हो गए हैं - और हर वह उपाय कर रहे हैं तथा हर उस व्यक्ति का दरवाजा खटखटा रहे हैं, जहाँ उन्हें उम्मीद की जरा सी भी किरण दिखाई देती है । बिजनेस के नाम पर लोगों से पैसे ले लेने और फिर वापस न करने के गंभीर आरोपों के चलते शिव कुमार चौधरी को बदनामी तो पहले से ही झेलनी पड़ रही है, बल्कि कोर्ट केस तक का सामना भी करना पड़ रहा है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनने' के बाद उन्हें लायन समाज के लोगों के बीच भी जिस तरह से शर्मसार होना पड़ रहा है; उसके मूल में उनकी ठगी का शिकार हुए लोगों की सक्रियता ही है । लोगों की इस सक्रियता ने शिव कुमार चौधरी के लिए ही नहीं, लायनिज्म के बड़े नेताओं के लिए भी समस्या खड़ी की हुई है । शिव कुमार चौधरी ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल की पत्नी अर्चना अग्रवाल को जोन चेयरपरसन बना कर जब यह संकेत दिया कि सुशील अग्रवाल उनके लिए बड़े खास हैं, तो शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों ने सुशील अग्रवाल से मदद की गुहार लगाई - इस गुहार से बचने के लिए सुशील अग्रवाल को जोन चेयरपरसन अर्चना अग्रवाल सहित पहली कैबिनेट मीटिंग से गायब रहने के लिए मजबूर होना पड़ा । लायंस क्लब गाजियाबाद के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल ने अपने भाषण में तो बड़ी ऊँची ऊँची बातें कीं, लेकिन जब शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार लोगों ने उनसे अपनी समस्या पर बात करना शुरू किया - तब नरेश अग्रवाल जल्दी निकलने की बात कहते हुए 'भागते' नजर आए ।
शिव कुमार चौधरी की फजीहत में अभी हाल ही में तब और वृद्धि हो गई जब उनकी ठगी के एक शिकार सतीश अग्रवाल ने वाट्स-ऐप पर शिव कुमार चौधरी को संबोधित संदेश शेयर किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि - 'लायन एसके चौधरी जी, बहुत समय से मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूँ कि कृपया मेरी रकम मुझे लौटा दें; आपने रकम लौटाने का वायदा तो बहुत बार किया है, किंतु रकम लौटाई नहीं है और इस तरह से आपने दो वर्ष निकाल दिए हैं । कृपया अब तो जल्दी से मुझे मेरा पैसा वापस दे दें ।' सतीश अग्रवाल वरिष्ठ लायन हैं और लायंस क्लब मसूरी के अध्यक्ष हैं । ऐसे वर्ष में, जो कि लायनिज्म का शताब्दी वर्ष है और जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स व क्लब-प्रेसीडेंट्स के लिए बड़े महत्वपूर्ण लक्ष्य व आदर्श निर्धारित किए जा रहे हैं; डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और क्लब-अध्यक्ष के बीच सोशल मीडिया में इस तरह की बातचीत हो रही है - जो कि लायनिज्म के लिए बहुत ही शर्म की बात है । इस शर्मनाक स्थिति के रचयिता शिव कुमार चौधरी को लेकिन इसकी कोई परवाह होती नहीं दिख रही है । सतीश अग्रवाल ने अपने वाट्स-ऐप संदेश में अपने लायन साथियों से भी अनुरोध किया है कि वह प्रार्थना करें कि ईश्वर चौधरी जी को सद्धबुद्धि दे और वह उनका पैसा जल्दी वापस करें । सतीश अग्रवाल के इस संदेश से अपना अपना पैसा वापस पाने की कोशिशों में लगे दूसरे लोगों को भी उम्मीद बंधी थी कि शिव कुमार चौधरी को सद्धबुद्धि आयेगी और वह उनके पैसे वापस करेंगे ।
शिव कुमार चौधरी को लेकिन सद्धबुद्धि आती हुई नहीं दिखी, तो उनकी ठगी के शिकार लोगों ने राजू मनवानी का दरवाजा खटखटाया है । लोगों को लगता है कि राजू मनवानी लायनिज्म में सक्रिय तो हैं ही, साथ ही लायनिज्म की छवि को लेकर भी वह बहुत सतर्क हैं; शिव कुमार चौधरी ने उन्हें अपनी कैबिनेट के अधिष्ठापन समारोह के लिए मुख्य अतिथि बनाया है; यह कुछ बातें ऐसी हैं - जिनसे उन्हें लगता है कि राजू मनवानी शायद शिव कुमार चौधरी को सद्धबुद्धि दे सकते हैं और उनके पैसे दिलवा सकते हैं । लोगों की इन उम्मीदों ने राजू मनवानी के लिए समस्या खड़ी कर दी है । वास्तव में यह एक अजीब सी समस्या है - मुख्य अतिथि के रूप में उन्हें जिसके यहाँ जाना है, उससे वह यह कैसे कहें कि तुमने जिन जिन को ठगा है और जिनके पैसे दबाए हुए हैं, उनके पैसे वापस करो ? नहीं कहते हैं तो अपनी जिम्मेदारी से भागते हुए दिखेंगे ! शिव कुमार चौधरी की ठगी के शिकार हुए लोगों की तरफ से सुनने को मिल रहा है कि अधिष्ठापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आ रहे राजू मनवानी से वह मिलेंगे और अपनी बात कहेंगे । इस बात की भनक मिलने के बाद शिव कुमार चौधरी और उनके नजदीकियों ने भी तैयारी शुरू कर दी है कि उनके शिकार बने लोग राजू मनवानी से न मिल सकें । होगा क्या, यह तो बाद में पता चलेगा; इस स्थिति ने फिलहाल लेकिन राजू मनवानी को और डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन तथा लायनिज्म की पहचान, साख व प्रतिष्ठा को मुसीबत में जरूर फँसा दिया है ।


Thursday, August 11, 2016

लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का उल्लंघन करने व मजाक बनाने वाले छुट्भैय्यों तक के सामने आत्मसमर्पण करते रहे नरेश अग्रवाल, लेकिन क्या अब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग को 'पटरी' पर लाने के बारे में सोचेंगे ?

नई दिल्ली । अधिष्ठापन समारोह के नाम पर डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग द्धारा करवाए जा रहे दुबई दौरे के महँगे पैकेज का मामला अब नरेश अग्रवाल की 'अदालत' में पहुँच गया है । अपने आप को डिस्ट्रिक्ट का वरिष्ठ लायन बताते हुए शिवशंकर अग्रवाल ने इस संबंध में नरेश अग्रवाल को एक पत्र लिखा है, जिसकी एक प्रति 'रचनात्मक संकल्प' को भी मिली है । अपने पत्र में शिवशंकर अग्रवाल ने विनय गर्ग की कैबिनेट पर ही सवाल उठाते हुए नरेश अग्रवाल से पूछा है कि विनय गर्ग ने जो तीन सौ से अधिक लोगों की कैबिनेट बनाई है, वह क्या लायंस इंटरनेशनल के नियमानुसार है ? शिवशंकर अग्रवाल का कहना है कि विनय गर्ग ने फर्जी तरीके से कैबिनेट के पदों को गढ़ा है, जिन्हें न तो लायंस इंटरनेशनल से कोई मान्यता प्राप्त है और वास्तव में न जिनका कोई काम है - इन्हें सिर्फ पैसे बटोरने के लिए गढ़ा है; और इनसे चार-चार हजार, आठ-आठ हजार और ग्यारह-ग्यारह हजार रुपए तक लिए गए हैं । शिवशंकर अग्रवाल का कहना है कि विनय गर्ग बातें तो ऊँची ऊँची करते हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने लायनिज्म के लिए यह किया है-वह किया है-न जाने क्या क्या किया है; आखिर तब फिर उन्हें अपनी कैबिनेट में फर्जी पद गढ़ने और उन पदों की 'कीमतें' बसूलने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? नरेश अग्रवाल को लिखे पत्र में शिवशंकर अग्रवाल ने लिखा है कि इसके बाद, विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह को दुबई में करके - और उसे खासा महँगा बना कर - पदाधिकारियों को अधिष्ठापित होने का मौका भी नहीं दे रहे हैं; क्योंकि अधिकतर पदाधिकारी दुबई जाने के विनय गर्ग के पैकेज को महँगा पा कर वहाँ नहीं जा रहे हैं ।
शिवशंकर अग्रवाल ने अनुमान लगाया है कि विनय गर्ग ने दुबई के लिए करीब ढाई सौ लोगों का जो लक्ष्य तय किया है, उसमें आधे से ज्यादा तो 'बेटर हाफ' और बच्चे होंगे । कई ऐसे लायन होंगे, जो कैबिनेट पदाधिकारी नहीं होंगे - यानि ढाई सौ की संख्या में कैबिनेट पदाधिकारी तो मुश्किल से अस्सी से सौ के बीच ही होंगे; जबकि विनय गर्ग ने कैबिनेट में पदाधिकारी तो तीन सौ से ज्यादा बनाए हैं । इससे लगता है कि विनय गर्ग दुबई में कैबिनेट पदाधिकारियों का अधिष्ठापन करने/करवाने नहीं जा रहे हैं, बल्कि तफरीह करने/करवाने जा रहे हैं । इससे लगता है कि विनय गर्ग को इस बात का बिलकुल भी अहसास नहीं है कि लायनिज्म में अधिष्ठापन की क्या महत्ता है; और उन्होंने लायनिज्म को तफरीह करने का एक अड्डा भर समझा हुआ है । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में कहा है कि विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए हैं, लेकिन लगता है कि उन्हें लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानून तथा लायनिज्म की महान परंपरा व उसके आदर्शों के बारे में कोई ज्ञान नहीं है; यदि है, तो उनकी परवाह नहीं है; यदि होती तो वह अधिष्ठापन कार्यक्रम को तफरीह का मौका बना कर इस तरह मजाक का विषय नहीं बना देते । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में नरेश अग्रवाल से अनुरोध किया है कि वह विनय गर्ग को - तथा उनके जैसे दूसरे अन्य लोगों को भी - लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों से परिचित होने के लिए कहें तथा उनका पालन करने के लिए प्रेरित करें ।
शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में नरेश अग्रवाल का ध्यान इस तथ्य की तरफ खींचा है कि वह इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट हैं, और अगले लायन वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होंगे - इसलिए दुनिया भर के लायन सदस्यों व पदाधिकारियों की नजर इस बात पर होगी कि उनके अपने देश और खासकर उनके अपने मल्टीपल ड्रिस्ट्रिक्ट में लायनिज्म के नाम पर हो क्या रहा है; और ऐसे में जब उन्हें अधिष्ठापन कार्यक्रम के नाम पर किए जा रहे विनय गर्ग के तफरीह भरे तमाशे की जानकारी मिलेगी तो यह - नरेश जी, आपके लिए भी फजीहत की बात होगी । इसी आधार पर, शिवशंकर अग्रवाल ने नरेश अग्रवाल से मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध करते हुए माँग की है कि वह विनय गर्ग से कहें कि तफरीह करने/करवाने के लिए वह दुबई जाना तथा लोगों को ले जाना चाहें - तो जरूर जाएँ/ले जाएँ; किंतु अधिष्ठापन कार्यक्रम ऐसी जगह करें, जहाँ कैबिनेट के सभी पदाधिकारी आसानी से पहुँच सकें । उन्होंने नरेश अग्रवाल से कहा है कि वह विनय गर्ग को लायनिज्म में अधिष्ठापन का जो महत्त्व है, उसके बारे में बताएँ और अधिष्ठापन कार्यक्रम को इस तरह से करने के लिए कहें, जिससे कि उक्त महत्त्व को वास्तव में हासिल किया जा सके । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में लिखा है कि विनय गर्ग को लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों से तथा लायनिज्म की महान परंपरा व उसके उच्च आदर्शों से परिचित करवाना जरूरी है, अन्यथा वह इसी तरह से लायनिज्म का मजाक बनाते/बनवाते रहेंगे ।
यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि शिवशंकर अग्रवाल ने विनय गर्ग के मामले में इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल से जो उम्मीद की है, उस पर नरेश अग्रवाल कोई ध्यान देते भी हैं - या उनकी बातों को हवा में उड़ा देते हैं । उल्लेखनीय है कि नरेश अग्रवाल का अपना ट्रैक रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है; वह लायनिज्म का मजाक बनाने वाली हरकतों का अक्सर सहयोग और समर्थन करते हुए देखे गए हैं; इसलिए बहुत उम्मीद नहीं है कि वह विनय गर्ग को लायनिज्म की 'पटरी' पर लाने के लिए सचमुच में कोई प्रयास करेंगे । पिछले दिनों की कई घटनाओं का हवाला देते हुए लोग देखते, मानते और कहते रहे हैं कि तीन-तिकड़म से नरेश अग्रवाल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में तो लग गए हैं; किंतु अपनी लीडरशिप क्वालिटी को दिखाने/जताने का नैतिक बल और हौंसला उनमें नहीं है - जिस कारण लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का उल्लंघन करने व मजाक बनाने वाले छुट्भैय्यों तक के सामने वह आत्मसमर्पण करते नजर आते रहे हैं । हालाँकि कुछेक लोगों को यह भी लगता है, जैसा कि शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में लिखा है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे नरेश अग्रवाल को कम से कम अब तो मैच्योरिटी और गंभीरता के साथ अपनी 'जिम्मेदारी' निभानी चाहिए और जानते-बूझते हुए कोई ऐसा काम नहीं होने देना चाहिए - जिससे लायनिज्म का मजाक बनता हो और लायनिज्म की बदनामी होती हो । दरअसल इसीलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि शिवशंकर अग्रवाल द्धारा उठाए गए मुद्दों का इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे नरेश अग्रवाल कोई संज्ञान लेते भी हैं, या लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों तथा उसके उच्च आदर्शों का मजाक बनता चुपचाप देखते रहते हैं ?

Tuesday, August 9, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में केआर रवींद्रन की खुराफाती सोच के चलते 'चुनावी अपराधी' घोषित हुए दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल की चुनावी सक्रियता डिस्ट्रिक्ट के लिए खतरा तो नहीं बनेगी ?

नई दिल्ली । दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता तथा सीओएल के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर जो तैयारियाँ शुरू की हैं, उनमें डिस्ट्रिक्ट के लिए - और खुद इनके लिए भी एक बड़े खतरे को देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल यह तीनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा 'चुनावी अपराधी' के रूप में 'पकड़े' जा चुके हैं, और इसके लिए इनकी फटकार के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को निर्देशित किया जा चुका है । चुनावी राजनीति में इनकी सक्रियता चूँकि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की निगरानी में है, इसलिए उम्मीद की गई थी कि कुछ समय यह तीनों चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहेंगे । चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात तो दूर - यह तीनों तो चुनावी राजनीति में सीधे सीधे कूदने की तैयारी करते देखे/सुने जा रहे हैं । यूँ रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का जो फैसला है, वह इन तीनों के चुनावी राजनीति में उतरने पर तकनीकी रूप से कोई रोक नहीं लगाता है; लेकिन उस फैसले का एक नैतिक व व्यावहारिक रूप भी है - जिसका पालन करने की इन तीनों से उम्मीद की गई थी - लेकिन जो अब ध्वस्त होती दिख रही है । सामाजिक जीवन में रिकॉर्डेड आरोप का एक नैतिक व व्यावहारिक रूप भी होता है, जिसका पालन भी किया ही जाता है : सामाजिक/राजनीतिक संस्थाएँ आरोपी व्यक्ति के साथ दूरी बनाने और 'दिखाने' का काम करती ही हैं; सुनते हैं कि अपराधी गिरोह भी ऐसे लोगों को गिरोह में रखने से बचते हैं जो पहले से ही पुलिस की निगाह में चढ़े होते हैं । इसी तरह की बातों के चलते उम्मीद की गई थी कि दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल चूँकि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की निगाह में 'चुनावी अपराधी' के रूप में चढ़े हुए हैं - इसलिए कुछ समय तो यह चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहेंगे । इनके ऐसा न करने के कारण आशंका यह व्यक्त की जा रही है कि इन्होंने अपने आप को तो खतरे में डाला ही है, साथ ही डिस्ट्रिक्ट को भी मुसीबत में फँसा दिया है । डर है कि इनकी राजनीति के चलते कहीं डिस्ट्रिक्ट 3011 का हाल भी डिस्ट्रिक्ट 3100 जैसा न हो जाए ?
इस डर का बड़ा ठोस आधार यह है कि पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3011 के - और खासकर इस डिस्ट्रिक्ट के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के रूप में दीपक तलवार, सुशील खुराना व विनोद बंसल के - मुसीबत में फँसने व आरोपी बनने के लिए जिन केआर रवींद्रन को जिम्मेदार माना गया था, वही केआर रवींद्रन अभी भी निर्णायक हैसियत में हैं; और इस कारण से उक्त फैसले की तलवार डिस्ट्रिक्ट 3011 पर अभी भी लटकी हुई है । उल्लेखनीय है कि सोचा यह गया था कि केआर रवींद्रन के प्रेसीडेंट-काल के पूरा हो जाने पर उनसे छुटकारा मिल जायेगा, और फिर मनमानी करने का अधिकार भी मिल जायेगा । गौर करने वाला तथ्य यह है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले का विरोध करते हुए पिछले रोटरी वर्ष में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने अपनी अंतिम मीटिंग में एक प्रस्ताव पास किया था; प्रस्ताव पास करते हुए काउंसिल ने यह भी तय किया था कि इस विरोध प्रस्ताव को एक जुलाई के बाद रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय को भेजा जायेगा - क्योंकि तब केआर रवींद्रन की बिदाई हो चुकी होगी । उक्त मीटिंग में इस बात को बाकायदा रेखांकित किया गया कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने डिस्ट्रिक्ट 3011 के खिलाफ जो फैसला दिया है, वह चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खुराफाती सोच का नतीजा है - इसलिए उनके प्रेसीडेंट रहते विरोध प्रस्ताव भेजने का कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए विरोध प्रस्ताव भेजने के लिए केआर रवींद्रन का कार्यकाल पूरा हो जाने तक इंतजार किया जाए । 30 जून को केआर रवींद्रन का प्रेसीडेंट-काल तो पूरा गया, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा इसके आरोपी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए मुसीबत की बात यह रही कि केआर रवींद्रन दक्षिण एशिया में रोटरी के झगड़ों/मामलों को देखने के इंचार्ज बना दिए गए । इस कारण डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा उसके आरोपी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए मामला जहाँ का तहाँ ही बना रह गया है, और इसके चलते पिछले रोटरी वर्ष की अंतिम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में पास हुए विरोध प्रस्ताव को भी रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय भेजने की बजाए धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया ।
ऐसी स्थिति में यह और भी जरूरी हो जाता है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 की चुनावी राजनीति के चिन्हित 'अपराधी' चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहें । पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से जो कार्रवाई हुई, उसे पर्दे के पीछे हुए किसी बड़े खेल के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना गया था - जिसमें डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों की अलग-अलग स्तर पर निभाई गई भूमिकाओं को लेकर बहुत सारे कयास और संदेह अभी भी लगातार बने हुए हैं । इन कयासों व संदेहों के कारण डिस्ट्रिक्ट में कई एक लोगों के बीच के संबंध और ज्यादा तनावपूर्ण हुए हैं । इस बात ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को और भी ज्यादा बारूदी बना दिया है, जहाँ एक छोटी से चिंगारी भी डिस्ट्रिक्ट के लिए घातक साबित हो सकती है । सोचने की बात है कि जब काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्य ही यह विश्वास करते हैं कि केआर रवींद्रन के होते हुए उन्हें न्याय नहीं मिलेगा और वह अपने ही एक विरोध प्रस्ताव को धूल खाने के लिए छोड़ देते हैं, तब केआर रवींद्रन चुनावी राजनीति करने के लिए 'अपराधी' घोषित किए गए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को खुल्लम-खुल्ला राजनीति करते कैसे देखेंगे और बर्दाश्त करेंगे ? इसीलिए उम्मीद की गई थी कि दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल कुछ समय तक तो - कम से कम केआर रवींद्रन के प्रभावी व निर्णायक हैसियत में रहने तक तो - चुनावी झमेलों से दूर रहेंगे; किंतु इन्हें सीओएल व इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए कमर कसते देख कई लोगों को डिस्ट्रिक्ट के और खुद इनके भी भविष्य के प्रति खतरा पैदा हो रहा नजर आ रहा है ।

Sunday, August 7, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल के पूर्ण नियंत्रण में चल रहे नोएडा ब्लड बैंक की कमाई, दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक की कमाई की तुलना में करीब पचास गुणा कम होने का राज आखिर क्या है ?

नोएडा । दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक के मुख्य कर्ता-धर्ता के रूप में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की उपलब्धियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है - और रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के मैनेजिंग ट्रस्टी के रूप में उनकी भूमिका को गंभीर वित्तीय आरोपों के घेरे में ला दिया है । पहले, विनोद बंसल की उपलब्धि पर गौर करते हैं : विनोद बंसल की देखरेख में चल रहे दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक ने पिछले महीने में करीब 2300 यूनिट ब्लड की बिक्री करके करीब 15 लाख रुपए का लाभ दर्ज किया है । अब, सतीश सिंघल की देखरेख में चल रहे रोटरी नोएडा ब्लड बैंक का रिकॉर्ड देखते हैं : सतीश सिंघल ने पिछले दिनों एक मीटिंग में बताया था कि पिछले वर्ष उनके ब्लड बैंक ने करीब 30 हजार यूनिट ब्लड बेचा था, और करीब चार लाख रुपए का लाभ दर्ज किया था । उनके बताए इस आंकड़े को महीने में विभाजित करें, तो हिसाब ढाई हजार यूनिट पर 34/35 हजार रुपए के लाभ का बना । जिन लोगों को दोनों ब्लड बैंक के हिसाब का पता चला, उनके लिए हैरानी की बात यह हुई कि दिल्ली वाला ब्लड बैंक ढाई हजार से भी कम यूनिट बेच कर 15 लाख रुपए के करीब का लाभ कमा लेता है, तो सतीश सिंघल की देखरेख में चलने वाले ब्लड बैंक की कमाई ढाई हजार यूनिट ब्लड बेचने के बाद भी कुल करीब 34/35 हजार रुपए पर ही क्यों ठहर जाती है ? यहाँ नोट करने की बात यह भी है कि दिल्ली वाला ब्लड बैंक बड़ा है, और इसलिए उसके खर्चे भी ज्यादा हैं; ब्लड के विभिन्न कंपोनेंट्स के दाम बिलकुल बराबर हैं - बल्कि एक कंपोनेंट के दाम सतीश सिंघल के ब्लड बैंक में कुछ ज्यादा ही बसूले जाते हैं । इस लिहाज से सतीश सिंघल की देखरेख में चलने वाले रोटरी नोएडा ब्लड बैंक का लाभ तो और भी ज्यादा होना चाहिए । लाभ के इस भीषण अंतर ने ब्लड बैंक के कर्ता-धर्ता के रूप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल की भूमिका को न सिर्फ संदेहास्पद बना दिया है, बल्कि गंभीर वित्तीय आरोपों के घेरे में भी ला दिया है ।
सतीश सिंघल का अपना व्यवहार व रवैया भी उनकी भूमिका के प्रति संदेह व आरोपों को विश्वसनीय बनाने का काम करता है । रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के ट्रस्टी अक्सर शिकायत करते सुने गए हैं कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक का हिसाब-किताब देने/बताने में हमेशा आनाकानी करते हैं, और पूछे जाने पर नाराजगी दिखाने लगते हैं । सतीश सिंघल अपना पूरा समय ब्लड बैंक में ही बिताते हैं, जिससे लगता है कि उनके पास और कोई कामधंधा नहीं है । सतीश सिंघल के इसी व्यवहार व रवैये से लोगों को यह लगता रहा है कि रोटरी ब्लड बैंक को उन्होंने अपनी कमाई का जरिया बना लिया है । ब्लड बैंक के कुछेक ट्रस्टी यह कहते सुने जाते रहे हैं कि सतीश सिंघल का कामकाज पूरी तरह चौपट हो गया है, और पिछले वर्षों में उन्हें काफी वित्तीय मुसीबतों का सामना करना पड़ा है । अपनी मुसीबतों से पार पाने के लिए वह पंडितों की शरण में भी गए; और किसी पंडित के सुझाव पर ही उन्होंने अपने नाम की स्पेलिंग में एक अतिरिक्त 'टी' और जोड़ा । सतीश को अंग्रेजी में जितने भी तरीके से लिखा जाता है, उसकी स्पेलिंग में एक ही 'टी' आता है; किंतु सतीश सिंघल खुद जब अपना नाम लिखते हैं, तो उसमें दो 'टी' लगाते हैं । अब सतीश सिंघल अपने नाम की स्पेलिंग में 'टी' एक बार की बजाए दो बार लिखें, या दस बार लिखें - किसी को क्या फर्क पड़ना चाहिए ? 
फर्क तो कुछ नहीं पड़ता है, दूसरों को लेकिन अजीब जरूर लगता है - और जब अजीब लगता है, तो फिर सवाल उठते हैं; सवाल उठते हैं, और उचित तरीके से जब उनके जबाव नहीं मिलते हैं तो लोग अपने अपने तरीके से उनके जबाव खोज लेते हैं । इस मामले में भी यही हुआ । यह तो नहीं पता कि सतीश सिंघल ने खुद बताया या लोगों ने अपने प्रयासों से जान लिया कि नाम में दो 'टी' लगाने का सुझाव किसी पंडित ने उन्हें दिया था और आश्वस्त किया था कि ऐसा करने से उनका कामधंधा फिर से चमक उठेगा । उनका कामधंधा फिर से पटरी पर लौटा या नहीं, यह तो सतीश सिंघल को ही पता होगा - लोगों को तो सिर्फ यह पता है कि पिछले कुछेक वर्षों से सतीश सिंघल अपना पूरा कामकाजी समय ब्लड बैंक को देते हैं, और ब्लड बैंक का हिसाब-किताब पूछने पर भड़क जाते हैं ।
सतीश सिंघल के इस व्यवहार और रवैये से लोगों को यह तो लगता रहा है कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक में ऐसा कुछ करते हैं, जिसे दूसरों से छिपाकर रखना चाहते हैं । ब्लड बैंक के कुछेक ट्रस्टियों का ही आरोप भी रहा कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक को अपने निजी संस्थान के रूप में इस्तेमाल करते हैं, और उसकी कमाई हड़प जाते हैं । सतीश सिंघल हालाँकि कई बार घाटे का रोना रोते हुए भी सुने गए हैं । तमाम तरह की बातों व आरोपों के बावजूद रोटरी नोएडा ब्लड बैंक में सतीश सिंघल का किया-धरा ज्यादा बबाल का कारण नहीं बना । किंतु अब जब दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक के लाभ के तथ्य सामने आ रहे हैं, तो लोगों को हैरानी हो रही है कि सतीश सिंघल नोएडा ब्लड बैंक की आड़ में कर क्या रहे हैं ? कुछेक लोग हालाँकि सतीश सिंघल को संदेह का लाभ देना चाहते हैं - उनका कहना है कि सतीश सिंघल अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे, इसलिए ब्लड बैंक की आड़ में मोटी कमाई करने के आरोपों के चलते उनके साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की भी बदनामी होगी; इसलिए इस मामले में उनका पक्ष भी सुना जाना चाहिए । ऐसे लोगों का कहना है कि यह ठीक है कि अभी तक सतीश सिंघल हिसाब-किताब माँगने पर भड़क उठते रहे हैं, लेकिन अब दिल्ली के रोटरी ब्लड बैंक के लाभ के आँकड़े आने पर मामला गंभीर हो गया है - और उम्मीद की जानी चाहिए कि सतीश सिंघल भी इस गंभीरता को समझेंगे, तथा भड़कने की बजाए नोएडा ब्लड बैंक के हिसाब-किताब को पारदर्शी बनायेंगे ।
लोगों का कहना है कि नोएडा ब्लड बैंक रोटरी में डिस्ट्रिक्ट 3012 की मुख्य पहचान है : इसकी कमाई पर यदि सचमुच डाका पड़ रहा है, और या सचमुच उचित तरीके से कमाई हो नहीं रही है - तो यह सभी के लिए चिंता की बात होना चाहिए; इसके कर्ता-धर्ता का पद सँभाले बैठे सतीश सिंघल के लिए तो यह और भी ज्यादा चिंता की बात होना चाहिए । उनकी तमाम मेहनत के बाद भी नोएडा ब्लड बैंक में कमाई का वास्तविक आँकड़ा यदि सचमुच वही है, जो वह बता रहे हैं - तो उन्हें खुद भी देखना चाहिए कि उनके जितना यूनिट ब्लड बेच कर दिल्ली वाला ब्लड बैंक उनके मुकाबले पचास गुना लाभ आखिर कैसे कमा पा रहा है ?