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Tuesday, August 23, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया

आगरा । पारस अग्रवाल ने 'दल बदल' करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को तो बदलने का काम किया ही है, साथ ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी यह समझने का प्रयास करना पड़ रहा है कि पिछले लायन वर्ष में पारस अग्रवाल के समर्थन के बावजूद मधु सिंह को जब करारी हार का सामना करना पड़ा था, तब इस वर्ष पारस अग्रवाल के विरोध के चलते उन्हें जितवा पाना कैसे संभव होगा ? कई लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल कोई इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके समर्थन और विरोध से जीतने/हारने के फैसले होते हों, इसलिए इस बात से चुनावी राजनीति के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पारस अग्रवाल किसके साथ हैं और किसके खिलाफ । लेकिन कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल - और पारस अग्रवाल ही क्यों, कोई भी - किसी चुनावी लड़ाई में निर्णायक फैक्टर नहीं हो सकते हैं; लेकिन समर्थन और विरोध बनाने में तो हर किसी की भूमिका होती ही है - वह भूमिका चाहें छोटी हो और या बड़ी; और इस लिहाज से पारस अग्रवाल के 'दल बदल' की भी भूमिका होगी ही, जो अभी तो मधु सिंह की उम्मीदवारी के खिलाफ जाती नजर आ रही है । यही कारण है कि पारस अग्रवाल के दल बदल से मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच निराशा पैदा हुई है, और उन्हें मधु सिंह की उम्मीदवारी पर खतरा मँडराता दिखने लगा है । उनके समर्थक कुछेक नेताओं ने तो इस बात पर भी विचार करना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की बजाए वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए किसी और को उम्मीदवार बनाएँ, तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उन्हें कामयाबी मिल सकती है क्या ?
मजे की बात यह है कि पारस अग्रवाल को दल बदलने के लिए मजबूर करने का आरोप मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल पर ही लगाया जा रहा है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के इशारे पर काम कर रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने कई फैसलों और मीटिंग्स आदि में पारस अग्रवाल को शामिल ही नहीं किया और उन्हें अलग-थलग करने/रखने की कोशिशें कीं, जिन्हें देख/जान कर पारस अग्रवाल के पास फिर दल बदल कर दूसरे खेमे में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि सीपी सिंघल और दूसरे नेताओं ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए पारस अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया तथा पारस अग्रवाल पर जासूसी करने का व धोखेबाजी करने का आरोप लगा कर उन्हें अलग-थलग करने/रखने का रवैया अपनाया । ऐसे में, पारस अग्रवाल दूसरे खेमे में न जाएँ, तो क्या करें ? नजदीकियों का कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल का सुमित गुप्ता के साथ पुराना परिचय और संबंध है, लेकिन सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से उनका कोई संबंध नहीं है - यह संबंध जोड़ कर मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने दरअसल अपनी कमजोरी को ही जाहिर किया है, और अपनी कमजोरी का ठीकरा पारस अग्रवाल के सिर पर फोड़ दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले वरिष्ठ लायन सदस्यों का कहना है कि पिछले लायन वर्ष के चुनावी नतीजे ने वास्तव में पारस अग्रवाल को अपनी भूमिका के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मधु सिंह और बीके गुप्ता के बीच चुनाव में पारस अग्रवाल ने मधु सिंह का समर्थन किया था । बीके गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को समझाने की बहुत कोशिश भी की थी कि वह खुद चूँकि सभी के समर्थन से निर्विरोध सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए हैं, इसलिए अब उन्हें किसी एक उम्मीदवार के समर्थन में खुल कर सक्रिय नहीं होना/दिखना चाहिए - लेकिन पारस अग्रवाल पर उनकी समझाइस का कोई असर नहीं पड़ा । वह तो जब चुनाव का नतीजा आया, तब पारस अग्रवाल की आँखें खुलीं । मधु सिंह खुद तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में बुरी तरह से हारी हीं - उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की सजा नेगेटिव वोट के रूप में सीपी सिंघल और पारस अग्रवाल को भी मिली ।
इसी से सबक लेकर पारस अग्रवाल ने 'पक्षपाती' भूमिका निभाने से बचने की कोशिशें शुरू कीं । उनकी इन कोशिशों का ही नतीजा था कि मल्टीपल काउंसिल की चंडीगढ़ में हुई कॉन्फ्रेंस में अम्बरीष सरीन की जो फजीहत हुई और जिसके बाद अम्बरीष सरीन व सीपी सिंघल ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के खिलाफ जो मोर्चा खोला - पारस अग्रवाल उससे दूर रहे । सीपी सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं को पारस अग्रवाल का यह रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने पारस अग्रवाल पर धोखेबाजी करने का आरोप तो लगाया ही; साथ ही यह आरोप भी मढ़ दिया कि पारस अग्रवाल 'यहाँ' की खबरें 'वहाँ' पहुँचाते हैं । इसके बाद, लायंस क्लब आगरा आदर्श के सुमित गुप्ता की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने मधु सिंह के खेमे में पारस अग्रवाल को और भी संदेहास्पद बना दिया । मधु सिंह के खेमे में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में तथा डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों से संबंधित फैसलों  तक में पारस अग्रवाल को शामिल नहीं किया, जिसकी चर्चा वाट्स ऐप तक में हुई । इस तरह से मधु सिंह के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को पूरी तरह से प्रतिद्धंद्धी खेमे में धकेल दिया है । धकेल तो दिया है, किंतु अब वह पछता भी रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि इससे उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है ।
मधु सिंह की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को हालाँकि उम्मीद है कि पारस अग्रवाल अपने पिछले लायन वर्ष के रवैये के कारण 'उस' खेमे के लोगों के बीच भी भरोसा नहीं बना पायेंगे - और तब वह वापस 'यहीं' लौटने के लिए मजबूर होंगे । आगे क्या होगा - यह तो आगे पता चलेगा, अभी लेकिन पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया है ।

Tuesday, June 2, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में तमाम प्रतिकूल चुनौतियों के बावजूद अंबरीश सरीन ने जिस तरह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन का चुनाव जीता है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट और मल्टीपल की चुनावी राजनीति में उनके बढ़े कद को अपने लिए खतरे और चुनौती के रूप में देख रहे जितेंद्र चौहान ने अंबरीश सरीन को घेरने की योजना बनाई

आगरा । जितेंद्र चौहान ने सभी को हैरान करने वाली गजब की उम्मीद प्रकट की है - कि अंबरीश सरीन एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव ऑफीसर्स के लिए उनका नाम प्रस्तावित करेंगे और उन्हें ऑफीसर बनवायेंगे । जितेंद्र चौहान की इस उम्मीद को 'गजब' इसलिए माना जा रहा है क्योंकि सभी जानते हैं कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन का पद अंबरीश सरीन को न मिले, इसके लिए जितेंद्र चौहान ने जमीन-आसमान एक किया हुआ था । उल्लेखनीय है कि लीडरशिप के बैनर तले इकट्ठा हुए दूसरे लोग जहाँ पीएस चावला को चेयरमैन बनवाने की मुहिम में लगे हुए थे, वहाँ जितेंद्र चौहान की मुहिम सिर्फ यह थी कि चेयरमैन चाहे जो बने - बस अंबरीश सरीन न बनें । उन्हीं अंबरीश सरीन से वही जितेंद्र चौहान लेकिन अब उम्मीद कर रहे हैं कि अंबरीश सरीन उन्हें एलसीसीआई में ऑफीसर बनवायें - मजे की बात यह है कि यह जानते हुए भी वह इस तरह की उम्मीद कर रहे हैं कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन इलेक्ट के रूप में अंबरीश सरीन की तरफ से नीरज बोरा का नाम एलसीसीआई की एक्जीक्यूटिव के लिए भेज दिया गया है । जितेंद्र चौहान का मानना और कहना है कि नाम भेजने से कुछ नहीं होता है, एलसीसीआई की एक्जीक्यूटिव का गठन मुंबई में हो रही स्कूलिंग में होगा और अंबरीश सरीन चाहेंगे तो उनका नाम प्रस्तावित कर सकते हैं । जितेंद्र चौहान का तर्क है कि नीरज बोरा के पास लायनिज्म के लिए समय ही नहीं है; उन्हें बड़ी राजनीति करनी है और वह उसी बड़ी राजनीति की व्यस्तता के चलते लायन गतिविधियों के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं - इसलिए एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव में उन्हें भेज कर क्या फायदा ? 
एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव में पद पाने के लिए अंबरीश सरीन का सहयोग प्राप्त करने की जितेंद्र चौहान की कोशिश और उम्मीद दूसरों को भले ही हैरान कर रही हो, लेकिन जितेंद्र चौहान को इसमें कुछ भी अजूबा नहीं लग रहा है । अपने नजदीकियों को उन्होंने कहा है कि किसी भी राजनीति में दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ ज्यादा देर नहीं बनी रहती हैं; इसलिए पीछे जो हुआ सो हुआ अब हमें आगे देखना चाहिए । जितेंद्र चौहान का कहना है कि अंबरीश सरीन भी जानते/समझते हैं कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन होने के बावजूद अपने ही डिस्ट्रिक्ट में तवज्जो पाने के लिए अंबरीश सरीन को उनकी शरण में आना ही पड़ेगा । उल्लेखनीय है कि जितेंद्र चौहान और अंबरीश सरीन के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद-भार सँभालने वाली रेणु नंदा को जितेंद्र चौहान के नजदीक समझा जाता है; और माना जाता है कि अगले लायन वर्ष में गवर्नरी का ताज भले ही रेणु नंदा के सिर पर होगा - लेकिन गवर्नरी करेंगे जितेंद्र चौहान । अगले लायन वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट टीम के जिन पदाधिकारियों की सूची सामने आई है, उस सूची के अधिकतर नामों को जितेंद्र चौहान के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है - और इसी आधार पर माना गया है कि अगले लायन वर्ष की टीम रेणु नंदा ने नहीं, बल्कि जितेंद्र चौहान ने बनाई है । दरअसल इसी मानने/समझने के बीच जितेंद्र चौहान को विश्वास है कि अगले लायन वर्ष में वह रेणु नंदा का 'सहारा' लेकर अंबरीश सरीन को अपनी शरण में आने के लिए मजबूर कर लेंगे । डिस्ट्रिक्ट के अन्य कई नेताओं को भी लगता है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में अंबरीश सरीन की जितेंद्र चौहान के साथ चाहें जैसी भी खटपट रही हो, जितेंद्र चौहान के साथ वह ज्यादा समय तक उस खटपट को बनाये नहीं रख पायेंगे ।   
जितेंद्र चौहान दरअसल इसीलिए प्रयास करना चाहते हैं कि उनके और अंबरीश सरीन के बीच जब खटपट अंततः खत्म होनी ही है, तो वह अभी ही क्यों न खत्म हो जाए । इसीलिए उन्होंने अंबरीश सरीन की तरफ मदद के लिए हाथ बढ़ाया है । दूसरे लोगों को लेकिन लगता है कि जितेंद्र चौहान ने मदद के लिए हाथ बढ़ा कर जल्दी कर दी है । यह सच है कि किसी भी राजनीति में दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ ज्यादा दिन तक टिकी नहीं रह पाती हैं, तथा इसी सच के चलते जितेंद्र चौहान और अंबरीश सरीन के बीच की मौजूदा खटपट भी खत्म हो ही जायेगी - लेकिन अंबरीश सरीन के लिए 'घाव' भरने में अभी समय लगेगा । जितेंद्र चौहान के - और उनके कहने के चलते रेणु नंदा के भी - विरोध के कारण मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के लिए अंबरीश सरीन की लड़ाई खासी मुश्किल हो गई थी - इस बात को अंबरीश सरीन के लिए जल्दी भूलना संभव नहीं होगा । इसके अलावा, मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए हुई उनकी जीत ने उनके लिए बड़ी भूमिका की जो राह बनाई है, तथा जितेंद्र चौहान को जो तगड़ा झटका दिया है - अंबरीश सरीन उसका भी फायदा उठाना चाहेंगे । उल्लेखनीय है कि जितेंद्र चौहान की राजनीति भी मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने के बाद ही चमकी थी । डिस्ट्रिक्ट के और मल्टीपल के कई एक नेताओं को लगता है कि तमाम प्रतिकूल चुनौतियों के बावजूद अंबरीश सरीन ने जिस तरह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन का चुनाव जीता है, उससे डिस्ट्रिक्ट और मल्टीपल की चुनावी राजनीति में उनका कद बढ़ा है । उनका यह बढ़ा कद ही जितेंद्र चौहान को अपने लिए बड़े खतरे और चुनौती के रूप में दिख रहा है । रेणु नंदा को अपने साथ 'दिखा' कर जितेंद्र चौहान दरअसल अंबरीश सरीन पर दबाव बनाना चाहते हैं और उन्हें अपनी शरण में आने के लिए प्रेरित और मजबूर करना चाहते हैं । 
एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव में पद के लिए मदद मांग कर जितेंद्र चौहान ने वास्तव में अंबरीश सरीन पर दबाव बनाने की चाल ही चली है । जितेंद्र चौहान को डिस्ट्रिक्ट में इस आरोप का जो सामना करना पड़ रहा है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के हितों के खिलाफ काम किया - उसे वह इस प्रति-आरोप से हल्का करना चाहते हैं कि एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव में अंबरीश सरीन ने डिस्ट्रिक्ट के हितों की बलि चढ़ा दी है । एलसीसीआई एक्जीक्यूटिव में पद के लिए अंबरीश सरीन से मदद माँग कर के जितेंद्र चौहान ने उनके विरोधी तेवरों को ठंडा करने का दाँव भी चला है । इस तरह, मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में मिले घाव को भरने का जितेंद्र चौहान ने जो प्रयास करना शुरू किया है - उसके क्या नतीजे निकलते हैं, यह कुछ समय बाद ही पता चल सकेगा । 

Thursday, May 21, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में अंबरीश सरीन के मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने से जेपी सिंह का एक बड़ा दाँव फेल हो गया है और उनकी बड़ी फजीहत हो रही है - इससे उनके सामने मल्टीपल की अपनी नेतागिरी को बचाने की एक बड़ी चुनौती भी पैदा हो गई है

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के पद पर अंबरीश सरीन की जीत का श्रेय लेने की पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी ने जो कोशिश की है - उसने उमेश गौतम, जितेंद्र सिंह चौहान, जेपी सिंह, तेजपाल सिंह खिल्लन जैसे नेताओं को बुरी तरह भड़का दिया है; और इन लोगों ने सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी को अवसरवादी घोषित करते हुए दावा किया है कि चुनावी नतीजा आने से पहले तक यह दोनों पीएस चावला के समर्थन में ही थे । कहा/बताया जा रहा है कि अगले लायन वर्ष में मल्टीपल में पूछ/तवज्जो बनाये रखने के उद्देश्य से ही सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी ने पलटी मार ली और बताने लगे हैं कि वह तो अंबरीश सरीन के साथ ही थे । उल्लेखनीय है कि सुशील अग्रवाल तो पहले से ही (कु)ख्यात हैं कि वह तो हमेशा ही जीतने वाले के साथ ही होते हैं; इस 'जरूरत' को लगता है कि अब जगदीश गुलाटी ने भी 'समझ' लिया है । लोगों को लेकिन इनके रवैये पर नहीं - बल्कि उमेश गौतम, जितेंद्र सिंह चौहान, जेपी सिंह और तेजपाल सिंह खिल्लन के रवैये पर हैरानी हो रही है कि यह चौकड़ी सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की पलटी पर इस कदर बौखला क्यों रही है ? दरअसल अंबरीश सरीन की जीत ने इस चौकड़ी को खासा तगड़ा झटका दिया है - और पीएस चावला की हार को पीएस चावला की हार के रूप में नहीं, बल्कि इस चौकड़ी की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । पीएस चावला को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवाने का 'ठेका' दरअसल इसी चौकड़ी ने - इस चौकड़ी में भी खासकर जेपी सिंह ने लिया हुआ था; और यही लोग अपने आप को मल्टीपल के लीडर के रूप में दिखा/जता रहे थे । 
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में पीएस चावला को लीडरशिप के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था; इस बात पर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भड़के हुए थे । उनकी शिकायत यह थी कि वोट तो उनको देना है लेकिन राजनीति करने और मलाई खाने का काम लीडरशिप के नाम पर कुछेक स्वयंभू नेता कर रहे हैं । इस संबंध में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के निशाने पर जेपी सिंह और जितेंद्र सिंह चौहान खासतौर पर थे । इसका नतीजा यह हुआ कि कुछेक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपने आप को संगठित कर लिया और तय किया कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन वह चुनेंगे । इस काम में ड्रिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील निगम ज्यादा सक्रिय थे; उन्होंने दूसरे फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को फार्मूला दिया कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की दौड़ में शामिल उम्मीदवारों से कहा जाए कि वह लीडरशिप पर पैसा खर्च करने की बजाए उनपर पैसा खर्च करें और उनके वोट प्राप्त करें । राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन को इस फार्मूले पर सहमत तो बताया गया लेकिन दोनों में से कोई भी इस फार्मूले पर आगे बढ़ता हुआ नहीं दिखा । समस्या दरअसल यह हुई कि इस फार्मूले के सूत्रधार और प्रस्तोता सुनील निगम पैसों के लेनदेन के मामले में चूँकि थोड़ा बदनाम रहे हैं, इसलिए राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन उनसे डील करने के लिए तैयार नहीं थे; डील करने के लिए दूसरा कोई सामने नहीं आया । राजीव मित्तल और अंबरीश सरीन चूँकि अपनी अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में दोनों ही डील करने के लिए प्रयास कर रहे थे, इसलिए भी मामला थोड़ा गफलतभरा हो गया था । 
जेपी सिंह ने इस गफलत का पूरा पूरा फायदा उठाया । वह पीएस चावला को यह समझाने में कामयाब रहे कि उन्हें पैसे चाहने/माँगने वाले फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के पास जाने की और उनकी चिंता करने की जरूरत नहीं है; वह उन्हें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवा देंगे । लोगों का आरोप है कि यह भरोसा देकर जेपी सिंह ने अकेले ही पीएस चावला से माल सूत लिया । इसी तरह की बातों और चर्चाओं के बीच यह लगभग तय हो गया था कि पीएस चावला फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की पसंद नहीं रह गए थे; फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इस बात पर उनसे बुरी तरह खफा हो गए थे कि वह पूरी तरह जेपी सिंह की गोद में जा बैठे हैं और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को कोई तवज्जो ही नहीं दे रहे हैं । कई फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पीएस चावला से नाराज जरूर थे, लेकिन वह चूँकि किसी और उम्मीदवार के साथ भी जुड़ते हुए नहीं दिख रहे थे - या यह कहें कि दूसरे उम्मीदवार उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफल होते हुए नहीं दिख रहे थे; इसलिए पीएस चावला निश्चिंत थे । जेपी सिंह भी उन्हें भरोसा दिलाए हुए थे कि जो नाराज हैं वह चूँकि गफलत में हैं और बँटे हुए हैं, इसलिए वह कुछ कर नहीं पायेंगे । उमेश गौतम और जितेंद्र सिंह चौहान ने अंबरीश सरीन के खिलाफ और तेजपाल सिंह खिल्लन ने राजीव मित्तल के खिलाफ कमर कसी हुई थी ही, इसलिए पीएस चावला और भी निश्चिंत थे । वही क्या, मल्टीपल काउंसिल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर कोई पीएस चावला के चुने जाने को लेकर आश्वस्त था ।
इन आश्वस्त लोगों ने लेकिन ऐन मौके पर हुए एक बड़े बदलाव को अनदेखा कर दिया । ऐन मौके पर एक बड़ी घटना यह हुई कि राजीव मित्तल ने चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लिया, और वह वाइस चेयरमैन पद के उम्मीदवार हो गए । अंडरकरेंट पीएस चावला और जेपी सिंह की जोड़ी के खिलाफ था ही - उनके विरोधी वोटों के बँटे होने का जो फायदा उन्हें मिलता दिख रहा था, राजीव मित्तल के पीछे हटते ही उस फायदे की संभावना घट गई थी । इस तथ्य को भाँपने/पहचानने और सावधान होने में वह चूक गए और जीतती दिख रही बाजी को हार बैठे । अब वह अपने एक वोट के बिक जाने का आरोप लगा रहे हैं । उन्हें पाँच वोट मिलने का विश्वास था, लेकिन मिले चार वोट । कौन सा एक वोट उनके हाथ से निकल गया, इसे लेकर उनमें आपस में ही मतभेद हैं । ज्यादा शक जगदीश वर्मा और प्रमोद सपरा पर किया जा रहा है । जेपी सिंह की तरफ से कहा जा रहा है कि जगदीश वर्मा ने धोखा दिया है, तो तेजपाल सिंह खिल्लन की तरफ से प्रमोद सपरा का नाम लिया जा रहा है । इस आरोप-प्रत्यारोप को जेपी सिंह और तेजपाल सिंह खिल्लन की 'लड़ाई' के रूप में भी देखा जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि इस आरोप-प्रत्यारोप के जरिए यह दोनों एक दूसरे को लोगों की निगाह में नीचा करने/गिराने का प्रयास कर रहे हैं । हार के बाद का यह एक स्वाभाविक दृश्य है - हारने वाले खेमे के लोग एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते ही हैं ।  
सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की कलाबाजी ने लेकिन इनके लिए - खासकर जेपी सिंह के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है । पीएस चावला को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनवाने की मुहिम के जरिए जेपी सिंह ने दरअसल एक बड़ा दाँव चला था; जिसके फेल होने पर जिस तरह उनकी फजीहत हो रही है - उससे उनके सामने अपनी नेतागिरी को बचाने की एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है । सुशील अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की कलाबाजी ने उनकी चुनौती को और बढ़ाने का ही काम किया है, इसलिए उन्हें इनके खिलाफ भी बातें करने को मजबूर होना पड़ा है । 

Thursday, January 15, 2015

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल में सेकेंड वाइस प्रेसीडेंट पद की उम्मीदवारी के लिए अपनाई गई नरेश अग्रवाल की तरकीब की तर्ज पर ही वीके हंस और सुनील निगम ने मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में काउंसिल चेयरमैन पद के लिए वोट 'बेच' कर लायनिज्म की सेवा करने का फार्मूला निकाला

नई दिल्ली । वीके हंस और सुनील निगम ने साठ लाख रुपये में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के काउंसिल चेयरमैन पद का ऑफर देकर मल्टीपल की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है । वीके हंस डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में और सुनील निगम डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं; इनका दावा है कि इन्हें चार और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन प्राप्त है; और इस तरह यह दस में से छह वोट का ग्रुप बनाते हैं । इनका कहना है कि छह वोट किसी को भी मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बना सकते हैं । इस आधार पर, प्रत्येक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए दस दस लाख रुपये के हिसाब से इन्होंने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की कीमत तय कर दी है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में महँगे गिफ्ट्स के साथ साथ नगद पैसों के लेन-देन की बातें पहले भी सुनी गईं हैं, और यह बात आम चर्चा में रही है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में वोट खरीदे बेचे जाते हैं; लेकिन संगठित रूप से 'वोट बेचने की दुकान' पहली बार खुली है । इस दुकान के प्रोप्राइटर वीके हंस और सुनील निगम बताये गए हैं । इन दोनों में एक मजेदार किस्म की समानता यह है कि यह दोनों तीसरी बार की कोशिश में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की लाइन में आ पाए हैं और अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में एक खेमे के नेताओं से दूसरे खेमे के नेताओं के बीच आवाजाही करते रहे हैं ।
वीके हंस और सुनील निगम के नजदीकियों ने इनके हवाले से दावा किया है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के राजीव मित्तल ने तथा डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू के अंबरीश सरीन ने इनके इस ऑफर में दिलचस्पी दिखाई है । इन दोनों को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के महत्वाकांक्षी उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । अपनी अपनी तरह से इन्होंने 'वोटरों' के बीच पैठ बनाने की कोशिश तो की है, लेकिन अपनी कोशिशें अभी तक इन्हें चूँकि खुद ही आश्वस्त करती हुई नहीं दिखी हैं इसलिए छह वोट एक साथ मिलने वाला ऑफर इन्हें सुविधाजनक लगा होगा । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के उत्सुक उम्मीदवारों में डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के सुनील जैन और डिस्ट्रिक्ट 321 डी के परमजीत सिंह चावला को भी देखा/पहचाना जाता रहा है । सुनील जैन अपने डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग पड़ जाने के कारण अपनी उम्मीदवारी को लेकर सुस्त पड़ते दिख रहे हैं, और परमजीत सिंह चावला मल्टीपल की लीडरशिप के भरोसे होने के कारण कुछ करने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं । कुछ भी हो, लेकिन 'दुकान खुलते ही ग्राहक आने लगे' वाली स्थिति से प्रोप्राइटर लोग खासे उत्साहित हैं ।
वीके हंस और सुनील निगम ने होशियारी यह की है कि उनकी यह 'दुकान' नेक उद्देश्य से प्रेरित दिखे, इसके लिए उन्होंने तर्क दिया है कि दस लाख रुपये पाने वाला फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अगले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल में यह रकम प्रोजेक्ट्स में खर्च करेगा । मजेदार बात यह हुई है कि इन्होंने लोगों को कहा/बताया है कि यह 'ऑफर' आयोजित करने की प्रेरणा इन्हें सेकेंड इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट पद के उम्मीदवार नरेश अग्रवाल से मिली है । उल्लेखनीय है कि नरेश अग्रवाल ने अपने कैम्पेन के लिए पैसा इकठ्ठा करने के लिए तरह तरह की स्कीमें चलाई हुई हैं । तरह तरह की स्कीमों से पैसा इकठ्ठा करने की उनकी तिकड़मों को लायनिज्म की सेवा के रूप में प्रचारित किया जा रहा है; और उनके 'शिकार' ऐसे लोग हैं जो महत्वाकांक्षी हैं तथा कोई न कोई पद चाहते हैं । नरेश अग्रवाल की तर्ज पर ही वीके हंस और सुनील निगम ने चार अन्य फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का साथ लेकर लायनिज्म की सेवा का बीड़ा उठाया और शिकार के रूप में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की इच्छा रखने वालों को पहचाना है ।
नरेश अग्रवाल ने सेकेंड इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव की आड़ में लोगों से पैसे ऐंठने की तरकीब निकाली, तो उनसे प्रेरणा लेकर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का साथ लेकर वीके हंस और सुनील निगम ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए वोट 'बेच' कर लायनिज्म की सेवा करने का फार्मूला निकाल लिया है । उनके इस फार्मूले ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनावी परिदृश्य को खासा रोचक बना दिया है ।