Friday, December 28, 2012

रवि भाटिया की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी को राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण विनोद बंसल का समर्थन भी मिल सकेगा क्या ?

नई दिल्ली । रवि भाटिया के जरिये रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की खबरों ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है । दिलचस्प इसलिए क्योंकि रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल ने मौजूदा रोटरी वर्ष में डॉक्टर सुब्रमणियन के जरिये अपनी जो उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, उसमें उसे सफलता नहीं मिली; लिहाजा हर किसी के लिए उत्सुकता का विषय यह है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के अनुभव से रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के लोगों ने क्या सबक सीखा है और उस सीखे हुए सबक से वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को किस तरह लोगों के बीच समर्थन दिलवाते हैं और स्वीकार्य बनाते/बनवाते हैं । क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव में यूँ तो उम्मीदवार की अपनी सक्रियता ही काम आती है और क्लब की कोई बहुत भूमिका नहीं होती है - लेकिन फिर भी कोई उम्मीदवार यदि क्लब के लोगों को अपने अभियान में प्रभावी तरीके से शामिल करता है; क्लब के लोगों की मदद लेता है तो निश्चित ही उसे इसका फायदा मिलता है । रवि भाटिया चूँकि क्लब के पुराने सदस्य हैं, इसलिए क्लब के पुराने और प्रमुख लोगों के साथ उनके गहरे विश्वास के संबंध हैं । जाहिर है की यह संबंध चुनाव में व्यावहारिक तरीके से उनके काम आयेंगे । यूँ तो क्लब के लोगों के साथ डॉक्टर सुब्रमणियन के भी अच्छे संबंध थे; और क्लब के लोगों ने उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में काम भी किया - लेकिन क्लब के लोगों का काम डॉक्टर सुब्रमणियन के काम इसलिए नहीं आ सका, क्योंकि क्लब के लोगों के साथ उनका बहुत जुड़ाव नहीं था; और जो लोग डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ सक्रिय थे, उनका न डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ और न डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के साथ कोई परिचय रहा है ।
रवि भाटिया के मामले में संबंधों का ‘गणित’ और संबंधों की 'केमिस्ट्री’ लेकिन बिल्कुल अलग है । रवि भाटिया ने कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ काम किया है; और इस कारण से वह कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की कोर टीम का हिस्सा रहे हैं । इस नाते से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया की पहचान तो है ही, लोग उनकी कार्य-क्षमताओं और रोटरी में तथा डिस्ट्रिक्ट में उनकी सक्रिय संलग्नता से भी परिचित हैं । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया के इस परिचय के चलते क्लब के लोगों के लिए भी रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए अभियान चलाना सुविधाजनक हो जाता है । उल्लेखनीय है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी के संदर्भ में इन्हीं ‘सुविधाओं’ का वास्ता देकर क्लब के कुछेक प्रमुख लोग मौजूदा वर्ष में ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे थे; किंतु पिछली डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में निभाई गई अपनी सक्रिय भूमिका से लाभ मिलने का वास्ता देकर डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा, तो रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत करने वालों ने डॉक्टर सुब्रमणियन को मौका दे देने की बात मान ली । डॉक्टर सुब्रमणियन के चुनावी मुकाबले से बाहर होने के बाद रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के तथा डिस्ट्रिक्ट के कई एक नेताओं का मानना और कहना रहा कि रवि भाटिया यदि उम्मीदवार होते तो इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता । किंतु जो हुआ, उसे खिलाड़ीभावना के साथ स्वीकार करते हुए रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के प्रमुख लोगों ने अगले रोटरी वर्ष में रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है ।
रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक अब की बार वह गलती नहीं करना चाहते हैं, जो पिछली बार हो जाने के कारण उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का मौका उनसे छिन गया था । पिछली बार रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक रवि भाटिया की उम्मीदवारी की घोषणा करने की टाइमिंग को लेकर गच्चा खा गये थे । वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को जब तक सामने लाते, उससे पहले ही डॉक्टर सुब्रमणियन ने चूँकि अपनी उम्मीदवारी के लिए लॉबीइंग शुरू कर दी - जिस कारण रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने का मौका जाता रहा । अगले रोटरी वर्ष के लिए चूँकि अभी तक किसी ने भी अपनी उम्मीदवारी की बात नहीं की है, इसलिए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने अभी से उनकी उम्मीदवारी की बात करना शुरू करके बढ़त बनाने का लाभ लेने की होशियारी चली है । अगले रोटरी वर्ष के लिए उम्मीदवार के रूप में कुछेक नाम बीच-बीच में सुने तो गये हैं, लेकिन जितने अचानक तरीके से वह नाम सामने आये उतने ही रहस्यपूर्ण ढंग से वह गुम भी हो गये हैं । पिछले दो-तीन वर्षों का नजारा देखें तो एक बात कॉमन दिखती है और वह यह कि जिस उम्मीदवार ने पहले से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, चुनावी बाजी उसके हाथ लगी । इस वर्ष जेके गौड़ चुने गये हैं, तो उनकी उम्मीदवारी की चर्चा दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में पहले से थी । उनसे पहले संजय खन्ना और उनसे भी पहले विनोद बंसल जीते तो उनकी उम्मीदवारी भी अपने-अपने प्रतिद्धंद्धियों से पहले सामने आई थी । यह कोई टोटके का मामला नहीं है - पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से आम लोगों के बीच यह संदेश जाता है कि पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाला उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से ले रहा है । जब कोई उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेता नजर आता है, तो दूसरे लोग भी उसकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते हैं । देर से उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के मामले में इम्प्रेशन यही पड़ता है कि उक्त उम्मीदवार लगता है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा होगा, इसलिए देर से अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत कर रहा है । अब जो उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा हो, उसके लिए अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के कन्फ्यूजन को दूर कर पाना मुश्किल ही होता है । चुनावी नतीजों से भी यही बात साबित होती रही है । इसलिए ही रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अभी से ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करना जरूरी भी लगा और उपयोगी भी ।
रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अगले रोटरी वर्ष में स्थितियाँ यदि रवि भाटिया के अनुकूल लग रही हैं तो इसका एक बड़ा कारण राजेश बत्रा का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर होना है । राजेश बत्रा यूँ तो चुनावी राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका निभाते हुए नहीं देखे/पाये गये हैं, लेकिन रवि भाटिया के साथ उनके नजदीकी संबंधों को देखते हुए यह विश्वास तो किया ही जा सकता है कि उनके नजदीकी संबंधों के चलते मनोवैज्ञानिक फायदा तो रवि भाटिया को मिलेगा ही । राजेश बत्रा के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनोद बंसल के लिए भी ऐसा कुछ कर पाना संभव नहीं होगा, जिससे कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को नुकसान पहुंचे । रवि भाटिया से विनोद बंसल के कोई विरोध के संबंध नहीं हैं; लेकिन मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल की जो निकटता है उसे देखते हुए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को विनोद बंसल के रवैये को लेकर कुछ आशंका है । रवि भाटिया हालाँकि इस नाते से खुशकिस्मत हैं कि जिन लोगों के विनोद बंसल के भरोसे उम्मीदवार बनने की चर्चा/संभावना थी, वह पीछे हटते दिख रहे हैं; और अभी तक ऐसे किसी नाम की चर्चा नहीं है जिसे विनोद बंसल के उम्मीदवार के तौर पर देखा/पहचाना जाये । रवि भाटिया के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को ही नहीं, दूसरे अन्य लोगों को यह विश्वास भी है कि राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण रवि भाटिया ही हो सकता है कि विनोद बंसल के उम्मीदवार हो जायें । यह विश्वास इसलिए बना और बढ़ा है क्योंकि रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा शुरू होते ही कुछेक संभावनाशील उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी उम्मीदवारी से इंकार करना शुरू कर दिया है । ऐसा ही नजारा रहा तो नेताओं के पास और डिस्ट्रिक्ट के पास ज्यादा विकल्प ही नहीं होंगे - और तब रवि भाटिया को हो सकता है कि किसी खास चुनौती का सामना ही न करना पड़े । हालाँकि यह सोचना/मानना थोड़ा जल्दबाजी करना भी होगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए आक्रामक तरीके से अभियान चला सकने की क्षमता रखने वाले कुछेक रोटेरियंस को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुक देखा/सुना जा रहा है । हालाँकि उनके बारे में अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि वह अगले वर्ष उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे या और आगे आने वाले वर्षों में ? जो होगा, वह तो आगे पता चलेगा - फ़िलहाल तो रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा चला कर अगले वर्ष होने वाली चुनावी दौड़ में रवि भाटिया की उम्मीदवारी को आगे तो बढ़ा ही दिया है ।

Thursday, December 27, 2012

विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा के जरिये मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से 'बाहर' करने की रणनीति बनाई

नई दिल्ली । मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से बाहर रखने के लिए रंजन ढींगरा को आगे करने की जो चाल विनोद बंसल ने चली है, उसके कारण उक्त नोमीनेटिंग कमेटी का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में मंजीत साहनी को पहले कोई रूचि नहीं थी, लेकिन फिर अचानक से उन्हें इस चुनाव की होड़ में शामिल देखा जाने लगा । माना/समझा गया कि उन्हें ऊपर के नेताओं से इसके लिए इशारा और समर्थन का भरोसा मिला होगा । यही मानने/समझने के चलते नोमीनेटिंग कमेटी के लिए मंजीत साहनी की उम्मीदवारी को गंभीरता के साथ देखा/पहचाना जाने लगा । चुनावी राजनीति के समीकरणों को समझने/पहचानने वाले लोगों ने भी मान लिया कि मंजीत साहनी उम्मीदवार हुए तो चुनावबाज मुकेश अरनेजा भी उम्मीदवार बने रहने का दम नहीं बनाये रख पायेंगे और मंजीत साहनी निर्विरोध ही चुन लिए जायेंगे । लेकिन विनोद बंसल के एक 'राजनीतिक' स्ट्रोक ने इस संभावना के घुर्रे उड़ा दिए हैं ।
मंजीत साहनी के निर्विरोध चुने जाने की संभावना में रूकावट पैदा करने के उद्देश्य से विनोद बंसल ने बड़ी होशियारी से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए रंजन ढींगरा की वकालत शुरू कर दी । विनोद बंसल की होशियारी यह रही कि उन्होंने भाँप लिया कि वह यदि मंजीत साहनी की उम्मीदवारी का सिर्फ विरोध करेंगे तो उनकी बात कोई नहीं सुनेगा और वह सफल नहीं होंगे, और कि वह रंजन ढींगरा को आगे करके ही मंजीत साहनी का 'शिकार' कर सकते हैं । इसी समझ के साथ, विनोद बंसल ने काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों में मंजीत साहनी के विरोधियों की पहचान करते हुए चर्चा चलाई कि मंजीत साहनी का समर्थन करने को लेकर कुछेक लोगों को ऐतराज है, इसलिए उनके नाम पर सहमति बनना मुश्किल है; लेकिन रंजन ढींगरा के नाम पर सहमति बनाई जा सकती है । विनोद बंसल ने तर्क दिया कि रंजन ढींगरा चूँकि पिछली बार नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बार उन्हें चुन लिए जाने पर सहमति बनाई जा सकती है । मजे की बात यहाँ यह है कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के प्रति सहमति बनाये जाने की कोई वकालत या कोशिश विनोद बंसल ने उस समय तक बिलकुल भी नहीं की थी, जब तक कि मंजीत साहनी ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की थी । उस समय तो वह रंजन ढींगरा के लिए समर्थन जुटने/जुटाने की मुश्किलों का ही विवरण दिया करते थे । लेकिन अब वह रंजन ढींगरा के बड़े समर्थक बन गए हैं ।
रंजन ढींगरा को आगे करके मंजीत साहनी को 'बाहर' करने की विनोद बंसल की तरकीब के पीछे कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की मदद करने की रणनीति भी दिख रही है । मुकेश अरनेजा के प्रति विनोद बंसल का समर्थन-भाव राजेश बत्रा के कारण मुसीबत में है । राजेश बत्रा को मुकेश अरनेजा फूटी आँख भी नहीं भाते हैं । मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल के संबधों को लेकर राजेश बत्रा विभिन्न तरीकों से अपनी नाराजगी जता चुके हैं । राजेश बत्रा के रवैये को देख कर विनोद बंसल ने मुकेश अरनेजा को लेकर थोड़ा सावधानी रखना तो शुरू किया है, लेकिन रंजन ढींगरा का नाम लेकर उन्होंने जो राजनीति शुरू की है - उसके पीछे उनकी राजेश बत्रा को धोखे में रख कर मुकेश अरनेजा का काम आसान करने की तरकीब को देखा/पहचाना जा रहा है । तरकीब यह कि मंजीत साहनी और रंजन ढींगरा मुकाबले में रहेंगे तो मुकेश अरनेजा के विरोधियों में फूट पड़ेगी और उसका फायदा स्वाभाविक रूप से मुकेश अरनेजा को मिलेगा ।
विनोद बंसल की इस राजनीति की बात लोगों को चूंकि अशोक अग्रवाल के मुँह से सुनने को मिल रही है, इसलिए भी विनोद बंसल की इस राजनीति के पीछे मुकेश अरनेजा की मदद को देखा/पहचाना जा रहा है । जेके गौड़ को प्राप्त हुई चुनावी जीत के बाद से अशोक अग्रवाल को 'सुपर गवर्नर' के अवतार में देखा जा रहा है और वह लगातार मंजीत साहनी तथा अमित जैन को निशाना बना रहे हैं और उनके बारे में गाली-गलौजपूर्ण अपशब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हुए लोगों को बता रहे हैं कि मंजीत साहनी का ईलाज तो विनोद बंसल करेंगे । अशोक अग्रवाल के अनुसार ही विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा रूपी इंजेक्शन से मंजीत साहनी का ईलाज शुरू भी कर दिया है । मंजीत साहनी से अशोक अग्रवाल की नाराजगी इस बात को लेकर है क्योंकि मंजीत साहनी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव में जेके गौड़ की बजाये सुधीर मंगला का साथ दिया । मंजीत साहनी के रवैये का हो सकता है कि जेके गौड़ को भी बुरा लगा हो, लेकिन जेके गौड़ अपनी बड़ी हो गई जिम्मेदारी को समझते हुए अब सभी का साथ लेने की जरूरत को समझते हुए चुप हैं; लेकिन अशोक अग्रवाल आपे से बाहर दिख रहे हैं । विनोद बंसल की भी मंजीत साहनी से कुछ पुरानी खटपट है - लिहाजा उन्होंने रंजन ढींगरा के कंधे का सहारा लेकर मंजीत साहनी को निशाने पर लिया तो अशोक अग्रवाल को भी मंजीत साहनी के खिलाफ भड़ास निकालने का मौका मिल गया है । अशोक अग्रवाल की भड़ास ने लेकिन विनोद बंसल की राजनीति को सबके सामने ला दिया है ।

Tuesday, December 25, 2012

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की खाली हुई कुर्सी को भरने का मामला कहीं राकेश त्रेहन और विजय शिरोहा के बीच के झगड़े का शिकार तो नहीं बनेगा ?

नई दिल्ली । सुभाष गुप्ता के आकस्मिक निधन से खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को भरने के लिए डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में हलचल तेज हो गई है । इस हलचल में खेमों की दीवारें टूटती हुई सी दिख रही हैं और नई खेमेबाजियाँ आकार लेती हुई नजर आ रही हैं । हालांकि अभी कुछ भी पक्के तौर पर कहना संभव नहीं है, लेकिन तेजी से घटते हुए घटनाचक्र में कई बातें ऐसी हो रही हैं जिनके होने के कई.कई अर्थ लगाये जा रहे हैं - और उन अर्थों के भरोसे नए समीकरणों को बनते-बिगड़ते देखा जा रहा है । नए समीकरणों की बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस हलचल ने कई दबे-ढके झगड़ों को पुनः सतह पर ला दिया है | ऊपर से साथ-साथ दिखने वाले चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर के बीच नेतृत्व की होड़ का मामला हो; या रोहतक मीटिंग की सफलता के बाद इन दोनों का राजिंदर बंसल से खतरा महसूस करने का मुद्दा हो; या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन से तनातनी की घटनाओं के बाद फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा का रोहतक मीटिंग में जाना और फिर वहाँ वाह-वाही लूटने का किस्सा हो; या चंद्रशेखर मेहता के साथ राकेश त्रेहन की नजदीकियों की कहानियाँ हों - खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को भरने के लिए होने वाली जोड़-तोड़ में यह सब बातें अचानक से महत्वपूर्ण हो उठी हैं ।
खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को भरने के लिए होने वाली जोड़-तोड़ में कुछेक लोगों को राकेश त्रेहन के साथ नजदीकी के चलते चंद्रशेखर मेहता की भूमिका महत्वपूर्ण लग रही है, तो कुछेक लोगों को राजिंदर बंसल और विजय शिरोहा के बीच बढ़ती ‘दिखती’ नजदीकी में एक अलग खिचड़ी के पकने की ‘खुशबू’ महसूस हो रही है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि चंद्रशेखर मेहता के साथ राकेश त्रेहन की नजदीकी को राकेश त्रेहन के साथी नेताओं ने कभी भी ऐप्रीशियेट नहीं किया - और उनकी नजदीकी को हमेशा ही संशय के साथ देखा/पहचाना है; लेकिन फिर भी राकेश त्रेहन ने चंद्रशेखर मेहता के साथ अपनी नजदीकी को न सिर्फ बनाये रखने पर, बल्कि किसी न किसी रूप में उसे ‘दिखाते’ रहने पर भी जोर दिया है । कुछेक लोगों को लगता है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की खाली जगह को भरने के मामले में सारा खेल चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन के हाथ में है, इसलिए उनकी मदद से चंद्रशेखर मेहता अपना काम बना लेंगे । चंद्रशेखर मेहता अपना काम बना लेंगे या नहीं बना लेंगे - यह तो बाद में पता चलेगा; काम बना लेने की चर्चाओं के बीच अभी केएल खट्टर को ही यह बात पसंद नहीं आ रही है कि चंद्रशेखर मेहता इस मामले में नाहक ही नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं । इन दोनों के बीच नेतृत्व को लेकर जो होड़ है, वह इस मामले के कारण और मुखर हो गई है । केएल खट्टर का कहना है कि चंद्रखेखर मेहता कर कुछ भी नहीं पायेंगे, इस तरह की बातें उड़वा कर बस अपने आप को चर्चा में बनाये रखेंगे । मजे की बात यह है कि एक तरफ तो यह दोनों आपस में लड़ रहे हैं, और दूसरी तरफ इन्हें राजिंदर बंसल और विजय शिरोहा के बीच बढ़ती नजदीकी में अपने लिए खतरा नजर आ रहा है ।
रोहतक में राजिंदर बंसल की पहल पर आयोजित डिस्ट्रिक्ट के ‘हरियाणवी’ नेताओं की मीटिंग में विजय शिरोहा ने जिस तरह से वाह-वाही लूटी, उसे देख कर चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर के तो होश ही उड़ गये हैं । उन्हें आश्चर्य इस बात का है कि राजिंदर बंसल ने ‘अपने मंच’ पर विजय शिरोहा को इतनी महत्ता क्यों दी कि कार्यक्रम की सारी रौनक विजय शिरोहा लूट ले गये । चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर को इसके पीछे राजिंदर बंसल और विजय शिरोहा के बीच कुछ खिचड़ी पकने की महक आ रही है । इस महक के प्रभाव में रहते हुए, सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के खाली पद को भरने के लिए आरके शाह की सक्रियता के बारे में जानते/सुनते हुए चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर को कुछ ज्यादा ही बेचैनी होने लगी है । पहले विजय शिरोहा को तवज्जो देकर और फिर आरके शाह को आगे करके राजिंदर बंसल ने हरियाणवी नेताओं के बीच तो अपना कद बढ़ा ही लिया है - क्योंकि उन्होंने दिखा दिया है कि उनके पास योजना भी है; योजना को क्रियान्वित करने का हुनर भी है; और मौका आने पर आगे बढ़ाने के लिए उम्मीदवार भी है । चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर के पास सिर्फ बातें ही बातें हैं । विजय शिरोहा के साथ राजिंदर बंसल की बढ़ती नजदीकी में चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर को इसलिए खतरा नजर आ रहा है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन के साथ विजय शिरोहा की तनातनी की खबरें अब आम हैं और डिस्ट्रिक्ट के बाहर भी सुनी/बताई जाती हैं । ऐसे में, कई एक लोगों को आशंका है कि चुनावी खेमेबाजी कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को आगे करके तो नए समीकरण नहीं बनायेगी । सत्ता खेमे के दूसरे नेताओं का हालाँकि दावा है कि राकेश त्रेहन और विजय शिरोहा के बीच के झगड़े को सुलझा लिया गया है, और दोनों के बीच के झगड़े को इस्तेमाल करके सत्ता खेमे में फूट डालने का सपना देखने वाले लोगों को निराशा ही हाथ लगेगी ।
सत्ता खेमे के नेताओं ने यह दावा कर तो दिया है लेकिन उन्हें भी पता है कि इसे पूरा करना उनके लिए आसान नहीं है । दरअसल इसीलिए सत्ता खेमे की तरफ भी, खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अभी किसी नाम पर सहमति बनना तो दूर, आपस में विचार.विमर्श भी नहीं हुआ है । दरअसल, हर कोई एक दूसरे की तरफ देख रहा है कि कौन किसका नाम लाता है और क्यों लाता है ? राकेश त्रेहन और विजय शिरोहा के बीच की तनातनी ने खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की कुर्सी के लिए होने वाले ‘चुनाव’ को सत्ता खेमे के लिए एक बड़ी चुनौती बना दिया है । चुनौती इसलिए क्योंकि सत्ता खेमे के नेता भी जानते और मानते हैं कि राकेश त्रेहन और विजय शिरोहा के बीच किसी बड़े मुद्दे को लेकर झगड़ा नहीं है, बल्कि बहुत छोटी-छोटी बातों का बखेड़ा भर है - लेकिन यदि छोटी-छोटी बातें बड़ा बखेड़ा खड़ा कर सकती हैं तो फिर उस बखेड़े के कारण पैदा हुआ परस्पर अविश्वास और अपनी.अपनी चलाने की जिद खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को भरने के मामले में क्या-क्या नजारे पेश कर सकती है ? यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को भरने के मामले में पैसे देने-लेने की चर्चाएँ भी सुनी/बताई जा रही हैं । सत्ता खेमे के नेताओं के सामने एक चुनौती यह भी है कि उन्होंने ‘दिल्ली के’ इस मामले को यदि होशियारी से हल नहीं किया तो फिर डर यह है कि कहीं ‘हरियाणा का’ मामला भी उनके हाथ से न निकल जाये । सत्ता खेमे के नेताओं को ‘हरियाणा के’ संभावित उम्मीदवार संजय खन्ना ने जिस तरह से छकाया हुआ है, उसके कारण ‘हरियाणा का’ मामला उनके लिए पहले से ही परेशानी का सबब बना हुआ है । अचानक से पैदा हो गये ‘दिल्ली के’ मामले ने सत्ता खेमे के नेताओं को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाने/करने का हालांकि एक बड़ा मौका दे दिया है - लेकिन इस मौके के साथ बनी परिस्थितियों ने उनके सामने यह खतरा भी पैदा कर दिया है कि ‘यहाँ’ से आगे का रास्ता उन्हें बढ़ा भी सकता है और घटा भी सकता है । सत्ता खेमे के नेता भी समझ रहे हैं और मान रहे हैं कि ‘दिल्ली के’ मामले को हल करने में उन्होंने जरा सा भी चूक की, तो ‘हरियाणा का’ मामला उनके हाथ से निकलने में देर नहीं लगेगी । सत्ता खेमे के नेताओं की खुशकिस्मती सिर्फ इतनी ही है कि उन्हें फँसाने/गिराने को लेकर विरोधी खेमे के नेताओं में एका नहीं है - विरोधी खेमे के नेता हालाँकि अपने-अपने स्तर पर मौके का फायदा उठाने की कोशिश में जरूर लगे हुए हैं, और सीमित दायरे में सफलता पाने की तरफ बढ़ने का आभास भी दे रहे हैं । जाहिर है कि सत्ता खेमे के सामने दोहरी चुनौती है - एक चुनौती उन्हें विरोधी खेमे के नेताओं से मिल रही है; और दूसरी चुनौती उन्हें अपने आपस के अंतर्विरोधों से, आपस के अविश्वासों व अपनी-अपनी जिदों से मिल रही है ।

Tuesday, December 18, 2012

सुरेश जैन के यह स्वीकार करने के साथ ही कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है, जेके गौड़ की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की चुनावी जीत का रास्ता साफ हुआ

नई दिल्ली । सुरेश जैन के सुधीर मंगला को मिले समर्थन की सच्चाई को जान/समझ लेने के साथ ही वह हुआ जिसकी तथ्यपूर्ण ठोस संभावना 'रचनात्मक संकल्प' में लगातार व्यक्त की जाती रही थी । उल्लेखनीय है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश जैन को सुधीर मंगला के समर्थन में उस समय से बताया/देखा/पहचाना जा रहा था जिस समय में, बाद में सुधीर मंगला के समर्थन में आये नेता लोग सुधीर मंगला को चुनावी दौड़ में कहीं भी नहीं देख/पहचान रहे थे । सुधीर मंगला जब चुनावी दौड़ में शामिल होते हुए-से दिखे तब तीन सदस्यीय चुनावी कमेटी के एक सदस्य होने के नाते से सुरेश जैन की सुधीर मंगला के प्रति समर्थन की बात खासी महत्वपूर्ण हो उठी । सुरेश जैन की भूमिका तब और महत्वपूर्ण हो गई जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद का चुनाव डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स के दो खेमों के झगड़े में बदलता हुआ दिखा । गौर करने की बात है कि पिछले कुछ दिनों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव के बहाने से पूर्व गवर्नर नेताओं ने अपनी-अपनी पोजीशन ले ली थी - रंग बदलने में गिरगिट को भी मात देने वाले मुकेश अरनेजा और मुहावरे की भाषा में 'थूक कर चाटने वाले' रमेश अग्रवाल ने जैसे ही जेके गौड़ की चुनावी स्थिति को मजबूत पाया, जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा लपक लिया । डिस्ट्रिक्ट में बनी मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की बदनामी का फायदा उठाने के उद्देश्य से मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का झंडा थाम लिया । मुकेश अरनेजा और मंजीत साहनी की इस पोजीशनिंग ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव की रिहर्सल में बदल दिया । मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास की एंट्री ने इस रिहर्सल को और व्यापक बना दिया । यश पाल दास की एंट्री के बाद, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के दूसरे खिलाड़ियों के लिए डिस्ट्रिक्ट 3010 की चुनावी राजनीति से दूर 'दिखना' मुश्किल हो गया और फिर वह भी इस लड़ाई में कूद पड़े ।
पिछले दो-तीन दिनों में तेजी से घटे घटना चक्र में पहले तो यह माहौल बनता हुआ नजर आया कि यश पाल दास डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव के झगड़े को सुलटायेंगे, लेकिन फिर जल्दी ही दूसरे इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता का नजरिया सुनने को मिला कि रोटरी के बड़े नेताओं को इस तरह के झगड़ों में पार्टी नहीं बनना चाहिए । शेखर मेहता के इस नजरिये के साथ पार्टी बनने की खबर मिलते ही यश पाल दास ने अपने बढ़े हुए क़दमों को पीछे खींच लिया । शेखर मेहता के इस नजरिये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव को झगड़े में फँसाने की कोशिश करने वाले लोगों को तगड़ा झटका दिया और वह एकदम से शांत हो गए । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की आड़ में राजनीति करने का जुगाड़ देखने वाले नेताओं के लिए सच्चाई को अनदेखा करना संभव नहीं रह गया । रिकॉर्ड पर जो चीजें थीं उन्हें देख/जान कर सुधीर मंगला के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले सुरेश जैन ने भी समझ लिया कि सुधीर मंगला उतना समर्थन सचमुच नहीं जुटा सके हैं, जितने समर्थन की जरूरत थी - और तब उन्होंने भी जेके गौड़ की चुनावी जीत की घोषणा पर मुहर लगाने में देर नहीं की ।
'रचनात्मक संकल्प' में लगातार कहा जाता रहा है कि सुधीर मंगला को अपने तथाकथित समर्थक नेताओं का ही समर्थन नहीं मिला । मंजीत साहनी का ही उदहारण लें - तो हर कोई मानता और जानता है कि मंजीत साहनी यदि सचमुच सुधीर मंगला की मदद करना चाहते तो वह पाँच-छह क्लब्स का समर्थन तो आराम से दिलवा सकते थे, लेकिन उन्होंने अंतिम समय तक जिस तरह से असमंजस बनाये रखा - उससे साफ हुआ कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का झंडा थामने के बावजूद उनका उद्देश्य सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के लिए कुछ करना नहीं था; वह तो बस अपने आप को एक खेमे का नेता दिखाना चाहते थे । समर्थन और सहयोग जेके गौड़ को भी अपने तथाकथित समर्थक नेताओं से नहीं मिला । जेके गौड़ की चुनावी जीत का श्रेय लेने की होड़ में आगे दिखने की कोशिश करने वाले मुकेश अरनेजा के बारे में कौन नहीं जानता कि जेके गौड़ की उम्मीदवारी को रोकने के लिए मुकेश अरनेजा ने ही आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करवाया था और जेके गौड़ को हतोत्साहित करने के उद्देश्य  से आलोक गुप्ता के गले में बाहें डाल कर लोगों के सामने घूमा करते थे । सिर्फ इतना ही नहीं, नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला होने से ठीक एक दिन पहले ही मुकेश अरनेजा ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरीश मल्होत्रा से डॉक्टर सुब्रा के समर्थन में फैसला करवाने को लेकर बात की थी । लेकिन जब नोमीनेटिंग कमेटी में जेके गौड़ का पलड़ा भारी दिखा तो मुकेश अरनेजा ने यह सूँघने में देर नहीं की कि जेके गौड़ के साथ होने में ही फायदा है ।
इस बार के चुनाव से एक बार फिर साबित हुआ है कि चुनाव में नेता लोग काम नहीं आते - जितना आते भी हैं मजबूरी में ही आते हैं; काम अपनी ही सक्रियता और अपना ही व्यवहार आता है । जेके गौड़ की चुनावी जीत उनकी अपनी सक्रियता, उनके अपने व्यवहार और चुनावी समीकरणों को अपने अनुकूल करने की उनकी अपनी तत्परतापूर्ण पहल का ही नतीजा है । जेके गौड़ की उम्मीदवारी को लेकर हर छोटा-बड़ा नेता जिस तरह की बातें करता रहा है, उन्हें याद करते और ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि जेके गौड़ की चुनावी जीत ने बड़बौले नेताओं को बौना साबित किया है ।

Monday, December 10, 2012

मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला के रवैये पर हैरानी व्यक्त की और साफ कहा कि सुधीर मंगला को अपनी 'राजनीति' में उनका नाम बदनाम नहीं करना चाहिए

नई दिल्ली । मंजीत साहनी को लेकर सुधीर मंगला ने जो 'राजनीति' की वह मंजीत साहनी के स्पष्टीकरण के कारण सुधीर मंगला को उल्टी पड़ गई है । उल्लेखनीय है कि मंजीत साहनी के लिए तब बड़ी अजीब स्थिति पैदा हो गई जब उन्हें दूसरों से सुनने को मिला कि सुधीर मंगला प्रचारित कर रहे हैं कि उन्होंने अपने क्लब का समर्थन सुधीर मंगला को दिलवा दिया है । मंजीत साहनी को कई लोगों के फोन आये कि सुधीर मंगला का यह दावा क्या सच है ? मंजीत साहनी ने हर किसी से यही कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि सुधीर मंगला इस तरह का दावा कर रहे हैं । दूसरों के साथ-साथ मंजीत साहनी के लिए भी हैरानी की बात यह थी कि सुधीर मंगला अपनी राजनीती में उनका नाम क्यों बदनाम कर रहे हैं ? आश्चर्य और हैरानी के बीच मंजीत साहनी ने जो कहा उससे स्पष्ट हुआ कि मंजीत साहनी द्धारा अपने क्लब का समर्थन सुधीर मंगला को दिलवाने की बात सफ़ेद झूठ है । मंजीत साहनी ने बताया कि वह चूंकि लगातार बाहर रहे हैं, इसलिए अपने क्लब की गतिविधियों से ज्यादा परिचित नहीं हैं; लेकिन उन्हें इतना अवश्य पता है कि क्लब के बोर्ड ने चुनाव को लेकर फैसला करने का अधिकार क्लब के अध्यक्ष को दे दिया है और ऐन मौके पर अध्यक्ष जो ठीक समझेंगे, वह फैसला करेंगे ।
मंजीत साहनी ने हालाँकि यह बताने/जताने में कोई परहेज नहीं किया कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति उनकी शुरू से ही सहानुभूति थी और इस बात को उन्होंने हमेशा ही स्पष्ट रूप से लोगों से कहा/बताया है । उन्होंने यहाँ तक कहा/बताया कि सुधीर मंगला के साथ उनके वर्षों पुराने संबंध हैं और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में भी उन्हें सुधीर मंगला का सहयोग और समर्थन मिलता रहा है - इसलिए उनकी सहानुभूति सुधीर मंगला के प्रति होना स्वाभाविक ही है । लेकिन इसके साथ ही मंजीत साहनी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि चूंकि उनके क्लब की यह परंपरा रही है कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने का समर्थन वह नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि इस वर्ष के क्लब के पदाधिकारी भी इस परंपरा का पालन करेंगे । मंजीत साहनी जानते हैं कि उनके क्लब का फैसला रोटरी में उनकी अपनी साख और प्रतिष्ठा पर भी असर डालेगा तथा उनकी 'राजनीति' पर भी - इसलिए वह संभल कर ही फैसला करना चाहते हैं । संभल कर फैसला करने का एक पेंच यह भी है कि उनके क्लब में जिस तरह फैसला करने का अधिकार अध्यक्ष को दे दिया गया है, और अध्यक्ष मनमाने तरीके से फैसला करे - जिसे तकनीकी आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निरस्त कर दे, तब क्लब की तो चलिए जाने दीजिये - मंजीत साहनी की साख और प्रतिष्ठा के लिए तो यह एक बड़ा आघात होगा ।
मंजीत साहनी के क्लब के ही कई लोगों का कहना है कि मंजीत साहनी अपने लिए - या क्लब उनकी साख का ध्यान रखते हुए यह 'खतरा' क्यों उठाये ? क्या मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को अपने तईं कोई मुद्दा बनाया हुआ है ? यह सच है कि वर्षों के संबंधों के चलते मंजीत साहनी के मन में सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रहा है - कुछ लोग उनके इस 'भाव' को हालाँकि विनोद बंसल के प्रति उनकी नाराजगी 'दिखाने' के रूप में भी देखते/पहचानते हैं । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल द्धारा की जा रही अपनी उपेक्षा से मंजीत साहनी काफी आहत हैं; और चूँकि वह जानते हैं कि विनोद बंसल का विरोध सुधीर मंगला की उम्मीदवारी से है; इसलिए विनोद बंसल के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट करने के लिए ही उन्होंने अपने आप को सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के साथ खड़ा दिखाना शुरू किया । यहाँ इस बात पर गौर करना महत्वपूर्ण है कि मंजीत साहनी ने चाहे किसी भी कारण से सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की हो - लेकिन वह सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय कभी भी नहीं नज़र आये हैं । जेके गौड़ की उम्मीदवारी के खिलाफ खड़े दिखने से बचने की भी उन्होंने हर संभव कोशिश की है ।
जेके गौड़ ने दरअसल उनके साथ रोटरी का काफी काम किया है, जिसके लिए मंजीत साहनी कई कई बार सार्वजानिक रूप से जेके गौड़ की प्रशंसा करते रहे हैं । सुधीर मंगला उनके साथ रोटरी का कोई काम करते हुए तो कभी दिखाई नहीं दिए हैं । ऐसे में मंजीत साहनी के लिए यह फैसला करना सचमुच चुनौतीपूर्ण बना कि वह रोटरी के काम में मिले सहयोग को तरजीह दें या व्यक्तिगत संबधों को ? मंजीत साहनी ने - अभी तक तो - दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने का अद्भुत कौशल दिखाया है : सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाने में उन्होंने कोई परहेज नहीं किया, लेकिन साथ ही जेके गौड़ की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम भी उन्होंने नहीं किया है । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव होने के बावजूद उन्होंने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने की उन्होंने कहीं कोई कोशिश नहीं की है ।
इसीलिये मंजीत साहनी ने जब सुना कि सुधीर मंगला लोगों के बीच दावा कर रहे हैं कि मंजीत साहनी ने अपने क्लब का समर्थन उन्हें दिलवा दिया है, तब मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला के रवैये पर आश्चर्य और हैरानी व्यक्त की और साफ कहा कि सुधीर मंगला को अपनी 'राजनीति' में उनका नाम बदनाम नहीं करना चाहिए । लोगों को दिए मंजीत साहनी के इस जबाव ने सुधीर मंगला की तिकड़मों को तगड़ा झटका दिया है । सुधीर मंगला ने सोचा तो यह होगा कि वह मंजीत साहनी का नाम लेकर इस तरह की बात कहेंगे तो उन्हें दूसरे क्लब्स का समर्थन जुटाने में आसानी होगी - लेकिन मंजीत साहनी के दो-टूक जबाव ने सब गड़बड़ कर दिया; और सुधीर मंगला की राजनीतिक चाल को न सिर्फ फेल कर दिया बल्कि सुधीर मंगला का ही नुकसान करवा दिया । इस तरह सुधीर मंगला को अपनी ही होशियारी भारी पड़ी है ।

Sunday, December 9, 2012

समर्थन में समझे जाने वाले क्लब्स और नेताओं के पीछे हटने से सुधीर मंगला के लिए जरूरी क्लब्स का समर्थन जुटाना मुश्किल हुआ

नई दिल्ली । सुधीर मंगला को यह देख/जान कर झटके पर झटके लग रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी के संदर्भ में जिन लोगों ने उन्हें समर्थन और सहयोग का भरोसा दिया था, वह अब उनका समर्थन करने से बचने लगे हैं । सुधीर मंगला के लिए हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि उन्होंने जिन क्लब के समर्थन की खुली घोषणा की थी, उनमें से कई ने उनका समर्थन करने से साफ इंकार कर दिया है । सुधीर मंगला के लिए सबसे बड़ा झटका उन पूर्व गवर्नर्स का रवैया रहा जिन्होंने उनके समर्थन का सिर्फ वायदा ही नहीं किया था, बल्कि खुले तौर पर समर्थन का ऐलान भी किया था । सुधीर मंगला के नजदीकियों का कहना है कि सुधीर मंगला ने जिन पूर्व गवर्नर्स पर भरोसा करके अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, वही पूर्व गवर्नर्स अब उनकी मदद करने के बजाये बहानेबाजी कर रहे हैं । समर्थन की घोषणा करने वाले पूर्व गवर्नर्स के रवैये को देख कर सुधीर मंगला अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा जेके गौड़ को अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने का फैसला करने के बाद, जेके गौड़ के मुकाबले खड़े होने की घोषणा करते हुए सुधीर मंगला ने कई पूर्व गवर्नर्स का समर्थन मिलने का दावा किया था । उन्होंने लोगों को बताया था कि फलाँ फलाँ पूर्व गवर्नर अपने अपने क्लब का समर्थन तो दिलवायेंगे ही, साथ ही अपने समर्थकों के क्लब से भी समर्थन दिलवायेंगे । सुधीर मंगला की इसी तरह की बातें अब उनके लिए मुसीबत बन गईं हैं । सुधीर मंगला जिस भी क्लब से समर्थन की बात करते हैं, उस क्लब के पदाधिकारी उनसे कहते हैं कि पहले अपने समर्थक पूर्व गवर्नर के क्लब का समर्थन दिखाओ, तब हम समर्थन देंगे । समर्थक पूर्व गवर्नर अपने क्लब का समर्थन देने/दिलवाने से यह कह कर बच रहे हैं कि पहले कुछेक क्लब्स का समर्थन तो जुटाओ, हम तब अपने क्लब का समर्थन देंगे/दिलवायेंगे । इस तरह सुधीर मंगला दोनों तरफ से ही 'मारे' जा रहे हैं - 'पहले उनसे' 'पहले उनसे' के चक्कर में सुधीर मंगला को किसी का भी समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है ।
सुधीर मंगला को सबसे तगड़ा झटका विनोद बंसल के रवैये से लगा है । विनोद बंसल ने पिछले रोटरी वर्ष के अनुभव से सबक लेकर इस बार होशियारी से काम लिया, और बदनाम हुए बिना अपनी राजनीति जमाई । विनोद बंसल के लिए सुधीर मंगला को सबक सिखाना जरूरी था - क्योंकि सुधीर मंगला ने उस समय विनोद बंसल को बहुत तंग किया था जब विनोद बंसल उम्मीदवार थे । उस समय, विनोद बंसल की उम्मीदवारी को बाधित करने और नुकसान पहुँचाने के लिए सुधीर मंगला ने हर संभव प्रयास किया था । सुधीर मंगला के उस समय के किये-धरे को विनोद बंसल भूले नहीं हैं और बदला लेने के लिए पूरी तरह से तैयारी किये हुए रहे । पिछले रोटरी वर्ष के अनुभव से सबक लेकर विनोद बंसल इस वर्ष खुल कर कुछ करने से बचे हैं, लेकिन अंदर-खाने उन्होंने उन क्लब्स के पदाधिकारियों को 'अपना' संदेश भिजवा दिया जिन पर सुधीर मंगला का समर्थन करने का शक था । विनोद बंसल चूंकि आने वाले रोटरी वर्ष में गवर्नर होंगे इसलिए लोगों को उनसे डिस्ट्रिक्ट टीम में पद पाने की उम्मीद है । ऐसे में कोई भी नहीं चाहेगा कि वह ऐसा कुछ करे जो विनोद बंसल को बुरा लगे और अगले रोटरी वर्ष में पद पाने की उसकी उम्मीद मारी जाये । इसी कारण से कई क्लब्स ने - जो सुधीर मंगला के समर्थन में देखे/पहचाने जा रहे थे - सुधीर मंगला का समर्थन करने से साफ इंकार कर दिया है ।
सुधीर मंगला और उनके समर्थकों के लिए हैरानी की बात यह बनी हुई है कि जो पूर्व गवर्नर्स उनके प्रति हमदर्दी भी रखते हैं, या विभिन्न कारणों से जेके गौड़ से खुश नहीं हैं - वह भी उनकी उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए कुछ कर क्यों नहीं रहे हैं ? मोटे तौर पर इसके दो कारण समझ में आ रहे हैं - एक कारण तो यह है कि पूर्व गवर्नर्स को रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेताओं के बीच अपनी बदनामी का डर है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव में पक्षपातपूर्ण धांधलियों की शिकायतों को लेकर रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेता काफी गंभीर हैं और धांधलियों पर रोक लगाने के उद्देश्य से जो पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया है - उसके पालन पर उनकी नज़र है । पायलट प्रोजेक्ट के पीछे जो भावना है उसमें नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की प्रक्रिया को हतोत्साहित करने की बात है । ऐसे में, कोई भी पूर्व गवर्नर नहीं चाहेगा कि अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने/करवाने की प्रक्रिया में उसकी सक्रियता या मिलीभगत सामने आये । इसे स्वाभाविक रूप से उसके रोटरी इंटरनेशनल के बड़े नेताओं के खिलाफ खड़े होने के रूप में देखा/पहचाना जायेगा - जिसका प्रतिकूल असर रोटरी इंटरनेशनल से उसे मिल सकने वाले ऐसाइनमेंट पर पड़ सकता है । दूसरा कारण यह है कि अधिकतर पूर्व गवर्नर्स को - जो विभिन्न कारणों से जेके गौड़ से खुश नहीं भी हैं उन्हें भी - विश्वास हो चला है कि लोगों के बीच जेके गौड़ ने जैसी जो पैठ बनाई हुई है उसके कारण जीतना/बनना जेके गौड़ को ही है - इसलिए सुधीर मंगला के पक्ष में सक्रिय दिख कर वह यह बदनामी मोल क्यों लें कि उनकी सक्रियता के बाद भी सुधीर मंगला का कुछ नहीं हुआ । कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने इन पक्तियों के लेखक से अलग अलग बात करते हुए साफ कहा कि उन्होंने जेके गौड़ को पहले ही बता दिया है कि वर्षों के परिचय के कारण उनकी हमदर्दी तो सुधीर मंगला के साथ है, लेकिन वह सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए कुछ करेंगे नहीं - और रोटरी इंटरनेशनल के पायलट प्रोजेक्ट के उद्देश्य तथा उसकी पीछे की भावना का सम्मान रखेंगे । समर्थन में दिखने/समझे जाने वाले पूर्व गवर्नर्स के इस रवैये ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के सामने कठिन मुश्किलें खड़ी कर दी हैं और उनके लिए जरूरी क्लब्स का समर्थन जुटाना लोहे के चने चबाना जैसा हो गया है ।


Sunday, December 2, 2012

आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के धोखे का बदला लेने के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की है क्या ?

गाजियाबाद/नई दिल्ली । आलोक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करके सभी को चौंका दिया है । उनकी दावेदारी से सबसे ज्यादा आश्चर्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा को हुआ है । आलोक गुप्ता इन दोनों को ही अपना बहुत खास मानते रहे हैं और इन्हीं दोनों के भरोसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की मुहीम में कूदे थे । नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने से पहले तक आलोक गुप्ता जो भी करते थे, रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा से पूछ कर या उन्हें बता कर ही करते थे । नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले ने लेकिन संबंधों की इस केमिस्ट्री को पूरी तरह से बदल दिया है । नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के बाद आलोक गुप्ता ने जो पहला फैसला किया - जेके गौड़ के रूप में नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चुनौती देने का और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का फैसला; उसके बाबत उन्होंने रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा को भी पूरी तरह अँधेरे में रखा । इसीलिये उनकी उम्मीदवारी के कागज डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में पहुँचे तो रमेश अग्रवाल भी हैरान रह गए ।
आलोक गुप्ता के इस फैसले ने सभी को हैरान किया है - क्योंकि वह जोर-शोर के साथ घोषणा कर चुके थे कि यदि जेके गौड़ अधिकृत उम्मीदवार चुने गए तो वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । जिन भी लोगों को उनकी इस घोषणा पर भरोसा नहीं होता था और जो उनकी इस घोषणा को एक स्टंट के रूप में देखते/बताते थे, उन्हें वह आश्वस्त करते थे कि वह उसूलों वाले व्यक्ति हैं और भले ही हालात उनकी उम्मीदवारी के कितने भी अनुकूल दिखते हों, लेकिन वह जेके गौड़ की अधिकृत उम्मीदवारी का विरोध नहीं करेंगे । इतनी साफ घोषणा के बावजूद आलोक गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की तो सभी का हैरान होना स्वाभाविक ही है । आलोक गुप्ता अपनी ही घोषणा से क्यों मुकरे हैं - इसे लेकर रहस्य आलोक गुप्ता की चुप्पी के कारण और भी गहरा गया है । राजनीतिक शब्दावली में कहें तो अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बाद से आलोक गुप्ता जैसे अंडरग्राउंड हो गए हैं, और फोन पर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं ।
आलोक गुप्ता का यह व्यवहार किसी की भी समझ से बाहर है - हर कोई मान रहा है कि आलोक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को लेकर यदि वास्तव में गंभीर हैं, तो अंडरग्राउंड रह कर - लोगों से बात करने से बच कर भला कैसे अपनी उम्मीदवारी के लिए काम कर सकेंगे ? इसी कारण से, लोगों का अनुमान है कि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के पीछे आलोक गुप्ता का उद्देश्य रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा की धोखाधढ़ी का बदला लेना है । आलोक गुप्ता नोमीनेटिंग कमेटी में अधिकृत उम्मीदवार चुनने के तौर-तरीके को लेकर पहले ही आपत्ति दर्ज करा चुके हैं । उन आपत्तियों को हालाँकि इसलिए गंभीरता से नहीं लिया गया है क्योंकि उन्होंने अपनी आपत्तियाँ नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के बाद दर्ज कराई हैं । नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के बाद आलोक गुप्ता की जिन भी लोगों से बातें हुईं हैं, उनसे उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल की भूमिका को लेकर अपनी नाराजगी खासी तल्खी के साथ व्यक्त की है । इसी आधार पर समझा जाता है कि आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा से अपने आप को ठगा हुआ पाया है ।
आलोक गुप्ता अक्सर ही दावा किया करते थे कि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा किसी भी कीमत पर जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनता हुआ नहीं देखना चाहते हैं । जेके गौड़ के प्रति रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के विरोध की बातें आलोक गुप्ता जिस विश्वास के साथ बताते/कहते थे, उन पर इसलिए विश्वास किया जाता था क्योंकि उस समय आलोक गुप्ता की नजदीकी रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के साथ सार्वजानिक रूप से देखी जाती थी । मजे की बात यह है कि उन दिनों जेके गौड़ भी कहा/बताया करते थे कि आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पीछे रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा हैं, जिनका उद्देश्य उनके सामने बाधा खड़ी करना है । जेके गौड़ के प्रति रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के रवैये से आलोक गुप्ता खासे उत्साहित थे - लेकिन नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले के बाद उन्होंने पाया/समझा कि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने उन्हें लगातार धोखे में रखा और उन्हें इस्तेमाल किया । आलोक गुप्ता को पता नहीं क्यों यह विश्वास था कि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने दूसरों के साथ भले ही धोखा किया हो, लेकिन उनके साथ धोखा नहीं करेंगे । किंतु अब उन्हें विश्वास हो चला है कि रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा किसी के भी सगे नहीं हो सकते हैं और अपने स्वार्थ के सामने किसी को भी धोखा दे सकते हैं ।
आलोक गुप्ता ने नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला आने के बाद जिन भी लोगों से बात की है उनका अनुमान है कि आलोक गुप्ता अब रमेश अग्रवाल को बदनाम और परेशान करने के अभियान में जुटेंगे - जैसा कि ललित खन्ना ने और सरोज जोशी ने किया । आलोक गुप्ता को भी इस बात का आभास है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव में अब उनके लिए कुछ नहीं बचा है - इसके बावजूद उन्होंने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की है; जाहिर है कि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के पीछे उनका उद्देश्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद का चुनाव नहीं, बल्कि रमेश अग्रवाल की ऐसी-तैसी करना है । इस मामले में भी, आलोक गुप्ता सचमुच कुछ कर पायेंगे या नहीं, और करेंगे तो क्या और कैसे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Saturday, December 1, 2012

संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में गिरीश आहुजा की सक्रियता ने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में खासी खलबली पैदा कर दी है

नई दिल्ली । गिरीश आहुजा ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाले चुनाव में संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके चुनावी माहौल को खासा गर्मा दिया है । संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में गिरीश आहुजा ने जिस तरह निरंतर अभियान चलाया है, उसे और उसके प्रभाव को देख/जान कर दूसरे उम्मीदवार हक्के-बक्के रह गए हैं, और उनके लिए यह समझ पाना मुश्किल हुआ है कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में लगे इस मास्टर स्ट्रोक से बने राजनीतिक माहौल में वह क्या करें ? कुछेक उम्मीदवारों ने कोशिश की कि गिरीश आहुजा उनके समर्थन में भी कहीं कुछ अच्छा कह दें, ताकि लोगों को यह बताया/दिखाया जा सके कि गिरीश आहुजा अकेले संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ ही नहीं हैं - बल्कि उनके साथ भी हैं । गिरीश आहुजा को इसके लिए राजी करने में असफल रहने के बाद उन्होंने चाल चली कि गिरीश आहुजा लोगों के बीच यह कह दें कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ उन्होंने पिछले दिनों जो प्लेटफॉर्म शेयर किया, वह उनकी एक बिजनेस और इंस्टीट्यूशनल एक्सरसाइज थी और उस एक्सरसाइज का सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से या संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी से कोई संबंध नहीं था । गिरीश आहुजा ने लेकिन ऐसा कुछ भी करने से साफ इंकार कर दिया और उनके इस इंकार ने स्पष्ट कर दिया कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में चलाया गया उनका अभियान एक सोचा-समझा अभियान है जिसे उन्होंने प्रोफेशनल तैयारी के साथ क्रियान्वित किया है ।
उल्लेखनीय है कि गिरीश आहुजा पहले भी सेंट्रल काउंसिल के चुनावों में कभी इस तो कभी उस उम्मीदवार का समर्थन करते और उन्हें जिताते रहे हैं - लेकिन अभी तक उन्होंने कभी भी सघन रूप से किसी उम्मीदवार के पक्ष में चुनावी अभियान नहीं चलाया । पहली बार, इस बार गिरीश आहुजा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के समर्थन में जैसा अभियान संयोजित किया है - उसने सभी को हैरान और सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों को परेशान किया है । पंजाब के विभिन्न प्रमुख शहरों में गिरीश आहुजा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ जो साझा मीटिंग्स कीं और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को संबोधित किया, उसने पूरे रीजन में अपना प्रभाव डाला । पूरे रीजन में प्रभाव इसलिए पड़ा, क्योंकि गिरीश आहुजा और संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साझा कार्यक्रम का फायदा उठाने के उद्देश्य से नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कई उम्मीदवार उन मीटिंग्स में शामिल हुए । मजे की बात यह हुई कि सेंट्रल काउंसिल के दूसरे-दूसरे उम्मीदवारों के साथ 'जुड़े' हुए रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार इन मीटिंग्स में शामिल होने के लिए संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के साथ जुड़ने की कोशिश करते देखे/सुने गए । रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की भागीदारी के चलते संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाली गिरीश आहुजा की मीटिंग्स को जोरदार प्रचार मिला ।
संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल के समर्थन में गिरीश आहुजा ने जो मीटिंग्स कीं, उसके साथ-साथ उन्होंने चूँकि अपनी क्लासेस के लिए भी कैम्पेन किया - जिसके चलते जिन भी शहरों में उनके आयोजन हुए वहाँ वह बहुत गहमागहमी के साथ हुए और उनके आयोजनों को अच्छा-खासा प्रचार मिला । गिरीश आहुजा की छात्रों के बीच जो लोकप्रियता और प्रतिष्ठा है, उसका संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल ने जमकर फायदा उठाया । दरअसल गिरीश आहुजा के बहुत से पुराने छात्र जो अब चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के रूप में काम कर रहे हैं, गिरीश आहुजा के शहर में आने/होने की बात सुनकर उनके कार्यक्रमों में आये, जिसका फायदा सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल को मिला । गिरीश आहुजा की डायरेक्ट टैक्सेस में खास विशेषज्ञता है, जिसके चलते डायरेक्ट टैक्सेस में काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनके कार्यक्रम में जुटे । गिरीश आहुजा से अलग-अलग कारणों से प्रभावित होने/रहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने गिरीश आहुजा को जब संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा - तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति उनके बीच भी समर्थन का भाव पैदा हुआ । गिरीश आहुजा के समर्थन के कारण संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी को एक अलग तरह का ऑरा (आभामंडल), एक अलग तरह की विश्वसनीयता और एक अलग तरह की स्वीकार्यता मिली । दरअसल इसीलिये संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी को मिले गिरीश आहुजा के समर्थन ने चुनाव में खासी खलबली पैदा कर दी है ।

काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में नवीन गुप्ता फिसड्डी, तो संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल फर्स्ट

नई दिल्ली । नवीन गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाने के लिए उनके पापा ने तो दिन-रात एक किया हुआ है, लेकिन नवीन गुप्ता को काउंसिल की मीटिंग में शामिल होना ही पसंद नहीं है । नवीन गुप्ता के पापा एनडी गुप्ता से पूछा जाना चाहिए कि उनके बेटे को जब काउंसिल की मीटिंग्स में कोई दिलचस्पी ही नहीं है और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होना वह जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें काउंसिल में चुनवाने को लेकर वह इतना परेशान क्यों हो रहे हैं ? एनडी गुप्ता इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं; इस लिहाज से उनसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह अपने बेटे को काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहने की आवश्यकता और अहमियत बताते/समझाते । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति को लेकर नवीन गुप्ता का जो रिकार्ड है, उसे देख कर लगता है कि या तो उनके पापा ने उन्हें मीटिंग्स में उपस्थित होने की आवश्यकता और अहमियत बताई नहीं है और या पापा के बताये जाने के बावजूद उन्होंने उसे एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया है । यही कारण है कि फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच काउंसिल की कुल हुईं 15 मीटिंग्स में से नवीन गुप्ता नौ मीटिंग्स में गायब रहे ।
'रचनात्मक संकल्प' के पास फरवरी 2010 से जून 2012 के बीच हुईं 15 मीटिंग्स का ब्यौरा है । नवीन गुप्ता इनमें से कुल छह मीटिंग्स में उपस्थित हुए । इन 15 में से जो 5 मीटिंग्स वर्ष 2011 तथा 2012 में हुईं हैं, उनमें से तो एक में भी नवीन गुप्ता शामिल नहीं हुए । यह जान कर हो सकता है कि उन लोगों की नाराजगी कुछ कम हो जाये, जिन्हें शिकायत रही है कि नवीन गुप्ता उनके फोन तक नहीं उठाते हैं और जरूरत पड़ने पर जिनसे संपर्क करना तक मुश्किल होता है । इस तरह की शिकायत रखने वाले लोगों को संतोष हो सकता है कि नवीन गुप्ता को जब काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उनके फोन उठाने में वह क्यों दिलचस्पी लें ? नवीन गुप्ता को पूरा हक़ है कि वह किसी के फोन न उठाये और काउंसिल की मीटिंग्स में शामिल न हों - लेकिन तब उन्हें और उनके पापा को लोगों को यह तो बताना ही चाहिए न कि उन्हें काउंसिल के लिए दोबारा क्यों चुना जाये ? स्कूल-कॉलिज तक में नियम है कि उपस्थिति कम होने पर छात्र को परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाता है । लेकिन इन बाप-बेटे ने इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की हैसीयत ऐसी बना दी है कि इसे स्कूल-कॉलिज से भी गई-बीती हालत में पहुँचा दिया है ।
इंस्टीट्यूट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ऐसी दशा करने के लिए अकेले यही बाप-बेटे जिम्मेदार नहीं हैं - कुछेक दूसरे काउंसिल सदस्यों का रिकॉर्ड भी नवीन गुप्ता से कुछ ही बेहतर है । संदर्भित 15 मीटिंग्स में चरनजोत सिंह नंदा कुल आठ में और पंकज त्यागी नौ में उपस्थित रहे । विनोद जैन ग्यारह मीटिंग्स में उपस्थित हुए, जबकि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल का 13 उपस्थिति के साथ रिकॉर्ड सबसे अच्छा रहा । अमरजीत चोपड़ा भी 13 मीटिंग्स में उपस्थित रहे । काउंसिल की मीटिंग्स का इस कारण से महत्त्व होता है कि उनमें खास मुद्दों पर विचार-विमर्श होता है जिनके आधार पर नीतिगत फैसले होते हैं । काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थिति के मामले में फिसड्डी रहने के बावजूद अपनी सदस्यता को बचाये रखने के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वह जब काउंसिल की मीटिंग्स में उपस्थित रहना जरूरी नहीं समझते हैं तो उन्हें फिर से क्यों चुना जाये ?

     

Friday, November 30, 2012

जीसी मिश्र के साथ की गई अनुज गोयल की चालबाजी ने रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बना दिया है

गाजियाबाद । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट को 'दिखा' 'दिखा' कर सहानुभूति जुटाने में इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्राँच के प्रमुख पदाधिकारी जीसी मिश्र का जैसा जो इस्तेमाल करने की कोशिश की, उसके कारण सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को खासी धमक मिली है । उल्लेखनीय है कि जीसी मिश्र सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थकों में हैं और चुनावी राजनीति की खेमेबाजी में अनुज गोयल के धुर विरोधी हैं । अभी पिछले दिनों ही गाजियाबाद ब्राँच में अनुज गोयल ने जब फर्जी तिकड़मों से अपने भाई जितेंद्र गोयल को को-ऑप्ट करवाया था तो ब्राँच में एक अकेले जीसी मिश्र ने ही उनकी इस भाई-भतीजा वाली कार्यवाई का विरोध किया था । रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल ने मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाया है । लेकिन उम्मीदवार के रूप में मुकेश बंसल की पतली हालत को देखते हुए अनुज गोयल ने उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं और जीसी मिश्र/राघवेन्द्र के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं ।
अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी सामान्य सी चोट पर खुद रो-रो कर और अपनी पत्नी को दूसरों के सामने रुला-रुला कर सहानुभूति जुटाने का जो ड्रामा रचा, उसमें जीसी मिश्र को शामिल करने के पीछे अनुज गोयल की यही समझ काम कर रही थी कि मुकेश बंसल उनके किसी काम नहीं आयेंगे, और उन्हें जीसी मिश्र/राघवेन्द्र की मदद ही लेनी पड़ेगी । अनुज गोयल को सिर्फ सहानुभूति ही जुटानी होती तो उन्हें जीसी मिश्र के नाम का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती । अनुज गोयल किंतु अपनी चोट का दो तरह से फायदा उठाना चाहते थे । एक तरफ तो उन्होंने लोगों के बीच सहानुभूति जुटाने की कोशिश की; और दूसरी तरफ उन्होंने जीसी मिश्र/राघवेन्द्र को अपने साथ दिखाने की चाल चली । अपनी इस चाल के लिए अनुज गोयल ने अपनी पत्नी का इस्तेमाल किया । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट का उपचार हो जाने के कई घंटे बाद अपनी पत्नी से जीसी मिश्र को फोन करवाया । अनुज गोयल की पत्नी ने रोते-रोते जीसी मिश्र को अनुज गोयल के अस्पताल में होने की बात बताई । अनुज गोयल की पत्नी ने जैसा जो बताया उससे ऐसा लगा जैसे अनुज गोयल का कोई भारी एक्सीडेंट हुआ है और वह बड़ी क्रिटिकल स्थिति में हैं । अनुज गोयल की पत्नी का रोना-धोना सुन कर जीसी मिश्र ने राघवेन्द्र को खबर की और दोनों ने ही तय किया कि उनके अनुज गोयल के साथ राजनीतिक रिश्ते भले ही जो भी हों, किंतु इस मुश्किल घड़ी में उन्हें अनुज गोयल की मदद में खड़े होना चाहिए । जीसी मिश्र और राघवेन्द्र तुरंत अस्पताल दौड़े । जीसी मिश्र अपनी पत्नी को भी अपने साथ लाये ।
अस्पताल पहुँच कर जो नजारा इन्होंने वहाँ देखा, तो यह हक्के-बक्के रह गए । चोट का उपचार करा चुके अनुज गोयल फोन पर लोगों को अपने अस्पताल में होने की जानकारी दे रहे थे । कुछेक दूसरे लोग भी फोन पर यही सूचना लगातार प्रचारित करने में लगे हुए थे । वह बाकायदा एक दूसरे से टिप्स ले/दे रहे थे कि फलाँ को फोन हो गया या नहीं । यह नजारा देख कर जीसी मिश्र और राघवेन्द्र ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । इन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि अनुज गोयल ने इन्हें इस्तेमाल किया है । इन्हें लेकिन अनुज गोयल की अगली चाल की भनक नहीं हो पाई । इन्हें यह तो पहले भी पता था, और यह साबित भी हो रहा था कि अनुज गोयल बहुत ही धूर्त किस्म का व्यक्ति है - लेकिन उसकी धूर्तता की हद क्या है, इसका अंदाजा नहीं था । इसका एक आभास तब हुआ जब जीसी मिश्र को पता चला कि उनके नाम से अनुज गोयल की सहानुभूति में एक एसएमएस रीजन के लोगों को भेजा गया है । अनुज गोयल को ऐसा फर्जीवाड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी ? सिर्फ इसलिए ताकि वह रीजन के लोगों को बता/दिखा सकें कि जीसी मिश्र और राघवेन्द्र उनके साथ हैं । अनुज गोयल की यह चालबाजी सामने आते ही जीसी मिश्र ने रीजन के लोगों को एसएमएस करके जानकारी दी कि अनुज गोयल के जो चोट लगी है, उसका उन्हें दुःख है और वह प्रार्थना करते हैं कि अनुज गोयल जल्दी स्वस्थ हों, लेकिन वह लोगों को बताना चाहते हैं कि पहले वाला एसएमएस उन्होंने नहीं किया था ।
जीसी मिश्र के इस एसएमएस से अनुज गोयल की किरकिरी तो खूब हुई - लेकिन उनकी किरकिरी ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी की धमक भी पैदा की । अनुज गोयल ने जो हरकत की, उससे साबित हुआ कि अनुज गोयल भी मान गए हैं कि राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है; लोगों के बीच राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन का फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने जीसी मिश्र के नाम का धोखाधड़ी के साथ इस्तेमाल किया । अनुज गोयल की इस हरकत ने उनके समर्थन के भरोसे उम्मीदवार बने मुकेश बंसल की उम्मीदवारी के लिए अजीब समस्या पैदा कर दी है । रीजन में लोगों को लग रहा है कि मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाने वाले अनुज गोयल को ही जब उन पर भरोसा नहीं रह गया है और अनुज गोयल तीन-तिकड़म से राघवेन्द्र के नजदीकियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं - तो दूसरों को उनसे जुड़ने में फिर क्या दिलचस्पी होगी । अनुज गोयल की इस हरकत से मुकेश बंसल के समर्थकों को भी लग रहा है कि अनुज गोयल ने उनके साथ धोखा किया है । मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को अपने खिलाफ अनुज गोयल का षड़यंत्र बताने वाले विनय मित्तल इस मामले में मजा ले रहे हैं । उन्हें लोगों को यह बताने का मौका मिला है कि अनुज गोयल ने पहले उनके साथ धोखा किया और अब अपने धोखे का शिकार उन्होंने मुकेश बंसल को बनाया है । अनुज गोयल के रवैये को लेकर अनुज गोयल के भूतपूर्व सहयोगी रहे विनय मित्तल के इस तरह के विचार और अनुज गोयल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले मुकेश बंसल के समर्थकों की आशंका ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिलने वाले समर्थन का स्पेस बढ़ाने का ही काम किया है । अनुज गोयल ने अपने स्वार्थ में जीसी मिश्र के साथ जो चालबाजी खेली, उसने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बनाने का ही काम किया है ।

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।

Thursday, November 29, 2012

योगिता आनंद की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी को वापस कराने की हरकत से राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल को मुश्किल में डाला

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल की नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए जीत पक्की करने के लिए उनके सबसे बड़े समर्थक राजेश शर्मा ने योगिता आनंद पर अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के लिए जिस तरह से दबाव बनाया, वह अब बड़े बबाल का रूप लेता जा रहा है । इस मामले में आरके गौड़ की एंट्री होने से मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है । मजे की बात है कि योगिता आनंद इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं, लेकिन उनके समर्थक और शुभचिंतक चुप बैठने को तैयार नहीं हैं; क्योंकि उन्हें डर है कि हरित अग्रवाल के समर्थक ऐन मौके पर उनकी उम्मीदवारी को लेकर कहीं कोई समस्या खड़ी न कर दें; इसलिए वह मामले को ऐसा बना देना चाहते हैं कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के सामने योगिता आनंद की उम्मीदवारी के खिलाफ कुछ करने का कोई मौका ही न बचे । इस कोशिश में योगिता आनंद के कुछेक समर्थकों ने आरके गौड़ से संपर्क किया । उल्लेखनीय है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - खास कर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान ऐसी है कि अन्याय और बेईमानी और मनमानीपूर्ण दादागिरी के खिलाफ लड़ाई में किसी को भी मदद की जरूरत होती है तो वह सबसे पहले आरके गौड़ का फोन लगाता है । आरके गौड़ भी मदद के लिए तुरंत हाज़िर हो जाते हैं । इस मामले में भी ऐसा ही हुआ ।
आरके गौड़ लेकिन, चूंकि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार भी हैं, इसलिए मामले में उनके पड़ते ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है । मामले ने राजनीतिक रंग इसलिए भी ले लिया, क्योंकि जिन राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल की मदद करने के लिए योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने का बीड़ा उठाया, वह राजेश शर्मा सेंट्रल काउंसिल के लिए चरनजोत सिंह नंदा की उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए बताये जा रहे हैं । मजे की बात यह है कि आरके गौड़ को इस मामले में अभी तक कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी है - योगिता आनंद के समर्थकों को उन्होंने सिर्फ आश्वस्त भर किया है कि वह चिंता न करें और परेशान न हों - योगिता आनंद की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम नहीं हो सकेगा । यूँ तो यह बात हर कोई कहता जिससे भी योगिता आनंद के समर्थक गुहार लगाते । किंतु अभी यह बात चूँकि आरके गौड़ ने - सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार आरके गौड़ ने कही है - और सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे उम्मीदवार चरनजोत सिंह नंदा के समर्थक समझे जाने वाले लोगों के संदर्भ में कही है; इसलिए उक्त मामला बड़ा हो गया है ।
आरके गौड़ की एंट्री के बाद, योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने की मुहिम में जुटे राजेश शर्मा के लिए सचमुच मुसीबत हो गई है कि अब वह क्या करेंगे ? राजेश शर्मा ने जो किया, उसे लेकर हरित अग्रवाल के दूसरे समर्थकों के बीच हालाँकि नाराजगी है - उनका मानना और कहना है कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है, इसलिए राजेश शर्मा को ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी विवाद में फँसे और कमजोर नज़र आये । राजेश शर्मा नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके हैं - इसलिए इस तरह की हरकत की उनसे उम्मीद नहीं की जाती है । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव घटिया हरकतों के कारण लगातार विवादस्पद होते जा रहे हैं - पिछली बार बूथ केप्चरिंग तक की हरकत हो गई थी और इस बार उम्मीदवार को डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने का प्रयास करने का मामला सामने आया है । गंभीर बात यह है कि इस तरह के मामलों में बड़े पदों पर रहे लोगों के नाम आरोपियों के रूप में सामने आये हैं - बूथ केप्चरिंग में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन अनुज गोयल का नाम है तो डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने के मामले में नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन राजेश शर्मा का नाम है ।
राजेश शर्मा की इस हरकत ने हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को सवालों के घेरे में ला दिया है । लोगों के बीच सवाल पैदा हो रहे हैं कि हरित अग्रवाल क्या इसी तरह की घटिया हरकतों के भरोसे चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं; और कि हरित अग्रवाल भी क्या इसी तरह की हरकतें करेंगे जैसी कि राजेश शर्मा कर रहे हैं ? हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों का ही कहना है कि योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने के लिए राजेश शर्मा ने जो किया है, हरित अग्रवाल को उसके लिए सार्वजानिक रूप से माफी मांग लेनी चाहिए, ताकि इस कारण से होने वाली बदनामी उनका कोई नुकसान न करे । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के बीच राजेश शर्मा की भूमिका को लेकर पहले से ही संदेह रहा है और हरित अग्रवाल के ही समर्थक कहते रहे हैं कि राजेश शर्मा समर्थक के भेष में विरोधी की भूमिका निभा रहे हैं । अब फिर हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों ने सुझाव दिया है कि हरित अग्रवाल को राजेश शर्मा से हाथ जोड़ कर एक यह अहसान करने के लिए कहना चाहिए कि अब वह उन पर कोई अहसान न करें ।  

Wednesday, November 28, 2012

अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ 'चुनावी' काम कर रहे और कुछ ही दिन बाद उनके यहाँ से निकाले जाने की आशंका से घिरे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले अतुल कुमार गुप्ता को अपने ही लोगों से गंभीर चुनौती मिलने से एक अजीब तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ अलग-अलग रूपों में नौकरी करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स दूसरों के सामने अपना दुखड़ा रोते सुने गए हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ उनकी नौकरी तो बस चुनाव तक ही है और चुनाव हो जाने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल ही दिया जाना है । उल्लेखनीय है कि अतुल कुमार गुप्ता ने पिछले कुछेक महीनों में कई युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने यहाँ नौकरी पर रखा है - ऐसा करते हुए उन्होंने दिखाने/जताने का प्रयास यह किया था कि उन्हें युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की कितनी फिक्र है; और कि उन्हें जैसे ही कुछ करने का मौका मिलेगा वह युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए करेंगे । उन्होंने दिखाया/जताया कि उन्हें अपने काम - अपने प्रोफेशनल काम के लिए जैसे ही लोगों की जरूरत महसूस हुई, उन्होंने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को चुना तथा उन्हें मौका दिया । लेकिन अब पोल खुल रही है कि उन्होंने अपने प्रोफेशनल काम के लिए नहीं, बल्कि अपने चुनावी काम के लिए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने यहाँ नौकरी दी हुई है ।
अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने दोस्तों व नजदीकियों के बीच कहते/शिकायत करते हुए सुना गया है कि उनसे प्रोफेशनल काम तो कोई कराया ही नहीं जाता है, उनसे तो सिर्फ चुनावी काम ही कराया जाता है । उनके यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ही अनुसार, प्रोफेशनल काम के लिए अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ पहले से ही पर्याप्त नेटवर्क था और उन्हें उतने लोगों की जरूरत थी ही नहीं, जितने कि उन्होंने रख लिए हैं । इस बीच उनके काम में इतना और ऐसा इजाफा भी नहीं हुआ है कि उन्हें कई लोगों की जरूरत पड़े; उनका काम सिर्फ इस रूप में ही बढ़ा है कि वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हो गए हैं - जिस कारण उनकी व्यस्तता बढ़ गई और चुनावी काम के लिए उन्हें हेल्पिंग हेंड्स की जरूरत पड़ी । इसलिए पिछले दिनों एक साथ काम पर रखे गए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स किन्हीं प्रोफेशनल कामों में नहीं, बल्कि चुनावी काम में लगाये गए हैं । चुनावी काम मुश्किल से दस दिन का और बचा है - इसलिए अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को चिंता होने लगी है और वह समझ रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ उनके दिन अब गिने-चुने ही बचे हैं । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स चूंकि अपनी चिंता दूसरे लोगों के बीच व्यक्त कर रहे हैं इसलिए अतुल कुमार गुप्ता का खेल बिगड़ रहा है । अतुल कुमार गुप्ता ने यह जो खेल किया है, पिछले चुनाव में यही खेल सुधीर कुमार अग्रवाल ने भी किया था - लेकिन उम्मीदवार के रूप में उन्हें इसका कोई फायदा नहीं हुआ था । अतुल कुमार गुप्ता के लिए मुश्किल कुछ ज्यादा इसलिए है क्योंकि उन्होंने अपने आप को बहुत जेनुइन रूप में पेश किया और यह दिखाने/जताने का प्रयास किया कि उन्हें प्रोफेशन की और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सचमुच बड़ी फ़िक्र है - लेकिन उनके यहाँ काम पर रखे गए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हवाले से जो बातें सामने आ रही हैं वह बता रही हैं कि अतुल कुमार गुप्ता युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे और कुछ ही दिन बाद उनके यहाँ से निकाले जाने की आशंका से घिरे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कह भी रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ होने की बजाये वह यदि अन्य किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के यहाँ नौकरी करते तो इतने दिनों में प्रोफेशन से जुड़ी बारीकियों को समझते/पहचानते, अनुभव प्राप्त करते और अपने कैरियर में कुछ कदम आगे बढ़ चुके होते । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करते हुए, उनके चुनाव अभियान से जुड़े काम करते हुए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने ठगे जाने का अहसास हो रहा है, क्योंकि इतने दिन काम करने के बदले में उन्हें कुछ भी मिलने नहीं जा रहा है - उनके लिए अपनी नौकरी तक बचा पाना भी मुश्किल ही होगा ।
अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का यह 'अहसास' और मुखर रूप में प्रकट की जा रही उनकी चिंता अतुल कुमार गुप्ता के लिए मुसीबत बन गई है । उन्हें और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को लग रहा है कि इस तरह की बातें युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अतुल कुमार गुप्ता की स्थिति को कमजोर करेंगी । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स यदि अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, और मान रहे हैं तथा दूसरे लोगों से बता भी रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता ने अपने चुनावी लाभ के लिए उन्हें इस्तेमाल किया है और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, तो चुनाव में वोट देने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर कोई अच्छा असर तो नहीं ही पड़ेगा और अतुल कुमार गुप्ता को नुकसान ही पहुंचाएगा ।

Tuesday, November 27, 2012

नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राधेश्याम बंसल के 'काम' को ही, उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है

नई दिल्ली । राधेश्याम बंसल की अति-सक्रियता ही रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उनकी जैसे दुश्मन बन गई लगती है । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उनकी जोरदार सक्रियता ने उन्हें जीत की तरफ तो बढ़ाया है, लेकिन उनके विरोधियों को भी आक्रामक होने के लिए उकसाया है । उन्हें सफलता की तरफ बढ़ता देख कर उनके कामकाज को लेकर उन्हें घेरने के प्रयास उनके विरोधियों ने तेज कर दिए हैं । राधे श्याम बंसल को एंट्री का काम करने वाला बताते हुए लोगों के बीच सवाल किया जा रहा है कि ऐसे लोग काउंसिल में आयेंगे तो इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन के लिए आखिर करेंगे क्या ?
राधेश्याम बंसल इस बार दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं । पिछली बार भी उन्होंने रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था और एक बड़े स्टडी सर्किल का सदस्य होने के बावजूद वह चुनाव हार गए थे । पिछली बार की अपनी हार के लिए उन्होंने अपने ही स्टडी सर्किल के मुखिया सुधीर अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया था । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके सुधीर अग्रवाल पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार थे । राधेश्याम बंसल का आरोप रहा कि सुधीर अग्रवाल ने स्टडी सर्किल के जरिये होने वाली राजनीति का सारा और एकतरफा इस्तेमाल अपने लिए किया, और उन्हें उसका फायदा नहीं लेने दिया । सुधीर अग्रवाल अपना चुनाव भी नहीं जीत पाए और राधेश्याम बंसल को भी हार का सामना करना पड़ा । राधेश्याम बंसल भी मानते थे और दूसरे लोगों ने भी माना कि स्टडी सर्किल के जरिये होने वाली राजनीति का इस्तेमाल यदि राधेश्याम बंसल के लिए भी होता तो राधेश्याम बंसल तो अपनी सीट निकाल ही सकते थे ।
यह 'समझने' के बाद राधेश्याम बंसल ने पहला काम यह किया कि सुधीर अग्रवाल की मुखियागिरी में चलने वाले स्टडी सर्किल को छोड़ कर अपना अलग एक स्टडी सर्किल बनाया । इस बार का नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चुनाव उन्होंने अपने भरोसे लड़ने की तैयारी की और धुआँधार अभियान संयोजित किया । रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों में राधेश्याम बंसल का चुनाव अभियान सबसे ज्यादा तड़क-भड़क वाला रहा है और उन्होंने शुरू से ही पार्टियों पर खासा जोर दिया । जाहिर है कि उन्होंने अपने चुनाव अभियान में काफी पैसा खर्च किया है । एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें इससे लाभ भी हुआ है । उन्हें जीतते हुए उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा है ।
राधेश्याम बंसल के इसी लाभ ने लेकिन उनके सामने मुश्किलें भी खड़ी कर दी हैं । दूसरे उम्मीदवारों ने लोगों के बीच कहना शुरू किया है कि राधेश्याम बंसल पैसे के बल पर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं । उनके खिलाफ उनके काम को ही हथियार बनाया जा रहा है । कहा/बताया जा रहा है कि वह एंट्री का काम करते हैं और इस कारण उन्हें इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ पता ही नहीं है और उनके लिए काउंसिल में कुछ कर पाना संभव ही नहीं होगा । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा दशा और दिशा का हवाला देते हुए तर्क दिया जा रहा है कि प्रोफेशन की चुनौतियों से अनजान लोग यदि काउंसिल में जाते हैं तो फिर वह काउंसिल का कबाड़ा ही करते हैं । इस तरफ की बातों ने राधेश्याम बंसल के सामने आकस्मिक रूप से मुश्किल तो खड़ी कर ही दी है । 

Monday, November 26, 2012

नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राजेंद्र नारंग ने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये हैं

नई दिल्ली/हिसार । राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में जो आवाजें सुनी जा रही हैं, उन आवाजों के शोर में रीजनल काउंसिल के कुछेक उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी के नारे धीमे पड़ते देखे जा रहे हैं, जो हिसार-सिरसा-भिवानी-रोहतक क्षेत्र के वोटों पर निगाह लगाये हुए थे । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के लिए कुछेक उम्मीदवारों ने तो सिर्फ इसी क्षेत्र के वोटों के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, तो जिन लोगों ने जीतने के लिए बड़ा दांव चला हुआ है उनकी नज़र भी इस क्षेत्र के वोटों पर रही है । लेकिन राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे समर्थन ने सभी के गणित बिगाड़ दिए हैं । मजे की बात है कि शुरू में कोई भी राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहा था । राजेंद्र नारंग ने पिछले दो चुनावों में भी अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया था, किन्तु वह सफल नहीं हो पाए थे । पिछले चुनाव में हालाँकि वह बहुत ही मामूली अंतर से पिछड़ गए थे - लेकिन चूंकि वह लगातार दूसरी बार पिछड़े थे, इसलिए इस बार शुरू में उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । इसीलिये उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के बावजूद कई एक उम्मीदवारों को उनके समर्थन आधार वाले क्षेत्र से वोट मिलने का भरोसा था । ऐसा भरोसा रखने वाले लोगों का मानना और कहना था कि दो बार पिछड़ने के कारण राजेंद्र नारंग के प्रति समर्थन का भाव उनके अपने समर्थन-आधार क्षेत्र में बुरी तरह घट गया है - क्योंकि अब उनके अपने बहुत खास लोग भी यह विश्वास करने को तैयार नहीं हैं कि वह जीतने लायक समर्थन जुटा सकेंगे ।
राजेंद्र नारंग को कम आंकने वाले लोगों ने लेकिन इस बात की पूरी तरह अनदेखी की कि दो बार असफल रहने के बावजूद राजेंद्र नारंग ने हिम्मत नहीं हारी है और अपनी असफलताओं से सबक लेकर उन्होंने काफी पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है । उन्होंने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये । यही कारण रहा कि जब चुनावी भाग-दौड़ सचमुच शुरू हुई तो राजेंद्र नारंग को कमजोर आँक रहे लोगों को यह देख कर तगड़ा झटका लगा कि राजेंद्र नारंग को न सिर्फ अपने समर्थकों से और ज्यादा जोश के साथ समर्थन मिल रहा है, बल्कि उनके सक्रिय समर्थकों की संख्या भी बढ़ी है । राजेंद्र नारंग ने इस बार एक बड़ा काम यह किया कि उन्होंने रीजन के बड़े सेंटर्स में अपनी पहचान बनाने पर जोर दिया । पंजाब और हरियाणा में आने वाली प्रमुख ब्रांचेज में अपनी पैठ बनाने सा साथ-साथ राजेंद्र नारंग ने दिल्ली में भी अपने समर्थकों को सक्रिए होने ही नहीं, 'दिखने के लिए भी प्रेरित करने का काम किया । उनकी इस तैयारी ने असर दिखाया; जिसका नतीजा यह निकला कि उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन का भाव तो पैदा हुआ ही, उनकी उम्मीदवारी का ऑरा (आभामंडल) भी बना । यही वजह है कि नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जिन उम्मीदवारों की जीत को सुनिश्चित समझा जा रहा है उनमें राजेंद्र नारंग का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है ।

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।

Saturday, November 24, 2012

जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की जीत की तरफ बढ़ता देख कर मुकेश अरनेजा ने गिरगिट की तरह रंग बदल कर उनका समर्थन करना शुरु कर दिया है

नई दिल्ली । जेके गौड़ के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से खिसिआये और निराश हुए लोगों को यह देख कर 'उम्मीद' बनी है कि मुकेश अरनेजा अब जेके गौड़ के समर्थन में कूद पड़े हैं । यह अब जगजाहिर बात हो चुकी है कि मुकेश अरनेजा जिसके दोस्त हो जाते हैं, उस बिचारे को दुश्मनों की जरूरत नहीं रह जाती - मुकेश अरनेजा की दोस्ती ही उसका काम तमाम कर देती है । हाल के दिनों में रवि चौधरी के साथ जो हुआ, और फिर अभी आलोक गुप्ता के साथ जो हुआ - उसमें इसके संकेत और सुबूत देखे जा सकते हैं । पिछले रोटरी वर्ष में रवि चौधरी को कई लोगों ने समझाया था कि मुकेश अरनेजा के साथ रहोगे तो निश्चित ही डूबोगे । इस वर्ष आलोक गुप्ता को कई लोगों ने रवि चौधरी के अनुभव से सबक लेने की नसीहत दी थी - लेकिन इन दोनों ने किसी की नहीं सुनी और मुकेश अरनेजा के समर्थन की कीमत चुकाई । इसी आधार पर, मुकेश अरनेजा को जेके गौड़ के समर्थन में जाता देख कर उन लोगों की बाँछे खिल गई हैं जो जेके गौड़ को सफल होते हुए नहीं देखना चाहते हैं ।
मुकेश अरनेजा को जेके गौड़ के समर्थन में आया देख कर उनके समर्थकों और शुभचिंतकों को भी चिंता हुई है कि मुकेश अरनेजा के कारण जेके गौड़ का बना/बनाया काम कहीं बिगड़ न जाये । जेके गौड़ के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए हैरानी की बात यह भी है कि जेके गौड़ के नोमीनेट होने के पहले तक मुकेश अरनेजा से जब भी समर्थन की बात की जाती थी, तब तो वह टाल-मटोल करते थे, और कभी रवि चौधरी तो कभी आलोक गुप्ता का समर्थन करने की बात करते थे - लेकिन जेके गौड़ के नोमीनेट होते ही मुकेश अरनेजा ने गिरगिट को भी मात देने वाले अंदाज़ में रंग बदला और जेके गौड़ के सबसे बड़े समर्थक बन गए । मुकेश अरनेजा ने यह रंग क्यों बदला ? उन्हें जानने वालों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने चूंकि भांप लिया है कि इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद का चुनाव जेके गौड़ ही जीतने जा रहे हैं, इसलिए उन्होंने बिना देर किये जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है - ताकि उनकी जीत का श्रेय वह ले सकें और लोगों को बता सकें कि उन्होंने जेके गौड़ को जितवा दिया ।
एक सच्चे नेता में और एक टुच्चे नेता में यही प्रमुख अंतर बताया/पाया जाता है कि एक सच्चा नेता जिसके साथ होता है उसे जितवाने का प्रयास करता है और असफल होने पर अपनी कमजोरियों का मूल्यांकन करता है; जबकि टुच्चा नेता होता किसी और के साथ है लेकिन जब जीतता हुआ कोई और दिखता है तो झट से पाला बदल कर जीतते हुए के साथ हो जाता है ।
मुकेश अरनेजा के लिए लोगों का कहना है कि यदि वह सचमुच में इतने जिताऊ नेता हैं तो अपने क्लब के ललित खन्ना को जितवाने में क्यों नहीं जुटते ? ललित खन्ना न सिर्फ उनके क्लब के हैं, बल्कि उनके बड़े खास भी रहे हैं और उनके प्रेरित करने के चलते ही उम्मीदवार बने हैं । मुकेश अरनेजा लेकिन उनकी कोई बात ही नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि ललित खन्ना के जीतने के कोई चांस नहीं हैं ।
मुकेश अरनेजा अब कोई सच्चे नेता तो हैं नहीं, जो हारते नज़र आ रहे उम्मीदवार के साथ हों - भले ही वह उनके क्लब का हो, उनका बड़ा खास हो और उनके प्रेरित करने पर ही उम्मीदवार बना हो ! मुकेश अरनेजा को तो जीतने वाले उम्मीदवार के साथ दिखना है - ताकि वह लोगों को बता और जता सकें कि उसे उन्होंने जितवाया है ।
मुकेश अरनेजा ने अपनी नेतागिरी चलाने के लिए जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है, इससे लेकिन जेके गौड़ की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को चिंता हो गई है । उन्हें डर यह हुआ है कि मुकेश अरनेजा के आगे आने के कारण कई दूसरे प्रमुख नेता बिदक सकते हैं और जेके गौड़ की उम्मीदवारी से हाथ खींच सकते हैं - और तब कहीं जेके गौड़ का बना/बनाया काम ख़राब न हो जाये । जेके गौड़ के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि जेके गौड़ ने बिना किसी नेता के समर्थन के - अपनी सक्रियता और अपने व्यवहार से लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है, तथा दूसरे उम्मीदवारों से आगे बढ़े हैं । उन्हें डर हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए जेके गौड़ का जो दावा मजबूत हुआ है, वह कहीं मुकेश अरनेजा की टुच्चाई के कारण कमजोर न पड़ जाये ।

अरूण आनंदगिरी के कारण शिवाजी जावरे को जो फजीहत झेलनी पड़ी है, उसका फायदा सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में सुधीर पंडित को मिलता नजर आ रहा है

पुणे। सुधीर पंडित की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी को पुणे की प्रमुख चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्म्स का जिस तरह समर्थन मिलता दिख रहा है, उससे शिवाजी जावरे के लिए अपनी सीट बचाने का संकट पैदा हो गया नजर आ रहा है । शिवाजी जावरे के लिए संकट इसलिए और गंभीर है क्योंकि सुधीर पंडित को जिन फर्म्स का समर्थन मिल रहा है उन्होंने पिछली बार शिवाजी जावरे का समर्थन किया था । शिवाजी जावरे के ही समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि शिवाजी जावरे को अपनी सीट बचाने के लिए नये समर्थन आधार तलाशने होंगे तथा और ज्यादा मेहनत करना होगी । उल्लेखनीय है कि शिवाजी जावरे का सेंट्रल काउंसिल का कार्यकाल खासा विवादपूर्ण रहा है, जिस कारण लोगों के बीच उनकी साख काफी घटी है । शिवाजी जावरे के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि लोगों के बीच उनकी सिर्फ साख ही नहीं घटी है, बल्कि उनके कई समर्थक व शुभचिंतक तक उनके खिलाफ हो गये हैं । पिछली बार सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में उन्हें वोट देते हुए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को उम्मीद थी कि वह उनके लिए ऐसा कुछ करेंगे जिससे कि उनके लिए काम के और अवसर पैदा हों तथा प्रोफेशन में उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका मिले । शिवाजी जावरे लेकिन ऐसा कुछ कर सकने में असफल रहे । उनकी इस असफलता ने उन युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बहुत निराश किया, जो उनसे खास उम्मीद लगाये बैठे थे । शिवाजी जावरे के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को निराश करने के साथ साथ लोगों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाये रखने तक में वह पिछड़ गये । हालत यह हुई कि लोगों के बीच, अपने प्रोफेशन के लोगों के बीच उनके संबंधों का मैनेजमेंट पूरी तरह बिगड़ गये ।
शिवाजी जावरे को इस बिगड़े मैनेजमेंट के कारण ही पुणे में आयोजित वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की डायमंड जुबली कांफ्रेंस में उस समय काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने उनकी तरफ इशारा करते हुए पुणे के अत्यंत सक्रिय चार्टर्ड एकाउंटेंट अरूण आनंदगिरी के साथ की गई बदतमीजी के लिए सार्वजनिक रूप से भर्त्सना की । शिवाजी जावरे पर आरोप रहा कि उन्होंने अरूण आनंदगिरी को शारीरिक चोट पहुंचवाने का प्रयास किया । अरूण आनंदगिरी ने इस आशय का एक शिकायत पत्र इंस्टीट्यूट को भेजा और शिवाजी जावरे के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की । शिवाजी जावरे की तरफ से अरूण आनंदगिरी पर उक्त शिकायत पत्र को वापस लेने के लिए तरह.तरह से दबाव डाला जा रहा था । शिवाजी जावरे की उपस्थिति में अरूण आनंदगिरी पर हुए हमले को इसी दबाव के तहत देखा/पहचाना जा रहा था । शिवाजी जावरे ने इस संबंध में पूछे जाने पर पत्रकारों के बीच यह तो स्वीकार किया कि उनके खिलाफ की गई शिकायत को लेकर उनके कुछेक समर्थकों ने नाराजगी व्यक्त की थी; लेकिन उन्होंने कहा कि उनकी नाराजगी का निशाना अरूण आनंदगिरी नहीं थे । रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने अरूण आनंदगिरी पर हुए हमले की भर्त्सना करते हुए पत्रकारों को बताया था कि अरूण आनंदगिरी की शिकायत को लेकर उन्होंने इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष से बात की है और अध्यक्ष ने उन्हें आश्वस्त किया है कि वह तथ्यों को देखेंगे और जल्दी ही उचित कार्रवाई करेंगे । कार्रवाई क्या होनी थी - यह तो सभी को पता था । शिवाजी जावरे इस बात पर तो राहत महसूस कर सकते हैं कि अरूण आनंदगिरी की शिकायत पर इंस्टीट्यूट में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन अरूण आनंदगिरी ने जो कुछ किया - उसके चलते शिवाजी जावरे की फजीहत बहुत हुई । फजीहत का कारण यह रहा कि तकनीकी आधार पर तो शिवाजी जावरे के खिलाफ मामला नहीं बना; लेकिन शिवाजी जावरे के खिलाफ जो आरोप रहा उसका एक नैतिक पक्ष है, जहां शिवाजी जावरे फँसे दिखते हैं ।
अरूण आनंदगिरी का आरोप था कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने के कारण शिवाजी जावरे की कोचिंग संस्था जावरे’ज प्रोफेशनल एकेडमी प्राइवेट लिमिटेड को इंस्टीट्यूट की पुणे ब्रांच से ट्रेनिंग कांट्रेक्ट नहीं मिलना चाहिए था । यह नैतिक आदर्शों के खिलाफ था और यह दर्शाता है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में शिवाजी जावरे अपने पद का दुरूपयोग कर रहे हैं । शिवाजी जावरे का लेकिन कहना रहा कि उक्त कांट्रेक्ट उन्हें जब मिला था, तब वह इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य नहीं थे । शिवाजी जावरे का कहना बिल्कुल सही है - लेकिन पेंच यह है कि शिवाजी जावरे जब सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बन गये, तब उन्होंने उक्त कांट्रेक्ट को छोड़ा क्यों नहीं या पुणे ब्रांच ने उनका कांट्रेक्ट रद्द क्यों नहीं किया ? वह रद्द तब हुआ, जब अरूण आनंदगिरी ने इंस्टीट्यूट में इसकी शिकायत की । इंस्टीट्यूट ने अरूण आनंदगिरी की शिकायत मिलने पर शिवाजी जावरे का कांट्रेक्ट तो रद्द कर दिया, लेकिन शिवाजी जावरे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की । इस संबंध में इंस्टीट्यूट ने बड़ा मजेदार जबाव दिया । इंस्टीट्यूट के सचिव ने बताया कि इस तरह के मामलों को लेकर चूंकि स्पष्ट नियम नहीं हैं, इसलिए इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है । मजे की बात यही है कि इंस्टीट्यूट जब यह मान रहा है कि कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है, तो फिर उसने उक्त कांट्रेक्ट रद्द क्यों कर दिया ? ‘कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती’ का तर्क देने वाले इंस्टीट्यूट ने लेकिन कार्रवाई तो की - आरोप यह है कि उसने अधूरी कार्रवाई की । जाहिर तौर पर इंस्टीट्यूट ने यह तो माना कि ‘अपराध’ हुआ है, लेकिन उसने इस सवाल पर धूल डाल दी कि अपराध किया किसने है ? इंस्टीट्यूट ने शिवाजी जावरे का कांट्रेक्ट रद्द करके यह तो मान ही लिया कि शिवाजी जावरे के पास उक्त कांट्रेक्ट का होना गलत था - लेकिन वह इस गलती के लिए जिम्मेदारी तय नहीं करना चाहता । अरूण आनंदगिरी का कहना यही था कि इंस्टीट्यूट को अधूरा फैसला नहीं करना चाहिए; उसने जब मान लिया है कि शिवाजी जावरे के पास जो कांट्रेक्ट था, वह नहीं होना चाहिए था - इसीलिए उसने शिवाजी जावरे को मिले कांट्रेक्ट को रद्द किया/करवाया; तो फिर इस गलती के लिए वह जिम्मेदारी तय करने से बचने की कोशिश क्यों कर रहा है ? अरूण आनंदगिरी के इस सवाल ने शिवाजी जावरे को इंस्टीट्यूट से क्लीन चिट मिलने के बावजूद आरोपों के घेरे में चूंकि फंसाये रखा, इसलिए शिवाजी जावरे का परेशान होना और भड़कना स्वाभाविक ही था ।
अरूण आनंदगिरी को चुप कराने के लिए शिवाजी जावरे को तब गुंडागर्दी का सहारा लेने का उपाये ही सूझा । उनकी मौजूदगी में कुछेक लोगों ने अरूण आनंदगिरी को धमकाने और शिवाजी जावरे के खिलाफ की गई शिकायत को वापस लेने के लिए दबाव बनाने का काम किया और अरूण आनंदगिरी को शारीरिक चोट पहुंचाने की कोशिश की । इस घटना से शिवाजी जावरे के लिए बात और बिगड़ गई । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के उनके जैसे सदस्य के लिए यह वास्तव में शर्मिंदगी की बात रही कि उनके अपने शहर पुणे में आयोजित हो रही वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की डायमंड जुबली कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने उनकी तरफ इशारा करते हुए अरूण आनंदगिरी के साथ की गई बदतमीजी के लिए सार्वजनिक रूप से भर्त्सना की । इस प्रसंग से जो एक बात साबित हुई वह यह कि शिवाजी जावरे को प्रतिकूल स्थितियों से निपटना नहीं आता है, और प्रतिकूल स्थितियों से निपटने की कोशिश में वह अपनी फजीहत और करा लेते हैं । यहाँ यह रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में अरूण आनंदगिरी ने भी सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, लेकिन चुनावी जीत उनके मुकाबले शिवाजी जावरे को मिली । शिवाजी जावरे लेकिन अपनी जीत का बड़प्पन नहीं बनाये रख सके । इसी का नतीजा यह हुआ है कि अरूण आनंदगिरी से चुनावी मुकाबला जीत जाने वाले शिवाजी जावरे उन्हीं अरूण आनंदगिरी से सामाजिक पहचान और छवि की लड़ाई में ‘पिट’ गये । अरूण आनंदगिरी ने उन्हें पुणे से लेकर दिल्ली तक ऐसा घेरा कि वह उस घेरे से निकलने की कोशिश में - अपने ऐटीट्यूड के चलते - बल्कि फँसते और चले गये । शिवाजी जावरे ने अपने इसी ऐटीट्यूट के कारण अपने कई साथियों को अपने खिलाफ कर लिया है ।
शिवाजी जावरे के लिए समस्या की बात यह हुई है कि उनके खिलाफ हुए उनके साथी सुधीर पंडित के साथ खड़े नजर आ रहे हैं । अरूण आनंदगिरी के कारण शिवाजी जावरे को जो फजीहत झेलनी पड़ी है, उसका फायदा तो सुधीर पंडित को मिलने की उम्मीद बनी ही है; शिवाजी जावरे ने अपने ऐटीट्यूड के कारण अपने जो नये दुश्मन बना लिए हैं उनके सुधीर पंडित के साथ जा खड़े होने के कारण शिवाजी जावरे की मुश्किलें और बढ़ गई हैं । को-ऑपरेटिव क्षेत्र में अपनी संलग्नता के चलते सुधीर पंडित की पुणे में और आसपास के शहरों में काफी सक्रियता रही है । इस क्षेत्र में अग्रणी जनता सहकारी बैंक के डायरेक्टर के रूप में सुधीर पंडित की भूमिका की इस नाते काफी प्रशंसा रही है कि कभी संकट से जूझ रहे इस बैंक को न सिर्फ संकट से उबारने में बल्कि उसे इस क्षेत्र के प्रमुख सहकारी बैंक के रूप में स्थापित करने में उन्होंने न सिर्फ महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भूमिका निभाई है । जनता सहकारी बैंक के संदर्भ में इस भूमिका के कारण सुधीर पंडित की लोगों के बीच खासी साख है, जो अब इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उनके काम आ रही है । सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में सुधीर पंडित को अपनी साख का फायदा तो मिलता दिख ही रहा है, साथ ही शिवाजी जावरे के प्रति लोगों के बीच बढ़ी नाराजगी व निराशा के कारण भी उन्हें लोगों के बीच समर्थन मिलता नजर आ रहा है । सुधीर पंडित के लिए चुनौती बस सिर्फ यही है कि वह इस समर्थन को वोट में कैसे बदलें ?

Thursday, November 22, 2012

निहार जम्बूसारिया को रिलायंस कनेक्शन के जाल में घेरने और फँसाने की तरूण घिया की रणनीति ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है

मुंबई। तरूण घिया ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को जीत में बदलने के लिए कंपनी प्रतिनिधियों के खिलाफ जो अभियान छेड़ा/छिड़वाया हुआ है, उसने निहार जम्बुसारिया की उम्मीदवारी के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी है। उल्लेखनीय है कि तरूण घिया और उनके समर्थक अलग.अलग तरीकों से लोगों को आगाह कर रहे हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उन्हें ऐसे उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करना चाहिए जो किन्हीं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका तर्क है कि कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार सेंट्रल काउंसिल में पहुंच जाते हैं तो वहाँ वह इंस्टीट्यूट के और या प्रोफेशन के हितों का ध्यान नहीं रखते हैं, बल्कि अपनी कंपनी के हितों के अनुसार काम करते हैं। तरूण घिया के इस अभियान के निशाने पर निहार जम्बुसारिया को देखा/पहचाना जा रहा है। तरूण घिया और निहार जम्बुसारिया के बीच कुछ पुरानी खुन्नस की लोगों के बीच पहले से भी चर्चा है। रीजनल काउंसिल में निहार जम्बुसारिया तो चेयरपरसन बनने में कामयाब हो गये थे, लेकिन अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तरूण घिया वहां चेयरपरसन नहीं बन सके - इस तथ्य ने इन दोनों के बीच की कड़बाहटभरी दूरी को और बढ़ाने का ही काम किया। यह तथ्य दोनों के बीच कड़बाहट का कारण इसलिए बना क्योंकि दोनों का समर्थन आधार एक ही है। सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव में बहुत ही मामूली अंतर से आगे पीछे रहते हुए दोनों ही चुने जाने से रह गये थे; और अपनी अपनी हार के लिए दोनों ने एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराया था। इस बार भी, दोनों के ही सिर पर यह डर सवार है कि दूसरा उसके समर्थक तो नहीं तोड़ रहा है क्या ?
पिछले चुनाव के बाद, निहार जम्बुसारिया ने रिलायंस समूह ज्वाइन किया है - जिसके चलते इस बार उनकी उम्मीदवारी को पिछली बार की तुलना में ज्यादा मजबूत माना/समझा जा रहा है। ऐसे में, तरूण घिया के लिए डर यह पैदा हुआ है कि रिलायंस समूह के वोटों के कारण निहार जम्बुसारिया को जो फायदा होगा, उसके मनोवैज्ञानिक असर के चलते तरूण घिया के वोट भी निहार जम्बुसारिया की तरफ आकर्षित होंगे और तब तरूण घिया के सामने अपने वोटों को अपने साथ बनाये रखना भी मुश्किल होगा। समर्थन आधार एक होने के कारण तरूण घिया को यह डर सता रहा है कि रीजनल काउंसिल में उन्हें जिस तरह निहार जम्बुसारिया से पिछड़ना पड़ा - उसी तरह कहीं उन्हें सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी निहार जम्बुसारिया से मात न खानी पड़े। तरूण घिया पिछले चुनाव में जीत नहीं पाये थे, लेकिन उन्हें इस बात का  संतोष रहा कि उन्हें निहार जम्बुसारिया से ज्यादा वोट मिले - भले ही यह ज्यादा कोई ‘बहुत ज्यादा’ नहीं थे। पिछली बार का यह ‘संतोष’ कहीं इस बार उनसे न छिन जाये - इसलिए तरूण घिया ने कंपनी का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार की आड़ में निहार जम्बुसारिया के खिलाफ खुला अभियान छेड़ दिया है। निहार जम्बुसारिया इस अभियान के चलते भारी दबाव में हैं। रिलायंस कनेक्शन के भरोसे उन्हें अपनी जो लड़ाई आसान दिख रही थी, तरूण घिया के अभियान के चलते वह मुश्किल में फंस गई दिख रही है। रिलायंस कनेक्शन के कारण निहार जम्बुसारिया को फायदा होने के दावे को लेकर कई लोगों को हालांकि शक भी था। ऐसे लोगों का कहना रहा है कि जिस रिलायंस कनेक्शन के कारण भावना दोषी को इंस्टीट्यूट के चुनाव से बाहर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा है, वही रिलायंस कनेक्शन निहार जम्बुसारिया के लिए फायदेमंद कैसे हो सकता है ?
उल्लेखनीय है कि भावना दोषी को अपने पति गौतम दोषी के रिलायंस की ‘सेवा’ करने के चक्कर में जेल जाने के कारण मिली बदनामी के चलते ही सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति से बाहर होने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि गौतम दोषी खुद भी सेंट्रल काउंसिल में दो टर्म सदस्य रह चुके हैं। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भावना दोषी ने सफलता की जो सीढि़यां तेजी से चढ़ीं हैं, वह हालांकि उनके व्यक्तित्व की अपनी काबिलियत और उनकी अपनी क्षमताओं भरी सक्रियता का ही नतीजा है, लेकिन गौतम दोषी की पहले से ही बनी प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का भी फायदा भावना दोषी को मिला ही है। भावना दोषी को गौतम दोषी की प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का यदि फायदा मिला, तो गौतम दोषी के जेल जाने से मिली बदनामी का नुकसान भी उठाना पड़ा। भावना दोषी के साथ जो हुआ, वह तो गौतम दोषी की कारस्तानी के चलते हुआ; लेकिन गौतम दोषी के साथ जो हुआ, वह इस बात का सुबूत है कि ‘व्यवस्था’ कैसे किसी अच्छे भले व्यक्ति को इस्तेमाल करती है। गौतम दोषी एक निहायत भले और सरल व्यक्ति के रूप में लोगों के बीच पहचाने जाते थे। गौतम दोषी से एक बार मिल लेने वाला व्यक्ति भी उनकी सरलता और सज्जनता का कायल हो जाता था; उनकी विद्धता से तो वह लोग भी परिचित हैं जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते हैं। चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन से संबद्ध शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जिस पर गौतम दोषी की एक्सपर्टीज न हो। कंपनियों के विलय और अधिग्रहण जैसे मामलों में तो गौतम दोषी की जो एक्सपर्टीज रही है, उसके चलते वह देश के नामी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में गिने और पहचाने जाने लगे थे। गौतम दोषी को जानने वाले लोग जानते हैं कि गौतम दोषी ने अपनी काबिलियत से नाम और दाम दोनों कमाये हैं, और इतने कमाये हैं कि उसके बाद उनके मन में कोई लालच या कोई स्वार्थ बचा नहीं हो सकता। प्रोफेशन में गौतम दोषी की जो धाक और पहचान थी, उनकी जो संलग्नता थी, प्रोफेशन के प्रति उनका जो कमिटमेंट ‘दिखता’ था, उसे जानने/पहचानने वाले लोगों को हैरानी थी कि रिलायंस से उन्हें आखिर ऐसा क्या मिला कि वह प्रोफेशन से ही ‘किनारा’ कर बैठे।
उस समय तो किसी को भी यह पहेली समझ नहीं आई थी - जिन्होंने समझने का दावा भी किया था, उनका भी सिर्फ यही कहना था कि गौतम दोषी पैसा और पोजीशन के चक्कर में ही अनिल अंबानी ग्रुप में गये थे; लेकिन जो लोग उन्हें जानते थे, वह इस बात पर इसलिए विश्वास नहीं करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि पैसा और पोजीशन का संकट तो गौतम दोषी के साथ था ही नहीं - संकट इसलिए भी नहीं था क्योंकि गौतम दोषी असंतोषी, लालची और स्वार्थी किस्म के व्यक्ति के रूप में ‘दिखते’ ही नहीं थे। जो व्यक्ति असंतोषी नहीं हैं, लालची नहीं है, स्वार्थी नहीं है, अपने प्रोफेशन के प्रति पूरी तरह समर्पित है, प्रोफेशन को दशा और दिशा देने वाली संस्था (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स) और संस्था की कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करने वाली टीम (सेंट्रल काउंसिल) के साथ गहरे से जुड़ा है - वह एक दिन अचानक प्रोफेशन को छोड़ कर एक ऐसे कार्पोरेट समूह का हिस्सा बन जाता है जिसकी छवि बहुत पाक.साफ नहीं है: अनिल अंबानी ग्रुप को ज्वाइन करने के गौतम दोषी के फैसले पर - उन्हें जानने वालों के लिए हैरान होने के पूरे कारण मौजूद थे। हैरान होने का कारण यह भी था कि अनिल अंबानी ग्रुप ने गौतम दोषी को आखिर क्या ‘देख’ कर अपने यहां एक बड़ा ओहदा दिया। गौतम दोषी को जानने वाले लोगों को यही लगता था कि अनिल अंबानी ग्रुप में ओहदे पर बैठे लोगों से जिस तरह की ‘सेवाओं’ की उम्मीद की जायेगी, उस तरह की ‘सेवा’ तो गौतम दोषी नहीं दे पायेंगे। उन्हीं जानने वाले लोगों में से बहुतों को अब यह लग रहा है कि वह गौतम दोषी को वास्तव में कितना कम जानते थे, और अनिल अंबानी ने गौतम दोषी को कितना सही पहचाना था।
अनिल अंबानी ग्रुप में गौतम दोषी ‘जो’ करने के लिए गए, ‘जो’ करने के लिए अनिल अंबानी ने उन्हें चुना - और ‘जिसे’ करने के चक्कर में वह जेल के सींखचों के पीछे जा पहुंचे - उसने उनकी साख व प्रतिष्ठा को तो धूल में मिला ही दिया; उनकी पत्नी भावना दोषी की सेंट्रल काउंसिल की राजनीति को भी ग्रहण लगा दिया। भावना दोषी इंस्टीट्यूट की अध्यक्ष पद की प्रबल दावेदार के रूप में देखी जाने लगीं थीं और अगले टर्म में उनके अध्यक्ष चुने जाने की उम्मीदें की जा रही थीं। रिलायंस कनेक्शन ने लेकिन सब चैपट कर दिया। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का यह एक ट्रेजिडीभरा पक्ष ही कहा जायेगा कि जिस रिलायंस कनेक्शन ने भावना दोषी की चुनावी राजनीति का बेड़ा गर्क किया, उसी रिलायंस कनेक्शन के भरोसे निहार जम्बुसारिया ने सेंट्रल काउंसिल में अपने प्रवेश करने की उम्मीद पैदा की। निहार जम्बुसारिया जिस रिलायंस कनेक्शन के भरोसे सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पा लेने की उम्मीद लगाये हुए हैं, उसी रिलायंस कनेक्शन को तरूण घिया ने निहार जम्बुसारिया के खिलाफ अपना हथियार बना लिया है। गौतम दोषी और भावना दोषी के साथ जो हुआ, उसने तरूण घिया के हथियार को धारदार बना दिया है। रिलायंस कनेक्शन के जाल में निहार जम्बूसारिया को घेरने और फँसाने की तरूण घिया ने जो रणनीति बनाई है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी लड़ाई को खासा दिलचस्प बना दिया है ।