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Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Tuesday, August 25, 2015

कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में उमेश गर्ग को तवज्जो मिलने से बौखलाए मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने जो हरकत की उससे उमेश गर्ग का तो कुछ नहीं बिगड़ा, उलटे मनु अग्रवाल की फजीहत और हुई

कानपुर । कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में उमेश गर्ग को तवज्जो मिलने से बौखलाए मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने भारी बबाल तो मचाया, किंतु बबाल के बावजूद वह मनचाहा नतीजा प्राप्त नहीं कर पाए । दरअसल हुआ यह कि कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के 28वें स्थापना दिवस पर आयोजित वार्षिक समारोह को मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथी सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे, और इसके लिए उन्होंने पूरी तैयारी भी कर रखी थी - किंतु उमेश गर्ग की उपस्थिति ने उनकी सारी तैयारी पर पानी फेर दिया था । चूँकि उमेश गर्ग सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हैं, इसलिए कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में प्रोटोकॉल के तहत उन्हें मंच पर जगह मिलना ही थी - और वह जगह उन्हें मिली भी । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन होने के नाते उन्हें सिर्फ मंच पर जगह ही नहीं मिली, बल्कि वक्ताओं की प्रशंसा भी मिली । किसी भी कार्यक्रम में यह एक स्वाभाविक सा दृश्य होता है कि प्रत्येक वक्ता मंच पर बैठे लोगों के लिए प्रशंसा के दो शब्द बोलता ही है । उमेश गर्ग चूँकि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हैं, इसलिए उनके बारे में बोलते हुए वक्ताओं ने जरा कुछ ज्यादा जोश दिखा दिया । उमेश गर्ग ने भी चूँकि सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित की हुई है, इसलिए समारोह के मंच पर उमेश गर्ग को मिल रही प्रशंसा को मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने अपने से छिनते वोटों के रूप में देखा/पहचाना । उन्हें लगा कि उमेश गर्ग को यह जो तवज्जो और प्रशंसा मिल रही है, उससे सेंट्रल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में कानपुर में उमेश गर्ग के वोट बढ़ रहे हैं - और इसका सीधा मतलब यह है कि कानपुर में उनके, यानि मनु अग्रवाल के वोट घट रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथी लगातार इस प्रयास में हैं कि कानपुर में मनु अग्रवाल के अलावा सेंट्रल काउंसिल के किसी भी अन्य उम्मीदवार को घुसने से रोक देना चाहिए; और कानपुर में कोई भी चार्टर्ड एकाउंटेंट मनु अग्रवाल के अलावा सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार से न मिले और न बात करे । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी अपने इस प्रयास में कानपुर के कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से लड़ बैठे हैं, जिन्होंने दूसरे उम्मीदवारों से बात/मुलाकात की । कई एक लोगों ने मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों को विभिन्न मौकों पर समझाने की बहुत कोशिश की कि जैसा वह सोचते और चाहते हैं, वैसा नहीं हो सकता है - इसलिए वह लोगों से लड़ना/झगड़ना बंद करें; क्योंकि लड़ने/झगड़ने से उनका खुद का नुकसान हो रहा है । कभी तो ऐसा लगता रहा कि उन्हें यह बात समझ में आ रही है, लेकिन फिर जल्दी ही वह यही कुछ करते देखे/सुने जाने लगते हैं । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों की इन्हीं हरकतों के चलते सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की 'कानपुर प्रोग्राम कमेटी' को निष्प्रभावी बना दिया गया है । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उमेश गर्ग ने उक्त कमेटी का चेयरमैन नवीन भार्गव को बनाया । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी इस पर भड़क गए और उन्होंने प्रचारित किया कि नवीन भार्गव रीजनल काउंसिल की कानपुर प्रोग्राम कमेटी के चेयरमैन के रूप में वास्तव में कानपुर में उमेश गर्ग की उम्मीदवारी के चुनावी एजेंट बने हैं, और उनका काम उमेश गर्ग की उम्मीदवारी के लिए सहयोग व समर्थन जुटाना होगा । नवीन भार्गव रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके हैं और कानपुर में उनकी अच्छी फॉलोइंग हैं - किंतु मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने उन्हें 'कानपुर-विरोधी' के रूप में प्रचारित किया । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने इस बात पर ऐसा बखेड़ा खड़ा किया कि उक्त कमेटी को ही निष्प्रभावी कर दिया गया । 
दरअसल अपनी इसी मुहिम के तहत मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने प्रयास किया था कि कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार को कोई तवज्जो न मिले । सोसायटी के पदाधिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने व्यवस्था भी ऐसी पक्की जमा ली थी, जिसमें सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार के लिए समारोह में घुसपैठ कर पाना मुश्किल क्या, असंभव था । किंतु उमेश गर्ग के मामले में उनकी यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उमेश गर्ग को समारोह के मंच से दूर रख पाना मुश्किल हुआ, और प्रोटोकॉल के तहत उमेश गर्ग को मंच पर बैठाना ही पड़ा । मंच पर बैठे उमेश गर्ग को जब वक्ताओं की प्रशंसा भी मिलने लगी, तब मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी भड़क गए । पर्दे के पीछे से उन्होंने कोशिश तो बहुत की कि उमेश गर्ग को या तो मंच से हटा कर दर्शक दीर्घा में पहुँचा दिया जाए, और या वक्ताओं को निर्देश दिया जाए कि वह किसी भी रूप में उमेश गर्ग की प्रशंसा न करें । पर इनमें से कुछ भी कर पाना संभव नहीं हो सका और मनु अग्रवाल व उनके संगी-साथियों को सिर पीट कर रह जाना पड़ा । मनु अग्रवाल व उनके संगी-साथियों की इस हरकत के बारे में जिन लोगों को पता चला, उन्होंने उन्हें यही समझाया कि वह जो करना चाहते हैं, वह हो पाना संभव ही नहीं है । उन्हें यह भी बताया/समझाया गया कि अपने राजनीतिक स्वार्थ में वह ऐसी कोई बेबकूफी न करें - जिससे उनकी और भद्द पिटे तथा उनकी बदनामी हो । यही हुआ भी, मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी जो करना चाहते थे - उसे तो नहीं ही कर पाए, लोगों के बीच अपनी बदनामी और करा बैठे । 
मनु अग्रवाल और उनके समर्थक दरअसल इस बार अपने चुनाव में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं । कानपुर में लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार की अपनी हार से सबक लेकर मनु अग्रवाल इस बार अपने चुनाव को पिछली बार की तुलना में खासी गंभीरता से ले रहे हैं । पर इस गंभीरता के चक्कर में वह कई तरह की बेबकूफियाँ भी कर रहे हैं - लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल कम कर रहे हैं, उनके नजदीकी और समर्थक ज्यादा कर रहे हैं; लेकिन नजदीकियों और समर्थकों का किया-धरा भी मनु अग्रवाल के सिर पर ही पड़ रहा है । मनु अग्रवाल अपनी तरफ से अपने विरोधियों को तथा अपने से नाराज रहने वाले लोगों को मनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं; लेकिन उनके समर्थक और नजदीकी फिर कुछ ऐसी हरकत कर देते हैं जिससे पुराने घाव फिर से हरे हो जाते हैं । इस कारण से मनु अग्रवाल के लिए कानपुर में अपनी उम्मीदवारी को लेकर एकमत समर्थन बना पाना मुश्किल हो रहा है । मनु अग्रवाल कानपुर से चूँकि अकेले उम्मीदवार हैं, इसलिए वह यदि यहाँ के ज्यादा से ज्यादा वोट पाने की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह बहुत स्वाभाविक ही है । इसके लिए किंतु यह जो तरीका अपना रहे हैं, उससे मामला बनने की बजाए बिगड़ और रहा है । उमेश गर्ग के मामले में मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों की जो हरकत रही है, उससे उमेश गर्ग का तो वह कुछ नहीं बिगाड़ सके - उलटे अपनी ही फजीहत और करा बैठे हैं । 

Tuesday, July 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके अक्षय गुप्ता ने कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति का गॉडफादर बनने का जो दाँव चला है, वह लेकिन मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बन गया है

कानपुर । मनु अग्रवाल की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता द्वारा सँभाल लेने के चलते कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । कुछेक लोगों को लगता है कि अक्षय गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी की कमान सौंप कर मनु अग्रवाल ने बड़ी होशियारी का काम किया है और अपनी जीत को सुनिश्चित कर लिया है; लेकिन अन्य कई लोगों को लगता है कि ऐसा करके मनु अग्रवाल ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है और अपनी चुनावी जीत की संभावना को खतरे में डाल लिया है । मजे की बात यह है कि मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता के हाथ में आने को मनु अग्रवाल के लिए वरदान और अभिशाप मानने वाले परस्पर विरोधी लोग इस बात पर लेकिन एकमत हैं कि अक्षय गुप्ता ने मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान मनु अग्रवाल के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए सँभाली है । ऐसा मानने वाले लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की आड़ में दरअसल अक्षय गुप्ता कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति में गॉडफादर का पद पाने की 'लड़ाई' लड़ रहे हैं । उल्लेखनीय है कि यह पद अभी तक नृपेन्द्र गुप्ता के पास रहा है । नृपेन्द्र गुप्ता लेकिन चूँकि अब बहुत सक्रिय नहीं रह गए हैं और कानपुर में अधिकतर लोग अब उनके प्रति अपनी नापसंदगी खुल कर जाहिर भी करने लगे हैं, इसलिए अक्षय गुप्ता को लगता है कि उनके लिए यह सही मौका है कि वह कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति के गॉडफादर का पद नृपेन्द्र गुप्ता से ले लें । कानपुर में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चूँकि एक अकेले मनु अग्रवाल की ही उम्मीदवारी सामने हैं, जिस कारण से उनकी जीत की अच्छी संभावना दिख रही है - इसलिए भी अक्षय गुप्ता को उनकी उम्मीदवारी की कमान सँभाल लेने में फायदा दिखा । मनु अग्रवाल की चुनावी जीत के जरिए वह लोगों को बता/दिखा सकेंगे कि उन्होंने मनु अग्रवाल को चुनाव जितवा दिया - और इस तरह उनका कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का गॉडफादर बनना पक्का हो जायेगा । 
अक्षय गुप्ता के मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान सँभाल लेने को जो लोग मनु अग्रवाल के लिए वरदान मान रहे हैं उनका कहना है कि मनु अग्रवाल के जीतने की उम्मीद तो पिछली बार भी थी, लेकिन पिछली बार जीतती हुई बाजी उनके हाथ से इसलिए फिसल गई थी क्योंकि उन्हें चुनावी राजनीति के फंडे क्लियर नहीं थे; अबकी बार चुनावी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी अक्षय गुप्ता का सहयोग/समर्थन उन्हें मिल रहा है, तो विश्वास किया जाना चाहिए कि पिछली बार जैसी गलतियाँ नहीं होंगी और मनु अग्रवाल की जीत सचमुच संभव हो सकेगी । लेकिन जो लोग अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन को मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए अभिशाप मान रहे हैं - उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता को सौंप कर मनु अग्रवाल ने अपने लिए नए विरोधी पैदा कर लिए हैं, जिन्हें अभी पहचानना भी मुश्किल है और ऐसे में जिनसे निपटना और भी मुश्किल होगा । इनका तर्क है कि मनु अग्रवाल के कई समर्थक और संभावित वोटर ऐसे हैं जो अक्षय गुप्ता के विरोधी रहे हैं - सबसे पहले तो ऐसे लोग मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता के हाथ में देख कर मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के विरोधी होंगे; दूसरी बात यह कि बहुत से लोग अक्षय गुप्ता के बहुत विरोधी तो नहीं होंगे, किंतु वह यह भी नहीं चाहेंगे कि अक्षय गुप्ता कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर का पद सँभाले । ऐसे लोगों के लिए मनु अग्रवाल को चुनाव हरवाना इसलिए जरूरी लगेगा जिससे कि वह गॉडफादर बनने की अक्षय गुप्ता की कोशिशों में मट्ठा डाल सकें । अक्षय गुप्ता के खिलाफ होने वाली राजनीति मनु अग्रवाल को सीधी चोट पहुँचाएगी और उनकी जीत की संभावना को कमजोर करेगी । 
मनु अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि अक्षय गुप्ता के कमान सँभालने से पैदा हुए खतरे को मनु अग्रवाल पहचान/समझ तो रहे हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की कमान लेकर अक्षय गुप्ता इतना आगे बढ़ गए हैं कि मनु अग्रवाल के लिए अब उन्हें रोक पाना या पीछे करना मुश्किल लग रहा है । मनु अग्रवाल के नजदीकियों ने ही बताया कि अक्षय गुप्ता के कमान सँभाल लेने से एक समस्या और पैदा हो गई है; और वह यह कि मनु अग्रवाल की जो अपनी कोर टीम थी उसके अधिकतर सदस्य तो उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने से पीछे हट गए हैं, लेकिन अक्षय गुप्ता के जो नजदीकी रहे हैं वह अभी तक भी मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के काम में नहीं जुड़ पाए हैं - यानि मनु अग्रवाल दोहरे नुकसान में हैं । इसके कारण समस्या यह पैदा हुई है कि अक्षय गुप्ता का सहयोग/समर्थन मिलने का मनु अग्रवाल को वास्तविक फायदा होता हुआ अभी नहीं नजर आ रहा है । अक्षय गुप्ता का सक्रिय सहयोग/समर्थन मिलने से मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का 'वज़न' तो निश्चित रूप से बढ़ा है, किंतु इस वज़न को सँभालने के लिए जिस तरह का नेटवर्क चाहिए, वह नहीं बन सका है - मनु अग्रवाल का अपना जो नेटवर्क था वह छिन्न-भिन्न और हो गया है । इसलिए अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन के कारण मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का जो 'वज़न' बढ़ा, उसमें मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के ही दबने का खतरा पैदा हो गया है ।
मनु अग्रवाल ने अपने व्यवहार और अपने तौर-तरीकों को लेकर इस बार जो सुधार किया व 'दिखाया' है, अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन के कारण लेकिन उसका कोई लाभ उठाना उनके लिए अभी तक तो मुश्किल बना हुआ है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार अपनी चुनावी जीत को लेकर मनु अग्रवाल इतने (अति)विश्वास में थे कि उन्होंने विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों के सुझावों तक की परवाह नहीं की थी । इस बार लोगों ने किंतु उनका बदला हुआ रूप पाया है । मनु अग्रवाल ने अपने विरोधियों को भी मनाने का प्रयास किया है, तथा साथ ही ऐसे लोगों को भी अपनी उम्मीदवारी के अभियान में जोड़ने का प्रयास किया है - जो चुनावी राजनीति में तटस्थ माने/पहचाने जाते हैं तथा इस नाते से लोगों के बीच उनकी विश्वसनीय पहचान है । मनु अग्रवाल के प्रयास किंतु अक्षय गुप्ता के कारण सिरे नहीं चढ़ पा रहे हैं - क्योंकि ऐसे लोगों से मनु अग्रवाल को प्रायः यही सुनने को मिल रहा है कि 'अरे, आप को मेरी मदद की क्या जरूरत है; अक्षय आपके साथ हैं, तब फिर आपको जीतने से कौन रोक सकेगा ?' मनु अग्रवाल भी समझते हैं कि इस बात के पीछे का भाव क्या है - और यही भाव मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए भारी मुसीबत बना हुआ है । 

Sunday, May 10, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने मनु अग्रवाल ने लगता है कि पिछली बार की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है; और इसीलिए उनके शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि पिछली बार की तरह कहीं इस बार भी हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल न जाए

कानपुर । मनु अग्रवाल ने अपने खुद के रवैये से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को मजाक का विषय बना दिया है, और अपने लिए विरोध व मुसीबत का माहौल बना लिया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए सेंट्रल रीजन में पिछली बार मामूली अंतर से जीतने से रह गए मनु अग्रवाल अगली बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की घोषणा लगातार करते रहे थे और थोड़ी बहुत जितनी संभव थी उतनी सक्रियता भी बनाए हुए थे । किंतु अभी चार-पाँच महीने पहले उन्होंने अचानक से ऐलान कर दिया कि वह चुनाव में चक्कर में नहीं पड़ेंगे और अपने कामधाम में ध्यान देंगे । लोगों को उन्होंने खुद ही बताया कि उन्हें एक बड़ा बिजनेस मिल रहा है, जिसमें उन्हें खूब कमाई होगी - इसलिए वह अपना समय और अपनी एनर्जी उसमें लगायेंगे । चुनाव, चुनावी राजनीति, चुने गए सदस्यों के क्रियाकलापों को लेकर उन्होंने बहुत ही नकारात्मक तथा आपत्तिजनक किस्म की बातें कहीं; जिनका लब्बोलुबाब यह था कि चुनाव-फुनाव क्या होता है, चुने जाने के बाद सदस्य अपना घर भरने में ही लगे रहते हैं, मुझे अपना घर भरने का जब दूसरा मौका मिल रहा है तो मैं चुनाव के चक्कर में क्यों पडूँ ? आदि-इत्यादि । उनकी इस तरह की बातें चल ही रही थीं कि लोगों ने देखा/पाया कि उन्होंने अचानक से फिर पलटा खाया और वह दोबारा से अपनी उम्मीदवारी की बात करने लगे । उन्होंने तो नहीं बताया कि जिस बड़े बिजनेस के लिए उन्होंने पहले अपनी उम्मीदवारी को छोड़ने की घोषणा कर दी थी, उसके लिए समय और एनर्जी कैसे निकालेंगे; लेकिन उनके नजदीकियों ने बताया कि जिस बड़े बिजनेस के चक्कर में उन्होंने चुनाव से हटने की घोषणा की थी, वह बड़ा बिजनेस उन्हें मिला ही नहीं, और इसलिए वह वापस चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए । इस कारण से मनु अग्रवाल को लोगों के इस सवाल का सामना अक्सर करना पड़ जाता है कि अब यदि उन्हें फिर से ज्यादा कमाई करने के लिए चुनाव लड़ने के अलावा कोई और बिजनेस मिल गया, तो क्या वह फिर से अपनी उम्मीदवारी छोड़ देंगे ? मनु अग्रवाल समझते हैं कि यह सवाल उन्हें चिढ़ाने के लिए पूछा जाता है, इसलिए इस सवाल को वह अलग अलग तरीकों से दाएँ-बाएँ कर देते हैं । 
मनु अग्रवाल का दावा है कि अपने धुर विरोधियों अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को उन्होंने अपनी उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए राजी कर लिया है; और 'हम तीनों' ने तय किया है कि अब की बार कानपुर से मैं अकेला ही उम्मीदवार बनूँ, ताकि कानपुर से सीट को पक्का किया जा सके । मनु अग्रवाल के इस दावे ने कानपुर में कई लोगों को भड़काया और उन्होंने कहना शुरू किया कि कानपुर में क्या हो, इसे 'तुम तीनों' ही क्यों तय करोगे ? मामला बढ़ा तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को सफाई देने सामने आना पड़ा और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो बस इतना कहा है कि वह उम्मीदवार नहीं हो रहे हैं; कौन उम्मीदवार हो या न हो, इसे वह भला कैसे तय कर सकते हैं; और जहाँ तक इसकी बात है कि वह किसका समर्थन करेंगे, तो इसका फैसला वह तब करेंगे जब सारा सीन क्लियर हो जायेगा । मजे की बात यह है कि मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने से पहले जब उम्मीदवार होने की बात कर रहे थे, तब तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बातें कर रहे थे; लेकिन जब मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में पीछे हटे, तो इन्होंने भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात करना बंद कर दिया । इससे समझा यह जा रहा है कि इन्हें उम्मीदवार होना कभी नहीं था, यह तो बस मनु अग्रवाल का काम बिगाड़ने के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । हाँ-न-हाँ का जो तमाशा मनु अग्रवाल ने दिखाया, वैसा तमाशा चूँकि यह दोनों नहीं कर सकते हैं - इसलिए मनु अग्रवाल अपने आप को निश्चिंत और अकेला मान रहे हैं । मनु अग्रवाल मान रहे हैं और कह रहे कि इन दोनों के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं होगा; इनके समर्थन से विवेक खन्ना के उम्मीदवार हो सकने की संभावना को भी मनु अग्रवाल यह कहते/बताते हुए खारिज कर रहे हैं कि विवेक खन्ना अपनी पारिवारिक मुश्किलों में बुरी तरह उलझे हुए हैं, इसलिए वह चाहते हुए भी उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे - और इस तरह कानपुर का मैदान उनके लिए पूरी तरह खाली है । 
यह सच लग भी रहा है कि कानपुर में मनु अग्रवाल को चुनावी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है - किंतु इससे उनकी राह आसान नहीं हो गई है । कानपुर की और इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति की बारीकियों को जानने/समझने वाले लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल दरअसल कुछेक गलतफहमियों के शिकार हैं और स्थितियों को तथ्यपरक रूप से नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के नजरिये से देख रहे हैं । मनु अग्रवाल को सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि पिछली बार उन्हें जो थोड़े से वोट कम पड़ गए थे, उनकी भरपाई तो वह आराम से कर लेंगे और इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है । कानपुर में किसी और उम्मीदवार के न होने से उनका काम और आसान हो गया है । लोगों का कहना/पूछना लेकिन यह है कि चुनावी समीकरण यदि इतने ही सीधे होते तो पिछली बार रवि होलानी क्यों हारते ? दरअसल हर बार चुनाव का एक नया गणित होता है, और एक नई केमिस्ट्री होती है - इसे समझने/पहचानने की कोशिश जो नहीं करता है, वह औंधे मुँह ही गिरता है । कानपुर में कई लोगों का कहना है कि पिछली बार मनु अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को यदि थोड़ा गंभीरता से लिया होता, तो वह सेंट्रल काउंसिल में होते । पिछली बार उन्हें मुकेश कुशवाह ने नहीं हराया था, उनकी खुद की मूर्खताओं व लापरवाहियों ने उन्हें हराया था । कानपुर में लोगों को लग रहा है कि पिछली बार की गलतियों से उन्होंने लगता नहीं है कि कोई सबक सीखा है । 
मनु अग्रवाल ने पिछले तीन-चार महीनों में जिस तरह की हरकतें/बातें की हैं, उससे उन्होंने अपनी स्थिति को कमजोर ही किया है । उनकी कमजोरी का पूरा पूरा फायदा अविचल कपूर ने उठाया है । कानपुर में एक बड़ा तबका मनु अग्रवाल के खिलाफ है - सच होते हुए भी यह कोई खास बात नहीं है । हर जगह दो खेमे होते ही हैं । समस्या तब बड़ी हो जाती है जब आप खिलाफ लोगों के साथ होशियारी से डील करने का प्रयास नहीं करते हैं । कानपुर में मनु अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि कानपुर के मठाधीशों को डर यह है कि मनु अग्रवाल यदि जीत गए तो उनकी मठधीशी ही खत्म हो जायेगी; अपनी मठधीशी बचाने के लिए उन्हें यह जरूरी लग रहा है कि वह मनु अग्रवाल को जीतने से रोकें । यही मठाधीश अविचल कपूर का समर्थन करते हुए सुने जा रहे हैं । कानपुर में अकेले उम्मीदवार होने के नाते मनु अग्रवाल के लिए भावनात्मक अपील बनाना हालाँकि संभव है और मनु अग्रवाल इसके लिए प्रयास भी करते देखे गए हैं; किंतु उनके प्रयास प्रायः इतने फूहड़ और नकारात्मक साबित हुए हैं कि उनसे बात बनने की बजाये बिगड़ और गई है । मनु अग्रवाल के शुभचिंतकों का भी मनना और कहना है कि वैसे तो मनु अग्रवाल के लिए अब की बार अच्छा मौका है, लेकिन यदि उन्होंने हालात को समझदारी से हैंडल नहीं किया तो पिछली बार की तरह हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल भी सकता है । 

Friday, November 30, 2012

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।