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Tuesday, August 25, 2015

कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में उमेश गर्ग को तवज्जो मिलने से बौखलाए मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने जो हरकत की उससे उमेश गर्ग का तो कुछ नहीं बिगड़ा, उलटे मनु अग्रवाल की फजीहत और हुई

कानपुर । कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में उमेश गर्ग को तवज्जो मिलने से बौखलाए मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने भारी बबाल तो मचाया, किंतु बबाल के बावजूद वह मनचाहा नतीजा प्राप्त नहीं कर पाए । दरअसल हुआ यह कि कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के 28वें स्थापना दिवस पर आयोजित वार्षिक समारोह को मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथी सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे, और इसके लिए उन्होंने पूरी तैयारी भी कर रखी थी - किंतु उमेश गर्ग की उपस्थिति ने उनकी सारी तैयारी पर पानी फेर दिया था । चूँकि उमेश गर्ग सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हैं, इसलिए कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में प्रोटोकॉल के तहत उन्हें मंच पर जगह मिलना ही थी - और वह जगह उन्हें मिली भी । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन होने के नाते उन्हें सिर्फ मंच पर जगह ही नहीं मिली, बल्कि वक्ताओं की प्रशंसा भी मिली । किसी भी कार्यक्रम में यह एक स्वाभाविक सा दृश्य होता है कि प्रत्येक वक्ता मंच पर बैठे लोगों के लिए प्रशंसा के दो शब्द बोलता ही है । उमेश गर्ग चूँकि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हैं, इसलिए उनके बारे में बोलते हुए वक्ताओं ने जरा कुछ ज्यादा जोश दिखा दिया । उमेश गर्ग ने भी चूँकि सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित की हुई है, इसलिए समारोह के मंच पर उमेश गर्ग को मिल रही प्रशंसा को मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों ने अपने से छिनते वोटों के रूप में देखा/पहचाना । उन्हें लगा कि उमेश गर्ग को यह जो तवज्जो और प्रशंसा मिल रही है, उससे सेंट्रल काउंसिल चुनाव के संदर्भ में कानपुर में उमेश गर्ग के वोट बढ़ रहे हैं - और इसका सीधा मतलब यह है कि कानपुर में उनके, यानि मनु अग्रवाल के वोट घट रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथी लगातार इस प्रयास में हैं कि कानपुर में मनु अग्रवाल के अलावा सेंट्रल काउंसिल के किसी भी अन्य उम्मीदवार को घुसने से रोक देना चाहिए; और कानपुर में कोई भी चार्टर्ड एकाउंटेंट मनु अग्रवाल के अलावा सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार से न मिले और न बात करे । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी अपने इस प्रयास में कानपुर के कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से लड़ बैठे हैं, जिन्होंने दूसरे उम्मीदवारों से बात/मुलाकात की । कई एक लोगों ने मनु अग्रवाल तथा उनके संगी-साथियों को विभिन्न मौकों पर समझाने की बहुत कोशिश की कि जैसा वह सोचते और चाहते हैं, वैसा नहीं हो सकता है - इसलिए वह लोगों से लड़ना/झगड़ना बंद करें; क्योंकि लड़ने/झगड़ने से उनका खुद का नुकसान हो रहा है । कभी तो ऐसा लगता रहा कि उन्हें यह बात समझ में आ रही है, लेकिन फिर जल्दी ही वह यही कुछ करते देखे/सुने जाने लगते हैं । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों की इन्हीं हरकतों के चलते सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की 'कानपुर प्रोग्राम कमेटी' को निष्प्रभावी बना दिया गया है । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उमेश गर्ग ने उक्त कमेटी का चेयरमैन नवीन भार्गव को बनाया । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी इस पर भड़क गए और उन्होंने प्रचारित किया कि नवीन भार्गव रीजनल काउंसिल की कानपुर प्रोग्राम कमेटी के चेयरमैन के रूप में वास्तव में कानपुर में उमेश गर्ग की उम्मीदवारी के चुनावी एजेंट बने हैं, और उनका काम उमेश गर्ग की उम्मीदवारी के लिए सहयोग व समर्थन जुटाना होगा । नवीन भार्गव रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके हैं और कानपुर में उनकी अच्छी फॉलोइंग हैं - किंतु मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने उन्हें 'कानपुर-विरोधी' के रूप में प्रचारित किया । मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने इस बात पर ऐसा बखेड़ा खड़ा किया कि उक्त कमेटी को ही निष्प्रभावी कर दिया गया । 
दरअसल अपनी इसी मुहिम के तहत मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों ने प्रयास किया था कि कानपुर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सोसायटी के वार्षिक समारोह में सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार को कोई तवज्जो न मिले । सोसायटी के पदाधिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने व्यवस्था भी ऐसी पक्की जमा ली थी, जिसमें सेंट्रल काउंसिल के किसी अन्य उम्मीदवार के लिए समारोह में घुसपैठ कर पाना मुश्किल क्या, असंभव था । किंतु उमेश गर्ग के मामले में उनकी यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उमेश गर्ग को समारोह के मंच से दूर रख पाना मुश्किल हुआ, और प्रोटोकॉल के तहत उमेश गर्ग को मंच पर बैठाना ही पड़ा । मंच पर बैठे उमेश गर्ग को जब वक्ताओं की प्रशंसा भी मिलने लगी, तब मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी भड़क गए । पर्दे के पीछे से उन्होंने कोशिश तो बहुत की कि उमेश गर्ग को या तो मंच से हटा कर दर्शक दीर्घा में पहुँचा दिया जाए, और या वक्ताओं को निर्देश दिया जाए कि वह किसी भी रूप में उमेश गर्ग की प्रशंसा न करें । पर इनमें से कुछ भी कर पाना संभव नहीं हो सका और मनु अग्रवाल व उनके संगी-साथियों को सिर पीट कर रह जाना पड़ा । मनु अग्रवाल व उनके संगी-साथियों की इस हरकत के बारे में जिन लोगों को पता चला, उन्होंने उन्हें यही समझाया कि वह जो करना चाहते हैं, वह हो पाना संभव ही नहीं है । उन्हें यह भी बताया/समझाया गया कि अपने राजनीतिक स्वार्थ में वह ऐसी कोई बेबकूफी न करें - जिससे उनकी और भद्द पिटे तथा उनकी बदनामी हो । यही हुआ भी, मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथी जो करना चाहते थे - उसे तो नहीं ही कर पाए, लोगों के बीच अपनी बदनामी और करा बैठे । 
मनु अग्रवाल और उनके समर्थक दरअसल इस बार अपने चुनाव में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं । कानपुर में लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार की अपनी हार से सबक लेकर मनु अग्रवाल इस बार अपने चुनाव को पिछली बार की तुलना में खासी गंभीरता से ले रहे हैं । पर इस गंभीरता के चक्कर में वह कई तरह की बेबकूफियाँ भी कर रहे हैं - लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल कम कर रहे हैं, उनके नजदीकी और समर्थक ज्यादा कर रहे हैं; लेकिन नजदीकियों और समर्थकों का किया-धरा भी मनु अग्रवाल के सिर पर ही पड़ रहा है । मनु अग्रवाल अपनी तरफ से अपने विरोधियों को तथा अपने से नाराज रहने वाले लोगों को मनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं; लेकिन उनके समर्थक और नजदीकी फिर कुछ ऐसी हरकत कर देते हैं जिससे पुराने घाव फिर से हरे हो जाते हैं । इस कारण से मनु अग्रवाल के लिए कानपुर में अपनी उम्मीदवारी को लेकर एकमत समर्थन बना पाना मुश्किल हो रहा है । मनु अग्रवाल कानपुर से चूँकि अकेले उम्मीदवार हैं, इसलिए वह यदि यहाँ के ज्यादा से ज्यादा वोट पाने की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह बहुत स्वाभाविक ही है । इसके लिए किंतु यह जो तरीका अपना रहे हैं, उससे मामला बनने की बजाए बिगड़ और रहा है । उमेश गर्ग के मामले में मनु अग्रवाल और उनके संगी-साथियों की जो हरकत रही है, उससे उमेश गर्ग का तो वह कुछ नहीं बिगाड़ सके - उलटे अपनी ही फजीहत और करा बैठे हैं । 

Tuesday, July 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करके अक्षय गुप्ता ने कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति का गॉडफादर बनने का जो दाँव चला है, वह लेकिन मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बन गया है

कानपुर । मनु अग्रवाल की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता द्वारा सँभाल लेने के चलते कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । कुछेक लोगों को लगता है कि अक्षय गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी की कमान सौंप कर मनु अग्रवाल ने बड़ी होशियारी का काम किया है और अपनी जीत को सुनिश्चित कर लिया है; लेकिन अन्य कई लोगों को लगता है कि ऐसा करके मनु अग्रवाल ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है और अपनी चुनावी जीत की संभावना को खतरे में डाल लिया है । मजे की बात यह है कि मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता के हाथ में आने को मनु अग्रवाल के लिए वरदान और अभिशाप मानने वाले परस्पर विरोधी लोग इस बात पर लेकिन एकमत हैं कि अक्षय गुप्ता ने मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान मनु अग्रवाल के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए सँभाली है । ऐसा मानने वाले लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की आड़ में दरअसल अक्षय गुप्ता कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति में गॉडफादर का पद पाने की 'लड़ाई' लड़ रहे हैं । उल्लेखनीय है कि यह पद अभी तक नृपेन्द्र गुप्ता के पास रहा है । नृपेन्द्र गुप्ता लेकिन चूँकि अब बहुत सक्रिय नहीं रह गए हैं और कानपुर में अधिकतर लोग अब उनके प्रति अपनी नापसंदगी खुल कर जाहिर भी करने लगे हैं, इसलिए अक्षय गुप्ता को लगता है कि उनके लिए यह सही मौका है कि वह कानपुर की इंस्टीट्यूट की राजनीति के गॉडफादर का पद नृपेन्द्र गुप्ता से ले लें । कानपुर में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चूँकि एक अकेले मनु अग्रवाल की ही उम्मीदवारी सामने हैं, जिस कारण से उनकी जीत की अच्छी संभावना दिख रही है - इसलिए भी अक्षय गुप्ता को उनकी उम्मीदवारी की कमान सँभाल लेने में फायदा दिखा । मनु अग्रवाल की चुनावी जीत के जरिए वह लोगों को बता/दिखा सकेंगे कि उन्होंने मनु अग्रवाल को चुनाव जितवा दिया - और इस तरह उनका कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का गॉडफादर बनना पक्का हो जायेगा । 
अक्षय गुप्ता के मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान सँभाल लेने को जो लोग मनु अग्रवाल के लिए वरदान मान रहे हैं उनका कहना है कि मनु अग्रवाल के जीतने की उम्मीद तो पिछली बार भी थी, लेकिन पिछली बार जीतती हुई बाजी उनके हाथ से इसलिए फिसल गई थी क्योंकि उन्हें चुनावी राजनीति के फंडे क्लियर नहीं थे; अबकी बार चुनावी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी अक्षय गुप्ता का सहयोग/समर्थन उन्हें मिल रहा है, तो विश्वास किया जाना चाहिए कि पिछली बार जैसी गलतियाँ नहीं होंगी और मनु अग्रवाल की जीत सचमुच संभव हो सकेगी । लेकिन जो लोग अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन को मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए अभिशाप मान रहे हैं - उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता को सौंप कर मनु अग्रवाल ने अपने लिए नए विरोधी पैदा कर लिए हैं, जिन्हें अभी पहचानना भी मुश्किल है और ऐसे में जिनसे निपटना और भी मुश्किल होगा । इनका तर्क है कि मनु अग्रवाल के कई समर्थक और संभावित वोटर ऐसे हैं जो अक्षय गुप्ता के विरोधी रहे हैं - सबसे पहले तो ऐसे लोग मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी की कमान अक्षय गुप्ता के हाथ में देख कर मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के विरोधी होंगे; दूसरी बात यह कि बहुत से लोग अक्षय गुप्ता के बहुत विरोधी तो नहीं होंगे, किंतु वह यह भी नहीं चाहेंगे कि अक्षय गुप्ता कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर का पद सँभाले । ऐसे लोगों के लिए मनु अग्रवाल को चुनाव हरवाना इसलिए जरूरी लगेगा जिससे कि वह गॉडफादर बनने की अक्षय गुप्ता की कोशिशों में मट्ठा डाल सकें । अक्षय गुप्ता के खिलाफ होने वाली राजनीति मनु अग्रवाल को सीधी चोट पहुँचाएगी और उनकी जीत की संभावना को कमजोर करेगी । 
मनु अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि अक्षय गुप्ता के कमान सँभालने से पैदा हुए खतरे को मनु अग्रवाल पहचान/समझ तो रहे हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की कमान लेकर अक्षय गुप्ता इतना आगे बढ़ गए हैं कि मनु अग्रवाल के लिए अब उन्हें रोक पाना या पीछे करना मुश्किल लग रहा है । मनु अग्रवाल के नजदीकियों ने ही बताया कि अक्षय गुप्ता के कमान सँभाल लेने से एक समस्या और पैदा हो गई है; और वह यह कि मनु अग्रवाल की जो अपनी कोर टीम थी उसके अधिकतर सदस्य तो उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने से पीछे हट गए हैं, लेकिन अक्षय गुप्ता के जो नजदीकी रहे हैं वह अभी तक भी मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के काम में नहीं जुड़ पाए हैं - यानि मनु अग्रवाल दोहरे नुकसान में हैं । इसके कारण समस्या यह पैदा हुई है कि अक्षय गुप्ता का सहयोग/समर्थन मिलने का मनु अग्रवाल को वास्तविक फायदा होता हुआ अभी नहीं नजर आ रहा है । अक्षय गुप्ता का सक्रिय सहयोग/समर्थन मिलने से मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का 'वज़न' तो निश्चित रूप से बढ़ा है, किंतु इस वज़न को सँभालने के लिए जिस तरह का नेटवर्क चाहिए, वह नहीं बन सका है - मनु अग्रवाल का अपना जो नेटवर्क था वह छिन्न-भिन्न और हो गया है । इसलिए अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन के कारण मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का जो 'वज़न' बढ़ा, उसमें मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के ही दबने का खतरा पैदा हो गया है ।
मनु अग्रवाल ने अपने व्यवहार और अपने तौर-तरीकों को लेकर इस बार जो सुधार किया व 'दिखाया' है, अक्षय गुप्ता के सहयोग/समर्थन के कारण लेकिन उसका कोई लाभ उठाना उनके लिए अभी तक तो मुश्किल बना हुआ है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार अपनी चुनावी जीत को लेकर मनु अग्रवाल इतने (अति)विश्वास में थे कि उन्होंने विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों के सुझावों तक की परवाह नहीं की थी । इस बार लोगों ने किंतु उनका बदला हुआ रूप पाया है । मनु अग्रवाल ने अपने विरोधियों को भी मनाने का प्रयास किया है, तथा साथ ही ऐसे लोगों को भी अपनी उम्मीदवारी के अभियान में जोड़ने का प्रयास किया है - जो चुनावी राजनीति में तटस्थ माने/पहचाने जाते हैं तथा इस नाते से लोगों के बीच उनकी विश्वसनीय पहचान है । मनु अग्रवाल के प्रयास किंतु अक्षय गुप्ता के कारण सिरे नहीं चढ़ पा रहे हैं - क्योंकि ऐसे लोगों से मनु अग्रवाल को प्रायः यही सुनने को मिल रहा है कि 'अरे, आप को मेरी मदद की क्या जरूरत है; अक्षय आपके साथ हैं, तब फिर आपको जीतने से कौन रोक सकेगा ?' मनु अग्रवाल भी समझते हैं कि इस बात के पीछे का भाव क्या है - और यही भाव मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए भारी मुसीबत बना हुआ है ।