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Monday, May 20, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव में सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा द्वारा पर्दे के पीछे से खड़ी की गई बाधा रूपी कारगुजारी के सामने सेंट्रल काउंसिल के अन्य दोनों सदस्यों - सतीश गुप्ता और प्रमोद बूब ने सरेंडर आखिर किस डर से किया हुआ है ?

जयपुर । जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव का मामला अब इंस्टीट्यूट मुख्यालय जा पहुँचा है, और दावा किया जा रहा है कि वहाँ भी यदि न्यायपूर्ण फैसला जल्दी ही नहीं हुआ - तब फिर मामले की शिकायत केंद्रीय मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में की जाएगी । उल्लेखनीय है कि जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चुनाव को लेकर 6 मार्च से झगड़ा पड़ा हुआ है, और इस झगड़े को सुलझाने के लिए तमाम शिकायतें और अनुरोध किए जा चुके हैं; इंस्टीट्यूट के संबंधित विभाग से स्पष्ट निर्देश मिल चुके हैं, लेकिन कुछेक लोगों की जिद के चलते झगड़ा अभी तक अनसुलझा हुआ पड़ा है । उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि जयपुर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में प्रकाश शर्मा, सतीश गुप्ता, प्रमोद बूब; तथा रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में अभिषेक शर्मा, सचिन जैन, दिनेश जैन भी एक्सऑफिसो सदस्य हैं - लेकिन फिर भी ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चुनाव जैसा 'मामूली' सा काम करीब ढाई महीने से झगड़े में पड़ा हुआ है । जयपुर में तमाम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स मान रहे हैं औरकह रहे हैं कि इस मामले में सबसे ज्यादा निराशा और शर्म की बात यह है कि सेंट्रल काउंसिल के तीन तीन सदस्यों के होते/रहते हुए सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव जैसा मामूली सा फैसला नहीं हो पा रहा है - क्या इन लोगों से बड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करने की उम्मीद की जा सकती है ? और यदि इन्हें कहीं कुछ करना ही नहीं है, तो यह सेंट्रल काउंसिल सदस्य आखिर बने क्यों हैं ? सिकासा चेयरमैन के चुनाव का झगड़ा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँचने की स्थिति में आ पहुँचा है, लेकिन इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में जयपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले तीनों सदस्य मुँह में दही जमा कर बैठे हुए हैं ।
झगड़ा क्या है, पहले यह जान/समझ लिया जाये : जयपुर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में चुने गए सात सदस्य हैं, जो खेमेबाजी के लिहाज से दो ग्रुप्स में बँटे हैं । एक ग्रुप में चार सदस्य हैं - लोकेश कासट, अमित यादव, कुलदीप गुप्ता और आकाश बरगोटी; जो क्रमशः चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, सेक्रेटरी तथा ट्रेजरर हैं । दूसरे ग्रुप में बाकी तीन सदस्य हैं - शिशिर अग्रवाल, अंकित माहेश्वरी और विजय अग्रवाल । यह तीनों सत्ता में बैठे चार सदस्यों से ज्यादा वोट पाकर मैनेजिंग कमेटी में पहुँचे हैं, लेकिन फिर भी सत्ता से बाहर हैं । हालाँकि यह कोई खास बात नहीं है; चुनावी राजनीति में यह सब होता है और चुनावी राजनीति की यही खूबी भी है । समस्या लेकिन यहाँ से शुरू होती है । इंस्टीट्यूट के नियमों के अनुसार, मैनेजिंग कमेटी के सदस्य एक पद के अधिकारी ही हो सकते हैं । इस नियम के चलते सिकासा चेयरमैन का पद विरोधी खेमे के किसी सदस्य को ही मिल सकता है; लेकिन चार सदस्यीय सत्ता खेमा इसके लिए तैयार नहीं है । 6 मार्च को हुई मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग में चार सदस्यीय सत्ता खेमे ने सिकासा चेयरमैन का पद पर अपने ही किसी सदस्य को सौंपने की तैयारी दिखाई, तो उन्हें इंस्टीट्यूट का नियम पढ़ा दिया गया । इस पर सत्ता खेमे के सदस्यों ने सिकासा चेयरमैन के पद पर फैसला करना टाल दिया और वह अभी तक टलता ही आ रहा है । इंस्टीट्यूट के पदाधिकारी की तरफ से ब्रांच के चेयरमैन व सेक्रेटरी को स्पष्ट निर्देश मिले हैं कि सिकासा चेयरमैन का पद उन्हें उन तीन सदस्यों में से ही किसी एक को सौंपना है, जो अभी किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन उनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है; और इस तरह जयपुर ब्रांच के चार सदस्यीय सत्ता खेमे ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट को और उसके पदाधिकारियों को 'बंधक' बना छोड़ा है ।
हालाँकि यह बात किसी को हजम नहीं हो रही है और हर किसी को लग रहा है कि जयपुर ब्रांच के पदाधिकारियों की इतनी 'हिम्मत' नहीं हो सकती है कि वह इंस्टीट्यूट को 'बंधक' बना लें । हर किसी को शक है कि इनके पीछे असली 'खिलाड़ी' कोई और है जो इन पदाधिकारियों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रहा है; और हर कोई अपनी शक की सुईं सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा पर टिका रहा है । आरोपपूर्ण चर्चाओं में कहा/सुना जा रहा है कि प्रकाश शर्मा ने विरोधी ग्रुप के तीनों सदस्यों को आफॅर दिया हुआ है कि जो कोई उनकी शरण में आ जायेगा, उसके अगले ही पल सिकासा चेयरमैन का पद पा लेगा; अन्यथा शिकायतें करते रह जाओगे और कहीं कोई सुनवाई नहीं होगी । विरोधी खेमे के तीनों सदस्यों में से कोई भी लेकिन प्रकाश शर्मा की शरण में जाने को तैयार नहीं हो रहा है । दरअसल विरोधी खेमे के तीनों सदस्य प्रकाश शर्मा से एक बार धोखा खा चुके हैं । बताया जाता है कि जयपुर ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में प्रकाश शर्मा ने इन्हीं तीनों को लेकर सत्ता ग्रुप बनाने की तैयारी की थी, जिसके तहत इन्हीं तीनों को पदाधिकारी बनना था; लेकिन ऐन मौके पर प्रकाश शर्मा ने इन्हें अलग-थलग कर दिया और इन्होंने अपने आप को ठगा हुआ पाया । उसी अनुभव के चलते विरोधी खेमे के तीनों सदस्य अब दोबारा से प्रकाश शर्मा पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं । सात सदस्यीय जयपुर ब्रांच में प्रकाश शर्मा को चूँकि पाँचवाँ सदस्य अपनी शरण में नहीं मिल रहा है, इसलिए जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के पद पर कोई नियुक्ति नहीं हो रही है । ऐसे में, सिकासा चेयरमैन की जिम्मेदारी का निर्वाह ब्रांच के चेयरमैन लोकेश कासट कर रहे हैं, जो 'चोर दरवाजे' से इंस्टीट्यूट के नियम का सीधा सीधा उल्लंघन है - जिसके अनुसार, ब्रांच का चेयरमैन निकासा का चेयरमैन नहीं हो सकता है । जयपुर में प्रकाश शर्मा की कारगुजारी पर तो किसी को हैरानी नहीं है; लेकिन सतीश गुप्ता और प्रमोद बूब की चुप्पी पर सभी को आश्चर्य जरूर है कि जयपुर ब्रांच में नियमविरुद्ध काम हो रहा है और इन्होंने प्रकाश शर्मा से डर कर उनके सामने सरेंडर क्यों किया हुआ है ? 

Sunday, March 17, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट प्रशासन के साफ निर्देश के बावजूद इंदौर ब्रांच के चेयरमैन पंकज शाह टैक्स प्रैक्टिशनर एसोसिएशन के साथ मिलकर होली मिलन समारोह करने पर अड़े हुए हैं

इंदौर । इंदौर ब्रांच के चेयरमैन पंकज शाह तथा ब्रांच के अन्य पदाधिकारियों ने 18 मार्च के होली मिलन समारोह को लेकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को जिस तरह से छकाया हुआ है, उसमें इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों की घटती/गिरती साख के संकेत और सुबूत को देखा/पहचाना जा सकता है । इंस्टीट्यूट की यूँ तो काफी अहमियत है और इसके पदाधिकारी बड़े बड़े नेताओं और कॉर्पोरेट क्षेत्र के पदाधिकारियों के साथ प्रसन्न मुद्रा में तस्वीरें खिंचवाते और उन्हें दिखाते रहते हैं; लेकिन अपने 'घर' में उन बेचारों की हालत यह रहती है कि घर के 'छोटे-मोटे लोग' तक उनकी सुनते/मानते नहीं हैं । इसका बिलकुल ताजा उदाहरण इंदौर में देखने को मिल रहा है । इंदौर ब्रांच ने 18 मार्च को होली मिलन समारोह के आयोजन की घोषणा की हुई है, जबकि इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से स्पष्ट हिदायत है कि ब्रांचेज किसी भी नॉन-एजुकेशनल कार्यक्रम पर पैसा खर्च नहीं करेंगी । इंस्टीट्यूट में हालाँकि देखने में आता है कि 'नीचे' से 'ऊपर' तक के पदाधिकारी इंस्टीट्यूट के पैसे को अपने 'बाप' का पैसा समझते हैं और उसे मनमाने तरीके से खर्च करते हैं । इसी 'परंपरा' का पालन करते हुए इंदौर ब्रांच के पदाधिकारियों ने होली मिलन समारोह के आयोजन की घोषणा कर दी । इंस्टीट्यूट में इसकी शिकायत हो गई । इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंदौर ब्रांच के चेयरमैन पंकज शाह को साफ निर्देश दिए कि वह यह कार्यक्रम नहीं कर सकते हैं; लेकिन आरोपों के अनुसार, पंकज शाह के कानों पर जूँ रेंगती हुई नहीं दिख रही है । 
इंदौर में कई लोग इस आयोजन के पीछे पंकज शाह की 'बिजनेस एप्रोच' को भी देख/पहचान रहे हैं, जिसके कारण इंस्टीट्यूट के मुख्यालय से मिले निर्देश की भी वह परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं । उल्लेखनीय है कि पंकज शाह प्रोफेशनली इनकम टैक्स की प्रैक्टिस करते हैं, और 18 मार्च का होली मिलन समारोह वह इंदौर की टैक्स प्रैक्टिशनर एसोसिएशन के साथ मिलकर कर रहे हैं - जिसके चलते लोग मान रहे हैं कि उक्त कार्यक्रम वास्तव में पंकज शाह का डिपार्टमेंट से जुड़े लोगों के बीच अपनी लॉबिइंग के लिए है; होली मिलन तो बस बहाना है । ऐसे में, यदि वह कार्यक्रम रद्द करते हैं, तो डिपार्टमेंट से जुड़े लोगों के बीच उनकी बड़ी फजीहत होगी । अपने आप को फजीहत से बचाने के लिए पंकज शाह इंस्टीट्यूट और उसके पदाधिकारियों की फजीहत करने को तैयार हो गए हैं । लोगों का कहना है कि अपने आप को और इंस्टीट्यूट व उसके पदाधिकारियों को फजीहत से बचाने का पंकज शाह के पास एक बड़ा आसान तरीका यह है कि वह इंस्टीट्यूट को सूचित कर दें कि उक्त कार्यक्रम वह ब्रांच/इंस्टीट्यूट के पैसे से नहीं कर रहे हैं, लेकिन पंकज शाह ऐसा नहीं कर रहे हैं - जिसके चलते मामला भड़का हुआ है ।
पंकज शाह को इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से लिखा/भेजा गया निर्देश इस प्रकार है :


इंस्टीट्यूट प्रशासन के स्पष्ट निर्देश के बाद भी पंकज शाह मनमाने तरीके से 18 मार्च को होली मिलन समारोह कर रहे हैं, इसकी शिकायत की प्रति यह है :    
     

Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।

Thursday, November 22, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में गाजियाबाद के एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता को राहत दिलवाने का भरोसा देकर अनुज गोयल ने अपना समर्थक बनाया, और मुकेश कुशवाह के लिए मुसीबत खड़ी की

गाजियाबाद । एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता की चुनावी सक्रियता ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने की मुकेश कुशवाह व अनुज गोयल की कोशिशों ने चुनावी परिदृश्य को एक मजेदार रंग दे दिया है । संजय गुप्ता पहले मुकेश कुशवाह के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते थे; लेकिन स्टेट बैंक से लिए गए लोन्स को न चुकाने के मामले में वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट व स्टेट बैंक के डायरेक्टर गिरीश आहुजा की मदद दिलवा पाने में असफल रहने के कारण वह मुकेश कुशवाह के खिलाफ हो गए हैं, और उन्होंने अनुज गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । संजय गुप्ता इससे पहले इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में किसी न किसी के समर्थक तो रहे हैं, लेकिन ज्यादा सक्रिय नहीं रहे; किंतु इस बार वह अनुज गोयल की उम्मीदवारी के पक्ष में घर घर जा कर जमकर प्रचार कर रहे हैं । उनके प्रचार में ज्यादातर मुकेश कुशवाह के प्रति जहरभरी बातें उगलना होता है, इसलिए उनकी सक्रियता ने गाजियाबाद में जोरों की तथा सेंट्रल रीजन के दूसरे हिस्सों में फुसफुसाहटभरी गर्मी पैदा की हुई है । इस मामले में गिरीश आहुजा जैसी बड़ी शख्सियत का नाम शामिल होने से बात और गंभीर भी हो गई है । संजय गुप्ता का मुकेश कुशवाह पर तो सीधा सीधा आरोप है ही कि उनके मामले में मुकेश कुशवाह को चूँकि पैसे मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उनके मामले में दिलचस्पी नहीं ली; कहीं कहीं संजय गुप्ता ने इस आरोप के लपेटे में गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । 
उल्लेखनीय है कि संजय गुप्ता ने कई वर्ष पहले ज्वैलरी का बिजनेस किया था, जिसके लिए उन्होंने स्टेट बैंक से भारी लोन लिया था । स्टेट बैंक से ही उनके नाम एक हाऊसिंग लोन भी रहा । बिजनेस उनका चला नहीं, फलस्वरूप लोन वह चुका नहीं सके । समय से लोन चुकाने की कोशिश करने की बजाये संजय गुप्ता तरह तरह के आरोप लगाते हुए बैंक पदाधिकारियों से उलझते और रहे, जिसके कारण उनका मामला गंभीर होता गया । संजय गुप्ता ने बैंक पदाधिकारियों पर जो जो आरोप लगाये, उनमें झूठ/सच चाहें जो हो; मामले में बुनियादी बात लोन चुकाने की जो थी - उसे पूरा करने में संजय गुप्ता असफल ही रहे, जिस कारण उनकी गर्दन फँसती गई । पिछले दिनों बैंक की तरफ से संजय गुप्ता को ओटीएस (वन टाइम सेटलमेंट) का ऑफर मिला । इस ऑफर को निपटाने के बावजूद संजय गुप्ता को मुसीबत से छुटकारा लेकिन नहीं मिला । बैंक ने लोन बसूलने के लिए सख्ती दिखाई और उनकी संपत्ति को 'कब्जे' में ले लिया । इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने एक बड़ी सिफारिश खोजी, जो उन्हें स्टेट बैंक में डायरेक्टर गिरीश आहुजा के रूप में नजर आई । गिरीश आहुजा तक पहुँच बनाने में संजय गुप्ता ने मुकेश कुशवाह की मदद ली । गिरीश आहुजा ने लेकिन जब संजय गुप्ता के मामले को देखा/जाना और उसे बुरी तरह उलझा हुआ पाया तो उन्होंने कुछ करने से साफ इंकार कर दिया । चर्चा है कि गिरीश आहुजा ने संजय गुप्ता को इस बात के लिए लताड़ भी लगाई कि बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों से उलझने की बजाये उन्होंने यदि लोन चुकाने में दिलचस्पी ली होती, तो नौबत यहाँ तक न आती । गिरीश आहुजा की इस लताड़ को सुन तथा उनके रवैये को देख कर मुकेश कुशवाह ने संजय गुप्ता की मदद करने के मामले से हाथ खींच लिया । इससे संजय गुप्ता बुरी तरह भड़क गए ।
मुकेश कुशवाह के लिए कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि चुनावी राजनीति के नाजुक मौके पर अनुज गोयल ने संजय गुप्ता को 'पकड़' लिया और उन्हें आश्वस्त किया कि उनके झंझट से वह उन्हें राहत दिलवायेंगे । संजय गुप्ता को अभी तक कोई राहत नहीं मिली है - और जो लोग उनके मामले से परिचित हैं, उनका कहना है कि संजय गुप्ता को वैसी कोई राहत मिल भी नहीं पायेगी जैसी राहत वह चाहते हैं - लेकिन अनुज गोयल ने कुछेक प्रभावी लोगों से उनकी बात चूँकि करवा दी है या करवा देने का भरोसा दिया है, इसलिए संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के बड़े समर्थक बन गए हैं । वर्षों अनुज गोयल के घोर विरोधी रहे संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के चुनाव प्रचार में जोरशोर से लगे हैं, और अपने लोन को चुकाने की चिंता करने की बजाये अनुज गोयल को वोट दिलवाने के अभियान में सक्रिय दिलचस्पी ले रहे हैं - जिसके तहत वह अनुज गोयल के साथ जा जा कर न सिर्फ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिल रहे हैं, बल्कि फोन से तथा वाट्स-ऐप में मुकेश कुशवाह के खिलाफ तरह तरह के आरोप लगाते हुए बातें बताने व पोस्ट्स लिखने का काम कर रहे हैं । संजय गुप्ता की तरफ से गंभीर आरोप यह सुना गया है कि मुकेश कुशवाह उनका काम करवाने के बदले में पैसे चाहते थे, और जब मुकेश कुशवाह को लगा कि उनसे उन्हें पैसे नहीं मिल पायेंगे, तो वह उनकी मदद करने से पीछे हट गए । इस तरह के आरोप के लपेटे में कहीं कहीं संजय गुप्ता ने गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । संजय गुप्ता की इस तरह की बातें मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को कितना नुकसान और अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कितना फायदा पहुँचायेंगी, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनकी बातों ने खास तौर से गाजियाबाद में तथा आम तौर से सेंट्रल रीजन में चुनावी माहौल में गर्मी जरूर पैदा कर दी है । 

Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते समय जयपुर के चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखी जा रही रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी में आई ऊँची उछाल ने चुनावी मुकाबले को टक्कर का बनाया

जयपुर । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी ने जिस तेजी और अप्रत्याशित तरीके से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी पैठ बनाई है, उसके कारण जयपुर/राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल चुनाव का पूरा नजारा बदलता हुआ नजर आ रहा है और चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है । इस बदलते नजारे का ही परिणाम है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने आने पर जो लोग उनकी उम्मीदवारी को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, वही लोग अब रोहित अग्रवाल को न सिर्फ मुकाबले में देख रहे हैं - बल्कि कई कई मामलों में वह उन्हें जयपुर के बाकी तीनों उम्मीदवारों से बेहतर स्थिति में भी पा रहे हैं । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रोहित अग्रवाल को युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच तो अच्छा समर्थन मिल ही रहा है, वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखा रहे हैं और उनमें संभावनाएँ देख रहे हैं । सक्रियता के लिहाज से जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में चूँकि रोहित अग्रवाल का ही पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए भी उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच महत्त्वपूर्ण हो उठी है । जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों के लोगों का भी मानना और कहना है कि जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में एक अकेले रोहित अग्रवाल ही चुनाव को चुनाव की तरह गंभीरता से 'लड़ते' दिख रहे हैं; एक अकेले वही हैं जिनके पास ऐसे समर्थकों/शुभचिंतकों की टीम है जो वास्तव में चुनावी मैदान में सक्रिय है - और इसी का उन्हें फायदा मिलता दिख रहा है । चुनावी राजनीति की बारीकियों को समझने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ते दिख रहे उत्साह को वोट में बदलने की चुनौती रोहित अग्रवाल के सामने अभी बाकी है ।
जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में शामिल और सक्रिय रहे अनुभवी लोगों का मानना और बताना है कि ऑरा (आभामंडल) के लिहाज से रोहित अग्रवाल बाकी तीनों उम्मीदवारों से कमजोर पड़ते हैं; उनकी सबसे बड़ी समस्या उनका युवा होना है । युवा होने के कारण उनकी उम्मीदवारी को लोग आसानी से तवज्जो देते हुए नहीं दिखते हैं । रोहित अग्रवाल की यही कमजोरी लेकिन उनके लिए वरदान बनती नजर आ रही है । इसमें काफी योगदान हालाँकि परिस्थितियों का भी है । परिस्थितियों ने दो तरह से रोहित अग्रवाल की 'मदद' की है । राजस्थान विधानसभा चुनाव में तमाम वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद जिस तरह सचिन पायलट का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, उसके चलते चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी यह भावना जोर मार रही है कि एक युवा नेता को यदि प्रदेश की बागडोर सौंपी जा सकती है, तो इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की एक सीट क्यों नहीं दी जा सकती है ? इसके अलावा, सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले बाकी तीन उम्मीदवार 'बड़े' तो हैं, लेकिन वह उस कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसमें कहा गया है - 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खुजूर ...।इसका फायदा रोहित अग्रवाल को मिलता बताया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि बाकी तीन उम्मीदवारों में सतीश गुप्ता दो बार पहले सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं, और पिछली व तीसरी बार पीछे हट चुके हैं । उनके बड़े होने पर उनका यह 'रिकॉर्ड' भारी है और इस बार भी वह कोई चमत्कार करते हुए नहीं दिख रहे हैं । प्रमोद बूब पिछली बार उम्मीदवार के रूप में कोई सक्रियता दिखाये बिना सबसे ज्यादा वोटों से रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते थे; इस बार सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में भी वह उसी ढर्रे पर हैं - इस बीच लेकिन लोगों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वह बड़े तो हैं, लेकिन हैं 'पेड़ खुजूर' । रीजनल काउंसिल में उनकी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं दिखी; कुछेक मुद्दों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के साथ उनकी जो 'मुठभेड़े' हुईं भी, वह निजी लड़ाई/खुन्नस के रूप में ज्यादा नजर आईं - और व्यापक सरोकार से जुड़ती हुई नहीं दिखीं । उम्मीदवार के रूप में वह लोगों से जुड़ते हुए और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु लोगों तक अपनी पहुँच बनाते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर जयपुर में ही कोई खास उत्साह नहीं देखा/पहचाना जा रहा है ।  
प्रकाश शर्मा तक के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट को बचाना मुश्किल हो रहा है । आमतौर पर माना/समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य तो अपनी सीट आसानी से निकाल ही लेता है; लेकिन पिछली बार वेस्टर्न और ईस्टर्न रीजन में एक एक सेंट्रल काउंसिल सदस्य को अपनी अपनी सीट गँवानी पड़ी थी, और सेंट्रल रीजन में भी 'स्टार' उम्मीदवार समझे जाने वाले अनुज गोयल अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाने में असफल रहे थे । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि काउंसिल सदस्य होना चुनावी जीत की कोई गारंटी नहीं है । प्रकाश शर्मा तो पिछला चुनाव ही जैसे-तैसे मुश्किल से जीते थे । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में उन्होंने दिखाया/जताया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट वह भले ही 'बड़े' हैं, लेकिन सोच व व्यवहार के मामले में वह बहुत 'छोटे' हैं । अपने व्यवहार और रवैये से प्रकाश शर्मा ने जो नकारात्मक पहचान बनाई है, उसके कारण उनके नजदीकियों व समर्थकों को ही उनकी जीत को लेकर आशंका है । मजे की बात है कि जयपुर और राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के अच्छे अच्छे जानकर भी विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों के बारे में अनुमान लगा पाने में गच्चा खा रहे हैं । वह यह तो मान रहे हैं कि जयपुर/राजस्थान की जो वोटिंग 'ताकत' है, उसके चलते जयपुर के दो उम्मीदवार तो सेंट्रल काउंसिल में पहुँच ही जायेंगे - लेकिन वह दो उम्मीदवार कौन से होंगे, इस सवाल पर उनकी बोलती बंद हो जाती है । विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों को लेकर बनी इस असमंजसता के चलते भी रोहित अग्रवाल के लिए तेजी से मुकाबले में आना आसान हुआ है । नामांकन होने के समय उन्हें चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन परिस्थितिवश मिले अवसर को अपनी सक्रियता से इस्तेमाल करके रोहित अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को जो ऊँची उछाल दी है, उससे उनकी उम्मीदवारी टक्कर में आ गई है - और इस तथ्य ने बाकी तीनों उम्मीदवारों तथा उनके समर्थकों को मुसीबत में डाल दिया है ।

Saturday, July 28, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की गाजियाबाद ब्रांच में पिछले वर्ष हुए घपले के मामले में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य मुकेश बंसल को भी खींच लिए जाने से, यह मामला अब सेंट्रल रीजन की चुनावी राजनीति के मैदान में शिफ्ट होता हुआ लग रहा है

गाजियाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्रांच में पिछले वर्ष हुई घपलेबाजी का मामला ब्रांच के मौजूदा चेयरमैन पुनीत सखुजा, पिछले वर्ष के चेयरमैन सचिंदर गर्ग और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य मुकेश बंसल के लिए एकसाथ जी का जंजाल बन गया है - और सभी की निगाह एक अगस्त को होने वाली ब्रांच की एजीएम पर है, जिसमें पिछले वर्ष के एकाउंट्स प्रस्तुत और स्वीकार किए जाने की कार्रवाई होनी है । इस वर्ष की एजीएम को लेकर गाजियाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और उनके नेताओं की ही नहीं, बल्कि सेंट्रल रीजन के तमाम नेताओं की दिलचस्पी दरअसल इसलिए है - क्योंकि हर कोई जानना/देखना चाहता है कि पिछले वर्ष हुए घपले को पकड़ने में पुनीत सखुजा ने जो तत्परता और आक्रामकता दिखाई, उसे वह लॉजिकल कन्क्लूजन तक ले जा पाते हैं या उनकी तत्परता और आक्रामकता बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती है । पुनीत सखुजा इस बात पर गर्व करते हैं कि उन्होंने तत्परता और आक्रामकता के साथ कार्रवाई करते हुए ब्रांच और इंस्टीट्यूट के करीब साढ़े छह लाख रुपए बचाए; दूसरे लोगों को लेकिन लगता है कि इतना काफी नहीं है; उनका कहना है कि पिछले वर्ष हुए इस घपले के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि आगे कोई इस तरह का घपला करने के बारे में न सोच सके । यह माँग करने वाले लोग दरअसल पिछले वर्ष के चेयरमैन सचिंदर गर्ग को 'सजा' दिलवाना चाहते हैं । उनका तर्क है कि सचिंदर गर्ग की मिलीभगत के बिना उक्त घपला हो ही नहीं सकता था ।
इस मामले में रोमांचपूर्ण पहलू यह है कि कुछेक लोग सचिंदर गर्ग की ऊँगली पकड़ कर मुकेश बंसल का 'पहुँचा' पकड़ने की कोशिश करने लगे हैं । उनका कहना है कि सचिंदर गर्ग चूँकि मुकेश बंसल के 'आदमी' हैं, इस नाते पिछले वर्ष चेयरमैन भले ही सचिंदर गर्ग थे - लेकिन ब्रांच में राजपाट मुकेश बंसल का ही चला था; और ऐसा हो ही नहीं सकता कि पिछले वर्ष जो घपला हुआ, उसकी जानकारी मुकेश बंसल को न हो । इस तर्क के साथ, पिछले वर्ष हुए घपले में कुछेक लोग मुकेश बंसल की जिम्मेदारी भी 'तय' करने/करवाने के काम में लगे हैं । कई लोगों को यह भी लगता है कि मौजूदा वर्ष चूँकि चुनावी वर्ष है, इसलिए उम्मीदवार लोग अपने आप को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे उम्मीदवारों को नीचे खींचने का काम करेंगे ही - और इस काम में घपलेबाजी के आरोप मामले को सनसनीखेज तो बनाते ही हैं । सचिंदर गर्ग ने इस बात का फायदा उठाते हुए घपलेबाजी के आरोप की अपने ऊपर पड़ी धूल को झाड़ने का काम शुरू भी कर दिया है । उनका कहना है कि मुकेश बंसल को फँसाने के लिए उन्हें नाहक ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है और मामले को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है । उनका कहना है कि जो मामला है, वह वास्तव में अतिरिक्त भुगतान संबंधी छोटी सी प्रशासनिक चूक का मामला है, जिसे घपला कहना उचित नहीं है । सचिंदर गर्ग का कहना है कि लेकिन चुनावी मुकाबलेबाजी की होड़ में लगे लोगों ने बात का बतंगड़ बना दिया है, और मुकेश बंसल के साथ नजदीकी के कारण उन्हें बदनामी का शिकार बनना पड़ रहा है ।
मामला हालाँकि इतना सीधा/सरल भी नहीं है, क्योंकि मामले में पुनीत सखुजा को खासी गंभीर लड़ाई लड़नी पड़ी है । मामला यदि अतिरिक्त भुगतान संबंधी छोटी सी प्रशासनिक चूक का होता, तो ब्रांच के चेयरमैन के रूप में पुनीत सखुजा को एफआईआर करवाने की धमकी देने की हद तक नहीं जाना पड़ता । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष ब्रांच में लगे कम्प्यूटर्स के भुगतान में गड़बड़ी को पकड़ने का काम पुनीत सखुजा ने चेयरमैन का अपना कार्यकाल शुरू होते ही पकड़ लिया था । पहले तो पिछले वर्ष के ब्रांच के पदाधिकारियों तथा कम्प्यूटर्स सप्लाई करने वाले बेंडर ने गड़बड़ी की बात से साफ इंकार किया, लेकिन कागजातों में ही गड़बड़ी के जो संकेत और सुबूत नजर आ रहे थे - उन्हें देखते हुए पुनीत सखुजा ने सख्ती दिखाई और मामले में एफआईआर दर्ज करने की बात की । इसके बाद बेंडर करीब साढ़े छह लाख रुपये वापस करने के लिए राजी हुआ और ब्रांच को उक्त रकम वापस मिली । उम्मीद की जा रही थी कि रकम वापस मिलने से मामला समाप्त हो जायेगा, लेकिन हुआ उल्टा । दरअसल रकम वापस मिलने से, और सख्ती करने के बाद वापस मिलने से यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि मामला घपलेबाजी का ही है । इसमें अब जिम्मेदारी तय करने की बात शुरू होने लगी । कुछेक लोगों ने कहना शुरू किया कि उक्त घपलेबाजी पिछले वर्ष के पदाधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकती है, इसलिए उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए । पुनीत सखुजा इस बारे में यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर दे रहे हैं कि जो हुआ, उसकी पूरी रिपोर्ट उन्होंने इंस्टीट्यूट प्रशासन को भेज दी है; किसके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए, यह इंस्टीट्यूट प्रशासन को तय करना है, उन्हें नहीं ।
पुनीत सखुजा के इस रवैये से लोगों को लगा है कि ब्रांच के प्रशासनिक स्तर पर उक्त मामला अब खत्म हो गया है । इस मामले में लेकिन मुकेश बंसल को भी खींच लिए जाने से लोगों को लग रहा है कि अब यह मामला ब्रांच के प्रशासनिक स्तर से हट कर चुनावी राजनीति के मैदान में शिफ्ट हो रहा है । इसी नाते लोगों की निगाह एक अगस्त को होने वाली ब्रांच की एजीएम पर है । एजीएम में यह मामला कैसे हैंडिल होता है, इस पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक मैदान पर इस मामले को कैसे खेला जायेगा । उम्मीद यही की जा रही है कि पिछले वर्ष गाजियाबाद ब्रांच में हुए घपले को लेकर गाजियाबाद और सेंट्रल रीजन में राजनीतिक नजरिये से बबाल अभी मचेगा, और राजनीति की पिच पर यह मामला आसानी से दफ्न नहीं होगा ।

Tuesday, July 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में अनुज गोयल की वापसी की कोशिश सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह व मुकेश बंसल की बनती दिख रही जोड़ी के कारण मुसीबत में फँसती नजर आ रही है क्या ?

गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्यता जुगाड़ने में असफल रहने के बाद अनुज गोयल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में ही फिर से शरण लेने का जो फैसला किया है, उसने उनके समर्थकों को ही बुरी तरह बिदका दिया है और उनके कई समर्थक उनके खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं । अनुज गोयल को सबसे तगड़ा झटका गाजियाबाद में ही लगा है, जहाँ उनके घनघोर समर्थक रहे मुकेश बंसल ने ही बगावत का झंडा उठा लिया है । मुकेश बंसल के विरोध का अनुज गोयल को ऐसा झटका लगा है कि वह हर जगह मुकेश बंसल के रवैये का रोना रोते हैं और मुकेश बंसल पर धोखा देने का आरोप लगाते हैं । अनुज गोयल जगह जगह लोगों को बता रहे हैं कि मुकेश बंसल को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह लेकर आये हैं, लेकिन मुकेश बंसल ने अब मुकेश कुशवाह से तार जोड़ लिए हैं; उनका गंभीर आरोप यह है कि पिछले चुनाव में मुकेश बंसल ने उनके भाई जितेंद्र गोयल की बजाये मुकेश कुशवाह का साथ दिया था - और जितेंद्र गोयल की हार का एक प्रमुख कारण मुकेश बंसल से मिला यह धोखा भी था । अनुज गोयल और जितेंद्र गोयल इन दिनों जहाँ कहीं भी जिस किसी से भी बात कर रहे हैं, मुकेश बंसल के रवैये का रोना जरूर रो रहे हैं । उनके लगातार जारी 'विलाप' से ऐसा लग रहा है जैसे अनुज गोयल की उम्मीदवारी को सबसे बड़ा खतरा मुकेश बंसल से ही है । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल यह सुन/जान कर दरअसल डरे हुए हैं कि मुकेश बंसल ने कई जगह लोगों के बीच यह कहा हुआ है कि वह अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे । 
मुकेश बंसल दरअसल 2021 के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस वर्ष हो रहा चुनाव मुकेश कुशवाह के लिए तीसरा और आखिरी चुनाव है, मुकेश बंसल की 'तैयारी' है कि मुकेश कुशवाह द्वारा की जाने वाली खाली जगह को वह भरें; इसके लिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि अनुज गोयल चुनाव न जीत सकें । सेंट्रल रीजन में कई लोग अनुज गोयल को करिश्माई नेता मानते हैं, और दावा करते हैं कि वह तो चुनाव जीत ही जायेंगे - लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं होगा । दरअसल उनके करिश्मे की पोल तो पिछली बार खुल गई थी, जब वह अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव नहीं जितवा सके थे । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में जितेंद्र गोयल 22 उम्मीदवारों में 943 वोटों के साथ नवें नंबर पर रहे थे, और 1237 वोटों के साथ पाँचवें नंबर पर रहे मुकेश कुशवाह से 294 वोट पीछे थे । फाइनल गिनती तक पहुँचते पहुँचते जितेंद्र गोयल छठे नंबर तक तो पहुँच गए थे, लेकिन विजेता बनने से रह गए थे । जितेंद्र गोयल की यह हार उनके साथ-साथ वास्तव में अनुज गोयल की भी हार थी । उनसे पहले, नॉर्दर्न रीजन में एनडी गुप्ता ने अपने बेटे नवीन गुप्ता को तथा वेस्टर्न रीजन में कमलेश विकमसे ने अपने भाई नीलेश विकमसे को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाया है । उम्मीद की जा रही थी कि अनुज गोयल भी अपने भाई को चुनाव जितवा देंगे । नवीन गुप्ता अपने पिता तथा नीलेश विकमसे अपने भाई के चुनाव में कभी भी सक्रिय नहीं देखे गए थे;जबकि जितेंद्र गोयल तो हमेशा ही अनुज गोयल के 'स्टार प्रचारक' रहे हैं - इसलिए भी उम्मीद की गई थी कि जितेंद्र गोयल तो आसानी से चुनाव जीत जायेंगे । लेकिन वह चुनाव हार गए । जितेंद्र गोयल की हार ने अनुज गोयल के तथाकथित करिश्मे की ही पोल नहीं खोली, बल्कि यह भी दिखाया/बताया कि सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को अपनी ही जेब में रखने की अनुज गोयल की 'कोशिश' को लोगों ने अच्छा नहीं माना और जितेंद्र गोयल के समर्थन से हाथ खींच कर वास्तव में अनुज गोयल की सत्ता-लोभी सोच को सबक सिखाया ।
सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अनुज गोयल ने अपनी उसी सत्ता-लोभी सोच को एक बार फिर प्रदर्शित किया है, जिसके विरोध के कारण पिछली बार उनके भाई जितेंद्र गोयल को हार का सामना करना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि अनुज गोयल पिछले दिनों बाबा रामदेव के भरोसे उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य होने की जुगाड़ में थे, और इसलिए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के मैदान से मुँह मोड़े हुए थे । लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो वह फिर से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मुँह मारने आ गए हैं । मुकेश बंसल जैसे उनके नजदीकी रहे लोगों तक को उनका यह सत्ता-लोभी रवैया बुरा लगा है । उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों का ही कहना/पूछना है कि अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता अपने और अपने भाई के लिए ही क्यों चाहिए ? अनुज गोयल के इस सत्ता-लोभी रवैये के सवाल बन जाने के कारण ही अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ी चुनौती है । दरअसल सेंट्रल रीजन में एक सीट बढ़ जाने का फायदा जयपुर को मिलता दिख रहा है । जयपुर/राजस्थान में बढ़े वोटों के भरोसे माना जा रहा है कि जयपुर में इस बार तीन लोग सेंट्रल काउंसिल में आ जायेंगे । सेंट्रल रीजन में पिछली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले श्याम लाल अग्रवाल के इस बार चुनाव से दूर रहने की चर्चा है; चर्चा हालाँकि यह भी है कि उनके समर्थक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए राजी करने के वास्ते उन पर दबाव भी बना रहे हैं, और साथ ही उनके किसी विकल्प को लाने के लिए भी प्रयासरत हैं । जयपुर और या राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल के लिए तीन उम्मीदवार रहें या चार - उम्मीद की जा रही है कि जयपुर के तीन उम्मीदवार तो जीत ही जायेंगे । 
ऐसे में, अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए मनु अग्रवाल और मुकेश कुशवाह में से किसी एक की उम्मीदवारी की बलि लेनी होगी । इसके लिए उन्हें पहली वरीयता में इनमें से किसी एक से ज्यादा वोट पाने का प्रयास करना होगा । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल ने अभी मुकेश कुशवाह को निशाने पर लिया है । उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से चार उम्मीदवार होने के कारण जो समस्या उनके सामने है, वही समस्या मुकेश कुशवाह के सामने भी है और इसलिए वह कोशिश करें तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में मुकेश कुशवाह से आगे हो सकते हैं और सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर सकते हैं । इस कोशिश में अनुज गोयल को लेकिन मुकेश बंसल बाधा बनते हुए दिख रहे हैं । मुकेश बंसल पिछले चुनाव में 31 उम्मीदवारों में 968 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे । उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों में उनका नंबर पहला था । इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों पर उनका अच्छा प्रभाव है । इस प्रभाव के साथ मुकेश बंसल यदि अनुज गोयल को हरवाने की बात कहते/करते हैं, और मुकेश कुशवाह का साथ देते हैं - तो अनुज गोयल के लिए मामला मुश्किल तो बनता है । मुकेश बंसल पर दबाव बनाने के लिए अनुज गोयल गाजियाबाद में नितिन गुप्ता को समर्थन देने की बात करते सुने जा रहे हैं । नितिन गुप्ता पिछली बार भी उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 487 वोट के साथ 17 वे नंबर पर थे । इस रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है कि अनुज गोयल का समर्थन नितिन गुप्ता को कोई लाभ पहुँचा कर मुकेश बंसल का कुछ बिगाड़ सकेगा । क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन अनुज गोयल के खिलाफ कभी उनके ही नजदीकी रहे मुकेश बंसल के आक्रामक रवैये से सेंट्रल रीजन में चुनावी परिदृश्य दिलचस्प हो उठा है । 

Thursday, March 22, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की राजनीति को छोड़ अनुज गोयल का विधान परिषद का टिकट जुगाड़ने में लगने और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र के सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारी में जुटने की खबरों ने उत्तर प्रदेश में इंस्टीट्यूट की राजनीति के समीकरण बिगाड़े

गाजियाबाद । अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट की राजनीति में दिलचस्पी लेना छोड़ कर उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की सदस्यता जुगाड़ने में लग जाने से मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ आदि ने राहत की जो साँस लेना शुरू किया था, उसमें ज्ञान चंद्र मिश्र की सेंट्रल काउंसिल के लिए दिखाई गई दिलचस्पी ने फिर से मुसीबत खड़ी कर दी है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह और मनु अग्रवाल सेंट्रल रीजन से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में हैं, और इन्हें इस वर्ष दिसंबर में होने वाले चुनाव में पुनर्वापसी के लिए फिर से चुनाव का सामना करना है; जबकि विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश करने की कोशिश के तहत चुनाव में उतरने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं । विनय मित्तल पिछली बार चुनाव हार गए थे, और अमरेश वशिष्ठ पिछले तीन चुनावों से लगातार हारते आ रहे हैं । इन चारों को पिछले महीनों में यह देख कर खासा तगड़ा झटका लगा कि अनुज गोयल एक बार फिर से सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं, जिसके चलते वह ब्रांचेज के कार्यक्रमों में बाहर ही हाथ जोड़े खड़े मिल/दिख जा रहे हैं । लगातार तीन टर्म ही सेंट्रल काउंसिल में रहने के नियम के चलते अनुज गोयल को पिछली बार चुनाव से बाहर बैठना पड़ा था; हालाँकि बाहर बैठ कर भी उन्होंने अपने भाई जितेंद्र गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़वा दिया था - जितेंद्र गोयल लेकिन चुनाव हार गए थे, यद्यपि वोट उन्हें अच्छे मिल गए थे । जितेंद्र गोयल की हार से लोगों ने मान लिया था कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीती में अनुज गोयल के दिन पूरे हो गए हैं । अनुज गोयल लेकिन जब चुनाव की तैयारी करते नजर आए - तो मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ को डर हुआ कि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल की उम्मीदवारी उनमें से न जाने किसका खेल बिगाड़ दे ?
अनुज गोयल लेकिन चुनावी सीन से अचानक से गायब हो गए । अभी कुछ महीने पहले तक वह सेंट्रल रीजन की हर ब्रांच के हर प्रमुख कार्यक्रम में हाथ जोड़े बाहर ही खड़े मिलते/दिखते थे, किंतु काफी दिनों से रीजन के लोगों को वह न कहीं दिख रहे हैं और न उनके फोन और मैसेज लोगों को मिल रहे हैं । उनके शुभचिंतकों ने पता किया तो मालुम चला कि अनुज गोयल आजकल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य होने का जुगाड़ बैठाने में लगे हैं, और इसके लिए आजकल रामदेव की सेवा में हैं । उनके नजदीकियों का तो कहना/बताना है कि रामदेव की सिफारिश पर विधान परिषद की सदस्यता मिलने का अनुज गोयल को पूरा पूरा भरोसा है, इसलिए उन्होंने इंस्टीट्यूट की राजनीति से ध्यान हटा कर अपनी सक्रियता का केंद्र रामदेव तक सीमित किया हुआ है । उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2012 में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की ब्रांचेज के चेयरमेंस की हरिद्वार में मीटिंग हुई थी, जिसमें एक वक्ता के रूप में रामदेव को भी बुलाया गया था । अनुज गोयल ने तभी से रामदेव से पींगें बढ़ाना शुरू कर दिया था । अनुज गोयल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि रामदेव की सत्ताधारी नेताओं से नजदीकी का फायदा उठा कर अनुज गोयल ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद के टिकट के लिए चक्कर चलाया है; और चूँकि उत्तर प्रदेश में जल्दी ही विधान परिषद के चुनाव होने हैं - इसलिए अनुज गोयल ने अपना सारा ध्यान रामदेव पर और विधान परिषद के टिकट पर लगाना शुरू किया है, और इस कारण से इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य से वह गायब हैं ।
अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य से गायब होने पर मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ को एक बड़े दबाव से मुक्ति मिलने का अहसास हुआ और उन्होंने राहत की साँस ली थी । लेकिन यह बेचारे अभी राहत की साँस पूरी तरह ले भी नहीं पाए थे कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के नए बने चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र की तरफ से सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारियाँ शुरू होने की खबरें मिलने लगीं । ज्ञान चंद्र मिश्र ने जिस तरह से पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव जीता था, और जिन हालात में वह चेयरमैन बने हैं - उससे लोगों के बीच यह संदेश तो है ही कि उनका नेटवर्क भी अच्छा है और उनकी किस्मत भी तेज है । पिछले चुनाव के दौरान वह जिस पारिवारिक मुसीबत में घिरे थे, उसके कारण उन्हें चुनावी दौड़ से बाहर ही मान लिया गया था - लेकिन वह न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि जीते भी तो इसे उनके प्रभावी नेटवर्क के सुबूत के तौर पर देखा गया । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में भी उनकी उम्मीदवारी के सामने ऐन मौके पर भारी मुसीबत खड़ी हो गयी थी, लेकिन फिर भी वह चेयरमैन बन गए - तो इसे उनकी तेज किस्मत के रूप में देखा/पहचाना गया है । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि ज्ञान चंद्र मिश्र ने यदि सचमुच सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिए तो उनका प्रभावी नेटवर्क और उनकी तेज किस्मत उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है । इस तरह उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवारों के लिए मामला 'आसमान से गिरे, खजूर पर अटके' की तर्ज पर 'अनुज गोयल से गिरे, ज्ञान चंद्र मिश्र पर अटके' जैसा हो गया है ।

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Tuesday, January 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल और जयपुर ब्रांच की राजनीति में गौतम शर्मा को जब-तब इस्तेमाल करते रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा क्या अब सचमुच उनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं

जयपुर । प्रकाश शर्मा के बदलते तेवरों के चलते गौतम शर्मा को सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने की पिछले करीब एक वर्ष से पाली हुई अपनी उम्मीद खतरे में पड़ती दिख रही है । मजे की बात यह है कि यह खतरा प्रकाश शर्मा का 'आदमी' होने के कारण ही वास्तव में उनके सामने आ खड़ा हुआ है । चुनावी वर्ष होने के कारण सेंट्रल काउंसिल सदस्य पिछली बार की ही तरह इस बार भी 'एकता' बना कर किसी ऐसे सदस्य को तो चेयरमैन बनाने/बनवाने का प्रयास करेंगे, जो मौजूदा चेयरमैन दीप मिश्र की तरह ही उनकी कठपुतली बन कर रहे - लेकिन यह तय माना जा रहा है कि वह सदस्य गौतम शर्मा तो नहीं ही होंगे । कहा/सुना जा रहा है कि गौतम शर्मा को प्रकाश शर्मा के 'आदमी' के रूप में देखने/पहचानने के कारण 'एका' बनाने वाले बाकी सेंट्रल काउंसिल सदस्य चेयरमैन के रूप में उनके नाम पर सहमत नहीं होंगे । गौतम शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, प्रकाश शर्मा ने उन्हें सेक्रेटरी बनवाने का आश्वासन जरूर दिया हुआ है । गौतम शर्मा और उनके समर्थक दरअसल यह देख/जान कर ज्यादा निराश हैं कि जो प्रकाश शर्मा पिछले करीब एक वर्ष से उन्हें चेयरमैन बनवाने का आश्वासन दे रहे थे, वही प्रकाश शर्मा मौका नजदीक आने पर गौतम शर्मा को इस बार चेयरमैन पद की चुनावी दौड़ से बाहर ही मान/बता रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें रीजनल काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । गौतम शर्मा इसी समीकरण के भरोसे इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की कोशिश में थे, लेकिन इंस्टीट्यूट में चुनावी वर्ष होने के कारण सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच गौतम शर्मा के नाम पर सहमती बनती हुई नहीं दिख रही है ।
दरअसल सेंट्रल काउंसिल के लिए इस बार अनुज गोयल, अभय छाजेड़ और प्रमोद बूब के उम्मीदवार बनने की संभावनाओं के चलते सेंट्रल रीजन के पाँचों मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सदस्यता खतरे में पड़ी दिख रही है - इसलिए वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहेंगे, जो लोगों के बीच उनकी पहचान को नकारात्मक बनाए । अनुज गोयल की संभावित उम्मीदवारी के चलते मुकेश कुशवाह और मनु अग्रवाल की सदस्यता पर खतरा दिख रहा है । यह तो हर कोई मान रहा है कि उत्तर प्रदेश में इन तीनों में से दो लोग तो आ जायेंगे, लेकिन वह दो लोग कौन होंगे - इसे लेकर कोई भी निश्चिन्त नहीं है । यही हाल राजस्थान में है, जहाँ कि प्रमोद बूब की संभावित उम्मीदवारी प्रकाश शर्मा और श्यामलाल अग्रवाल के लिए खतरा बनी है; इस खतरे को सतीश गुप्ता व विजय गर्ग में से किसी एक की संभावित उम्मीदवारी और बढ़ा देती है । जातीय आधार पर प्रकाश शर्मा ही सबसे ज्यादा खतरे में नजर आ रहे हैं । अभय छाजेड़ की संभावित उम्मीदवारी मध्य प्रदेश में केमिशा सोनी के लिए चुनौती बनी है । अपनी कई गतिविधियों और अपने रवैये के चलते केमिशा सोनी ने इंदौर में अपने विरोधियों की संख्या को बढ़ाने का जो काम किया है, वह भी चुनाव में उनकी मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित होगा और इसलिए भी इस बार का चुनाव उनके लिए खासा चुनौतीपूर्ण होगा । सेंट्रल काउंसिल के सदस्य चुनावी नजरिये से अपने अपने क्षेत्रों में जिस तरह से मुसीबत में घिरे हैं, उसके चलते सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इस वर्ष होने वाले चुनाव में वह पिछली बार की तरह आरोपपूर्ण तरीके से शामिल होने से बचने की कोशिश - उम्मीद है कि करेंगे ।
इस बात ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इस बार होने वाले चुनावों को दिलचस्प बना दिया है । प्रकाश शर्मा जिस तरह से गौतम शर्मा को सेक्रेटरी बनवाने की बात कर रहे हैं, उसके चलते माना जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य विरोधी खेमे के दो/तीन सदस्यों को तोड़ कर रीजनल काउंसिल में अपना बहुमत बनाने का प्रयास करेंगे । रीजनल काउंसिल के दस सदस्यों में छह सदस्यों वाला विरोधी खेमा यदि एकजुट बना रहता है, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य रीजनल काउंसिल की राजनीति से अपने आप को दूर रखते हैं - तब तो गौतम शर्मा और सत्ता पक्ष के बाकी सदस्यों को अबकी बार सिर्फ झुनझुना मिलने की ही स्थिति है । छह सदस्यीय विरोधी खेमे में चेयरमैन बनने के प्रबल आकांक्षी तो हालाँकि दो/तीन सदस्य हैं, लेकिन उनके बीच गलाकाट स्पर्धा के संकेत अभी तो नहीं दिख रहे हैं - इसलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए उनमें फूट डालना भी आसान काम नहीं होगा । इसलिए गौतम शर्मा के लिए चेयरमैन तो दूर, सेक्रेटरी बनने के भी लाले दिख रहे हैं । गौतम शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, गौतम शर्मा और उनके समर्थक लेकिन इस बात से निराश और नाराज हैं कि प्रकाश शर्मा अपने स्वार्थ में उन्हें जब-तब इस्तेमाल तो करते रहे, लेकिन अब वह उनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं और उन्हें अकेला छोड़ दिया । प्रकाश शर्मा के चक्कर में गौतम शर्मा ने रीजनल काउंसिल और जयपुर ब्रांच में भी लोगों से 'दुश्मनी' कर ली - और अब प्रकाश शर्मा ने भी उन्हें अकेला कर दिया है ।

Friday, November 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच में अपने लोगों को न जितवा पाने की खुन्नस में नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी का उसका अधिकार छिनवा कर प्रकाश शर्मा ने जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गौरव पर तो चोट की ही है, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को भी दाँव पर लगा दिया है

जयपुर । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी द्वारा जयपुर में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की फजीहत का कारण बन रही है । विवादपूर्ण मुद्दों पर नीलेश विकमसे के फैसला न करने के रवैये के चलते इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी बेचारे वी सागर की बड़ी आफत हो जाती है - क्योंकि अक्सर उनकी सुनी नहीं जाती है और कोई भी उन्हें कभी भी लताड़ देता है । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने समझ लिया है कि नीलेश विकमसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बन जरूर गए हैं, लेकिन प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी सँभाल और निभा पाना उनके बस की बात है नहीं, और इसलिए वह इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी को भी कुछ नहीं समझते और मनमानियों पर उतरे रहते हैं । जयपुर में 24/25 नबंवर को हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट में फैली अराजकता का दिलचस्प उदाहरण है । इस नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी को लेकर विवाद है - इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, जयपुर में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट के कार्यक्रम की मेज़बानी इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच को करनी/मिलनी चाहिए; लेकिन मेज़बानी निभा रही है सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल । मजे की बात यह है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में इस बारे में जो विचार-विमर्श हुआ, उसमें भी नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी जयपुर ब्रांच को सौंपने का फैसला हुआ - लेकिन उसके बाद भी मेज़बानी का अधिकार जयपुर ब्राँच से छीन कर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को सौंप दिया गया है ।
यह पूछना बेकार है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीप मिश्र आखिर काउंसिल की मीटिंग में ही हुए फैसले पर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह पूछना इसलिए बेकार है क्योंकि दीप मिश्र को एक 'कठपुतली' चेयरमैन के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, और माना/समझा जाता है कि उन्हें चेयरमैन की कुर्सी दिलवाने वाले ऊपर के लोग जैसे 'नचाते' हैं, वह वैसे ही 'नाचते' हैं । दरअसल दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । ऐसे में, बेचारे दीप मिश्र की मजबूरी और व्यथा को समझा जा सकता है । संदर्भित मामले में दरअसल हुआ यह कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उपस्थित हुए सदस्यों के बहुमत ने मेज़बानी की जिम्मेदारी जयपुर ब्राँच को सौंपने का फैसला लिया; लेकिन इस फैसले को मानने से यह कहते/बताते हुए इंकार कर दिया गया कि काउंसिल का बहुमत इस फैसले से सहमत नहीं है । निश्चित रूप से बहुमत को अपना फैसला लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह तथाकथित बहुमत है कहाँ ? यह तथाकथित बहुमत उस मीटिंग में नजर क्यों नहीं आया, जिस मीटिंग में जयपुर में हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी सुनिश्चित करने का मामला तय हो रहा था ? कम से कम न्याय का दिखावा ही कर लिया जाता और यह तथाकथित बहुमत दूसरी मीटिंग करके पहली मीटिंग के फैसले को पलट देता - लेकिन ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गई । असल में, ऐसा करने में एक समस्या यह भी थी कि तथाकथित बहुमत के ठेकेदार सेंट्रल काउंसिल सदस्य मनु अग्रवाल को अपने साथ मान रहे हैं, लेकिन मनु अग्रवाल जयपुर ब्राँच को मेज़बानी देने का फैसला करने वाली मीटिंग में मौजूद थे और इस फैसले के साथ थे - ऐसे में यदि इसी मुद्दे पर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दूसरी मीटिंग होती तो पहले हुए फैसले को बदलने के लिए मनु अग्रवाल को अपना स्टैंड बदलना होता, और तब उनका दोहरा चरित्र 'रिकॉर्ड' पर आता ।
मनु अग्रवाल के दोहरे चरित्र को रिकॉर्ड पर आने से तो बचा लिया गया है, लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में हुए फैसले को खुद सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा ठेंगा दिखाए जाने की हरकत पर उनकी चुप्पी से उनका दोहरा चरित्र लोगों के सामने तो आ ही गया है । क्योंकि मनु अग्रवाल यदि अभी भी मीटिंग में लिए गए अपने स्टैंड पर कायम हैं तो तथाकथित बहुमत का दावा झूठा है; बहुमत का दावा करने वाले लोग मनु अग्रवाल की चुप्पी के सहारे/भरोसे ही अपने दावे को सच 'दिखा' रहे हैं । बहुमत की इस तरह की मनमानी व्याख्या और दिखावेबाजी से सवाल पैदा हुआ है कि बहुमत यदि 'ऐसे' ही तय होना है, तो फिर मीटिंग आदि की जरूरत ही क्या है ? और क्यों मीटिंग के रिकॉर्ड और मिनिट्स तैयार करने व रखने की जरूरत है ? इस मामले को लेकर इंस्टीट्यूट में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें प्रथम दृष्टया उचित मानते/देखते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने संबंधित पार्टियों से जबाव तलब किया है । वी सागर की इस कार्रवाई से लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में हो रही मनमानियों पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को इस बात से जैसे कोई मतलब ही नहीं है कि उनके प्रेसीडेंट-काल में हर कोई मनमानी कर रहा है, जिसके चलते नाहक ही विवाद पैदा हो रहे हैं - और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो रही है । जयपुर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विजय गुप्ता से भी मेज़बानी के मामले में हो रहे नियम के उल्लंघन को लेकर शिकायत की गई, लेकिन विजय गुप्ता ने जब देखा/पाया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ही कोई फिक्र नहीं है - तो वह ही मामले में क्यों पड़ें ? विजय गुप्ता इसलिए भी मामले से दूर रहना और बचना चाहते हैं, क्योंकि इस सारे झमेले के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं - जिन्हें नाराज करना सेंट्रल काउंसिल की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को नुकसान पहुँचाना हो सकता है ।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम की और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में लिए गए फैसले की ऐसी-तैसी करने के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा की निजी खुन्नस को देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर ब्राँच के सदस्यों के अनुसार, प्रकाश शर्मा को लगता है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके कहे में नहीं चलते हैं, और उनकी बजाए सेंट्रल काउंसिल के ही एक दूसरे सदस्य श्याम लाल अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो देते हैं । सेंट्रल काउंसिल के इन दोनों ही सदस्यों के बीच जयपुर में अपने अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर एक स्वाभाविक सी होड़ रहती ही है; इस होड़ में श्याम लाल गुप्ता का पलड़ा इसलिए भारी दिखता है, क्योंकि जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों में दो - प्रमोद बूब और रोहित रुवाटिया उनके साथ देखे/पहचाने जाते हैं तथा जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके नजदीक हैं । प्रकाश शर्मा को जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीसरे सदस्य गौतम शर्मा का ही समर्थन है । जयपुर ब्राँच और रीजनल काउंसिल में प्रकाश शर्मा भले ही श्याम लाल अग्रवाल से पिछड़ रहे हैं, लेकिन सेंट्रल काउंसिल में सेंट्रल रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सदस्यों में प्रकाश शर्मा का पलड़ा फिलहाल भारी है । खेमेबाजी के चलते कहीं कभी 'जीत' कभी कहीं 'हार' का नजारा बनता/दिखता रहता ही है - लेकिन जयपुर में अपनी 'हार' का बदला लेने के लिए प्रकाश शर्मा इस स्तर तक जायेंगे कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को ही दाँव पर लगा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । जयपुर ब्राँच जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए गौरव का प्रतीक है - राजनीति में आगे/पीछे होता ही रहता है; जयपुर ब्राँच में प्रकाश शर्मा यदि 'अपने' लोगों को नहीं जितवा सके और इस कारण से उन्हें ब्राँच में अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अवसर यदि नहीं मिल पा रहा है, तो इसकी खुन्नस में वह जयपुर ब्राँच का हक़ ही छिनवा देंगे - इसकी कल्पना उनके नजदीकियों और शुभचिंतकों तक ने नहीं की थी । जयपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारियों के साथ प्रकाश शर्मा की नाराजगी हो सकती है, लेकिन उनसे बदला लेने के लिए वह जयपुर ब्राँच की पहचान और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करेंगे - यह प्रकाश शर्मा की छोटी सोच का सुबूत और उदाहरण है ।

Wednesday, August 16, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की इंदौर ब्रांच में अपने मनमाने कार्य-व्यवहार को लेकर अपने खिलाफ बन रहे नाराजगी के माहौल के बावजूद केमिशा सोनी सेंट्रल काउंसिल के अगले चुनाव में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त क्यों हैं ?

इंदौर । इंदौर ब्रांच के कार्यक्रमों में चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को किनारे लगा कर एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी द्वारा जिस तरह की मनमानियाँ करने की चर्चाएँ हैं, उससे इंदौर के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती और मुखर होती जा रही है - जिसे देख कर उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि यह नाराजगी केमिशा सोनी को अगले चुनाव में कहीं भारी न पड़ जाए । केमिशा सोनी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को हालाँकि यह भी लगता है कि उनके विरोधी जिस तरह बिखरे पड़े हैं और निराश हैं, उसके कारण तमाम बदनामी के बाद भी केमिशा सोनी को कोई चुनावी नुकसान शायद ही हो ! इन लोगों का तर्क है इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वर्षों 'राज' करते रहे विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को करीब बीस महीने पहले केमिशा सोनी की तरफ से जो तगड़ा चुनावी झटका लगा है, उससे वह अभी तक भी उबर नहीं पाए हैं - जिसका नतीजा है कि करीब पंद्रह महीने बाद होने वाले चुनाव के लिए वह इंदौर में 'अपना' कोई उम्मीदवार तक नहीं खोज पाए हैं । पिछली बार जो विकास जैन उनके भरोसे उम्मीदवार बने थे और चुनाव हार गए थे, उनके रंग-ढंग अगली बार उम्मीदवार बनने के दिख नहीं रहे हैं; विकास जैन नहीं, तो उनकी जगह कौन उम्मीदवार बनेगा - विष्णु झावर और मनोज फडनिस की तरफ से उम्मीदवार बनने को लेकर अभी तक कोई अपनी दिलचस्पी व सक्रियता दिखाता हुआ नजर नहीं आया है । इस स्थिति को विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की राजनीतिक बदहाली के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की इस राजनीतिक बदहाली ने केमिशा सोनी को मनमानी करने की जैसे खुली छूट दे दी है । नजारा यहाँ तक देखा/सुना जा रहा है कि ब्रांच द्वारा आयोजित सेमिनारों में आमंत्रित किए जाने वाले वक्ता यदि केमिशा सोनी को पसंद नहीं होते हैं, तो वह उनका कार्यक्रम ही रद्द करवा देती हैं । केमिशा सोनी की इस कार्रवाई के चलते इंदौर के कई वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को पिछले दिनों अपमानित होना पड़ा और इंदौर ब्रांच के चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने शर्मिंदा होना पड़ा । ब्रांच के कामकाज और फैसलों में केमिशा सोनी का इस हद तक दखल बताया और सुना जाता है कि लोगों को सोमदत्त सिंघल तो बस एक कठपुतली चेयरमैन ही लगते हैं । मजे की बात यह देखने को मिल रही है कि जो लोग पहले विष्णु झावर और मनोज फडनिस के 'व्यवहार' से नाराज रहते/होते थे, वह अब कहने/बताने लगे हैं कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । उनका कहना है कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; आरोप है कि केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं और अपमानित करती हैं ।
केमिशा सोनी ने इंदौर ब्रांच के कामकाज और फैसलों में अपना जैसा हस्तक्षेप बना रखा है, उससे लोगों को लगा है कि जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । पिछले वर्ष ब्रांच में चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर को शुरू में केमिशा सोनी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता था, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि फिर जल्दी ही वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रहे चर्चिल जैन और निलेश गुप्ता का है : चर्चिल जैन रीजनल काउंसिल में वाइस चेयरमैन हैं, लेकिन इंदौर ब्रांच में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में उन्हें केमिशा सोनी की मनमानियों के सामने चुप ही बने रहना पड़ता है । उन्हें और निलेश गुप्ता को कई मौकों पर केमिशा सोनी के रवैये और व्यवहार पर इर्रीटेट होते हुए और मनमसोस कर अपमानित होते हुए देखा गया है । केमिशा सोनी के कार्य-व्यवहार को लेकर इंदौर में उनके खिलाफ नाराजगी का जो माहौल बन रहा है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित तो किया हुआ है - और उन्हें उम्मीद बंध रही है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं; उससे केमिशा सोनी को अगले चुनाव में नुक्सान उठाना पड़ सकता है, और केमिशा सोनी के नुक्सान के चलते विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका मिल सकेगा । यह अभी सिर्फ उम्मीद और अनुमान भर है, क्योंकि इस उम्मीद और अनुमान के पूरा होने की कोई रूपरेखा बनती हुई अभी तो नहीं नजर आ रही है । शायद इसी कारण से केमिशा सोनी लोगों के बीच अपने प्रति बढ़ती नाराजगी को लेकर बेपरवाह बनी हुई हैं ।

Thursday, March 16, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा होने की घोषणा से सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह की फजीहत हुई और प्रकाश शर्मा की मुसीबत बढ़ी

कानपुर । मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने की जो हरकत की, उसके निशान मिटाने के लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कदम तो उठाया है - लेकिन मुकेश कुशवाह की हरकतों के दाग इतने गहरे हैं कि लगता नहीं है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के प्रयासों के बावजूद वह पूरी तरह मिट पायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी की भूमिका निभा रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह ने अपनी मनमानीपूर्ण बेईमानी से दीप कुमार मिश्र को चेयरमैन 'चुनवाने' का जो कांड किया, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने उसे रद्द कर दिया है - और चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब उसकी किसी रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने का निर्णय हुआ है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इस काले अध्याय को जोड़ने की जिम्मेदारी के लिए मुकेश कुशवाह को याद किया जायेगा । इस कलंक-कथा की खास बात यह है कि मुकेश कुशवाह जब इसे 'लिख' ही रहे थे, तब ही इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से साफ शब्दों में बता दिया गया था कि वह जो कर रहे हैं - वह नियम विरुद्ध है और गलत है; मुकेश कुशवाह उस समय लेकिन पद की गर्मी और अहंकार में इस कदर जकड़े हुए थे कि उन्होंने साफ साफ लिखे उन शब्दों को कोई अहमियत ही नहीं दी ।
मुकेश कुशवाह को दरअसल उम्मीद थी कि वह जो फैसला कर देंगे, इंस्टीट्यूट प्रशासन अंततः उसे स्वीकार कर ही लेगा । मुकेश कुशवाह की तरफ से उस समय दावा किया भी गया था कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । अनिल भंडारी से मिले आश्वासन के भरोसे ही मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से नियमों के मिले हवाले की परवाह करने की जरूरत नहीं समझी । मुकेश कुशवाह अपनी कारस्तानी को लेकर इसलिए भी आश्वस्त थे क्योंकि उनके किए-धरे को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन मिला था । किंतु किसी का भी आश्वासन और समर्थन उनके काम नहीं आया । लोगों का कहना/मानना है कि दरअसल मुकेश कुशवाह की जैसी छवि है, उसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को लगा होगा कि मुकेश कुशवाह की इस हरकत पर उन्होंने यदि कोई कार्रवाई नहीं की तो मुकेश कुशवाह का हौंसला बढ़ेगा और फिर वह अपनी कारस्तानियों से इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को बदनाम करते रहेंगे । इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह द्धारा मनमानीपूर्ण बेईमानी से कराए गए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव को रद्द करके उक्त चुनाव को दोबारा कराने का आदेश दिया गया है ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंस्टीट्यूट के इतिहास और उसकी पहचान/प्रतिष्ठा पर मुकेश कुशवाह द्धारा पोती गई कालिख को इस तरह से पौंछने की कोशिश तो की गई है, लेकिन उसकी यह कोशिश अधिकतर लोगों को आधी-अधूरी भी लग रही है । लोगों का मानना/कहना है कि सिर्फ चेयरमैन का ही नहीं, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का पूरा चुनाव ही दोबारा होना चाहिए । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में पहले चेयरमैन का चुनाव होता है, और यह चुनाव बाकी पदों के लिए होने वाले चुनाव की भावभूमि और केमिस्ट्री तय करता है - इसलिए चेयरमैन के चुनाव में हुई बेईमानी ने बाकी सभी चुनावों पर अपना असर डाला है, इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन यदि वास्तव में न्याय करना चाहता है तो उसे पूरा चुनाव दोबारा कराना चाहिए; अन्यथा चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाला चुनाव महज खानापूर्ति करना होगा । मुकेश कुशवाह की मनमानीपूर्ण बेईमानी के चलते चेयरमैन पद पाने से वंचित रहे रोहित रुवाटिया अग्रवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगता है कि तीन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के समर्थन के बूते मुकेश कुशवाह जो बेईमानी कर सके, उसके चलते दोबारा होने वाले चुनाव में 'वास्तविक चुनाव' नहीं हो सकेगा - और रोहित रुवाटिया अग्रवाल के साथ सचमुच न्याय नहीं हो पायेगा । समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से रोहित रुवाटिया अग्रवाल को सलाह दी जा रही है कि उन्हें सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पदों का चुनाव दोबारा कराने हेतु इंस्टीट्यूट प्रशासन को राजी करने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । माना/समझा जाता है कि रद्द हुए चुनाव में प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को समर्थन नहीं दिया था । इसके लिए जयपुर और राजस्थान में उन्हें भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा है । लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जयपुर और राजस्थान का वास्ता देकर ही समर्थन जुटाया था, और अगले चुनाव में भी उन्हें यही 'वास्ता' देना पड़ेगा - ऐसे में जयपुर और राजस्थान को चेयरमैन 'मिलने' के मौके के साथ उन्होंने धोखा क्यों कर दिया ? प्रकाश शर्मा समय के साथ जयपुर और राजस्थान के लोगों के 'घाव' के भरने का इंतजार कर रहे थे कि दोबारा चुनाव होने/कराने की घोषणा ने उनके घावों को कुरेद कर फिर से ताजा कर दिया है । प्रकाश शर्मा और उनके नजदीकियों को यह डर सता रहा है कि चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में रोहित रुवाटिया अग्रवाल यदि नहीं जीते, तो जयपुर और राजस्थान में लोग इसके लिए प्रकाश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे और इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव का नतीजा क्या होगा, इसका जबाव तो जल्दी ही मिल जायेगा - लेकिन दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने मुकेश कुशवाह की बेईमानीपूर्ण कारस्तानी पर जो मोहर लगाई है और प्रकाश शर्मा के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसने सेंट्रल रीजन में एक दिलचस्प नजारा खड़ा किया है ।

Friday, March 3, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्रांच को कब्ज़ाने की कोशिशों के चलते सेंट्रल काउंसिल सदस्य केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी ने विष्णु झावर व मनोज फडनिस को वापसी करने के लिए उत्साहित और सक्रिय किया

इंदौर । इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी ने जिस तरह की मनमानियाँ कीं, उससे उनके समर्थकों व शुभचिंतकों तक को तगड़ा झटका लगा है - और उनके लगे झटके ने इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति में उथल-पुथल मचने के संकेत दिए हैं । इस प्रसंग ने इंदौर में केमिशा सोनी की बदनामी में और इजाफा किया है । केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के भी उनके खिलाफ होते जाने से विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को इंदौर की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस मिलने की उम्मीद होने लगी है, और उन्होंने इस बारे में अपने प्रयास भी तेज कर दिए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में केमिशा सोनी ने इन्हें कड़ी टक्कर दी थी, और इंदौर की राजनीति में इनके प्रभुत्व को धूल चटा दी थी; हालाँकि उस समय भी माना/समझा गया था कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस को केमिशा सोनी ने नहीं, बल्कि उनकी खुद की चौधराहटभरी कार्रवाइयों ने हराया है । विष्णु झावर के 'आशीर्वाद' से नियंत्रित होने वाली इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति से लोग इतने त्रस्त हो गए थे कि पिछले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों को हार का शिकार होना पड़ा था । यह हार इसलिए और उल्लेखनीय बन गई थी क्योंकि मनोज फडनिस के इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट होने के बावजूद उन्हें यह हार मिली थी । उम्मीद की गई थी कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस का हाल देखकर केमिशा सोनी सबक लेंगी और वह गलतियाँ नहीं करेंगी जो विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने कीं - और जिनके कारण उन्हें फजीहत झेलना पड़ी ।
लेकिन लोगों ने पाया कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । पिछले एक वर्ष में इंदौर ब्रांच के कामकाज में उनका जैसा हस्तक्षेप रहा है, उससे लोगों को लगा है जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । लोगों का कहना है कि उनका रवैया तो विष्णु झावर और मनोज फडनिस से भी बुरा है - यह लोग मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं । इंदौर ब्रांच में पिछले वर्ष चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर शुरू में केमिशा सोनी के समर्थकों में देखी/पहचानी जाती थीं, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि कार्यकाल पूरा होते होते वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला निलेश गुप्ता का है : रीजनल काउंसिल के सदस्य निलेश गुप्ता खेमेबाजी के संदर्भ में यूँ तो केमिशा सोनी वाले खेमे में 'होते' हैं, लेकिन कई मौकों पर उन्हें केमिशा सोनी के रवैये पर इर्रीटेट होते हुए देखा गया है । निलेश गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की राजनीति में निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी की 'राजनीति' का समर्थन नहीं करते हैं, इसलिए इंदौर ब्रांच के मामलों में केमिशा सोनी उन्हें अक्सर हड़काती रहती हैं - इंदौर ब्रांच में राजनीतिक खेमेबाजी का जो तानाबाना है, उसके कारण निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी के साथ रहने के लिए मजबूर हैं, इसलिए मनमसोस कर वह अपमानित होते रहते हैं ।
इंदौर ब्रांच के सदस्यों को ही नहीं, रीजनल काउंसिल के सदस्यों को भी अभी चार दिन पहले इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में केमिशा सोनी की मनमानियों का शिकार होना पड़ा । इस चुनाव में पहला झमेला तो चेयरमैन के चुनाव को लेकर हुआ - केमिशा सोनी ने इंस्टीट्यूट के नए बने नियम के हवाले से वाइस चेयरमैन को ही चेयरमैन बनाने के लिए दबाव बनाया; ब्रांच के बहुमत सदस्य लेकिन मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए चेयरमैन पद के लिए चुनाव कराने की माँग कर रहे थे - केमिशा सोनी ने लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को मानने/अपनाने से इंकार कर दिया । केमिशा सोनी ने हाईकोर्ट के फैसले की ही अवमानना नहीं की, बल्कि इंस्टीट्यूट के उक्त नियम के उस प्रावधान की भी अवहेलना की जो ब्रांच के दो-तिहाई सदस्यों को अधिकार देता है कि वह यदि एकमत हों तो चेयरमैन पद के लिए चुनाव कर सकते हैं । इससे भी बड़ी बात यह कि एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में केमिशा सोनी को ब्रांच के चुनाव को गवर्न करने का नैतिक अधिकार ही नहीं था - ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करने देना चाहिए था; लेकिन ब्रांच पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए केमिशा सोनी ने न नैतिकता की परवाह की, न हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार किया और न इंस्टीट्यूट के नियम को ही माना । ऐसा करते हुए उन्होंने ब्रांच के सदस्यों और रीजनल काउंसिल सदस्यों को तरह तरह से हड़काया व अपमानित किया, सो अलग ।
चेयरमैन पद 'हथियाने' के बाद केमिशा सोनी ने बाकी पदों पर भी नजर गड़ाई और उन्हें कब्जाने के लिए भी चालें चलीं - कुछेक पदों पर लेकिन उन्हें मात भी खानी पड़ी; इस सारे नज़ारे को लोगों ने बहुत ही बुरे प्रसंग के रूप में देखा और रेखांकित किया है । केमिशा सोनी के रवैये से इंदौर ब्रांच में पहली बार यह हुआ कि एक्सऑफिसो सदस्यों ने ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में वोट डाले - और इस तरह ब्रांच के सदस्यों की हैसियत घटाने का काम हुआ । पहली बार अल्पमत का व्यक्ति चेयरमैन बना है । ब्रांचेज के संचालन में एक अलिखित 'नियम' है कि ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करना चाहिए तथा एक्सऑफिसो सदस्यों को उनके अभिभावक तथा उनके सलाहकार के रूप में ही रहना चाहिए । जो नेता लोग ब्रांचेज में अपना प्रभुत्व बनाना चाहते हैं और बना कर रखना चाहते हैं, वह भी और चाहें जो उठापटक करें - लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' को पार करने से बचते हैं; केमिशा सोनी ने लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' की मर्यादा की कोई परवाह नहीं की और इस तरह इंदौर ब्रांच के इतिहास में काला पन्ना जोड़ा ।
केमिशा सोनी की इस कार्रवाई को लेकर इंदौर में नाराजगी का जो माहौल बना है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित किया है । उन्हें उम्मीद बंधी है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं - उससे उन्हें इंदौर की राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका आसानी से मिल जायेगा ।

Wednesday, March 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में मुकेश कुशवाह की नियम विरुद्ध मनमानी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे असहाय क्यों बने हुए हैं ?

कानपुर । दीप कुमार मिश्र को बेईमानीपूर्ण तरीके से सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन 'चुनवा' कर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के नए बने प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को खासे धर्मसंकट में फँसा दिया है । उन पर एक तरफ मुकेश कुशवाह की कारस्तानी को अनदेखा करने का दबाव है, तो दूसरी तरफ प्रेसीडेंट पद के रूप में अपने पद व इंस्टीट्यूट की गरिमा को बचाने की चुनौती है । मुकेश कुशवाह की तरफ से दावा सुना गया है कि उन्होंने नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । मुकेश कुशवाह इसलिए भी आश्वस्त हैं क्योंकि उनकी कारस्तानी को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नीलेश विकमसे के जो अन्य नजदीकी हैं, उनका कहना लेकिन यह भी है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह ने जो हरकत की है - उसे लेकर नीलेश विकमसे खासे परेशान भी हैं और उनका मानना है कि इस तरह की हरकतों पर वह यदि चुप रहे तो मुकेश कुशवाह जैसे लोग इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को अपनी कारस्तानी से बदनाम करते रहेंगे । 
मुकेश कुशवाह सहित सेंट्रल रीजन के चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मनमानीभरी दादागिरी का पहला लक्षण तो तब दिखा, जब उन्होंने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में वोट डालने का फैसला किया । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को वोटिंग में शामिल नहीं होना चाहिए, और रीजनल काउंसिल के सदस्यों को ही पदाधिकारी चुनने देना चाहिए । मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा व केमिशा सोनी ने लेकिन लगता है कि नैतिकता का पाठ पढ़ा ही नहीं है । इनकी बदकिस्मती लेकिन यह रही कि निर्लज्जता के साथ नैतिकता के पाठ की अनदेखी करने के बाद भी चेयरमैन पद के इनके उम्मीदवार दीप कुमार मिश्र को जीत नहीं मिल सकी । पंद्रह वोटों में दीप कुमार मिश्र और चेयरमैन पद के दूसरे उम्मीदवार रोहित रुवाटिया अग्रवाल को पहली वरीयता के सात-सात वोट मिले और एक वोट में पहली वरीयता का वोट नहीं दिया गया था, जबकि दूसरी वरीयता का वोट दीप कुमार मिश्र के लिए था । तर्कशील तरीके से देखें तो जो वोटर दीप कुमार मिश्र को दूसरी वरीयता का वोट दे रहा है, उसका पहली वरीयता का वोट रोहित रुवाटिया अग्रवाल के लिए ही रहा होगा - जो किसी तकनीकी गड़बड़ी के चलते मार्क नहीं हो पाया होगा । इंस्टीट्यूट का कामकाज लेकिन तर्कशीलता के आधार पर नहीं चलता है, वह ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही काम करेगा - और इसके लिए ही नियम-कानून बनाए गए हैं । इंस्टीट्यूट के नियम-कानून के अनुसार, इस पंद्रहवें वोट को रद्द होना चाहिए था ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में लेकिन इंस्टीट्यूट के नियम-कानून की अनदेखी करते हुए इस पंद्रहवें वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ कर उन्हें विजेता घोषित कर दिया । इससे पहले मुकेश कुशवाह ने एक हरकत यह और की थी कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल को मिले एक वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ दिया था, उनकी यह हरकत लेकिन तुरंत से पकड़ में आ गई थी । रद्द हो जाने वाले वोट को गिनती में शामिल करने के मामले में भी मुकेश कुशवाह की मनमानी का आलम यह रहा कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन अभय छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट के मुख्यालय से इस मामले में निर्देश लिया, तो संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से ईमेल के जरिये उनसे स्पष्ट कहा गया कि नियमानुसार उक्त वोट रद्द होगा - मुकेश कुशवाह ने लेकिन उनके फैसले को भी मानने से इंकार करते हुए दीप कुमार मिश्र को विजेता घोषित कर दिया । मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी  के रूप में जिस निर्लज्जता के साथ इंस्टीट्यूट के नियम की ऐसीतैसी की है, उसके कारण वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के पात्र बनते हैं - लेकिन उनका आत्मविश्वास दिखाता है कि इस मामले में उनकी इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के साथ सेटिंग हो चुकी है, और वह आश्वस्त हैं कि उनकी हरकत के चलते न तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी और न उनका फैसला ही बदला जायेगा ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में जो हरकत की है, उसे जयपुर ब्रांच की राजनीति के संदर्भ में बदले की कार्रवाई के रूप में भी देखा/बताया जा रहा है । जयपुर ब्रांच पर कब्जे की लड़ाई में प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा की जोड़ी को श्याम लाल अग्रवाल, प्रमोद कुमार बूब व रोहित रुवाटिया अग्रवाल की तिकड़ी से मात खानी पड़ रही है । प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को अपनी तरफ करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन उन्हें किसी भी तरह से सफलता नहीं मिली । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में रीजनल काउंसिल के सदस्यों में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा जब भारी दिखा, तो प्रकाश शर्मा को उन्हें दबाव में लेकर जयपुर ब्रांच पर कब्जे को लेकर सौदेबाजी करने का मौका मिला । चर्चा है कि प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को साफ बता दिया था कि जयपुर ब्रांच के मामले में वह यदि उनके ग्रुप का समर्थन नहीं करेंगे, तो उन्हें किसी भी कीमत पर रीजनल काउंसिल का चेयरमैन नहीं बनने दिया जायेगा । जो हुआ, उसके जरिये प्रकाश शर्मा ने अपनी धमकी को सच साबित करके दिखा दिया । उल्लेखनीय है कि जयपुर को आठ वर्ष बाद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन पद मिलने जा रहा था - जिसे लेकिन मुकेश कुशवाह, मनु शर्मा, केमिशा सोनी की मदद से प्रकाश शर्मा व गौतम शर्मा की ब्लैकमेल की राजनीति ने संभव नहीं होने दिया ।

Monday, February 29, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव में अभय शर्मा को विकास जैन के नजदीक तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दे/दिलवा कर केमिशा सोनी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया

इंदौर । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव को लेकर घटनाओं का जो अप्रत्याशित और नाटकीय चक्र घूमा, उसने किसी भी थ्रिलर फिल्म को मात देने का काम किया है । इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव - नाम की जिस थ्रिलर ने इस समय इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रोमांचक रूप में चौंकाया हुआ है, उसकी पटकथा लिखने से लेकर निर्देशन करने तक के काम के लिए केमिशा सोनी को जिम्मेदार माना/बताया जा रहा है । जैसे फिल्म को एक्टर की बजाए निर्देशक के उपक्रम के रूप में देखा/पहचाना जाता है - नाम/दाम भले ही एक्टर भी कमाता हो; लेकिन फिल्म निर्देशक के 'काम' के रूप में ही देखी/पहचानी जाती है : ठीक उसी तर्ज पर चेयरपरसन का पद जीता भले ही गर्जना राठौर ने हो, लेकिन उनकी इस जीत को उनकी नहीं बल्कि केमिशा सोनी की जीत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जैसे जीत गर्जना राठौर की नहीं है, वैसे ही हार अभय शर्मा की नहीं है - अभय शर्मा को हरवा कर केमिशा सोनी ने वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस को 'हराया' है । पिछले तीन महीनों में जितने जो चुनाव हुए हैं, उनके नतीजे इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति की बदलती हवा की कहानी तो कहते ही हैं - लेकिन उसमें भी कुछ परस्पर-विरोधी बातें कहते हैं, जिन्हें सफलता की खुशी और असफलता की निराशा में दोनों ही पक्ष अनसुना किए हुए हैं ।
उल्लेखनीय है कि इंदौर में हर कोई मान रहा था और कह भी रहा था कि इंदौर ब्राँच के चेयरमैन पद पर अभय शर्मा ही बैठेंगे । इसका कारण भी था । इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी में अभय शर्मा अकेले सदस्य हैं, जिनकी मैनेजिंग कमेटी में दूसरी टर्म है और इस लिहाज से वह वरिष्ठ हैं और अनुभवी हैं । इसके आलावा, इंदौर ब्राँच के चुनाव में अभय शर्मा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे - सिर्फ सबसे ज्यादा नहीं, दूसरे उम्मीदवारों से बहुत ज्यादा वोट मिले थे । चुनावी राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि इस तरह के तथ्य किसी भी उम्मीदवार का हौंसला तो बढ़ाते हैं, उसकी उम्मीदवारी में 'वज़न' तो पैदा करते हैं - लेकिन उसकी जीत की संभावना में निर्णायक तत्व नहीं बनते हैं । अभय शर्मा के चेयरमैन पद की दावेदारी में इन तथ्यों का महत्व तो था, लेकिन उनकी दावेदारी को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने का काम जो तथ्य कर रहा था, वह था इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी के नवनिर्वाचित आठ सदस्यों में उन्हें मिलते दिख रहे छह सदस्यों का समर्थन । अभय शर्मा को पंकज शाह, कीर्ति जोशी, गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन का समर्थन मिलता नजर आ रहा था । इसी बिना पर अभय शर्मा को चेयरमैन के रूप में देखा जाने लगा था । प्रत्येक तथ्य और प्रत्येक संकेत चेयरमैन पद पर अभय शर्मा की ताजपोशी करवा रहा था । लेकिन केमिशा सोनी ने सारा सीन पलट दिया और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में वह कर दिखाया, जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था ।
केमिशा सोनी ने इससे पहले, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत कर भी विष्णु झावर और मनोज फडनिस को खासा तगड़ा वाला झटका दिया था, और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में सभी को चौंकाया था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विष्णु झावर और मनोज फडनिस के खुले समर्थन के बावजूद विकास जैन के हार जाने की उम्मीद तो बहुतों को थी, किंतु केमिशा सोनी के जीतने की उम्मीद किसी को नहीं थी । ऐसे में, केमिशा सोनी की जीत - सिर्फ जीत नहीं, बड़ी जीत ने उनका कद तो बढ़ाया ही - वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस का कद घटाने का काम ज्यादा किया । किंतु सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से भी 'बड़ा' चुनाव इंदौर ब्राँच का चुनाव था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में तो मान लिया गया था कि विष्णु झावर व मनोज फडनिस ने विकास जैन जैसे बेकार-से उम्मीदवार पर दाँव लगाया, और उसकी सजा पाई; इंदौर ब्राँच का चुनाव छोटा होने के बावजूद 'बड़ा' इसलिए था, क्योंकि विष्णु झावर व मनोज फडनिस का असली असर तो यहीं है । अभय शर्मा की जोरदार जीत से यह असर दिखा भी । चेयरमैन का चुनाव और छोटा हो जाने के कारण और ज्यादा 'बड़ा' हो गया । इस चुनाव में मिली 'जीत' इसीलिए ही केमिशा सोनी के लिए सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में मिली जीत से भी बड़ी जीत है । दरअसल यही एक ऐसा पहला चुनाव था जिसमें केमिशा सोनी का विष्णु झावर व मनोज फडनिस से आमने-सामने का सीधा मुकाबला था ।
सारे तथ्य, सारे समीकरण, सारी परिस्थितियाँ हालाँकि चेयरमैन पद के चुनाव में अभय शर्मा की जीत की तरफ इशारा कर रही थीं - किंतु अभय शर्मा और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने इंदौर में बदल रही हवा के रुख को पहचानने/समझने में चूक कर दी । इस बदल रही हवा का संकेत सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के चुनाव में तो स्पष्ट रूप से मिला ही; इंदौर ब्राँच के चुनाव  में भी दिखा/मिला - जब अभय शर्मा की बड़ी जीत को बेईमानी व हेराफेरी से मिली जीत के रूप में प्रचारित किया गया । इस बात को जिस तरह से हवा मिली, उससे यह साबित हुआ कि इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'नेताओं' के बीच विष्णु झावर व मनोज फडनिस खेमे के खिलाफ भारी नाराजगी है । इस तथ्य को केमिशा सोनी ने पहचाना और इसे अपनी राजनीति में इस्तेमाल करने की उन्होंने तैयारी की । इंदौर ब्राँच में चुने गए नवनिर्वाचित सदस्य चूँकि अलग-अलग नेताओं के नजदीकी के रूप में या संपर्क में पहचाने गए, इसलिए उन्हें इकट्ठा करने में केमिशा सोनी को कोई बहुत मशक्कत नहीं करना पड़ी । इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं को केमिशा सोनी को सिर्फ यह समझाना पड़ा कि अभय शर्मा के चेयरमैन बनने से इंदौर ब्राँच पर विकास जैन का कब्जा हो जायेगा, और फिर विकास जैन मनमानी करेंगे । विकास जैन की मनमानी का डर दिखा कर और पदों का ऑफर देकर केमिशा सोनी ने गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन को अभय शर्मा के समर्थन से अलग कर दिया । चेयरमैन का पद अभय शर्मा से जिस तरह से 'छीन' लिया गया है, उसके जरिए दरअसल उन्हें विकास जैन के नजदीक होने तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दी गई है - और इस कार्रवाई से केमिशा सोनी ने इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया है ।

Sunday, January 3, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन को इंदौर में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की चौधराहट के खिलाफ फैली नाराजगी का शिकार होना पड़ा

इंदौर । विकास जैन की कूड़ा बुहारते सार्वजनिक हुई तस्वीर ने एक मजेदार किस्म का प्रतीकात्मक संयोग बनाया - क्योंकि जिस समय उनकी यह तस्वीर लोगों के सामने आई, लगभग उसी समय इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चल रही वोटों की गिनती में विकास जैन के 'बुहारे' जाने की सूचना लोगों को मिली । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 23 उम्मीदवारों के बीच विकास जैन के 847 वोटों के साथ दसवें नंबर पर रहने की सूचना मिली तो हर कोई हैरान रह गया । विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए ही नहीं, उनके विरोधियों के लिए भी यह नतीजा हैरान करने वाला था । इंदौर में यह मानने और कहने वाले लोग तो काफी थे कि विकास जैन चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन उनकी इतनी बुरी हार की उम्मीद उनके घनघोर किस्म के विरोधियों को भी नहीं थी । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि केमिशा सोनी चुनाव जीत गईं - और अच्छे प्रदर्शन के साथ जीत गईं । 1328 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह तीसरे नंबर पर थीं । विकास जैन की हार की तरह केमिशा सोनी की जीत भी इंदौर के लोगों के लिए किसी चमत्कार की तरह रही । वास्तव में, केमिशा सोनी के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी उनकी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी । इसलिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन की बड़ी हार तथा केमिशा सोनी की बड़ी जीत के कारणों को समझने/पहचानने के लिए गहन विश्लेषण की जरूरत है । 
पहली नजर में यह चुनावी नतीजा विष्णु झावर और मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु झावर उर्फ काका जी को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं । इन दोनों का समर्थन विकास जैन को था । सिर्फ समर्थन होता, तो भी कोई बात नहीं थी - हर किसी का किसी न किसी को समर्थन होता ही है; विष्णु झावर और मनोज फडनिस की भूमिका लेकिन समर्थक से बड़ी - बहुत बड़ी थी । उन्होंने विकास जैन को चुनाव जितवाने के लिए जो भी, जैसी भी तीन-तिकड़म हो सकती थी - वह की; और इसके लिए अपनी वरिष्ठता, अपनी पोजीशन व अपने पद की गरिमा तक को दाँव पर लगाया हुआ था । मनोज फडनिस भूल गए थे कि वह एक उम्मीदवार के समर्थक कार्यकर्ता नहीं हैं; इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं, और इस नाते उनकी कुछ नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है । विष्णु झावर व मनोज फडनिस की देखरेख में चले विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान का सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि कई मौकों पर केमिशा सोनी को बहुत ही अभद्र व अशालीन तरीके से निशाना बनाया गया । समझा जाता है कि इसी बात ने केमिशा सोनी के प्रति लोगों के बीच हमदर्दी पैदा की, जिसका उन्हें चुनावी फायदा मिला । 
विष्णु झावर को इंदौर में कई लोगों ने यह समझाने की कोशिश की थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए विकास जैन उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं; और विकास जैन की जगह किसी और को उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहिए । विष्णु झावर ने लेकिन किसी की नहीं सुनी । उन्होंने माना और कहीं कहीं कहा भी कि भले ही विकास जैन सेंट्रल काउंसिल के लायक न हों, किंतु मैं उन्हें सेंट्रल काउंसिल में भिजवाऊँगा । विष्णु झावर की इस अहंकारपूर्ण सोच व कहन को लोगों ने लगता है कि दिल पर ले लिया; और उन्हें विष्णु झावर व मनोज फडनिस को यह 'बताना' जरूरी लगा कि सेंट्रल काउंसिल में किसी को भिजवाने का काम उनका नहीं, 'हमारा' है । कुछेक लोगों का कहना है कि इंदौर में विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने चौधराहट दिखाने/ज़माने की जो कोशिश की है, उसके प्रति लोगों के बीच गहरी नाराजगी व विरोध का भाव है, जिसका शिकार विकास जैन को होना पड़ा है । इन दोनों की छाया में रहने के कारण विजेश खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल तक का चुनाव हार गए । इसीलिए विकास जैन की हार को विकास जैन की हार के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।