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Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।

Thursday, March 22, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की राजनीति को छोड़ अनुज गोयल का विधान परिषद का टिकट जुगाड़ने में लगने और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र के सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारी में जुटने की खबरों ने उत्तर प्रदेश में इंस्टीट्यूट की राजनीति के समीकरण बिगाड़े

गाजियाबाद । अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट की राजनीति में दिलचस्पी लेना छोड़ कर उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की सदस्यता जुगाड़ने में लग जाने से मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ आदि ने राहत की जो साँस लेना शुरू किया था, उसमें ज्ञान चंद्र मिश्र की सेंट्रल काउंसिल के लिए दिखाई गई दिलचस्पी ने फिर से मुसीबत खड़ी कर दी है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह और मनु अग्रवाल सेंट्रल रीजन से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में हैं, और इन्हें इस वर्ष दिसंबर में होने वाले चुनाव में पुनर्वापसी के लिए फिर से चुनाव का सामना करना है; जबकि विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश करने की कोशिश के तहत चुनाव में उतरने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं । विनय मित्तल पिछली बार चुनाव हार गए थे, और अमरेश वशिष्ठ पिछले तीन चुनावों से लगातार हारते आ रहे हैं । इन चारों को पिछले महीनों में यह देख कर खासा तगड़ा झटका लगा कि अनुज गोयल एक बार फिर से सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं, जिसके चलते वह ब्रांचेज के कार्यक्रमों में बाहर ही हाथ जोड़े खड़े मिल/दिख जा रहे हैं । लगातार तीन टर्म ही सेंट्रल काउंसिल में रहने के नियम के चलते अनुज गोयल को पिछली बार चुनाव से बाहर बैठना पड़ा था; हालाँकि बाहर बैठ कर भी उन्होंने अपने भाई जितेंद्र गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़वा दिया था - जितेंद्र गोयल लेकिन चुनाव हार गए थे, यद्यपि वोट उन्हें अच्छे मिल गए थे । जितेंद्र गोयल की हार से लोगों ने मान लिया था कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीती में अनुज गोयल के दिन पूरे हो गए हैं । अनुज गोयल लेकिन जब चुनाव की तैयारी करते नजर आए - तो मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ को डर हुआ कि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल की उम्मीदवारी उनमें से न जाने किसका खेल बिगाड़ दे ?
अनुज गोयल लेकिन चुनावी सीन से अचानक से गायब हो गए । अभी कुछ महीने पहले तक वह सेंट्रल रीजन की हर ब्रांच के हर प्रमुख कार्यक्रम में हाथ जोड़े बाहर ही खड़े मिलते/दिखते थे, किंतु काफी दिनों से रीजन के लोगों को वह न कहीं दिख रहे हैं और न उनके फोन और मैसेज लोगों को मिल रहे हैं । उनके शुभचिंतकों ने पता किया तो मालुम चला कि अनुज गोयल आजकल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य होने का जुगाड़ बैठाने में लगे हैं, और इसके लिए आजकल रामदेव की सेवा में हैं । उनके नजदीकियों का तो कहना/बताना है कि रामदेव की सिफारिश पर विधान परिषद की सदस्यता मिलने का अनुज गोयल को पूरा पूरा भरोसा है, इसलिए उन्होंने इंस्टीट्यूट की राजनीति से ध्यान हटा कर अपनी सक्रियता का केंद्र रामदेव तक सीमित किया हुआ है । उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2012 में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की ब्रांचेज के चेयरमेंस की हरिद्वार में मीटिंग हुई थी, जिसमें एक वक्ता के रूप में रामदेव को भी बुलाया गया था । अनुज गोयल ने तभी से रामदेव से पींगें बढ़ाना शुरू कर दिया था । अनुज गोयल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि रामदेव की सत्ताधारी नेताओं से नजदीकी का फायदा उठा कर अनुज गोयल ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद के टिकट के लिए चक्कर चलाया है; और चूँकि उत्तर प्रदेश में जल्दी ही विधान परिषद के चुनाव होने हैं - इसलिए अनुज गोयल ने अपना सारा ध्यान रामदेव पर और विधान परिषद के टिकट पर लगाना शुरू किया है, और इस कारण से इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य से वह गायब हैं ।
अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य से गायब होने पर मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ को एक बड़े दबाव से मुक्ति मिलने का अहसास हुआ और उन्होंने राहत की साँस ली थी । लेकिन यह बेचारे अभी राहत की साँस पूरी तरह ले भी नहीं पाए थे कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के नए बने चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र की तरफ से सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारियाँ शुरू होने की खबरें मिलने लगीं । ज्ञान चंद्र मिश्र ने जिस तरह से पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव जीता था, और जिन हालात में वह चेयरमैन बने हैं - उससे लोगों के बीच यह संदेश तो है ही कि उनका नेटवर्क भी अच्छा है और उनकी किस्मत भी तेज है । पिछले चुनाव के दौरान वह जिस पारिवारिक मुसीबत में घिरे थे, उसके कारण उन्हें चुनावी दौड़ से बाहर ही मान लिया गया था - लेकिन वह न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि जीते भी तो इसे उनके प्रभावी नेटवर्क के सुबूत के तौर पर देखा गया । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में भी उनकी उम्मीदवारी के सामने ऐन मौके पर भारी मुसीबत खड़ी हो गयी थी, लेकिन फिर भी वह चेयरमैन बन गए - तो इसे उनकी तेज किस्मत के रूप में देखा/पहचाना गया है । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि ज्ञान चंद्र मिश्र ने यदि सचमुच सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिए तो उनका प्रभावी नेटवर्क और उनकी तेज किस्मत उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है । इस तरह उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवारों के लिए मामला 'आसमान से गिरे, खजूर पर अटके' की तर्ज पर 'अनुज गोयल से गिरे, ज्ञान चंद्र मिश्र पर अटके' जैसा हो गया है ।

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।