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Monday, February 11, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ की पर्दे की आगे/पीछे के 'सक्रियता' को देखते हुए अतुल गुप्ता और केमिशा सोनी ने उनका और उनके नजदीकियों का समर्थन पाने के लिए दाँव तो अच्छा चला है, लेकिन देखने की बात यह होगी कि प्रफुल्ल छाजेड़ अगले वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इनमें से किसी एक पर भरोसा करते हैं या किसी और पर ?

नई दिल्ली । अतुल गुप्ता ने वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए फील्डिंग तो अच्छी सजाई है, लेकिन दूसरे कुछेक लोगों को लगता है कि उनके व्यवहार/रवैये से नाराज रहने वाले सेंट्रल काउंसिल सदस्य उनकी बजाये केमिशा सोनी का खेल जमा सकते हैं । इन दोनों को पछाड़ कर आगे रहने के लिए अब्राहम बाबु की पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के 'आदमी' होने की छवि से निकलने की जोरदार कोशिश ने लेकिन इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव को दिलचस्प बना दिया है । कंपनी सेक्रेटरीज इंस्टीट्यूट की तरह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में भी 'सरकारी' सदस्यों के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में भाग लेने की आशंकाएँ और चर्चाएँ काफी हैं, लेकिन साथ-साथ दावा भी सुना/कहा जा रहा है कि मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ ने 'सरकारी' सदस्यों की 'नस' दबा/दबवा कर वैसा कुछ न होने देने की व्यवस्था की हुई है । इस बारे में खास बात यह है कि इंस्टीट्यूट की अगली काउंसिल में चूँकि वही सरकारी सदस्य नोमीनेट हो गए हैं, जो मौजूदा काउंसिल में हैं - इसलिए वह प्रफुल्ल छाजेड़ को और प्रफुल्ल छाजेड़ उन्हें 'जानते' हैं; इसलिए विश्वास किया जा रहा है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में सरकारी सदस्य वैसी हरकत नहीं करेंगे, जैसी हरकत कंपनी सेक्रेटरीज इंस्टीट्यूट में सरकारी सदस्यों ने की है । प्रफुल्ल छाजेड़ की कुछ पर्दे के सामने की और कुछ पर्दे के पीछे की सक्रियता ने भी इस बार के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को 'गंभीर' रूप दिया हुआ है ।   
सरकारी सदस्यों के समर्थन के बूते, दरअसल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा और अनुज गोयल ने वाइस प्रेसीडेंट चुने जाने के दावे किए हैं । इस दावे के जरिये वास्तव में इन्होंने सेंट्रल काउंसिल के चुने हुए सदस्यों पर दबाव बनाने और उनका समर्थन जुटाने का प्रयास किया । इन तीनों को उम्मीद रही कि सरकारी सदस्यों के समर्थन का दावा करेंगे, तो सेंट्रल काउंसिल के चुने हुए सदस्य इनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेंगे और यह वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी दौड़ में शामिल हो जायेंगे । लेकिन कोई इनके झाँसे में आता हुआ नजर तो नहीं आ रहा है । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अब्राहम बाबु की उम्मीदवारी का ज्यादा शोर रहा है; हालाँकि इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के उनके समर्थन होने की चर्चा ने उस शोर को जल्दी ही दबाव में ले लिया । अब्राहम बाबु और उनके समर्थकों ने भाँप लिया कि उत्तम अग्रवाल का समर्थन उन्हें फायदा पहुँचाने की बजाये नुकसान पहुँचाने का ही काम करेगा; और इसलिए पिछले कुछेक दिनों में उन्होंने उत्तम अग्रवाल की 'छाया' से बचने तथा दूर 'दिखने' का भरसक प्रयास किया है । दरअसल काउंसिल सदस्यों के बीच उत्तम अग्रवाल की जैसी बदनामी है, उसे देख/पहचान कर ही अब्राहम बाबु और उनके समर्थकों को इस बात की जरूरत महसूस हुई कि यदि उन्हें सचमुच वाइस प्रेसीडेंट बनना है - तो उन्हें उत्तम अग्रवाल का उम्मीदवार 'दिखने' से बचना होगा । अब्राहम बाबु की इस  कोशिश ने वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में अतुल गुप्ता और केमिशा सोनी के लिए मुकाबले को मुश्किल बना दिया है ।
चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में अब्राहम बाबु के साथ-साथ अतुल गुप्ता और केमिशा सोनी की उम्मीदवारी को ही गंभीरता से लिया/देखा जा  रहा है - और इन दोनों ने ही उत्तम अग्रवाल के विरोधी काउंसिल सदस्यों का समर्थन जुटाने पर जोर दिया है । इस जोर के बहाने वास्तव में इन्होंने मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ और उनके नजदीकियों व समर्थकों का समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । अतुल गुप्ता के मुकाबले केमिशा सोनी का विवादों से चूँकि कम रिश्ता रहा है, इसलिए कुछेक लोगों को केमिशा सोनी का पलड़ा भारी दिखता है; लेकिन अतुल गुप्ता और उनके नजदीकियों को काउंसिल सदस्यों की पुरुषवादी सोच पर भरोसा है और उम्मीद है कि काउंसिल सदस्य एक महिला को (वाइस) प्रेसीडेंट चुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे और यही बात केमिशा सोनी के मुकाबले उन्हें आगे रखेगी । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों को याद होगा भी कि भावना दोषी हर तरह से समर्थ होने के और अपना एक ऑरा रखने के बावजूद - सिर्फ महिला होने के कारण - (वाइस) प्रेसीडेंट नहीं बन सकीं । यह देखना सचमुच विडंबनापूर्ण होगा कि केमिशा सोनी के मामले में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट का चुनावी इतिहास क्या पहले जैसे फूहड़ तरीके से एक फिर अपने को दोहरायेगा ? इस बार के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव को लेकर होने वाली उठापटक से परिचित लोगों का हालाँकि यह भी कहना है कि कम उम्मीदवार होने के कारण हो सकता है कि चुनावी नतीजा सभी को चौंका ही दे - और फिलहाल चुनावी दौड़ में आगे 'दिखने' वाले अब्राहम बाबु, अतुल गुप्ता और केमिशा सोनी ताकते ही रह जाएँ ! 

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Thursday, January 18, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की काउंसिल की महिला सदस्यों को दरकिनार कर अपनी पत्नी अर्चना शर्मा को बुमेन कॉन्फ्रेंस का डायरेक्टर बनवा कर राजेश शर्मा ने एक बार फिर इंस्टीट्यूट की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का काम किया

नई दिल्ली । महिला सशक्तिकरण के नाम पर 'पत्नी सशक्तिकरण' करने की राजेश शर्मा की हरकत से लोगों के बीच एक बार फिर यह साबित हुआ कि राजेश शर्मा किसी भी तरह से सुधरने वाले नहीं हैं । उल्लेखनीय है कि राजेश शर्मा अपनी हरकतों के चलते प्रोफेशन के लोगों के बीच बार बार लताड़ खाते रहे हैं । इंस्टीट्यूट के इतिहास में राजेश शर्मा अभी तक अकेले ऐसे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं, जिन्हें प्रोफेशन के लोगों की नाराजगी का शिकार होने से बचने के लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में खिड़की से कूद कर भागना पड़ा और जिनके लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे लगाए गए और गूँजे । उम्मीद की गई थी कि प्रोफेशन के लोगों के बीच अपनी हो/बढ़ रही बदनामी से सबक लेकर राजेश शर्मा अपने व्यवहार और आचरण में संजीदगी लायेंगे, और ऐसे काम करने से बचेंगे - जो लोगों के बीच उनकी नकारात्मक पहचान को बढ़ाए व गाढ़ा करें । लेकिन राजेश शर्मा बार बार अपनी हरकतों से लोगों की उम्मीदों को ठेंगा दिखा देते हैं और पिछली बार से भी बड़ा कारनामा कर दिखाते हैं । राजेश शर्मा अभी तक तो अपनी हरकतों से प्रोफेशन के सदस्यों को ही परेशान, उपेक्षित और अपमानित करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को ही निशाने पर ले लिया है । इंस्टीट्यूट की कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी और नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के संयुक्त तत्त्वाधान में 'बुमेन कॉन्फ्रेंस' करने में जल्दबाजी करने तथा राजेश शर्मा की पत्नी अर्चना शर्मा के कॉन्फ्रेंस की डायरेक्टर 'बनने' में राजेश शर्मा की जो हरकत रही है, प्रोफेशन के लोगों के बीच उसे लेकर भारी नाराजगी है । 
मजे की बात यह है कि कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी में सेंट्रल काउंसिल की दो महिला सदस्य - के श्रीप्रिया और केमिशा सोनी हैं, तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दो महिला सदस्य - योगिता आनंद व पूजा बंसल हैं; लेकिन बुमेन कॉन्फ्रेंस का डायरेक्टर इनमें से किसी को न बना कर राजेश शर्मा की पत्नी को बनाया गया । कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी के चेयरमैन मुकेश कुशवाह से इस बारे में कुछ लोगों ने जब बात की, तो उन्होंने यह कहते हुए मामले से अपने को अलग कर लिया कि इस बारे में सभी फैसले राजेश शर्मा कर रहे हैं, लिहाजा उनसे ही पूछो । राजेश शर्मा उक्त कमेटी के वाइस चेयरमैन हैं । कमेटी के बाकी लोगों का कहना है कि मुकेश कुशवाह तो बस कहने के लिए चेयरमैन हैं, उन्हें कुछ आता/जाता भी नहीं है और उन्हें कुछ करने में दिलचस्पी भी नहीं है - जिसके चलते राजेश शर्मा ने ही चेयरमैन की 'जिम्मेदारियाँ' ले ली हैं । 'बुमेन कॉन्फ्रेंस' की तैयारी को लेकर जो मीटिंग हुई, उसमें भी अर्चना शर्मा को डायरेक्टर बनाने पर सवाल उठे, और पूछा गया कि उनका कहाँ क्या योगदान है और उन्होंने ऐसा क्या किया है कि चार काउंसिल सदस्यों के होते हुए उन्हें डायरेक्टर बनाया जा रहा है; तो इसके जबाव में सुनने को मिला कि चेयरमैन ने कहा है कि भाभी जी को ही डायरेक्टर बनाना है । यहाँ चेयरमैन से मतलब राकेश मक्कड़ से है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ किस हद तक राजेश शर्मा की गिरफ्त में हैं, और उनकी जी-हुजूरी में रहते हैं - यह अब जगजाहिर बात है ।
राजेश शर्मा की पत्नी अर्चना शर्मा को डायरेक्टर बनाने से काउंसिल सदस्य ही नहीं, बल्कि राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ के कई समर्थक तक नाराज हो गए हैं । इनके समर्थकों व नजदीकियों में जो महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, उनमें से कइयों ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि चुनाव के समय तो यह उनसे मदद लेते हैं, और जब कहीं कार्यक्रम का मौका आता है, तो अपनी पत्नी और भाभी ही इन्हें दिखती हैं । अपनी पत्नी को डायरेक्टर बनवाने की राजेश शर्मा की हरकत को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी पैदा हुई है, उसने बुमेन कॉन्फ्रेंस के बुरी तरह फ्लॉप होने की स्थिति बना दी है । कॉन्फ्रेंस को फ्लॉप होने से बचाने के लिए राजेश शर्मा और उनके 'चंपुओं' ने वाट्स-ऐप पर अभियान तो चलाया हुआ है, लेकिन उसका कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है । राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ से इस वर्ष होने वाले रीजनल काउंसिल के चुनाव में सहयोग/समर्थन मिलने की उम्मीद में कुछेक संभावित उम्मीदवारों - जो पिछली बार हार गए थे - ने भी कॉन्फ्रेंस को कामयाब बनाने का बीड़ा उठाया हुआ है । राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की तरफ से महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तथा ब्रांचेज में महिला पदाधिकरियों को ट्रॉफी व अवॉर्ड का लालच देकर ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को कॉन्फ्रेंस में लाने के लिए प्रेरित भी किया जा रहा है । उन्हें उम्मीद है कि ट्रॉफी और अवॉर्ड के लालच में कई महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तथा ब्रांचेज में महिला पदाधिकारी कॉन्फ्रेंस को सफल बनाने में जुट जायेंगी । हारे हुए और लालची किस्म के 'नेताओं' के भरोसे, अपनी पत्नी की डायरेक्टरशिप में होने वाली बुमेन कॉन्फ्रेंस को कामयाब बनाने की राजेश शर्मा की कोशिशों ने इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख व प्रतिष्ठा को उनके हाथों एक बार फिर कलंकित करने का ही काम किया है ।

Wednesday, August 16, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की इंदौर ब्रांच में अपने मनमाने कार्य-व्यवहार को लेकर अपने खिलाफ बन रहे नाराजगी के माहौल के बावजूद केमिशा सोनी सेंट्रल काउंसिल के अगले चुनाव में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त क्यों हैं ?

इंदौर । इंदौर ब्रांच के कार्यक्रमों में चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को किनारे लगा कर एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी द्वारा जिस तरह की मनमानियाँ करने की चर्चाएँ हैं, उससे इंदौर के वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती और मुखर होती जा रही है - जिसे देख कर उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि यह नाराजगी केमिशा सोनी को अगले चुनाव में कहीं भारी न पड़ जाए । केमिशा सोनी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को हालाँकि यह भी लगता है कि उनके विरोधी जिस तरह बिखरे पड़े हैं और निराश हैं, उसके कारण तमाम बदनामी के बाद भी केमिशा सोनी को कोई चुनावी नुकसान शायद ही हो ! इन लोगों का तर्क है इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वर्षों 'राज' करते रहे विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को करीब बीस महीने पहले केमिशा सोनी की तरफ से जो तगड़ा चुनावी झटका लगा है, उससे वह अभी तक भी उबर नहीं पाए हैं - जिसका नतीजा है कि करीब पंद्रह महीने बाद होने वाले चुनाव के लिए वह इंदौर में 'अपना' कोई उम्मीदवार तक नहीं खोज पाए हैं । पिछली बार जो विकास जैन उनके भरोसे उम्मीदवार बने थे और चुनाव हार गए थे, उनके रंग-ढंग अगली बार उम्मीदवार बनने के दिख नहीं रहे हैं; विकास जैन नहीं, तो उनकी जगह कौन उम्मीदवार बनेगा - विष्णु झावर और मनोज फडनिस की तरफ से उम्मीदवार बनने को लेकर अभी तक कोई अपनी दिलचस्पी व सक्रियता दिखाता हुआ नजर नहीं आया है । इस स्थिति को विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की राजनीतिक बदहाली के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे की इस राजनीतिक बदहाली ने केमिशा सोनी को मनमानी करने की जैसे खुली छूट दे दी है । नजारा यहाँ तक देखा/सुना जा रहा है कि ब्रांच द्वारा आयोजित सेमिनारों में आमंत्रित किए जाने वाले वक्ता यदि केमिशा सोनी को पसंद नहीं होते हैं, तो वह उनका कार्यक्रम ही रद्द करवा देती हैं । केमिशा सोनी की इस कार्रवाई के चलते इंदौर के कई वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को पिछले दिनों अपमानित होना पड़ा और इंदौर ब्रांच के चेयरमैन सोमदत्त सिंघल को उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने शर्मिंदा होना पड़ा । ब्रांच के कामकाज और फैसलों में केमिशा सोनी का इस हद तक दखल बताया और सुना जाता है कि लोगों को सोमदत्त सिंघल तो बस एक कठपुतली चेयरमैन ही लगते हैं । मजे की बात यह देखने को मिल रही है कि जो लोग पहले विष्णु झावर और मनोज फडनिस के 'व्यवहार' से नाराज रहते/होते थे, वह अब कहने/बताने लगे हैं कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । उनका कहना है कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; आरोप है कि केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं और अपमानित करती हैं ।
केमिशा सोनी ने इंदौर ब्रांच के कामकाज और फैसलों में अपना जैसा हस्तक्षेप बना रखा है, उससे लोगों को लगा है कि जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । पिछले वर्ष ब्रांच में चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर को शुरू में केमिशा सोनी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता था, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि फिर जल्दी ही वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इंदौर का प्रतिनिधित्व कर रहे चर्चिल जैन और निलेश गुप्ता का है : चर्चिल जैन रीजनल काउंसिल में वाइस चेयरमैन हैं, लेकिन इंदौर ब्रांच में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में उन्हें केमिशा सोनी की मनमानियों के सामने चुप ही बने रहना पड़ता है । उन्हें और निलेश गुप्ता को कई मौकों पर केमिशा सोनी के रवैये और व्यवहार पर इर्रीटेट होते हुए और मनमसोस कर अपमानित होते हुए देखा गया है । केमिशा सोनी के कार्य-व्यवहार को लेकर इंदौर में उनके खिलाफ नाराजगी का जो माहौल बन रहा है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित तो किया हुआ है - और उन्हें उम्मीद बंध रही है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं; उससे केमिशा सोनी को अगले चुनाव में नुक्सान उठाना पड़ सकता है, और केमिशा सोनी के नुक्सान के चलते विष्णु झावर और मनोज फडनिस खेमे को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका मिल सकेगा । यह अभी सिर्फ उम्मीद और अनुमान भर है, क्योंकि इस उम्मीद और अनुमान के पूरा होने की कोई रूपरेखा बनती हुई अभी तो नहीं नजर आ रही है । शायद इसी कारण से केमिशा सोनी लोगों के बीच अपने प्रति बढ़ती नाराजगी को लेकर बेपरवाह बनी हुई हैं ।

Friday, March 3, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्रांच को कब्ज़ाने की कोशिशों के चलते सेंट्रल काउंसिल सदस्य केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी ने विष्णु झावर व मनोज फडनिस को वापसी करने के लिए उत्साहित और सक्रिय किया

इंदौर । इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी ने जिस तरह की मनमानियाँ कीं, उससे उनके समर्थकों व शुभचिंतकों तक को तगड़ा झटका लगा है - और उनके लगे झटके ने इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति में उथल-पुथल मचने के संकेत दिए हैं । इस प्रसंग ने इंदौर में केमिशा सोनी की बदनामी में और इजाफा किया है । केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के भी उनके खिलाफ होते जाने से विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को इंदौर की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस मिलने की उम्मीद होने लगी है, और उन्होंने इस बारे में अपने प्रयास भी तेज कर दिए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में केमिशा सोनी ने इन्हें कड़ी टक्कर दी थी, और इंदौर की राजनीति में इनके प्रभुत्व को धूल चटा दी थी; हालाँकि उस समय भी माना/समझा गया था कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस को केमिशा सोनी ने नहीं, बल्कि उनकी खुद की चौधराहटभरी कार्रवाइयों ने हराया है । विष्णु झावर के 'आशीर्वाद' से नियंत्रित होने वाली इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति से लोग इतने त्रस्त हो गए थे कि पिछले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों को हार का शिकार होना पड़ा था । यह हार इसलिए और उल्लेखनीय बन गई थी क्योंकि मनोज फडनिस के इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट होने के बावजूद उन्हें यह हार मिली थी । उम्मीद की गई थी कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस का हाल देखकर केमिशा सोनी सबक लेंगी और वह गलतियाँ नहीं करेंगी जो विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने कीं - और जिनके कारण उन्हें फजीहत झेलना पड़ी ।
लेकिन लोगों ने पाया कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । पिछले एक वर्ष में इंदौर ब्रांच के कामकाज में उनका जैसा हस्तक्षेप रहा है, उससे लोगों को लगा है जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । लोगों का कहना है कि उनका रवैया तो विष्णु झावर और मनोज फडनिस से भी बुरा है - यह लोग मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं । इंदौर ब्रांच में पिछले वर्ष चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर शुरू में केमिशा सोनी के समर्थकों में देखी/पहचानी जाती थीं, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि कार्यकाल पूरा होते होते वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला निलेश गुप्ता का है : रीजनल काउंसिल के सदस्य निलेश गुप्ता खेमेबाजी के संदर्भ में यूँ तो केमिशा सोनी वाले खेमे में 'होते' हैं, लेकिन कई मौकों पर उन्हें केमिशा सोनी के रवैये पर इर्रीटेट होते हुए देखा गया है । निलेश गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की राजनीति में निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी की 'राजनीति' का समर्थन नहीं करते हैं, इसलिए इंदौर ब्रांच के मामलों में केमिशा सोनी उन्हें अक्सर हड़काती रहती हैं - इंदौर ब्रांच में राजनीतिक खेमेबाजी का जो तानाबाना है, उसके कारण निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी के साथ रहने के लिए मजबूर हैं, इसलिए मनमसोस कर वह अपमानित होते रहते हैं ।
इंदौर ब्रांच के सदस्यों को ही नहीं, रीजनल काउंसिल के सदस्यों को भी अभी चार दिन पहले इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में केमिशा सोनी की मनमानियों का शिकार होना पड़ा । इस चुनाव में पहला झमेला तो चेयरमैन के चुनाव को लेकर हुआ - केमिशा सोनी ने इंस्टीट्यूट के नए बने नियम के हवाले से वाइस चेयरमैन को ही चेयरमैन बनाने के लिए दबाव बनाया; ब्रांच के बहुमत सदस्य लेकिन मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए चेयरमैन पद के लिए चुनाव कराने की माँग कर रहे थे - केमिशा सोनी ने लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को मानने/अपनाने से इंकार कर दिया । केमिशा सोनी ने हाईकोर्ट के फैसले की ही अवमानना नहीं की, बल्कि इंस्टीट्यूट के उक्त नियम के उस प्रावधान की भी अवहेलना की जो ब्रांच के दो-तिहाई सदस्यों को अधिकार देता है कि वह यदि एकमत हों तो चेयरमैन पद के लिए चुनाव कर सकते हैं । इससे भी बड़ी बात यह कि एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में केमिशा सोनी को ब्रांच के चुनाव को गवर्न करने का नैतिक अधिकार ही नहीं था - ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करने देना चाहिए था; लेकिन ब्रांच पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए केमिशा सोनी ने न नैतिकता की परवाह की, न हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार किया और न इंस्टीट्यूट के नियम को ही माना । ऐसा करते हुए उन्होंने ब्रांच के सदस्यों और रीजनल काउंसिल सदस्यों को तरह तरह से हड़काया व अपमानित किया, सो अलग ।
चेयरमैन पद 'हथियाने' के बाद केमिशा सोनी ने बाकी पदों पर भी नजर गड़ाई और उन्हें कब्जाने के लिए भी चालें चलीं - कुछेक पदों पर लेकिन उन्हें मात भी खानी पड़ी; इस सारे नज़ारे को लोगों ने बहुत ही बुरे प्रसंग के रूप में देखा और रेखांकित किया है । केमिशा सोनी के रवैये से इंदौर ब्रांच में पहली बार यह हुआ कि एक्सऑफिसो सदस्यों ने ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में वोट डाले - और इस तरह ब्रांच के सदस्यों की हैसियत घटाने का काम हुआ । पहली बार अल्पमत का व्यक्ति चेयरमैन बना है । ब्रांचेज के संचालन में एक अलिखित 'नियम' है कि ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करना चाहिए तथा एक्सऑफिसो सदस्यों को उनके अभिभावक तथा उनके सलाहकार के रूप में ही रहना चाहिए । जो नेता लोग ब्रांचेज में अपना प्रभुत्व बनाना चाहते हैं और बना कर रखना चाहते हैं, वह भी और चाहें जो उठापटक करें - लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' को पार करने से बचते हैं; केमिशा सोनी ने लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' की मर्यादा की कोई परवाह नहीं की और इस तरह इंदौर ब्रांच के इतिहास में काला पन्ना जोड़ा ।
केमिशा सोनी की इस कार्रवाई को लेकर इंदौर में नाराजगी का जो माहौल बना है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित किया है । उन्हें उम्मीद बंधी है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं - उससे उन्हें इंदौर की राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका आसानी से मिल जायेगा ।

Monday, February 29, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव में अभय शर्मा को विकास जैन के नजदीक तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दे/दिलवा कर केमिशा सोनी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया

इंदौर । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव को लेकर घटनाओं का जो अप्रत्याशित और नाटकीय चक्र घूमा, उसने किसी भी थ्रिलर फिल्म को मात देने का काम किया है । इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव - नाम की जिस थ्रिलर ने इस समय इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रोमांचक रूप में चौंकाया हुआ है, उसकी पटकथा लिखने से लेकर निर्देशन करने तक के काम के लिए केमिशा सोनी को जिम्मेदार माना/बताया जा रहा है । जैसे फिल्म को एक्टर की बजाए निर्देशक के उपक्रम के रूप में देखा/पहचाना जाता है - नाम/दाम भले ही एक्टर भी कमाता हो; लेकिन फिल्म निर्देशक के 'काम' के रूप में ही देखी/पहचानी जाती है : ठीक उसी तर्ज पर चेयरपरसन का पद जीता भले ही गर्जना राठौर ने हो, लेकिन उनकी इस जीत को उनकी नहीं बल्कि केमिशा सोनी की जीत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जैसे जीत गर्जना राठौर की नहीं है, वैसे ही हार अभय शर्मा की नहीं है - अभय शर्मा को हरवा कर केमिशा सोनी ने वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस को 'हराया' है । पिछले तीन महीनों में जितने जो चुनाव हुए हैं, उनके नतीजे इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति की बदलती हवा की कहानी तो कहते ही हैं - लेकिन उसमें भी कुछ परस्पर-विरोधी बातें कहते हैं, जिन्हें सफलता की खुशी और असफलता की निराशा में दोनों ही पक्ष अनसुना किए हुए हैं ।
उल्लेखनीय है कि इंदौर में हर कोई मान रहा था और कह भी रहा था कि इंदौर ब्राँच के चेयरमैन पद पर अभय शर्मा ही बैठेंगे । इसका कारण भी था । इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी में अभय शर्मा अकेले सदस्य हैं, जिनकी मैनेजिंग कमेटी में दूसरी टर्म है और इस लिहाज से वह वरिष्ठ हैं और अनुभवी हैं । इसके आलावा, इंदौर ब्राँच के चुनाव में अभय शर्मा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे - सिर्फ सबसे ज्यादा नहीं, दूसरे उम्मीदवारों से बहुत ज्यादा वोट मिले थे । चुनावी राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि इस तरह के तथ्य किसी भी उम्मीदवार का हौंसला तो बढ़ाते हैं, उसकी उम्मीदवारी में 'वज़न' तो पैदा करते हैं - लेकिन उसकी जीत की संभावना में निर्णायक तत्व नहीं बनते हैं । अभय शर्मा के चेयरमैन पद की दावेदारी में इन तथ्यों का महत्व तो था, लेकिन उनकी दावेदारी को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने का काम जो तथ्य कर रहा था, वह था इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी के नवनिर्वाचित आठ सदस्यों में उन्हें मिलते दिख रहे छह सदस्यों का समर्थन । अभय शर्मा को पंकज शाह, कीर्ति जोशी, गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन का समर्थन मिलता नजर आ रहा था । इसी बिना पर अभय शर्मा को चेयरमैन के रूप में देखा जाने लगा था । प्रत्येक तथ्य और प्रत्येक संकेत चेयरमैन पद पर अभय शर्मा की ताजपोशी करवा रहा था । लेकिन केमिशा सोनी ने सारा सीन पलट दिया और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में वह कर दिखाया, जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था ।
केमिशा सोनी ने इससे पहले, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत कर भी विष्णु झावर और मनोज फडनिस को खासा तगड़ा वाला झटका दिया था, और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में सभी को चौंकाया था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विष्णु झावर और मनोज फडनिस के खुले समर्थन के बावजूद विकास जैन के हार जाने की उम्मीद तो बहुतों को थी, किंतु केमिशा सोनी के जीतने की उम्मीद किसी को नहीं थी । ऐसे में, केमिशा सोनी की जीत - सिर्फ जीत नहीं, बड़ी जीत ने उनका कद तो बढ़ाया ही - वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस का कद घटाने का काम ज्यादा किया । किंतु सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से भी 'बड़ा' चुनाव इंदौर ब्राँच का चुनाव था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में तो मान लिया गया था कि विष्णु झावर व मनोज फडनिस ने विकास जैन जैसे बेकार-से उम्मीदवार पर दाँव लगाया, और उसकी सजा पाई; इंदौर ब्राँच का चुनाव छोटा होने के बावजूद 'बड़ा' इसलिए था, क्योंकि विष्णु झावर व मनोज फडनिस का असली असर तो यहीं है । अभय शर्मा की जोरदार जीत से यह असर दिखा भी । चेयरमैन का चुनाव और छोटा हो जाने के कारण और ज्यादा 'बड़ा' हो गया । इस चुनाव में मिली 'जीत' इसीलिए ही केमिशा सोनी के लिए सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में मिली जीत से भी बड़ी जीत है । दरअसल यही एक ऐसा पहला चुनाव था जिसमें केमिशा सोनी का विष्णु झावर व मनोज फडनिस से आमने-सामने का सीधा मुकाबला था ।
सारे तथ्य, सारे समीकरण, सारी परिस्थितियाँ हालाँकि चेयरमैन पद के चुनाव में अभय शर्मा की जीत की तरफ इशारा कर रही थीं - किंतु अभय शर्मा और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने इंदौर में बदल रही हवा के रुख को पहचानने/समझने में चूक कर दी । इस बदल रही हवा का संकेत सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के चुनाव में तो स्पष्ट रूप से मिला ही; इंदौर ब्राँच के चुनाव  में भी दिखा/मिला - जब अभय शर्मा की बड़ी जीत को बेईमानी व हेराफेरी से मिली जीत के रूप में प्रचारित किया गया । इस बात को जिस तरह से हवा मिली, उससे यह साबित हुआ कि इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'नेताओं' के बीच विष्णु झावर व मनोज फडनिस खेमे के खिलाफ भारी नाराजगी है । इस तथ्य को केमिशा सोनी ने पहचाना और इसे अपनी राजनीति में इस्तेमाल करने की उन्होंने तैयारी की । इंदौर ब्राँच में चुने गए नवनिर्वाचित सदस्य चूँकि अलग-अलग नेताओं के नजदीकी के रूप में या संपर्क में पहचाने गए, इसलिए उन्हें इकट्ठा करने में केमिशा सोनी को कोई बहुत मशक्कत नहीं करना पड़ी । इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं को केमिशा सोनी को सिर्फ यह समझाना पड़ा कि अभय शर्मा के चेयरमैन बनने से इंदौर ब्राँच पर विकास जैन का कब्जा हो जायेगा, और फिर विकास जैन मनमानी करेंगे । विकास जैन की मनमानी का डर दिखा कर और पदों का ऑफर देकर केमिशा सोनी ने गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन को अभय शर्मा के समर्थन से अलग कर दिया । चेयरमैन का पद अभय शर्मा से जिस तरह से 'छीन' लिया गया है, उसके जरिए दरअसल उन्हें विकास जैन के नजदीक होने तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दी गई है - और इस कार्रवाई से केमिशा सोनी ने इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया है ।

Sunday, January 3, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन को इंदौर में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की चौधराहट के खिलाफ फैली नाराजगी का शिकार होना पड़ा

इंदौर । विकास जैन की कूड़ा बुहारते सार्वजनिक हुई तस्वीर ने एक मजेदार किस्म का प्रतीकात्मक संयोग बनाया - क्योंकि जिस समय उनकी यह तस्वीर लोगों के सामने आई, लगभग उसी समय इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चल रही वोटों की गिनती में विकास जैन के 'बुहारे' जाने की सूचना लोगों को मिली । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 23 उम्मीदवारों के बीच विकास जैन के 847 वोटों के साथ दसवें नंबर पर रहने की सूचना मिली तो हर कोई हैरान रह गया । विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए ही नहीं, उनके विरोधियों के लिए भी यह नतीजा हैरान करने वाला था । इंदौर में यह मानने और कहने वाले लोग तो काफी थे कि विकास जैन चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन उनकी इतनी बुरी हार की उम्मीद उनके घनघोर किस्म के विरोधियों को भी नहीं थी । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि केमिशा सोनी चुनाव जीत गईं - और अच्छे प्रदर्शन के साथ जीत गईं । 1328 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह तीसरे नंबर पर थीं । विकास जैन की हार की तरह केमिशा सोनी की जीत भी इंदौर के लोगों के लिए किसी चमत्कार की तरह रही । वास्तव में, केमिशा सोनी के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी उनकी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी । इसलिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन की बड़ी हार तथा केमिशा सोनी की बड़ी जीत के कारणों को समझने/पहचानने के लिए गहन विश्लेषण की जरूरत है । 
पहली नजर में यह चुनावी नतीजा विष्णु झावर और मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु झावर उर्फ काका जी को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं । इन दोनों का समर्थन विकास जैन को था । सिर्फ समर्थन होता, तो भी कोई बात नहीं थी - हर किसी का किसी न किसी को समर्थन होता ही है; विष्णु झावर और मनोज फडनिस की भूमिका लेकिन समर्थक से बड़ी - बहुत बड़ी थी । उन्होंने विकास जैन को चुनाव जितवाने के लिए जो भी, जैसी भी तीन-तिकड़म हो सकती थी - वह की; और इसके लिए अपनी वरिष्ठता, अपनी पोजीशन व अपने पद की गरिमा तक को दाँव पर लगाया हुआ था । मनोज फडनिस भूल गए थे कि वह एक उम्मीदवार के समर्थक कार्यकर्ता नहीं हैं; इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं, और इस नाते उनकी कुछ नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है । विष्णु झावर व मनोज फडनिस की देखरेख में चले विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान का सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि कई मौकों पर केमिशा सोनी को बहुत ही अभद्र व अशालीन तरीके से निशाना बनाया गया । समझा जाता है कि इसी बात ने केमिशा सोनी के प्रति लोगों के बीच हमदर्दी पैदा की, जिसका उन्हें चुनावी फायदा मिला । 
विष्णु झावर को इंदौर में कई लोगों ने यह समझाने की कोशिश की थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए विकास जैन उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं; और विकास जैन की जगह किसी और को उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहिए । विष्णु झावर ने लेकिन किसी की नहीं सुनी । उन्होंने माना और कहीं कहीं कहा भी कि भले ही विकास जैन सेंट्रल काउंसिल के लायक न हों, किंतु मैं उन्हें सेंट्रल काउंसिल में भिजवाऊँगा । विष्णु झावर की इस अहंकारपूर्ण सोच व कहन को लोगों ने लगता है कि दिल पर ले लिया; और उन्हें विष्णु झावर व मनोज फडनिस को यह 'बताना' जरूरी लगा कि सेंट्रल काउंसिल में किसी को भिजवाने का काम उनका नहीं, 'हमारा' है । कुछेक लोगों का कहना है कि इंदौर में विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने चौधराहट दिखाने/ज़माने की जो कोशिश की है, उसके प्रति लोगों के बीच गहरी नाराजगी व विरोध का भाव है, जिसका शिकार विकास जैन को होना पड़ा है । इन दोनों की छाया में रहने के कारण विजेश खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल तक का चुनाव हार गए । इसीलिए विकास जैन की हार को विकास जैन की हार के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 

Monday, November 16, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के प्रचार में इंदौर ब्रांच की अधिकृत आईडी इस्तेमाल करने के कारण केमिशा सोनी मुसीबत में फँसी

इंदौर । केमिशा सोनी सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के प्रचार अभियान में इंदौर ब्रांच की सुविधाओं का फायदा उठाने के गंभीर आरोप में फँस गई हैं । इस आरोप को लेकर जो बबाल हुआ है, उसके कारण केमिशा सोनी की उम्मीदवारी के समर्थक व शुभचिंतक खासे दबाव में आ गए हैं और उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि इस आरोप के चलते केमिशा सोनी की उम्मीदवारी तथा उनके प्रचार-तंत्र की व्यवस्था को लेकर जो नकारात्मक माहौल बना है - उससे वह कैसे निपटें ? कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि इस आरोप को लेकर केमिशा सोनी ने जो सफाई दी, उससे मामला सुधरने की बजाए बिगड़ और गया ।  
हुआ यह कि एसएस देशपांडे, पीडी नागर, बीएल बंसल, डीजे दवे, एमपी अग्रवाल आदि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से इंदौर व बाहर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बल्क में एक एसएमएस भेजा गया जिसमें इंदौर ब्रांच व सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की चेयरपरसन के रूप में केमिशा सोनी की योग्यता का जिक्र करते सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में पहली वरीयता के वोट देने की अपील की गई थी । अपनी इस अपील को भावनात्मक रूप से स्ट्रॉंग बनाने लिए इसी एसएमएस में इस तथ्य का भी जिक्र किया गया कि केमिशा सोनी ने पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की जाने वाली अपनी उम्मीदवारी को इंदौर और मनोज फडनिस के हित में त्याग दिया था । इस एसएमएस में जो कुछ भी कहा/बताया गया, उसमें हालाँकि आपत्तिजनक कुछ नहीं था - लेकिन फिर भी इस एसएमएस ने इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बबाल पैदा कर दिया । इसका कारण यह रहा कि यह एसएमएस जिस आईडी से भेजा गया, वह इंदौर ब्रांच की आधिकारिक आईडी है । इस नाते आरोप लगा कि केमिशा सोनी और उनके समर्थक अपने प्रचार अभियान में फर्जी व बेईमानीपूर्ण तरीके से इंदौर ब्रांच की आईडी इस्तेमाल कर रहे हैं । आरोप लगना और विवाद बढ़ना शुरू होते ही केमिशा सोनी व उनके समर्थक तुरंत से सक्रिय हुए और उनकी तरफ से एक सफाईपूर्ण संदेश यह दिया गया कि उनके पिछले एसएमएस को जिस आईडी से भेजा गया है, उसे इंदौर ब्रांच की आईडी न समझा जाए । किंतु उनकी यह सफाई उनके जरा भी काम नहीं आई, क्योंकि दोनों ही आईडी जब एक ही थीं, और यह आईडी इंदौर ब्रांच की अधिकृत आईडी के रूप में लोगों के बीच जानी/पहचानी जाती है - तो उनकी इस सफाई को लोगों की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश के रूप में ही देखा गया ।  
केमिशा सोनी ने मामले में जो सफाई दी, उससे बात और बिगड़ गई । उन्होंने पहले कहा कि उक्त जिस आईडी का उन्होंने इस्तेमाल किया, वह टेलीकॉम सेंटर ने उन्हें दी थी और इसलिए इसमें उनका भला क्या दोष । किंतु जब उन्हें लगा कि उनका यह तर्क व दावा चलेगा नहीं, और उनका झूठ पकड़ा जायेगा तो उन्होंने पैंतरा बदला और कहा कि जो हुआ वह गलतफहमी में हुआ, उसे उन्होंने जानबूझ कर नहीं किया । लेकिन उनके इस दावे पर सवाल उठे कि वह जिम्मेदार पदों पर रही हैं और इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहती हैं - इसलिए अपने निजी हित में प्रशासनिक आईडी का इस्तेमाल गलतफहमी में कैसे कर सकती हैं ? और यदि कर सकती हैं तो फिर कैसे भरोसा किया जाए कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में वह गलतफहमी में अर्थ का अनर्थ नहीं करेंगी ? केमिशा सोनी के लिए इस सवाल का जबाव देना मुश्किल हुआ, तो इस सारे झमेले से पल्ला झाड़ते हुए उन्होंने इस कांड की जिम्मेदारी अपने समर्थकों के सिर मढ़ दी । उन्होंने कहा कि जो हुआ वह उन्होंने नहीं, उनके समर्थकों ने किया है और इसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । यह तर्क काम कर सकता था, लेकिन उन्होंने जिस तरह से बार-बार बयान बदले और परस्पर अंतर्विरोधी बातें कहीं उससे लोगों के बीच संदेश गया कि वह सच को छिपाने का प्रयास कर रही हैं । इससे केमिशा सोनी के लिए मामला और खराब हुआ । 
केमिशा सोनी के समर्थकों व शुभचिंतकों का ही मानना और कहना है कि मामला इतना गंभीर था नहीं, और केमिशा सोनी यदि होशियारी से मामले को हैंडल करतीं तो बात इतना न बिगड़ती; लेकिन केमिशा सोनी ने मामले की गंभीरता को समझा नहीं और लापरवाही में परस्पर विरोधी बातें की/कहीं - जिससे मामला खासा संगीन हो उठा है । इन्हीं समर्थकों व शुभचिंतकों का हालाँकि कहना यह भी है कि केमिशा सोनी जो हुआ उससे सबक लेकर आगे क्या करती हैं, इससे यह तय होगा कि यह मामला उनके लिए बड़ी मुसीबत बनेगा या कुछेक दिन की चर्चा के बाद खुद ही दफ्न हो जायेगा । आगे क्या होगा, यह तो आगे पता चलेगा - अभी लेकिन इस मामले ने केमिशा सोनी की मुसीबत बढ़ा दी है ।

Wednesday, October 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव में पक्षपातपूर्ण भूमिका के चलते प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा से फटकार सुननी पड़ी

इंदौर । मनोज फडनिस ने विकास जैन के चुनाव कार्यालय जाकर उनकी चुनावी तैयारी का जायेजा लेने का काम करके एक बार फिर साबित किया कि जब एक छोटी सोच, टुच्ची मानसिकता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आदी व्यक्ति किसी संस्था का मुखिया बन जाता है, तो वह कैसे 'द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया' जैसी प्रतिष्ठित संस्था को भी मटियामेट कर दे सकता है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में मनोज फडनिस ने अपनी मौन स्वीकृतियों, अपनी धृतराष्ट्रीय कार्रवाइयों और अपनी हरकतों से इंस्टीट्यूट की छवि को खासा नुकसान पहुँचाया है । ताजा हरकत के लिए तो उन्हें इंस्टीट्यूट के एक पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा तक से सार्वजनिक रूप से फटकार सुनने को मिली है । प्रेसीडेंट के रूप में मनोज फडनिस के पक्षपातपूर्ण फैसलों व कार्रवाईयों को लेकर जो शिकायत व आलोचना होती रही है, उसे एक बार को यदि भूल भी जाएँ - तो क्या इस तथ्य को भूल पाना किसी के लिए भी संभव होगा कि इंस्टीट्यूट के 66 वर्षीय इतिहास में मनोज फडनिस ऐसे पहले प्रेसीडेंट हुए, जिनकी कारस्तानी पर इंस्टीट्यूट के एक पूर्व प्रेसीडेंट को सार्वजनिक रूप से उनके कान उमेठने के लिए मजबूर होना पड़ा । 'रंगे हाथ' पकड़े जाने के बाद मनोज फडनिस की तरफ से सुबूत मिटाने के प्रयास तो खूब हुए, लेकिन उनकी हरकतों से परिचित लोग उनसे ज्यादा होशियार साबित हुए ।  
मनोज फडनिस की ताजा हरकत उनका सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे विकास जैन के चुनाव-कार्यालय जाना रहा । यूँ तो विकास जैन की उम्मीदवारी को मनोज फडनिस के समर्थन की चर्चा आम है । मनोज फडनिस की तरफ से इस आम चर्चा को झुठलाने की कोशिश चूँकि कभी नहीं हुई, इसलिए माना गया कि इस आम चर्चा से लोगों के बीच उनकी जो पक्षपातपूर्ण छवि बन रही है - उससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है । अपनी छवि, अपनी गरिमा और अपनी प्रतिष्ठा को धूल में मिलता देख चुप रहने वाले मनोज फडनिस के इस रवैये ने उन लोगों को हैरान जरूर किया - जो उन्हें नहीं जानते हैं । जो उन्हें जानते हैं, उन्हें तो पता है कि मनोज फडनिस ऐसे ही हैं । जो उन्हें जानते हैं, उनमें कईयों को लेकिन यह नहीं पता कि मनोज फडनिस इससे भी ज्यादा घटियापन कर सकते हैं । कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य है कि विकास जैन के चुनाव कार्यालय जाते समय मनोज फडनिस को क्या यह ख्याल बिलकुल भी नहीं
आया होगा कि वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट जैसे जिम्मेदार व प्रतिष्ठित पद पर हैं, और इस पद की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी उनकी ही है; और इस जिम्मेदारी को निभाने के तहत उन्हें एक उम्मीदवार के चुनाव कार्यालय तो नहीं जाना चाहिए । मनोज फडनिस अपने पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को ताक पर रख कर जिस तरह एक उम्मीदवार के चुनाव कार्यालय गए और वहाँ उन्होंने चुनावी तैयारियों पर खासी दिलचस्पी के साथ चर्चा की, उससे यही पता चलता है कि उन्हें या तो अपने पद की गरिमा व प्रतिष्ठा का ख्याल नहीं रहा; और या उन्हें ख्याल तो आया होगा, किंतु उन्होंने उसकी परवाह नहीं की । 
इस मामले में मूर्खता की पराकाष्ठा यह रही कि एक उम्मीदवार के चुनाव-कार्यालय में मनोज फडनिस ने अपनी उपस्थिति व अपनी संलग्नता की तस्वीरें भी खिंचवाईं । तस्वीरें न खिंची होतीं, तो मनोज फडनिस रंगे हाथ पकड़े नहीं गए होते और न उन्हें पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा से फटकार सुननी पड़ती । कुछेक लोगों को लगता है कि यह मूर्खता नहीं, मनोज फडनिस का आत्मविश्वास था । उन्होंने सोचा होगा कि तस्वीरें उनका क्या बिगाड़ लेंगी ? लेकिन तस्वीरों के कारण पोल खुलने और बबाल मचना शुरू होते ही मनोज फडनिस की तरफ से जिस तरह से छिपना/भागना शुरू हुआ, उससे साबित होता है कि तस्वीरें खिंचवाने का फैसला मूर्खता के चलते ही हुआ । उन्हें पता होता कि तस्वीरों के कारण वह रंगे हाथ पकड़े जायेंगे, तो शायद तस्वीरें न खिंचवाते । विकास जैन के चुनाव कार्यालय में चुनावी चर्चा करते हुए मनोज फडनिस की तस्वीरें सोशल मीडिया में आईं, तो बबाल मच गया । इस बबाल को शुरू करने/करवाने तथा भड़काने में अमरजीत चोपड़ा के एक कॉमेंट ने उत्प्रेरक का काम किया । बबाल भड़कने की खबर मनोज फडनिस को मिली तो वह तुरंत हरकत में आए तथा सुबूत मिटाने की तत्परता दिखाते हुए आनन-फानन में उन्होंने सोशल मीडिया से उक्त सारी तस्वीरें हटवाईं । मनोज फडनिस एंड कंपनी की हरकतों से परिचित होने के कारण कुछेक लोगों को पता था कि यह लोग पकड़े जाने पर सुबूत मिटाने की कोशिश करेंगे - इसलिए उन्होंने सुबूतों को मिटाये जाने से पहले ही सहेज लिया और सुरक्षित कर लिया । 
मनोज फडनिस का यह कारनामा इंस्टीट्यूट के लिए, प्रोफेशन के लिए और खुद उनके लिए (वह यदि समझें तो) शर्मनाक तो है ही - साथ ही उम्मीदवार के रूप में विकास जैन के लिए भी मुसीबत बढ़ाने वाला है । रीजन में चर्चा है कि इस मामले को चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन के मामले के रूप में लाकर विकास जैन की उम्मीदवारी को निरस्त कराने का प्रयास किया जा सकता है । गाजियाबाद व जयपुर के कुछेक उम्मीदवार इस मामले में दिलचस्पी लेते सुने गए हैं । विकास जैन के नजदीकियों को हालाँकि भरोसा है कि मनोज फडनिस के होते हुए विकास जैन की उम्मीदवारी निरस्त तो नहीं करवाई जा सकेगी; लेकिन उनकी चिंता/समस्या यह है कि इस प्रकरण से विकास जैन के चुनाव अभियान पर पड़े नकारात्मक असर से कैसे निपटा जायेगा ? इस प्रकरण से विकास जैन के चुनाव अभियान पर दरअसल दोहरी मार पड़ी है । इस प्रकरण से एक तरफ तो यह साबित हुआ कि उनकी टीम में कोई समन्वय नहीं है, और उनकी अपनी हरकतें ही उनकी पोल खोल रही हैं तथा उन्हें मुसीबत में डाल रही हैं; दूसरी तरफ यह बात सामने आई कि अपने चुनाव अभियान व अपनी जीत को लेकर वह खुद आश्वस्त नहीं हैं, जिसके चलते उनके पक्ष के बड़े नेताओं को विचार-विमर्श करने के लिए चुनाव-कार्यालय में इकट्ठा होना पड़ा । विकास जैन के नजदीकियों का ही कहना है कि अब उन्हें समझ में आ रहा है कि विकास जैन के लिए लिए चुनाव उतना आसान नहीं है, जितना पहले समझा जा रहा था । इंदौर में उनकी उम्मीदवारी को लेकर कई कारणों से विरोध के स्वर मुखर हुए हैं - जिसके चलते इंदौर में सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवार के रूप में केमिषा सोनी को अच्छा समर्थन मिलता नजर आ रहा है । मजे की बात यह है कि कुछ समय पहले तक केमिषा सोनी की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से लेता हुआ नहीं दिख रहा था । इंदौर में जो लोग विकास जैन की उम्मीदवारी के साथ नहीं हैं और किसी वैकल्पिक उम्मीदवार की तलाश में थे, उन्हें भी यह संशय था कि केमिषा सोनी अपनी उम्मीदवारी को बनाये/टिकाये रख भी पायेंगी या नहीं ? विकास जैन के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि उन्होंने केमिषा सोनी की उम्मीदवारी की ताकत को कम आँकने की चूक की । हालाँकि कई लोग यह भी मानते/कहते हैं कि केमिषा सोनी की उम्मीदवारी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि विकास जैन अपनी उम्मीदवारी के अभियान को ठीक तरीके से सँभाल नहीं पा रहे हैं, तथा अपनी उम्मीदवारी के विरोधियों को मैनेज करने में विफल साबित हो रहे हैं । दरअसल इसी समस्या पर विचार के लिए उनके कार्यालय में हाई लेबल मीटिंग रखी गई थी, जिसमें मनोज फडनिस की उपस्थिति ने किंतु विकास जैन के लिए हालात और बिगाड़ दिए हैं ।

Sunday, January 4, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में मनोज फडनिस की विरासत सँभालने की तैयारी में असीम त्रिवेदी की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी की आहट ने विकास जैन को तगड़ा झटका दिया है; हालाँकि विकास जैन को विश्वास है कि मनोज फडनिस उनके साथ धोखा नहीं करेंगे

इंदौर । मनोज फडनिस द्धारा इंस्टीट्यूट की अपनी राजनीतिक विरासत असीम त्रिवेदी को सौंपे जाने की आहट ने विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच खलबली मचा दी है और सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की विकास जैन की तैयारी के सामने संकट खड़ा कर दिया है । यह खलबली मचना स्वाभाविक भी है । क्योंकि अभी तक विकास जैन को इंस्टीट्यूट की राजनीति में मनोज फडनिस के उत्तराधिकारी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । मजे की बात यह है कि मनोज फडनिस ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं कहा है, जिससे ऐसा लगे कि वह विकास जैन को अपनी विरासत सौंपने की तैयारी कर रहे हैं । हुआ सिर्फ यह है कि पिछले कुछेक वर्षों में मनोज फडनिस कई मौकों पर विकास जैन को तवज्जो देते हुए तथा उन्हें आगे बढ़ाते हुए देखे गए हैं, जिससे इंदौर में लोगों के बीच इस चर्चा को बल मिला कि मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट की राजनीति में अपनी विरासत विकास जैन को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं । इंदौर के लोगों के बीच यह हवा बनाने में विकास जैन और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनियोजित तरीके से प्रयास भी किया ।
इंदौर में कई लोगों का हालाँकि यह भी मानना और कहना रहा है कि मनोज फडनिस और विकास जैन ने वास्तव में एक दूसरे को अपने अपने हित में इस्तेमाल किया है और एक-दूसरे से फायदे उठाए हैं । कई लोगों को लगता है कि इंस्टीट्यूट की राजनीति में विकास जैन ने जो सफलता प्राप्त की है, वह मनोज फडनिस के सहयोग व समर्थन के भरोसे पाई है; लेकिन कई अन्य लोगों का मानना और कहना है कि विकास जैन ने जो कुछ भी पाया है वह अपनी मेहनत और सक्रियता के बल पर पाया है - मनोज फडनिस से उन्हें जो सहयोग व समर्थन मिला है, उसे उन्होंने अपने कौशल से ही हासिल किया है, मनोज फडनिस ने उन पर कोई अहसान नहीं किया है । इन्हीं लोगों का कहना है कि पिछले चुनाव से पहले अपनी हालत को पतली पाते हुए मनोज फडनिस ने विकास जैन को अपने साथ करने का जो काम किया था, उसमें विकास जैन की सक्रियता से फायदा उठाने का उनका उद्देश्य था । मनोज फडनिस ने तो इंदौर में खिसकती अपनी चुनावी जमीन को बचाने के लिए विकास जैन का हाथ पकड़ा; तो विकास जैन को अपनी चुनावी जमीन को फैलाने के लिए मनोज फडनिस का हाथ पकड़ना लाभ का सौदा लगा ।
इसी से हवा बनी कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मनोज फडनिस ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में विकास जैन को चुन लिया है । इस हवा को और सघन बनाने तथा फैलाने में विकास जैन तथा उनके समर्थकों ने भी हाथ बँटाया और एक बड़ा सा गुब्बारा फुला लिया ।
किंतु असीम त्रिवेदी के नाम की चर्चा ने इस गुब्बारे में पिन चुभोने का काम किया है । असीम त्रिवेदी इंदौर में सीए कोचिंग के धंधे में एक बड़ा नाम है और इस नाम के चलते पिछले दस-बारह वर्षों में चार्टर्ड एकाउंटेंट बने लोगों के बीच उनके लिए अच्छा सम्मान है, जो उनके उम्मीदवार होने पर समर्थन व वोट में बदल सकता है । असीम त्रिवेदी की पिछले दिनों की गतिविधियों से लोगों को यह आभास भी मिला है कि वह अपने लिए अब एक बड़ी भूमिका की तलाश में हैं । सीए कोचिंग के धंधे में उनको जो मिल सकता था, वह लगता है कि उन्होंने पा लिया है; और अब वह बड़े फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं । इसी उद्देश्य से पिछले दिनों रीजन की ब्रांचेज से उन्होंने स्पीकर के निमंत्रणों को जुटाया और वहाँ उन्होंने अपनी विद्धता के साथ साथ एक प्रभावी स्पीकर होने की छाप भी छोड़ी । असीम त्रिवेदी की इन गतिविधियों से लोगों को यह आभास तो मिला कि असीम त्रिवेदी कुछ ऊँचा उड़ने की फिराक में है, लेकिन यह ऊँचा उड़ना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने के रूप में सामने आएगा - यह किसी ने नहीं सोचा था ।
मनोज फडनिस की विरासत सँभालने की तैयारी में असीम त्रिवेदी की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी की आहट ने विकास जैन को तगड़ा झटका दिया है । विकास जैन के समर्थक हालाँकि अभी भी यह मानने से इंकार कर रहे हैं कि असीम त्रिवेदी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे । उनका तर्क है कि असीम त्रिवेदी को चुनावी राजनीति का कोई अनुभव नहीं है और इसलिए सीधे सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना उनके बस की बात नहीं होगी । विकास जैन के समर्थकों को यह भी विश्वास है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए असीम त्रिवेदी को ला कर मनोज फडनिस, विकास जैन के साथ धोखा नहीं करेंगे । विकास जैन के कुछेक शुभचिंतक मनोज फडनिस और असीम त्रिवेदी पर दबाव बना कर उनकी संभावित उम्मीदवारी को टलवाने के अभियान में भी जुट गए हैं । उन्हें दरअसल पता है कि असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी यदि सचमुच में प्रस्तुत हो गई तो विकास जैन का तो सारा खेल ही बिगड़ जायेगा । असीम त्रिवेदी की संभावित उम्मीदवारी की आहट ने राजेश सेलोट और केमिशा सोनी के समर्थकों को खासा उत्साहित किया है । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए इन दोनों की उम्मीदवारी भी प्रस्तुत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है । इनके समर्थकों को लगता है कि असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने से चुनावी मुकाबला चौकोणीय हो जायेगा और चौकोणीय मुकाबले में इनके लिए अपनी अपनी दाल गलाना आसान हो जायेगा ।
असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी की आहट ने इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अभी जो गर्मी पैदा कर दी है, यह देखना दिलचस्प होगा कि वह आगे भी बनी रहती है या विकास जैन के समर्थकों का यह दावा सच साबित होगा कि असीम त्रिवेदी इंदौर में लोकप्रिय चाहें जितने भी हों, किंतु अनुभव की कमी के चलते सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना उनके बस की बात नहीं होगी ।