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Sunday, January 3, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन को इंदौर में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की चौधराहट के खिलाफ फैली नाराजगी का शिकार होना पड़ा

इंदौर । विकास जैन की कूड़ा बुहारते सार्वजनिक हुई तस्वीर ने एक मजेदार किस्म का प्रतीकात्मक संयोग बनाया - क्योंकि जिस समय उनकी यह तस्वीर लोगों के सामने आई, लगभग उसी समय इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चल रही वोटों की गिनती में विकास जैन के 'बुहारे' जाने की सूचना लोगों को मिली । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 23 उम्मीदवारों के बीच विकास जैन के 847 वोटों के साथ दसवें नंबर पर रहने की सूचना मिली तो हर कोई हैरान रह गया । विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए ही नहीं, उनके विरोधियों के लिए भी यह नतीजा हैरान करने वाला था । इंदौर में यह मानने और कहने वाले लोग तो काफी थे कि विकास जैन चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन उनकी इतनी बुरी हार की उम्मीद उनके घनघोर किस्म के विरोधियों को भी नहीं थी । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि केमिशा सोनी चुनाव जीत गईं - और अच्छे प्रदर्शन के साथ जीत गईं । 1328 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह तीसरे नंबर पर थीं । विकास जैन की हार की तरह केमिशा सोनी की जीत भी इंदौर के लोगों के लिए किसी चमत्कार की तरह रही । वास्तव में, केमिशा सोनी के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी उनकी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी । इसलिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन की बड़ी हार तथा केमिशा सोनी की बड़ी जीत के कारणों को समझने/पहचानने के लिए गहन विश्लेषण की जरूरत है । 
पहली नजर में यह चुनावी नतीजा विष्णु झावर और मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु झावर उर्फ काका जी को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं । इन दोनों का समर्थन विकास जैन को था । सिर्फ समर्थन होता, तो भी कोई बात नहीं थी - हर किसी का किसी न किसी को समर्थन होता ही है; विष्णु झावर और मनोज फडनिस की भूमिका लेकिन समर्थक से बड़ी - बहुत बड़ी थी । उन्होंने विकास जैन को चुनाव जितवाने के लिए जो भी, जैसी भी तीन-तिकड़म हो सकती थी - वह की; और इसके लिए अपनी वरिष्ठता, अपनी पोजीशन व अपने पद की गरिमा तक को दाँव पर लगाया हुआ था । मनोज फडनिस भूल गए थे कि वह एक उम्मीदवार के समर्थक कार्यकर्ता नहीं हैं; इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं, और इस नाते उनकी कुछ नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है । विष्णु झावर व मनोज फडनिस की देखरेख में चले विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान का सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि कई मौकों पर केमिशा सोनी को बहुत ही अभद्र व अशालीन तरीके से निशाना बनाया गया । समझा जाता है कि इसी बात ने केमिशा सोनी के प्रति लोगों के बीच हमदर्दी पैदा की, जिसका उन्हें चुनावी फायदा मिला । 
विष्णु झावर को इंदौर में कई लोगों ने यह समझाने की कोशिश की थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए विकास जैन उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं; और विकास जैन की जगह किसी और को उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहिए । विष्णु झावर ने लेकिन किसी की नहीं सुनी । उन्होंने माना और कहीं कहीं कहा भी कि भले ही विकास जैन सेंट्रल काउंसिल के लायक न हों, किंतु मैं उन्हें सेंट्रल काउंसिल में भिजवाऊँगा । विष्णु झावर की इस अहंकारपूर्ण सोच व कहन को लोगों ने लगता है कि दिल पर ले लिया; और उन्हें विष्णु झावर व मनोज फडनिस को यह 'बताना' जरूरी लगा कि सेंट्रल काउंसिल में किसी को भिजवाने का काम उनका नहीं, 'हमारा' है । कुछेक लोगों का कहना है कि इंदौर में विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने चौधराहट दिखाने/ज़माने की जो कोशिश की है, उसके प्रति लोगों के बीच गहरी नाराजगी व विरोध का भाव है, जिसका शिकार विकास जैन को होना पड़ा है । इन दोनों की छाया में रहने के कारण विजेश खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल तक का चुनाव हार गए । इसीलिए विकास जैन की हार को विकास जैन की हार के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 

Wednesday, October 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव में पक्षपातपूर्ण भूमिका के चलते प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा से फटकार सुननी पड़ी

इंदौर । मनोज फडनिस ने विकास जैन के चुनाव कार्यालय जाकर उनकी चुनावी तैयारी का जायेजा लेने का काम करके एक बार फिर साबित किया कि जब एक छोटी सोच, टुच्ची मानसिकता और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आदी व्यक्ति किसी संस्था का मुखिया बन जाता है, तो वह कैसे 'द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया' जैसी प्रतिष्ठित संस्था को भी मटियामेट कर दे सकता है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में मनोज फडनिस ने अपनी मौन स्वीकृतियों, अपनी धृतराष्ट्रीय कार्रवाइयों और अपनी हरकतों से इंस्टीट्यूट की छवि को खासा नुकसान पहुँचाया है । ताजा हरकत के लिए तो उन्हें इंस्टीट्यूट के एक पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा तक से सार्वजनिक रूप से फटकार सुनने को मिली है । प्रेसीडेंट के रूप में मनोज फडनिस के पक्षपातपूर्ण फैसलों व कार्रवाईयों को लेकर जो शिकायत व आलोचना होती रही है, उसे एक बार को यदि भूल भी जाएँ - तो क्या इस तथ्य को भूल पाना किसी के लिए भी संभव होगा कि इंस्टीट्यूट के 66 वर्षीय इतिहास में मनोज फडनिस ऐसे पहले प्रेसीडेंट हुए, जिनकी कारस्तानी पर इंस्टीट्यूट के एक पूर्व प्रेसीडेंट को सार्वजनिक रूप से उनके कान उमेठने के लिए मजबूर होना पड़ा । 'रंगे हाथ' पकड़े जाने के बाद मनोज फडनिस की तरफ से सुबूत मिटाने के प्रयास तो खूब हुए, लेकिन उनकी हरकतों से परिचित लोग उनसे ज्यादा होशियार साबित हुए ।  
मनोज फडनिस की ताजा हरकत उनका सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे विकास जैन के चुनाव-कार्यालय जाना रहा । यूँ तो विकास जैन की उम्मीदवारी को मनोज फडनिस के समर्थन की चर्चा आम है । मनोज फडनिस की तरफ से इस आम चर्चा को झुठलाने की कोशिश चूँकि कभी नहीं हुई, इसलिए माना गया कि इस आम चर्चा से लोगों के बीच उनकी जो पक्षपातपूर्ण छवि बन रही है - उससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है । अपनी छवि, अपनी गरिमा और अपनी प्रतिष्ठा को धूल में मिलता देख चुप रहने वाले मनोज फडनिस के इस रवैये ने उन लोगों को हैरान जरूर किया - जो उन्हें नहीं जानते हैं । जो उन्हें जानते हैं, उन्हें तो पता है कि मनोज फडनिस ऐसे ही हैं । जो उन्हें जानते हैं, उनमें कईयों को लेकिन यह नहीं पता कि मनोज फडनिस इससे भी ज्यादा घटियापन कर सकते हैं । कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य है कि विकास जैन के चुनाव कार्यालय जाते समय मनोज फडनिस को क्या यह ख्याल बिलकुल भी नहीं
आया होगा कि वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट जैसे जिम्मेदार व प्रतिष्ठित पद पर हैं, और इस पद की गरिमा को बनाए रखने की जिम्मेदारी उनकी ही है; और इस जिम्मेदारी को निभाने के तहत उन्हें एक उम्मीदवार के चुनाव कार्यालय तो नहीं जाना चाहिए । मनोज फडनिस अपने पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को ताक पर रख कर जिस तरह एक उम्मीदवार के चुनाव कार्यालय गए और वहाँ उन्होंने चुनावी तैयारियों पर खासी दिलचस्पी के साथ चर्चा की, उससे यही पता चलता है कि उन्हें या तो अपने पद की गरिमा व प्रतिष्ठा का ख्याल नहीं रहा; और या उन्हें ख्याल तो आया होगा, किंतु उन्होंने उसकी परवाह नहीं की । 
इस मामले में मूर्खता की पराकाष्ठा यह रही कि एक उम्मीदवार के चुनाव-कार्यालय में मनोज फडनिस ने अपनी उपस्थिति व अपनी संलग्नता की तस्वीरें भी खिंचवाईं । तस्वीरें न खिंची होतीं, तो मनोज फडनिस रंगे हाथ पकड़े नहीं गए होते और न उन्हें पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा से फटकार सुननी पड़ती । कुछेक लोगों को लगता है कि यह मूर्खता नहीं, मनोज फडनिस का आत्मविश्वास था । उन्होंने सोचा होगा कि तस्वीरें उनका क्या बिगाड़ लेंगी ? लेकिन तस्वीरों के कारण पोल खुलने और बबाल मचना शुरू होते ही मनोज फडनिस की तरफ से जिस तरह से छिपना/भागना शुरू हुआ, उससे साबित होता है कि तस्वीरें खिंचवाने का फैसला मूर्खता के चलते ही हुआ । उन्हें पता होता कि तस्वीरों के कारण वह रंगे हाथ पकड़े जायेंगे, तो शायद तस्वीरें न खिंचवाते । विकास जैन के चुनाव कार्यालय में चुनावी चर्चा करते हुए मनोज फडनिस की तस्वीरें सोशल मीडिया में आईं, तो बबाल मच गया । इस बबाल को शुरू करने/करवाने तथा भड़काने में अमरजीत चोपड़ा के एक कॉमेंट ने उत्प्रेरक का काम किया । बबाल भड़कने की खबर मनोज फडनिस को मिली तो वह तुरंत हरकत में आए तथा सुबूत मिटाने की तत्परता दिखाते हुए आनन-फानन में उन्होंने सोशल मीडिया से उक्त सारी तस्वीरें हटवाईं । मनोज फडनिस एंड कंपनी की हरकतों से परिचित होने के कारण कुछेक लोगों को पता था कि यह लोग पकड़े जाने पर सुबूत मिटाने की कोशिश करेंगे - इसलिए उन्होंने सुबूतों को मिटाये जाने से पहले ही सहेज लिया और सुरक्षित कर लिया । 
मनोज फडनिस का यह कारनामा इंस्टीट्यूट के लिए, प्रोफेशन के लिए और खुद उनके लिए (वह यदि समझें तो) शर्मनाक तो है ही - साथ ही उम्मीदवार के रूप में विकास जैन के लिए भी मुसीबत बढ़ाने वाला है । रीजन में चर्चा है कि इस मामले को चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन के मामले के रूप में लाकर विकास जैन की उम्मीदवारी को निरस्त कराने का प्रयास किया जा सकता है । गाजियाबाद व जयपुर के कुछेक उम्मीदवार इस मामले में दिलचस्पी लेते सुने गए हैं । विकास जैन के नजदीकियों को हालाँकि भरोसा है कि मनोज फडनिस के होते हुए विकास जैन की उम्मीदवारी निरस्त तो नहीं करवाई जा सकेगी; लेकिन उनकी चिंता/समस्या यह है कि इस प्रकरण से विकास जैन के चुनाव अभियान पर पड़े नकारात्मक असर से कैसे निपटा जायेगा ? इस प्रकरण से विकास जैन के चुनाव अभियान पर दरअसल दोहरी मार पड़ी है । इस प्रकरण से एक तरफ तो यह साबित हुआ कि उनकी टीम में कोई समन्वय नहीं है, और उनकी अपनी हरकतें ही उनकी पोल खोल रही हैं तथा उन्हें मुसीबत में डाल रही हैं; दूसरी तरफ यह बात सामने आई कि अपने चुनाव अभियान व अपनी जीत को लेकर वह खुद आश्वस्त नहीं हैं, जिसके चलते उनके पक्ष के बड़े नेताओं को विचार-विमर्श करने के लिए चुनाव-कार्यालय में इकट्ठा होना पड़ा । विकास जैन के नजदीकियों का ही कहना है कि अब उन्हें समझ में आ रहा है कि विकास जैन के लिए लिए चुनाव उतना आसान नहीं है, जितना पहले समझा जा रहा था । इंदौर में उनकी उम्मीदवारी को लेकर कई कारणों से विरोध के स्वर मुखर हुए हैं - जिसके चलते इंदौर में सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवार के रूप में केमिषा सोनी को अच्छा समर्थन मिलता नजर आ रहा है । मजे की बात यह है कि कुछ समय पहले तक केमिषा सोनी की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से लेता हुआ नहीं दिख रहा था । इंदौर में जो लोग विकास जैन की उम्मीदवारी के साथ नहीं हैं और किसी वैकल्पिक उम्मीदवार की तलाश में थे, उन्हें भी यह संशय था कि केमिषा सोनी अपनी उम्मीदवारी को बनाये/टिकाये रख भी पायेंगी या नहीं ? विकास जैन के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि उन्होंने केमिषा सोनी की उम्मीदवारी की ताकत को कम आँकने की चूक की । हालाँकि कई लोग यह भी मानते/कहते हैं कि केमिषा सोनी की उम्मीदवारी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि विकास जैन अपनी उम्मीदवारी के अभियान को ठीक तरीके से सँभाल नहीं पा रहे हैं, तथा अपनी उम्मीदवारी के विरोधियों को मैनेज करने में विफल साबित हो रहे हैं । दरअसल इसी समस्या पर विचार के लिए उनके कार्यालय में हाई लेबल मीटिंग रखी गई थी, जिसमें मनोज फडनिस की उपस्थिति ने किंतु विकास जैन के लिए हालात और बिगाड़ दिए हैं ।

Tuesday, October 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के गंभीर रूप लेते ही इंदौर में विकास जैन खेमा विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी के झंडे को छोड़ने के लिए मजबूर हुआ

इंदौर । नीलेश गुप्ता को रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते देख इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को अपने अपने समीकरण फिर से बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है । इसका कारण यह है कि नीलेश गुप्ता पिछले दिनों जब अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटते दिख रहे थे, तब इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का समीकरण बिलकुल अलग था; किंतु अब जब नीलेश गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के साथ न सिर्फ वापस लौट आए हैं, बल्कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम भी जोरशोर से शुरू कर दिया है - तो इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के समीकरण पूरी तरह उलट पलट गए हैं । मजे की बात यह हुई है कि रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के गंभीर रूप लेते ही सबसे ज्यादा असर सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार विकास जैन के खेमे पर पड़ा है । विकास जैन खेमे के लोगों ने पहले इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति पर अपना कब्जा जमाने के उद्देश्य से रीजनल काउंसिल के लिए विजेश जैन की उम्मीदवारी का झंडा भी उठा लिया था; किंतु नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के गंभीर रूप लेते ही वह विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी का झंडा छोड़ देने के लिए मजबूर हुए हैं । बदले हालात में विकास जैन खेमे के लोगों ने रीजनल काउंसिल की राजनीति में पड़ने की बजाए सेंट्रल काउंसिल के लिए विकास जैन की उम्मीदवारी की फिक्र करने की जरूरत ज्यादा समझी है । 
विकास जैन खेमे के लोगों ने दरअसल चर्चिल जैन की उम्मीदवारी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था; जिसके चलते उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के साथ साथ रीजनल काउंसिल की राजनीति पर भी कब्जा करने की नीयत से विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी का जिम्मा भी अपने हाथों में ले लिया था । इंदौर ब्रांच की पिछले टर्म की तीन वर्षीय कमेटी में विकास जैन और विजेश खंडेलवाल साथ साथ थे, तथा कई एक कामों में दोनों की मिलीभगत भी थी - इस नाते दोनों के बीच एक तार जुड़ा हुआ था ही । विजेश जैन इंदौर ब्रांच के चुनाव ही मुश्किल से जीतते थे और वहाँ चेयरमैन भी वह तीसरे टर्म में बन सके थे; इस बात को ध्यान में रखते हुए रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से लेता हुआ नहीं दिख रहा था । इंदौर में रीजनल काउंसिल के दोनों उम्मीदवारों - चर्चिल जैन और विजेश खंडेलवाल की खस्ता हालत की चर्चा बाहर तक थी; जिसका नतीजा था कि यहाँ वोट जुटाने के लिए जयपुर के सचिन जैन, रतलाम के प्रमोद नाहर तथा उज्जैन के शरद जैन तक ने घात लगाना शुरू कर दिया था । ऐसे में विकास जैन और उनके संगी-साथियों ने सोचा कि वह यदि प्रयास करेंगे तो संभव है कि वह विजेश खंडेलवाल को जितवा देंगे । यही सोच कर उन्होंने विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी का जिम्मा ले लिया । यह जिम्मा लेने के पीछे उनका एक उद्देश्य यह भी बना कि इसके जरिए उन्हें इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति की चाबी पूरी तरह अपने हाथ में आती हुई दिखाई दी । 
नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी में लेकिन दोबारा से पैदा हुई गर्मी ने विकास जैन और उनके संगी-साथियों की इस योजना पर पानी फेर दिया है । इंदौर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में सदस्य के रूप में तथा चेयरमैन के रूप में नीलेश गुप्ता की जैसी सक्रियता रही, और विभिन्न उपलब्धियों के साथ उनकी जैसी पहचान व प्रतिष्ठा बनी - उसे देखते/समझते हुए उन्हें एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अपने स्वभाव और अपनी सक्रियता से नीलेश गुप्ता ने सिर्फ इंदौर में ही पहचान व प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की है, बल्कि अन्य कुछेक ब्रांचेज में भी अपनी जगह बनाई है । कोटा से चार्टर्ड एकाउंटेंसी की पढ़ाई करने तथा अपने प्रोफेशनल जीवन के शुरू के कुछेक वर्ष वहाँ व्यतीत करने के कारण उनका कोटा व राजस्थान के लोगों के साथ भी भावनात्मक रिश्ता है । इस सब के संदर्भ में नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी का वजन काफी बढ़ा दिख रहा है । दरअसल इसीलिए नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के गंभीर रूप लेते ही इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदल गए । ऐसे में, विकास जैन तथा उनके संगी-साथियों को विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी के झंडे को पकड़े रहने में खतरा दिखा । खतरा यह कि तब नीलेश गुप्ता को समर्थन देने वाले लोग सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन का विरोध करेंगे । नीलेश गुप्ता का समर्थन आधार चूँकि खासा बड़ा है, इसलिए विकास जैन व उनके संगी-साथियों को लगा कि विजेश खंडेलवाल के चक्कर में वह अपनी उम्मीदवारी को खतरे में क्यों डालें ? लिहाजा उन्होंने विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी का खुला समर्थन करने से हाथ खींच लिया । 
विकास जैन व उनके संगी-साथियों से झटका मिलने के कारण विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट तो पैदा हो गया है, जिसे उनके समर्थक अभी इस तर्क के जरिए झुठलाने का प्रयास कर रहे हैं कि नीलेश गुप्ता और चर्चिल जैन एक ही खेमे के उम्मीदवार होने के कारण एक-दूसरे के वोटों को ही काटेंगे - और इस तरह नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के पुनः सक्रिय होने से विजेश खंडेलवाल के लिए चुनाव और आसान हो गया है, जिसके कारण उन्हें विकास जैन व उनके संगी-साथियों के समर्थन की ज्यादा जरूरत रह भी नहीं गई है । दूसरे लोगों का कहना किंतु यह है कि किताबी रूप में तो यह तर्क अच्छा दिखता है, लेकिन व्यावहारिक रूप में इस तर्क का कोई मतलब नहीं है । यह सच है कि ब्रांच के पिछले चुनाव में चर्चिल जैन ने दोस्त होने के नाते नीलेश गुप्ता का साथ दिया था; लेकिन उनकी दोस्ती चुनावी संदर्भ में समर्थक और उम्मीदवार के रूप में विभक्त हुई थी । उम्मीदवार के रूप में नीलेश गुप्ता का साथ तो बहुत से लोगों ने दिया था - जिनमें चर्चिल जैन भी एक थे । ऐसे में चर्चिल जैन अब उनकी बराबरी पर कैसे आ सकते हैं ? जाहिर है कि चर्चिल जैन की उम्मीदवारी नीलेश गुप्ता के लिए कोई समस्या नहीं बनेगी; वह यदि समस्या बनेगी भी तो विजेश खंडेलवाल के लिए - विकास जैन के मार्फत जो जैन वोट विजेश खंडेलवाल को मिल सकते होंगे, चर्चिल जैन उन्हें अपनी तरफ खींच सकते हैं । मजे की बात यह है कि चर्चिल जैन की उम्मीदवारी को कोई भी पक्ष गंभीरता से नहीं ले रहा है, और दोनों पक्षों को ही लग रहा है कि इंदौर में वास्तव में दो ही उम्मीदवार हैं । नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी का पलड़ा वैसे भी भारी दिख रहा था, जिसके 'बोझ' को महसूस करते हुए विकास जैन व उनके संगी-साथियों ने विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी के समर्थन से हाथ खींच कर और भारी बना दिया है । विकास जैन व उनके संगी-साथियों ने अपनी उम्मीदवारी को बचाने के लिए विजेश खंडेलवाल की उम्मीदवारी को जिस तरह से बीच रास्ते पर छोड़ दिया है, उससे विजेश खंडेलवाल के लिए मुसीबत तो पैदा हुई ही है - लेकिन इंदौर का चुनावी परिदृश्य भी खासा दिलचस्प हो गया है । 

Friday, September 25, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के संदर्भ में सत्यनारायण माहेश्वरी को इंदौर में मिली अनपेक्षित सफलता विकास जैन के लिए मुसीबत बनी

इंदौर । सत्यनारायण माहेश्वरी ने विकास जैन के कई नजदीकियों, समर्थकों व संभावित समर्थकों को सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के अभियान में जोड़ कर विकास जैन की संभावनाओं को तगड़ा झटका दिया है । यह झटका इतना तगड़ा है कि विकास जैन और उनके समर्थक अभी यह समझने का ही प्रयास कर रहे हैं कि दरअसल हुआ क्या है ? जैसे आँखों पर तेज लाईट पड़ने पर खुली आँखें भी सामने का कुछ भी देख पाने में समर्थ नहीं होती हैं; सत्यनारायण माहेश्वरी के चुनाव अभियान की 'इंदौर की उपलब्धियों' ने विकास जैन और उनके समर्थकों के सामने भी वैसा ही मामला बना दिया है । विकास जैन और उनके समर्थकों की बदकिस्मती यह है कि इस स्थिति के लिए अधिकतर लोग उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । दरअसल विकास जैन की जीत को लेकर वह खुद और उनके समर्थक इतने आश्वस्त थे कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को लेकर वह लोग जरा भी गंभीर नहीं थे । जीत को लेकर आश्वस्त होने के उनके पास एक नहीं, बल्कि कई ठोस कारण थे । इंदौर और मालवा क्षेत्र में ही इतने जैन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं कि विकास जैन और उनके समर्थकों को लगा कि जैन होने के कारण उन्हें वह सब वोट तो आराम से मिल ही जायेंगे, और उतने वोट उनकी जीत के लिए काफी होंगे - और इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है । इसके अलावा, इंदौर में चुनावी राजनीति की बागडोर अपने हाथ में रखने वाले 'काका जी' विष्णु झावर उनके समर्थन में हैं, और विष्णु झावर के चलते इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस उनका समर्थन करने के लिए मजबूर होंगे ही । विकास जैन और उनके समर्थकों का मानना और कहना रहा कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस का समर्थन उनकी जीत के अंतर को बढ़ाने का ही काम करेगा । 
विकास जैन और उनके समर्थक अपनी जीत को लेकर इसलिए और ज्यादा आश्वस्त थे क्योंकि इंदौर में उन्हें कोई चुनावी चुनौती मिलती नहीं दिख रही थी । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की चेयरपरसन रह चुकीं केमिशा सोनी ने भी हालाँकि सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की हुई है, किंतु विकास जैन और उनके समर्थकों ने केमिशा सोनी की उम्मीदवारी को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया । उनकी तरफ से सुना भी गया था कि केमिशा सोनी के खिलाफ वह ऐसा अभियान चलायेंगे कि केमिशा सोनी खुद ही चुनाव से हट जायेंगी । सत्यनारायण माहेश्वरी हालाँकि इंदौर में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश करते देखे/सुने तो गए थे, किंतु माना/समझा गया कि जैसे दूसरे उम्मीदवार यह जानते/बूझते कोशिश कर रहे हैं कि इंदौर में उन्हें कुछ मिलेगा तो नहीं ही; वैसे ही सत्यनारायण माहेश्वरी भी कोशिश कर रहे हैं और इसमें कोई खास बात नहीं है । यह तथ्य भी सामने आया कि सत्यनारायण माहेश्वरी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट की पढ़ाई इंदौर में की है और यहाँ कुछ समय उन्होंने चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में काम भी किया है । लेकिन इस तथ्य में भी कोई बहुत बड़ा राजनीतिक खतरा नहीं देखा/पहचाना गया । माना/समझा गया कि सत्यनारायण माहेश्वरी लंबे समय से उदयपुर में ही सक्रिय हैं, और जीवन में उन्हें जो कुछ भी मिला है - वह उदयपुर में रहते हुए ही मिला है; इसलिए इंदौर में उनके कुछ समय गुजारने के तथ्य से उनके या विकास जैन के चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है । 
विकास जैन तथा उनके रणनीतिकारों ने फिर भी सत्यनारायण माहेश्वरी से निपटने की रणनीति के तहत विजेश खण्डेलवाल को रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया । उनका आकलन रहा कि विजेश खण्डेलवाल की उम्मीदवारी के जरिए वह इंदौर के माहेश्वरियों की चौकीदारी कर सकेंगे तथा उन्हें अपने साथ जोड़े रखने में सफल होंगे, और तब सत्यनारायण माहेश्वरी को यहाँ ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा । सत्यनारायण माहेश्वरी ने लेकिन इंदौर में अनपेक्षित सफलता प्राप्त की है । इंदौर में उन्हें इंदौर के तीसरे उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा है । विकास जैन की उम्मीदवारी को एक तो इस बात से तगड़ा झटका लगा है; विकास जैन के लिए लेकिन इससे भी ज्यादा झटके की बात यह हुई है कि इंदौर में उनके कई नजदीकियों और समर्थकों ने उनकी उम्मीदवारी का झंडा छोड़ कर सत्यनारायण माहेश्वरी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । सत्यनारायण माहेश्वरी ने विकास जैन के नजदीकियों व समर्थकों को अपनी तरफ मिला कर विकास जैन पर तो मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया ही है, साथ ही इंदौर के चुनावी परिदृश्य को भी बदल दिया है । बदले चुनावी परिदृश्य में दूसरों को तो छोड़िए, खुद विकास जैन की उम्मीदवारी के समर्थक उनकी जीत को लेकर उतने आश्वस्त नहीं रह गए हैं, जितने कि वह अभी कुछ समय पहले तक थे ।
विकास जैन के समर्थकों की तरफ से आरोप लगाया गया है कि सत्यनारायण माहेश्वरी अपने राजनीतिक संपर्कों का सहारा लेकर उनके समर्थकों को उनसे छीन रहे हैं । सत्यनारायण माहेश्वरी की पत्नी किरण माहेश्वरी के राजस्थान की भाजपा सरकार में मंत्री होने का हवाला देते हुए आरोप लगाया जा रहा है कि पत्नी के राजनीतिक रसूख का सहारा लेकर सत्यनारायण माहेश्वरी जानबूझकर खासकर ऐसे लोगों पर अपने साथ आने का दबाव बना रहे हैं, जो विकास जैन की उम्मीदवारी की ताकत हैं । इस तरह सत्यनारायण माहेश्वरी ने विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान की हवा ही निकाल देने की योजना पर काम किया है । इंदौर में हालाँकि यह मानने/कहने वालों की भी कमी नहीं है कि विकास जैन को इंदौर में अपना जो आधार खिसकता हुआ दिख रहा है, उसके लिए कोई और नहीं, बल्कि वह खुद और उनके समर्थक ही जिम्मेदार हैं । जीत की आश्वस्ति में उन्होंने दरअसल दूसरों को कोई तवज्जो ही नहीं दी, और निरंतर मनमानियाँ करते रहे । अपनी मनमानियों के चलते वह विरोधियों को तो अपना बनाने का प्रयास नहीं ही कर सके, अपने समर्थकों को भी उन्होंने खोना शुरू कर दिया । यह सच्चाई अभी तक 'दिख' इसलिए नहीं रही थी, क्योंकि एक तो चुनावी शिड्यूल में इसके 'दिखने' का उचित समय नहीं आया था; दूसरे विकास जैन को सबक सिखाने की तैयारी किए बैठे लोगों को 'उचित जगह' नहीं मिल रही थी । केमिशा सोनी अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच कोई भरोसा पैदा नहीं कर पा रही थीं । सत्यनारायण माहेश्वरी ने अपनी उम्मीदवारी के प्रति जैसे ही भरोसा पैदा किया, वैसे ही विकास जैन की उम्मीदवारी के प्रति लोगों का 'रवैया' सामने आ गया । इंदौर में सत्यनारायण माहेश्वरी के नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि यहाँ सत्यनारायण माहेश्वरी को जो समर्थन मिल रहा है, वह सत्यनारायण माहेश्वरी के काम के कारण नहीं, बल्कि विकास जैन और उनके समर्थकों की नकारात्मकता के कारण मिल रहा है । इंदौर में हालाँकि कई लोगों का यह भी मानना और कहना है कि विकास जैन के लिए स्थितियाँ अभी भी इतनी नहीं बिगड़ी हैं कि संभाली न जा सकें - किंतु यह इस पर निर्भर करेगा कि विकास जैन और उनके समर्थक सारे मामले को देख/समझ कैसे रहे हैं ? यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्यनारायण माहेश्वरी द्वारा पैदा की गई चुनौती से निपटने के लिए विकास जैन और उनके समर्थक क्या रणनीति अपनाते हैं ?

Saturday, June 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस ने आखिर किस स्वार्थ और या किस मजबूरी में ऐसे लोगों को अपनाया हुआ है, जिनके कारण इंदौर ब्रांच में कामकाज की बदइंतजामी फैली हुई है और खुद मनोज फडनिस की साख व प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई है

इंदौर । मनोज फडनिस की 'घरेलू' ब्रांच के सदस्यों को अभी जून माह में जब मार्च माह का न्यूजलेटर मिला, तो ब्रांच के कामकाज की पोल खुली और सवाल उठे कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष मनोज फडनिस की अपनी ब्रांच में कामकाज का इतना बुरा हाल क्यों है ? कामकाज के बुरे हाल का संदर्भ सिर्फ यही नहीं है कि मार्च माह का न्यूजलेटर लोगों को जून माह में मिला; संदर्भ यह भी है कि मार्च माह का न्यूजलेटर जब समय से प्रकाशित नहीं किया जा सका था, तब चार माह बाद उसे प्रकाशित करके पैसे की बर्बादी क्यों की गई । यानि कामकाज का बुरा हाल सिर्फ क्रियान्वन के स्तर पर ही नहीं, बल्कि सोच और नीति के स्तर पर भी है । इंस्टीट्यूट के मौजूदा अध्यक्ष मनोज फडनिस चूँकि इंदौर के हैं, इसलिए इंस्टीट्यूट की इंदौर ब्रांच को उनकी घरेलू ब्रांच के रूप में देखा/पहचाना जाता है और उम्मीद की जाती है कि इंदौर ब्रांच अपने कामकाज में गुणवत्ता को स्थापित करेगी । इंदौर ब्रांच अपने कामकाज में गुणवत्ता के मामले में लेकिन निकृष्ट दौर में दिखाई दे रही है । लोगों के बीच जो चर्चा है उसमें मतभेद सिर्फ इस बात को लेकर है कि इंदौर ब्रांच में कामकाज की बुरी दशा के लिए मनोज फडनिस को सिर्फ नैतिक आधार पर ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है; और या इंदौर ब्रांच में कामकाज की बदइंतजामी के लिए मनोज फडनिस सचमुच में सीधे जिम्मेदार भी ठहरते हैं ?
यह जानने/समझने के लिए कुछेक तथ्यों पर गौर करना उपयोगी होगा । 
इंदौर ब्रांच में कामकाज की बदइंतजामी के लिए ब्रांच के चेयरमैन सुनील खंडेलवाल ब्रांच के सचिव अभय शर्मा से अपेक्षित सहयोग न मिलने को जिम्मेदार ठहराते हैं । उन्होंने अलग अलग मौकों पर कई लोगों से कहा/बताया है कि अभय शर्मा ने सचिव पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह यदि ठीक से किया होता, तो ब्रांच के न्यूजलेटर भी समय से निकलते और ब्रांच के दूसरे काम भी उचित समय पर और प्रभावी तरीके से संपन्न होते । ब्रांच के दूसरे पदाधिकारियों के अनुसार भी, अभय शर्मा की सचिव पद की जिम्मेदारियों को निभाने से ज्यादा रुचि अपनी राजनीति करने में दिखाई दे रही है । अभय शर्मा पर गंभीर आरोप है कि वह ब्रांच के स्वयंभू मीडिया प्रभारी बन गए हैं, और शहर के अखबारों में अपनी तथाकथित सक्रियता की खबरें प्रकाशित करवाते हैं - और इस सब के बाद उन्हें जो समय मिलता है उसमें वह विकास जैन की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करते हैं । इस तरह, अभय शर्मा काम तो बहुत करते हैं; बस ब्रांच के सचिव पद का काम करने में वह कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं - और इसका नतीजा यह है कि ब्रांच में ठीक ढंग से कोई काम नहीं हो पा रहा है; न्यूजलेटर तक चार महीने बाद लोगों को मिल रहा है । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यह अभय शर्मा इंदौर ब्रांच को मनोज फडनिस का ही गिफ्ट है । मनोज फडनिस ने पिछले वर्ष नियम-कायदों की अनदेखी करते हुए अपनी पूरी धमकीबाजी से जिस तरह अभय शर्मा को इंदौर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी का सदस्य बनवाया था, वह मनोज फडनिस के राजनीतिक जीवन का शायद सबसे शर्मनाक काम होगा । (इस किस्से को यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है ।)
मनोज फडनिस ने पिछले वर्ष अभय शर्मा को इंदौर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी का सदस्य बनवाया था; और इस वर्ष उन्हें इंदौर ब्रांच का सचिव बनवाया । मजे की बात यह रही कि अभय शर्मा को सचिव बनवाने के लिए मनोज फडनिस को पिछले वर्ष बनाई गई अपनी ही व्यवस्था का उल्लंघन करना पड़ा । उल्लेखनीय है कि पिछले ही वर्ष मनोज फडनिस ने इंदौर ब्रांच के लिए पदाधिकारियों के चयन के लिए लैडर सिस्टम बनाया था, जिसके अनुसार इस वर्ष नीलेश गुप्ता को सचिव पद पर होना था । मनोज फडनिस ने लेकिन तिकड़म करके अभय शर्मा को सचिव बनवा दिया । अभय शर्मा को दरअसल विकास जैन के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और विकास जैन को इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनवाने का जिम्मा मनोज फडनिस ने लिया हुआ बताया जाता है । विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान में ब्रांच की मदद ली जा सके, इसके लिए ही मनोज फडनिस ने अपनी ही बनाई व्यवस्था को एक वर्ष में ही ध्वस्त करके अभय शर्मा को ब्रांच में सचिव बनवा दिया है । 
मनोज फडनिस की तिकड़मबाजी से ब्रांच में सचिव का पद पाने वाले अभय शर्मा के कारण ब्रांच कामकाज की बदइंतजामी का शिकार यदि होती है, तो इसके लिए मनोज फडनिस भी स्वाभाविक रूप से सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहरते हैं । मनोज फडनिस इसलिए भी जिम्मेदार ठहरते हैं क्योंकि उनकी तरफ से इंदौर ब्रांच में कामकाज की गुणवत्ता स्थापित कराने की कोई कोशिश होती हुई नहीं दिखी है । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि अभय शर्मा और उनके असली वाले 'गॉडफॉदर्स' ने मनोज फडनिस से अपने 'काम' तो करवा लिए हैं, लेकिन अब उनकी सुनते नहीं हैं - और मनोज फडनिस असहाय बन कर रह गए हैं । बात चाहें जो सच हो : इंदौर ब्रांच में कामकाज की बदइंतजामी को लेकर मनोज फडनिस चाहें सबकुछ जानते/बूझते हुए भी चुप बने हुए हों, या असहाय बनकर चुप हों - बदइंतजामी के लिए जिम्मेदार वही ठहराए जा रहे हैं । लोगों के बीच सवाल यही चर्चा में है कि मनोज फडनिस ने आखिर किस स्वार्थ में और या किस मजबूरी में ऐसे लोगों को अपनाया हुआ है जिन्हें ब्रांच व प्रोफेशन के काम में कोई दिलचस्पी ही नहीं है; और जिनके कारण ब्रांच में कामकाज की बदइंतजामी फैली हुई है । 
मनोज फडनिस के लिए इंदौर में एक और खतरा मंडरा रहा है । सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बाद से सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन केमिशा सोनी के खिलाफ जिस तरह का नकारात्मक व अशालीन प्रचार अभियान शुरू किया गया है, उसके पीछे मनोज फडनिस के नजदीकियों को ही देखा/पहचाना जा रहा है । केमिशा सोनी की उम्मीदवारी को दरअसल विकास जैन की उम्मीदवारी के लिए सीधी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है । केमिशा सोनी की उम्मीदवारी को विकास जैन की उम्मीदवारी के लिए खतरे के रूप में देख रहे विकास जैन के कुछेक समर्थकों ने केमिशा सोनी के खिलाफ अपमानजनक अभियान छेड़ दिया है । उनका मानना है कि उनके इस अभियान से डर कर केमिशा सोनी चुनावी मैदान छोड़ जायेंगी और तब विकास जैन के लिए मैदान एकदम से खाली हो जायेगा । केमिशा सोनी के खिलाफ अपमानजनक अभियान चलाने वालों को मनोज फडनिस के करीबियों के रूप में भी देखा/पहचाना जाता है, इसलिए कुछेक लोगों को लगता है कि उनके अभियान को मनोज फडनिस की भी शह है । मनोज फडनिस की साख और प्रतिष्ठा की परवाह करने वाले लोगों को इस बात की फिक्र है कि केमिशा सोनी के खिलाफ अभियान चलाने वाले लोग केमिशा सोनी को कोई नुकसान पहुँचा सकेंगे या नहीं - यह तो अभी नहीं पता है; किंतु मनोज फडनिस की साख व प्रतिष्ठा को वह अवश्य ही धूल-धूसरित कर देंगे । मनोज फडनिस के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को तो उनकी साख और प्रतिष्ठा की चिंता है, खुद मनोज फडनिस को यह चिंता है - इसके कोई संकेत उन्होंने अपने 'व्यवहार' से तो अभी तक नहीं दिए हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष मनोज फडनिस अपने नजदीकियों की हरकतों को रोकने व नियंत्रित करने की कोई कोशिश करते हैं - और या अपने नजदीकियों को अपनी साख व प्रतिष्ठा के साथ खेलने देते हैं । 

Sunday, January 4, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में मनोज फडनिस की विरासत सँभालने की तैयारी में असीम त्रिवेदी की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी की आहट ने विकास जैन को तगड़ा झटका दिया है; हालाँकि विकास जैन को विश्वास है कि मनोज फडनिस उनके साथ धोखा नहीं करेंगे

इंदौर । मनोज फडनिस द्धारा इंस्टीट्यूट की अपनी राजनीतिक विरासत असीम त्रिवेदी को सौंपे जाने की आहट ने विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच खलबली मचा दी है और सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की विकास जैन की तैयारी के सामने संकट खड़ा कर दिया है । यह खलबली मचना स्वाभाविक भी है । क्योंकि अभी तक विकास जैन को इंस्टीट्यूट की राजनीति में मनोज फडनिस के उत्तराधिकारी के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । मजे की बात यह है कि मनोज फडनिस ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं कहा है, जिससे ऐसा लगे कि वह विकास जैन को अपनी विरासत सौंपने की तैयारी कर रहे हैं । हुआ सिर्फ यह है कि पिछले कुछेक वर्षों में मनोज फडनिस कई मौकों पर विकास जैन को तवज्जो देते हुए तथा उन्हें आगे बढ़ाते हुए देखे गए हैं, जिससे इंदौर में लोगों के बीच इस चर्चा को बल मिला कि मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट की राजनीति में अपनी विरासत विकास जैन को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं । इंदौर के लोगों के बीच यह हवा बनाने में विकास जैन और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनियोजित तरीके से प्रयास भी किया ।
इंदौर में कई लोगों का हालाँकि यह भी मानना और कहना रहा है कि मनोज फडनिस और विकास जैन ने वास्तव में एक दूसरे को अपने अपने हित में इस्तेमाल किया है और एक-दूसरे से फायदे उठाए हैं । कई लोगों को लगता है कि इंस्टीट्यूट की राजनीति में विकास जैन ने जो सफलता प्राप्त की है, वह मनोज फडनिस के सहयोग व समर्थन के भरोसे पाई है; लेकिन कई अन्य लोगों का मानना और कहना है कि विकास जैन ने जो कुछ भी पाया है वह अपनी मेहनत और सक्रियता के बल पर पाया है - मनोज फडनिस से उन्हें जो सहयोग व समर्थन मिला है, उसे उन्होंने अपने कौशल से ही हासिल किया है, मनोज फडनिस ने उन पर कोई अहसान नहीं किया है । इन्हीं लोगों का कहना है कि पिछले चुनाव से पहले अपनी हालत को पतली पाते हुए मनोज फडनिस ने विकास जैन को अपने साथ करने का जो काम किया था, उसमें विकास जैन की सक्रियता से फायदा उठाने का उनका उद्देश्य था । मनोज फडनिस ने तो इंदौर में खिसकती अपनी चुनावी जमीन को बचाने के लिए विकास जैन का हाथ पकड़ा; तो विकास जैन को अपनी चुनावी जमीन को फैलाने के लिए मनोज फडनिस का हाथ पकड़ना लाभ का सौदा लगा ।
इसी से हवा बनी कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मनोज फडनिस ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में विकास जैन को चुन लिया है । इस हवा को और सघन बनाने तथा फैलाने में विकास जैन तथा उनके समर्थकों ने भी हाथ बँटाया और एक बड़ा सा गुब्बारा फुला लिया ।
किंतु असीम त्रिवेदी के नाम की चर्चा ने इस गुब्बारे में पिन चुभोने का काम किया है । असीम त्रिवेदी इंदौर में सीए कोचिंग के धंधे में एक बड़ा नाम है और इस नाम के चलते पिछले दस-बारह वर्षों में चार्टर्ड एकाउंटेंट बने लोगों के बीच उनके लिए अच्छा सम्मान है, जो उनके उम्मीदवार होने पर समर्थन व वोट में बदल सकता है । असीम त्रिवेदी की पिछले दिनों की गतिविधियों से लोगों को यह आभास भी मिला है कि वह अपने लिए अब एक बड़ी भूमिका की तलाश में हैं । सीए कोचिंग के धंधे में उनको जो मिल सकता था, वह लगता है कि उन्होंने पा लिया है; और अब वह बड़े फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं । इसी उद्देश्य से पिछले दिनों रीजन की ब्रांचेज से उन्होंने स्पीकर के निमंत्रणों को जुटाया और वहाँ उन्होंने अपनी विद्धता के साथ साथ एक प्रभावी स्पीकर होने की छाप भी छोड़ी । असीम त्रिवेदी की इन गतिविधियों से लोगों को यह आभास तो मिला कि असीम त्रिवेदी कुछ ऊँचा उड़ने की फिराक में है, लेकिन यह ऊँचा उड़ना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने के रूप में सामने आएगा - यह किसी ने नहीं सोचा था ।
मनोज फडनिस की विरासत सँभालने की तैयारी में असीम त्रिवेदी की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उम्मीदवारी की आहट ने विकास जैन को तगड़ा झटका दिया है । विकास जैन के समर्थक हालाँकि अभी भी यह मानने से इंकार कर रहे हैं कि असीम त्रिवेदी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे । उनका तर्क है कि असीम त्रिवेदी को चुनावी राजनीति का कोई अनुभव नहीं है और इसलिए सीधे सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना उनके बस की बात नहीं होगी । विकास जैन के समर्थकों को यह भी विश्वास है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए असीम त्रिवेदी को ला कर मनोज फडनिस, विकास जैन के साथ धोखा नहीं करेंगे । विकास जैन के कुछेक शुभचिंतक मनोज फडनिस और असीम त्रिवेदी पर दबाव बना कर उनकी संभावित उम्मीदवारी को टलवाने के अभियान में भी जुट गए हैं । उन्हें दरअसल पता है कि असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी यदि सचमुच में प्रस्तुत हो गई तो विकास जैन का तो सारा खेल ही बिगड़ जायेगा । असीम त्रिवेदी की संभावित उम्मीदवारी की आहट ने राजेश सेलोट और केमिशा सोनी के समर्थकों को खासा उत्साहित किया है । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए इन दोनों की उम्मीदवारी भी प्रस्तुत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है । इनके समर्थकों को लगता है कि असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने से चुनावी मुकाबला चौकोणीय हो जायेगा और चौकोणीय मुकाबले में इनके लिए अपनी अपनी दाल गलाना आसान हो जायेगा ।
असीम त्रिवेदी की उम्मीदवारी की आहट ने इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अभी जो गर्मी पैदा कर दी है, यह देखना दिलचस्प होगा कि वह आगे भी बनी रहती है या विकास जैन के समर्थकों का यह दावा सच साबित होगा कि असीम त्रिवेदी इंदौर में लोकप्रिय चाहें जितने भी हों, किंतु अनुभव की कमी के चलते सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना उनके बस की बात नहीं होगी ।

Monday, June 9, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में महत्वपूर्ण पद पाने के लालच में सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों ने मनोज फडनिस से यह पूछने का साहस ही नहीं किया कि वह इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष हैं, जल्दी ही वह अध्यक्ष होंगे - ऐसे में, वही इंस्टीट्यूट के नियम की अवहेलना क्यों करवा रहे हैं और क्यों इंस्टीट्यूट को विष्णु झवर के यहाँ गिरवी रखने की तैयारी कर रहे हैं ?


नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट मनोज फडनिस ने इंस्टीट्यूट को विष्णु झवर के पास गिरवी रखने की तैयारी कर ली है क्या ? इंस्टीट्यूट की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की इंदौर ब्रांच के न्यूजलेटर के मई अंक में उपर वाली तस्वीर को छपा देख कर कई लोगों के मन में यह सवाल कुलबुलाने लगा है । यह तस्वीर माउंट आबू में 19-20 अप्रैल को सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्धारा आयोजित चेयरमैन मीट एंड ओरिएंटेशन प्रोग्राम के मौके की है । इस तस्वीर में विष्णु झवर की मौजूदगी ने हर किसी को चौंकाया है । हर किसी के मन में यही सवाल उठा है कि माउंट आबू में आयोजित हुए उक्त कार्यक्रम में विष्णु झवर क्या कर रहे हैं और काउंसिल के विभिन्न पदाधिकारियों के साथ बैठ कर तस्वीर खिंचाने का मौका उन्हें कैसे मिल गया ?
विष्णु झवर इंदौर के एक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं । इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच वह 'काका' के संबोधन से पुकारे और पहचाने जाते हैं । उनकी प्रोफेशनल एक्सपर्टीज क्या हैं - यह तो उनके क्लाइंट जानते होंगे; इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के बीच उनकी पहचान लेकिन दो सौ-चार सौ वोटों के 'एक थोक सप्लायर' की है । इसीलिए इंदौर में इंस्टीट्यूट के किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास अवश्य ही करता है । माना/कहा जाता है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मनोज फडनिस उन्हीं की देन हैं । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट 'बनने' का मौका तो मनोज फडनिस ने अपनी तीन-तिकड़म, अपने आचार-व्यवहार, अपने जुगाड़ और अपनी किस्मत से पाया है - लेकिन इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल तक पहुँचने और वहाँ लंबे समय तक टिके रहने में उन्हें विष्णु झवर की सक्रिय और संलग्न मदद मिली है ।
लेकिन यह तो कोई वजह नहीं बनती है, जिसके चलते माउंट आबू में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के एक प्रोफेशल व ट्रेनिंग कार्यक्रम में विष्णु झवर को उपस्थित होने का मौका मिले ? मनोज फडनिस को विष्णु झवर के अहसानों का बदला यदि चुकाना ही है तो उसके और बहुत अच्छे अच्छे तरीके हो सकते हैं - एक प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट के प्रोफेशनल कार्यक्रम को अपने निजी मंतव्यों के लिए इस्तेमाल करने का मनोज फडनिस का यह कारनामा कोई अच्छा उदाहरण तो प्रस्तुत नहीं करता है ।
बात यदि 'सिर्फ' इतनी ही होती, तो भी कोई बात न होती ! मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष होने जा रहे हैं - वह यदि अपने 'राजनीतिक गुरु' को अपना जलवा दिखाने के लिए कार्यक्रम का प्रोटोकॉल तोड़ कर कार्यक्रम में शामिल कर भी लेते हैं, तो इसमें किसी के लिए भी बहुत तेवर दिखाने की जरूरत नहीं है । मनोज फडनिस आखिर इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष होने जा रहे हैं, उनकी इस तरह की 'छोटी-छोटी' बातों का यदि नोटिस लिया जायेगा तो यह कोई अच्छी बात नहीं होगी । इंस्टीट्यूट के अध्यक्षों ने कैसे-कैसे गुल खिलाये हुए हैं - उन्हें याद कीजिये और मनोज फडनिस की इस 'छोटी' सी बात पर धूल डालिए यार !
लेकिन .... लेकिन, जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि, बात यदि 'सिर्फ' इतनी ही होती; बात यदि सिर्फ विष्णु झवर की एक कार्यक्रम में उपस्थिति भर की होती तो सचमुच धूल डालने लायक ही होती । किंतु विष्णु झवर की इस उपस्थिति के पीछे के कारण के खुलासे से इंस्टीट्यूट को विष्णु झवर के यहाँ गिरवी रखने वाला सवाल पैदा हुआ है ।
माउंट आबू में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के उक्त कार्यक्रम में पात्रता न रखने के बावजूद विष्णु झवर की उपस्थिति दरअसल इंदौर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में अभय शर्मा को शामिल किए जाने को सुनिश्चित करने बाबत हुई थी । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की आठ सदस्यीय इंदौर ब्रांच में नवीन खण्डेलवाल के इस्तीफ़ा दे देने के बाद उनकी जगह भरने को लेकर इंदौर से लेकर दिल्ली तक भारी ड्रामा हुआ । ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि इस तरह की स्थिति के लिए इंस्टीट्यूट का नियम यह कहता है कि ब्रांच के 'किसी भी सदस्य' को खाली हुई जगह दी जा सकती है । इंदौर ब्रांच के चेयरमैन नरेंद्र भंडारी ने लेकिन जब इंस्टीट्यूट के इस नियम का संदर्भ लेकर नवीन खण्डेलवाल के इस्तीफे से खाली हुई जगह को भरने की कार्रवाई शुरू की, तो मनोज फडनिस ने उन्हें लगभग आदेश जैसे भाव के साथ कहा कि उक्त खाली जगह उन्हें आठ सदस्यीय इंदौर ब्रांच के लिए हुए चुनाव में नवें नंबर पर रहने वाले अभय शर्मा को देनी चाहिए । नरेंद्र भंडारी ही नहीं, दूसरे कई लोगों ने भी मनोज फडनिस के इस रवैये पर हैरानी जताई । उनका कहना/पूछना रहा कि मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष हैं, जल्दी ही वह अध्यक्ष होंगे - ऐसे में, वही इंस्टीट्यूट के नियम की अवहेलना करने को क्यों कह रहे हैं ?
मनोज फडनिस यदि अभय शर्मा को मैनेजिंग कमेटी में लेने की सिफारिश करते, तो भी बात समझ में आती; क्योंकि इंस्टीट्यूट के 'किसी भी सदस्य' संदर्भित नियम में अभय शर्मा भी आते ही हैं - लेकिन मनोज फडनिस जिस तर्क के साथ अभय शर्मा के लिए जगह बनाने की बात कह रहे थे, उससे सीधे-सीधे जाहिर हो रहा था कि मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के नियम की ही ऐसी-तैसी करने पर आमादा थे । कई लोगों को आश्चर्य भी हुआ कि मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं - ऐसे में उनकी चिंताओं और उनकी सक्रियताओं का दायरा बड़ा होना चाहिए; किंतु वह एक टुच्चे किस्म के मामले में अपना नाम, अपनी साख, अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर लगाये दे रहे हैं । उनके नजदीकियों ने हालाँकि समझ लिया था कि यह सब वह किसी की सेवा खातिर कर रहे हैं । जल्दी ही इस रहस्य पर से पर्दा भी हट गया । मनोज फडनिस केलिफोर्निया जाने से पहले इंदौर ब्रांच के पदाधिकारियों को हालाँकि आदेश दे गए थे कि उनके वापस लौटने तक मैनेजिंग कमेटी में की खाली जगह को भरने का फैसला न किया जाये, लेकिन फिर भी उन्हें और उन्हें चला रही पर्दे के पीछे की ताकतों को डर हुआ कि ब्रांच के पदाधिकारी कहीं कोई फैसला कर न लें - लिहाजा विष्णु झवर ने सामने आकर मोर्चा संभाला । तब भेद खुला कि ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम को ही ठेंगा दिखाने का काम मनोज फडनिस दरअसल विष्णु झवर की सेवा खातिर कर रहे हैं ।
विष्णु झवर के लिए अभय शर्मा को मैनेजिंग कमेटी में लाने का काम असल में विकास जैन के हाथ मजबूत करने के उद्देश्य से करना जरूरी हुआ । विष्णु झवर ने अगले वर्ष होने वाले चुनाव में विकास जैन को सेंट्रल काउंसिल में चुनवाने का बीड़ा उठाया है । इस बार इंदौर ब्रांच के चेयरमैन के चुनाव में विकास जैन को जिस तरह से मुँह की खानी पड़ी, उससे विकास जैन को ही नहीं, विष्णु झवर को भी झटका लगा । चेयरमैन के चुनाव में विकास जैन की जो फजीहत हुई, उससे लोगों के बीच यह संदेश तो गया ही है कि इंदौर में विकास जैन की नहीं चलती । इसलिए इंदौर ब्रांच पर कब्ज़ा करना विकास जैन और विष्णु झवर को जरूरी लगा । अभय शर्मा को विकास जैन के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । अभय शर्मा को किसी भी तरह से मैनेजिंग कमेटी में घुसा कर विकास जैन और विष्णु झवर को अपना उद्देश्य पूरा होता दिखा और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने पहले मनोज फडनिस को 'काम' पर लगाया और फिर खुद मैदान में कूद पड़े ।
माउंट आबू में आयोजित सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यक्रम में पात्रता न रखने के बावजूद - समझा जाता है कि - विष्णु झवर गए ही इसलिए थे ताकि वह मनोज फडनिस से अभय शर्मा वाले काम को पक्के से करवा सकें । कार्यक्रम में शामिल होने माउंट आबू पहुँचे इंदौर ब्रांच के चेयरमैन नरेंद्र भंडारी को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की तरफ से आश्चर्यजनक तरीके से एक मीटिंग में बने नियम का हवाला पकड़ा दिया गया जिसमें मैनेजिंग कमेटी की खाली हुई जगह हारे हुए निकटतम उम्मीदवार को देने की बात कही गई थी । उक्त मीटिंग और उसमें बने नियम की प्रक्रिया हालाँकि संदेह के घेरे में है - लेकिन मनोज फडनिस ने दबाव बनाया कि रीजनल काउंसिल के उक्त तथाकथित नियम के तहत अभय शर्मा को खाली जगह दी जाए ।
मनोज फडनिस अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में तो अंततः सफल हुए, लेकिन उनकी इस सफलता ने अकेले उनकी ही नहीं - सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्यों की भी पोल खोल कर रख दी है । दरअसल हुआ यह कि उक्त मसले पर अपने आप को बुरी तरह से घिरा पा कर इंदौर ब्रांच के पदाधिकारियों ने फैसला करने से पहले सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्यों से सलाह लेने की कोशिश की और ईमेल के जरिये यह पूछा कि ब्रांच में की खाली जगह को भरने के मामले में उन्हें इंस्टीट्यूट के नियम का पालन करना चाहिए या रीजनल काउंसिल द्धारा फर्जी तरीके से बनाये गए तथाकथित नियम का ? संयोग यह रहा कि इंदौर ब्रांच की तरफ से सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को जिस समय यह ईमेल मिला उस समय दिल्ली में उनकी एक मीटिंग चल रही थी । इस कारण सभी के सामने यह मामला एक साथ आ गया । जो हालात बने उसमें मीटिंग में मौजूद मनोज फडनिस ने अपनी किरकिरी तो बहुत महसूस की, लेकिन उनकी खुशकिस्मती यह रही कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच 'मौसेरे भाई' बनकर 'मैं तुझे बचाऊँ, तू मुझे बचा' तथा 'मैं तेरी ढाँकु, तू मेरी ढाँक' वाला जो खेल चलता है वह अब भी चला । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को मनोज फडनिस के अध्यक्ष-काल में महत्वपूर्ण पद पाने हैं, ऐसे में भला कौन मुँह खोलता और मनोज फडनिस से कहता कि उन्हें इंस्टीट्यूट के नियम की इस तरह से अवहेलना नहीं करना चाहिए । इंदौर ब्रांच के पदाधिकारियों को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों से अपने सवाल का जबाव नहीं ही मिला ।
यह पूरा प्रसंग कुछ ही लोगों की जानकारी में था - और रहता; यदि इंदौर ब्रांच के न्यूजलेटर में ऊपर वाली तस्वीर न छपी होती । न्यूजलेटर में छपी तस्वीर को देखकर कई लोगों का ध्यान इस तथ्य पर गया कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग में विष्णु झवर क्या करने और क्यों गए थे ? बात शुरू हुई तो फिर सारी पोल खुली और उसी खुली पोल में यह सवाल पैदा हुआ कि मनोज फडनिस ने इंस्टीट्यूट को विष्णु झवर के यहाँ गिरवी रखने की तैयारी कर ली है क्या ?