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Monday, February 29, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव में अभय शर्मा को विकास जैन के नजदीक तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दे/दिलवा कर केमिशा सोनी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया

इंदौर । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव को लेकर घटनाओं का जो अप्रत्याशित और नाटकीय चक्र घूमा, उसने किसी भी थ्रिलर फिल्म को मात देने का काम किया है । इंदौर ब्राँच के चेयरमैन के चुनाव - नाम की जिस थ्रिलर ने इस समय इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रोमांचक रूप में चौंकाया हुआ है, उसकी पटकथा लिखने से लेकर निर्देशन करने तक के काम के लिए केमिशा सोनी को जिम्मेदार माना/बताया जा रहा है । जैसे फिल्म को एक्टर की बजाए निर्देशक के उपक्रम के रूप में देखा/पहचाना जाता है - नाम/दाम भले ही एक्टर भी कमाता हो; लेकिन फिल्म निर्देशक के 'काम' के रूप में ही देखी/पहचानी जाती है : ठीक उसी तर्ज पर चेयरपरसन का पद जीता भले ही गर्जना राठौर ने हो, लेकिन उनकी इस जीत को उनकी नहीं बल्कि केमिशा सोनी की जीत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जैसे जीत गर्जना राठौर की नहीं है, वैसे ही हार अभय शर्मा की नहीं है - अभय शर्मा को हरवा कर केमिशा सोनी ने वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस को 'हराया' है । पिछले तीन महीनों में जितने जो चुनाव हुए हैं, उनके नतीजे इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति की बदलती हवा की कहानी तो कहते ही हैं - लेकिन उसमें भी कुछ परस्पर-विरोधी बातें कहते हैं, जिन्हें सफलता की खुशी और असफलता की निराशा में दोनों ही पक्ष अनसुना किए हुए हैं ।
उल्लेखनीय है कि इंदौर में हर कोई मान रहा था और कह भी रहा था कि इंदौर ब्राँच के चेयरमैन पद पर अभय शर्मा ही बैठेंगे । इसका कारण भी था । इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी में अभय शर्मा अकेले सदस्य हैं, जिनकी मैनेजिंग कमेटी में दूसरी टर्म है और इस लिहाज से वह वरिष्ठ हैं और अनुभवी हैं । इसके आलावा, इंदौर ब्राँच के चुनाव में अभय शर्मा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे - सिर्फ सबसे ज्यादा नहीं, दूसरे उम्मीदवारों से बहुत ज्यादा वोट मिले थे । चुनावी राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि इस तरह के तथ्य किसी भी उम्मीदवार का हौंसला तो बढ़ाते हैं, उसकी उम्मीदवारी में 'वज़न' तो पैदा करते हैं - लेकिन उसकी जीत की संभावना में निर्णायक तत्व नहीं बनते हैं । अभय शर्मा के चेयरमैन पद की दावेदारी में इन तथ्यों का महत्व तो था, लेकिन उनकी दावेदारी को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने का काम जो तथ्य कर रहा था, वह था इंदौर ब्राँच की मैनेजिंग कमेटी के नवनिर्वाचित आठ सदस्यों में उन्हें मिलते दिख रहे छह सदस्यों का समर्थन । अभय शर्मा को पंकज शाह, कीर्ति जोशी, गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन का समर्थन मिलता नजर आ रहा था । इसी बिना पर अभय शर्मा को चेयरमैन के रूप में देखा जाने लगा था । प्रत्येक तथ्य और प्रत्येक संकेत चेयरमैन पद पर अभय शर्मा की ताजपोशी करवा रहा था । लेकिन केमिशा सोनी ने सारा सीन पलट दिया और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में वह कर दिखाया, जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था ।
केमिशा सोनी ने इससे पहले, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत कर भी विष्णु झावर और मनोज फडनिस को खासा तगड़ा वाला झटका दिया था, और इंदौर की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में सभी को चौंकाया था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विष्णु झावर और मनोज फडनिस के खुले समर्थन के बावजूद विकास जैन के हार जाने की उम्मीद तो बहुतों को थी, किंतु केमिशा सोनी के जीतने की उम्मीद किसी को नहीं थी । ऐसे में, केमिशा सोनी की जीत - सिर्फ जीत नहीं, बड़ी जीत ने उनका कद तो बढ़ाया ही - वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस का कद घटाने का काम ज्यादा किया । किंतु सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से भी 'बड़ा' चुनाव इंदौर ब्राँच का चुनाव था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में तो मान लिया गया था कि विष्णु झावर व मनोज फडनिस ने विकास जैन जैसे बेकार-से उम्मीदवार पर दाँव लगाया, और उसकी सजा पाई; इंदौर ब्राँच का चुनाव छोटा होने के बावजूद 'बड़ा' इसलिए था, क्योंकि विष्णु झावर व मनोज फडनिस का असली असर तो यहीं है । अभय शर्मा की जोरदार जीत से यह असर दिखा भी । चेयरमैन का चुनाव और छोटा हो जाने के कारण और ज्यादा 'बड़ा' हो गया । इस चुनाव में मिली 'जीत' इसीलिए ही केमिशा सोनी के लिए सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में मिली जीत से भी बड़ी जीत है । दरअसल यही एक ऐसा पहला चुनाव था जिसमें केमिशा सोनी का विष्णु झावर व मनोज फडनिस से आमने-सामने का सीधा मुकाबला था ।
सारे तथ्य, सारे समीकरण, सारी परिस्थितियाँ हालाँकि चेयरमैन पद के चुनाव में अभय शर्मा की जीत की तरफ इशारा कर रही थीं - किंतु अभय शर्मा और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने इंदौर में बदल रही हवा के रुख को पहचानने/समझने में चूक कर दी । इस बदल रही हवा का संकेत सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के चुनाव में तो स्पष्ट रूप से मिला ही; इंदौर ब्राँच के चुनाव  में भी दिखा/मिला - जब अभय शर्मा की बड़ी जीत को बेईमानी व हेराफेरी से मिली जीत के रूप में प्रचारित किया गया । इस बात को जिस तरह से हवा मिली, उससे यह साबित हुआ कि इंदौर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'नेताओं' के बीच विष्णु झावर व मनोज फडनिस खेमे के खिलाफ भारी नाराजगी है । इस तथ्य को केमिशा सोनी ने पहचाना और इसे अपनी राजनीति में इस्तेमाल करने की उन्होंने तैयारी की । इंदौर ब्राँच में चुने गए नवनिर्वाचित सदस्य चूँकि अलग-अलग नेताओं के नजदीकी के रूप में या संपर्क में पहचाने गए, इसलिए उन्हें इकट्ठा करने में केमिशा सोनी को कोई बहुत मशक्कत नहीं करना पड़ी । इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं को केमिशा सोनी को सिर्फ यह समझाना पड़ा कि अभय शर्मा के चेयरमैन बनने से इंदौर ब्राँच पर विकास जैन का कब्जा हो जायेगा, और फिर विकास जैन मनमानी करेंगे । विकास जैन की मनमानी का डर दिखा कर और पदों का ऑफर देकर केमिशा सोनी ने गर्जना राठौर, विपुल पदलिया और आनंद जैन को अभय शर्मा के समर्थन से अलग कर दिया । चेयरमैन का पद अभय शर्मा से जिस तरह से 'छीन' लिया गया है, उसके जरिए दरअसल उन्हें विकास जैन के नजदीक होने तथा विष्णु झावर व मनोज फडनिस के 'आदमी' होने की सजा दी गई है - और इस कार्रवाई से केमिशा सोनी ने इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अपनी धाक को और मजबूत बनाया है ।

Wednesday, June 24, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी को लेकर मनोज गुप्ता, नीलेश गुप्ता और अभय शर्मा के बीच लुकाछिपी का जो खेल चल रहा है, उसने इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है

इंदौर । मनोज गुप्ता की उम्मीदवारी के 'आने' के भय ने इंदौर में रीजनल काउंसिल के संभावित उम्मीदवारों को अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करने से जिस तरह रोका हुआ है, वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में परस्पर अविश्वास तथा अनिश्चय के माहौल के होने का दिलचस्प नजारा प्रस्तुत करता है । मजे की बात यह है कि खुद मनोज गुप्ता कई मौकों पर यह घोषणा कर चुके हैं कि वह इस बार चुनावी झमेले से दूर ही रहेंगे, लेकिन फिर भी इंदौर में कई लोगों के लिए मनोज गुप्ता की इस घोषणा पर विश्वास करना मुश्किल बना हुआ है - उन्हें लगता है कि मनोज गुप्ता कभी भी अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर देंगे और सफाई दे देंगे कि वह तो उम्मीदवार नहीं होना चाहते थे, किंतु समर्थकों व शुभचिंतकों के दबाव के कारण उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए मजबूर होना पड़ा है । लोगों को यदि ऐसा लगता है, तो इसका कारण खुद मनोज गुप्ता ही हैं; वह स्वयं लोगों को यह भी बताते/कहते हैं कि उम्मीदवार बनने से उनके स्पष्ट इंकार करने के बावजूद उनके कई समर्थक व शुभचिंतक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं, और उन्हें समझाते हैं कि इस बार उनके लिए अच्छा मौका है, कि चुनावी राजनीति में उन्हें गैप नहीं छोड़ना चाहिए, कि बाद में फिर जरूरी नहीं है कि उनके लिए अभी जैसी ही अनुकूल स्थितियाँ बनी रहें, आदि-इत्यादि । मनोज गुप्ता चूँकि स्वयं ही इस तरह की बातें लोगों के बीच कहते हैं, इसलिए उम्मीदवार न होने की उनकी घोषणा शक के दायरे में आ जाती है । लोग दरअसल जानते हैं कि चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के 'लिए' न और हाँ के बीच बहुत ही पतली लाइन होती है, जिसे पार करना उनके लिए जरा भी मुश्किल नहीं होता है । चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के प्रति बनी इस धारणा के कारण ही मनोज गुप्ता की इस बार उम्मीदवार न बनने की घोषणा पर कई लोगों को भरोसा नहीं हो पा रहा है । 
मनोज गुप्ता की घोषणा पर भरोसा न हो पाने का एक कारण वास्तव में यह भी है कि पिछले से पिछले वर्ष, यानि त्रिवर्षीय सत्र के पहले वर्ष में इंदौर ब्रांच के चेयरमैन के रूप में उनका कामकाज बहुत ही सक्रियताभरा रहा था, जिसके लिए उनकी खासी प्रशंसा भी हुई और उन्हें अवार्ड भी मिले । उस समय उनकी सक्रियता और उनकी उपलब्धियों को देख कर लोगों को लग गया था कि ब्रांच में झंडे गाड़ने के बाद मनोज गुप्ता का अगला ठिकाना रीजनल काउंसिल होगा । मनोज गुप्ता ने इससे कभी इंकार भी नहीं किया । अभी भी वह सिर्फ यह कह रहे हैं कि वह इस बार उम्मीदवार नहीं होंगे - आगे कभी उम्मीदवार होने की संभावना से वह इंकार नहीं कर रहे हैं । उनका कहना है कि अभी वह अपने कामकाज पर ध्यान देना चाहते हैं और कामकाज सँभालने के बाद ही वह इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में आयेंगे । समस्या दरअसल इस कारण से है कि मनोज गुप्ता जो कह रहे हैं वह उनका व्यक्तिगत फैसला है, लेकिन चुनावी राजनीति में जो होता है वह प्रायः एक समूह से निर्देशित होता है और उसका 'व्यक्तिगत' आमतौर पर कमजोर साबित होता है; मनोज गुप्ता पर उनके 'समूह' की तरफ से तो उम्मीदवार होने का दबाव पड़ ही रहा है - उनका व्यक्तिगत अभी तक तो समूह के दबाव को नकार रहा है; शक यही है कि उनका यह नकार टिका रह पायेगा क्या ?
समझा जाता है कि इसी शक के कारण नीलेश गुप्ता अपनी उम्मीदवारी की घोषणा नहीं कर रहे हैं । नीलेश गुप्ता लोगों से तो हालाँकि यह कह रहे हैं कि चुनाव में अभी बहुत समय है, अभी से घोषणा करने की क्या जरूरत है, उचित समय पर ही घोषणा करना सही होगा, आदि-इत्यादि; लेकिन उनके नजदीकियों का कहना है कि वह मनोज गुप्ता की तरफ से पूरी तरह आश्वस्त हो लेना चाहते हैं, और मनोज गुप्ता का 'न आना' पक्का होने के बाद ही अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करेंगे । मनोज गुप्ता की उम्मीदवारी की उपस्थिति में नीलेश गुप्ता अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे; और इसीलिए वह इंतजार कर रहे हैं कि मनोज गुप्ता की तरफ से स्थिति विश्वसनीय तरीके से साफ हो जाए ।
नीलेश गुप्ता को अभय शर्मा की तरफ से भी खतरा है । अभय शर्मा ने पिछले दो वर्षों में जिस तरह से ऊँची छलाँगें लगाई हैं, उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि उनकी निगाह रीजनल काउंसिल में विकास जैन द्वारा खाली की गई जगह पर है और वह उसे भरने के लिए उत्सुक हैं । अभय शर्मा हालाँकि अभी तक तो अपनी उम्मीदवारी से इंकार कर रहे हैं, लेकिन कुछेक लोगों का कहना है कि वह जिस तरह से इंकार कर रहे हैं उसमें दरअसल मौका देखने का भाव है । अभय शर्मा के कुछेक नजदीकियों तथा शुभचिंतकों का उनके लिए सुझाव हालाँकि यह है कि पहले उन्हें  इंदौर ब्रांच का चुनाव जीत कर लोगों को दिखाना चाहिए, फिर उसके बाद उन्हें रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहिए । उल्लेखनीय है कि अभय शर्मा आज भले ही इंदौर ब्रांच के सचिव बने हुए हैं, लेकिन लोगों को यह बात अच्छी तरह याद है कि इंदौर ब्रांच का पिछला चुनाव वह जीत नहीं पाए थे - और इस कारण से लोगों के बीच उनके प्रति एक नकारात्मक भाव है । कुछेक लोगों का यद्यपि यह भी कहना है कि लोग कल की नाकामयाबी की बजाए आज की सफलता को याद रखते हैं; इसलिए इस बात को भूल कर कि पिछली बार का इंदौर ब्रांच का चुनाव वह नहीं जीत पाए थे, अभय शर्मा को रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ ही लेना चाहिए । अभय शर्मा के कुछेक समर्थकों का तर्क भी है कि नीलेश गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को लेकर जिस तरह कन्फ्यूज से दिख रहे हैं, उससे अभय शर्मा की उम्मीदवारी के लिए अच्छा मौका बन रहा है । 
अभय शर्मा लेकिन नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हो लेना चाहते हैं । अभी ऐसा लग/दिख रहा है कि नीलेश गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ अभय शर्मा अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से बचना चाहते हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि लेकिन नीलेश गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करने में देर की तो फिर अभय शर्मा अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर देंगे । रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी को लेकर नीलेश गुप्ता और अभय शर्मा के बीच लुकाछिपी का जो खेल चल रहा है, उसने इंदौर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।