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Saturday, July 28, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की गाजियाबाद ब्रांच में पिछले वर्ष हुए घपले के मामले में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य मुकेश बंसल को भी खींच लिए जाने से, यह मामला अब सेंट्रल रीजन की चुनावी राजनीति के मैदान में शिफ्ट होता हुआ लग रहा है

गाजियाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्रांच में पिछले वर्ष हुई घपलेबाजी का मामला ब्रांच के मौजूदा चेयरमैन पुनीत सखुजा, पिछले वर्ष के चेयरमैन सचिंदर गर्ग और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य मुकेश बंसल के लिए एकसाथ जी का जंजाल बन गया है - और सभी की निगाह एक अगस्त को होने वाली ब्रांच की एजीएम पर है, जिसमें पिछले वर्ष के एकाउंट्स प्रस्तुत और स्वीकार किए जाने की कार्रवाई होनी है । इस वर्ष की एजीएम को लेकर गाजियाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और उनके नेताओं की ही नहीं, बल्कि सेंट्रल रीजन के तमाम नेताओं की दिलचस्पी दरअसल इसलिए है - क्योंकि हर कोई जानना/देखना चाहता है कि पिछले वर्ष हुए घपले को पकड़ने में पुनीत सखुजा ने जो तत्परता और आक्रामकता दिखाई, उसे वह लॉजिकल कन्क्लूजन तक ले जा पाते हैं या उनकी तत्परता और आक्रामकता बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती है । पुनीत सखुजा इस बात पर गर्व करते हैं कि उन्होंने तत्परता और आक्रामकता के साथ कार्रवाई करते हुए ब्रांच और इंस्टीट्यूट के करीब साढ़े छह लाख रुपए बचाए; दूसरे लोगों को लेकिन लगता है कि इतना काफी नहीं है; उनका कहना है कि पिछले वर्ष हुए इस घपले के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि आगे कोई इस तरह का घपला करने के बारे में न सोच सके । यह माँग करने वाले लोग दरअसल पिछले वर्ष के चेयरमैन सचिंदर गर्ग को 'सजा' दिलवाना चाहते हैं । उनका तर्क है कि सचिंदर गर्ग की मिलीभगत के बिना उक्त घपला हो ही नहीं सकता था ।
इस मामले में रोमांचपूर्ण पहलू यह है कि कुछेक लोग सचिंदर गर्ग की ऊँगली पकड़ कर मुकेश बंसल का 'पहुँचा' पकड़ने की कोशिश करने लगे हैं । उनका कहना है कि सचिंदर गर्ग चूँकि मुकेश बंसल के 'आदमी' हैं, इस नाते पिछले वर्ष चेयरमैन भले ही सचिंदर गर्ग थे - लेकिन ब्रांच में राजपाट मुकेश बंसल का ही चला था; और ऐसा हो ही नहीं सकता कि पिछले वर्ष जो घपला हुआ, उसकी जानकारी मुकेश बंसल को न हो । इस तर्क के साथ, पिछले वर्ष हुए घपले में कुछेक लोग मुकेश बंसल की जिम्मेदारी भी 'तय' करने/करवाने के काम में लगे हैं । कई लोगों को यह भी लगता है कि मौजूदा वर्ष चूँकि चुनावी वर्ष है, इसलिए उम्मीदवार लोग अपने आप को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे उम्मीदवारों को नीचे खींचने का काम करेंगे ही - और इस काम में घपलेबाजी के आरोप मामले को सनसनीखेज तो बनाते ही हैं । सचिंदर गर्ग ने इस बात का फायदा उठाते हुए घपलेबाजी के आरोप की अपने ऊपर पड़ी धूल को झाड़ने का काम शुरू भी कर दिया है । उनका कहना है कि मुकेश बंसल को फँसाने के लिए उन्हें नाहक ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है और मामले को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है । उनका कहना है कि जो मामला है, वह वास्तव में अतिरिक्त भुगतान संबंधी छोटी सी प्रशासनिक चूक का मामला है, जिसे घपला कहना उचित नहीं है । सचिंदर गर्ग का कहना है कि लेकिन चुनावी मुकाबलेबाजी की होड़ में लगे लोगों ने बात का बतंगड़ बना दिया है, और मुकेश बंसल के साथ नजदीकी के कारण उन्हें बदनामी का शिकार बनना पड़ रहा है ।
मामला हालाँकि इतना सीधा/सरल भी नहीं है, क्योंकि मामले में पुनीत सखुजा को खासी गंभीर लड़ाई लड़नी पड़ी है । मामला यदि अतिरिक्त भुगतान संबंधी छोटी सी प्रशासनिक चूक का होता, तो ब्रांच के चेयरमैन के रूप में पुनीत सखुजा को एफआईआर करवाने की धमकी देने की हद तक नहीं जाना पड़ता । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष ब्रांच में लगे कम्प्यूटर्स के भुगतान में गड़बड़ी को पकड़ने का काम पुनीत सखुजा ने चेयरमैन का अपना कार्यकाल शुरू होते ही पकड़ लिया था । पहले तो पिछले वर्ष के ब्रांच के पदाधिकारियों तथा कम्प्यूटर्स सप्लाई करने वाले बेंडर ने गड़बड़ी की बात से साफ इंकार किया, लेकिन कागजातों में ही गड़बड़ी के जो संकेत और सुबूत नजर आ रहे थे - उन्हें देखते हुए पुनीत सखुजा ने सख्ती दिखाई और मामले में एफआईआर दर्ज करने की बात की । इसके बाद बेंडर करीब साढ़े छह लाख रुपये वापस करने के लिए राजी हुआ और ब्रांच को उक्त रकम वापस मिली । उम्मीद की जा रही थी कि रकम वापस मिलने से मामला समाप्त हो जायेगा, लेकिन हुआ उल्टा । दरअसल रकम वापस मिलने से, और सख्ती करने के बाद वापस मिलने से यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि मामला घपलेबाजी का ही है । इसमें अब जिम्मेदारी तय करने की बात शुरू होने लगी । कुछेक लोगों ने कहना शुरू किया कि उक्त घपलेबाजी पिछले वर्ष के पदाधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकती है, इसलिए उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए । पुनीत सखुजा इस बारे में यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर दे रहे हैं कि जो हुआ, उसकी पूरी रिपोर्ट उन्होंने इंस्टीट्यूट प्रशासन को भेज दी है; किसके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए, यह इंस्टीट्यूट प्रशासन को तय करना है, उन्हें नहीं ।
पुनीत सखुजा के इस रवैये से लोगों को लगा है कि ब्रांच के प्रशासनिक स्तर पर उक्त मामला अब खत्म हो गया है । इस मामले में लेकिन मुकेश बंसल को भी खींच लिए जाने से लोगों को लग रहा है कि अब यह मामला ब्रांच के प्रशासनिक स्तर से हट कर चुनावी राजनीति के मैदान में शिफ्ट हो रहा है । इसी नाते लोगों की निगाह एक अगस्त को होने वाली ब्रांच की एजीएम पर है । एजीएम में यह मामला कैसे हैंडिल होता है, इस पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक मैदान पर इस मामले को कैसे खेला जायेगा । उम्मीद यही की जा रही है कि पिछले वर्ष गाजियाबाद ब्रांच में हुए घपले को लेकर गाजियाबाद और सेंट्रल रीजन में राजनीतिक नजरिये से बबाल अभी मचेगा, और राजनीति की पिच पर यह मामला आसानी से दफ्न नहीं होगा ।

Tuesday, July 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में अनुज गोयल की वापसी की कोशिश सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह व मुकेश बंसल की बनती दिख रही जोड़ी के कारण मुसीबत में फँसती नजर आ रही है क्या ?

गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्यता जुगाड़ने में असफल रहने के बाद अनुज गोयल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में ही फिर से शरण लेने का जो फैसला किया है, उसने उनके समर्थकों को ही बुरी तरह बिदका दिया है और उनके कई समर्थक उनके खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं । अनुज गोयल को सबसे तगड़ा झटका गाजियाबाद में ही लगा है, जहाँ उनके घनघोर समर्थक रहे मुकेश बंसल ने ही बगावत का झंडा उठा लिया है । मुकेश बंसल के विरोध का अनुज गोयल को ऐसा झटका लगा है कि वह हर जगह मुकेश बंसल के रवैये का रोना रोते हैं और मुकेश बंसल पर धोखा देने का आरोप लगाते हैं । अनुज गोयल जगह जगह लोगों को बता रहे हैं कि मुकेश बंसल को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह लेकर आये हैं, लेकिन मुकेश बंसल ने अब मुकेश कुशवाह से तार जोड़ लिए हैं; उनका गंभीर आरोप यह है कि पिछले चुनाव में मुकेश बंसल ने उनके भाई जितेंद्र गोयल की बजाये मुकेश कुशवाह का साथ दिया था - और जितेंद्र गोयल की हार का एक प्रमुख कारण मुकेश बंसल से मिला यह धोखा भी था । अनुज गोयल और जितेंद्र गोयल इन दिनों जहाँ कहीं भी जिस किसी से भी बात कर रहे हैं, मुकेश बंसल के रवैये का रोना जरूर रो रहे हैं । उनके लगातार जारी 'विलाप' से ऐसा लग रहा है जैसे अनुज गोयल की उम्मीदवारी को सबसे बड़ा खतरा मुकेश बंसल से ही है । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल यह सुन/जान कर दरअसल डरे हुए हैं कि मुकेश बंसल ने कई जगह लोगों के बीच यह कहा हुआ है कि वह अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे । 
मुकेश बंसल दरअसल 2021 के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस वर्ष हो रहा चुनाव मुकेश कुशवाह के लिए तीसरा और आखिरी चुनाव है, मुकेश बंसल की 'तैयारी' है कि मुकेश कुशवाह द्वारा की जाने वाली खाली जगह को वह भरें; इसके लिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि अनुज गोयल चुनाव न जीत सकें । सेंट्रल रीजन में कई लोग अनुज गोयल को करिश्माई नेता मानते हैं, और दावा करते हैं कि वह तो चुनाव जीत ही जायेंगे - लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं होगा । दरअसल उनके करिश्मे की पोल तो पिछली बार खुल गई थी, जब वह अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव नहीं जितवा सके थे । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में जितेंद्र गोयल 22 उम्मीदवारों में 943 वोटों के साथ नवें नंबर पर रहे थे, और 1237 वोटों के साथ पाँचवें नंबर पर रहे मुकेश कुशवाह से 294 वोट पीछे थे । फाइनल गिनती तक पहुँचते पहुँचते जितेंद्र गोयल छठे नंबर तक तो पहुँच गए थे, लेकिन विजेता बनने से रह गए थे । जितेंद्र गोयल की यह हार उनके साथ-साथ वास्तव में अनुज गोयल की भी हार थी । उनसे पहले, नॉर्दर्न रीजन में एनडी गुप्ता ने अपने बेटे नवीन गुप्ता को तथा वेस्टर्न रीजन में कमलेश विकमसे ने अपने भाई नीलेश विकमसे को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाया है । उम्मीद की जा रही थी कि अनुज गोयल भी अपने भाई को चुनाव जितवा देंगे । नवीन गुप्ता अपने पिता तथा नीलेश विकमसे अपने भाई के चुनाव में कभी भी सक्रिय नहीं देखे गए थे;जबकि जितेंद्र गोयल तो हमेशा ही अनुज गोयल के 'स्टार प्रचारक' रहे हैं - इसलिए भी उम्मीद की गई थी कि जितेंद्र गोयल तो आसानी से चुनाव जीत जायेंगे । लेकिन वह चुनाव हार गए । जितेंद्र गोयल की हार ने अनुज गोयल के तथाकथित करिश्मे की ही पोल नहीं खोली, बल्कि यह भी दिखाया/बताया कि सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को अपनी ही जेब में रखने की अनुज गोयल की 'कोशिश' को लोगों ने अच्छा नहीं माना और जितेंद्र गोयल के समर्थन से हाथ खींच कर वास्तव में अनुज गोयल की सत्ता-लोभी सोच को सबक सिखाया ।
सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अनुज गोयल ने अपनी उसी सत्ता-लोभी सोच को एक बार फिर प्रदर्शित किया है, जिसके विरोध के कारण पिछली बार उनके भाई जितेंद्र गोयल को हार का सामना करना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि अनुज गोयल पिछले दिनों बाबा रामदेव के भरोसे उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य होने की जुगाड़ में थे, और इसलिए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के मैदान से मुँह मोड़े हुए थे । लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो वह फिर से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मुँह मारने आ गए हैं । मुकेश बंसल जैसे उनके नजदीकी रहे लोगों तक को उनका यह सत्ता-लोभी रवैया बुरा लगा है । उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों का ही कहना/पूछना है कि अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता अपने और अपने भाई के लिए ही क्यों चाहिए ? अनुज गोयल के इस सत्ता-लोभी रवैये के सवाल बन जाने के कारण ही अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ी चुनौती है । दरअसल सेंट्रल रीजन में एक सीट बढ़ जाने का फायदा जयपुर को मिलता दिख रहा है । जयपुर/राजस्थान में बढ़े वोटों के भरोसे माना जा रहा है कि जयपुर में इस बार तीन लोग सेंट्रल काउंसिल में आ जायेंगे । सेंट्रल रीजन में पिछली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले श्याम लाल अग्रवाल के इस बार चुनाव से दूर रहने की चर्चा है; चर्चा हालाँकि यह भी है कि उनके समर्थक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए राजी करने के वास्ते उन पर दबाव भी बना रहे हैं, और साथ ही उनके किसी विकल्प को लाने के लिए भी प्रयासरत हैं । जयपुर और या राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल के लिए तीन उम्मीदवार रहें या चार - उम्मीद की जा रही है कि जयपुर के तीन उम्मीदवार तो जीत ही जायेंगे । 
ऐसे में, अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए मनु अग्रवाल और मुकेश कुशवाह में से किसी एक की उम्मीदवारी की बलि लेनी होगी । इसके लिए उन्हें पहली वरीयता में इनमें से किसी एक से ज्यादा वोट पाने का प्रयास करना होगा । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल ने अभी मुकेश कुशवाह को निशाने पर लिया है । उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से चार उम्मीदवार होने के कारण जो समस्या उनके सामने है, वही समस्या मुकेश कुशवाह के सामने भी है और इसलिए वह कोशिश करें तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में मुकेश कुशवाह से आगे हो सकते हैं और सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर सकते हैं । इस कोशिश में अनुज गोयल को लेकिन मुकेश बंसल बाधा बनते हुए दिख रहे हैं । मुकेश बंसल पिछले चुनाव में 31 उम्मीदवारों में 968 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे । उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों में उनका नंबर पहला था । इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों पर उनका अच्छा प्रभाव है । इस प्रभाव के साथ मुकेश बंसल यदि अनुज गोयल को हरवाने की बात कहते/करते हैं, और मुकेश कुशवाह का साथ देते हैं - तो अनुज गोयल के लिए मामला मुश्किल तो बनता है । मुकेश बंसल पर दबाव बनाने के लिए अनुज गोयल गाजियाबाद में नितिन गुप्ता को समर्थन देने की बात करते सुने जा रहे हैं । नितिन गुप्ता पिछली बार भी उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 487 वोट के साथ 17 वे नंबर पर थे । इस रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है कि अनुज गोयल का समर्थन नितिन गुप्ता को कोई लाभ पहुँचा कर मुकेश बंसल का कुछ बिगाड़ सकेगा । क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन अनुज गोयल के खिलाफ कभी उनके ही नजदीकी रहे मुकेश बंसल के आक्रामक रवैये से सेंट्रल रीजन में चुनावी परिदृश्य दिलचस्प हो उठा है । 

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Friday, November 30, 2012

जीसी मिश्र के साथ की गई अनुज गोयल की चालबाजी ने रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बना दिया है

गाजियाबाद । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट को 'दिखा' 'दिखा' कर सहानुभूति जुटाने में इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्राँच के प्रमुख पदाधिकारी जीसी मिश्र का जैसा जो इस्तेमाल करने की कोशिश की, उसके कारण सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को खासी धमक मिली है । उल्लेखनीय है कि जीसी मिश्र सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थकों में हैं और चुनावी राजनीति की खेमेबाजी में अनुज गोयल के धुर विरोधी हैं । अभी पिछले दिनों ही गाजियाबाद ब्राँच में अनुज गोयल ने जब फर्जी तिकड़मों से अपने भाई जितेंद्र गोयल को को-ऑप्ट करवाया था तो ब्राँच में एक अकेले जीसी मिश्र ने ही उनकी इस भाई-भतीजा वाली कार्यवाई का विरोध किया था । रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल ने मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाया है । लेकिन उम्मीदवार के रूप में मुकेश बंसल की पतली हालत को देखते हुए अनुज गोयल ने उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं और जीसी मिश्र/राघवेन्द्र के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं ।
अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी सामान्य सी चोट पर खुद रो-रो कर और अपनी पत्नी को दूसरों के सामने रुला-रुला कर सहानुभूति जुटाने का जो ड्रामा रचा, उसमें जीसी मिश्र को शामिल करने के पीछे अनुज गोयल की यही समझ काम कर रही थी कि मुकेश बंसल उनके किसी काम नहीं आयेंगे, और उन्हें जीसी मिश्र/राघवेन्द्र की मदद ही लेनी पड़ेगी । अनुज गोयल को सिर्फ सहानुभूति ही जुटानी होती तो उन्हें जीसी मिश्र के नाम का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती । अनुज गोयल किंतु अपनी चोट का दो तरह से फायदा उठाना चाहते थे । एक तरफ तो उन्होंने लोगों के बीच सहानुभूति जुटाने की कोशिश की; और दूसरी तरफ उन्होंने जीसी मिश्र/राघवेन्द्र को अपने साथ दिखाने की चाल चली । अपनी इस चाल के लिए अनुज गोयल ने अपनी पत्नी का इस्तेमाल किया । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट का उपचार हो जाने के कई घंटे बाद अपनी पत्नी से जीसी मिश्र को फोन करवाया । अनुज गोयल की पत्नी ने रोते-रोते जीसी मिश्र को अनुज गोयल के अस्पताल में होने की बात बताई । अनुज गोयल की पत्नी ने जैसा जो बताया उससे ऐसा लगा जैसे अनुज गोयल का कोई भारी एक्सीडेंट हुआ है और वह बड़ी क्रिटिकल स्थिति में हैं । अनुज गोयल की पत्नी का रोना-धोना सुन कर जीसी मिश्र ने राघवेन्द्र को खबर की और दोनों ने ही तय किया कि उनके अनुज गोयल के साथ राजनीतिक रिश्ते भले ही जो भी हों, किंतु इस मुश्किल घड़ी में उन्हें अनुज गोयल की मदद में खड़े होना चाहिए । जीसी मिश्र और राघवेन्द्र तुरंत अस्पताल दौड़े । जीसी मिश्र अपनी पत्नी को भी अपने साथ लाये ।
अस्पताल पहुँच कर जो नजारा इन्होंने वहाँ देखा, तो यह हक्के-बक्के रह गए । चोट का उपचार करा चुके अनुज गोयल फोन पर लोगों को अपने अस्पताल में होने की जानकारी दे रहे थे । कुछेक दूसरे लोग भी फोन पर यही सूचना लगातार प्रचारित करने में लगे हुए थे । वह बाकायदा एक दूसरे से टिप्स ले/दे रहे थे कि फलाँ को फोन हो गया या नहीं । यह नजारा देख कर जीसी मिश्र और राघवेन्द्र ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । इन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि अनुज गोयल ने इन्हें इस्तेमाल किया है । इन्हें लेकिन अनुज गोयल की अगली चाल की भनक नहीं हो पाई । इन्हें यह तो पहले भी पता था, और यह साबित भी हो रहा था कि अनुज गोयल बहुत ही धूर्त किस्म का व्यक्ति है - लेकिन उसकी धूर्तता की हद क्या है, इसका अंदाजा नहीं था । इसका एक आभास तब हुआ जब जीसी मिश्र को पता चला कि उनके नाम से अनुज गोयल की सहानुभूति में एक एसएमएस रीजन के लोगों को भेजा गया है । अनुज गोयल को ऐसा फर्जीवाड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी ? सिर्फ इसलिए ताकि वह रीजन के लोगों को बता/दिखा सकें कि जीसी मिश्र और राघवेन्द्र उनके साथ हैं । अनुज गोयल की यह चालबाजी सामने आते ही जीसी मिश्र ने रीजन के लोगों को एसएमएस करके जानकारी दी कि अनुज गोयल के जो चोट लगी है, उसका उन्हें दुःख है और वह प्रार्थना करते हैं कि अनुज गोयल जल्दी स्वस्थ हों, लेकिन वह लोगों को बताना चाहते हैं कि पहले वाला एसएमएस उन्होंने नहीं किया था ।
जीसी मिश्र के इस एसएमएस से अनुज गोयल की किरकिरी तो खूब हुई - लेकिन उनकी किरकिरी ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी की धमक भी पैदा की । अनुज गोयल ने जो हरकत की, उससे साबित हुआ कि अनुज गोयल भी मान गए हैं कि राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है; लोगों के बीच राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन का फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने जीसी मिश्र के नाम का धोखाधड़ी के साथ इस्तेमाल किया । अनुज गोयल की इस हरकत ने उनके समर्थन के भरोसे उम्मीदवार बने मुकेश बंसल की उम्मीदवारी के लिए अजीब समस्या पैदा कर दी है । रीजन में लोगों को लग रहा है कि मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाने वाले अनुज गोयल को ही जब उन पर भरोसा नहीं रह गया है और अनुज गोयल तीन-तिकड़म से राघवेन्द्र के नजदीकियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं - तो दूसरों को उनसे जुड़ने में फिर क्या दिलचस्पी होगी । अनुज गोयल की इस हरकत से मुकेश बंसल के समर्थकों को भी लग रहा है कि अनुज गोयल ने उनके साथ धोखा किया है । मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को अपने खिलाफ अनुज गोयल का षड़यंत्र बताने वाले विनय मित्तल इस मामले में मजा ले रहे हैं । उन्हें लोगों को यह बताने का मौका मिला है कि अनुज गोयल ने पहले उनके साथ धोखा किया और अब अपने धोखे का शिकार उन्होंने मुकेश बंसल को बनाया है । अनुज गोयल के रवैये को लेकर अनुज गोयल के भूतपूर्व सहयोगी रहे विनय मित्तल के इस तरह के विचार और अनुज गोयल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले मुकेश बंसल के समर्थकों की आशंका ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिलने वाले समर्थन का स्पेस बढ़ाने का ही काम किया है । अनुज गोयल ने अपने स्वार्थ में जीसी मिश्र के साथ जो चालबाजी खेली, उसने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बनाने का ही काम किया है ।