Showing posts with label CIRC. Show all posts
Showing posts with label CIRC. Show all posts

Wednesday, July 16, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सदस्य डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत करके आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच अपनी पहचान को और समृद्ध किया है

गाजियाबाद । डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत किया है । इस प्रिंटेड प्रारूप से डॉक्टर सुनील गुप्ता को तो एक नया पाठक-वर्ग मिलेगा ही, साथ ही उन लोगों को भी डॉक्टर सुनील गुप्ता के विचारों से परिचित होने का अवसर मिलेगा जो सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हैं । डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेखों और टिप्पणियों का यह प्रिंटेड प्रारूप उन लोगों के लिए भी उपयोगी साबित होगा जो सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों पर उपलब्ध इन आलेखों व टिप्पणियों को देख/पढ़ तो चुके होंगे, लेकिन जिन्हें कभी अचानक उनके किसी आलेख या टिप्पणी को देखने/पढ़ने की या उसका संदर्भ लेने की जरूरत आ पड़े । प्रिंटेड प्रारूप के शुरू में ही दिए गए इंडेक्स में आलेख/टिप्पणी का शीर्षक इस जानकारी के साथ दिया गया है कि वह किस तारीख को सोशल मीडिया में जारी हुआ और प्रिंटेड प्रारूप में वह किस पृष्ठ पर उपलब्ध है । इस जानकारी के साथ उपलब्ध प्रिंटेड प्रारूप शोधछात्रों के काम को आसान कर देता है ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेखों व टिप्पणियों के विषयों का दायरा बहुत व्यापक है । अर्थव्यवस्था के नवीनीकरण (रीस्ट्रक्चरिंग) का मुद्दा हो, या नए भूमि अधिग्रहण कानून का मसला हो, या स्वच्छ भारत की बात हो, या रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियम-कानूनों की व्याख्या हो - डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सभी विषयों पर तथ्यपरक तरीके से अपनी कलम चलाई है । रोजगार, महँगाई, लघु उद्योगों से जुड़े विषय हों और या नौजवानों, महिलाओं, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के उत्थान से संबद्ध मामले हों - डॉक्टर सुनील गुप्ता ने समस्या को संपूर्णता में समझने का प्रयास किया है । कॉरपोरेट क्षेत्र में होने वाले बदलाव भी डॉक्टर सुनील गुप्ता की निगाह से नहीं बच पाते हैं और वहाँ नतीजों को प्रभावित करने वाली बातों को पहचानने का तथा उनका आकलन करने का उन्होंने भरसक प्रयास किया है । इसके साथ ही, देश में होने वाली राजनीतिक व सामाजिक हलचलों पर भी डॉक्टर सुनील गुप्ता की निगाह बराबर बनी रहती है । उनके आलेखों व टिप्पणियों के विषय देख कर ही लगता है देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा शायद ही कोई विषय हो जो उनसे छूटा हो ।
इसी कारण से डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेख और टिप्पणियाँ प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने वालों से लेकर देश और समाज के प्रति जागरूक रहने वाले लोगों के लिए - तथा देश और समाज के विकास में किसी भी स्तर की भूमिका निभाने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए उपयोगी हैं । शायद यही कारण है कि अपने आलेखों व टिप्पणियों को लेकर शुरू किए गए उनके फेसबुक पेज को तीन-साढ़े तीन माह की अवधि में ही सोलह हजार से ज्यादा पाठक मिल गए हैं । कम समय में उनको प्राप्त हुई पाठक संख्या से यह भी पता चलता है कि जिस तरह के विषयों को डॉक्टर सुनील गुप्ता ने साधा है, उन विषयों पर जानकारी पाने की लोगों के बीच कितनी ज्ञानात्मक 'भूख' है और इस ज्ञानात्मक 'भूख' को दूर करने के साधन कितने कम हैं । डॉक्टर सुनील गुप्ता ने इस तरह लोगों की एक बड़ी जरूरत को पूरा करने का महत्वपूर्ण काम किया है ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं । 15 नबंवर 1966 को एक कृषक परिवार में जन्मे डॉक्टर सुनील गुप्ता ने 1990 में चार्टर्ड एकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी कर ली थी । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सदस्य के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता ने शुरू से ही प्रोफेशन और प्रोफेशन से जुड़े लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाना और उन्हें हल करने की दिशा में आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था । इस सक्रियता के चलते ही डॉक्टर सुनील गुप्ता बहुत जल्दी ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की गाजियाबाद ब्रांच के चेयरमैन बने । चेयरमैन के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता की पहल से किए गए प्रयत्नों के चलते ही गाजियाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्रों को गाजियाबाद में ही परीक्षा देने की सुविधा प्राप्त हुई; अन्यथा उन्हें परीक्षा देने के लिए दिल्ली जाना पड़ता था । डॉक्टर सुनील गुप्ता द्धारा दिलचस्पी लेने के बाद ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया ने गाजियाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्रों के लिए कोचिंग की व्यवस्था शुरू की । इन सफलताओं से डॉक्टर सुनील गुप्ता की सक्रियता का क्षेत्र बढ़ा और उन्होंने बड़े स्तर पर अपने आपको खड़ा किया । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के जब वह सदस्य बने, तो वह उक्त काउंसिल के सदस्य बनने वाले गाजियाबाद के पहले चार्टर्ड एकाउंटेंट थे । इसके बाद, डॉक्टर सुनील गुप्ता ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता आज पंजाब नेशनल बैंक, जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया तथा रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के निदेशक मंडल के सदस्य हैं । इसके साथ ही वह मिनिस्ट्री ऑफ स्टील की स्टील कंज्यूमर्स काउंसिल के सक्रिय सदस्य भी हैं । एसोचैम, सीआईआई तथा पीएचडी चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज तथा प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की सदस्यता के जरिये भी उनकी संलग्नता और सक्रियता का व्यापक दायरा है । फिक्की की नेशनल एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य के रूप में फिक्की की गतिविधियों और उसके फैसलों में डॉक्टर सुनील गुप्ता की निर्णायक भूमिका रहती है । यूनिटी इंटरनेशनल फाउंडेशन की इकोनोमिक अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता ने विभिन्न देशों के बीच के व्यापारिक संबंधों को और प्रगाढ़ तथा व्यावहारिक बनाने के लिए नीति संबंधी एक ड्राफ्ट तैयार करने का एक महत्वपूर्ण काम किया है । इंडिया सेंटर फाउंडेशन ने इंडिया-जापान ग्लोबल पार्टनरशिप तथा देहली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की प्रस्तुति में जो कामयाबी प्राप्त की है, उसमें डॉक्टर सुनील गुप्ता की सक्रिय भागीदारी रही है ।
विभिन्न संस्थाओं में विविधतापूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह करते रहने के बावजूद डॉक्टर सुनील गुप्ता ने अपनी स्वतंत्र एकेडमिक पहचान को भी बनाये रहने का अनोखा काम किया है । इसी का नतीजा है कि वह एक स्वतंत्र लेखक, विचारक और व्याख्याकार के रूप में भी पहचाने जाते हैं । आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों पर समाचार पत्रों में लेख लिखते रहने तथा टेलीविजन चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित रूप से भाग लेते रहने के चलते डॉक्टर सुनील गुप्ता आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच एक जाना-पहचाना नाम है । आर्थिक व वाणिज्यिक विषयों पर उनकी कुछेक किताबें भी प्रकाशित हैं । सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत करके डॉक्टर सुनील गुप्ता ने एक एकेडमिक की अपनी पहचान को और समृद्ध करने की दिशा में ही कदम बढ़ाया है ।

Friday, November 30, 2012

जीसी मिश्र के साथ की गई अनुज गोयल की चालबाजी ने रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बना दिया है

गाजियाबाद । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट को 'दिखा' 'दिखा' कर सहानुभूति जुटाने में इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्राँच के प्रमुख पदाधिकारी जीसी मिश्र का जैसा जो इस्तेमाल करने की कोशिश की, उसके कारण सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को खासी धमक मिली है । उल्लेखनीय है कि जीसी मिश्र सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थकों में हैं और चुनावी राजनीति की खेमेबाजी में अनुज गोयल के धुर विरोधी हैं । अभी पिछले दिनों ही गाजियाबाद ब्राँच में अनुज गोयल ने जब फर्जी तिकड़मों से अपने भाई जितेंद्र गोयल को को-ऑप्ट करवाया था तो ब्राँच में एक अकेले जीसी मिश्र ने ही उनकी इस भाई-भतीजा वाली कार्यवाई का विरोध किया था । रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल ने मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाया है । लेकिन उम्मीदवार के रूप में मुकेश बंसल की पतली हालत को देखते हुए अनुज गोयल ने उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं और जीसी मिश्र/राघवेन्द्र के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं ।
अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी सामान्य सी चोट पर खुद रो-रो कर और अपनी पत्नी को दूसरों के सामने रुला-रुला कर सहानुभूति जुटाने का जो ड्रामा रचा, उसमें जीसी मिश्र को शामिल करने के पीछे अनुज गोयल की यही समझ काम कर रही थी कि मुकेश बंसल उनके किसी काम नहीं आयेंगे, और उन्हें जीसी मिश्र/राघवेन्द्र की मदद ही लेनी पड़ेगी । अनुज गोयल को सिर्फ सहानुभूति ही जुटानी होती तो उन्हें जीसी मिश्र के नाम का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती । अनुज गोयल किंतु अपनी चोट का दो तरह से फायदा उठाना चाहते थे । एक तरफ तो उन्होंने लोगों के बीच सहानुभूति जुटाने की कोशिश की; और दूसरी तरफ उन्होंने जीसी मिश्र/राघवेन्द्र को अपने साथ दिखाने की चाल चली । अपनी इस चाल के लिए अनुज गोयल ने अपनी पत्नी का इस्तेमाल किया । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट का उपचार हो जाने के कई घंटे बाद अपनी पत्नी से जीसी मिश्र को फोन करवाया । अनुज गोयल की पत्नी ने रोते-रोते जीसी मिश्र को अनुज गोयल के अस्पताल में होने की बात बताई । अनुज गोयल की पत्नी ने जैसा जो बताया उससे ऐसा लगा जैसे अनुज गोयल का कोई भारी एक्सीडेंट हुआ है और वह बड़ी क्रिटिकल स्थिति में हैं । अनुज गोयल की पत्नी का रोना-धोना सुन कर जीसी मिश्र ने राघवेन्द्र को खबर की और दोनों ने ही तय किया कि उनके अनुज गोयल के साथ राजनीतिक रिश्ते भले ही जो भी हों, किंतु इस मुश्किल घड़ी में उन्हें अनुज गोयल की मदद में खड़े होना चाहिए । जीसी मिश्र और राघवेन्द्र तुरंत अस्पताल दौड़े । जीसी मिश्र अपनी पत्नी को भी अपने साथ लाये ।
अस्पताल पहुँच कर जो नजारा इन्होंने वहाँ देखा, तो यह हक्के-बक्के रह गए । चोट का उपचार करा चुके अनुज गोयल फोन पर लोगों को अपने अस्पताल में होने की जानकारी दे रहे थे । कुछेक दूसरे लोग भी फोन पर यही सूचना लगातार प्रचारित करने में लगे हुए थे । वह बाकायदा एक दूसरे से टिप्स ले/दे रहे थे कि फलाँ को फोन हो गया या नहीं । यह नजारा देख कर जीसी मिश्र और राघवेन्द्र ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । इन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि अनुज गोयल ने इन्हें इस्तेमाल किया है । इन्हें लेकिन अनुज गोयल की अगली चाल की भनक नहीं हो पाई । इन्हें यह तो पहले भी पता था, और यह साबित भी हो रहा था कि अनुज गोयल बहुत ही धूर्त किस्म का व्यक्ति है - लेकिन उसकी धूर्तता की हद क्या है, इसका अंदाजा नहीं था । इसका एक आभास तब हुआ जब जीसी मिश्र को पता चला कि उनके नाम से अनुज गोयल की सहानुभूति में एक एसएमएस रीजन के लोगों को भेजा गया है । अनुज गोयल को ऐसा फर्जीवाड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी ? सिर्फ इसलिए ताकि वह रीजन के लोगों को बता/दिखा सकें कि जीसी मिश्र और राघवेन्द्र उनके साथ हैं । अनुज गोयल की यह चालबाजी सामने आते ही जीसी मिश्र ने रीजन के लोगों को एसएमएस करके जानकारी दी कि अनुज गोयल के जो चोट लगी है, उसका उन्हें दुःख है और वह प्रार्थना करते हैं कि अनुज गोयल जल्दी स्वस्थ हों, लेकिन वह लोगों को बताना चाहते हैं कि पहले वाला एसएमएस उन्होंने नहीं किया था ।
जीसी मिश्र के इस एसएमएस से अनुज गोयल की किरकिरी तो खूब हुई - लेकिन उनकी किरकिरी ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी की धमक भी पैदा की । अनुज गोयल ने जो हरकत की, उससे साबित हुआ कि अनुज गोयल भी मान गए हैं कि राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है; लोगों के बीच राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन का फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने जीसी मिश्र के नाम का धोखाधड़ी के साथ इस्तेमाल किया । अनुज गोयल की इस हरकत ने उनके समर्थन के भरोसे उम्मीदवार बने मुकेश बंसल की उम्मीदवारी के लिए अजीब समस्या पैदा कर दी है । रीजन में लोगों को लग रहा है कि मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाने वाले अनुज गोयल को ही जब उन पर भरोसा नहीं रह गया है और अनुज गोयल तीन-तिकड़म से राघवेन्द्र के नजदीकियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं - तो दूसरों को उनसे जुड़ने में फिर क्या दिलचस्पी होगी । अनुज गोयल की इस हरकत से मुकेश बंसल के समर्थकों को भी लग रहा है कि अनुज गोयल ने उनके साथ धोखा किया है । मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को अपने खिलाफ अनुज गोयल का षड़यंत्र बताने वाले विनय मित्तल इस मामले में मजा ले रहे हैं । उन्हें लोगों को यह बताने का मौका मिला है कि अनुज गोयल ने पहले उनके साथ धोखा किया और अब अपने धोखे का शिकार उन्होंने मुकेश बंसल को बनाया है । अनुज गोयल के रवैये को लेकर अनुज गोयल के भूतपूर्व सहयोगी रहे विनय मित्तल के इस तरह के विचार और अनुज गोयल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले मुकेश बंसल के समर्थकों की आशंका ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिलने वाले समर्थन का स्पेस बढ़ाने का ही काम किया है । अनुज गोयल ने अपने स्वार्थ में जीसी मिश्र के साथ जो चालबाजी खेली, उसने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बनाने का ही काम किया है ।

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।