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Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।

Thursday, November 22, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में गाजियाबाद के एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता को राहत दिलवाने का भरोसा देकर अनुज गोयल ने अपना समर्थक बनाया, और मुकेश कुशवाह के लिए मुसीबत खड़ी की

गाजियाबाद । एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता की चुनावी सक्रियता ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने की मुकेश कुशवाह व अनुज गोयल की कोशिशों ने चुनावी परिदृश्य को एक मजेदार रंग दे दिया है । संजय गुप्ता पहले मुकेश कुशवाह के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते थे; लेकिन स्टेट बैंक से लिए गए लोन्स को न चुकाने के मामले में वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट व स्टेट बैंक के डायरेक्टर गिरीश आहुजा की मदद दिलवा पाने में असफल रहने के कारण वह मुकेश कुशवाह के खिलाफ हो गए हैं, और उन्होंने अनुज गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । संजय गुप्ता इससे पहले इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में किसी न किसी के समर्थक तो रहे हैं, लेकिन ज्यादा सक्रिय नहीं रहे; किंतु इस बार वह अनुज गोयल की उम्मीदवारी के पक्ष में घर घर जा कर जमकर प्रचार कर रहे हैं । उनके प्रचार में ज्यादातर मुकेश कुशवाह के प्रति जहरभरी बातें उगलना होता है, इसलिए उनकी सक्रियता ने गाजियाबाद में जोरों की तथा सेंट्रल रीजन के दूसरे हिस्सों में फुसफुसाहटभरी गर्मी पैदा की हुई है । इस मामले में गिरीश आहुजा जैसी बड़ी शख्सियत का नाम शामिल होने से बात और गंभीर भी हो गई है । संजय गुप्ता का मुकेश कुशवाह पर तो सीधा सीधा आरोप है ही कि उनके मामले में मुकेश कुशवाह को चूँकि पैसे मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उनके मामले में दिलचस्पी नहीं ली; कहीं कहीं संजय गुप्ता ने इस आरोप के लपेटे में गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । 
उल्लेखनीय है कि संजय गुप्ता ने कई वर्ष पहले ज्वैलरी का बिजनेस किया था, जिसके लिए उन्होंने स्टेट बैंक से भारी लोन लिया था । स्टेट बैंक से ही उनके नाम एक हाऊसिंग लोन भी रहा । बिजनेस उनका चला नहीं, फलस्वरूप लोन वह चुका नहीं सके । समय से लोन चुकाने की कोशिश करने की बजाये संजय गुप्ता तरह तरह के आरोप लगाते हुए बैंक पदाधिकारियों से उलझते और रहे, जिसके कारण उनका मामला गंभीर होता गया । संजय गुप्ता ने बैंक पदाधिकारियों पर जो जो आरोप लगाये, उनमें झूठ/सच चाहें जो हो; मामले में बुनियादी बात लोन चुकाने की जो थी - उसे पूरा करने में संजय गुप्ता असफल ही रहे, जिस कारण उनकी गर्दन फँसती गई । पिछले दिनों बैंक की तरफ से संजय गुप्ता को ओटीएस (वन टाइम सेटलमेंट) का ऑफर मिला । इस ऑफर को निपटाने के बावजूद संजय गुप्ता को मुसीबत से छुटकारा लेकिन नहीं मिला । बैंक ने लोन बसूलने के लिए सख्ती दिखाई और उनकी संपत्ति को 'कब्जे' में ले लिया । इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने एक बड़ी सिफारिश खोजी, जो उन्हें स्टेट बैंक में डायरेक्टर गिरीश आहुजा के रूप में नजर आई । गिरीश आहुजा तक पहुँच बनाने में संजय गुप्ता ने मुकेश कुशवाह की मदद ली । गिरीश आहुजा ने लेकिन जब संजय गुप्ता के मामले को देखा/जाना और उसे बुरी तरह उलझा हुआ पाया तो उन्होंने कुछ करने से साफ इंकार कर दिया । चर्चा है कि गिरीश आहुजा ने संजय गुप्ता को इस बात के लिए लताड़ भी लगाई कि बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों से उलझने की बजाये उन्होंने यदि लोन चुकाने में दिलचस्पी ली होती, तो नौबत यहाँ तक न आती । गिरीश आहुजा की इस लताड़ को सुन तथा उनके रवैये को देख कर मुकेश कुशवाह ने संजय गुप्ता की मदद करने के मामले से हाथ खींच लिया । इससे संजय गुप्ता बुरी तरह भड़क गए ।
मुकेश कुशवाह के लिए कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि चुनावी राजनीति के नाजुक मौके पर अनुज गोयल ने संजय गुप्ता को 'पकड़' लिया और उन्हें आश्वस्त किया कि उनके झंझट से वह उन्हें राहत दिलवायेंगे । संजय गुप्ता को अभी तक कोई राहत नहीं मिली है - और जो लोग उनके मामले से परिचित हैं, उनका कहना है कि संजय गुप्ता को वैसी कोई राहत मिल भी नहीं पायेगी जैसी राहत वह चाहते हैं - लेकिन अनुज गोयल ने कुछेक प्रभावी लोगों से उनकी बात चूँकि करवा दी है या करवा देने का भरोसा दिया है, इसलिए संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के बड़े समर्थक बन गए हैं । वर्षों अनुज गोयल के घोर विरोधी रहे संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के चुनाव प्रचार में जोरशोर से लगे हैं, और अपने लोन को चुकाने की चिंता करने की बजाये अनुज गोयल को वोट दिलवाने के अभियान में सक्रिय दिलचस्पी ले रहे हैं - जिसके तहत वह अनुज गोयल के साथ जा जा कर न सिर्फ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिल रहे हैं, बल्कि फोन से तथा वाट्स-ऐप में मुकेश कुशवाह के खिलाफ तरह तरह के आरोप लगाते हुए बातें बताने व पोस्ट्स लिखने का काम कर रहे हैं । संजय गुप्ता की तरफ से गंभीर आरोप यह सुना गया है कि मुकेश कुशवाह उनका काम करवाने के बदले में पैसे चाहते थे, और जब मुकेश कुशवाह को लगा कि उनसे उन्हें पैसे नहीं मिल पायेंगे, तो वह उनकी मदद करने से पीछे हट गए । इस तरह के आरोप के लपेटे में कहीं कहीं संजय गुप्ता ने गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । संजय गुप्ता की इस तरह की बातें मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को कितना नुकसान और अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कितना फायदा पहुँचायेंगी, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनकी बातों ने खास तौर से गाजियाबाद में तथा आम तौर से सेंट्रल रीजन में चुनावी माहौल में गर्मी जरूर पैदा कर दी है । 

Tuesday, July 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में अनुज गोयल की वापसी की कोशिश सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह व मुकेश बंसल की बनती दिख रही जोड़ी के कारण मुसीबत में फँसती नजर आ रही है क्या ?

गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्यता जुगाड़ने में असफल रहने के बाद अनुज गोयल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में ही फिर से शरण लेने का जो फैसला किया है, उसने उनके समर्थकों को ही बुरी तरह बिदका दिया है और उनके कई समर्थक उनके खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं । अनुज गोयल को सबसे तगड़ा झटका गाजियाबाद में ही लगा है, जहाँ उनके घनघोर समर्थक रहे मुकेश बंसल ने ही बगावत का झंडा उठा लिया है । मुकेश बंसल के विरोध का अनुज गोयल को ऐसा झटका लगा है कि वह हर जगह मुकेश बंसल के रवैये का रोना रोते हैं और मुकेश बंसल पर धोखा देने का आरोप लगाते हैं । अनुज गोयल जगह जगह लोगों को बता रहे हैं कि मुकेश बंसल को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह लेकर आये हैं, लेकिन मुकेश बंसल ने अब मुकेश कुशवाह से तार जोड़ लिए हैं; उनका गंभीर आरोप यह है कि पिछले चुनाव में मुकेश बंसल ने उनके भाई जितेंद्र गोयल की बजाये मुकेश कुशवाह का साथ दिया था - और जितेंद्र गोयल की हार का एक प्रमुख कारण मुकेश बंसल से मिला यह धोखा भी था । अनुज गोयल और जितेंद्र गोयल इन दिनों जहाँ कहीं भी जिस किसी से भी बात कर रहे हैं, मुकेश बंसल के रवैये का रोना जरूर रो रहे हैं । उनके लगातार जारी 'विलाप' से ऐसा लग रहा है जैसे अनुज गोयल की उम्मीदवारी को सबसे बड़ा खतरा मुकेश बंसल से ही है । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल यह सुन/जान कर दरअसल डरे हुए हैं कि मुकेश बंसल ने कई जगह लोगों के बीच यह कहा हुआ है कि वह अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे । 
मुकेश बंसल दरअसल 2021 के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस वर्ष हो रहा चुनाव मुकेश कुशवाह के लिए तीसरा और आखिरी चुनाव है, मुकेश बंसल की 'तैयारी' है कि मुकेश कुशवाह द्वारा की जाने वाली खाली जगह को वह भरें; इसके लिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि अनुज गोयल चुनाव न जीत सकें । सेंट्रल रीजन में कई लोग अनुज गोयल को करिश्माई नेता मानते हैं, और दावा करते हैं कि वह तो चुनाव जीत ही जायेंगे - लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं होगा । दरअसल उनके करिश्मे की पोल तो पिछली बार खुल गई थी, जब वह अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव नहीं जितवा सके थे । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में जितेंद्र गोयल 22 उम्मीदवारों में 943 वोटों के साथ नवें नंबर पर रहे थे, और 1237 वोटों के साथ पाँचवें नंबर पर रहे मुकेश कुशवाह से 294 वोट पीछे थे । फाइनल गिनती तक पहुँचते पहुँचते जितेंद्र गोयल छठे नंबर तक तो पहुँच गए थे, लेकिन विजेता बनने से रह गए थे । जितेंद्र गोयल की यह हार उनके साथ-साथ वास्तव में अनुज गोयल की भी हार थी । उनसे पहले, नॉर्दर्न रीजन में एनडी गुप्ता ने अपने बेटे नवीन गुप्ता को तथा वेस्टर्न रीजन में कमलेश विकमसे ने अपने भाई नीलेश विकमसे को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाया है । उम्मीद की जा रही थी कि अनुज गोयल भी अपने भाई को चुनाव जितवा देंगे । नवीन गुप्ता अपने पिता तथा नीलेश विकमसे अपने भाई के चुनाव में कभी भी सक्रिय नहीं देखे गए थे;जबकि जितेंद्र गोयल तो हमेशा ही अनुज गोयल के 'स्टार प्रचारक' रहे हैं - इसलिए भी उम्मीद की गई थी कि जितेंद्र गोयल तो आसानी से चुनाव जीत जायेंगे । लेकिन वह चुनाव हार गए । जितेंद्र गोयल की हार ने अनुज गोयल के तथाकथित करिश्मे की ही पोल नहीं खोली, बल्कि यह भी दिखाया/बताया कि सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को अपनी ही जेब में रखने की अनुज गोयल की 'कोशिश' को लोगों ने अच्छा नहीं माना और जितेंद्र गोयल के समर्थन से हाथ खींच कर वास्तव में अनुज गोयल की सत्ता-लोभी सोच को सबक सिखाया ।
सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अनुज गोयल ने अपनी उसी सत्ता-लोभी सोच को एक बार फिर प्रदर्शित किया है, जिसके विरोध के कारण पिछली बार उनके भाई जितेंद्र गोयल को हार का सामना करना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि अनुज गोयल पिछले दिनों बाबा रामदेव के भरोसे उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य होने की जुगाड़ में थे, और इसलिए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के मैदान से मुँह मोड़े हुए थे । लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो वह फिर से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मुँह मारने आ गए हैं । मुकेश बंसल जैसे उनके नजदीकी रहे लोगों तक को उनका यह सत्ता-लोभी रवैया बुरा लगा है । उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों का ही कहना/पूछना है कि अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता अपने और अपने भाई के लिए ही क्यों चाहिए ? अनुज गोयल के इस सत्ता-लोभी रवैये के सवाल बन जाने के कारण ही अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ी चुनौती है । दरअसल सेंट्रल रीजन में एक सीट बढ़ जाने का फायदा जयपुर को मिलता दिख रहा है । जयपुर/राजस्थान में बढ़े वोटों के भरोसे माना जा रहा है कि जयपुर में इस बार तीन लोग सेंट्रल काउंसिल में आ जायेंगे । सेंट्रल रीजन में पिछली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले श्याम लाल अग्रवाल के इस बार चुनाव से दूर रहने की चर्चा है; चर्चा हालाँकि यह भी है कि उनके समर्थक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए राजी करने के वास्ते उन पर दबाव भी बना रहे हैं, और साथ ही उनके किसी विकल्प को लाने के लिए भी प्रयासरत हैं । जयपुर और या राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल के लिए तीन उम्मीदवार रहें या चार - उम्मीद की जा रही है कि जयपुर के तीन उम्मीदवार तो जीत ही जायेंगे । 
ऐसे में, अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए मनु अग्रवाल और मुकेश कुशवाह में से किसी एक की उम्मीदवारी की बलि लेनी होगी । इसके लिए उन्हें पहली वरीयता में इनमें से किसी एक से ज्यादा वोट पाने का प्रयास करना होगा । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल ने अभी मुकेश कुशवाह को निशाने पर लिया है । उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से चार उम्मीदवार होने के कारण जो समस्या उनके सामने है, वही समस्या मुकेश कुशवाह के सामने भी है और इसलिए वह कोशिश करें तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में मुकेश कुशवाह से आगे हो सकते हैं और सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर सकते हैं । इस कोशिश में अनुज गोयल को लेकिन मुकेश बंसल बाधा बनते हुए दिख रहे हैं । मुकेश बंसल पिछले चुनाव में 31 उम्मीदवारों में 968 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे । उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों में उनका नंबर पहला था । इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों पर उनका अच्छा प्रभाव है । इस प्रभाव के साथ मुकेश बंसल यदि अनुज गोयल को हरवाने की बात कहते/करते हैं, और मुकेश कुशवाह का साथ देते हैं - तो अनुज गोयल के लिए मामला मुश्किल तो बनता है । मुकेश बंसल पर दबाव बनाने के लिए अनुज गोयल गाजियाबाद में नितिन गुप्ता को समर्थन देने की बात करते सुने जा रहे हैं । नितिन गुप्ता पिछली बार भी उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 487 वोट के साथ 17 वे नंबर पर थे । इस रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है कि अनुज गोयल का समर्थन नितिन गुप्ता को कोई लाभ पहुँचा कर मुकेश बंसल का कुछ बिगाड़ सकेगा । क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन अनुज गोयल के खिलाफ कभी उनके ही नजदीकी रहे मुकेश बंसल के आक्रामक रवैये से सेंट्रल रीजन में चुनावी परिदृश्य दिलचस्प हो उठा है । 

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Thursday, January 18, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की काउंसिल की महिला सदस्यों को दरकिनार कर अपनी पत्नी अर्चना शर्मा को बुमेन कॉन्फ्रेंस का डायरेक्टर बनवा कर राजेश शर्मा ने एक बार फिर इंस्टीट्यूट की प्रतिष्ठा को कलंकित करने का काम किया

नई दिल्ली । महिला सशक्तिकरण के नाम पर 'पत्नी सशक्तिकरण' करने की राजेश शर्मा की हरकत से लोगों के बीच एक बार फिर यह साबित हुआ कि राजेश शर्मा किसी भी तरह से सुधरने वाले नहीं हैं । उल्लेखनीय है कि राजेश शर्मा अपनी हरकतों के चलते प्रोफेशन के लोगों के बीच बार बार लताड़ खाते रहे हैं । इंस्टीट्यूट के इतिहास में राजेश शर्मा अभी तक अकेले ऐसे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं, जिन्हें प्रोफेशन के लोगों की नाराजगी का शिकार होने से बचने के लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में खिड़की से कूद कर भागना पड़ा और जिनके लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे लगाए गए और गूँजे । उम्मीद की गई थी कि प्रोफेशन के लोगों के बीच अपनी हो/बढ़ रही बदनामी से सबक लेकर राजेश शर्मा अपने व्यवहार और आचरण में संजीदगी लायेंगे, और ऐसे काम करने से बचेंगे - जो लोगों के बीच उनकी नकारात्मक पहचान को बढ़ाए व गाढ़ा करें । लेकिन राजेश शर्मा बार बार अपनी हरकतों से लोगों की उम्मीदों को ठेंगा दिखा देते हैं और पिछली बार से भी बड़ा कारनामा कर दिखाते हैं । राजेश शर्मा अभी तक तो अपनी हरकतों से प्रोफेशन के सदस्यों को ही परेशान, उपेक्षित और अपमानित करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को ही निशाने पर ले लिया है । इंस्टीट्यूट की कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी और नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के संयुक्त तत्त्वाधान में 'बुमेन कॉन्फ्रेंस' करने में जल्दबाजी करने तथा राजेश शर्मा की पत्नी अर्चना शर्मा के कॉन्फ्रेंस की डायरेक्टर 'बनने' में राजेश शर्मा की जो हरकत रही है, प्रोफेशन के लोगों के बीच उसे लेकर भारी नाराजगी है । 
मजे की बात यह है कि कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी में सेंट्रल काउंसिल की दो महिला सदस्य - के श्रीप्रिया और केमिशा सोनी हैं, तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दो महिला सदस्य - योगिता आनंद व पूजा बंसल हैं; लेकिन बुमेन कॉन्फ्रेंस का डायरेक्टर इनमें से किसी को न बना कर राजेश शर्मा की पत्नी को बनाया गया । कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस कमेटी के चेयरमैन मुकेश कुशवाह से इस बारे में कुछ लोगों ने जब बात की, तो उन्होंने यह कहते हुए मामले से अपने को अलग कर लिया कि इस बारे में सभी फैसले राजेश शर्मा कर रहे हैं, लिहाजा उनसे ही पूछो । राजेश शर्मा उक्त कमेटी के वाइस चेयरमैन हैं । कमेटी के बाकी लोगों का कहना है कि मुकेश कुशवाह तो बस कहने के लिए चेयरमैन हैं, उन्हें कुछ आता/जाता भी नहीं है और उन्हें कुछ करने में दिलचस्पी भी नहीं है - जिसके चलते राजेश शर्मा ने ही चेयरमैन की 'जिम्मेदारियाँ' ले ली हैं । 'बुमेन कॉन्फ्रेंस' की तैयारी को लेकर जो मीटिंग हुई, उसमें भी अर्चना शर्मा को डायरेक्टर बनाने पर सवाल उठे, और पूछा गया कि उनका कहाँ क्या योगदान है और उन्होंने ऐसा क्या किया है कि चार काउंसिल सदस्यों के होते हुए उन्हें डायरेक्टर बनाया जा रहा है; तो इसके जबाव में सुनने को मिला कि चेयरमैन ने कहा है कि भाभी जी को ही डायरेक्टर बनाना है । यहाँ चेयरमैन से मतलब राकेश मक्कड़ से है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ किस हद तक राजेश शर्मा की गिरफ्त में हैं, और उनकी जी-हुजूरी में रहते हैं - यह अब जगजाहिर बात है ।
राजेश शर्मा की पत्नी अर्चना शर्मा को डायरेक्टर बनाने से काउंसिल सदस्य ही नहीं, बल्कि राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ के कई समर्थक तक नाराज हो गए हैं । इनके समर्थकों व नजदीकियों में जो महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, उनमें से कइयों ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि चुनाव के समय तो यह उनसे मदद लेते हैं, और जब कहीं कार्यक्रम का मौका आता है, तो अपनी पत्नी और भाभी ही इन्हें दिखती हैं । अपनी पत्नी को डायरेक्टर बनवाने की राजेश शर्मा की हरकत को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी पैदा हुई है, उसने बुमेन कॉन्फ्रेंस के बुरी तरह फ्लॉप होने की स्थिति बना दी है । कॉन्फ्रेंस को फ्लॉप होने से बचाने के लिए राजेश शर्मा और उनके 'चंपुओं' ने वाट्स-ऐप पर अभियान तो चलाया हुआ है, लेकिन उसका कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है । राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ से इस वर्ष होने वाले रीजनल काउंसिल के चुनाव में सहयोग/समर्थन मिलने की उम्मीद में कुछेक संभावित उम्मीदवारों - जो पिछली बार हार गए थे - ने भी कॉन्फ्रेंस को कामयाब बनाने का बीड़ा उठाया हुआ है । राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की तरफ से महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तथा ब्रांचेज में महिला पदाधिकरियों को ट्रॉफी व अवॉर्ड का लालच देकर ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को कॉन्फ्रेंस में लाने के लिए प्रेरित भी किया जा रहा है । उन्हें उम्मीद है कि ट्रॉफी और अवॉर्ड के लालच में कई महिला चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तथा ब्रांचेज में महिला पदाधिकारी कॉन्फ्रेंस को सफल बनाने में जुट जायेंगी । हारे हुए और लालची किस्म के 'नेताओं' के भरोसे, अपनी पत्नी की डायरेक्टरशिप में होने वाली बुमेन कॉन्फ्रेंस को कामयाब बनाने की राजेश शर्मा की कोशिशों ने इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख व प्रतिष्ठा को उनके हाथों एक बार फिर कलंकित करने का ही काम किया है ।

Thursday, March 16, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा होने की घोषणा से सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह की फजीहत हुई और प्रकाश शर्मा की मुसीबत बढ़ी

कानपुर । मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने की जो हरकत की, उसके निशान मिटाने के लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कदम तो उठाया है - लेकिन मुकेश कुशवाह की हरकतों के दाग इतने गहरे हैं कि लगता नहीं है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के प्रयासों के बावजूद वह पूरी तरह मिट पायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी की भूमिका निभा रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह ने अपनी मनमानीपूर्ण बेईमानी से दीप कुमार मिश्र को चेयरमैन 'चुनवाने' का जो कांड किया, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने उसे रद्द कर दिया है - और चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब उसकी किसी रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने का निर्णय हुआ है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इस काले अध्याय को जोड़ने की जिम्मेदारी के लिए मुकेश कुशवाह को याद किया जायेगा । इस कलंक-कथा की खास बात यह है कि मुकेश कुशवाह जब इसे 'लिख' ही रहे थे, तब ही इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से साफ शब्दों में बता दिया गया था कि वह जो कर रहे हैं - वह नियम विरुद्ध है और गलत है; मुकेश कुशवाह उस समय लेकिन पद की गर्मी और अहंकार में इस कदर जकड़े हुए थे कि उन्होंने साफ साफ लिखे उन शब्दों को कोई अहमियत ही नहीं दी ।
मुकेश कुशवाह को दरअसल उम्मीद थी कि वह जो फैसला कर देंगे, इंस्टीट्यूट प्रशासन अंततः उसे स्वीकार कर ही लेगा । मुकेश कुशवाह की तरफ से उस समय दावा किया भी गया था कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । अनिल भंडारी से मिले आश्वासन के भरोसे ही मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से नियमों के मिले हवाले की परवाह करने की जरूरत नहीं समझी । मुकेश कुशवाह अपनी कारस्तानी को लेकर इसलिए भी आश्वस्त थे क्योंकि उनके किए-धरे को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन मिला था । किंतु किसी का भी आश्वासन और समर्थन उनके काम नहीं आया । लोगों का कहना/मानना है कि दरअसल मुकेश कुशवाह की जैसी छवि है, उसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को लगा होगा कि मुकेश कुशवाह की इस हरकत पर उन्होंने यदि कोई कार्रवाई नहीं की तो मुकेश कुशवाह का हौंसला बढ़ेगा और फिर वह अपनी कारस्तानियों से इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को बदनाम करते रहेंगे । इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह द्धारा मनमानीपूर्ण बेईमानी से कराए गए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव को रद्द करके उक्त चुनाव को दोबारा कराने का आदेश दिया गया है ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंस्टीट्यूट के इतिहास और उसकी पहचान/प्रतिष्ठा पर मुकेश कुशवाह द्धारा पोती गई कालिख को इस तरह से पौंछने की कोशिश तो की गई है, लेकिन उसकी यह कोशिश अधिकतर लोगों को आधी-अधूरी भी लग रही है । लोगों का मानना/कहना है कि सिर्फ चेयरमैन का ही नहीं, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का पूरा चुनाव ही दोबारा होना चाहिए । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में पहले चेयरमैन का चुनाव होता है, और यह चुनाव बाकी पदों के लिए होने वाले चुनाव की भावभूमि और केमिस्ट्री तय करता है - इसलिए चेयरमैन के चुनाव में हुई बेईमानी ने बाकी सभी चुनावों पर अपना असर डाला है, इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन यदि वास्तव में न्याय करना चाहता है तो उसे पूरा चुनाव दोबारा कराना चाहिए; अन्यथा चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाला चुनाव महज खानापूर्ति करना होगा । मुकेश कुशवाह की मनमानीपूर्ण बेईमानी के चलते चेयरमैन पद पाने से वंचित रहे रोहित रुवाटिया अग्रवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगता है कि तीन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के समर्थन के बूते मुकेश कुशवाह जो बेईमानी कर सके, उसके चलते दोबारा होने वाले चुनाव में 'वास्तविक चुनाव' नहीं हो सकेगा - और रोहित रुवाटिया अग्रवाल के साथ सचमुच न्याय नहीं हो पायेगा । समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से रोहित रुवाटिया अग्रवाल को सलाह दी जा रही है कि उन्हें सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पदों का चुनाव दोबारा कराने हेतु इंस्टीट्यूट प्रशासन को राजी करने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । माना/समझा जाता है कि रद्द हुए चुनाव में प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को समर्थन नहीं दिया था । इसके लिए जयपुर और राजस्थान में उन्हें भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा है । लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जयपुर और राजस्थान का वास्ता देकर ही समर्थन जुटाया था, और अगले चुनाव में भी उन्हें यही 'वास्ता' देना पड़ेगा - ऐसे में जयपुर और राजस्थान को चेयरमैन 'मिलने' के मौके के साथ उन्होंने धोखा क्यों कर दिया ? प्रकाश शर्मा समय के साथ जयपुर और राजस्थान के लोगों के 'घाव' के भरने का इंतजार कर रहे थे कि दोबारा चुनाव होने/कराने की घोषणा ने उनके घावों को कुरेद कर फिर से ताजा कर दिया है । प्रकाश शर्मा और उनके नजदीकियों को यह डर सता रहा है कि चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में रोहित रुवाटिया अग्रवाल यदि नहीं जीते, तो जयपुर और राजस्थान में लोग इसके लिए प्रकाश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे और इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव का नतीजा क्या होगा, इसका जबाव तो जल्दी ही मिल जायेगा - लेकिन दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने मुकेश कुशवाह की बेईमानीपूर्ण कारस्तानी पर जो मोहर लगाई है और प्रकाश शर्मा के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसने सेंट्रल रीजन में एक दिलचस्प नजारा खड़ा किया है ।

Wednesday, September 28, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करके संजीव चौधरी अलग-थलग पड़े और भारी फजीहत का शिकार बने

नई दिल्ली । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने के मामले में संजीव चौधरी ने विदेशी फर्मों के समर्थन में शॉट तो जोर का लगाया, लेकिन बहस में वह जिस तरह से अलग-थलग पड़े दिखाई दिए - उससे खुद उन्हें ही डर हो गया है कि उनकी बॉल गोल में जाएगी भी और या उन्हीं को चोट पहुँचाएगी ? अपनी संभावित फजीहत से बचने के लिए उन्होंने बिग फोर के एक अन्य सदस्य एनसी हेगड़े के रूप में हालाँकि एक बलि का बकरा ढूँढ़ लिया है । इससे पहले भी इंस्टीट्यूट के चुनावों में, खासतौर से सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी । उस मामले में भी संजीव चौधरी जोश में होश खो बैठे थे, और उन्होंने अपनी स्वार्थी व्यक्तिवादी सोच काउंसिल व इंस्टीट्यूट पर लादने की कोशिश की थी; इस बार भी उनका रवैया काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को अपनी मर्जी से हाँकने की कोशिश करने वाला था - जिसका नतीजा यह हुआ कि काउंसिल में वह पूरी तरह अकेले पड़ गए; यहाँ तक कि इस मामले में जिन एनसी हेगड़े का समर्थन मिलने की उन्होंने खासी उम्मीद की थी, उन एनसी हेगड़े की तरफ से भी उन्हें सक्रिय व पर्याप्त समर्थन नहीं मिला ।
उल्लेखनीय है कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने को लेकर कंपनी मामलों के मंत्रालय द्धारा माँगी गई सलाह पर विचार के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की पिछली मीटिंग में विचार विमर्श किया गया था । विचार विमर्श शुरू होते ही संजीव चौधरी ने विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के पक्ष में शॉट पर शॉट लगाना शुरू कर दिया । उक्त मीटिंग में मौजूद सदस्यों के अनुसार, संजीव चौधरी के तेवर दिखा/बता रहे थे जैसे कि वह खुद विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को अनुमति देने के आदेश पर दस्तख़त कर दें । संजीव चौधरी के रवैये ने मीटिंग में मौजूद काउंसिल के दूसरे सदस्यों का पारा गर्म किया, और फिर उन्होंने संजीव चौधरी के तर्कों की धज्जियाँ उड़ाईं । नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने खासी मुखरता के साथ विदेशी फर्मों को देश में अनुमति देने से पैदा होने वाले खतरों को रेखांकित किया । इन सभी का अपने अपने तरीके से कहना रहा कि विदेशी फर्मों के देश में काम करने से देश की फर्मों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा तथा उनके सामने अपनी पहचान व प्रतिष्ठा के साथ काम करना संभव ही नहीं रह जायेगा और उनके सामने विदेशी फर्मों में नौकरी करने का ही विकल्प बचा रह जायेगा । इनका कहना रहा कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के देश में काम करने से सिर्फ देश की चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों पर ही असर नहीं पड़ेगा, बल्कि देश के उद्योग जगत को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी - और इस तरह से विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों का देश में प्रवेश देश की जनता के लिए और देश के लिया आत्मघाती होगा ।
मीटिंग में मौजूद बाकी सदस्यों का रवैया भी विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के विरोध का ही था । एनसी हेगड़े ने जरूर मामले को संतुलित ढंग से विवेचित करने का प्रयास किया और उनकी बातों को सुनते हुए वहाँ मौजूद सदस्यों को कभी कभी ऐसा लगा कि जैसे एनसी हेगड़े विदेशी फर्मों की वकालत कर रहे हैं, लेकिन उनकी वकालत का स्वर काफी नीचा था; और इसलिए उनकी वकालत के बावजूद संजीव चौधरी को कोई मदद और सहारा नहीं मिल पाया । संजीव चौधरी की बातों और उनके तर्कों को 'पीटने' में नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने जिस तरह की तेजी और आक्रामकता दिखाई - उससे मीटिंग में खासी गर्मी पैदा हो गई और विचार-विमर्श के लिए समय कम पड़ गया, लिहाज़ा इस विचार-विमर्श को अगली मीटिंग के लिए स्थगित कर दिया गया । पिछली मीटिंग में हुई बातें बाहर आईं तो काउंसिल सदस्यों पर दबाव बनना शुरू हुआ है, और लोग उनसे सवाल पूछने लगे हैं कि प्रोफेशन को विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को बेच ही दोगे क्या ? संजीव चौधरी के रवैये पर तमाम लोगों को नाराजगी है; लोगों का कहना है कि संजीव चौधरी चुनाव के समय तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के भले के लिए न जाने क्या क्या करने की बातें कर रहे थे, और अब वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के 'प्रतिनिधि' के रूप में ऐसे काम कर रहे हैं - जैसे कि काउंसिल में वह उन्हीं की 'नौकरी' बजाने के लिए आए हैं । काउंसिल के भीतर और बाहर आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच संजीव चौधरी की जैसी फजीहत हुई है और हो रही है, उसे देखते हुए लग रहा है कि काउंसिल की मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों की वकालत उन्हें बहुत भारी पड़ रही है ।
इससे पहले, सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों/उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को उस समय बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी, जब उनके नेतृत्व में बनी कमेटी द्धारा की गईं कुछेक खास सिफारिशें काउंसिल सदस्यों के बीच हुई सीक्रेट वोटिंग में समर्थन पाने में विफल रहीं थीं । उस विफलता, और विफलता के कारण होने वाली फजीहत की चर्चा हालाँकि सिर्फ काउंसिल सदस्यों तक ही सीमित थी । इसलिए विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने के मामले में उनकी जो फजीहत हुई है, उसने उन्हें ज्यादा गंभीर चोट पहुँचाई है । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करने के कारण काउंसिल सदस्यों के साथ-साथ आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी प्रोफेशन व चार्टर्ड एकाउंटेंट्स विरोधी जो छवि बनी है, वह उनके भारी मुसीबतें खड़ी कर सकती हैं । संजीव चौधरी के लिए परेशानी की बात यह है कि काउंसिल में बिग फोर के जो दूसरे सदस्य हैं, उनका भी उन्हें वैसा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है, जैसा कि वह चाहते हैं । एनसी हेगड़े के रवैये का जिक्र इस रिपोर्ट में पहले किया ही जा चुका है; दीनल शाह पिछली मीटिंग में तो नहीं थे, लेकिन उनकी तरफ से संजीव चौधरी को ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं जिनसे वह अगली मीटिंग में उनके सहयोग/समर्थन की उम्मीद कर सकें । दीनल शाह को दरअसल अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति करनी है, और वहाँ अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत करना है - इसलिए उम्मीद की जाती है कि वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वैसी खुल्लमखुल्ला वकालत नहीं करेंगे, जैसी वकालत संजीव चौधरी ने की है और अपनी फजीहत करवाई है ।
काउंसिल में अलग-थलग पड़ जाने तथा आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच हो रही फजीहत को देखते हुए उनके नजदीकियों को भी लग रहा है कि संजीव चौधरी ने इस बार बहुत ही गलत शॉट खेल दिया है । इससे संजीव चौधरी कोई सबक लेंगे या नहीं, और काउंसिल की अगली मीटिंग में वह क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Tuesday, January 12, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव के संदर्भ में चरनजोत सिंह नंदा को लग रहा है कि 'यूज एंड थ्रो' रणनीति के तहत राजेश शर्मा ने उन्हें इस्तेमाल किया, और अब वह उनसे पीछा छुड़ा लेना चाहते हैं

नई दिल्ली । राजेश शर्मा जिस तरह से वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी के समर्थन की बात कर रहे हैं, उसे सुन/देख कर चरनजोत सिंह नंदा खासे भड़के हुए हैं । वह भड़के इसलिए हुए हैं क्योंकि राजेश शर्मा के इस कदम ने वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी राजनीति में चरनजोत सिंह नंदा की भूमिका को पूरी तरह खत्म कर दिया है । उल्लेखनीय है कि राजेश शर्मा को चरनजोत सिंह नंदा के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और इस नाते से वाइस प्रेसीडेंट पद के प्रायः सभी उम्मीदवार राजेश शर्मा के वोट के लिए चरनजोत सिंह नंदा से सिफारिश लगा रहे थे । चरनजोत सिंह नंदा भी राजेश शर्मा के वोट को लेकर अलग अलग लोगों को अलग अलग तरह के आश्वासन दे रहे थे । लेकिन जैसे जैसे भेद खुला कि राजेश शर्मा तो मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं, वैसे वैसे लोगों ने राजेश शर्मा के वोट के लिए चरनजोत सिंह नंदा से बात करना छोड़ दिया है । इससे राजेश शर्मा के जरिए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को एन्जॉय करने का चरनजोत सिंह नंदा का सारा प्लान चौपट हो गया है । चरनजोत सिंह नंदा का अपने नजदीकियों से कहना है कि राजेश शर्मा को चुनाव जितवाने में उन्होंने दिन-रात एक किया है, और उनके खुले व सक्रिय समर्थन के भरोसे ही राजेश शर्मा वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में भूमिका निभाने लायक बने हैं; इसलिए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में अपना रवैया तय करने और 'दिखाने' से पहले राजेश शर्मा को उनसे पूछना/बताना तो चाहिए ही । राजेश शर्मा ने लेकिन उनसे पूछे/बताए बिना वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है, जिससे चरनजोत सिंह नंदा बुरी तरह भड़क गए हैं । 
चरनजोत सिंह नंदा के भड़कने का एक कारण राजेश शर्मा के नजदीकियों का यह प्रचारित करना भी है कि राजेश शर्मा की चुनावी जीत में चरनजोत सिंह नंदा की कोई भूमिका नहीं है, और राजेश शर्मा की जीत वास्तव में राजेश शर्मा तथा उनकी अपनी टीम के सदस्यों की मेहनत का नतीजा है । इस संबंध में उनका तर्क है कि चरनजोत सिंह नंदा जब अपने पार्टनर उमेश वर्मा को रीजनल काउंसिल का चुनाव नहीं जितवा सके हैं, तो सेंट्रल काउंसिल में वह राजेश शर्मा के ही क्या काम आए होंगे ? इस तरह की बातें चरनजोत सिंह नंदा को स्वाभाविक रूप से परेशान करने वाली बातें हैं । चरनजोत सिंह नंदा को लगता है कि इस तरह की बातें राजेश शर्मा की शह पर ही हो रही हैं और वही अपने लोगों को इस तरह की बातें करने के लिए उकसा रहे हैं । राजेश शर्मा के रवैये से चरनजोत सिंह नंदा को अपने ठगे जाने का अहसास हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि 'यूज एंड थ्रो' रणनीति के तहत राजेश शर्मा ने उन्हें इस्तेमाल किया, और काम निकल जाने के बाद अब उनसे पीछा छुड़ा लेना चाहते हैं । 
इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि राजेश शर्मा को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में यदि लंबी पारी खेलनी है, तो उन्हें चरनजोत सिंह नंदा की छाया से बाहर आना ही होगा - लगता है कि राजेश शर्मा ने इसके लिए प्रयास शुरू कर भी दिए हैं । दरअसल राजेश शर्मा को खतरा यह भी है कि बहुत संभव है कि चरनजोत सिंह नंदा इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का अगला चुनाव लड़े, तब फिर अगला चुनाव उन्हें अपने भरोसे ही लड़ना पड़ेगा - लिहाजा उन्होंने अभी से उसके लिए तैयारी शुरू कर दी है । चरनजोत सिंह नंदा हालाँकि पंजाब के विधानसभा चुनाव में भी किस्मत आजमाने के चक्कर में बताए जाते हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि वह अकाली दल और आम आदमी पार्टी में टिकट के लिए संभावनाएँ तलाश रहे हैं, और जिससे भी टिकट मिल गया उससे चुनाव लड़ लेंगे । जीत गए तो फिर इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को राम राम कह देंगे । राजेश शर्मा भी भारतीय जनता पार्टी की तरफ से राज्यसभा में जाने के जुगाड़ में बताए जाते हैं । जब तक उनकी दाल वहाँ नहीं गलती है, तब तक वह इंस्टीट्यूट की राजनीति में शरण लिए रहेंगे । आगे क्या होगा, यह तो आगे पता चलेगा - अभी लेकिन वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव के चक्कर में राजेश शर्मा और चरनजोत सिंह नंदा के संबंधों में दिख रही दरार ने नॉर्दर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प ट्विस्ट दिया है ।

Monday, September 28, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदवारी 'अपने ही घर' में मुसीबतों से घिरी

गाजियाबाद । अमरेश वशिष्ट, जितेंद्र गोयल व ध्रुव अग्रवाल जैसे नॉन सीरियस उम्मीदवारों ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की गाजियाबाद क्षेत्र की चुनावी राजनीति में ऐसा घपड़चौथ मचा दिया है कि मुकेश कुशवाह व विनय मित्तल जैसे सीरियस उम्मीदवारों के लिए अपनी अपनी सीरियसनेस बचाना/दिखाना मुश्किल हो गया है । इंस्टीट्यूट की मौजूदा 22वीं सेंट्रल काउंसिल में गाजियाबाद के दो सदस्य हैं, लेकिन 23वीं काउंसिल में एक भी सीट मिलने का संदेह बन गया है । बात सिर्फ उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की नहीं है, क्योंकि पिछली बार भी इस क्षेत्र में चार उम्मीदवार तो थे ही; इसलिए इस बार पाँच उम्मीदवार हो जाने से कोई खास फर्क पड़ना नहीं चाहिए था - किंतु इस बार के पाँच उम्मीदवारों ने चुनावी गणित कुछ ऐसा बनाया है कि किसी एक का जीतना भी मुश्किल लग रहा है ।
सबसे बड़ी मुश्किल मुकेश कुशवाह के सामने हैं - उन्हें काउंसिल में अपनी सीट बचाने के लिए कठिन जद्दोजहद करना पड़ रही है । पिछली बार मुकेश कुशवाह बहुत मामूली अंतर से जीते थे । इस जीत में उन्हें मनु अग्रवाल की चुनावी नादानियों से बड़ा फायदा मिला था । मनु अग्रवाल लेकिन इस बार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं । मनु अग्रवाल ने पिछली बार जो चुनावी मूर्खताएँ की थीं, इस बार वह उन्हें दोहराने से बचने की कोशिश करते हुए नजर आ रहे हैं; लगता है कि उन्होंने समझ लिया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सॉफ्टवेयर बेचना जितना मुश्किल काम है, चार्टर एकाउंटेंट्स के वोट पाना उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है । मनु अग्रवाल के लिए मुश्किलें हालाँकि कम नहीं हैं, किंतु इस बार चूँकि वह मुश्किलों को पहचानने/समझने तथा उन्हें दूर करने को लेकर तत्पर दिख रहे हैं - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार उनकी नाव पार लग जानी चाहिए । मनु अग्रवाल की नाव के पार लगने की स्थिति में मुकेश कुशवाह की नाव के डूबने का खतरा देखा जा रहा है ।
मुकेश कुशवाह को खतरा मनु अग्रवाल से नहीं है; खतरा तो उन्हें गाजियाबाद क्षेत्र में है । मुकेश कुशवाह के लिए समस्या की बात यह है कि 'अपने घर में' उनके सामने जो खतरा पैदा हो गया है, उससे उनकी स्थिति बिगड़ी - और कानपुर में मनु अग्रवाल की स्थिति सुधरी तो फिर उनके लिए अपनी सीट बचाना मुश्किल हो जायेगा । इसीलिए मुकेश कुशवाह के लिए सेंट्रल काउंसिल के लिए राह आसान नहीं दिख रही है । मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को इस बार सबसे बड़ी 'मार' यह पड़ेगी कि पिछली बार गाजियाबाद क्षेत्र में उन्हें अनुज गोयल विरोधी जो वोट मिले थे, उन वोटों को इस बार उन्हें विनय मित्तल के साथ बाँटना पड़ेगा । अनुज गोयल ने अपने भाई जितेंद्र गोयल को उम्मीदवार बना कर अपने वोटों को बँटने से रोकने की जो व्यवस्था की है, दरअसल उसके कारण मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल का मामला फँस गया है । यूँ तो हर कोई यह मान रहा है कि जितेंद्र गोयल एक कठपुतली उम्मीदवार हैं, और अनुज गोयल 'भाई साहब का ख्याल रखना' कहते हुए लोगों के चाहें जितना हाथ जोड़ लें, वह 'भाई साहब' को चुनाव जितवा तो नहीं पायेंगे; लेकिन 'भाई साहब' की उम्मीदवारी अनुज गोयल के पक्के वाले वोटों को अपने पास/साथ बाँधे रखने में कामयाब हो सकती है । इससे जो हालात बने हैं, उसमें मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदें ध्वस्त होती नजर आ रही हैं । अनुज गोयल के उम्मीदवार न होने में विनय मित्तल ने फायदा उठाने की जो योजना बनाई थी, वह योजना तो फेल हुई ही; उनकी योजना के चक्कर में मुकेश कुशवाह को बैठे-बिठाए मुसीबत और मिल गई । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी से मुकेश कुशवाह को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के साथ साथ लेकिन विनय मित्तल की उम्मीदवारी आने से अनुज गोयल विरोधी वोटों का बँटवारा होने की जो स्थिति बनी है, उसमें मुकेश कुशवाह घिरते हुए नजर आ रहे हैं ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिए अनुज गोयल ने जो चाल चली है, उससे विनय मित्तल को खासा धोखा मिला है । विनय मित्तल ने अनुज गोयल की खाली होने वाली सीट पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से बहुत पहले से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी थी । उनके समर्थकों में से ही कईयों का मानना और कहना हालाँकि यह था कि उन्हें अभी एक टर्म और रीजनल काउंसिल में रहना चाहिए और यहाँ चेयरमैन बनना चाहिए तथा अपने अनुभव व अपने समर्थन-आधार में इजाफा करना चाहिए - फिर उसके बाद उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए आना चाहिए । विनय मित्तल को किंतु लगा कि अनुज गोयल की खाली हो रही सीट के कारण जो मौका बन रहा है, उससे अच्छा मौका उन्हें फिर नहीं मिलेगा; लिहाजा उन्होंने अपने ही समर्थकों की एक न सुनी और सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बन गए । विनय मित्तल ने जो सोचा, वह गलत नहीं था - उनकी जगह कोई भी होता, संभवतः ऐसा ही सोचता और करता । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी न होती, तो मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए इंस्टीट्यूट की 23वीं काउंसिल में अपनी अपनी जगह बनाना कोई मुश्किल भी नहीं होता । विनय मित्तल के नजदीकियों के अनुसार, विनय मित्तल लेकिन अब पछता रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि वह न तो इधर के रहे, और न उधर के रहे । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते विनय मित्तल की योजना तो पिटी ही, विनय मित्तल की उम्मीदवारी ने मुकेश कुशवाह के लिए भी आफत खड़ी कर दी है । 
मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल जैसे-तैसे करके जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के कारण पैदा हुई समस्या से निपट भी लेते; लेकिन अमरेश वशिष्ट व ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने उनके लिए वह रास्ता भी बंद कर दिया लगता है । अमरेश वशिष्ट का मामला तो खासा दिलचस्प है - पिछले दोनों चुनावों में वह अंगद के पाँव की तरह दसवें नंबर पर ही पैर जमाए मिले थे । अमरेश वशिष्ट पिछली बार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खासे गंभीर थे, किंतु वोटर उनकी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नहीं हो सके । वोटरों की इस बेवफाई से अमरेश वशिष्ट इतने निराश और नाराज हुए कि उन्होंने चुनावी नतीजा आते ही सार्वजनिक रूप से आगे कभी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया । लेकिन जैसे ही इस बार के चुनाव नजदीक आए, उनके चुनावी कीड़े कुलबुलाये और वह तीसरी बार फिर उम्मीदवार हो गए । लोगों का कहना है कि जो व्यक्ति अपनी ही घोषणा पर न टिका रह पाता हो, उसकी उम्मीदवारी के साथ भला कौन टिकना चाहेगा ? जाहिर है कि अमरेश वशिष्ट के लिए दिल्ली बहुत बहुत दूर है; उनकी उम्मीदवारी को लेकिन जो वोट मिलेंगे, वह मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए दिल्ली को दूर करने का काम तो करेंगे ही । ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने कभी उनके नजदीकी रहे लोगों को ही हैरान किया है । वर्ष 2009 के चुनाव में वह जिस बुरी तरह से हारे थे, उसके कारण वह वर्ष 2012 में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की हिम्मत तक नहीं कर पाए थे । इस बार उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई आहट या अफवाह तक नहीं थी । पर अब जब उनकी उम्मीदवारी एक सच है, तो माना/समझा यही जा रहा है कि उनकी उम्मीदवारी का तो कुछ नहीं होना है, वह लेकिन मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की संभावनाओं को अवश्य ही नुकसान पहुँचायेंगे । 
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के संदर्भ में गाजियाबाद क्षेत्र में जितेंद्र गोयल, अमरेश वशिष्ट और ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन इनकी उम्मीदवारी ने अपनी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेने वाले मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के सामने खासा गंभीर संकट जरूर खड़ा कर दिया है । 

Sunday, May 10, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने मनु अग्रवाल ने लगता है कि पिछली बार की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है; और इसीलिए उनके शुभचिंतकों को भी डर हुआ है कि पिछली बार की तरह कहीं इस बार भी हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल न जाए

कानपुर । मनु अग्रवाल ने अपने खुद के रवैये से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को मजाक का विषय बना दिया है, और अपने लिए विरोध व मुसीबत का माहौल बना लिया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए सेंट्रल रीजन में पिछली बार मामूली अंतर से जीतने से रह गए मनु अग्रवाल अगली बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की घोषणा लगातार करते रहे थे और थोड़ी बहुत जितनी संभव थी उतनी सक्रियता भी बनाए हुए थे । किंतु अभी चार-पाँच महीने पहले उन्होंने अचानक से ऐलान कर दिया कि वह चुनाव में चक्कर में नहीं पड़ेंगे और अपने कामधाम में ध्यान देंगे । लोगों को उन्होंने खुद ही बताया कि उन्हें एक बड़ा बिजनेस मिल रहा है, जिसमें उन्हें खूब कमाई होगी - इसलिए वह अपना समय और अपनी एनर्जी उसमें लगायेंगे । चुनाव, चुनावी राजनीति, चुने गए सदस्यों के क्रियाकलापों को लेकर उन्होंने बहुत ही नकारात्मक तथा आपत्तिजनक किस्म की बातें कहीं; जिनका लब्बोलुबाब यह था कि चुनाव-फुनाव क्या होता है, चुने जाने के बाद सदस्य अपना घर भरने में ही लगे रहते हैं, मुझे अपना घर भरने का जब दूसरा मौका मिल रहा है तो मैं चुनाव के चक्कर में क्यों पडूँ ? आदि-इत्यादि । उनकी इस तरह की बातें चल ही रही थीं कि लोगों ने देखा/पाया कि उन्होंने अचानक से फिर पलटा खाया और वह दोबारा से अपनी उम्मीदवारी की बात करने लगे । उन्होंने तो नहीं बताया कि जिस बड़े बिजनेस के लिए उन्होंने पहले अपनी उम्मीदवारी को छोड़ने की घोषणा कर दी थी, उसके लिए समय और एनर्जी कैसे निकालेंगे; लेकिन उनके नजदीकियों ने बताया कि जिस बड़े बिजनेस के चक्कर में उन्होंने चुनाव से हटने की घोषणा की थी, वह बड़ा बिजनेस उन्हें मिला ही नहीं, और इसलिए वह वापस चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए । इस कारण से मनु अग्रवाल को लोगों के इस सवाल का सामना अक्सर करना पड़ जाता है कि अब यदि उन्हें फिर से ज्यादा कमाई करने के लिए चुनाव लड़ने के अलावा कोई और बिजनेस मिल गया, तो क्या वह फिर से अपनी उम्मीदवारी छोड़ देंगे ? मनु अग्रवाल समझते हैं कि यह सवाल उन्हें चिढ़ाने के लिए पूछा जाता है, इसलिए इस सवाल को वह अलग अलग तरीकों से दाएँ-बाएँ कर देते हैं । 
मनु अग्रवाल का दावा है कि अपने धुर विरोधियों अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को उन्होंने अपनी उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए राजी कर लिया है; और 'हम तीनों' ने तय किया है कि अब की बार कानपुर से मैं अकेला ही उम्मीदवार बनूँ, ताकि कानपुर से सीट को पक्का किया जा सके । मनु अग्रवाल के इस दावे ने कानपुर में कई लोगों को भड़काया और उन्होंने कहना शुरू किया कि कानपुर में क्या हो, इसे 'तुम तीनों' ही क्यों तय करोगे ? मामला बढ़ा तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा को सफाई देने सामने आना पड़ा और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो बस इतना कहा है कि वह उम्मीदवार नहीं हो रहे हैं; कौन उम्मीदवार हो या न हो, इसे वह भला कैसे तय कर सकते हैं; और जहाँ तक इसकी बात है कि वह किसका समर्थन करेंगे, तो इसका फैसला वह तब करेंगे जब सारा सीन क्लियर हो जायेगा । मजे की बात यह है कि मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने से पहले जब उम्मीदवार होने की बात कर रहे थे, तब तो अक्षय गुप्ता और राजीव मेहरोत्रा भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बातें कर रहे थे; लेकिन जब मनु अग्रवाल बिजनेस के चक्कर में पीछे हटे, तो इन्होंने भी अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात करना बंद कर दिया । इससे समझा यह जा रहा है कि इन्हें उम्मीदवार होना कभी नहीं था, यह तो बस मनु अग्रवाल का काम बिगाड़ने के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । हाँ-न-हाँ का जो तमाशा मनु अग्रवाल ने दिखाया, वैसा तमाशा चूँकि यह दोनों नहीं कर सकते हैं - इसलिए मनु अग्रवाल अपने आप को निश्चिंत और अकेला मान रहे हैं । मनु अग्रवाल मान रहे हैं और कह रहे कि इन दोनों के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं होगा; इनके समर्थन से विवेक खन्ना के उम्मीदवार हो सकने की संभावना को भी मनु अग्रवाल यह कहते/बताते हुए खारिज कर रहे हैं कि विवेक खन्ना अपनी पारिवारिक मुश्किलों में बुरी तरह उलझे हुए हैं, इसलिए वह चाहते हुए भी उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे - और इस तरह कानपुर का मैदान उनके लिए पूरी तरह खाली है । 
यह सच लग भी रहा है कि कानपुर में मनु अग्रवाल को चुनावी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है - किंतु इससे उनकी राह आसान नहीं हो गई है । कानपुर की और इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति की बारीकियों को जानने/समझने वाले लोगों का कहना है कि मनु अग्रवाल दरअसल कुछेक गलतफहमियों के शिकार हैं और स्थितियों को तथ्यपरक रूप से नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के नजरिये से देख रहे हैं । मनु अग्रवाल को सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि पिछली बार उन्हें जो थोड़े से वोट कम पड़ गए थे, उनकी भरपाई तो वह आराम से कर लेंगे और इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है । कानपुर में किसी और उम्मीदवार के न होने से उनका काम और आसान हो गया है । लोगों का कहना/पूछना लेकिन यह है कि चुनावी समीकरण यदि इतने ही सीधे होते तो पिछली बार रवि होलानी क्यों हारते ? दरअसल हर बार चुनाव का एक नया गणित होता है, और एक नई केमिस्ट्री होती है - इसे समझने/पहचानने की कोशिश जो नहीं करता है, वह औंधे मुँह ही गिरता है । कानपुर में कई लोगों का कहना है कि पिछली बार मनु अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को यदि थोड़ा गंभीरता से लिया होता, तो वह सेंट्रल काउंसिल में होते । पिछली बार उन्हें मुकेश कुशवाह ने नहीं हराया था, उनकी खुद की मूर्खताओं व लापरवाहियों ने उन्हें हराया था । कानपुर में लोगों को लग रहा है कि पिछली बार की गलतियों से उन्होंने लगता नहीं है कि कोई सबक सीखा है । 
मनु अग्रवाल ने पिछले तीन-चार महीनों में जिस तरह की हरकतें/बातें की हैं, उससे उन्होंने अपनी स्थिति को कमजोर ही किया है । उनकी कमजोरी का पूरा पूरा फायदा अविचल कपूर ने उठाया है । कानपुर में एक बड़ा तबका मनु अग्रवाल के खिलाफ है - सच होते हुए भी यह कोई खास बात नहीं है । हर जगह दो खेमे होते ही हैं । समस्या तब बड़ी हो जाती है जब आप खिलाफ लोगों के साथ होशियारी से डील करने का प्रयास नहीं करते हैं । कानपुर में मनु अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि कानपुर के मठाधीशों को डर यह है कि मनु अग्रवाल यदि जीत गए तो उनकी मठधीशी ही खत्म हो जायेगी; अपनी मठधीशी बचाने के लिए उन्हें यह जरूरी लग रहा है कि वह मनु अग्रवाल को जीतने से रोकें । यही मठाधीश अविचल कपूर का समर्थन करते हुए सुने जा रहे हैं । कानपुर में अकेले उम्मीदवार होने के नाते मनु अग्रवाल के लिए भावनात्मक अपील बनाना हालाँकि संभव है और मनु अग्रवाल इसके लिए प्रयास भी करते देखे गए हैं; किंतु उनके प्रयास प्रायः इतने फूहड़ और नकारात्मक साबित हुए हैं कि उनसे बात बनने की बजाये बिगड़ और गई है । मनु अग्रवाल के शुभचिंतकों का भी मनना और कहना है कि वैसे तो मनु अग्रवाल के लिए अब की बार अच्छा मौका है, लेकिन यदि उन्होंने हालात को समझदारी से हैंडल नहीं किया तो पिछली बार की तरह हाथ में आता आता मौका फिसल कर निकल भी सकता है । 

Friday, March 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन में जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने तथा विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोकने की व्यवस्था की है क्या ?

गाजियाबाद । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे विनय मित्तल के लिए कड़ी चुनौती पैदा कर दी है । विनय मित्तल फिलहाल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, जहाँ उनका इस वर्ष पहला टर्म पूरा हो रहा है । अगले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की चर्चा तो लगातार थी, लेकिन पिछले दिनों इस चर्चा पर कुछ समय के लिए ब्रेक तब लगा जब सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए लगातार तीन की बजाये चार टर्म तक सदस्य बने रहने का कानून बनने/बनाने की कोशिशों की बात पता चली । उक्त कोशिशें यदि सफल होतीं, तो अनुज गोयल एक बार फिर सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनते - और इसी आशंका में विनय मित्तल ने कहना/बताना शुरू कर दिया था कि तब वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । अभी हाल तक विनय मित्तल लोगों से यही कहते रहे थे कि यदि अनुज गोयल के लिए उम्मीदवार बनने की स्थितियाँ बनीं, तो फिर वह सेंट्रल काउंसिल की बजाये रीजनल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । किंतु जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि लगातार तीन टर्म वाले कानून में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, और वर्ष 2015 के चुनाव में अनुज गोयल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे; वैसे ही विनय मित्तल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करना पुनः शुरू कर दिया ।
सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के संदर्भ में विनय मित्तल की समझ यही रही कि उनके लिए कोई भी मौका अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही बन सकता है । अगले चुनाव में अनुज गोयल के उम्मीदवार न बन सकने की बात चूँकि पहले से ही लगभग स्पष्ट थी, इसलिए विनय मित्तल लगातार अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । इस बात में पिछले दिनों हालाँकि छोटा-सा ब्रेक आया, लेकिन फिर जल्दी ही सेंट्रल काउंसिल के लिए विनय मित्तल की उम्मीदवारी की बात दोबारा से पटरी पर आ गई । किंतु जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने विनय मित्तल के लिए समस्या खड़ी कर दी है । जितेंद्र गोयल, अनुज गोयल के भाई हैं और जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी को अनुज गोयल द्धारा अपनी सीट को बचाये/बनाये रखने की एक कसरत के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल दरअसल विनय मित्तल की जीत  की संभावना को रोकना चाहते हैं । अनुज गोयल को डर यह है कि उनकी खाली हुई सीट पर यदि विनय मित्तल काबिज हो गए तो फिर इंस्टीट्यूट की उनकी राजनीति तो पूरी तरह चौपट ही हो जाएगी । अनुज गोयल को विश्वास है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये वह विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोक लेंगे; और इस तरह से अगली से अगली बार - यानि वर्ष 2018 के लिए अपने लिए मौका बनाये रख सकेंगे ।
विनय मित्तल के शुभचिंतक तथा दूसरे लोग भी यह दावा तो कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल के लिए संभव नहीं होगा; लेकिन वह अनुज गोयल के नजदीकियों की इस बात पर गौर नहीं कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल का उद्देश्य है भी नहीं । चुनावी राजनीति के लिए जिस तरह के लटकों-झटकों की जरूरत होती है, उसमें जितेंद्र गोयल का हाथ खासा तंग रहता है और इसीलिए वह चुनावी राजनीति से हमेशा दूर ही रहे हैं । नजदीकियों के अनुसार, जितेंद्र गोयल भी जानते हैं और अनुज गोयल भी समझते हैं कि जितेंद्र गोयल के बस की चुनाव जीतना नहीं है; जितेंद्र गोयल जीतने के लिए उम्मीदवार बने भी नहीं है - वह तो बस अनुज गोयल के वोटों की चौकीदारी करने के लिए उम्मीदवार बने हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की है, ताकि विनय मित्तल उन्हें न ले लें । अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी लाने के बारे में सोचा था, तो इसके पीछे भी यही कारण था कि खुद विनय मित्तल को भी लगता है कि वह अनुज गोयल के वोटों के सहारे ही सेंट्रल काउंसिल में पहुँच सकते हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने विनय मित्तल के इसी सहारे को छीनने का जुगाड़ बैठाया है ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने मुकेश कुशवाह को भी लपेटे में लेने का दाँव चला है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह पिछली बार बहुत ही मामूली अंतर से जीते थे । मामूली अंतर से मिली जीत में भी गाजियाबाद तथा आसपास के क्षेत्रों में अनुज विरोधी वोटों का बड़ा सहयोग था । पिछली बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह को मिले थे; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते अबकी बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के बीच बंटेंगे तो नुकसान मुकेश कुशवाह को ही होगा । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में मुकेश कुशवाह ने ऐसा कुछ किया भी नहीं है, जिससे उनके समर्थन-आधार को बढ़ा हुआ माना/देखा जाये । मुकेश कुशवाह को रवींद्र होलानी के रूप में देखा जा रहा है, जिनकी उम्मीदवारी सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के बावजूद पिछली बार वीरगति को प्राप्त हुई थी । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने जो जाल बिछाया है, उसमें हो सकता है कि गाजियाबाद के तीनों ही उम्मीदवार ढेर हो जाएँ - जैसा कि पिछली बार कानपुर में हुआ था; तो यह स्थिति अनुज गोयल को सूट करती है । वर्ष 2018 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए अनुज गोयल ने 2015 के चुनाव की जो फील्डिंग सजाई है, उसने विनय मित्तल के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती खड़ी की है क्योंकि विनय मित्तल इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को मुकेश कुशवाह के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से लेते दिखे हैं और लंबी पारी खेलने की तैयारी किये बैठे हैं ।

Friday, November 30, 2012

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।