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Sunday, February 17, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद पर अतुल गुप्ता को बैठाने के लिए हुई राजनीति के चलते एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के सामने पैदा हुई मुसीबत ने वेस्टर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर होने वाली होड़ को दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली/मुंबई । अतुल गुप्ता को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने के लिए चुनाव से पहले के करीब दस घंटों में जो राजनीतिक उठापटक हुई, उसने अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए ताल ठोंक रहे एनसी हेगड़े तथा जय छैरा की तैयारियों को तगड़ा झटका दिया है । मजे की बात यह है कि इस वर्ष के चुनावी नतीजे के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ की 'रणनीति' की तारीफ की जा रही है, और उसे श्रेय दिया जा रहा है; लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ की यह कामयाबी ही - प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थन के भरोसे अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी कर रहे एनसी हेगड़े के लिए मुसीबत बन गई है । दूसरी तरफ, पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के नजदीक तो क्या - दूर से भी तार जोड़े रहे उम्मीदवारों का जो बुरा हाल हुआ, उससे जय छैरा को अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए की जा रही अपनी तैयारी पर मिट्टी पड़ती दिख रही है । दरअसल इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उत्तम अग्रवाल समर्थित उम्मीदवारों को सफलता के आसपास भी न फटकने देने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ ने जो मोर्चा खोला, उसने कामयाबी तो प्राप्त कर ली, लेकिन उसके कारण उनके अपने 'ग्रुप' में संदेह और अविश्वास का जो महौल बना है, उसने अगले वर्ष के चुनावी समीकरणों को अनिश्चय में डाल दिया है । इस वर्ष हुए चुनाव में केमिशा सोनी तथा एमपी विजय कुमार को चुनाव से ठीक पहले 'अपने' ही लोगों से जो झटका लगा, उसके कारण यह दोनों अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं । इसी बात ने सत्ता खेमे में आपसी विश्वास को झटका दिया है, और इस झटके के चलते ही इंस्टीट्यूट की राजनीति के सत्ता खेमे में नए समीकरण बनने की संभावना बनी है - और इस संभावना में ही अलग अलग कारणों से एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के लिए मुसीबत के संकेत प्रकट हैं । 
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उम्मीदवार तो कई थे; लेकिन मुख्य प्रतिस्पर्धा में अतुल गुप्ता, केमिशा सोनी व अब्राहम बाबु के नाम थे । अब्राहम बाबु को उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जाने का खामियाजा भुगतना पड़ा, और चुनाव से दो/एक दिन पहले ही वह पिछड़ते हुए लगने लगे । अब्राहम बाबु के पिछड़ने से एमपी विजय कुमार के लिए मौका बना । इस वर्ष के चुनाव में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि काउंसिल सदस्यों के बीच उत्तम अग्रवाल को लेकर भारी विरोध का भाव रहा, जिस कारण हर उम्मीदवार जोरशोर से यह दावे करने को मजबूर हो रहा था कि उसका उत्तम अग्रवाल के साथ कोई लेना देना नहीं है । वास्तव में यही बात एमपी विजय कुमार के लिए घातक बनी । उत्तम अग्रवाल ने अपने सभी उम्मीदवारों की दुर्दशा देखी, तो उनकी तरफ से एमपी विजय कुमार को समर्थन देने की कार्रवाई हुई । एमपी विजय कुमार मौके की नजाकत को भाँप नहीं सके, और उत्तम अग्रवाल के साथ आने से पैदा होने वाले खतरे का आभास नहीं कर सके । दूसरी तरफ, उत्तम अग्रवाल की इस चाल को फेल करने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ के नेतृत्व में सत्ता खेमे ने अपनी तैयारी की, और अतुल गुप्ता पर ध्यान केंद्रित किया । चुनाव से पहले के करीब दस घंटों में जो राजनीतिक उठापटक चली और जिसमें प्रफुल्ल छाजेड़ तथा पूर्व प्रेसीडेंट्स नीलेश विकमसे व सुबोध अग्रवाल ने अपने अपने स्तर पर मोर्चा संभाला - उसमें केमिशा सोनी को इंस्टीट्यूट की प्रेसीडेंट पद की चुनावी राजनीति पर हावी रहने वाली पुरुषवादी सोच का शिकार बनना पड़ा और उनके व अतुल गुप्ता के बीच चलने वाली प्रतिस्पर्धा में पलड़ा अतुल गुप्ता की तरफ पूरी तरह झुक गया । केमिशा सोनी को तगड़ा झटका पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की तरफ से लगा; अमरजीत चोपड़ा शुरू से केमिशा सोनी की उम्मीदवारी के पक्ष में थे - लेकिन ऐन मौके पर वह अतुल गुप्ता की तरफदारी में जुट गए । अमरजीत चोपड़ा की पाला बदलने की इस कार्रवाई के पीछे पूर्व प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को देखा/पहचाना गया । 
चुनाव से ठीक पहले इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े महारथियों के अतुल गुप्ता के पक्ष में जुटने के पीछे दरअसल उत्तम अग्रवाल की राजनीति को पूरी तरह से फेल करने की कोशिश थी । यह कोशिश तो सफल रही, लेकिन इस कोशिश के चलते एमपी विजय कुमार और केमिशा सोनी को जो झटका लगा, उसने सत्ता खेमे में परस्पर अविश्वास की बीज बो दिए हैं । इन दोनों को लगा है कि इन्हें इनके अपने लोगों ने ही धोखा दिया है । मजे की बात यह रही कि पिछली काउंसिल में मधुकर हिरगंगे ने अतुल गुप्ता की 'प्रोफेशनल बेईमानियों' को लेकर जो मुहिम चलाई हुई थी, उसे सभी प्रमुख लोगों का समर्थन प्राप्त था, और जिसके चलते इंस्टीट्यूट की इनडायरेक्ट टैक्सेस कमेटी पर कब्जे की अतुल गुप्ता की कोशिशें सफल नहीं हो सकीं थीं - लेकिन वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में अचानक से सभी लोग अतुल गुप्ता के समर्थक बन गए । इस बात ने वाइस प्रेसीडेंट पद की राजनीति में केमिशा सोनी के लिए चुनौती बढ़ा दी है । इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उत्तम अग्रवाल की जो राजनीतिक फजीहत हुई है, उसका श्रेय भले ही प्रफुल्ल छाजेड़ की रणनीति को दिया जा रहा है; लेकिन रणनीतिक सफलता के बाद सत्ता खेमे में परस्पर अविश्वास का जो माहौल बना है, उसमें प्रफुल्ल छाजेड़ को राजनीतिक नुकसान होने का खतरा भी छिपा है । यह खतरा एनसी हेगड़े की अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी को झटका देता है । एनसी हेगड़े दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी में हैं; ऐसे में प्रफुल्ल छाजेड़ का नुकसान वास्तव में एनसी हेगड़े का ही नुकसान होगा । इस वर्ष जो हुआ, उसने जय छैरा के लिए भी मुसीबत खड़ी की है । जय छैरा को उत्तम अग्रवाल के 'कवरिंग' उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । जय छैरा ने अपनी तरफ से होशियारीभरी चाल तो काफी दिखाई हुई है - जिसके तहत एक तरफ उन्होंने उत्तम अग्रवाल से भी तार जोड़े हुए हैं, और दूसरी तरफ वह उत्तम अग्रवाल के विरोधियों के साथ भी 'खड़े' रहने की कोशिश करते रहते हैं; लेकिन इस बार जो हुआ, उससे एक बात साफ हो गई है कि इस तरह की चालबाजी अब काम नहीं आएगी । वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के सामने पैदा हुई नई मुसीबतों ने वेस्टर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर होने वाली होड़ को दिलचस्प बना दिया है ।

Saturday, October 27, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वेस्टर्न रीजन में राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी में पैदा हुआ करंट अनिल भंडारी की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी की तैयारी को शिकार बना सकता है क्या ?

मुंबई । दुर्गेश काबरा को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुँचाने के लिए आनंद राठी, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे द्वारा कमर कस लिए जाने से वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में बदलाव का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें अनिल भंडारी के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाना तो चुनौतीपूर्ण हो ही गया है, साथ ही राजकुमार अदुकिया के लिए सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी और पुरुषोत्तम खंडेलवाल की राह भी मुश्किल हुई है । मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व प्रेसीडेंट आनंद राठी की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भी खासी धाक है । 1985 से 1992 तक के दो टर्म में सेंट्रल काउंसिल में रहे आनंद राठी ने अपना चुनाव खूब धूम-धड़ाके से लड़ा था; उसके बाद फिर उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत विकमसे परिवार को सौंप दी थी, जहाँ से एसके विकमसे, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे बारी बारी से सेंट्रल काउंसिल में गए; कमलेश विकमसे और  नीलेश विकमसे तो इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट भी बने । एक समय आनंद राठी को मुंबई में 'जोधपुर क्लब' के नाम से भी पहचाना जाता था; (कुमारमंगलम) बिड़ला ग्रुप से नजदीकियों के चलते आनंद राठी का एक अन्य रुतबा भी रहा है । माहेश्वरी समाज में आनंद राठी का विशेष प्रभाव बना, और माहेश्वरी समाज में उन्हें एक 'संस्थान' के रूप में पहचान व मान्यता मिली । विकमसे परिवार के जुड़ने से उनका प्रभाव क्षेत्र और बड़ा हुआ, तथा वेस्टर्न रीजन में 'राठी विकमसे ग्रुप' की एक अनोखी ताकत बनी । यही ताकत अचानक से दुर्गेश काबरा का संबल बन गई दिख रही है । दरअसल राठी विकमसे ग्रुप के तीनों बड़े नेताओं ने जिस अप्रत्याशित तरीके से दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाया है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी गणित में खासी उथल-पुथल मचा दी है - और दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी दूसरे कुछेक उम्मीदवारों के लिए खतरे की घंटी बजाने लगी है ।
मजे की बात है कि अभी दो महीने पहले तक दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । दुर्गेश काबरा पिछले दो बार से लगातार चुनाव हार रहे हैं । पिछली बार उनका प्रदर्शन हालाँकि अच्छा रहा था, लेकिन दूसरी वरीयता के वोटों का सहयोग/समर्थन न मिल पाने के कारण वह नाकामयाबी का शिकार हो गए थे । उनकी नाकामयाबी जिस तरह से अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल की किस्मत का ताला खोलने वाली चाभी बनी थी, उसे देखते/समझते हुए चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले लोगों ने दुर्गेश काबरा के राजनीतिक जीवन को समाप्त हुआ मान लिया था । इसी कारण से, इस बार जब दुर्गेश काबरा को तीसरी बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए सक्रिय देखा गया, तो किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया । लोगों का मानना/कहना रहा कि दुर्गेश काबरा जितने जो प्रयास कर सकते थे, वह सब उन्होंने कर लिए हैं - और उन सब प्रयासों के बावजूद चूँकि वह कामयाब नहीं हुए हैं, इसलिए अब उनके लिए कहीं कोई उम्मीद नहीं बची है । लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार चमत्कार घटते - और उन चमत्कारों के चलते बड़े उलट-फेर होते हुए देखे गए हैं, इसलिए दुर्गेश काबरा को राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन ने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में भी एकदम से उलट-फेर कर दिया है - और कहीं मुकाबले में न देखे/पहचाने जा रहे दुर्गेश काबरा अचानक से बड़े महत्त्वपूर्ण उम्मीदवार बन गए हैं । उनकी उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण होने से अनिल भंडारी की सदस्यता पर खतरा मंडराता देखा जा रहा है । पिछली बार अनिल भंडारी और दुर्गेश काबरा को मिले वोटों में ज्यादा अंतर नहीं था, और दोनों ही माहेश्वरी वोटों पर निर्भर रहे थे और इस बार भी हैं; इसी बिना पर माना/समझा जा रहा है कि राठी विकमसे ग्रुप के समर्थन के चलते दुर्गेश काबरा के वोटों में यदि ठीक-ठाक इजाफा हो गया, तो अनिल भंडारी के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में अपनी मौजूदा सीट को बचाना मुश्किल हो जायेगा ।
दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण हो उठने से राजकुमार अदुकिया और पुरुषोत्तम खंडेलवाल के लिए भी अलग अलग कारणों से मुसीबत पैदा हो गई है । राजकुमार अदुकिया एक दशक से अधिक समय तक सेंट्रल काउंसिल में रहने के कारण नियमों के चलते पिछले टर्म में बाहर रहने के लिए 'मजबूर' किए जाने के बाद इस बार फिर से उम्मीदवार हो गए हैं, जिस कारण लोग उनके खिलाफ हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि सेंट्रल काउंसिल में आखिर ऐसे कौन से लड्डू मिलते हैं, जिनके लालच में राजकुमार अदुकिया से सेंट्रल काउंसिल से मोह ही नहीं छूट रहा है । राजकुमार अदुकिया को यह आभास था कि उनके ऊपर सत्ता-लोलुपता का आरोप लगेगा और उनके समर्थक रहे लोग उनके विरोध में हो जायेंगे; लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि नीलेश विकमसे द्वारा खाली की गई सीट उनके लिए फायदे का सबब बन जाएगी । किंतु राठी विकमसे ग्रुप द्वारा दुर्गेश काबरा को समर्थन देने के कारण उनकी उम्मीद को झटका लग सकता है । अहमदाबाद के पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मुंबई के उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो राजस्थान के हैं - क्योंकि वह खुद राजस्थान के हैं; लेकिन आनंद राठी के कारण राजस्थान से मुंबई आए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट यदि सचमुच दुर्गेश काबरा को पड़ गए, तो पुरुषोत्तम खंडेलवाल का राजस्थान-समीकरण गड़बड़ा सकता है ।
राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा और उनके नजदीकियों में हवा तो भरी है, लेकिन दुर्गेश काबरा के ही कुछेक समर्थकों का मानना/कहना यह भी है कि सिर्फ समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा की जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन को वोट में बदलने के लिए दुर्गेश काबरा जरूरी मैकेनिज्म को बना पाते हैं या नहीं । दुर्गेश काबरा के ही समर्थकों का कहना/बताना है कि राठी विकमसे ग्रुप ने फैमिली से बाहर के उम्मीदवार के रूप में आरएल काबरा को दो बार समर्थन दिया था, लेकिन आरएल काबरा को दोनों ही बार हार का सामना करना पड़ा था । इसके अलावा एक मजेदार संयोग यह है कि लगातार दो बार हार का सामना करने के बाद तरुण घिया को छोड़ कर और किसी उम्मीदवार के सफल होने का  उदाहरण नहीं है । इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद भी दुर्गेश काबरा सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता पाने की अपनी हसरत को पूरा कर पाते हैं, या एक बार फिर बदकिस्मती का शिकार बनते हैं ?

Wednesday, February 14, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत का चेयरमैन बनवाने की राजेश शर्मा की हरकत को विजय गुप्ता का भी समर्थन सचमुच मिलेगा क्या ?

नई दिल्ली । विज्ञान भवन में आयोजित हुए इंस्टीट्यूट के 68वें वार्षिक समारोह के अवसर पर निवर्तमान प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को तीन केंद्रीय मंत्रियों के सामने पिछले 'सीए डे' फंक्शन की बदइंतजामी को लेकर जो लताड़ सुनने को मिली, उसने सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की करतूतों की याद एक बार फिर ताजा करा दी - और इस याद ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव को लेकर राजेश शर्मा द्वारा बनाए जा रहे समीकरण को गड़बड़ा देने की आशंका पैदा कर दी है । यह आशंका वास्तव में सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे सदस्य विजय गुप्ता को लेकर उठी है । लोगों को लग रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन में की गईं राजेश शर्मा की करतूतों की यादें जिस तरह से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अभी भी पीड़ा पहुँचा रही हैं, उसे देखते हुए विजय गुप्ता अपना नाम किसी भी रूप में राजेश शर्मा के साथ जोड़ने को तैयार शायद न हों । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन को लेकर राजेश शर्मा लेकिन जो समीकरण बनाते सुने जा रहे हैं, उसमें उन्होंने विजय गुप्ता को शामिल किया हुआ है । हालाँकि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि राजेश शर्मा ने अपने समीकरण में शामिल करने के लिए विजय गुप्ता की सहमति ले ली है, या उन्हें फँसाने के लिए वह उनका नाम अपने मन से ले रहे हैं । राजेश शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि राजेश शर्मा यदि अपने किसी खेल में विजय गुप्ता के भी शामिल होने की बात कर रहे हैं, तो इसके लिए उन्होंने अवश्य ही विजय गुप्ता से सहमति ले ली होगी; लेकिन विजय गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि प्रोफेशन के लोगों के बीच राजेश शर्मा की भारी बदनामी को देखते हुए विजय गुप्ता चुनावी वर्ष में राजेश शर्मा के साथ किसी भी रूप में खड़े नहीं दिखना चाहेंगे - उनके किसी खेल में शामिल होना तो बहुत दूर की बात है । 
68वें वार्षिक समारोह में राजेश शर्मा की कारस्तानियों के कारण भरी सभा में नीलेश विकमसे की जो फजीहत हुई, उसने विजय गुप्ता को और भी सावधान कर दिया है । उनकी यह सावधानी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव को लेकर राजेश शर्मा द्वारा तैयार की गई रणनीति को गड़बड़ा रही है । राजेश शर्मा ने पंकज पेरिवाल को अल्पमत के बावजूद चेयरमैन बनवाने की जो रणनीति तैयार की है, उसमें विजय गुप्ता की अहम् भूमिका है । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 13 सदस्यों में राजेश शर्मा के उम्मीदवार के रूप में पंकज पेरिवाल को कुल 6 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है । तरह तरह की हरकतों व दबावों से राजेश शर्मा ने बाकी सदस्यों में से किसी एक का समर्थन जुटाने का प्रयास तो बहुत किया है, लेकिन उनकी बदनामी को देखते हुए उनका प्रयास सफल नहीं हो सका है । इस असफलता के चलते ही राजेश शर्मा ने दावा करना शुरू किया कि चेयरमैन तो पंकज पेरिवाल ही बनेगा, इसके लिए भले ही एक्स-ऑफिसो के रूप में उन्हें और विजय गुप्ता को अपना वोट क्यों न डालना पड़े । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल में एक्स-ऑफिसो के रूप में हालाँकि पाँच वोट और हैं, और उन पाँचों को पंकज पेरिवाल व राजेश शर्मा की जोड़ी के खिलाफ ही देखा/पहचाना जाता है - लेकिन राजेश शर्मा को उनकी परवाह नहीं है । राजेश शर्मा जानते हैं कि यह पाँचों 'शरीफ' लोग हैं और यह एक्स-ऑफिसो के रूप में अपना अपना वोट नहीं डालेंगे । दरअसल जैसा कि समाज में होता है - जहाँ बदमाशियाँ बदमाशों के प्रभाव के कारण नहीं होती/बढ़ती हैं, बल्कि शरीफों के चुप रहने के कारण बढ़ती हैं; ठीक उसी तर्ज पर इंस्टीट्यूट में राजेश शर्मा की हरकतों ने इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को अपने प्रभाव के कारण कलंकित नहीं किया हुआ है, बल्कि इसलिए कलंकित किया हुआ है क्योंकि दूसरे लोग चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं । राजेश शर्मा इसीलिए आश्वस्त हैं कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनवाने में उनकी मर्जी सफल हो जाएगी । विजय गुप्ता को वह 'अपने जैसा ही' मानते/समझते हैं ।
विजय गुप्ता को राजेश शर्मा अपने खेल में इसलिए भी शामिल समझते हैं, क्योंकि पंकज पेरिवाल के साथ विजय गुप्ता के यूँ भी अच्छे संबंध हैं । विजय गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी के लिए लुधियाना में पंकज पेरिवाल और उनके पिता से सहयोग व समर्थन मिलता रहा है । राजेश शर्मा को विश्वास है कि वही सहयोग व समर्थन पंकज पेरिवाल के पक्ष में वोट करने के लिए विजय गुप्ता की मजबूरी बनेगा । विजय गुप्ता के सामने दोहरी समस्या है - एक तो यह कि पंकज पेरिवाल के लिए वह वोट करने को यदि तैयार हो भी जाएँ, तो भी पंकज पेरिवाल की जीत वास्तव में राजेश शर्मा की ही जीत मानी/समझी जाएगी और उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा; दूसरी समस्या यह कि राजेश शर्मा की बदनामी का कीचड़ उनके साथ और चिपक जायेगा । विजय गुप्ता को यह भी लगता है कि पंकज पेरिवाल यदि अल्पमत में होने के बावजूद चेयरमैन बन भी जाते हैं, तो पूरे वर्ष बार बार मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ की तरह फजीहत के शिकार बनेंगे - और तब बार बार उनका नाम भी उछलेगा, और यह बात चुनावी वर्ष में उनके लिए खासी फजीहत भरी साबित हो सकती है । विजय गुप्ता को अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव भी लड़ना है । अल्पमत के चेयरमैन के रूप में पंकज पेरिवाल के झंझट तब तक चलते ही रहेंगे और यह बात विजय गुप्ता के लिए मुसीबत भरी साबित हो सकती है । इसलिए विजय गुप्ता के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि विजय गुप्ता को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत का चेयरमैन बनवाने के राजेश शर्मा के खेल में नहीं पड़ना/फँसना चाहिए । विजय गुप्ता क्या करेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन यह जरूर पता चल रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव की चाबी विजय गुप्ता के पास ही है ।

Monday, February 5, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी ने नीलेश विकमसे और नवीन गुप्ता के बीच के झगड़े को चर्चा का विषय बनाया

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी ने उनके अपने सदर्न रीजन से लेकर इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल तक में बुरी तरह से खलबली मचा दी है । एमपी विजय कुमार का सेंट्रल काउंसिल में पहला टर्म है । यूँ तो पहली टर्म वाले धीरज खंडेलवाल और मनु अग्रवाल भी अपनी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत किए हुए हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनावी समीकरणों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को हालाँकि यही लग रहा है कि पहली टर्म वाले सदस्यों की उम्मीदवारी - और कुछ नहीं, बल्कि सिर्फ किसी गंभीर उम्मीदवार का खेल बनाने और या किसी का खेल बिगाड़ने का ही काम करेगी, और इस सोच के कारण सबसे बुरी दशा में धीरज खंडेलवाल और मनु अग्रवाल हैं । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में हमेशा ही अपनी टाँग फँसाए रखने वाले फुर्सती पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के समर्थन की चर्चा के चलते धीरज खंडेलवाल को तो कुछ समय लोगों ने गंभीरता से लिया भी, मनु अग्रवाल को लेकिन उम्मीदवार के रूप में कभी भी तवज्जो नहीं मिली । लोगों को यही सोच सोच कर हैरानी है कि मनु अग्रवाल आखिर किस भरोसे वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उम्मीदवार बन गए हैं । कानपुर में उनके नजदीकियों से मजाक भी सुने गए हैं कि पनकी वाले हनुमान मंदिर के बाबा ने मनु अग्रवाल को (वाइस) प्रेसीडेंट बनने का आशीर्वाद दिया हुआ है, और वह उसी आशीर्वाद के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लग गए हैं । उत्तम अग्रवाल और पनकी वाले बाबा के कारण क्रमशः धीरज खंडेलवाल और मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के बारे में भले ही मजाक सुने जा रहे हों, लेकिन एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी ने अलग अलग कारणों से कइयों को सांसत में डाला हुआ है । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में एमपी विजय कुमार का क्या हाल होगा और वह जीतेंगे या नहीं, यह तो नतीजा मिलने पर ही पता चलेगा - लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में चौतरफा बबाल जरूर काटा हुआ है ।
सबसे ज्यादा बबाल उनके अपने सदर्न रीजन में ही मचा हुआ है, और उनकी उम्मीदवारी सदर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों के लिए दिलचस्पी का विषय बनी हुई है । एमपी विजय कुमार ने दरअसल सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव में सदर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट प्राप्त किए थे, और इस तरह से वह देवराज रेड्डी के लिए दुःस्वप्न साबित हुए थे । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट में यह रिकॉर्ड रहा है कि वाइस प्रेसीडेंट के रूप में सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने वाला अपने रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाता है । देवराज रेड्डी के मामले में लेकिन यह रिकॉर्ड टूट गया, क्योंकि वाइस प्रेसीडेंट के रूप में चुनाव लड़ने वाले देवराज रेड्डी को एमपी विजय कुमार से कम वोट मिले और वह अपने रीजन में दूसरे नंबर पर रहने के लिए मजबूर हुए । सदर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे लोगों को डर है कि एमपी विजय कुमार यदि वाइस प्रेसीडेंट बन गए, तो इस वर्ष वर्ष होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में कितने वोट पायेंगे - और किस किस का काम बिगाड़ेंगे ? इसलिए सदर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कई उम्मीदवार और उनके समर्थक नेता अपने अपने तरीके से वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में एमपी विजय कुमार की राह को मुश्किल बनाने का काम कर रहे हैं । जिस बेचारे की वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में कोई भूमिका नहीं है, वह प्रार्थना करके एमपी विजय कुमार के लिए मुश्किलें खड़ी करने की कोशिश कर रहा है ।
एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी ने लेकिन बड़ा काम प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे और वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के बीच के 'झगड़े' को सामने लाने का किया है । नवीन गुप्ता को यूँ तो महा-नाकारा सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिनकी इंस्टीट्यूट के किसी काम में कभी कोई सक्रियता नहीं रही और जो सिर्फ अपने पिताजी की बदौलत काउंसिल में सदस्य बन गए और फिर वाइस प्रेसीडेंट भी बन गए - लेकिन एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी के खिलाफ उनकी गजब की सक्रियता है । नवीन गुप्ता के अनुसार, वाइस प्रेसीडेंट चाहे कोई भी बन जाए, बस एमपी विजय कुमार न बने । एमपी विजय कुमार से नवीन गुप्ता की नाराजगी का कारण - एमपी विजय कुमार का नीलेश विकमसे के नजदीक होना/रहना है । नवीन गुप्ता की नाराजगी वास्तव में नीलेश विकमसे से है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट के बीच इतने खराब रिश्ते शायद ही कभी रहे हों, जितने इस वर्ष रहे हैं । नवीन गुप्ता की शिकायत रही है कि प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे ने उन्हें कभी किसी मौके पर कोई अहमियत नहीं दी, और उन्हें पूरी तरह से उपेक्षित रखा । इस स्थिति के लिए कई लोग हालाँकि नवीन गुप्ता को ही जिम्मेदार मानते/ठहराते हैं । उनका कहना है कि नवीन गुप्ता किसी लायक हैं ही नहीं; इसलिए नीलेश विकमसे ने अपना समय और एनर्जी बचाने के लिए ही उन्हें किसी मौके पर अहमियत नहीं दी । अब वजह चाहें जो हो, नीलश विकमसे से तवज्जो न मिलने के कारण नवीन गुप्ता उनसे बुरी तरह खफा हैं; और नीलेश विकमसे से अपनी नाराजगी का बदला वह एमपी विजय कुमार से लेने की कोशिश कर रहे हैं - क्योंकि एमपी विजय कुमार इस वर्ष नीलेश विकमसे के बड़े खास रहे हैं । नवीन गुप्ता के लिए नीलेश विकमसे का तो कुछ बिगाड़ पाना संभव नहीं है, इसलिए वह उनके खास रहे एमपी विजय कुमार से ही बदला लेकर अपने कलेजे को ठंडक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं ।
वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की इस सक्रियता ने एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी को खास बना दिया है । लोगों का कहना/मानना है कि एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी ही है, जिसने नीलेश विकमसे और नवीन गुप्ता के बीच के झगड़े को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया है । इसी से लोगों को कहने का मौका मिला है कि वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी का क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने वाइस प्रेसीडेंट के चुनावी परिदृश्य को रोचक जरूर बना दिया है ।

Saturday, November 11, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एक्जामिनेशन कमेटी के सदस्य के रूप में राजेश शर्मा की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं को मजाक बना देने की हरकत ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे और वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की कार्य व निर्णय क्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा द्वारा की गई एक हरकत के पकड़ में आने से अभी भी चल रही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षा की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है, और यह साबित हो गया है कि परीक्षाओं को ईमानदारी से करवा सकने की इंस्टीट्यूट की व्यवस्था को 'बेईमान' बने रखवालों ने ही छिन्न-भिन्न कर दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले कुछ समय से चर्चा तो गर्म थी कि नबंवर/दिसंबर में हो रही परीक्षाओं में राजेश शर्मा ने कई परीक्षा केंद्रों पर अपने चहेतों को ऑब्जर्वर के रूप में नियुक्ति दिलवाई है, लेकिन इस चर्चा को सिर्फ एक आरोप के रूप में देखा जा रहा था । चूँकि प्रोफेशन के लोगों के बीच राजेश शर्मा की खासी बदनामी है, और प्रोफेशन के लोगों के बीच उन्हें एक 'दलाल' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; पिछले ही दिनों दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में उनकी उपस्थिति में 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे गूँजे थे - इसलिए उक्त चर्चा पर किसी को हैरानी नहीं हुई थी, लेकिन उक्त आरोप को पुष्ट करने के लिए किसी के पास चूँकि कोई ठोस सुबूत नहीं था, जिसके कारण उक्त आरोप सिर्फ चर्चा का हिस्सा ही बना रहा । लेकिन 'रचनात्मक संकल्प' को इस बात का जो ठोस सुबूत मिला है, वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की परीक्षा-व्यवस्था में बेईमानीभरी सेंध लगाने की राजेश शर्मा की हरकत को सामने लाता है । सुबूत के रूप में सामने आए राजेश शर्मा द्वारा कुछेक खास खास लोगों को किए गए वाट्स-ऐप संदेश से साबित है कि राजेश शर्मा ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षा की व्यवस्था को जैसे हाई-जैक कर लिया है और पूरी व्यवस्था को वह अपने बेईमानीभरे तरीके से संचालित कर रहे हैं ।
राजेश शर्मा ने अपने व्यवहार से 'रखवाले ही चोर बने' मुहावरे को चरितार्थ किया है । दरअसल राजेश शर्मा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की उस एक्जामिनेशन कमेटी के ही सदस्य हैं, जिस पर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं को ईमानदारी से करवाने की जिम्मेदारी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट में 39 कमेटियाँ हैं, जिनमें कुल चार कमेटियों को स्टैंडिंग कमेटी का दर्जा प्राप्त है - इन चार कमेटियों में एक एक्जामिनेशन कमेटी है । इस तथ्य से ही इस कमेटी की महत्ता समझ में आ जाती है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे इस कमेटी के मुखिया हैं; तथा उनके और इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के अलावा पाँच अन्य सदस्य इस कमेटी में हैं । इस कमेटी की ही अनुशंसा पर नवंबर/दिसंबर में होने वाली परीक्षाओं के लिए ऑब्जर्वर्स के मनोनयन हेतु 10 अगस्त को इंस्टीट्यूट ने नियमों की घोषणा की थी । यह घोषणा होने के बाद से ही राजेश शर्मा अपने चहेतों से संपर्क करने में जुट गए और उन्हें उनकी पसंद का परीक्षा-केंद्र दिलवाने तक का ऑफर देने लगे । 'दलाल'रूपी यह ऑफर इसलिए और ज्यादा गंभीर है - क्योंकि यह इंस्टीट्यूट की एक्जामिनेशन कमेटी के ही एक सदस्य की तरफ से दिया गया । इस ऑफर से सिर्फ राजेश शर्मा का ही करेक्टर सामने नहीं आया है, बल्कि इंस्टीट्यूट की परीक्षा-व्यवस्था का असली रूप भी सामने आया है । राजेश शर्मा द्वारा भेजे गए वाट्स-ऐप संदेश का स्क्रीन-शॉट राजेश शर्मा की ही करतूत को सामने नहीं ला रहा है, बल्कि इस तथ्य को भी उजागर कर रहा है कि नीलेश विकमसे और नवीन गुप्ता की सरपरस्ती में 'आस्तीन के साँपों' ने कैसे अपनी ऊँची पहुँच बना ली है - और परीक्षा जैसे अत्यंत महत्त्व के काम को कैसे मजाक बना दिया है ।
मजे की और राजेश शर्मा की तरफ से बेशर्मी की बात यह हुई कि राजेश शर्मा की इस हरकत को लेकर लोगों के बीच जब चर्चा शुरू हुई, तब राजेश शर्मा ने यह कहते हुए मामले को दबाने का प्रयास किया कि एक्जामिनेशन कमेटी के बाकी सदस्यों ने भी तो अपने अपने नजदीकियों और चहेतों को उनकी पसंद के परीक्षा केंद्र दिलवाने के लिए काम किए हैं । यह कहते/बताते हुए उनका आशय दरअसल यह रहा कि इस मामले में अकेले उन्हीं को निशाना क्यों बनाया जा रहा है । राजेश शर्मा की यह बात यदि सच है, तो समझा जा सकता है कि हालात आखिर किस कदर बिगड़े हुए हैं ? एक्जामिनेशन कमेटी में मंगेश किनरे, सुशील गोयल, केमिशा सोनी और पीसी जैन भी हैं । राजेश शर्मा अपनी करतूत पर पर्दा डाल कर अपने आप को बचाने तथा मामले को रफा-दफा करने/करवाने के लिए जिस तरफ से एक्जामिनेशन कमेटी के बाकी सदस्यों को भी 'आरोपी' बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उसने मामले को दिलचस्प मोड़ दे दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं के साथ-साथ इंस्टीट्यूट की एक्जामिनेशन कमेटी को ही मजाक बना देने की राजेश शर्मा की हरकत ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की कार्य व निर्णय क्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं ।

 

Friday, November 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच में अपने लोगों को न जितवा पाने की खुन्नस में नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी का उसका अधिकार छिनवा कर प्रकाश शर्मा ने जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गौरव पर तो चोट की ही है, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को भी दाँव पर लगा दिया है

जयपुर । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी द्वारा जयपुर में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की फजीहत का कारण बन रही है । विवादपूर्ण मुद्दों पर नीलेश विकमसे के फैसला न करने के रवैये के चलते इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी बेचारे वी सागर की बड़ी आफत हो जाती है - क्योंकि अक्सर उनकी सुनी नहीं जाती है और कोई भी उन्हें कभी भी लताड़ देता है । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने समझ लिया है कि नीलेश विकमसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बन जरूर गए हैं, लेकिन प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी सँभाल और निभा पाना उनके बस की बात है नहीं, और इसलिए वह इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी को भी कुछ नहीं समझते और मनमानियों पर उतरे रहते हैं । जयपुर में 24/25 नबंवर को हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट में फैली अराजकता का दिलचस्प उदाहरण है । इस नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी को लेकर विवाद है - इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, जयपुर में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट के कार्यक्रम की मेज़बानी इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच को करनी/मिलनी चाहिए; लेकिन मेज़बानी निभा रही है सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल । मजे की बात यह है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में इस बारे में जो विचार-विमर्श हुआ, उसमें भी नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी जयपुर ब्रांच को सौंपने का फैसला हुआ - लेकिन उसके बाद भी मेज़बानी का अधिकार जयपुर ब्राँच से छीन कर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को सौंप दिया गया है ।
यह पूछना बेकार है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीप मिश्र आखिर काउंसिल की मीटिंग में ही हुए फैसले पर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह पूछना इसलिए बेकार है क्योंकि दीप मिश्र को एक 'कठपुतली' चेयरमैन के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, और माना/समझा जाता है कि उन्हें चेयरमैन की कुर्सी दिलवाने वाले ऊपर के लोग जैसे 'नचाते' हैं, वह वैसे ही 'नाचते' हैं । दरअसल दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । ऐसे में, बेचारे दीप मिश्र की मजबूरी और व्यथा को समझा जा सकता है । संदर्भित मामले में दरअसल हुआ यह कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उपस्थित हुए सदस्यों के बहुमत ने मेज़बानी की जिम्मेदारी जयपुर ब्राँच को सौंपने का फैसला लिया; लेकिन इस फैसले को मानने से यह कहते/बताते हुए इंकार कर दिया गया कि काउंसिल का बहुमत इस फैसले से सहमत नहीं है । निश्चित रूप से बहुमत को अपना फैसला लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह तथाकथित बहुमत है कहाँ ? यह तथाकथित बहुमत उस मीटिंग में नजर क्यों नहीं आया, जिस मीटिंग में जयपुर में हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी सुनिश्चित करने का मामला तय हो रहा था ? कम से कम न्याय का दिखावा ही कर लिया जाता और यह तथाकथित बहुमत दूसरी मीटिंग करके पहली मीटिंग के फैसले को पलट देता - लेकिन ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गई । असल में, ऐसा करने में एक समस्या यह भी थी कि तथाकथित बहुमत के ठेकेदार सेंट्रल काउंसिल सदस्य मनु अग्रवाल को अपने साथ मान रहे हैं, लेकिन मनु अग्रवाल जयपुर ब्राँच को मेज़बानी देने का फैसला करने वाली मीटिंग में मौजूद थे और इस फैसले के साथ थे - ऐसे में यदि इसी मुद्दे पर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दूसरी मीटिंग होती तो पहले हुए फैसले को बदलने के लिए मनु अग्रवाल को अपना स्टैंड बदलना होता, और तब उनका दोहरा चरित्र 'रिकॉर्ड' पर आता ।
मनु अग्रवाल के दोहरे चरित्र को रिकॉर्ड पर आने से तो बचा लिया गया है, लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में हुए फैसले को खुद सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा ठेंगा दिखाए जाने की हरकत पर उनकी चुप्पी से उनका दोहरा चरित्र लोगों के सामने तो आ ही गया है । क्योंकि मनु अग्रवाल यदि अभी भी मीटिंग में लिए गए अपने स्टैंड पर कायम हैं तो तथाकथित बहुमत का दावा झूठा है; बहुमत का दावा करने वाले लोग मनु अग्रवाल की चुप्पी के सहारे/भरोसे ही अपने दावे को सच 'दिखा' रहे हैं । बहुमत की इस तरह की मनमानी व्याख्या और दिखावेबाजी से सवाल पैदा हुआ है कि बहुमत यदि 'ऐसे' ही तय होना है, तो फिर मीटिंग आदि की जरूरत ही क्या है ? और क्यों मीटिंग के रिकॉर्ड और मिनिट्स तैयार करने व रखने की जरूरत है ? इस मामले को लेकर इंस्टीट्यूट में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें प्रथम दृष्टया उचित मानते/देखते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने संबंधित पार्टियों से जबाव तलब किया है । वी सागर की इस कार्रवाई से लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में हो रही मनमानियों पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को इस बात से जैसे कोई मतलब ही नहीं है कि उनके प्रेसीडेंट-काल में हर कोई मनमानी कर रहा है, जिसके चलते नाहक ही विवाद पैदा हो रहे हैं - और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो रही है । जयपुर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विजय गुप्ता से भी मेज़बानी के मामले में हो रहे नियम के उल्लंघन को लेकर शिकायत की गई, लेकिन विजय गुप्ता ने जब देखा/पाया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ही कोई फिक्र नहीं है - तो वह ही मामले में क्यों पड़ें ? विजय गुप्ता इसलिए भी मामले से दूर रहना और बचना चाहते हैं, क्योंकि इस सारे झमेले के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं - जिन्हें नाराज करना सेंट्रल काउंसिल की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को नुकसान पहुँचाना हो सकता है ।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम की और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में लिए गए फैसले की ऐसी-तैसी करने के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा की निजी खुन्नस को देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर ब्राँच के सदस्यों के अनुसार, प्रकाश शर्मा को लगता है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके कहे में नहीं चलते हैं, और उनकी बजाए सेंट्रल काउंसिल के ही एक दूसरे सदस्य श्याम लाल अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो देते हैं । सेंट्रल काउंसिल के इन दोनों ही सदस्यों के बीच जयपुर में अपने अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर एक स्वाभाविक सी होड़ रहती ही है; इस होड़ में श्याम लाल गुप्ता का पलड़ा इसलिए भारी दिखता है, क्योंकि जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों में दो - प्रमोद बूब और रोहित रुवाटिया उनके साथ देखे/पहचाने जाते हैं तथा जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके नजदीक हैं । प्रकाश शर्मा को जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीसरे सदस्य गौतम शर्मा का ही समर्थन है । जयपुर ब्राँच और रीजनल काउंसिल में प्रकाश शर्मा भले ही श्याम लाल अग्रवाल से पिछड़ रहे हैं, लेकिन सेंट्रल काउंसिल में सेंट्रल रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सदस्यों में प्रकाश शर्मा का पलड़ा फिलहाल भारी है । खेमेबाजी के चलते कहीं कभी 'जीत' कभी कहीं 'हार' का नजारा बनता/दिखता रहता ही है - लेकिन जयपुर में अपनी 'हार' का बदला लेने के लिए प्रकाश शर्मा इस स्तर तक जायेंगे कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को ही दाँव पर लगा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । जयपुर ब्राँच जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए गौरव का प्रतीक है - राजनीति में आगे/पीछे होता ही रहता है; जयपुर ब्राँच में प्रकाश शर्मा यदि 'अपने' लोगों को नहीं जितवा सके और इस कारण से उन्हें ब्राँच में अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अवसर यदि नहीं मिल पा रहा है, तो इसकी खुन्नस में वह जयपुर ब्राँच का हक़ ही छिनवा देंगे - इसकी कल्पना उनके नजदीकियों और शुभचिंतकों तक ने नहीं की थी । जयपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारियों के साथ प्रकाश शर्मा की नाराजगी हो सकती है, लेकिन उनसे बदला लेने के लिए वह जयपुर ब्राँच की पहचान और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करेंगे - यह प्रकाश शर्मा की छोटी सोच का सुबूत और उदाहरण है ।

Thursday, November 9, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में नीलेश विकमसे के प्रेसीडेंट-काल में बना अराजकता और अनिर्णय का माहौल, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ एंड टीम की मनमानियों और लूट-खसोट के लिए वरदान बना

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों ने स्टूडेंट कन्वेंशन के नाम पर रुपए हड़पने की योजना पर काम करना शुरू किया है, और इसके तहत करीब 35 लाख रुपए का बजट बना कर तैयार किया है । पिछले वर्ष स्टूडेंट कन्वेंशन में करीब 20 लाख रुपए खर्च हुए थे । इसी से लोगों को लगता है कि राकेश मक्कड़ एंड टीम के सदस्यों के पेट कुछ ज्यादा बड़े हैं, और इसीलिए उन्होंने स्टूडेंट कन्वेंशन के खर्चे में जोर का उछाल 'पैदा' कर दिया है । इस उछाल को तर्कसंगत बनाने/दिखाने के लिए कन्वेंशन में दो हजार छात्रों की भागीदारी होने/कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष एक हजार छात्रों का था । अब पिछले वर्ष यदि एक हजार छात्रों के लिए इंतजाम करने में 20 लाख रुपए खर्च हुए थे, तो इस वर्ष दो हजार छात्रों के लिए इंतजाम करने में 35 लाख का खर्चा तो उचित ही लगता है । लेकिन यहाँ एक पेंच है - पिछले वर्ष इंतजाम भले ही एक हजार छात्रों के लिए किया गया था, लेकिन कन्वेंशन में छात्र कुल 400/500 के बीच ही पहुँचे थे । पिछले वर्ष की कन्वेंशन के लिए तैयार की/करवाई गयी तमाम स्टेशनरी अभी भी धूल खा रही है । पिछले वर्ष की कन्वेंशन आयोजित करने वाले भी राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथी ही थे - इसलिए एक स्वाभाविक सा सवाल बनता है कि पिछले वर्ष यही लोग स्टूडेंट कन्वेंशन में जब एक हजार छात्रों को जुटाने का लक्ष्य ही पूरा नहीं कर पाए थे, तब इस वर्ष दो हजार छात्रों का लक्ष्य क्यों निर्धारित कर लिया गया है ? राकेश मक्कड़ तथा काउंसिल में पदाधिकारी उनके साथियों की हरकतों को देखते/पहचानते हुए लोगों को इस सवाल का उचित जबाव यही समझ में आता है कि इंस्टीट्यूट के पैसे की ज्यादा से ज्यादा लूट को संभव बनाने के लिए ही राकेश मक्कड़ एंड टीम ने यह ऊँचा लक्ष्य निर्धारित किया है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के रूप में राकेश मक्कड़ एंड टीम पर काउंसिल के हिसाब-किताब में गड़बड़ियाँ करने तथा हिसाब-किताब को काउंसिल सदस्यों से ही छिपाने को लेकर गंभीर आरोप और भारी विवाद रहे हैं; जिन्हें लेकर चारों तरफ से घिर जाने के बाद वह जो थोड़ा-बहुत हिसाब दिखाने को मजबूर हुए तो उसमें बहुत सी 'हेरा-फेरियाँ' पकड़ी गईं - और जिसके चलते पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग और मौजूदा ट्रेजरर सुमित गर्ग काउंसिल के 'लूटे गए' पैसे काउंसिल को वापस करने के लिए मजबूर तक हुए । पोल खुलती तथा लूटे गए पैसे वापस करने की नौबत आते देख राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों ने हिसाब-किताब फिर से छिपा लिया और बेईमानीपूर्ण तरीके से 'जबरदस्ती' बजट पास करवाया, और षड्यंत्रपूर्ण तरीके से डेढ़ मिनट में एजीएम कर ली । राकेश मक्कड़ एंड टीम की इन हरकतों पर काउंसिल के ही सदस्यों की तरफ से इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को शिकायत की हुई है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की तरफ से कई कारणों से चूँकि कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए राकेश मक्कड़ एंड टीम को मनमानियाँ करने का और बल मिला है । नीलेश विकमसे के प्रेसीडेंट-काल में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में जो अराजकता और अनिर्णय का माहौल बना है, वह नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ एंड टीम की मनमानियों और लूट-खसोट के लिए वरदान बना है ।
इसी वरदान का प्रसाद पाने के लिए, पिछले वर्ष एक हजार छात्रों की भागीदारी के लक्ष्य-निर्धारण के साथ की गई स्टूडेंट कन्वेंशन में मुश्किल से 400/500 छात्रों को इकट्ठा कर पाने वाली राकेश मक्कड़ एंड टीम ने इस वर्ष की स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए दो हजार छात्रों की भागीदारी का लक्ष्य निर्धारित कर अपनी अपनी जेबें भरने का इंतजाम कर लिया है । मजे की बात यह है कि काउंसिल के चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए काउंसिल सदस्यों तक से बात करने की जरूरत तक नहीं समझी है । उनकी मनमानी का इससे भी बड़ा सुबूत यह मिला है कि कन्वेंशन के लिए जगह बुक करवाने का काम गुपचुप रूप से जून में ही कर लिया गया था, और जिसके लिए किसी से पूछे या किसी को बताए बिना ही तीन लाख रुपए एडवांस के रूप में भी दे दिए गए थे । राकेश मक्कड़ और काउंसिल में पदाधिकारी उनके साथियों की सोच और उनके व्यवहार का दिलचस्प नजारा यह है कि पदाधिकारी के रूप में उनके पास लाइब्रेरीज के खर्चे पूरे करने के लिए पैसे नहीं हैं, और इसलिए पिछले दिनों उन्होंने लाइब्रेरीज को बंद कर देने के फैसले कर लिए - लेकिन फालतू के कामों में खर्च करने के लिए उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है । दरअसल फालतू के कामों में खर्च हुए 'दिखाए' गए पैसे से चूँकि अपनी अपनी जेबें भरने का मौका मिलता है, इसलिए चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों का सारा ध्यान जरूरी कामों की बजाए उन्हीं पर रहता है ।
राकेश मक्कड़ के चेयरमैन-काल में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सिर्फ पैसों की ही बेईमानी नहीं हो रही है, बल्कि प्रोफेशन के नाम पर भी जमकर धोखाधड़ी हो रही है । इसका बिलकुल नया उदाहरण लुधियाना में होने वाला सेमीनार है - जिसके लिए पहले तो बताया गया था कि सेमीनार में 'एमिनेंट' स्पीकर्स आयेंगे, लेकिन जब स्पीकर्स के नाम सामने आए तो 'खोदा पहाड़, निकला चूहा' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए काउंसिल में पदाधिकारी नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के नाम सामने आए । इस हरकत को सरासर धोखाधड़ी मानते/बताते हुए राकेश मक्कड़ को लोगों की तरफ से जब लताड़ पड़ी, तो उन्होंने बहानेबाजी लगाई कि उन्हें कोई एमिनेंट स्पीकर मिला ही नहीं, इसलिए ऐन मौके पर उन्हें काउंसिल के इन पदाधिकारियों को ही स्पीकर्स के रूप में तय करना पड़ा है । यह हरकत कोई पहली बार नहीं हुई है; काउंसिल पदाधिकारी ब्रांचेज के कार्यक्रमों में स्पीकर्स के रूप में पहले भी जाते रहे हैं - काउंसिल के सदस्यों के आरोपों के ही अनुसार, वह इसलिए स्पीकर बनते रहे हैं, ताकि आने/जाने/ठहरने/खाने का खर्चा वह काउंसिल से बसूल सकें । राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारी अपनी छोटी छोटी जरूरतों और स्वार्थों को पूरा करने के लिए सेमिनार्स के आयोजन तक में जिस तरह की हेराफेरियाँ कर रहे हैं, उससे सेमिनार्स के स्तर बुरी तरह से घटे हैं और वह मजाक बन कर रह गए हैं ।

Saturday, September 30, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के मामले में राकेश मक्कड़ और उनके साथियों द्वारा दिखाई जा रही निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहेंगे ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे, वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा सेक्रेटरी वी सागर की बेपरवाही और कानों में तेल डाले बैठे होने की धृतराष्ट्री प्रवृत्ति ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी दिखाने का सुनहरा अवसर प्रदान किया हुआ है । गौरतलब है कि रीजनल काउंसिल के 13 में से सात सदस्यों ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए नोटिस दिया हुआ है, नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले सेंट्रल काउंसिल के तीन सदस्यों तथा एक नोमीनेटेड सदस्य ने उक्त नोटिस का समर्थन किया हुआ है - लेकिन फिर भी राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मी भरी चुप्पी साधे हुए हैं । इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के तीन सदस्य रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग कर सकते हैं । चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ इस नियम का खुल्लमखुल्ला मजाक बनाए हुए हैं - और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी आँखों पर पट्टी बाँध धृतराष्ट्र बने हुए हैं । राकेश मक्कड़ को अपनी इस बेशर्मीभरी निर्लज्जता में अपने साथी पदाधिकारियों का पूरा पूरा समर्थन मिला हुआ है । नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी या ट्रेजरर में से किसी एक के समर्थन से वाइस चेयरमैन भी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुला सकता है - लेकिन इस संबंध में वाइस चेयरमैन विवेक खुराना के प्रयासों को न तो सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा से और न ट्रेजरर सुमित गर्ग से समर्थन मिला है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन सहित सात सदस्यों - विवेक खुराना, राजिंदर नारंग, राजेश अग्रवाल, स्वदेश गुप्ता, आलोक जैन, योगिता आनंद और पूजा बंसल ने 17 सितंबर को सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा को संबोधित पत्र के जरिए 4 अक्टूबर को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग की । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हाल ही के दिनों में घटी घटनाओं के संदर्भ में विचार करने तथा जरूरी फैसले लेने का वास्ता देते हुए उक्त माँग की गई । उक्त माँग के साथ, बुलाई जाने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग के लिए रीजनल काउंसिल की कमेटियों के पुनर्गठन तथा चेयरमैन सहित रीजनल काउंसिल के अन्य पदाधिकारियों को दिए गए विशेषाधिकारों पर पुनर्विचार को प्रमुख एजेंडे के रूप में रेखांकित किया गया है । रीजनल काउंसिल के 13 सदस्यों में से सात सदस्यों द्वारा की जा रही इस माँग से स्वतः ही साबित है कि मीटिंग में राकेश मक्कड़ की मनमानी भरी लूट-खसोट पर लगाम लगना निश्चित ही है । पिछली एक मीटिंग में जिस तरह पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग तथा मौजूदा ट्रेजरर सुमित गर्ग द्वारा की गई लूट को पकड़ा गया था, जिसके चलते यह दोनों काउंसिल के खजाने से 'लूटी' गई रकम को वापस करने के लिए मजबूर हुए - उससे राकेश मक्कड़ बुरी तरह घबराए हुए हैं । अपनी बेईमानीभरी हरकतों के कारण राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल में बहुमत सदस्यों का समर्थन खो चुके हैं, इसलिए वह चुपचाप चेयरमैन पद पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर चुप्पी ओढ़े हुए हैं ।
राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि रीजनल काउंसिल में बहुमत बनाते सात सदस्यों की रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की तरफ से जोरदार और सक्रिय समर्थन मिला है । सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले संजय अग्रवाल, संजीव चौधरी तथा संजय वासुदेवा ने इंस्टीट्यूट के नियमों का हवाला देते हुए रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाए जाने की माँग का जोरदार तरीके से समर्थन किया । सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी का रवैया तो राकेश मक्कड़ के लिए खासा अप्रत्याशित रहा है । उल्लेखनीय है कि विजय झालानी कुछ समय पहले तक राकेश मक्कड़ के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं, जिसके चलते उनकी राजिंदर नारंग से झड़प भी हो गई थी - लेकिन राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत बनी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग का विजय झालानी ने खासी मुखरता के साथ समर्थन किया है । और सिर्फ समर्थन ही नहीं किया है, बल्कि इस मामले में लीपापोती-सी करते दिख रहे इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर तक से भिड़ गए । दरअसल, मामले में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियता से दबाव बढ़ता देख वी सागर ने राकेश मक्कड़ को संदेश लिखा/भेजा और उनसे मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया । इस पर विजय झालानी ने उन्हें तुरंत लिखा कि आप अनुरोध क्यों कर रहे हैं, नियमों के हवाले से आप मीटिंग बुलाने के लिए निर्देश दीजिए ।
राकेश मक्कड़ लेकिन तमाम हील-हुज्जत के बावजूद मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मों की तरह चुप्पी साधे हुए हैं । दरअसल वह समझ रहे हैं कि रीजनल काउंसिल की इस बार की मीटिंग उनकी और उनके साथियों की लूट-खसोट पर पूरी तरह रोक लगाने का काम करेगी - इसलिए वह किसी भी तरह मीटिंग करने से बचना चाहते हैं और इसके लिए अपनी फजीहत करवाने से लेकर इंस्टीट्यूट और उसके पदाधिकारियों तक की किरकिरी करवाने के लिए तैयार हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ और उनके साथियों की निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहते हैं ?

Thursday, August 24, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की मनमानियों को शह मिलती 'देख' सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रेसीडेंट से मिली जिम्मेदारी को निभाने से पीछे हटे

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे का कार्यकाल जिस तरह के विवादों और आरोपों का शिकार हो रहा है, उसमें इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों ने उनकी बात मानने से इंकार करके एक अध्याय और जोड़ दिया है । इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि सेंट्रल काउंसिल के किन्हीं सदस्यों को प्रेसीडेंट कोई जिम्मेदारी सौंपे, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य उसे मानने और पूरा करने से पीछे हट जाएँ । उल्लेखनीय है कि नीलेश विकमसे ने नॉर्दर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा दूसरे सदस्यों के बीच चल रहे टकराव को दूर करने की जिम्मेदारी सौंपी थी, जिसे तत्परता से निभाने की कोशिश करते हुए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने पिछले सप्ताह रीजनल काउंसिल सदस्यों की एक मीटिंग बुलाई, उस मीटिंग में तय हुए काम को आगे बढ़ाने की श्रृंखला में लेकिन कल जो मीटिंग हुई - सेंट्रल काउंसिल सदस्य उसमें शामिल नहीं हुए, जिस कारण पटरी पर आता दिख रहा मामला एक बार फिर पटरी से उतरता हुआ नजर आ रहा है । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने अपनी अनुपस्थिति को लेकर कोई औपचारिक बयान तो नहीं दिया है, लेकिन उनकी तरफ से लोगों को सुनने को मिला है कि चूँकि उन्हें नहीं लगता कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में गड़बड़ी के जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे सचमुच कोई कार्रवाई करेंगे, इसलिए जब कुछ होना ही नहीं है - तो वही क्यों अपने आप को मुसीबत में डालें ?
सेंट्रल काउंसिल सदस्य दरअसल पिछले सप्ताह हुई मीटिंग में नितिन कँवर द्वारा अतुल गुप्ता के साथ की गयी बदतमीजी से 'डर' गए हैं । मीटिंग में निकासा चेयरमैन नितिन कँवर ने सेंट्रल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य अतुल गुप्ता के साथ जो बदतमीजी की, अतुल गुप्ता ने हालाँकि नितिन कँवर को उसका करारा जबाव तो मीटिंग में ही दे दिया था - लेकिन नितिन कँवर के व्यवहार ने सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को यह सोचने पर मजबूर किया कि नितिन कँवर को 'समर्थन' किसका और कहाँ से मिल रहा है, जिसके बल पर वह सेंट्रल काउंसिल के एक वरिष्ठ सदस्य के साथ भी बदतमीजी करने की हिम्मत कर रहा है । यह सवाल गंभीर इसलिए बना क्योंकि उक्त मीटिंग से पहले हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में दो ऑब्जर्बर्स की उपस्थिति में नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा ने बदतमीजी की थी - जिसे लेकर दोनों ऑब्जर्बर्स ने अपनी रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की थी । ऑब्जर्बर्स की रिपोर्ट के आधार पर इनके खिलाफ कार्रवाई हुई होती, तो नितिन कँवर की अतुल गुप्ता के साथ बदतमीजी करने की हिम्मत नहीं होती । इस बात को 'समझ' कर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने जान लिया कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में मनमानी बेईमानियाँ तथा बदतमीजी करने वाले पदाधिकारियों को 'ऊपर' से समर्थन प्राप्त है - जिसके बल पर उक्त पदाधिकारी उनके साथ भी बदतमीजी कर सकते हैं, नितिन कँवर ने उसका नजारा पेश कर ही दिया है; इसलिए उनसे दूर रहने में ही भलाई है ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा के समर्थन की बात जगजाहिर है । इसके साथ-साथ यह बात भी इंस्टीट्यूट के लोगों की जुबान पर रहती है कि नीलेश विकमसे पता नहीं क्यों राजेश शर्मा से बड़ा 'घबराते' हैं । समझा जाता है कि नीलेश विकमसे पर राजेश शर्मा के प्रभाव के कारण ही नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को न सिर्फ मनमानियाँ व बेईमानियाँ करने की छूट मिली हुई है, बल्कि ऑब्जर्बर्स की उपस्थिति में भी बदतमीजी करने का अधिकार मिला हुआ है । इस अधिकार से वह इतने मस्त हैं कि उन्होंने अपने ही रीजन के सेंट्रल काउंसिल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता तक का भी कोई लिहाज नहीं किया और उनके साथ भी बदतमीजी कर बैठे । ऐसे में, सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने समझ लिया कि प्रेसीडेंट से संरक्षण प्राप्त रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की बदतमीजी का शिकार होने से उन्हें यदि बचना है, तो प्रेसीडेंट द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा - और इसीलिए कल हुई मीटिंग से वह दूर ही रहे, जिसका नतीजा रहा कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को मनमानी तथा बदतमीजी करने की पूरी छूट मिल गयी ।
पिछले सप्ताह हुई मीटिंग में जब प्रेसीडेंट के निर्देश पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य आए थे, तब रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों पर कुछ दबाव पड़ा था और उनकी मनमानियों पर रोक लग सकी थी । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के दबाव के चलते रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी रीजनल काउंसिल के दूसरे सदस्यों को एकाउंट्स दिखाने के लिए मजबूर हुए थे, जिसमें पदाधिकारियों की बेईमानियों और चोरी के सुबूत मिले थे । दरअसल इससे ही बौखला कर नितिन कँवर ने अतुल गुप्ता के साथ बदतमीजी की थी । कल की मीटिंग से सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के दूर रहने/होने से रीजनल काउंसिल में  हालात फिर से पहले जैसे ही होते नजर आए । इंस्टीट्यूट के इतिहास में शायद यह पहली बार ही हुआ होगा कि सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों ने प्रेसीडेंट द्वारा सौंपे गए काम को करने से 'इंकार' किया है ।

Wednesday, August 23, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के दो-तीन बेईमान पदाधिकारियों के सामने सेंट्रल काउंसिल सदस्य और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक लाचार क्यों बने हुए हैं ?

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़, सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा और निकासा चेयरमैन नितिन कँवर ने 'चोर चोर मौसेरे भाई' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पिछले वर्ष की बेईमानी के आरोपों से भरी बैलेंसशीट को पास करवाने में एकता का आज की मीटिंग में बेशर्मीभरा परिचय दिया । दीपक गर्ग, पंकज पेरिवाल तथा सुमित गर्ग ने इस एकता में 'फर्स्ट कज़िन' की भूमिका निभाई । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष की बैलेंसशीट को लेकर रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच काफी समय से विवाद चल रहा है । काउंसिल के ही कुछेक सदस्यों का आरोप है कि काउंसिल के पदाधिकारियों ने अनापशनाप खर्चे किए हुए हैं, और फर्जी किस्म के बिलों के जरिए काफी मोटी रकम हड़पी हुई है । इन आरोपों को तब और बल मिला, जब काउंसिल के पदाधिकारियों ने बैलेंस शीट में जुड़े खर्चों के डिटेल्स काउंसिल सदस्यों को ही दिखाने/बताने से इंकार कर दिया । 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाली कहावत को प्रासंगिक बनाते हुए रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इस इंकार ने जो बबाल मचाया, उसकी गूँज इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे तक पहुँची, जिन्होंने सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व कर रहे सदस्यों से मामले को देखने और निपटाने को कहा ।
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की उपस्थिति में पिछले सप्ताह रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी आरोप लगाने वाले काउंसिल सदस्यों को बैलेंस शीट में दिखाए गए खर्चों के डिटेल्स दिखाने के लिए मजबूर हुए । डिटेल्स देखने वाले काउंसिल सदस्यों ने खर्चों में भारी अनियमितता और बेईमानियाँ रेखांकित कीं । चेयरमैन राकेश मक्कड़ के भाई को बेईमानीपूर्ण तरीके से क्लासेस देने और तय शर्तों से ज्यादा पैसा देने का मामला पकड़ा गया; टीए/डीए के नाम पर तो अनापशनाप बिल पकड़े ही गए, हद की बात तो यह सामने आई कि किसी ब्रांच में गए, तो उसके नजदीक के मंदिर में भी गए और वहाँ हजारों रुपए का प्रसाद खरीदा और उस प्रसाद का बिल भी रीजनल काउंसिल के खाते में डाल दिया । निकासा चेयरमैन के रूप में राजेंद्र अरोड़ा ने जो कन्वेंशन की, उसमें करीब तीन-चार सौ छात्रों की उपस्थिति की बात सामने आई थी, लेकिन खर्चे करीब एक हजार छात्रों की उपस्थिति के हिसाब से डाले हुए हैं । अनापशनाप रकम के फर्जी किस्म के बिलों को पास करने और पैसे देने में तत्कालीन ट्रेजरर नितिन कँवर ने जो तत्परता दिखाई, उससे लगता है कि जैसे उन्हें इसके लिए कमीशन मिला है । गंभीर आरोप यह लगा है कि बैलेंस शीट का ऑडिट करने में भी नियमों का पालन नहीं हुआ है, और ऑडीटर ने भी इस तथ्य को लेकर अपनी आँखें बंद ही किए रखीं ।
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की उपस्थिति में पिछले सप्ताह रीजनल काउंसिल के ही सदस्यों ने जो तमाम अनिमितताएँ पकड़ीं, उन पर काउंसिल के पदाधिकारियों को आज की मीटिंग में जबाव देना था । आज की मीटिंग में चूँकि सेंट्रल काउंसिल सदस्य नहीं पहुँचे - इसलिए राकेश मक्कड़, राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर की तिकड़ी ने मनमानी और बदतमीजी का एकबार फिर नंगानाच किया और आरोपों का संतोषप्रद जबाव देने से बचते हुए जोरजबर्दस्ती से बैलेंसशीट पास कराने का प्रयास किया । इसमें कामयाब न होने पर वह बैलेंसशीट पर वोट करवाने के लिए मजबूर हुए । मीटिंग में उपस्थित 12 काउंसिल सदस्यों में बैलेंसशीट को पास करने के पक्ष में छह सदस्यों का ही वोट मिला । सत्ता खेमे के लिए फजीहत की बात यह हुई कि काउंसिल के वाइस चेयरमैन विवेक खुराना ने भी बेईमानीपूर्ण खर्चों वाली बैलेंसशीट को पास करने का विरोध किया । बैलेंसशीट को पास कराने की जिद पर अड़े राकेश मक्कड़ ने तब चेयरमैन के रूप में अपना डिसाइडिंग वोट देते हुए बैलेंसशीट को पास कराया । न्याय का तकाजा तो यह कहता है कि जब राकेश मक्कड़ पर अपने भाई को बेईमानीपूर्ण तरीके से फायदा पहुँचाने का आरोप है, तब राकेश मक्कड़ को तो वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लेना चाहिए था - लेकिन वोटिंग में राकेश मक्कड़ अपने दो वोट गिनवाते हैं; और इस तरह अपनी तथा दूसरों की 'चोरी' को जस्टीफाई करते हैं ।
बैलेंसशीट को पास करने का विरोध कर रहे सदस्यों ने नितिन कँवर को खूब उलाहना भी दिया कि ब्रांचेज में और दूसरी जगहों पर भाषण देते हुए तो अपनी ईमानदारी का बड़ा ढोल पीटते हो, यहाँ लेकिन बेईमानों और काउंसिल में लूट-खसोट मचाने वालों का साथ दे रहे हो - नितिन कँवर पर लेकिन किसी उलाहने का असर नहीं पड़ा और उन्होंने 'मौसेरे भाई' वाली भूमिका ही निभाई । सत्ता खेमे के लोग बैलेंसशीट को पास करा लेने में तो आज कामयाब हो गए हैं, लेकिन विवाद अभी थमता हुआ दिख नहीं रहा है । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियता और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट की दिलचस्पी के बाद भी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में लूटखसोट को नियंत्रित नहीं किया जा पा रहा है, तो इससे लूटखसोट की प्रवृत्ति की जड़ों के दूर दूर तक फैले होने का आभास ही मिलता है । इस सारे विवाद से परिचित लोगों को हैरानी इस बात की भी है कि रीजनल काउंसिल के दो-तीन बेईमान पदाधिकारी-सदस्यों के सामने सेंट्रल काउंसिल सदस्य और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक लाचार क्यों बने हुए हैं ?

Saturday, August 5, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर की बदतमीजी पर विराम लगा और राकेश मक्कड़ विरोधी सदस्यों की माँगे मानने के लिए मजबूर हुए

नई दिल्ली । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में जो निर्लज्ज किस्म का लफंगापन प्रदर्शित किया, उसे रोकने के लिए काउंसिल सदस्यों को पुलिस बुलाने की धमकी देनी पड़ी - और तब मीटिंग में शांति स्थापित हो सकी और उसमें सदस्यों को अपनी अपनी बात कहने/रखने का मौका मिल सका । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल क्या, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि पदाधिकारियों के रवैये के खिलाफ काउंसिल  सदस्यों को ही पुलिस बुलाने की जरूरत महसूस हुई । मीटिंग में राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर के व्यवहार के बारे में जिस किसी ने भी सुना, उसकी यही प्रतिक्रिया रही कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में इन्हें वोट देने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने काउंसिल के लिए सदस्य चुने हैं या लफंगे चुने हैं ? राजेंद्र अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेक्रेटरी हैं और नितिन कँवर निकासा चेयरमैन हैं; यह दोनों यूँ तो मीटिंग में चीख-चिल्लाहट के जरिए और मेजें थपथपा कर शोर-शराबा करने तथा अपशब्दों व गालियों के जरिये दूसरों को चुप करने का काम करने के लिए कुख्यात रहे हैं, लेकिन कल की मीटिंग में तो इन दोनों ने हद ही कर दी - अपने लफंगई व्यवहार से यह दूसरे सदस्यों को लगातार अपमानित करते जा रहे थे और उन्हें बोलने ही नहीं दे रहे थे; इनके व्यवहार से दो-तीन बार तो ऐसे हालात बने कि लगा कि मीटिंग में मार-पिटाई हो जाएगी ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन द्वारा मीटिंग में भेजे गए ऑब्जर्वर्स की उपस्थिति की भी इन्होंने परवाह नहीं की । इनके व्यवहार से तंग आकर काउंसिल के कुछेक सदस्यों ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर से इनकी शिकायत की, उन्होंने लेकिन यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि मीटिंग में उन्होंने ऑब्जर्वर्स भेज दिए हैं और इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कर सकते हैं । शिकायत करने गए काउंसिल सदस्यों ने तब वी सागर को दो-टूक शब्दों में बता दिया कि आप कुछ नहीं कर सकते हैं, तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर रहे हैं और पुलिस बुला रहे हैं । यह बात कही तो गयी थी इंस्टीयूट के सेक्रेटरी वी सागर से उनके ऑफिस में, लेकिन यह बात तुरंत राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर तक पहुँची - जिसका नतीजा यह देखने में आया कि फिर इन्होंने मीटिंग में कोई बदतमीजी नहीं की और मीटिंग में सचमुच कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले हुए । लगता है कि इनके रिंग मास्टर राजेश शर्मा, जो मीटिंग के दौरान मीटिंग-स्थल के आसपास ही बने हुए थे और इन्हें लगातार निर्देश दे रहे थे, ने इन्हें चेता दिया होगा कि पुलिस को 'बेस' पसंद है और वह 'बेस' सुजा देती है, इसलिए अब कोई ऐसी हरकत न करना कि अपने अपने 'बेस' को सुजवा लो और बैठने लायक न रहो । राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने पॉवर ग्रुप के रिंग मास्टर राजेश शर्मा की चेतावनी को गंभीरता से लिया और अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए मीटिंग में अपनी बदतमीजी पर ब्रेक लगाया ।
इसके बाद मीटिंग का पूरा नजारा बदल गया । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों के लिए बार-बार माफी माँगी; अपने भाई को काउंसिल की कोचिंग क्लास देने के लिए उन्होंने मासूम-सा तर्क दिया कि उन्हें उस नियम के बारे में पता नहीं था जिसके अनुसार वह अपने भाई को क्लास नहीं दे सकते हैं । पिछले वर्ष के एकाउंट काउंसिल सदस्यों को ही दिखाने से लगातार इंकार करते रहे राकेश मक्कड़ फिर एकाउंट दिखाने के लिए भी राजी हो गए । रीजनल काउंसिल के हर उस फैसले के पूरे विवरण देने के लिए भी उन्होंने सहमति व्यक्त की, जिसमें पैसों का लेन-देन होता है । कल हुई नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग दरअसल इसीलिए महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि उसमें पॉवर ग्रुप की बेईमानियों के हिसाब-किताब के बारे में फैसला होना था । राजेश शर्मा द्वारा नियंत्रित और राकेश मक्कड़ द्वारा संचालित काउंसिल का पॉवर ग्रुप इसीलिए काउंसिल की मीटिंग करने से बच रहा था । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को बार बार मेल लिखे जा रहे थे कि वह हस्तक्षेप करें और रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाएँ, लेकिन इसके बावजूद मीटिंग करने से बचा जा रहा था । रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग करवाने की माँग करते हुए प्रेसीडेंट को मेल लिखना लगातार जारी रखा और उनकी बारहवीं मेल के बाद मीटिंग करने का फैसला हुआ ।
मीटिंग के लिए मजबूर होने के बाद भी राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की जोड़ी अपनी हरकत से बाज नहीं आई और उसने मीटिंग का एजेंडा तय नहीं होने दिया । काउंसिल के विरोधी सदस्यों को आभास था कि मीटिंग में हुड़दंगबाजी करके यह अपनी बेईमानियों के मामलों को एजेंडा नहीं बनने देंगे, इसलिए उन्होंने ऑब्जर्वर की माँग की । इंस्टीट्यूट प्रशासन ने दो ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिए । राजेश शर्मा की शह पर राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने ऑब्जर्वर्स की मौजूदगी की भी परवाह नहीं की और अपनी बदतमीजियों से मीटिंग में कोई बात ही नहीं होने दी । अपनी बदतमीजियों का निशाना बनाने से उन्होंने अपने ग्रुप के महत्त्वपूर्ण सदस्य और वाइस चेयरमैन विवेक खुराना तक को नहीं छोड़ा; विवेक खुराना का 'कुसूर' सिर्फ इतना था कि वह लगातार नियमानुसार काम करने की वकालत कर रहे थे - जो राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने विवेक खुराना को कई बार धमकाया । उनकी हरकतों के कारण एक-डेढ़ घंटे की मीटिंग छह घंटे चली - और छह घंटे की मीटिंग में भी कई-एक फैसले तब संभव हो सके जब पुलिस कार्रवाई की धमकी के बाद राजेंद्र अरोड़ा और नितिन कँवर ने अपने अपने 'बेस' की चिंता करते हुए अपनी बदतमीजियों पर ब्रेक लगाया ।
चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने कल हुई मीटिंग में काउंसिल के विरोधी खेमे के सदस्यों की कई माँगों को सिद्धांततः स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन विरोधी खेमे के कुछेक सदस्यों को शक है कि उन्हें सचमुच अमल में लाने से बचने के लिए वह कोई हरकत न कर दें, इसलिए वह राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथियों की हरकतों पर नजर रखने की जरूरत भी समझ रहे हैं । राकेश मक्कड़ अपनी हरकतों से अपनी और काउंसिल की खासी फजीहत करवा चुके हैं, और अपनी हरकतों पर पर्दा डालने की उनकी हर कोशिश लगातार फेल होती जा रही है - इससे उम्मीद हालाँकि यह भी की जा रही है कि इससे सबक लेते हुए राकेश मक्कड़ अब अपनी बात पर ईमानदारी से अमल करेंगे । देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ लगातार हो रही अपनी फजीहत से सचमुच सबक लेंगे या अपनी बेईमानीपूर्ण हरकतों को जारी रखेंगे ?

Friday, July 28, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को भरोसा है कि उन पर लग रहे मनमानी बेईमानियों के आरोपों से उन्हें इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे अवश्य ही बचा लेंगे

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल की लगातार दोहराई जाती माँग के दबाव में मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ अंततः रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं - और 4 अगस्त को रीजनल काउंसिल की मीटिंग के लिए घोषणा हो गयी है । इस माँग के चलते लगातार फजीहत का शिकार बन रहे राकेश मक्कड़ हालाँकि अभी भी अपनी मनमानी बेईमानियों को छिपाने और दबाने की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे हैं - और इसी कोशिश के चलते 4 अगस्त की मीटिंग के लिए उन्होंने कोई एजेंडा तय तथा घोषित नहीं किया है । इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, रीजनल काउंसिल का कोई सदस्य एजेंडे में कुछ जोड़ता है और काउंसिल के दो-तिहाई सदस्य उसका विरोध नहीं करते हैं, तो वह बात एजेंडे में शामिल होती है - लेकिन राकेश मक्कड़ किसी भी नियम को स्वीकारने तथा अपनाने से बचने का प्रयास कर रहे हैं और अपने ही मनमाने एजेंडे पर रीजनल काउंसिल की मीटिंग करना चाहते हैं । उन्हें अच्छी तरह पता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच उनकी हरकतों के खिलाफ बेहद नाराजगी है और मीटिंग में उनकी मनमानी चलेगी नहीं, जिस कारण मीटिंग में बबाल हो सकता है - इसके बावजूद राकेश मक्कड़ एजेंडे के मामले में नियमों का पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं ।
राकेश मक्कड़ चेयरमैन के रूप में मनमानी करने तथा काउंसिल में लूट-खसोट मचाने, और अपनी मनमानी लूट-खसोट को छिपाने/दबाने के लिए इंस्टीट्यूट के नियमों के साथ खिलवाड़ करने की ताकत सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा से प्राप्त कर रहे हैं । अपने नजदीकियों को उन्होंने आश्वस्त किया है कि रीजनल काउंसिल में वह भले ही अल्पमत में हैं, लेकिन अंततः मामला तो फिर इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट के पास ही जायेगा न, जहाँ राजेश शर्मा मामले को संभाल लेंगे । सीए डे फंक्शन के बबाल में इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट ने जिस तरह से राजेश शर्मा का बचाव किया, उसका उदाहरण देते हुए राकेश मक्कड़ लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि राजेश शर्मा के होते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थान के सेक्रेटरी वी सागर और प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने अपने व्यवहार और रवैये से अपनी ऐसी पहचान और औकात बना ली है कि एक रीजनल काउंसिल का एक बेईमान पदाधिकारी मनमानी कर रहा है और काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर ही दावा भी कर रहा है कि इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकेंगे ।
राकेश मक्कड़ पर इंस्टीट्यूट के नियमों की अवहेलना करते हुए इंस्टीट्यूट के पैसे को अपने भाई के हाथों लुटवा देने का गंभीर आरोप है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों ने ही इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को संबोधित ज्ञापन में खुलासा करते हुए आरोप लगाया है कि काउंसिल की तरफ से चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस में फैकल्टी नियुक्त करने के मामले में भारी बेईमानी की जा रही है, नियुक्ति के जरिए कमीशन खाया जा रहा है और चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने इंस्टीट्यूट के नियमों की अवहेलना करते हुए मनमानी शर्तों पर अपने भाई को भी फैकल्टी नियुक्त कर दिया । ज्ञापन में इंस्टीट्यूट के उक्त नियम को रेखांकित करते हुए - जिसके अनुसार काउंसिल के पदाधिकारी अपने रिश्तेदारों, पार्टनर्स व क्लाइंट्स को लाभ का कोई काम अलॉट नहीं कर सकते हैं - बताया गया है कि राकेश मक्कड़ ने अपने भाई राजेश मक्कड़ को काउंसिल द्वारा चलाई जा रही बहुत सी क्लासेस दीं, और उन्हें भुगतान करने के मामले में भी नियमों व चली आ रही व्यवस्था में मनमाने तरीके से परिवर्तन किया गया - जिसमें राजेश मक्कड़ को ज्यादा पैसा दिया गया, और काउंसिल को मिलने वाला पैसा घट गया है । इसके साथ-साथ, आरोप है कि चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ अपने भाई की कोचिंग को प्रमोट करने के काम में लगे हुए हैं, और इसमें वह अलग अलग तरीके से इंस्टीट्यूट के नाम को भी इस्तेमाल कर रहे हैं - और इस तरह इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों का उन्होंने मजाक बना कर रख दिया है । कोचिंग क्लासेस तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के प्रिंटिंग व फोटोकॉपी के काम देने में भी धाँधली के आरोप ज्ञापन में लगाए गए हैं ।
आरोपों की गंभीरता इस आरोप से लगाई/समझी जा सकती है कि कोचिंग क्लासेस में कैसे क्या हो रहा है, इस बात को काउंसिल सदस्यों से भी छिपाया जा रहा है - काउंसिल के ही सदस्यों का कहना है कि वह कई दिनों से पदाधिकारियों से पूछ/कह रहे हैं कि काउंसिल द्वारा चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस में किस तरह से नियुक्तियाँ और भुगतान हुए हैं, लेकिन उन्हें जबाव नहीं दिया जा रहा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को संबोधित ज्ञापन में कहा गया है कि काउंसिल के अकाउंट उन्हें दिखाने/बताने से तो बचा ही जा रहा है, उनके सवालों के जबाव भी नहीं दिए जाते हैं । यहाँ तक कि पिछले कार्यकारी वर्ष के आखिरी कुछ महीनों में कार्यकारी चेयरपरसन रहीं पूजा अग्रवाल बंसल तक से खर्चों के विवरण तथा अकाउंट छिपाए गए हैं । समझा जा सकता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ और उनके दो-तीन साथी पदाधिकारियों ने किस तरह से कब्जा किया हुआ है और वह मनमानी लूट-खसोट मचाए हुए हैं कि काउंसिल के दूसरे सदस्यों से ही उन्हें तथ्य छिपाने पड़ रहे हैं । चेयरमैन राकेश मक्कड़ की बेशर्मी और निर्लज्जता का आलम यह है कि अपने टीए/डीए के बिल उन्होंने नगद तक ले लिए हैं, जो काउंसिल के नियमों का खुला उल्लंघन है ।
राकेश मक्कड़ का प्रयास यह है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग में यह आरोप रिकॉर्ड पर न आ सकें, और इसके लिए ही वह मीटिंग के एजेंडे को अपने मनमाने तरीके से तय करना चाहते हैं । उनकी इस हरकत से मीटिंग में बबाल हो, और काउंसिल व इंस्टीट्यूट की फजीहत हो - उन्हें इसकी चिंता नहीं है । उन्हें भरोसा है कि राजेश शर्मा के साथ उनके कनेक्शन के कारण इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर और प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे अंततः उन्हें बचा लेंगे । राकेश मक्कड़ के भरोसे के बावजूद काउंसिल के सदस्यों ने भी उम्मीद और कोशिश नहीं छोड़ी है कि राकेश मक्कड़ जैसे बेईमान की दाल अब ज्यादा दिन तक गलती नहीं रह सकेगी । उनका कहना है कि राकेश मक्कड़ को आखिरकार रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा है न - जिससे कि वह लगातार बचते और इंकार करते आ रहे थे । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने इंस्टीट्यूट प्रशासन को 12वीं मेल लिखी थी, जिसके बाद राकेश मक्कड़ के लिए रीजनल काउंसिल की मीटिंग से बचना/भागना संभव नहीं रह गया । इस तरह राकेश मक्कड़ की मनमानी बेईमानियों के खिलाफ काउंसिल सदस्यों ने अपनी लड़ाई का पहला चरण जीत लिया है, उन्हें उम्मीद है कि आगे भी सच्चाई की ही जीत होगी ।

Tuesday, July 25, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग में सदस्यों की सीधी सीधी लताड़ खाने वाले नीलेश विकमसे ने पहले प्रेसीडेंट बनने का रिकॉर्ड बनाया

नई दिल्ली । 24 जुलाई की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे तक चली सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग में जो हुआ, वह इंस्टीट्यूट के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ - और इस मीटिंग में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की जैसी फजीहत हुई, वैसी इससे पहले किसी प्रेसीडेंट की नहीं हुई है । अपनी करतूतों और कारस्तानियों के खुलासे पर नीलेश विकमसे को पचासों बार सॉरी सॉरी कहना पड़ा । कई काउंसिल सदस्यों को हैरानी है कि नीलेश विकमसे को काउंसिल सदस्यों से जो और जैसी लताड़ सुनने को मिली, उसके बाद भी वह प्रेसीडेंट पद पर बने क्यों हुए हैं ? काउंसिल सदस्यों का ही कहना है कि नीलेश विकमसे में यदि जरा सा भी आत्म सम्मान होता, तो वह कल ही अपने पद से इस्तीफा दे देते । काउंसिल सदस्यों की जली-कटी सुनते हुए नीलेश विकमसे ने बीच-बीच में यह तो कहा कि मुझसे यदि इतनी ही शिकायत है तो मेरे खिलाफ शिकायत करो और कार्रवाई करो/करवाओ - लेकिन इस बात पर उन्होंने कतई गौर नहीं किया कि सीए डे फंक्शन से जुड़े मामले में काउंसिल सदस्यों की शिकायतों का यदि सचमुच कोई आधार नहीं है, तो उन्हें बार बार माफी क्यों माँगना पड़ रही है । विजय गुप्ता ने उनके नेतृत्व को पूरी तरह असफल बताया । रंजीत अग्रवाल ने पिछले प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी के कार्यकाल को अच्छा बताते हुए उन पर सीधा हमला किया । तरुण घिया ने आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में कमेटियों को स्वतंत्रता से काम नहीं करने दिया जा रहा है, जिसकी परिणति सीए डे फंक्शन की बदइंतजामी और बेईमानी में हुई । 
इस तरह की बातों से नीलेश विकमसे तिलमिलाए तो बहुत, लेकिन उनका आत्मसम्मान एक बार भी नहीं जागा । नीलेश विकमसे के लिए मुसीबत की बात यह बनी कि मीटिंग्स में हमेशा सौम्यता से अपनी बात रखने/कहने वाले संजय वासुदेवा, प्रेसीडेंट के निकट रहने की कोशिश करते रहने वाले अतुल गुप्ता, अपनी वरिष्ठता की गरिमा के अनुरूप व्यवहार करने वाले संजय अग्रवाल, हमेशा चुप बने रहने वाले देवाशीष मित्रा ने भी नीलेश विकमसे की 'धुलाई' में खासी दिलचस्पी ली; काउंसिल में नीलेश विकमसे के बहुत खास और उनके 'ट्रवल शूटर' समझे जाने वाले अनिल भंडारी मीटिंग में आए ही नहीं । नीलेश विकमसे को जिन सदस्यों से तरफदारी की उम्मीद थी, उन्होंने बेसिरपैर की बातें करते हुए टाइम पास करने का काम तो किया लेकिन नीलेश विकमसे की तरफदारी करने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई । मीटिंग में सबसे मजेदार रवैया राजेश शर्मा का रहा । मुद्दे पर बात करने में तो उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं ली; दो-तीन बार लेकिन उन्होंने यह रोना जरूर रोया कि सीए डे फंक्शन की बदइंतजामी और बेईमानी के लिए उन्हें ही क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उनका कुसूर क्या है जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उन्हें चोर और दलाल कहा जा रहा है । उनकी इन बातों को 'चोर की दाढ़ी में तिनके' के उदाहरण के रूप में देखा गया । कहा/पूछा भी गया कि यहाँ उन्हें कौन जिम्मेदार ठहरा रहा है, या कौन उन्हें चोर और दलाल कह रहा है - सोशल मीडिया में उनके बारे में यदि यह सब कहा जा रहा है, तो उन्हें वहाँ जबाव देना चाहिए; वहाँ तो लेकिन वह छिपते/बचते फिर रहे हैं ।
सीए डे फंक्शन में हुई बदइंतजामी और बेईमानी को लेकर मीटिंग में मोर्चा खोला धीरज खंडेलवाल और विजय गुप्ता ने । फंक्शन की तैयारी और व्यवस्था से जुड़े उनके सवालों ने नीलेश विकमसे को तरह तरह से परेशान किया और नीलेश विकमसे सॉरी सॉरी कहते हुए अपने आप को बचाने की कोशिश करते रहे । धीरज खंडेलवाल की तो बदकिस्मती रही कि उन्हें वेस्टर्न रीजन के अपने साथियों से कोई सहयोग नहीं मिला, किंतु विजय गुप्ता को अपने अभियान में नॉर्दर्न रीजन के सदस्यों से अप्रत्याशित सहयोग और समर्थन मिला । उल्लेखनीय है कि काउंसिल की अंदरूनी राजनीति में संजय अग्रवाल और अतुल गुप्ता को विजय गुप्ता के विरोधियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन सीए डे फंक्शन में हुई बदइंतजामी और बेईमानी को लेकर विजय गुप्ता ने मीटिंग में जो सवाल उठाए - संजय अग्रवाल और अतुल गुप्ता ने उनका जोरदार समर्थन किया और उन्हें दोहराया । विजय गुप्ता ने नीलेश विकमसे से सवाल किया कि सीए डे फंक्शन की तैयारी और व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर अलग अलग तारीखों में उन्होंने चार मेल लिखे, लेकिन उन्हें एक भी मेल का जबाव नहीं मिला । संजय अग्रवाल और अतुल गुप्ता ने इसी बात को आधार बना कर नीलेश विकमसे को घेरा कि इससे ही लगता है कि वह सवालों से बचना चाहते हैं और सच्चाई को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं । बात को बढ़ता देख विजय गुप्ता की शिकायत पर नीलेश विकमसे ने माफी माँग ली । 
नीलेश विकमसे को वेस्टर्न रीजन के कुछेक तथा सेंट्रल रीजन के सभी सदस्यों से लेकिन 'अच्छा' समर्थन मिला, जिन्होंने टाइम पास करके नीलेश विकमसे पर होने वाले हमलों की धार को कुंद करने का काम किया । मुकेश कुशवाह ने भाषण तो बड़ा लंबा सा दिया, किंतु बातों की उन्होंने जो जलेबी सी बनाई - उसे जो सुन ले, तो उसे यह समझने में देर नहीं लगेगी कि उनके जैसे लोग जब सेंट्रल काउंसिल में होंगे - तो इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन का बेड़ा ही गर्क होगा । यह महज इत्तफाक नहीं है कि काउंसिल में मुकेश कुशवाह और राजेश शर्मा की जोड़ी रंगा-बिल्ला की जोड़ी के रूप में (कु)ख्यात है । मीटिंग में कई काउंसिल सदस्यों ने जिस तरह से बेसिरपैर की लंबी लंबी बातें कीं, उससे आभास मिला है कि नीलेश विकमसे ने अपने बचाव के लिए पहले से ही रणनीति बनाई हुई थी कि उनके समर्थक सदस्य मीटिंग को लंबा खींचेंगे, ताकि किसी नतीजे पर पहुँचा ही नहीं जा सके । धीरज खंडेलवाल और विजय गुप्ता ने मीटिंग के शुरू में ही जो आक्रामक रवैया दिखाया, उसके चलते किसी भी सदस्य के लिए नीलेश विकमसे की तरफदारी करना तो संभव नहीं हो सका, लेकिन मीटिंग को लंबा खींच कर मामले को दफ़्न करने/करवाने में नीलेश विकमसे जरूर सफल हो गए । सुबह दस बजे शुरू हुई मीटिंग में 30 के करीब सदस्य उपस्थित थे, लेकिन मीटिंग जब देर रात तक खिंचती गई - तब 14/15 सदस्य ही बचे रह गए थे । नीलेश विकमसे मीटिंग को किसी नतीजे पर पहुँचने ही नहीं दे रहे थे और तब नीलेश विकमसे के माफीनामे और इस आश्वासन के साथ मीटिंग समाप्त हुई कि जैसी पक्षपातपूर्ण बेवकूफियाँ और बेईमानियाँ उन्होंने इस बार की हैं, वैसी वह आगे नहीं करेंगे ।
नीलेश विकमसे ने किसी कार्रवाई से तो अपने आप को और राजेश शर्मा को बचा लिया है, लेकिन राजेश शर्मा पर चोर और दलाल होने के आरोप का जो शोर है, उससे और राजेश शर्मा को बचाने के चक्कर में अपनी हो रही फजीहत से वह नहीं बच सके हैं - और इस मामले में इंस्टीट्यूट के 68 वर्षों के इतिहास में कल हुई मीटिंग इंस्टीट्यूट के पिछले और आगे आने वाले प्रेसीडेंट्स के लिए एक उदाहरण भी होगी और एक सबक भी । काउंसिल में नीलेश विकमसे के समर्थक व शुभचिंतक सदस्यों तक का भी मानना और कहना है कि भारी फजीहत के बाद भी नीलेश विकमसे प्रेसीडेंट पद पर बने रहना भले ही चाहते हों, लेकिन काउंसिल में उनकी विश्वसनीयता और सम्मान जरा भी बचा नहीं रह गया है ।

Tuesday, July 11, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की खुली तरफदारी के बावजूद कल की मीटिंग में राजेश शर्मा के खिलाफ हुई नारेबाजी से लगता नहीं है कि राजेश शर्मा को जलालत भरी मुसीबत से जल्दी ही छुटकारा मिल सकेगा ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट मुख्यालय में छह दिन बाद दूसरी बार 'राजेश शर्मा हाय हाय' और 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे गूँजे । फर्क यह रहा कि पिछली बार राजेश शर्मा ने जब यह नारे सुने थे, तब वह अलमारियों के पीछे छिप-छिपा कर और खिड़कियों से कूद-फांद कर मुख्यालय से भाग गए थे - लेकिन अब की बार उन्हें भागने का मौका नहीं मिला । कुछ लोगों का कहना है कि इस बार उन्हें भागना था भी नहीं; इस बार उन्हें साबित करना था कि उनकी चमड़ी बड़ी मोटी है और इस तरह के नारों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है । राजेश शर्मा को इस बार इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे और इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर सहित सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों की मौजूदगी में अपने खिलाफ होने वाली नारेबाजी को झेलना पड़ा । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन विवेक खुराना तथा निकासा चेयरमैन नितिन कँवर के साथ-साथ ट्रेजरर सुमित गर्ग और सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा तक ने राजेश शर्मा के खिलाफ जो स्टैंड दिखाया, उसने कई लोगों को चौंकाया; क्योंकि इन चारों को राजेश शर्मा के नजदीकी और समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है; इन चारों को चूँकि किसी भी मामले में मुखर होते हुए भी कभी नहीं देखा गया - इसलिए प्रेसीडेंट और सेक्रेटरी की मौजूदगी में राजेश शर्मा की कारस्तानियों को लेकर इनकी मुखरता ने हर किसी का ध्यान खींचा । वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि इंस्टीट्यूट के 68 वर्षों के इतिहास में इतनी बेइज्जती किसी सेंट्रल काउंसिल सदस्य की नहीं हुई है, जितनी राजेश शर्मा की हुई है और हो रही है - और सार्वजनिक रूप से हो रही है ।
मजे की बात लेकिन यह है कि राजेश शर्मा और उनके समर्थक आश्वस्त हैं कि उनका यह 'बुरा' समय जल्दी ही बीत जाएगा और कुछ दिनों में ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भूल जायेंगे कि इस वर्ष के 'सीए डे' में उनके साथ क्या हुआ ? अपने आश्वस्त होने का कारण बताते हुए वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट ही नहीं, बल्कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के रवैए को भी वह रेखांकित कर रहे हैं । राजेश शर्मा के समर्थकों का कहना है कि कल हुई मीटिंग में सभी ने देखा कि प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने कैसे राजेश शर्मा की वकालत की और सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुँह पर ताला डाले हुए चुपचाप बैठे रहे । राजेश शर्मा के समर्थकों का कहना है कि यह इस बात का सुबूत है कि राजेश शर्मा ने प्रेसीडेंट और सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को तो 'सेट' कर लिया है; उनकी तरफ से तो उन्हें कोई खतरा नहीं होगा - रही बात छुटभैये चार्टर्ड एकाउंटेंट्स नेताओं की, तो वह भी आखिर कब तक गला फाड़ सकेंगे ? राजेश शर्मा के समर्थकों का कहना है कि इंस्टीट्यूट के पिछले चुनाव में हार चुके कुछेक नेता इस उम्मीद में राजेश शर्मा के खिलाफ माहौल बनाए हुए हैं, कि इससे लोगों के बीच अपनी सक्रियता दिखाते हुए उनके लिए अगले चुनाव में जीत हासिल कर पाना आसान हो जाएगा - लेकिन ऐसे लोगों से राजेश शर्मा को कोई खतरा नहीं है ।
राजेश शर्मा और उनके समर्थक भले ही बेशर्मी के साथ 'बहादुरी' दिखाने की कोशिश कर रहे हैं और इस उम्मीद में हैं कि उनके खिलाफ मुखर बनी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी जल्दी ही खत्म हो जाएगी; लेकिन सात दिन के भीतर ही राजेश शर्मा को इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के सामने ही जिस तरह की जलालत झेलनी पड़ी - उसे देख कर दूसरे लोगों को लगता नहीं है कि राजेश शर्मा के बुरे दिन जल्दी ही खत्म होंगे । राजेश शर्मा की कारस्तानियों को और उन कारस्तानियों के चलते उनके खिलाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पैदा हुई नाराजगी को देखते हुए उनके कई समर्थकों ने जिस तरह से उनके साथ दूरी बना ली है, उससे राजेश शर्मा का संकट काफी बढ़ गया है । राजेश शर्मा ने अपने रवैये और अपने व्यवहार से तमाम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को, खासतौर से इंस्टीट्यूट की राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को नाराज किया हुआ है - उन्हें 'सीए डे' के हादसे के चलते राजेश शर्मा से बदला लेने का अच्छा मौका मिला है, जिसे वह किसी भी तरह से खोना नहीं चाहेंगे । राजेश शर्मा के विरोधियों को लगता है कि इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने तो राजेश शर्मा के सामने समर्पण किया हुआ है, इसलिए उनसे तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह राजेश शर्मा की नकेल कस सकें; लेकिन विरोधियों को लगता है कि राजेश शर्मा के खिलाफ यदि माहौल बनाए रखा गया तो अगले प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता को जरूर इस बात के लिए 'तैयार' किया जा सकेगा कि अगले वर्ष के अपने प्रेसीडेंट-काल में वह राजेश शर्मा को कोई तवज्जो न दें - और बिना तवज्जो के राजेश शर्मा की हालत जल बिन मछली वाली ही हो जाएगी ।
प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की खुली तरफदारी करने और सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के मौन समर्थन के बावजूद कल की मीटिंग में लोगों ने राजेश शर्मा को जिस तरह से बोलने तक नहीं दिया, और बोलने की उनकी हर कोशिश को उनके खिलाफ नारेबाजी तथा भद्दे कमेंट करके विफल कर दिया - उसे देख/जान कर लगता है कि राजेश शर्मा के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी की जड़ें काफी फैल गईं हैं और राजेश शर्मा को जलालत भरी मुसीबत से जल्दी ही छुटकारा मिलने की उम्मीद नहीं है ।

Saturday, July 8, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने अपने भाई कमलेश विकमसे से प्रोफेशनली आगे निकलने की 'तैयारी' में सीए डे के फंक्शन को तमाशा बनाया क्या ?

नई दिल्ली । 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के मामलों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की मिलीभगत के किस्से इंस्टीट्यूट के मुख्यालय के गलियारों में भी जिस तरह से सुने/सुनाए जा रहे हैं, उससे लग रहा है कि नीलेश विकमसे की मुसीबतें अभी जल्दी से खत्म होने वाली नहीं हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नोमीनेटेटड सदस्यों ने नीलेश विकमसे को 'बचाने' के लिए प्रयास तो शुरू कर दिए हैं, लेकिन नीलेश विकमसे को लेकर जिस तरह की 'नई' 'नई' बातों का खुलासा हो रहा है - उससे लगता नहीं है कि नीलेश विकमसे की परेशानियाँ जल्दी समाप्त होंगी । कई लोगों को लग रहा है कि उनकी परेशानियों को बढ़ाने का काम 'सीए डे' फंक्शन के मुख्य खलनायक राजेश शर्मा और इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर की तरफ से भी हो रहा है । ऐसा मानने और कहने वाले लोगों का तर्क है कि दरअसल इन दोनों को डर है कि नीलेश विकमसे अपने आप को बचाने के लिए कहीं इन्हें ही बलि का बकरा न बना दें, इसलिए इन्होंने नीलेश विकमसे को संकेत देना शुरू कर दिया है कि उन्होंने यदि इन्हें फँसा कर अपने आप को बचाने की कोशिश की तो यह उन्हें भी नहीं छोड़ेंगे । नीलेश विकमसे के शुभचिंतकों को भी लग रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के मामलों में फँसने से बचने के लिए राजेश शर्मा और वी सागर की तरफ से उन्हें 'ब्लैकमेल' करने के प्रयास हो रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि राजेश शर्मा तो अभी हालाँकि 'फरार' ही चल रहे हैं, जिस कारण सोशल मीडिया में उनकी तरफ से सूनापन ही फैला/बना हुआ है - लेकिन उनके नजदीकियों ने चर्चाओं का बाजार पूरी तरह गर्म बनाया हुआ है । उनकी तरफ से ही पूछने के अंदाज में बताया जा रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन में राजेश शर्मा के परिवार की मौजूदगी की तो बातें की जा रही हैं, लेकिन नीलेश विकमसे के परिवार की उपस्थिति की बात कोई क्यों नहीं कर रहा है ? राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से ही बताया और पूछा जा रहा है कि नीलेश विकमसे का पूरा परिवार - उनके भाई और उनके अपने एकल परिवार के सदस्य फंक्शन में शामिल होने के लिए मुंबई से दिल्ली पहुँचे थे; उनके आने-जाने के किराए और दिल्ली में आने-जाने तथा ठहरने के खर्च किस मद से हुए हैं - यह सवाल क्यों नहीं चर्चा में हैं ? राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से सबसे गंभीर बात यह की जा रही है कि 'सीए डे' फंक्शन का जो स्वरूप बना, उसे पूरी तरह से नीलेश विकमसे ने तैयार किया था और उनका असली मकसद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को खुश करना था - जिनसे उन्हें प्रेसीडेंट पद से हटने के बाद महत्त्वपूर्ण नियुक्तियों के रूप में फायदा उठाना था । इस बात से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच नीलेश विकमसे की अपने भाई कमलेश विकमसे के साथ होने/चलने वाली प्रोफेशनल होड़ की बात एक बार फिर मुखर हो उठी है ।
उल्लेखनीय है कि वेस्टर्न रीजन के लोग दिल्ली के लोगों को बताते रहे हैं कि काउंसिल में आने का नीलेश विकमसे का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि उन्हें अपने भाई कमलेश विकमसे से प्रोफेशनली आगे 'निकलना' है । अन्य कई लोगों की तरह नीलेश विकमसे भी मानते हैं कि कमलेश विकमसे का सितारा इंस्टीट्यूट की काउंसिल का सदस्य बनने और फिर प्रेसीडेंट बनने के बाद ही बुलंद हुआ है । नीलेश विकमसे को उम्मीद रही कि काउंसिल में आने/रहने के चलते जिस तरह कमलेश विकमसे के लिए 'तरक्की' के रास्ते खुले, वैसे ही उनके लिए भी रास्ते बनेंगे और खुलेंगे । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे ने अपनी तरक्की के रास्ते को खोलने/खुलवाने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ही 'सीए डे' फंक्शन के स्वरूप को ही पूरी तरह बदल दिया और उसे तमाशे का रूप दे दिया । राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मुख्य तौर पर नीलेश विकमसे ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, राजेश शर्मा ने तो उनकी सिर्फ मदद की है । दिलचस्प नजारा यह देखने को मिल रहा है कि राजेश शर्मा के नजदीकी सिर्फ राजेश शर्मा की ही वकालत नहीं कर रहे हैं, बल्कि इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर को भी यह कहते हुए 'बचाने' के लिए माहौल बना रहे हैं कि सेक्रेटरी ने तो वही किया जो प्रेसीडेंट ने उन्हें करने को कहा - इसमें सेक्रेटरी की भला क्या गलती है ?
प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को बदनाम करने की राजेश शर्मा के नजदीकियों की कार्रवाई के पीछे राजेश शर्मा का ही दिमाग देखा/पहचाना जा रहा है; और माना जा रहा है कि इस तरह से राजेश शर्मा ने नीलेश विकमसे को 'ब्लैकमेल' करने की तैयारी की है, ताकि नीलेश विकमसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न कर सकें । राजेश शर्मा ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर की मदद करने/करवाने के जरिए उन्हें भी अपने साथ मिला लेने की चाल चली है । उल्लेखनीय है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के लिए राजेश शर्मा को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है, और जमकर उनकी लानत/मनालत हो रही है - जिसके कारण उन्हें लोगों की नजरों से छिपछिपा कर रहना पड़ रहा है । उन्हें जानने वालों का कहना लेकिन यह है कि राजेश शर्मा की चमड़ी बड़ी मोटी है, अभी हो रही लानत/मनालत से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा होगा; वह तो बस मौके का इंतजार कर रहे होंगे कि लोगों का गुस्सा शांत हो और वह फिर अपनी कारस्तानियों को खुल कर शुरू करें । अभी पर्दे के पीछे रहते हुए उन्होंने अपने नजदीकियों को काम पर लगाया हुआ है, जो प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की पोल-पट्टी खोलने में लगे हुए हैं । राजेश शर्मा का लगता है कि नीलेश विकमसे को दबाव में लेकर ही वह अपने आप को बचा सकेंगे ।

Wednesday, July 5, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के असली गुनहगारों के खिलाफ सचमुच कोई कार्रवाई करवा सकेंगे या मामला यूँ ही रफा दफा हो जाएगा ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता की पहल ने 'सीए डे' के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी पर विरोध के मुद्दे को प्रभावी और निर्णायक रूप देने का जो काम किया, उसके चलते काउंसिल के बाहर के नेताओं से नेतागिरी करने/दिखाने का मौका छिनता दिख रहा है । विजय गुप्ता की पहल को सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व कर रहे संजय अग्रवाल, अतुल गुप्ता, संजीव चौधरी और संजय वासुदेव का जो समर्थन मिला - उससे भी मुद्दे की लड़ाई सेंट्रल काउंसिल में ही केंद्रित होती हुई दिख रही है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने भी चूँकि इन पाँचों सेंट्रल काउंसिल सदस्यों पर भरोसा करना/दिखाना शुरू किया है, इसलिए भी विरोध की बागडोर काउंसिल के बाहर के नेताओं के हाथ से छूटती/फिसलती नजर आ रही है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरमैन पूजा बंसल और उनके पति मोहित बंसल की सक्रियता के कारण रीजनल काउंसिल में भी ग्यारह सदस्य खेमेबाजी की सीमाओं को तोड़ते हुए 'सीए डे' के नाम पर हुई घटनाओं के खिलाफ इकट्ठा हो गए हैं । रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ और अगले वर्ष चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे पंकज पेरिवाल जरूर अभी भी राजेश शर्मा को बचाने के प्रयासों में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी ज्यादा चल नहीं पा रही है ।
उल्लेखनीय है कि 'सीए डे' के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के खिलाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गुस्से को संगठित रूप देने के लिए तीन जुलाई को इंस्टीट्यूट मुख्यालय में प्रदर्शन करने/बुलाने की पहल वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट मोहित बंसल ने की - उन्होंने घटना वाले दिन के विवरण तथा तस्वीरों के साथ एक बड़ा मेल-संदेश चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भेजने का काम तो किया ही, साथ ही प्रदर्शन के लिए पुलिस अनुमति लेने का औपचारिक काम भी किया । मजेदार नजारा यह रहा कि मोहित बंसल ने जब सारी तैयारी कर ली और प्रदर्शन के लिए माहौल बना दिया, तब प्रदर्शन में भागीदारी और नेतागिरी 'दिखाने' के लिए ऐसे कुछ लोग कूद पड़े - जो रीजनल काउंसिल के पिछले चुनाव में हार गए थे और अगले चुनाव में उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । उन्हें लगा कि अगले वर्ष होने वाले अगले चुनाव में अपना 'चार्टर्ड एकाउंटेंट्स समर्थक' चेहरा दिखाने के लिए कुछ काम कर लेने का यह अच्छा मौका है । इनमें सबसे दिलचस्प स्थिति रतन सिंह यादव की देखने को मिली - वह 'सीए डे' की तैयारी में भी जबर्दस्ती घुस कर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'सूटेडबूटेड' के ड्रेस कोड में पहुँचने का आह्वान कर रहे थे, और विरोध प्रदर्शन में भी आगे आगे 'दिखने' की कोशिशों में लगे थे । उनके दोहरे रवैये पर सोशल मीडिया में उन पर लताड़ पड़ी, तो वह अपने रवैये पर माफी माँगते हुए भी नजर आए और उन्होंने अपनी टाइमलाइन से 'सूटेडबूटेड' वाली पोस्ट भी हटा ली । रतन सिंह यादव अपनी टाइमलाइन पर विभिन्न नेताओं को अक्सर निशाना बनाते रहते हैं, लेकिन जो नरेंद्र मोदी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सीधी चमाट मार कर बेइज्जत कर गए, उनके बारे में रतन सिंह यादव चुप्पी साध गए हैं - और उसके बाद भी वह अपने आप को चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का शुभचिंतक बताने/दिखाने का प्रयास कर रहे हैं ।
रतन सिंह यादव जैसे लोगों के कारण ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने काउंसिल के पदाधिकारियों पर ही भरोसा करना ज्यादा उचित समझा । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए जिम्मेदारी का चोला पहना और नाराज व गुस्से से भरे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से संवाद स्थापित किया - विजय गुप्ता मामले के कुछेक प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ईमेल लिखकर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की भूमिका को जिम्मेदार बनाने की नींव रख चुके थे, अतुल गुप्ता ने नारेबाजी कर रहे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को आगे की रणनीति बनाने पर बात करने के लिए तैयार करने के लिए मशक्कत की और संजय अग्रवाल ने अपनी वरिष्ठता का वास्ता देकर माहौल को इमोशनल टच दिया । संजीव चौधरी और संजय वासुदेव की उपस्थिति और सक्रिय समर्थन ने उन्हें बल दिया । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने स्वीकार किया कि 'सीए डे' के आयोजन को लेकर जो अव्यवस्था हुई, उसका वह पहले से अनुमान लगा सकने में असफल रहे; और उनकी यह असफलता इसलिए रही क्योंकि 'सीए डे' के आयोजन से जुड़ी तैयारी में उन्हें ज्यादा शामिल ही नहीं किया गया । उन्होंने स्वीकार किया कि अब जो बातें और जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे पता चल रहा है कि 'सीए डे' की तैयारी में ही भारी घपला था और इसीलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों तक से बातें छिपाई गयीं । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने आंदोलनरत चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भरोसा दिलाया कि तैयारी के नाम पर जो भी गड़बड़ियाँ हुईं हैं, उनके बारे में वह चुप नहीं बैठेंगे और इसीलिए वह सेंट्रल काउंसिल की इमरजेंसी मीटिंग तत्काल बुलाने की माँग करने जा रहे हैं ।
'सीए डे' फंक्शन की तैयारी के नाम पर दरअसल जो कुछ होने के तथ्य अब सामने आ रहे हैं, उन्होंने दूसरे लोगों के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को भी चौंकाया है । किसी की भी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि फंक्शन स्थल पर जब उपलब्ध सीटों की संख्या ही बीस हजार के करीब थी, तो 42 हजार पास बाँटने और इक्यावन हजार रजिस्ट्रेशन करने की क्या जरूरत थी - और ऐसा करने का फैसला आखिर था किसका ? सेंट्रल काउंसिल सदस्य इंस्टीट्यूट मुख्यालय में हुई उस मीटिंग के होने को लेकर खासे आंदोलित दिखे जिसमें इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर, राजेश शर्मा और गौरव अग्रवाल के साथ मिल कर फंक्शन में किराए के लोगों को लाने की बात कर रहे हैं और किराए के लोगों की जिम्मेदारियाँ तय कर रहे हैं । सवाल है कि वी सागर आखिर क्यों और किसके कहने पर 'सीए डे' फंक्शन में स्टूडेंट्स के नाम पर किराए के लोगों को लाने की व्यवस्था में जुटे थे; और वी सागर इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी हैं या राजेश शर्मा और गौरव अग्रवाल के सेक्रेटरी हैं ? विजय गुप्ता ने लोगों के बीच आश्चर्य प्रकट किया कि 'उस' मीटिंग के समय वह इंस्टीट्यूट मुख्यालय में मौजूद थे, लेकिन उन्हें भी उस मीटिंग की भनक तक नहीं लगी । सेंट्रल काउंसिल सदस्य इस बात पर भी हैरान हैं कि उनके साथ हुई बातचीत में खुद प्रेसीडेंट ने प्रोटोकॉल की व्यवस्था तय की थी और बताई थी, जिसके अनुसार मंच पर नरेंद्र मोदी का स्वागत करने के दौरान सिर्फ प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट को रहना था - तब फिर उस दौरान राजेश शर्मा मंच पर कैसे पहुँच गया ? इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व कर रहे इन पाँचों सदस्यों ने आंदोलनरत चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भरोसा दिया/दिलाया कि इन तथा इन जैसे अन्य कई सवालों के जबाव वह प्रेसीडेंट से लेने का काम करेंगे ।
आंदोलनरत चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने इन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्वारा दिए/दिलाए गए भरोसे पर भरोसा तो किया है, लेकिन वह इनकी गतिविधियों और इनके रवैए पर नजर रखने की भी तैयारी में हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का मानना और कहना है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर जो तमाशा हुआ है, उसके कारण इन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को भी काफी कुछ सहना पड़ा है; राजेश शर्मा की कारस्तानियों तथा प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे का उनके सामने किए गए समर्पण ने इंस्टीट्यूट का नाम खराब करने के साथ-साथ इन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए भी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खराब स्थितियाँ बनाई हैं - इसलिए इस मामले को यह आसानी से तो नहीं खत्म होने देंगे, लेकिन फिर भी यह देखना जरूरी होगा कि यह आखिर करते क्या हैं ? 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के असली गुनहगारों के खिलाफ सचमुच कोई कार्रवाई हो सकेगी या मामला यूँ ही रफा दफा हो जाएगा - यह अब सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के रवैए पर ही निर्भर करेगा ।

Monday, July 3, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की काउंसिल के सदस्य अपने प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे का राजेश शर्मा के सामने 'समर्पण' चुपचाप क्यों देखते रहे ?

नई दिल्ली । 'सीए डे' फंक्शन की बदइंतजामी तथा फंक्शन-स्थल के बाहर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ हुए अपमानजनक व हिंसक व्यवहार के खिलाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का गुस्सा आज दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में देखने को मिला । सोशल मीडिया में आ रही प्रतिक्रियाओं से यह आभास तो मिल रहा था कि आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों से बुरी तरह नाराज हैं, लेकिन उनकी नाराजगी की संगठित अभिव्यक्ति का जो नजारा इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में आज देखने को मिला - वह सचमुच इस बात का गवाह रहा कि 'सीए डे' फंक्शन में जो हुआ, उसकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को गहरी चोट पड़ी/लगी है । 'सीए डे' फंक्शन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर जो बीती, उसके लिए मुख्य तौर पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा को जिम्मेदार ठहराया गया, और इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में उनके खिलाफ जहाँ-तहाँ जमकर नारेबाजी हुई । राजेश शर्मा को भी शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनकी कारस्तानियों और करतूतों के खिलाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच कितना तीखा गुस्सा बना है - और इसीलिए वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के विरोध प्रदर्शन के दौरान मुख्यालय पहुँचे । उन्हें देखकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स जिस तरह भड़के और उनके खिलाफ गालियों और अपशब्दों की बौछार करने लगे - उसमें अपने लिए खतरा भाँप कर राजेश शर्मा अलमारियों के पीछे छिप-छिपा कर और खिड़कियों से कूद-फांद कर मुख्यालय से भागे और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गुस्से से उन्होंने बड़ी मुसीबत से अपने आप को बचाया ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने भी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गुस्से की गर्मी को पहचाना है, और इसलिए ही वह - दो दिन बाद ही सही - 'सीए डे' फंक्शन में हुई घटनाओं के लिए माफी माँगने के  मजबूर हुआ । लेकिन अपने माफीनामे में भी इंस्टीट्यूट प्रशासन अपनी शातिराना चाल चलने/दिखाने से बाज नहीं आया है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और सेक्रेटरी की तरफ से जो माफीनामा सामने आया है, उसमें 'सीए डे' फंक्शन में घटी घटनाओं के लिए प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया गया है । विडंबना की और मजे की बात यह है कि अभी तक भी कोई भी समस्या की मुख्य वजहों को पहचानने की कोशिश करता हुआ नहीं दिख रहा है - न तो काउंसिल के लोग और न विरोध करने वाले लोग । उल्लेखनीय है कि 'सीए डे' से तीन दिन पहले ही, 28 जून को 'रचनात्मक संकल्प' ने रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ही हवाले से कहा/बताया गया था कि प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे 'सीए डे' जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन को अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, और इसके लिए उन्होंने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'किराए का आदमी' बना दिया है । दरअसल जैसे ही यह तथ्य सामने आए कि 'सीए डे' फंक्शन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को लाने/पहुँचाने के लिए बसों की व्यवस्था की गयी है, वैसे ही यह संकेत मिल गया था कि उक्त फंक्शन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपमानित करने की 'तैयारी' कर ली गयी है । इंस्टीट्यूट में राजनीति करने वाले नेता लेकिन इस महत्त्वपूर्ण संकेत को या तो पढ़/समझ नहीं पाए और या अपने अपने स्वार्थ में जानबूझ कर इसकी अनदेखी कर बैठे ।
चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गुस्से का निशाना बन रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य बड़ी मासूमियत से पूछ रहे हैं कि जो हुआ, उसमें उनका क्या कसूर है ? कोई इनसे पूछे कि सेंट्रल काउंसिल में आप लोग क्या मंजीरे बजाने के लिए बैठे हो ? इंस्टीट्यूट के एक बड़े फंक्शन की तैयारी हो रही है, जिसका चार्ज प्रेसीडेंट ने काउंसिल के एक 'युवा' सदस्य राजेश शर्मा को दे दिया है - और काउंसिल सदस्य मुँह पर पट्टी बाँधे बैठे रहे । प्रोफेशन के लोगों के बीच राजेश शर्मा की पहचान एक 'सामान्य किस्म के दलाल' की है - जो सरकार और सरकारी पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के साथ खिंचवाई गयी तस्वीरों को दिखा दिखा कर अपना 'धंधा' करता है । इंस्टीट्यूट की काउंसिल के सदस्य भी उसकी इस पहचान से परिचित हैं - लेकिन फिर भी सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने इस बात पर आपत्ति करने और या सवाल उठाने की कोशिश तक नहीं की कि प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने इंस्टीट्यूट के एक बड़े आयोजन के लिए राजेश शर्मा के सामने समर्पण क्यों किया हुआ है ? एक कुशल 'दलाल' और धंधेबाज के रूप में राजेश शर्मा ने तो नीलेश विकमसे के 'स्वार्थ' को पहचान कर उन्हें अपने सामने समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया, लेकिन सेंट्रल काउंसिल के बाकी सदस्य किस मजबूरी और या किस स्वार्थ में अपने प्रेसीडेंट की हरकत को नजरअंदाज करते हुए अपने आप को मंजीरे बजाने में ही व्यस्त किए रहे ? हद की बात यह तक हुई कि राजेश शर्मा का प्रोफेशनल पार्टनर तक 'सीए डे' की तैयारी में नीलेश विकमसे के साथ मंच शेयर कर रहा था; तैयारी के काम में तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण मौकों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को किनारे लगाया/बैठाया हुआ था - लेकिन मजाल है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने चूँ भी की हो । सेंट्रल काउंसिल सदस्य 'सीए डे' के आयोजन से पहले नीलेश विकमसे और राजेश शर्मा के सामने 'बेचारे' बने बैठे रहे, और अब विरोधियों के सामने अपनी बेचारगी दिखाते हुए पूछ रहे हैं कि उनका क्या कसूर है ? मुट्ठी भर बेईमान चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने काउंसिल और इंस्टीट्यूट प्रशासन को यदि कमजोर और असहाय देखा/पाया जाता है, तो इसका कारण काउंसिल सदस्यों की इसी 'बेचारगी' वाली अदा में देखा/पहचाना सकता है ।
'सीए डे' के इस वर्ष के फंक्शन में हुई बदनीयतभरी राजनीति तथा अव्यवस्था ने इंस्टीट्यूट में पल रही सड़ांध की बदबू से खुद चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को ही परिचित कराने का काम जरूर किया है । यह देख कर भी उम्मीद बंधी है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स बदबू और सड़ांध से विचलित हुए हैं और इसके विरोध में आवाज उठा रहे हैं । उनका विरोध हालाँकि अभी अराजकता का शिकार हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि शातिर और दलाल किस्म के नेता इस विरोध को भटकाने तथा कमजोर करने के लिए क्या तरकीबें लगाते हैं ?