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Saturday, October 27, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वेस्टर्न रीजन में राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी में पैदा हुआ करंट अनिल भंडारी की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी की तैयारी को शिकार बना सकता है क्या ?

मुंबई । दुर्गेश काबरा को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुँचाने के लिए आनंद राठी, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे द्वारा कमर कस लिए जाने से वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में बदलाव का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें अनिल भंडारी के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाना तो चुनौतीपूर्ण हो ही गया है, साथ ही राजकुमार अदुकिया के लिए सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी और पुरुषोत्तम खंडेलवाल की राह भी मुश्किल हुई है । मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व प्रेसीडेंट आनंद राठी की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भी खासी धाक है । 1985 से 1992 तक के दो टर्म में सेंट्रल काउंसिल में रहे आनंद राठी ने अपना चुनाव खूब धूम-धड़ाके से लड़ा था; उसके बाद फिर उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत विकमसे परिवार को सौंप दी थी, जहाँ से एसके विकमसे, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे बारी बारी से सेंट्रल काउंसिल में गए; कमलेश विकमसे और  नीलेश विकमसे तो इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट भी बने । एक समय आनंद राठी को मुंबई में 'जोधपुर क्लब' के नाम से भी पहचाना जाता था; (कुमारमंगलम) बिड़ला ग्रुप से नजदीकियों के चलते आनंद राठी का एक अन्य रुतबा भी रहा है । माहेश्वरी समाज में आनंद राठी का विशेष प्रभाव बना, और माहेश्वरी समाज में उन्हें एक 'संस्थान' के रूप में पहचान व मान्यता मिली । विकमसे परिवार के जुड़ने से उनका प्रभाव क्षेत्र और बड़ा हुआ, तथा वेस्टर्न रीजन में 'राठी विकमसे ग्रुप' की एक अनोखी ताकत बनी । यही ताकत अचानक से दुर्गेश काबरा का संबल बन गई दिख रही है । दरअसल राठी विकमसे ग्रुप के तीनों बड़े नेताओं ने जिस अप्रत्याशित तरीके से दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाया है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी गणित में खासी उथल-पुथल मचा दी है - और दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी दूसरे कुछेक उम्मीदवारों के लिए खतरे की घंटी बजाने लगी है ।
मजे की बात है कि अभी दो महीने पहले तक दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । दुर्गेश काबरा पिछले दो बार से लगातार चुनाव हार रहे हैं । पिछली बार उनका प्रदर्शन हालाँकि अच्छा रहा था, लेकिन दूसरी वरीयता के वोटों का सहयोग/समर्थन न मिल पाने के कारण वह नाकामयाबी का शिकार हो गए थे । उनकी नाकामयाबी जिस तरह से अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल की किस्मत का ताला खोलने वाली चाभी बनी थी, उसे देखते/समझते हुए चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले लोगों ने दुर्गेश काबरा के राजनीतिक जीवन को समाप्त हुआ मान लिया था । इसी कारण से, इस बार जब दुर्गेश काबरा को तीसरी बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए सक्रिय देखा गया, तो किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया । लोगों का मानना/कहना रहा कि दुर्गेश काबरा जितने जो प्रयास कर सकते थे, वह सब उन्होंने कर लिए हैं - और उन सब प्रयासों के बावजूद चूँकि वह कामयाब नहीं हुए हैं, इसलिए अब उनके लिए कहीं कोई उम्मीद नहीं बची है । लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार चमत्कार घटते - और उन चमत्कारों के चलते बड़े उलट-फेर होते हुए देखे गए हैं, इसलिए दुर्गेश काबरा को राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन ने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में भी एकदम से उलट-फेर कर दिया है - और कहीं मुकाबले में न देखे/पहचाने जा रहे दुर्गेश काबरा अचानक से बड़े महत्त्वपूर्ण उम्मीदवार बन गए हैं । उनकी उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण होने से अनिल भंडारी की सदस्यता पर खतरा मंडराता देखा जा रहा है । पिछली बार अनिल भंडारी और दुर्गेश काबरा को मिले वोटों में ज्यादा अंतर नहीं था, और दोनों ही माहेश्वरी वोटों पर निर्भर रहे थे और इस बार भी हैं; इसी बिना पर माना/समझा जा रहा है कि राठी विकमसे ग्रुप के समर्थन के चलते दुर्गेश काबरा के वोटों में यदि ठीक-ठाक इजाफा हो गया, तो अनिल भंडारी के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में अपनी मौजूदा सीट को बचाना मुश्किल हो जायेगा ।
दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण हो उठने से राजकुमार अदुकिया और पुरुषोत्तम खंडेलवाल के लिए भी अलग अलग कारणों से मुसीबत पैदा हो गई है । राजकुमार अदुकिया एक दशक से अधिक समय तक सेंट्रल काउंसिल में रहने के कारण नियमों के चलते पिछले टर्म में बाहर रहने के लिए 'मजबूर' किए जाने के बाद इस बार फिर से उम्मीदवार हो गए हैं, जिस कारण लोग उनके खिलाफ हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि सेंट्रल काउंसिल में आखिर ऐसे कौन से लड्डू मिलते हैं, जिनके लालच में राजकुमार अदुकिया से सेंट्रल काउंसिल से मोह ही नहीं छूट रहा है । राजकुमार अदुकिया को यह आभास था कि उनके ऊपर सत्ता-लोलुपता का आरोप लगेगा और उनके समर्थक रहे लोग उनके विरोध में हो जायेंगे; लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि नीलेश विकमसे द्वारा खाली की गई सीट उनके लिए फायदे का सबब बन जाएगी । किंतु राठी विकमसे ग्रुप द्वारा दुर्गेश काबरा को समर्थन देने के कारण उनकी उम्मीद को झटका लग सकता है । अहमदाबाद के पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मुंबई के उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो राजस्थान के हैं - क्योंकि वह खुद राजस्थान के हैं; लेकिन आनंद राठी के कारण राजस्थान से मुंबई आए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट यदि सचमुच दुर्गेश काबरा को पड़ गए, तो पुरुषोत्तम खंडेलवाल का राजस्थान-समीकरण गड़बड़ा सकता है ।
राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा और उनके नजदीकियों में हवा तो भरी है, लेकिन दुर्गेश काबरा के ही कुछेक समर्थकों का मानना/कहना यह भी है कि सिर्फ समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा की जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन को वोट में बदलने के लिए दुर्गेश काबरा जरूरी मैकेनिज्म को बना पाते हैं या नहीं । दुर्गेश काबरा के ही समर्थकों का कहना/बताना है कि राठी विकमसे ग्रुप ने फैमिली से बाहर के उम्मीदवार के रूप में आरएल काबरा को दो बार समर्थन दिया था, लेकिन आरएल काबरा को दोनों ही बार हार का सामना करना पड़ा था । इसके अलावा एक मजेदार संयोग यह है कि लगातार दो बार हार का सामना करने के बाद तरुण घिया को छोड़ कर और किसी उम्मीदवार के सफल होने का  उदाहरण नहीं है । इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद भी दुर्गेश काबरा सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता पाने की अपनी हसरत को पूरा कर पाते हैं, या एक बार फिर बदकिस्मती का शिकार बनते हैं ?

Saturday, July 8, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने अपने भाई कमलेश विकमसे से प्रोफेशनली आगे निकलने की 'तैयारी' में सीए डे के फंक्शन को तमाशा बनाया क्या ?

नई दिल्ली । 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के मामलों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की मिलीभगत के किस्से इंस्टीट्यूट के मुख्यालय के गलियारों में भी जिस तरह से सुने/सुनाए जा रहे हैं, उससे लग रहा है कि नीलेश विकमसे की मुसीबतें अभी जल्दी से खत्म होने वाली नहीं हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नोमीनेटेटड सदस्यों ने नीलेश विकमसे को 'बचाने' के लिए प्रयास तो शुरू कर दिए हैं, लेकिन नीलेश विकमसे को लेकर जिस तरह की 'नई' 'नई' बातों का खुलासा हो रहा है - उससे लगता नहीं है कि नीलेश विकमसे की परेशानियाँ जल्दी समाप्त होंगी । कई लोगों को लग रहा है कि उनकी परेशानियों को बढ़ाने का काम 'सीए डे' फंक्शन के मुख्य खलनायक राजेश शर्मा और इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर की तरफ से भी हो रहा है । ऐसा मानने और कहने वाले लोगों का तर्क है कि दरअसल इन दोनों को डर है कि नीलेश विकमसे अपने आप को बचाने के लिए कहीं इन्हें ही बलि का बकरा न बना दें, इसलिए इन्होंने नीलेश विकमसे को संकेत देना शुरू कर दिया है कि उन्होंने यदि इन्हें फँसा कर अपने आप को बचाने की कोशिश की तो यह उन्हें भी नहीं छोड़ेंगे । नीलेश विकमसे के शुभचिंतकों को भी लग रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के मामलों में फँसने से बचने के लिए राजेश शर्मा और वी सागर की तरफ से उन्हें 'ब्लैकमेल' करने के प्रयास हो रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि राजेश शर्मा तो अभी हालाँकि 'फरार' ही चल रहे हैं, जिस कारण सोशल मीडिया में उनकी तरफ से सूनापन ही फैला/बना हुआ है - लेकिन उनके नजदीकियों ने चर्चाओं का बाजार पूरी तरह गर्म बनाया हुआ है । उनकी तरफ से ही पूछने के अंदाज में बताया जा रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन में राजेश शर्मा के परिवार की मौजूदगी की तो बातें की जा रही हैं, लेकिन नीलेश विकमसे के परिवार की उपस्थिति की बात कोई क्यों नहीं कर रहा है ? राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से ही बताया और पूछा जा रहा है कि नीलेश विकमसे का पूरा परिवार - उनके भाई और उनके अपने एकल परिवार के सदस्य फंक्शन में शामिल होने के लिए मुंबई से दिल्ली पहुँचे थे; उनके आने-जाने के किराए और दिल्ली में आने-जाने तथा ठहरने के खर्च किस मद से हुए हैं - यह सवाल क्यों नहीं चर्चा में हैं ? राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से सबसे गंभीर बात यह की जा रही है कि 'सीए डे' फंक्शन का जो स्वरूप बना, उसे पूरी तरह से नीलेश विकमसे ने तैयार किया था और उनका असली मकसद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को खुश करना था - जिनसे उन्हें प्रेसीडेंट पद से हटने के बाद महत्त्वपूर्ण नियुक्तियों के रूप में फायदा उठाना था । इस बात से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच नीलेश विकमसे की अपने भाई कमलेश विकमसे के साथ होने/चलने वाली प्रोफेशनल होड़ की बात एक बार फिर मुखर हो उठी है ।
उल्लेखनीय है कि वेस्टर्न रीजन के लोग दिल्ली के लोगों को बताते रहे हैं कि काउंसिल में आने का नीलेश विकमसे का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि उन्हें अपने भाई कमलेश विकमसे से प्रोफेशनली आगे 'निकलना' है । अन्य कई लोगों की तरह नीलेश विकमसे भी मानते हैं कि कमलेश विकमसे का सितारा इंस्टीट्यूट की काउंसिल का सदस्य बनने और फिर प्रेसीडेंट बनने के बाद ही बुलंद हुआ है । नीलेश विकमसे को उम्मीद रही कि काउंसिल में आने/रहने के चलते जिस तरह कमलेश विकमसे के लिए 'तरक्की' के रास्ते खुले, वैसे ही उनके लिए भी रास्ते बनेंगे और खुलेंगे । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे ने अपनी तरक्की के रास्ते को खोलने/खुलवाने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ही 'सीए डे' फंक्शन के स्वरूप को ही पूरी तरह बदल दिया और उसे तमाशे का रूप दे दिया । राजेश शर्मा के नजदीकियों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मुख्य तौर पर नीलेश विकमसे ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, राजेश शर्मा ने तो उनकी सिर्फ मदद की है । दिलचस्प नजारा यह देखने को मिल रहा है कि राजेश शर्मा के नजदीकी सिर्फ राजेश शर्मा की ही वकालत नहीं कर रहे हैं, बल्कि इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर को भी यह कहते हुए 'बचाने' के लिए माहौल बना रहे हैं कि सेक्रेटरी ने तो वही किया जो प्रेसीडेंट ने उन्हें करने को कहा - इसमें सेक्रेटरी की भला क्या गलती है ?
प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को बदनाम करने की राजेश शर्मा के नजदीकियों की कार्रवाई के पीछे राजेश शर्मा का ही दिमाग देखा/पहचाना जा रहा है; और माना जा रहा है कि इस तरह से राजेश शर्मा ने नीलेश विकमसे को 'ब्लैकमेल' करने की तैयारी की है, ताकि नीलेश विकमसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न कर सकें । राजेश शर्मा ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर की मदद करने/करवाने के जरिए उन्हें भी अपने साथ मिला लेने की चाल चली है । उल्लेखनीय है कि 'सीए डे' फंक्शन के नाम पर हुई बदइंतजामी और बेईमानी के लिए राजेश शर्मा को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है, और जमकर उनकी लानत/मनालत हो रही है - जिसके कारण उन्हें लोगों की नजरों से छिपछिपा कर रहना पड़ रहा है । उन्हें जानने वालों का कहना लेकिन यह है कि राजेश शर्मा की चमड़ी बड़ी मोटी है, अभी हो रही लानत/मनालत से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा होगा; वह तो बस मौके का इंतजार कर रहे होंगे कि लोगों का गुस्सा शांत हो और वह फिर अपनी कारस्तानियों को खुल कर शुरू करें । अभी पर्दे के पीछे रहते हुए उन्होंने अपने नजदीकियों को काम पर लगाया हुआ है, जो प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की पोल-पट्टी खोलने में लगे हुए हैं । राजेश शर्मा का लगता है कि नीलेश विकमसे को दबाव में लेकर ही वह अपने आप को बचा सकेंगे ।