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Thursday, March 5, 2020

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में प्रफुल्ल छाजेड़ द्वारा खाली की जाने वाली सीट पर सुनील पटोदिया की दावेदारी को जितना आसान समझा जा रहा है, वह वास्तव में उतनी आसान भी नहीं है और कई चुनौतियों से घिरी हुई है 

मुंबई । इंस्टीट्यूट के निवर्त्तमान प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ अगली सेंट्रल काउंसिल में जो जगह खाली करेंगे, उसे भरने के लिए सुनील पटोदिया ने जिस तरह से तैयारी शुरू कर दी है - उसे देखते हुए उनके चुनाव में सभी की दिलचस्पी पैदा हुई है । मजे की बात यह देखने/सुनने को मिल रही है कि वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी करने वाले दूसरे नए संभावित उम्मीदवार सुनील पटोदिया की चुनावी तैयारी से थोड़ा 'डरे' हुए से दिख रहे हैं, और अपनी उम्मीदवारी पर फैसला करने से पहले सुनील पटोदिया की तैयारियों तथा उसके संभावित नतीजे का आकलन कर लेना चाहते हैं । वेस्टर्न रीजन में हालाँकि पहले भी ऐसे उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिन्हें मजबूत उम्मीदवार के रूप में देखा जाता था - लेकिन जैसा 'शोर' सुनील पटोदिया की उम्मीदवारी को लेकर है, वैसा इससे पहले शायद ही यहाँ कभी देखा गया हो । सुनील पटोदिया की उम्मीदवारी के पक्ष में बहुत से सकारात्मक तत्त्व हैं - प्रफुल्ल छाजेड़ तथा उनके वाले खेमे का समर्थन तो सुनील पटोदिया के साथ है ही; उनकी अपनी खुद की भी प्रभावी सक्रियता है, जिसके चलते उनकी व्यापक पहुँच है; उनके व्यवहार की बड़ी तारीफ है । इसका परिणाम 2012 में वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में देखने को मिला था, जो सुनील पटोदिया का पिछला अंतिम चुनाव था । उस चुनाव में पहली वरीयता के 1205 वोट के साथ सुनील पटोदिया पाँचवें नंबर पर थे, और उन्होंने दूसरे/तीसरे चरण की गिनती में ही बहुत आसानी से जरूरी कोटा प्राप्त कर लिया था । हालाँकि कई लोगों का यह भी मानना और कहना है कि रीजनल काउंसिल का चुनाव और सेंट्रल काउंसिल का चुनाव बिलकुल अलग अलग आधार पर होता है, और रीजनल काउंसिल की कामयाबी को सेंट्रल काउंसिल की कामयाबी की गारंटी नहीं माना जा सकता है । 
इस बात को वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 2012 के चुनावी नतीजों के आधार पर भी समझा जा सकता है । उस चुनाव में पराग रावल पहली वरीयता के 2067 वोटों के साथ पहले नंबर पर रहे थे, जबकि अनिल भंडारी पहली वरीयता के कुल 772 वोटों के साथ 17वें नंबर पर थे । वर्ष 2015 में सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में लेकिन पराग रावल को सफलता नहीं मिली, जबकि अनिल भंडारी सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पा गए थे । इससे जाहिर है कि रीजनल काउंसिल और सेंट्रल काउंसिल में पहुँचने के रास्ते अलग अलग 'गली-कूँचों' से होकर गुजरते हैं, और रीजनल काउंसिल की कामयाबी के आधार पर सेंट्रल काउंसिल की सफलता के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । वर्ष 2012 के चुनावी नतीजे का विस्तारित आकलन सुनील पटोदिया के लिए एक गंभीर चुनौती की तरफ इशारा करता है; और वह यह कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में सुनील पटोदिया जिस पाँचवें नंबर पर थे, फाइनल नतीजे में भी वह उसी पाँचवें नंबर पर ही रहे - वोटों की गिनती के बीच में वह कुछ समय के लिए हालाँकि चौथे नंबर पर आये थे, लेकिन अंततः पाँचवें नंबर पर ही वह आ टिके । इससे अन्य वरीयताओं के वोटों को प्राप्त करने में उनकी कमजोरी का संकेत मिलता है । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में यह कमजोरी बहुत नुकसान पहुँचा सकती है । सुनील पटोदिया की उम्मीदवारी को जिन प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थन के चलते भी मजबूती दिखती है, उन प्रफुल्ल छाजेड़ को भी अन्य वरीयताओं के वोटों के संकट का सामना करना पड़ता रहा था - और अपनी जीत के लिए उन्हें भी अंत तक जूझना पड़ता था ।
प्रफुल्ल छाजेड़ की तरह सुनील पटोदिया की भी खूबी यह है कि उनका व्यक्तिगत करिश्मा बड़ा है; लेकिन इस खूबी की समस्या यह है कि व्यक्तिगत करिश्मे के चलते इनका जो समर्थन आधार है, वह बहुत बिखरा हुआ है, जिसे समेटना और वोटों में तब्दील करना खासा चुनौतीपूर्ण होता है । प्रफुल्ल छाजेड़ को भी हर बार इस चुनौती का सामना करना पड़ा है; और सुनील पटोदिया के नजदीकियों के अनुसार, सुनील पटोदिया को भी इस चुनौती से निपटना होगा । सुनील पटोदिया को हालाँकि सूरत से बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है, जो समर्थन-आधार होने के बावजूद प्रफुल्ल छाजेड़ को कभी नहीं मिल सका । मजे की बात यह है कि जय छैरा के चुनावी मुकाबले से हटने के बाद कई मौजूदा व संभावित उम्मीदवारों की निगाह सूरत के वोटरों पर है । सूरत से सेंट्रल काउंसिल के लिए हालाँकि बालकिशन अग्रवाल को संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, लेकिन कोई भी - खुद सूरत के लोग भी - उन्हें विजेता के रूप में नहीं देख/समझ रहे हैं । इस नाते उम्मीद की जा रही है कि अगली बार सूरत के वोट 'बाहर' के उम्मीदवारों के पास जायेंगे । सूरत के संभावित वोटों के भरोसे ही अहमदाबाद के पुरुषोत्तम खंडेलवाल एक बार फिर सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उतरने की तैयारी करते हुए देखे/सुने जा रहे हैं । पिछली बार वह मामूली वोटों के अंतर से पिछड़ गए थे । पुरुषोत्तम खंडेलवाल के अलावा, सुनील पटोदिया को भी सूरत से बहुत उम्मीदें हैं । दिलचस्प संयोग यह है कि सुनील पटोदिया लायंस इंटरनेशनल में और पुरुषोत्तम खंडेलवाल रोटरी इंटरनेशनल में सक्रिय हैं, और दोनों को विश्वास है कि सामाजिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता उनकी उम्मीदवारी को अवश्य ही लाभ पहुँचायेगी । हालाँकि सामाजिक सक्रियता के मामले में सुनील पटोदिया का पलड़ा भारी है; लायंस इंटरनेशनल में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जैसे बड़े/ऊँचे पदों तक पहुँचे हैं - जबकि पुरुषोत्तम खंडेलवाल रोटरी इंटरनेशनल में निचली पाँत के खिलाड़ी/नेता हैं: और रोटरी में वह जिस डिस्ट्रिक्ट में हैं, उसका बड़ा हिस्सा वेस्टर्न रीजन से अलग क्षेत्र में है । इस तरह की बातें चुनावी अभियान पर कैसे क्या असर डालेंगी, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन यह चुनावी मुकाबले के परिदृश्य को रोमांचक तो बनाती ही हैं । 

Thursday, February 13, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद पर निहार जंबुसारिया की अप्रत्याशित जीत इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े तुर्रमखाँ नेताओं के लिए खासी झटके वाली बात भी है; लगता है कि उनसे धोखा खाए पूर्व व मौजूदा काउंसिल सदस्यों ने ही उनकी राजनीति को फेल कर दिया है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद पर हुई निहार जंबुसारिया की चुनावी जीत इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को हैरान करने वाली तो है ही, इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के तुर्रमखांओं को झटका देने वाली भी है । हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पूर्व प्रेसीडेंट्स अमरजीत चोपड़ा, उत्तम अग्रवाल और सुबोध अग्रवाल अपने अपने उम्मीदवारों को जितवाने के लिए चालें चल रहे थे, लेकिन इस वर्ष इन्हें बुरी तरह मुहँकी खानी पड़ी । बुरी तरह इसलिए, क्योंकि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इनके सारे प्लान - प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी ..... आदि-इत्यादि सब फेल हो गए । दरअसल इन नेताओं का खेल हर वर्ष होता/रहता यह है कि अपने प्रमुख उम्मीदवारों के साथ-साथ यह दो-तीन और उम्मीदवारों को भी 'गोली' दिए रहते हैं, और वोटों का आदान-प्रदान करवा कर अपने पहले नहीं, तो दूसरे; दूसरे नहीं, तो तीसरे; और तीसरे नहीं, तो चौथे उम्मीदवार के जीतने की स्थिति बना लेते थे - और फिर श्रेय 'लूटते' थे । इसी 'परंपरा' के तहत इस वर्ष अनिल भंडारी, सुशील गोयल, मनु अग्रवाल, धीरज खंडेलवाल इन नेताओं के पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे नंबर के उम्मीदवार थे ।
अमरजीत चोपड़ा ने अनिल भंडारी और मनु अग्रवाल को 'गोली' दी हुई थी; सुबोध अग्रवाल ने सुशील गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ था; और उत्तम अग्रवाल ने धीरज खंडेलवाल के लिए दाँव लगाया हुआ था । तत्कालीन प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के अनिल भंडारी के तथा तत्कालीन वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के सुशील गोयल के समर्थन में होने के कारण इनका पलड़ा भारी दिख रहा था । उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार की पहचान रखने के कारण धीरज खंडेलवाल को समर्थन का टोटा पड़ता दिखा, तो उत्तम अग्रवाल ने मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा इस उम्मीद से उठा लिया कि अमरजीत चोपड़ा का समर्थन मनु अग्रवाल को मिलेगा ही, तो धीरज खंडेलवाल न सही मनु अग्रवाल को ही वह वाइस प्रेसीडेंट चुनवा लेते हैं । वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में दिलचस्पी लेते रहे पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता दिल्ली विधानसभा की राजनीति में व्यस्त रहने के कारण इस वर्ष वाइस प्रेसीडेंट की राजनीति से दूर रहे, जिस कारण उम्मीद रही कि अमरजीत चोपड़ा, सुबोध अग्रवाल और उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवारों में से ही कोई उम्मीदवार कामयाब हो जायेगा । लेकिन नतीजा आया, तो उक्त उम्मीदों को धराशाही पाया । समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य, खासकर नए सदस्य पूर्व प्रेसीडेंट्स के खेल को समझ गए हैं, और इस बार वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उनके हाथ की कठपुतली नहीं बने और उन्होंने अपने विवेक से फैसला किया ।
वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव के चक्कर में काउंसिल सदस्य दरअसल इन पूर्व प्रेसीडेंट्स के द्वारा कई बार इस्तेमाल हो चुके हैं; काउंसिल सदस्यों को वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए वोट दिलवाने का वास्ता देकर नेता लोग अपने समर्थक बनाते हैं, और फिर अपनी राजनीति के लिए उन्हें इस्तेमाल करते हैं । वाइस प्रेसीडेंट बनने की दौड़ में शामिल होने वाले काउंसिल सदस्यों का तो बहुत ही बुरा अनुभव रहा है; और अधिकतर ने अपने आप को 'ठगा' हुआ ही पाया है । वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उत्तम अग्रवाल तथा अमरजीत चोपड़ा से वादानुरूप अपेक्षित समर्थन न मिलने से पूर्व काउंसिल सदस्य विजय गुप्ता ने तो अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी । पूर्व प्रेसीडेंट्स की राजनीति में इस्तेमाल होने और या इस्तेमाल होने के किस्से सुन कर ही काउंसिल सदस्यों ने इस बार लगता है कि उनके झाँसे में आने से अपने आप को बचा लिया और इस कारण से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी चौधराहट बनाने/जमाने के चक्कर में लगे रहने वाले नेताओं को मात खाना पड़ी । समझा जाता है कि वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में नेताओं की वादाखिलाफी के शिकार हो चुके पूर्व व मौजूदा काउंसिल सदस्यों ने भी सक्रिय भूमिका निभा कर नेताओं की राजनीति को फेल करने का काम किया और निहार जंबुसारिया की उम्मीदवारी को सफल बनाया/बनवाया । इस तरह निहार जंबुसारिया का अप्रत्याशित तरीके से वाइस प्रेसीडेंट बनना इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े नेताओं के लिए खासे झटके वाली बात रही है ।

Thursday, January 30, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अगले वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के अपने अपने उम्मीदवारों के साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ने से वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनावी मुकाबला रोचक हुआ

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता जिस तरह से आपने-सामने खड़े हो गए हैं, उसके चलते वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है ।  उल्लेखनीय है कि प्रफुल्ल छाजेड़ ने वेस्टर्न रीजन के अनिल भंडारी की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ है, जबकि अतुल गुप्ता ने ईस्टर्न रीजन के सुशील गोयल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान छेड़ा हुआ है । सुशील गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में सुशील गोयल को लोग ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन जब से अतुल गुप्ता ने उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की जिम्मेदारी सँभाली है, तब से सुशील गोयल की उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जाने लगा है । संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि सुशील गोयल यदि सचमुच प्रफुल्ल छाजेड़  उम्मीदवार अनिल भंडारी को टक्कर देते हुए नजर आए, तो इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल का समर्थन भी उन्हें मिल जायेगा । वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उत्तम अग्रवाल का एकमात्र एजेंडा दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार को सफल होने से रोकने का है, और इसीलिए सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल का समर्थन मिल सकने का भरोसा जताया जा रहा है ।
अतुल गुप्ता की तरफ से लेकिन मजे की बात यह देखने में आ रही है कि वह सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल के समर्थन से बचाने की कोशिश कर रहे हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अतुल गुप्ता दो वजहों से ऐसा कर रहे हैं : एक तो उन्हें डर है कि सुशील गोयल की उम्मीदवारी के साथ उत्तम अग्रवाल का नाम जुड़ा तो सुशील गोयल का बनता दिख रहा 'काम' बिगड़ जायेगा, और दूसरी बात यह कि सुशील गोयल की सफलता में यदि उत्तम अग्रवाल की भूमिका बनी/दिखी, तो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति तथा व्यवस्था में उत्तम अग्रवाल को महत्त्व मिलने लगेगा । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उत्तम अग्रवाल अभी पूरी तरह अलग-थलग पड़े हुए हैं; वह उछल-कूद तो खूब मचाये रखते हैं, लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता है - उनके अपने भी नहीं । यही कारण है कि उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में जो धीरज खंडेलवाल वाइस प्रेसीडेंट बनने की लाइन में हैं, उन धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है - खुद धीरज खंडेलवाल भी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । इसीलिए, अब जब चुनाव सिर पर है तब भी धीरज खंडेलवाल चुनावी परिदृश्य से 'दूर' दूसरे कामों में व्यस्त हैं ।
सुशील गोयल की उम्मीदवारी को अतुल गुप्ता के समर्थन से जो ताकत मिलती है, वह उत्तम अग्रवाल के समर्थन की संभावना से बिगड़ भी जाती है - और यही बात अनिल भंडारी की उम्मीदवारी को बढ़त दिलाती लग रही है । लेकिन उनके साथ भी मुश्किलें कम नहीं हैं । दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के भरोसे एक अनिल भंडारी ही नहीं हैं, बल्कि वेस्टर्न रीजन के एनसी हेगड़े तथा सेंट्रल रीजन के मनु अग्रवाल भी चुनावी मैदान में कूदे हुए हैं । इन्हें प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार 'बी' और उम्मीदवार 'सी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इसके चलते प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थकों व नजदीकियों के बीच असमंजस बन गया है, और इस असमंजस के चलते प्रफुल्ल छाजेड़ ग्रुप में एकता बने रह पाने को लेकर संदेह पैदा हो गया है । अनिल भंडारी और सुशील गोयल को अलग अलग कारणों से मुसीबत में घिरा पाकर वेस्टर्न रीजन के निहार जंबुसारिया व जय छैरा तथा सदर्न रीजन के अब्राहम बाबु व जी शेखर अपनी अपनी दाल गलाने की कोशिशों में हैं । दरअसल अलग अलग कारणों से इनके लिए काउंसिल सदस्यों के बीच समर्थन का 'भाव' तो है, लेकिन इस भाव को वोट में बदलने के लिए जो मैकेनिज्म चाहिए होता है - उसका इनके पास नितांत अभाव है । यह तो बस किस्मत के भरोसे हैं । इन्हें भी पता है कि इंस्टीट्यूट को कई (वाइस) प्रेसीडेंट किस्मत के चलते ही मिले हैं । 

Saturday, October 27, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वेस्टर्न रीजन में राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी में पैदा हुआ करंट अनिल भंडारी की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी की तैयारी को शिकार बना सकता है क्या ?

मुंबई । दुर्गेश काबरा को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुँचाने के लिए आनंद राठी, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे द्वारा कमर कस लिए जाने से वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में बदलाव का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें अनिल भंडारी के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाना तो चुनौतीपूर्ण हो ही गया है, साथ ही राजकुमार अदुकिया के लिए सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी और पुरुषोत्तम खंडेलवाल की राह भी मुश्किल हुई है । मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व प्रेसीडेंट आनंद राठी की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भी खासी धाक है । 1985 से 1992 तक के दो टर्म में सेंट्रल काउंसिल में रहे आनंद राठी ने अपना चुनाव खूब धूम-धड़ाके से लड़ा था; उसके बाद फिर उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत विकमसे परिवार को सौंप दी थी, जहाँ से एसके विकमसे, कमलेश विकमसे व नीलेश विकमसे बारी बारी से सेंट्रल काउंसिल में गए; कमलेश विकमसे और  नीलेश विकमसे तो इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट भी बने । एक समय आनंद राठी को मुंबई में 'जोधपुर क्लब' के नाम से भी पहचाना जाता था; (कुमारमंगलम) बिड़ला ग्रुप से नजदीकियों के चलते आनंद राठी का एक अन्य रुतबा भी रहा है । माहेश्वरी समाज में आनंद राठी का विशेष प्रभाव बना, और माहेश्वरी समाज में उन्हें एक 'संस्थान' के रूप में पहचान व मान्यता मिली । विकमसे परिवार के जुड़ने से उनका प्रभाव क्षेत्र और बड़ा हुआ, तथा वेस्टर्न रीजन में 'राठी विकमसे ग्रुप' की एक अनोखी ताकत बनी । यही ताकत अचानक से दुर्गेश काबरा का संबल बन गई दिख रही है । दरअसल राठी विकमसे ग्रुप के तीनों बड़े नेताओं ने जिस अप्रत्याशित तरीके से दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाया है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावी गणित में खासी उथल-पुथल मचा दी है - और दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी दूसरे कुछेक उम्मीदवारों के लिए खतरे की घंटी बजाने लगी है ।
मजे की बात है कि अभी दो महीने पहले तक दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । दुर्गेश काबरा पिछले दो बार से लगातार चुनाव हार रहे हैं । पिछली बार उनका प्रदर्शन हालाँकि अच्छा रहा था, लेकिन दूसरी वरीयता के वोटों का सहयोग/समर्थन न मिल पाने के कारण वह नाकामयाबी का शिकार हो गए थे । उनकी नाकामयाबी जिस तरह से अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल की किस्मत का ताला खोलने वाली चाभी बनी थी, उसे देखते/समझते हुए चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले लोगों ने दुर्गेश काबरा के राजनीतिक जीवन को समाप्त हुआ मान लिया था । इसी कारण से, इस बार जब दुर्गेश काबरा को तीसरी बार अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए सक्रिय देखा गया, तो किसी ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया । लोगों का मानना/कहना रहा कि दुर्गेश काबरा जितने जो प्रयास कर सकते थे, वह सब उन्होंने कर लिए हैं - और उन सब प्रयासों के बावजूद चूँकि वह कामयाब नहीं हुए हैं, इसलिए अब उनके लिए कहीं कोई उम्मीद नहीं बची है । लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार चमत्कार घटते - और उन चमत्कारों के चलते बड़े उलट-फेर होते हुए देखे गए हैं, इसलिए दुर्गेश काबरा को राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन ने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में भी एकदम से उलट-फेर कर दिया है - और कहीं मुकाबले में न देखे/पहचाने जा रहे दुर्गेश काबरा अचानक से बड़े महत्त्वपूर्ण उम्मीदवार बन गए हैं । उनकी उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण होने से अनिल भंडारी की सदस्यता पर खतरा मंडराता देखा जा रहा है । पिछली बार अनिल भंडारी और दुर्गेश काबरा को मिले वोटों में ज्यादा अंतर नहीं था, और दोनों ही माहेश्वरी वोटों पर निर्भर रहे थे और इस बार भी हैं; इसी बिना पर माना/समझा जा रहा है कि राठी विकमसे ग्रुप के समर्थन के चलते दुर्गेश काबरा के वोटों में यदि ठीक-ठाक इजाफा हो गया, तो अनिल भंडारी के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में अपनी मौजूदा सीट को बचाना मुश्किल हो जायेगा ।
दुर्गेश काबरा की उम्मीदवारी के महत्त्वपूर्ण हो उठने से राजकुमार अदुकिया और पुरुषोत्तम खंडेलवाल के लिए भी अलग अलग कारणों से मुसीबत पैदा हो गई है । राजकुमार अदुकिया एक दशक से अधिक समय तक सेंट्रल काउंसिल में रहने के कारण नियमों के चलते पिछले टर्म में बाहर रहने के लिए 'मजबूर' किए जाने के बाद इस बार फिर से उम्मीदवार हो गए हैं, जिस कारण लोग उनके खिलाफ हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि सेंट्रल काउंसिल में आखिर ऐसे कौन से लड्डू मिलते हैं, जिनके लालच में राजकुमार अदुकिया से सेंट्रल काउंसिल से मोह ही नहीं छूट रहा है । राजकुमार अदुकिया को यह आभास था कि उनके ऊपर सत्ता-लोलुपता का आरोप लगेगा और उनके समर्थक रहे लोग उनके विरोध में हो जायेंगे; लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि नीलेश विकमसे द्वारा खाली की गई सीट उनके लिए फायदे का सबब बन जाएगी । किंतु राठी विकमसे ग्रुप द्वारा दुर्गेश काबरा को समर्थन देने के कारण उनकी उम्मीद को झटका लग सकता है । अहमदाबाद के पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मुंबई के उन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो राजस्थान के हैं - क्योंकि वह खुद राजस्थान के हैं; लेकिन आनंद राठी के कारण राजस्थान से मुंबई आए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट यदि सचमुच दुर्गेश काबरा को पड़ गए, तो पुरुषोत्तम खंडेलवाल का राजस्थान-समीकरण गड़बड़ा सकता है ।
राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा और उनके नजदीकियों में हवा तो भरी है, लेकिन दुर्गेश काबरा के ही कुछेक समर्थकों का मानना/कहना यह भी है कि सिर्फ समर्थन मिलने से दुर्गेश काबरा की जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि राठी विकमसे ग्रुप से मिले समर्थन को वोट में बदलने के लिए दुर्गेश काबरा जरूरी मैकेनिज्म को बना पाते हैं या नहीं । दुर्गेश काबरा के ही समर्थकों का कहना/बताना है कि राठी विकमसे ग्रुप ने फैमिली से बाहर के उम्मीदवार के रूप में आरएल काबरा को दो बार समर्थन दिया था, लेकिन आरएल काबरा को दोनों ही बार हार का सामना करना पड़ा था । इसके अलावा एक मजेदार संयोग यह है कि लगातार दो बार हार का सामना करने के बाद तरुण घिया को छोड़ कर और किसी उम्मीदवार के सफल होने का  उदाहरण नहीं है । इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि राठी विकमसे ग्रुप का समर्थन मिलने के बाद भी दुर्गेश काबरा सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता पाने की अपनी हसरत को पूरा कर पाते हैं, या एक बार फिर बदकिस्मती का शिकार बनते हैं ?

Sunday, March 11, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद पर प्रफुल्ल छाजेड़ की जीत के साइड इफेक्ट्स ने बृजमोहन अग्रवाल, जुल्फेश शाह, दुर्गेश काबरा, अनिल भंडारी, धीरज खंडेलवाल आदि के लिए अच्छी-खासी मुसीबत खड़ी कर दी है

मुंबई । प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बनने के बाद वेस्टर्न रीजन में वोटों के उलटफेर होने का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें सबसे तगड़ा झटका बृजमोहन अग्रवाल की चुनावी तैयारी और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल की सीट को लगता दिख रहा है । दरअसल इस वर्ष दिसंबर में होने जा रहे सेंट्रल काउंसिल चुनाव में प्रफुल्ल छाजेड़ इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के रूप में उम्मीदवार बनेंगे, जिसके चलते उन पर वोटों की बारिश होने का अनुमान लगाया जा रहा है । अब चूँकि वोटों की संख्या तो सीमित है, इसलिए वह यदि कहीं बारिश के रूप में गिरेंगे तो स्वाभाविक ही है कि कहीं 'सूखा' पड़ेगा । इसी सूखे की सबसे ज्यादा मार बृजमोहन अग्रवाल की चुनावी तैयारी और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल की मौजूदा सीट पर पड़ती नजर आ रही है । बृजमोहन अग्रवाल पिछली बार कामयाब तो नहीं हो सके थे, लेकिन उनका चुनावी प्रदर्शन ठीकठाक रहा था; और इसीलिए इस बार वह और जोरशोर से चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे थे । अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल पिछली बार पहली वरीयता में अच्छे वोट पाने के बावजूद बाद में लुढ़कने/फिसलने लगे थे और जैसे-तैसे करके सीट निकालने में सफल हुए थे । पहली वरीयता के वोटों के आधार पर यह दोनों प्रफुल्ल छाजेड़ से कुछ ही वोटों से आगे थे, लेकिन बाद में फिर पीछे जा पहुँचे थे । जातीय और क्षेत्रीय आधार पर यह चारों लगभग एक ही सेगमेंट का प्रतिनिधित्व करते हैं । इसलिए वोट पाने के लिए इनके बीच आपस में ही होड़ रहती है । प्रफुल्ल छाजेड़ पिछली बार सिटिंग सदस्य थे, लेकिन फिर भी पहली वरीयता के वोटों की गिनती में बृजमोहन अग्रवाल उनसे थोड़ा पीछे और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल उनसे कुछ आगे थे - इसलिए इन्हें उम्मीद थी कि अपनी तैयारी को और सुढृढ़ करके अबकी बार होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में यह अपनी अपनी स्थिति में और सुधार कर लेंगे ।
लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बन जाने से उनकी तैयारी पर पानी फिर गया लग रहा है । दरअसल वाइस प्रेसीडेंट होने से प्रफुल्ल छाजेड़ की चुनावी 'हैसियत' में भी जोर का उछाल आया है - जिसके चलते अबकी बार के चुनाव में जो प्रफुल्ल छाजेड़ चुनावी मैदान में होंगे, वह पिछली बार वाले प्रफुल्ल छाजेड़ से बिलकुल बदले हुए प्रफुल्ल छाजेड़ होंगे । वेस्टर्न रीजन में अबकी बार प्रोफेशन के सदस्य प्रफुल्ल छाजेड़ को ही नहीं, बल्कि वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ को वोट देंगे - और इसीलिए विश्वास किया जा रहा है कि प्रफुल्ल छाजेड़ पर अबकी बार वोटों की अच्छी बारिश होगी । इस 'बारिश' का बड़ा हिस्सा उन्हें अपने जातीय व क्षेत्रीय सेगमेंट से ही मिलेगा, और यही बात बृजमोहन अग्रवाल, अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल के लिए मुसीबत वाली है । उम्मीद की जा रही है कि प्रफुल्ल छाजेड़ को पहली वरीयता के वोटों में ही पिछली बार की तुलना में जोरदार फायदा होगा । पहली वरीयता में प्रफुल्ल छाजेड़ को पिछली बार 1665 वोट मिले थे, जबकि धीरज खंडेलवाल को 1683 तथा अनिल भंडारी को 1693 वोट मिले थे । बृजमोहन अग्रवाल को मिले वोटों का संख्या 1401 थी । पिछली बार कोटा 3230 वोट का तय हुआ था, जिसके इस बार 3800 के आसपास तय होने की उम्मीद की जा रही है । अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रफुल्ल छाजेड़ को अबकी बार पहली वरीयता में ही 3500 के आसपास वोट तो मिलने ही चाहिए । उनके वोटों में जो बढ़ोत्तरी होगी, उसका सीधा असर अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल के वोटों पर पड़ने की ही आशंका है । इस आशंका में बृजमोहन अग्रवाल को तो तगड़ा नुकसान होने का डर है ही, अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल को भी अपनी अपनी सीट बचा पाने के मामले में संकट में देखा/पहचाना जा रहा है ।
प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बनने के साइड इफेक्ट्स की चपेट में जुल्फेश शाह और दुर्गेश काबरा के भी आने/फँसने का डर व्यक्त किया जा रहा है । प्रफुल्ल छाजेड़ की विदर्भ क्षेत्र की ब्रांचेज में पहले से ही अच्छी पकड़ है, और इस नाते उम्मीद की जा रही है कि वाइस प्रेसीडेंट के रूप में उन्हें वहाँ से और ज्यादा वोट मिलेंगे - जो जुल्फेश शाह के समर्थन आधार पर सीधी चोट होगी । जुल्फेश शाह को पिछली बार 2100 से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन फिर भी वह सेंट्रल काउंसिल का हिस्सा बनने से पिछड़ गए थे । अबकी बार जब प्रफुल्ल छाजेड़ उनके वोट आधार पर सीधी सेंध लगाने जा रहे हैं, तब तो उनके लिए मुकाबला और भी मुश्किल होता नजर आ रहा है । प्रफुल्ल छाजेड़ के पक्ष में अनुमानित की जा रही वोटों की बारिश में दुर्गेश काबरा की तैयारी और उम्मीदें भी बहती हुई दिख रही हैं, क्योंकि वह भी उसी सेगमेंट के भरोसे हैं जिस सेगमेंट पर प्रफुल्ल छाजेड़ सवार हैं । इस तरह की अनुमानपूर्ण चर्चाओं ने वेस्टर्न रीजन में चुनावी माहौल में दिलचस्प किस्म की गर्मी पैदा हो गई है । प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट के रूप में चुनावी मैदान में उतरने की स्थिति में मारवाड़ी व जैन व दक्षिण महाराष्ट्र की ब्रांचेज के वोटों के भरोसे रहने वाले उम्मीदवारों के बीच जहाँ चिंता और परेशानी देखी जा रही है, वहाँ दूसरे 'सेगमेंट' के उन उम्मीदवारों की उम्मीदें बढ़ गईं हैं जो अभी तक मुकाबले में कहीं देखे/पहचाने नहीं जा रहे थे । जाहिर तौर पर इन अनुमानपूर्ण चर्चाओं ने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावों की पूरी तस्वीर को ही उल्टा-पुल्टा कर दिया है ।

Thursday, March 16, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा होने की घोषणा से सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह की फजीहत हुई और प्रकाश शर्मा की मुसीबत बढ़ी

कानपुर । मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने की जो हरकत की, उसके निशान मिटाने के लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कदम तो उठाया है - लेकिन मुकेश कुशवाह की हरकतों के दाग इतने गहरे हैं कि लगता नहीं है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के प्रयासों के बावजूद वह पूरी तरह मिट पायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी की भूमिका निभा रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह ने अपनी मनमानीपूर्ण बेईमानी से दीप कुमार मिश्र को चेयरमैन 'चुनवाने' का जो कांड किया, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने उसे रद्द कर दिया है - और चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब उसकी किसी रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने का निर्णय हुआ है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इस काले अध्याय को जोड़ने की जिम्मेदारी के लिए मुकेश कुशवाह को याद किया जायेगा । इस कलंक-कथा की खास बात यह है कि मुकेश कुशवाह जब इसे 'लिख' ही रहे थे, तब ही इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से साफ शब्दों में बता दिया गया था कि वह जो कर रहे हैं - वह नियम विरुद्ध है और गलत है; मुकेश कुशवाह उस समय लेकिन पद की गर्मी और अहंकार में इस कदर जकड़े हुए थे कि उन्होंने साफ साफ लिखे उन शब्दों को कोई अहमियत ही नहीं दी ।
मुकेश कुशवाह को दरअसल उम्मीद थी कि वह जो फैसला कर देंगे, इंस्टीट्यूट प्रशासन अंततः उसे स्वीकार कर ही लेगा । मुकेश कुशवाह की तरफ से उस समय दावा किया भी गया था कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । अनिल भंडारी से मिले आश्वासन के भरोसे ही मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से नियमों के मिले हवाले की परवाह करने की जरूरत नहीं समझी । मुकेश कुशवाह अपनी कारस्तानी को लेकर इसलिए भी आश्वस्त थे क्योंकि उनके किए-धरे को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन मिला था । किंतु किसी का भी आश्वासन और समर्थन उनके काम नहीं आया । लोगों का कहना/मानना है कि दरअसल मुकेश कुशवाह की जैसी छवि है, उसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को लगा होगा कि मुकेश कुशवाह की इस हरकत पर उन्होंने यदि कोई कार्रवाई नहीं की तो मुकेश कुशवाह का हौंसला बढ़ेगा और फिर वह अपनी कारस्तानियों से इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को बदनाम करते रहेंगे । इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह द्धारा मनमानीपूर्ण बेईमानी से कराए गए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव को रद्द करके उक्त चुनाव को दोबारा कराने का आदेश दिया गया है ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंस्टीट्यूट के इतिहास और उसकी पहचान/प्रतिष्ठा पर मुकेश कुशवाह द्धारा पोती गई कालिख को इस तरह से पौंछने की कोशिश तो की गई है, लेकिन उसकी यह कोशिश अधिकतर लोगों को आधी-अधूरी भी लग रही है । लोगों का मानना/कहना है कि सिर्फ चेयरमैन का ही नहीं, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का पूरा चुनाव ही दोबारा होना चाहिए । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में पहले चेयरमैन का चुनाव होता है, और यह चुनाव बाकी पदों के लिए होने वाले चुनाव की भावभूमि और केमिस्ट्री तय करता है - इसलिए चेयरमैन के चुनाव में हुई बेईमानी ने बाकी सभी चुनावों पर अपना असर डाला है, इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन यदि वास्तव में न्याय करना चाहता है तो उसे पूरा चुनाव दोबारा कराना चाहिए; अन्यथा चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाला चुनाव महज खानापूर्ति करना होगा । मुकेश कुशवाह की मनमानीपूर्ण बेईमानी के चलते चेयरमैन पद पाने से वंचित रहे रोहित रुवाटिया अग्रवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगता है कि तीन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के समर्थन के बूते मुकेश कुशवाह जो बेईमानी कर सके, उसके चलते दोबारा होने वाले चुनाव में 'वास्तविक चुनाव' नहीं हो सकेगा - और रोहित रुवाटिया अग्रवाल के साथ सचमुच न्याय नहीं हो पायेगा । समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से रोहित रुवाटिया अग्रवाल को सलाह दी जा रही है कि उन्हें सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पदों का चुनाव दोबारा कराने हेतु इंस्टीट्यूट प्रशासन को राजी करने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । माना/समझा जाता है कि रद्द हुए चुनाव में प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को समर्थन नहीं दिया था । इसके लिए जयपुर और राजस्थान में उन्हें भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा है । लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जयपुर और राजस्थान का वास्ता देकर ही समर्थन जुटाया था, और अगले चुनाव में भी उन्हें यही 'वास्ता' देना पड़ेगा - ऐसे में जयपुर और राजस्थान को चेयरमैन 'मिलने' के मौके के साथ उन्होंने धोखा क्यों कर दिया ? प्रकाश शर्मा समय के साथ जयपुर और राजस्थान के लोगों के 'घाव' के भरने का इंतजार कर रहे थे कि दोबारा चुनाव होने/कराने की घोषणा ने उनके घावों को कुरेद कर फिर से ताजा कर दिया है । प्रकाश शर्मा और उनके नजदीकियों को यह डर सता रहा है कि चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में रोहित रुवाटिया अग्रवाल यदि नहीं जीते, तो जयपुर और राजस्थान में लोग इसके लिए प्रकाश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे और इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव का नतीजा क्या होगा, इसका जबाव तो जल्दी ही मिल जायेगा - लेकिन दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने मुकेश कुशवाह की बेईमानीपूर्ण कारस्तानी पर जो मोहर लगाई है और प्रकाश शर्मा के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसने सेंट्रल रीजन में एक दिलचस्प नजारा खड़ा किया है ।

Sunday, September 27, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अनिल भंडारी कहीं दूसरे मितिल चोकसी तो साबित नहीं होंगे

मुंबई । अनिल भंडारी ने सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु अपनी जिन खूबियों पर भरोसा किया है, उसे देखते/पहचानते हुए वेस्टर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के जानकारों और खिलाड़ियों को मितिल चोकसी की उम्मीदवारी याद आ रही है - किंतु इस 'याद' में अनिल भंडारी के लिए कुछेक सबक भी छिपे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए अनिल भंडारी अपनी स्मार्टनेस पर निर्भर कर रहे हैं । उनके समर्थकों के साथ साथ दूसरे लोगों का भी मानना और कहना है कि अनिल भंडारी में लोगों को प्रभावित करने का अच्छा हुनर है, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलेगा । लोगों का कहना है कि अपने व्यक्तित्व और अपने व्यवहार से अनिल भंडारी लोगों पर जैसे जादू सा कर देते हैं, और उनके द्वारा किए गए जादू से वशीभूत होकर लोग उनकी तरफ खिंचे चले आते हैं । अनिल भंडारी को 'मार्केटिंग' के मामले में खासा होशियार माना/समझा जाता है - और इसी आधार पर माना/समझा जा रहा है कि अनिल भंडारी सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी की भी मार्केटिंग कर लेंगे, और चुनाव में कामयाब हो जायेंगे । अनिल भंडारी के समर्थकों की इस 'राजनीतिक समझ' पर बात करते हुए इंस्टीट्यूट की वेस्टर्न रीजन की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कुछेक लोग लेकिन मितिल चोकसी को याद कर रहे हैं, और अनिल भंडारी के लिए सुझाव दे रहे हैं कि उन्हें मितिल चोकसी के अनुभव से सबक सीखना चाहिए । 
उल्लेखनीय है कि मितिल चोकसी वर्ष 2003 में वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे, और उसी वर्ष हुए चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार थे । स्मार्टनेस - व्यक्तित्व और व्यवहार के मामले में वह अनिल भंडारी से इक्कीस ही थे । मार्केटिंग के मामले में भी वह अनिल भंडारी पर भारी ही पड़ेंगे, और लोगों को प्रभावित करने की कला में खूब होशियार होने के बावजूद अनिल भंडारी यदि चाहें, तो मितिल चोकसी से बहुत कुछ सीख सकते हैं । वेस्टर्न रीजन में लोग आज भी याद करते हैं, और मानते व कहते हैं कि मितिल चोकसी जैसा चेयरमैन वेस्टर्न रीजन को अभी तक नहीं मिला है । इतने सब के बावजूद सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में मितिल चोकसी को इतने वोट नहीं मिल पाए, कि वह चुनाव जीत पाते । मितिल चोकसी के साथ तो एक और प्लस प्वाइंट था - और वह यह कि उनके चेयरमैन बनने से कुल तेरह वर्ष पहले, वर्ष 1990 में उनके पिता आरएस चोकसी वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे । आरएस चोकसी काफी लंबे समय तक रीजनल काउंसिल में रहे थे । उम्मीद की गई थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की गई मितिल चोकसी की उम्मीदवारी को उनके पिता आरएस चोकसी की सक्रियता का भी फायदा मिलेगा, किंतु जो नहीं मिल सका । अपने व्यक्तित्व और व्यवहार का जादू लोगों पर बिखेरने के बावजूद मितिल चोकसी सेंट्रल काउंसिल का चुनाव नहीं जीत सके थे, तो इसका कारण यही समझा/माना गया था कि तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद वह स्थितियों को अपने चुनाव के संदर्भ में व्यवस्थित नहीं कर पाए और वोट पाने में पिछड़ गए । मॉरल ऑफ द स्टोरी यह है कि सिर्फ जादुई व्यक्तित्व के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता । मितिल चोकसी की इस स्टोरी का अनिल भंडारी के लिए संदेश और सबक यही है कि वह अपने व्यक्तित्व और व्यवहार के भरोसे ही यदि रहे, तो मितिल चोकसी की तरह धोखा खा सकते हैं ।
अनिल भंडारी के मामले में यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रीजनल काउंसिल के पिछले चुनावी नतीजे भी 'बताते' हैं कि अनिल भंडारी को अपने जादुई व्यक्तित्व व व्यवहार का चुनाव में कोई खास फायदा नहीं हुआ है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार रीजनल काउंसिल के 49 उम्मीदवारों में अनिल भंडारी पहली वरीयता के 772 वोटों के साथ 16वें स्थान पर थे; और फाइनली अपने वोटों की संख्या को 1243 तक पहुँचाते हुए उन्होंने विजेता उम्मीदवारों में अपना स्थान एक ऊँचा करते हुए 15वाँ कर लिया था । उससे पिछली बार के, यानि वर्ष 2009 के चुनाव में उन्हें पहली वरीयता के 767 वोटों के साथ 14वाँ और फाइनली 1089 वोटों के साथ 13 वाँ स्थान मिला था । जाहिर है कि 2010 से 2012 के बीच के समय में काउंसिल में रहते हुए उन्होंने अपनी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं किया, और उनके लिए मामला जहाँ का तहाँ ही रहा । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में यह कोई बहुत उत्साहित करने वाला नतीजा नहीं कहा जा सकता है । जादुई व्यक्तित्व और व्यवहार के बावजूद अनिल भंडारी यदि वर्ष 2010 से 2012 के बीच अपनी चुनावी स्थिति में कोई सुधार नहीं कर सके थे, तो आखिर क्या गारंटी है कि वर्ष 2013 से 2015 के बीच उन्होंने बहुत कमाल कर दिया होगा ? मितिल चोकसी का किस्सा और रीजनल काउंसिल चुनाव में खुद अनिल भंडारी का परफॉर्मेंस कहता/बताता है कि सिर्फ स्मार्टनेस के भरोसे वोट नहीं पाए जा सकते हैं ?
संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया और पंकज जैन द्वारा खाली की गईं सेंट्रल काउंसिल की सीटों को कब्जाने के लिए दुर्गेश काबरा, बीएम अग्रवाल, अनिल भंडारी और धीरज खण्डेलवाल ने जिस तरह की तैयारी की है, उसे देखते/समझते हुए रीजन के चुनावी खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि इनमें से एक का जीतना तो पक्का है; चुनावी गणित यदि किसी खास ऐंगल पर बैठा तो दो लोग भी जीत सकते हैं - जीतने वाले कौन होंगे, यह अभी किसी के लिए भी कह पाना मुश्किल हो रहा है । मारवाड़ी वोटों पर भरोसा करने वाले इन चारों उम्मीदवारों के साथ खूबियों और कमजोरियों की अपनी अपनी फेहरिस्त है; और इनके बीच मुकाबला टक्कर का है और खासा दिलचस्प है । अनिल भंडारी के समर्थक अनिल भंडारी के जादुई व्यक्तित्व और व्यवहार के भरोसे अनिल भंडारी की नाव पार हो जाने का जो विश्वास दिखा/जता रहे हैं, उस विश्वास की पड़ताल बाकी तीनों उम्मीदवारों की संभावनाओं के संदर्भ में करने पर ही लोगों को मितिल चोकसी का चुनाव याद आया है ।  

Thursday, July 16, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की खाली हो रही तीन सीटों को देखते हुए दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी ने तैयारी तो अच्छे से की है, किंतु प्रफुल्ल छाजेड़ की सक्रियता ने उनके सामने चुनौती भी गंभीर बना दी है

मुंबई । संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया और पंकज जैन द्वारा खाली की गईं सेंट्रल काउंसिल की सीटों पर कब्जा करने के लिए इंस्टीट्यूट के वेस्टर्न रीजन में उम्मीदवारों के बीच जो घमासान मचा है, उसने वेस्टर्न रीजन में दिलचस्प चुनावी नजारा प्रस्तुत किया हुआ है । इस नजारे को खासा नजदीक से और गंभीरता से देख रहे चुनावी विश्लेषकों का मानना और कहना है कि सेंट्रल काउंसिल की खाली हो रही इन तीनों सीटों को भरने के लिए हाथ-पैर मारना तो कई लोगों ने शुरू किया है, किंतु अभी तक कोई ऐसा दमदार उम्मीदवार नहीं दिख रहा है - जिसे/जिन्हें इन खाली हो रही सीटों का वारिस मान लिया जाए । दरअसल इसीलिए वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाला चुनाव खासा मजेदार हो गया है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में वेस्टर्न रीजन से जो तीन लोग सीट खाली कर रहे हैं, उनमें दो बातें कॉमन हैं - एक तो यह कि तीनों मुंबई के हैं और दूसरा यह कि तीनों मोटे तौर पर मारवाड़ी वोटों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं । अभी जो उम्मीदवार सक्रिय दिख रहे हैं और उनकी जो दशा/दिशा नजर आ रही है, उसमें यह बात तो निश्चित ही दिख रही है कि इनकी जगह अब जो भी लोग आयेंगे - वह मारवाड़ी वोटों का वैसा प्रतिनिधित्व तो नहीं ही कर रहे होंगे, जैसा प्रतिनिधित्व इन तीनों ने किया है । 'खतरा' यह भी है कि मुंबई भी अपनी तीनों सीटें बचाकर शायद न रख सके । माना जा रहा है कि खाली हो रही तीन सीटों में कम-से-कम एक सीट तो मुंबई के बाहर निश्चित ही जा रही है । अभी सक्रियता व चुनावी समीकरणों के आधार पर जो परसेप्शन बना है, उसमें एक सीट पर अहमदाबाद के पराग रावल 'आते' हुए नजर आ रहे हैं । 
मारवाड़ी वोटों के प्रतिनिधित्व के लिए दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी के बीच तगड़ी होड़ देखने को मिल रही है । दुर्गेश काबरा ने पिछली बार भी सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, लेकिन तब वह कोई बहुत उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सके थे और असफल रहे थे । अनिल भंडारी ने भी रीजनल काउंसिल का पिछला चुनाव कोई बहुत प्रभावी तरीके से नहीं जीता था । पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के वेस्टर्न रीजन के 24 उम्मीदवारों की मतगणना में पहली वरीयता के 967 वोटों के साथ दुर्गेश काबरा 18वें नंबर पर रहे थे; फाइनली 1039 वोटों के साथ 18वें नंबर पर रहते हुए ही वह चुनावी होड़ से बाहर हो गए थे । अनिल भंडारी रीजनल काउंसिल के 49 उम्मीदवारों में पहली वरीयता के 772 वोटों के साथ 16वें स्थान पर थे; फाइनली अपने वोटों की संख्या को 1243 तक पहुँचाते हुए उन्होंने विजेता उम्मीदवारों में अपना स्थान एक ऊँचा करते हुए 15वाँ कर लिया था । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में इसे कोई बहुत प्रभावी नतीजा नहीं कहा जा सकता है । उल्लेखनीय है कि वेस्टर्न रीजन में इस बार 75 हजार से ज्यादा वोट मान्य होने का अनुमान है, जिसमें से 35 से 38 हजार के बीच वोट पड़ने की उम्मीद की जा रही है । चुनावी विश्लेषकों का आकलन है कि सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने की तैयारी करने वाले मौजूद आठ सदस्य इनमें से 20/22 हजार वोट झटक लेंगे । कोटा तीन हजार वोटों तक जा सकता है । ऐसे में खाली हो रही तीन सीटों पर कब्जा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों के लिए मामला खासा कठिन हो जाता है ।
मामला भले ही खासा कठिन हो जाता हो, लेकिन फिर भी मारवाड़ी वोटों का प्रतिनिधित्व करने वाली तीन सीटों के खाली होने से मारवाड़ी वोटों के भरोसे रहने वाले उम्मीदवारों के लिए मौका तो अच्छा ही है । यह अच्छा मौका ही - पिछला प्रदर्शन प्रभावी न होने के बावजूद - दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी के लिए उम्मीद पैदा करता है । दुर्गेश काबरा के समर्थक कहते भी हैं कि कई मारवाड़ी उम्मीदवारों के रहते हुए दुर्गेश काबरा ने 24 उम्मीदवारों में 18वीं स्थिति भी जो पाई, वह कोई खराब नतीजा नहीं है; इसलिए अब की बार जब संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया, पंकज जैन चुनावी मैदान में नहीं होंगे - तब दुर्गेश काबरा के लिए ज्यादा चुनौती नहीं होगी और उनके लिए जीत कोई मुश्किल नहीं होगी । दुर्गेश काबरा के समर्थक एक और जोरदार तर्क देते हैं और वह यह कि सेंट्रल काउंसिल चुनाव की जो एक अलग और विस्तृत केमिस्ट्री होती है, दुर्गेश काबरा ने पिछली बार की अपनी उम्मीदवारी के चलते उसे समझ/पहचान लिया है; तथा पिछली बार की अपनी कमजोरियों व गलतियों से भी सबक लिया है - इसलिए इस बार उनके लिए ज्यादा समस्या नहीं ही होगी । यह तर्क एक तरह से अनिल भंडारी के लिए चुनौती खड़ी करता है - क्योंकि अनिल भंडारी अभी सेंट्रल काउंसिल चुनाव की केमिस्ट्री से ज्यादा परिचित नहीं हैं और रीजनल काउंसिल का पिछला चुनाव भी उन्होंने कोई बहुत आकर्षक तरीके से नहीं जीता था । अनिल भंडारी के समर्थकों का कहना लेकिन यह है कि पिछले वर्ष वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में अनिल भंडारी ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई थी और उनकी जो उपलब्धियाँ रहीं थीं, उसके कारण चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी जो पोजीटिव पहचान बनी है - उसका उन्हें फायदा मिलेगा । अनिल भंडारी की उम्मीदवारी के समर्थकों का यह भी तर्क है कि पिछले दो-तीन वर्षों में जो नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स बने हैं, उनके बीच अनिल भंडारी की रीजनल काउंसिल के सदस्य व चेयरमैन के रूप में अच्छी पहचान बनी है - जिसके भरोसे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन जुटाना उनके लिए आसान होगा । 
दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी के समर्थकों के अपने अपने जो तर्क हैं, वह यूँ तो बहुत मौजूँ हैं - किंतु चुनाव सिर्फ तर्कों के सहारे तो जीता नहीं जाता है; संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया और पंकज जैन का ही उदाहरण देखें तो पाते हैं कि लंबी सक्रियता और भारी स्वीकार्यता के बावजूद वह कोई बहुत प्रभावी तरीके से अपनी अपनी जीत प्राप्त नहीं कर सकें हैं । दरअसल चुनावी नतीजे का ऊँठ किस करवट बैठता है, यह बहुत सारे फैक्टर्स पर निर्भर करता है । इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है, और वह उदाहरण यह कि मारवाड़ी वोटों के भरोसे जिन दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी के लिए मुकाबले को थोड़ा अनुकूल समझा जा रहा है, उन्हें लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ से तगड़ी चुनौती मिलती दिख रही है । चुनावी विश्लेषकों का मानना और कहना है कि संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया और पंकज जैन के बाहर होने से इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में मारवाड़ी वोटों का प्रतिनिधित्व प्रफुल्ल छाजेड़ के पास आने की संभावना है; और उनके वोटों में भारी उछाल मिलने की उम्मीद है । अनुमानपूर्ण दावे हैं कि पंकज जैन को मिलने वाले जैन वोट तो प्रफुल्ल छाजेड़ के खाते में जायेंगे ही, दूसरे मारवाड़ी वोटों का झुकाव भी उन्हीं ही तरफ होने का अनुमान है । प्रफुल्ल छाजेड़ के पक्ष में एक तथ्य और है : इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इंस्टीट्यूट के पूर्व अध्यक्ष बंसीधर मेहता की बड़ी गहरी छाया रही है । उनकी फर्म में ऑर्टिकल या पार्टनर रहे लोगों की इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में बड़ी धूम रही है । गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन आदि इसके उदाहरण हैं । बंसीधर मेहता की छाया से फायदा उठाने/मिलने का मौका अब प्रफुल्ल छाजेड़ के पास आ गया है । लोगों का मानना और कहना है कि प्रफुल्ल छाजेड़ ने यदि सुनियोजित तरीके से काम किया, तो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में बड़ी पहचान और धाक बनायेंगे । प्रफुल्ल छाजेड़ की यह अनुमानित बड़ी पहचान और धाक लेकिन दुर्गेश काबरा और अनिल भंडारी के लिए मुसीबत खड़ी करेगी और उनकी चुनावी यात्रा को चुनौतीपूर्ण बनायेगी ।