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Thursday, October 8, 2020

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए बालकृष्ण अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी तो जता दी है, लेकिन उनके नजदीकियों का ही कहना है कि उनके लिए वोट जुटाना खासा मुश्किल ही होगा

सूरत । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए तैयारी कर रहे बालकृष्ण अग्रवाल अभी हार्दिक शाह की भी उम्मीदवारी के आ जाने के झटके से संभल भी नहीं पाए थे, कि सेंट्रल काउंसिल के अन्य उम्मीदवारों के सूरत में दस्तक देने की आहटों ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है । बालकृष्ण अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह है कि सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट जुटाने में जो संभावित उम्मीदवार दिलचस्पी ले रहे हैं, उनमें से अधिकतर की निगाह मारवाड़ी समुदाय के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर है - जिनके भरोसे बालकृष्ण अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं । ऐसे में, बालकृष्ण अग्रवाल के सामने अपने समर्थन आधार को ही बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है । बालकृष्ण अग्रवाल को सबसे गंभीर चुनौती सुनील पटोदिया से मिलती दिख रही है । सूरत में सुनील पटोदिया के कई समर्थक व शुभचिंतक हैं, जो उनके सरल तथा काम आने वाले व्यवहार से प्रभावित हैं, और उनकी उम्मीदवारी की खबर से खासे उत्साहित हैं । मजे की बात यह है कि सुनील पटोदिया ने अभी सूरत में कोई चुनावी संपर्क नहीं किया है, लेकिन उन्हें जानने वाले उनकी उम्मीदवारी की खबर से ही उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने की बातें करने लगे हैं ।
सुनील पटोदिया के अलावा अनिल भंडारी, धीरज खंडेलवाल तथा दुर्गेश काबरा की भी सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खास दिलचस्पी है; और यह सभी कुल मिलाकर बालकृष्ण अग्रवाल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम करते लग रहे हैं । हालाँकि बालकृष्ण अग्रवाल के नजदीकी रहे लोगों का कहना है कि बालकृष्ण अग्रवाल को कोई दूसरा नुकसान नहीं पहुँचायेगा - वह खुद ही खुद को नुकसान पहुंचायेंगे; और पहुँचायेंगे क्या, पहुँचा चुके हैं । बालकृष्ण अग्रवाल के नजदीकी रहे लोगों के अनुसार, वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चुने जाने के बाद बालकृष्ण अग्रवाल का रवैया व व्यवहार बिलकुल ही बदल गया, और वह अपने नजदीकियों व समर्थकों तक को अपने से दूर कर बैठे हैं । बालकृष्ण अग्रवाल के पार्टनर रहे लोग तक उनके खिलाफ बातें करते सुने जा रहे हैं । ऐसे में, बालकृष्ण अग्रवाल के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाना खासा मुश्किल ही होगा । विडंबना और मजे की बात लेकिन यह देखी/समझी जा रही है कि बालकृष्ण अग्रवाल की मुश्किल के चलते हार्दिक शाह को कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है । 
हार्दिक शाह के सामने सूरत के बाहर से वोट जुटाने की बड़ी चुनौती है । दरअसल सिर्फ सूरत के वोटों के भरोसे तो सेंट्रल काउंसिल का चुनाव नहीं जीता जा सकता है । जय छैरा पिछले तीन टर्म से इसलिए चुनाव जीतते रहे, क्योंकि उन्हें सूरत के बाहर से खूब वोट मिलते रहे हैं । जय छैरा को सूरत में भी एकतरफा वोट मिले, और सूरत में उन्हें किसी दूसरे उम्मीदवार ने डिस्टर्ब नहीं किया - तथा उनके उम्मीदवार रहते हुए बाहर के उम्मीदवारों ने भी सूरत से दूरी बना कर रखी । अब लेकिन ऐसी स्थिति नहीं रहेगी । प्रत्येक चुनाव परसेप्शन पर भी निर्भर करता है । सूरत में सेंट्रल काउंसिल के लिए दो उम्मीदवार होने से सूरत के लोगों के बीच यह परसेप्शन अभी से बनने लगा है कि दो उम्मीदवार होने से सेंट्रल काउंसिल में सूरत के प्रतिनिधित्व की संभावना पर ग्रहण लग गया है । इस परसेप्शन के चलते बालकृष्ण अग्रवाल तथा हार्दिक शाह के लिए वोट जुटाना और मुश्किल हो गया है, क्योंकि वोट देने वाले अधिकतर लोग ऐसे उम्मीदवारों को वोट देने से बचते हैं, जिनके जीतने की संभावना पर पहले से ही सवाल उठ खड़े हुए हों । इस स्थिति ने बाहर के, खासकर मुंबई के उम्मीदवारों को सूरत में समर्थन जुटाने के लिए और ज्यादा प्रेरित किया है, जिसके कारण सूरत में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चुनावी राजनीति के समीकरण और भी दिलचस्प हो गए हैं ।

Thursday, January 30, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अगले वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के अपने अपने उम्मीदवारों के साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ने से वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनावी मुकाबला रोचक हुआ

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता जिस तरह से आपने-सामने खड़े हो गए हैं, उसके चलते वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है ।  उल्लेखनीय है कि प्रफुल्ल छाजेड़ ने वेस्टर्न रीजन के अनिल भंडारी की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ है, जबकि अतुल गुप्ता ने ईस्टर्न रीजन के सुशील गोयल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान छेड़ा हुआ है । सुशील गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में सुशील गोयल को लोग ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन जब से अतुल गुप्ता ने उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की जिम्मेदारी सँभाली है, तब से सुशील गोयल की उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जाने लगा है । संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि सुशील गोयल यदि सचमुच प्रफुल्ल छाजेड़  उम्मीदवार अनिल भंडारी को टक्कर देते हुए नजर आए, तो इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल का समर्थन भी उन्हें मिल जायेगा । वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उत्तम अग्रवाल का एकमात्र एजेंडा दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार को सफल होने से रोकने का है, और इसीलिए सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल का समर्थन मिल सकने का भरोसा जताया जा रहा है ।
अतुल गुप्ता की तरफ से लेकिन मजे की बात यह देखने में आ रही है कि वह सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल के समर्थन से बचाने की कोशिश कर रहे हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अतुल गुप्ता दो वजहों से ऐसा कर रहे हैं : एक तो उन्हें डर है कि सुशील गोयल की उम्मीदवारी के साथ उत्तम अग्रवाल का नाम जुड़ा तो सुशील गोयल का बनता दिख रहा 'काम' बिगड़ जायेगा, और दूसरी बात यह कि सुशील गोयल की सफलता में यदि उत्तम अग्रवाल की भूमिका बनी/दिखी, तो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति तथा व्यवस्था में उत्तम अग्रवाल को महत्त्व मिलने लगेगा । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उत्तम अग्रवाल अभी पूरी तरह अलग-थलग पड़े हुए हैं; वह उछल-कूद तो खूब मचाये रखते हैं, लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता है - उनके अपने भी नहीं । यही कारण है कि उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में जो धीरज खंडेलवाल वाइस प्रेसीडेंट बनने की लाइन में हैं, उन धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है - खुद धीरज खंडेलवाल भी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । इसीलिए, अब जब चुनाव सिर पर है तब भी धीरज खंडेलवाल चुनावी परिदृश्य से 'दूर' दूसरे कामों में व्यस्त हैं ।
सुशील गोयल की उम्मीदवारी को अतुल गुप्ता के समर्थन से जो ताकत मिलती है, वह उत्तम अग्रवाल के समर्थन की संभावना से बिगड़ भी जाती है - और यही बात अनिल भंडारी की उम्मीदवारी को बढ़त दिलाती लग रही है । लेकिन उनके साथ भी मुश्किलें कम नहीं हैं । दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के भरोसे एक अनिल भंडारी ही नहीं हैं, बल्कि वेस्टर्न रीजन के एनसी हेगड़े तथा सेंट्रल रीजन के मनु अग्रवाल भी चुनावी मैदान में कूदे हुए हैं । इन्हें प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार 'बी' और उम्मीदवार 'सी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इसके चलते प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थकों व नजदीकियों के बीच असमंजस बन गया है, और इस असमंजस के चलते प्रफुल्ल छाजेड़ ग्रुप में एकता बने रह पाने को लेकर संदेह पैदा हो गया है । अनिल भंडारी और सुशील गोयल को अलग अलग कारणों से मुसीबत में घिरा पाकर वेस्टर्न रीजन के निहार जंबुसारिया व जय छैरा तथा सदर्न रीजन के अब्राहम बाबु व जी शेखर अपनी अपनी दाल गलाने की कोशिशों में हैं । दरअसल अलग अलग कारणों से इनके लिए काउंसिल सदस्यों के बीच समर्थन का 'भाव' तो है, लेकिन इस भाव को वोट में बदलने के लिए जो मैकेनिज्म चाहिए होता है - उसका इनके पास नितांत अभाव है । यह तो बस किस्मत के भरोसे हैं । इन्हें भी पता है कि इंस्टीट्यूट को कई (वाइस) प्रेसीडेंट किस्मत के चलते ही मिले हैं । 

Thursday, November 29, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हो रहे चुनाव अभियान में आचारसंहिता के उल्लंघन की शिकायतों की सुनवाई के लिए सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता वाले पैनल के गठन में अतुल गुप्ता के खिलाफ हुई शिकायत की भूमिका की चर्चा ने चुनावी माहौल में गर्मी पैदा की

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के लिए होने वाले चुनाव में उम्मीदवारों द्वारा चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं और शिकायतों की गूँज लगता है कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के पदाधिकारियों के कानों तक जा पहुँची है, और उनके दबाव में चुनाव के अंतिम दौर में इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को शिकायतों की सुनवाई के लिए दो सरकारी प्रतिनिधियों वाले एक तीन सदस्यीय पैनल का गठन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ । कई लोगों का कहना है कि इंस्टीट्यूट के इतिहास में इससे पहले कभी वी सागर जैसा सेक्रेटरी भी नहीं रहा है, जो तमाम शिकायतों को लगातार अनसुना करता रहे और कानों में तेल डाल कर बैठा रहे । कुछेक लोगों ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया है कि इंस्टीट्यूट के चुनावी इतिहास में अब से पहले यह नजारा भी कभी देखने को नहीं मिला कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के पिताजी ही चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की कोशिशों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हों और उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हों । यह भी पहली बार देखने में आ रहा है कि इंस्टीट्यूट के कुछेक पूर्व प्रेसीडेंट पूरी निर्लज्जता के साथ 'इस' या 'उस' उम्मीदवार के समर्थन में वोट जुटाने के अभियान में खुल्लमखुल्ला लगे हुए हैं । इस लिहाज से इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के लिए हो रहा इस बार का चुनाव कई मायनों में अनोखा है और 'अंधेर नगरी व चौपट राजा' का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है । 
उल्लेखनीय है कि यूँ तो इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के प्रत्येक चुनाव में चुनावी आचारसंहिता का उल्लंघन होता रहा है और आरोप लगते रहे हैं; लेकिन हर बार देखने में आया है कि आचारसंहिता का उल्लंघन करने के आरोपी बनने वाले उम्मीदवार शर्म और लिहाज का झीना सा ही सही एक पर्दा रखते रहे हैं, और छापामार कार्रवाई की तरह हरकत करके बच निकलते रहे हैं, लेकिन इस बार तो खुल्लाखेल फरुख्खावादी जैसा मामला हो गया है । आचारसंहिता की ऐसीतैसी करने वाले उम्मीदवारों को जैसे किसी की परवाह ही नहीं है । प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता और सेक्रेटरी वी सागर के नाकारापन की हद का आलम यह है कि काउंसिल के मौजूदा सदस्य तक नियमों/कानूनों का मजाक बना दे रहे हैं । मुंबई में काउंसिल के ही एक सदस्य धीरज खंडेलवाल द्वारा किए गए आयोजनों पर काउंसिल के ही सदस्यों ने सवाल उठाये, लेकिन नवीन गुप्ता और वी सागर ने उनके ही सवालों का जबाव देना तक जरूरी नहीं समझा । चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की अधिकतर शिकायतों को इलेक्शन ऑफिसर की भूमिका निभा रहे सेक्रेटरी वी सागर ने यह तर्क देते हुए खारिज कर दिया कि उनके साथ पर्याप्त सुबूत नहीं दिए गए । धीरज खंडेलवाल के मामले में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्वारा पूछे गए सामान्य से सवाल पर उन्होंने चुप्पी साध ली । इससे ही जाहिर है कि चुनावी आचारसंहिता के आरोपों को उन्होंने पूरी तरह अनदेखा/अनसुना करने का मन बना लिया है । समझा जाता है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी के नाकारापन की शिकायतें मिलने के बाद ही मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के पदाधिकारियों ने मामले में हस्तक्षेप करने का फैसला लिया होगा और उसी के फलस्वरूप आचारसंहिता के आरोपों की सुनवाई के लिए दो सरकारी प्रतिनिधियों वाले तीन सदस्यीय पैनल का गठन करने की घोषणा की गई है ।
मजे की बात यह है कि इस पैनल के गठन के लिए नॉर्दर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । दरअसल दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में 24 नवंबर को 'प्रोफेशनल मीट' के नाम पर आयोजित हुई अतुल गुप्ता की चुनावी सभा की शिकायत 26 नवंबर को हुई, जिसकी एक प्रति मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स को भी भेजी गई । उक्त शिकायत में ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ खासे पर्याप्त सुबूत भी दिए गए हैं । 26 नवंबर को हुई इस शिकायत के अगले ही दिन, 27 नवंबर को सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता के साथ पैनल के गठन की सूचना जारी हो गई । इससे लोगों को लगा है कि अतुल गुप्ता के खिलाफ हुई शिकायत तथा उसमें दिए गए तथ्यों व सुबूतों को मिनिस्ट्री के पदाधिकारियों ने गंभीर माना/पाया है, और तुरंत ही यह फैसला कर लिया कि चुनावी आचारसंहिता के आरोपों की सुनवाई इंस्टीट्यूट के पदाधिकरियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती । उल्लेखनीय है कि अतुल गुप्ता के प्रचार अभियान का माध्यम बनने के चक्कर में नॉर्थ-एक्स सीपीई स्टडी सर्किल पीछे कई दिनों तक सस्पेंड रह चुका है; इसके बावजूद अतुल गुप्ता अपनी हरकतों से बाज नहीं आए हैं । सरकारी प्रतिनिधियों की सदस्यता के साथ पैनल के गठन की सूचना में अतुल गुप्ता की 'जिम्मेदारी' की चर्चाओं ने अतुल गुप्ता की मुसीबतों को और बढ़ा दिया है । यह देखना दिलचस्प होगा कि इस पैनल के गठन के बाद उम्मीदवारों द्वारा चुनावी आचारसंहिता के उल्लंघन की घटनाओं और शिकायतों में सचमुच कोई कमी आती है या मामला पहले जैसा ही बना रहता है ।

Monday, October 29, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के नियमों की अनदेखी करते हुए धीरज खंडेलवाल द्वारा मुंबई में आयोजित किए गए 'एसएमई लीडर अवॉर्ड' पर प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की मजबूरीभरी चुप्पी इंस्टीट्यूट में अराजकता का सुबूत नहीं है क्या ?

मुंबई । सेंट्रल काउंसिल सदस्य धीरज खंडेलवाल ने मनमाने तरीके से 'एसएमई लीडर अवॉर्ड्स' के आयोजन के जरिये इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के लिए किरकिरी वाले हालात बना दिए हैं । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच ही कहा/सुना जाता है कि नवीन गुप्ता कहने को तो इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट जैसे बड़े पद पर हैं, लेकिन उनकी दशा मंदिर के उस घंटे की तरह है - जिसे कोई भी जब चाहे तब 'बजा' देता है और नवीन गुप्ता इस 'बजाये' जाने को असहाय देखते रहते हैं । धीरज खंडेलवाल ने 'एसएमई लीडर अवॉर्ड्स' के जरिये जो हरकत की है, उस पर नवीन गुप्ता की असहायता का आलम यह है कि अन्य कुछेक लोगों के साथ एसबी जावरे, संजीव चौधरी, एनसी हेगड़े जैसे सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने जो स्पष्टीकरण माँगे हैं - नवीन गुप्ता के लिए उनका जबाव तक देना मुश्किल हो रहा है,  और वह इनके सवालों से मुँह छिपाते फिर रहे हैं । 'एसएमई लीडर अवॉर्ड्स' को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वह बड़े साधारण से हैं : इस आयोजन को क्या काउंसिल की अनुमति थी; इस आयोजन के लिए बजट तय व पास हुआ था क्या; आयोजन की स्पॉन्सरिंग के लिए काउंसिल की अनुमति थी क्या ? सेंट्रल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा लिखित रूप में पूछे गए इन सवालों पर नवीन गुप्ता ने लेकिन चुप्पी साधी हुई है । मजे की बात यह है कि नवीन गुप्ता ने अभी पिछले दिनों ही ऐलान किया था कि इंस्टीट्यूट के आयोजनों में स्पॉन्सरशिप नहीं ली जाएगी । धीरज खंडेलवाल ने लेकिन उनके ऐलान की अनदेखी करते हुए 'एसएमई लीडर अवॉर्ड्स' को स्पॉन्सर करा लिया । इससे लगता है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच नवीन गुप्ता की कोई इज्जत ही नहीं है, और जिसे जैसा जो मन करता है वह खुल्लमखुल्ला मनमानी करता है ।
इस मामले में सेंट्रल काउंसिल में गवर्नमेंट नॉमिनी विजय झालानी का रवैया भी बड़ा मजेदार है । अभी पिछले दिनों उन्होंने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में अड़ंगा डाल कर उसे होने नहीं दिया था, क्योंकि उस मीटिंग के लिए चेयरमैन की सहमति नहीं थी । उनका कहना था कि वह इंस्टीट्यूट में कोई गलत काम नहीं होने दे सकते हैं । विजय झालानी लेकिन धीरज खंडेलवाल द्वारा काउंसिल को इग्नोर करके मनमाने तरीके से 'एसएमई लीडर अवॉर्ड' का आयोजन करने के मामले में चुप्पी साधे बैठे हुए हैं, जबकि वह आयोजक कमेटी के सदस्य भी हैं । 'एसएमई लीडर अवॉर्ड्स' का आयोजन कमेटी फॉर मेंबर्स इन इंडस्ट्रीज एंड बिजनेस द्वारा किया गया, जिसके चेयरमैन धीरज खंडेलवाल हैं । कमेटी के 'मिशन' और ऑब्जेक्टिव्स' तो बहुत व्यापक हैं, लेकिन धीरज खंडेलवाल ने अपनी छोटी सोच के चलते उन 'मिशन' व 'ऑब्जेक्टिव्स' को अवॉर्ड देने तक सीमित कर दिया है । धीरज खंडेलवाल को पता था कि इस तरह के मनमाने आयोजन के लिए काउंसिल से उन्हें अनुमति नहीं मिलेगी, लिहाजा वह अनुमति लेने के चक्कर में पड़े ही नहीं । लोगों के बीच चर्चा है कि यह आईडिया उन्हें इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम प्रकाश अग्रवाल ने दिया होगा; समझा जाता है कि उत्तम प्रकाश अग्रवाल ने उनसे कहा होगा कि जैसा जो चाहें कर लो - बाद में काउंसिल की मीटिंग में शोर-शराबा होगा, उसे बेशर्मी के साथ झेल लेना; इससे ज्यादा क्या होगा ? धीरज खंडेलवाल को यह आईडिया कुछ ज्यादा ही पसंद आ गया है । उन्होंने 'एसएमई लीडर अवॉर्ड' का आयोजन तो कर ही लिया है, साथ ही दूसरे देशों में काम कर रहे इंस्टीट्यूट के सदस्य चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए भी अवॉर्ड्स फंक्शन करने की घोषणा कर चुके हैं, और जिसके आयोजन के लिए भी उन्होंने काउंसिल से कोई अनुमति नहीं ली है ।
धीरज खंडेलवाल की इस हरकत पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य खासे खफा हैं, और इसी कारण से वेस्टर्न रीजन तक का कोई सेंट्रल काउंसिल सदस्य उक्त अवॉर्ड फंक्शन में नहीं गया । वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के भी गिनती के वही सदस्य आयोजन में उपस्थित नजर आये, जिन्हें उत्तम प्रकाश अग्रवाल के 'आदमियों' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । उत्तम प्रकाश अग्रवाल ने ही अवॉर्ड बाँटने का काम किया । वह इस आयोजन की आयोजक कमेटी - कमेटी फॉर मेंबर्स इन इंडस्ट्रीज एंड बिजनेस में को-ऑप्टेड सदस्य भी हैं । किसी पूर्व प्रेसीडेंट का किसी कमेटी में को-ऑप्टेड होना उसके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं देखा/पहचाना जाता है; इसीलिए अन्य कोई पूर्व प्रेसीडेंट किसी कमेटी में को-ऑप्टेड नहीं है - लेकिन उत्तम प्रकाश अग्रवाल के लिए पद की गरिमा जैसी चीजों का कोई महत्त्व नहीं है, और इसलिए उन्हें प्रायः नियम विरुद्ध होने वाले आयोजनों में देखा जाता है । 'एसएमई लीडर अवॉर्ड' को भी उत्तम प्रकाश अग्रवाल के आयोजन के रूप में देखा/पहचाना गया है, जिसमें धीरज खंडेलवाल की भूमिका को कठपुतली के रूप में देखा/समझा गया है । धीरज खंडेलवाल को लोगों के बीच उत्तम प्रकाश अग्रवाल की 'कठपुतली' के रूप में ही पहचाना जाता है । लोगों के बीच चर्चा है कि उत्तम प्रकाश अग्रवाल की शह पर ही धीरज खंडेलवाल ने काउंसिल और प्रेसीडेंट की अवहेलना करके 'एसएमई लीडर अवॉर्ड' का आयोजन कर लिया है, और इंटरनेशनल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए अवॉर्ड्स के आयोजन की तैयारी कर रहे हैं - और प्रेसीडेंट बेचारा मजबूर सा बना चुपचाप सारा तमाशा देख रहा है ।

Sunday, March 11, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद पर प्रफुल्ल छाजेड़ की जीत के साइड इफेक्ट्स ने बृजमोहन अग्रवाल, जुल्फेश शाह, दुर्गेश काबरा, अनिल भंडारी, धीरज खंडेलवाल आदि के लिए अच्छी-खासी मुसीबत खड़ी कर दी है

मुंबई । प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बनने के बाद वेस्टर्न रीजन में वोटों के उलटफेर होने का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें सबसे तगड़ा झटका बृजमोहन अग्रवाल की चुनावी तैयारी और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल की सीट को लगता दिख रहा है । दरअसल इस वर्ष दिसंबर में होने जा रहे सेंट्रल काउंसिल चुनाव में प्रफुल्ल छाजेड़ इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के रूप में उम्मीदवार बनेंगे, जिसके चलते उन पर वोटों की बारिश होने का अनुमान लगाया जा रहा है । अब चूँकि वोटों की संख्या तो सीमित है, इसलिए वह यदि कहीं बारिश के रूप में गिरेंगे तो स्वाभाविक ही है कि कहीं 'सूखा' पड़ेगा । इसी सूखे की सबसे ज्यादा मार बृजमोहन अग्रवाल की चुनावी तैयारी और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल की मौजूदा सीट पर पड़ती नजर आ रही है । बृजमोहन अग्रवाल पिछली बार कामयाब तो नहीं हो सके थे, लेकिन उनका चुनावी प्रदर्शन ठीकठाक रहा था; और इसीलिए इस बार वह और जोरशोर से चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे थे । अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल पिछली बार पहली वरीयता में अच्छे वोट पाने के बावजूद बाद में लुढ़कने/फिसलने लगे थे और जैसे-तैसे करके सीट निकालने में सफल हुए थे । पहली वरीयता के वोटों के आधार पर यह दोनों प्रफुल्ल छाजेड़ से कुछ ही वोटों से आगे थे, लेकिन बाद में फिर पीछे जा पहुँचे थे । जातीय और क्षेत्रीय आधार पर यह चारों लगभग एक ही सेगमेंट का प्रतिनिधित्व करते हैं । इसलिए वोट पाने के लिए इनके बीच आपस में ही होड़ रहती है । प्रफुल्ल छाजेड़ पिछली बार सिटिंग सदस्य थे, लेकिन फिर भी पहली वरीयता के वोटों की गिनती में बृजमोहन अग्रवाल उनसे थोड़ा पीछे और अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल उनसे कुछ आगे थे - इसलिए इन्हें उम्मीद थी कि अपनी तैयारी को और सुढृढ़ करके अबकी बार होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में यह अपनी अपनी स्थिति में और सुधार कर लेंगे ।
लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बन जाने से उनकी तैयारी पर पानी फिर गया लग रहा है । दरअसल वाइस प्रेसीडेंट होने से प्रफुल्ल छाजेड़ की चुनावी 'हैसियत' में भी जोर का उछाल आया है - जिसके चलते अबकी बार के चुनाव में जो प्रफुल्ल छाजेड़ चुनावी मैदान में होंगे, वह पिछली बार वाले प्रफुल्ल छाजेड़ से बिलकुल बदले हुए प्रफुल्ल छाजेड़ होंगे । वेस्टर्न रीजन में अबकी बार प्रोफेशन के सदस्य प्रफुल्ल छाजेड़ को ही नहीं, बल्कि वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ को वोट देंगे - और इसीलिए विश्वास किया जा रहा है कि प्रफुल्ल छाजेड़ पर अबकी बार वोटों की अच्छी बारिश होगी । इस 'बारिश' का बड़ा हिस्सा उन्हें अपने जातीय व क्षेत्रीय सेगमेंट से ही मिलेगा, और यही बात बृजमोहन अग्रवाल, अनिल भंडारी व धीरज खंडेलवाल के लिए मुसीबत वाली है । उम्मीद की जा रही है कि प्रफुल्ल छाजेड़ को पहली वरीयता के वोटों में ही पिछली बार की तुलना में जोरदार फायदा होगा । पहली वरीयता में प्रफुल्ल छाजेड़ को पिछली बार 1665 वोट मिले थे, जबकि धीरज खंडेलवाल को 1683 तथा अनिल भंडारी को 1693 वोट मिले थे । बृजमोहन अग्रवाल को मिले वोटों का संख्या 1401 थी । पिछली बार कोटा 3230 वोट का तय हुआ था, जिसके इस बार 3800 के आसपास तय होने की उम्मीद की जा रही है । अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रफुल्ल छाजेड़ को अबकी बार पहली वरीयता में ही 3500 के आसपास वोट तो मिलने ही चाहिए । उनके वोटों में जो बढ़ोत्तरी होगी, उसका सीधा असर अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल के वोटों पर पड़ने की ही आशंका है । इस आशंका में बृजमोहन अग्रवाल को तो तगड़ा नुकसान होने का डर है ही, अनिल भंडारी और धीरज खंडेलवाल को भी अपनी अपनी सीट बचा पाने के मामले में संकट में देखा/पहचाना जा रहा है ।
प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट बनने के साइड इफेक्ट्स की चपेट में जुल्फेश शाह और दुर्गेश काबरा के भी आने/फँसने का डर व्यक्त किया जा रहा है । प्रफुल्ल छाजेड़ की विदर्भ क्षेत्र की ब्रांचेज में पहले से ही अच्छी पकड़ है, और इस नाते उम्मीद की जा रही है कि वाइस प्रेसीडेंट के रूप में उन्हें वहाँ से और ज्यादा वोट मिलेंगे - जो जुल्फेश शाह के समर्थन आधार पर सीधी चोट होगी । जुल्फेश शाह को पिछली बार 2100 से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन फिर भी वह सेंट्रल काउंसिल का हिस्सा बनने से पिछड़ गए थे । अबकी बार जब प्रफुल्ल छाजेड़ उनके वोट आधार पर सीधी सेंध लगाने जा रहे हैं, तब तो उनके लिए मुकाबला और भी मुश्किल होता नजर आ रहा है । प्रफुल्ल छाजेड़ के पक्ष में अनुमानित की जा रही वोटों की बारिश में दुर्गेश काबरा की तैयारी और उम्मीदें भी बहती हुई दिख रही हैं, क्योंकि वह भी उसी सेगमेंट के भरोसे हैं जिस सेगमेंट पर प्रफुल्ल छाजेड़ सवार हैं । इस तरह की अनुमानपूर्ण चर्चाओं ने वेस्टर्न रीजन में चुनावी माहौल में दिलचस्प किस्म की गर्मी पैदा हो गई है । प्रफुल्ल छाजेड़ के वाइस प्रेसीडेंट के रूप में चुनावी मैदान में उतरने की स्थिति में मारवाड़ी व जैन व दक्षिण महाराष्ट्र की ब्रांचेज के वोटों के भरोसे रहने वाले उम्मीदवारों के बीच जहाँ चिंता और परेशानी देखी जा रही है, वहाँ दूसरे 'सेगमेंट' के उन उम्मीदवारों की उम्मीदें बढ़ गईं हैं जो अभी तक मुकाबले में कहीं देखे/पहचाने नहीं जा रहे थे । जाहिर तौर पर इन अनुमानपूर्ण चर्चाओं ने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनावों की पूरी तस्वीर को ही उल्टा-पुल्टा कर दिया है ।

Friday, February 2, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी से खफा हुए विजय गुप्ता के तेवरों ने उत्तम अग्रवाल के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट बनने की उम्मीद लगाए उम्मीदवारों को मुसीबत में डाला

नई दिल्ली । विजय गुप्ता की नाराजगी के चलते इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उत्तम अग्रवाल खेमे के उम्मीदवारों के लिए मुसीबत और गंभीर चुनौती खड़ी हो गयी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में प्रत्येक वर्ष टाँग अड़ाने वाले पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल पहले तो धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में लगे थे, लेकिन उनकी स्थिति को कमजोर देख कर उत्तम अग्रवाल ने अब निहार जम्बूसारिया व अब्राहम बाबु की उम्मीदवारी का झंडा भी उठा लिया है । अब्राहम बाबु को हालाँकि पिछले वर्ष प्रेसीडेंट रहे देवराज रेड्डी के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उत्तम अग्रवाल का भी समर्थन मिल जाने से अब्राहम बाबु की स्थिति को बेहतर हुआ देखा/माना जा रहा है । निहार जम्बूसारिया भी उत्तम अग्रवाल के कोई विश्वासपात्र उम्मीदवार नहीं हैं; वास्तव में निहार जम्बूसारिया की स्थिति बेहतर देख/जान कर उत्तम अग्रवाल ने उन्हें भी अपना उम्मीदवार बताना/दिखाना शुरू कर दिया है, ताकि उनके जीतने पर वह जीत का श्रेय खुद ले सकें । उत्तम अग्रवाल के पक्के वाले उम्मीदवार तो धीरज खंडेलवाल ही हैं, और उन्हें वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने के लिए उत्तम अग्रवाल ने हर संभव कोशिश की हुई है । उनकी इस कोशिश को लेकिन दिल्ली में उनके खासमखास विजय गुप्ता के रवैये से तगड़ा झटका लगा है । विजय गुप्ता से लगे झटके की भरपाई के लिए दिल्ली में सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे सदस्य राजेश शर्मा आगे तो आए हैं, लेकिन उत्तम अग्रवाल उन पर भरोसा नहीं कर रहे हैं - और इस कारण से धीरज खंडेलवाल का मामला बिगड़ता हुआ ही दिख रहा है ।
धीरज खंडेलवाल का इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहला टर्म है । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उन्हें उम्मीदवार बनाने की उत्तम अग्रवाल की कार्रवाई से विजय गुप्ता दरअसल इसीलिए उखड़े हुए हैं । विजय गुप्ता को काफी समय से यह शिकायत यूँ भी रही ही है कि बेहद नजदीकी होने के बावजूद उत्तम अग्रवाल ने वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को कभी भी गंभीरता से समर्थन नहीं दिया । धीरज खंडेलवाल को वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए आगे करने की उत्तम अग्रवाल की कार्रवाई का विजय गुप्ता ने इसीलिए बुरा माना कि उनके जैसे सीनियर काउंसिल सदस्य को तो उत्तम अग्रवाल ने कभी गंभीरता से नहीं लिया, और धीरज अग्रवाल जैसे नए सदस्य के लिए वह पूरी तरह सक्रिय हो रहे हैं । बात केवल विजय गुप्ता की नाराजगी की होती, तो उत्तम अग्रवाल को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता - लेकिन विजय गुप्ता की नाराजगी के चलते धीरज खंडेलवाल जैसे नए सदस्य की उम्मीदवारी के खिलाफ माहौल बन गया और कुल मिलाकर यह माहौल उत्तम अग्रवाल के खिलाफ संगठित होता नजर आया । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव के संदर्भ में प्रतिकूल बनते हालात की नजाकत को भाँप कर उत्तम अग्रवाल ने पैंतरा बदला और अब्राहम बाबु व निहार जम्बूसारिया की उम्मीदवारी का भी झंडा उठा लिया - ताकि उनकी नेतागिरी की हवा बनी रहे ।
उत्तम अग्रवाल ने इसके साथ-साथ विजय गुप्ता को भी अपने साथ बनाए रखने के प्रयत्न किए हैं । उन्हें विश्वास है कि विजय गुप्ता को धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी पर भले ही शिकायत हो, लेकिन अब्राहम बाबु और या निहार जम्बूसारिया में से किसी एक के समर्थन के लिए वह विजय गुप्ता को अवश्य ही राजी कर लेंगे । लोगों को भी लगता है कि विजय गुप्ता राजी हो जायेंगे, लेकिन इसके लिए वह उत्तम अग्रवाल के साथ अगले वर्ष के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में समर्थन पाने की सौदेबाजी करना चाहेंगे । विजय गुप्ता को डर है कि इस बार यदि सदर्न रीजन से वाइस प्रेसीडेंट बन गया, तो अगले वर्ष उत्तम अग्रवाल फिर से धीरज खंडेलवाल को उम्मीदवार बना/बनवा देंगे - और पिछले वर्षों की तरह वह एक बार फिर ठगे रह जायेंगे । विजय गुप्ता इस बार के चुनाव में उत्तम अग्रवाल के खेमे में बने रहने और या उससे बाहर आ निकलने का 'फैसला' कर लेना चाहते हैं । उत्तम अग्रवाल के खेमे में बने रहने का फैसला करके दरअसल अभी तक उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ है - दूसरे लोग उत्तम अग्रवाल का 'आदमी' मानते हुए उनका विरोध करते हैं, और उत्तम अग्रवाल उन्हें गंभीरता से लेते नहीं हैं । इसलिए विजय गुप्ता इस बार मामला इधर का और या उधर का कर लेना चाहते हैं । उत्तम अग्रवाल के साथ विजय गुप्ता के खिंचाव को देखते हुए राजेश शर्मा ने उत्तम अग्रवाल के साथ नजदीकी बनाने की कोशिश तो खूब की, लेकिन उत्तम अग्रवाल ने उन्हें कोई ज्यादा भाव नहीं दिया है । उत्तम अग्रवाल दरअसल राजेश शर्मा पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि राजेश शर्मा कभी भी उन्हें धोखा दे देंगे । उत्तम अग्रवाल दिल्ली में भरोसेमंद साथी/सहयोगी के रूप में सिर्फ विजय गुप्ता को ही देखते/मानते हैं - लेकिन विजय गुप्ता ने भी लगता है कि अब पक्का निश्चय कर लिया है कि वह उत्तम अग्रवाल के यहाँ सिर्फ इस्तेमाल ही नहीं होंगे, और अपना 'हक' भी मागेंगे । विजय गुप्ता के इस रवैये ने उत्तम अग्रवाल और उनके भरोसे वाइस प्रेसीडेंट बनने की उम्मीद लगाए उम्मीदवारों को मुसीबत में डाल दिया है ।

Saturday, January 6, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए धीरज खंडेलवाल की सक्रियता के पीछे प्रफुल्ल छाजेड़ को 'रोकने' के साथ-साथ वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन विष्णु अग्रवाल से भी निपटने की तैयारी है क्या ?

मुंबई । धीरज खंडेलवाल ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट का आगामी वाइस प्रेसीडेंट बनने/चुनने के लिए जिस तरह से कमर कसी है, उसके चलते वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए वेस्टर्न रीजन में मजबूत समझे/देखे जा रहे प्रफुल्ल छाजेड़ और निहार जम्बूसारिया के लिए गंभीर चुनौती तो पैदा हुई ही है, वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनावी परिदृश्य भी दिलचस्प हो उठा है । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए सदर्न रीजन से अब्राहम बाबु तथा एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी को भी गंभीरता से लिया जा रहा है । उम्मीदवारी के लिए हाथ-पैर तो और भी कई सेंट्रल काउंसिल सदस्य चला रहे हैं और अपने अपने जुगाड़ बैठाने में लगे हैं, लेकिन सतत प्रयासों और सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अपनी सक्रियता व सदस्यों के बीच अपनी पहचान और खेमेबाजी के समीकरणों के हिसाब से आकलन करने वाले लोग वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अभी चार लोगों - प्रफुल्ल छाजेड़, निहार जम्बूसारिया, अब्राहम बाबु और एमपी विजय कुमार के बीच ही मुकाबले को देख रहे हैं । प्रफुल्ल छाजेड़ को इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे का समर्थन माना/सुना जा रहा है, तो अब्राहम बाबु के साथ पिछले वर्ष प्रेसीडेंट रहे देवराज रेड्डी के समर्थन की चर्चा सुनी जा रही है । एमपी विजय कुमार को हर वर्ष वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में टाँग अड़ाने वाले पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के भरोसे देखा/पहचाना जा रहा है, तो निहार जम्बूसारिया दूसरे रीजंस के कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ बने अपने संबंधों के भरोसे चुनावी मैदान में हैं । इन चारों को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच की अलग-अलग तरह की खेमेबाजी का सहयोग/समर्थन तो है ही, साथ ही इनका अपना अपना कार्य-व्यवहार भी है - जिसके चलते वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इनकी उम्मीदवारी को गंभीरता के साथ देखा जा रहा है ।
लेकिन वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अचानक से वेस्टर्न रीजन के धीरज खंडेलवाल ने जो सक्रियता दिखाई है, उसने वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में खासी गर्मी पैदा कर दी है । धीरज खंडेलवाल ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में करीब दो वर्षों के अभी तक के अपने कार्यकाल में हालाँकि ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ी है, जिसके चलते उनकी उम्मीदवारी को कोई गंभीरता से - लेकिन अचानक से बढ़ी उनकी सक्रियता के पीछे पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल को देखे जाने के कारण मामला थोड़ा रोचक जरूर हो गया है । धीरज खंडेलवाल की लोगों के बीच उत्तम अग्रवाल का 'आदमी' होने की एक बहुत ही मजबूत छवि है - यह छवि धीरज खंडेलवाल की ताकत भी है, और साथ ही साथ उनकी कमजोरी भी है । दरअसल इस छवि के चक्कर में उनकी अपनी पहचान और उनका अपना व्यक्तित्व दब गया है, और इस कारण से उनकी अपनी 'भूमिका' बहुत सिमटी हुई सी रह गई है । इस वजह से, उत्तम अग्रवाल के समर्थन के बावजूद धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं देख रहा है, और हर कोई मान/समझ रहा है कि उत्तम अग्रवाल ने प्रफुल्ल छाजेड़ का काम बिगाड़ने के लिए धीरज खंडेलवाल को सक्रिय किया है । उत्तम अग्रवाल को प्रफुल्ल छाजेड़ से यूँ तो कोई समस्या नहीं है; लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ की जीत में चूँकि नीलेश विकमसे की जीत समझी जाएगी - इसलिए उत्तम अग्रवाल को प्रफुल्ल छाजेड़ का काम बिगाड़ने के लिए धीरज खंडेलवाल को सक्रिय करना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि वेस्टर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उत्तम अग्रवाल का विकमसे भाइयों के साथ पुराना बैर है, और जब जब भी उनके बीच सीधी चुनावी टक्कर हुई है - उत्तम अग्रवाल को हमेशा ही विकमसे भाइयों से हारना ही पड़ा है । इसी बात से पैदा हुई खुन्नस में उत्तम अग्रवाल ने प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के लिए वेस्टर्न रीजन में ही मुसीबत खड़ी करने के उद्देश्य से धीरज खंडेलवाल को सक्रिय कर दिया है ।
धीरज खंडेलवाल को सक्रिय करने की उत्तम अग्रवाल की कार्रवाई से उनके समर्थन के भरोसे बैठे एमपी विजय कुमार को तो झटका लगा ही है, निहार जम्बूसारिया को भी अपना गेमप्लान बिगड़ता हुआ लगा/दिखा है । दरअसल उन्हें उम्मीद थी कि ऐन मौके पर प्रफुल्ल छाजेड़ को बढ़त मिलती दिखी, तो उत्तम अग्रवाल उन्हें समर्थन दे/दिलवा देंगे । निहार जम्बूसारिया के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यह है कि उनकी न नीलेश विकमसे से बनती है, और न उत्तम अग्रवाल से । इसके बावजूद उन्हें उत्तम अग्रवाल से 'मदद' मिलने की उम्मीद रही तो इसका कारण यही रहा कि उन्हें पता है कि उत्तम अग्रवाल नकारात्मक राजनीति करते हैं और तात्कालिक हानि-लाभ को देखते हुए अपने पैंतरे बदलते रहते हैं । दीनल शाह को उत्तम अग्रवाल ने हालाँकि कभी पसंद नहीं किया, लेकिन नीलेश विकमसे को रोकने के लिए उन्होंने दीनल शाह से हाथ मिला लेने में कोई गुरेज नहीं किया था - यह बात अलग है कि उसके बावजूद भी वह नीलेश विकमसे को नहीं रोक सके थे । क्या होता, और क्या नहीं होता - यह तो आगे पता चलता; अभी लेकिन उत्तम अग्रवाल की शह पर शुरू हुई धीरज खंडेलवाल की सक्रियता ने निहार जम्बूसारिया की उम्मीदों को वेस्टर्न रीजन में ही झटका जरूर दिया है ।
धीरज खंडेलवाल को वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उम्मीदवार के रूप में सक्रिय करने के पीछे कुछेक लोगों के बीच उत्तम अग्रवाल की एक अन्य 'जरूरत' को कारण के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उत्तम अग्रवाल और धीरज खंडेलवाल के कुछेक नजदीकियों का ही कहना है कि यह दोनों वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन विष्णु अग्रवाल की संभावित उम्मीदवारी से डरे हुए हैं । इन्हें डर है कि विष्णु अग्रवाल ने यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तो उसका सीधा असर धीरज खंडेलवाल की सदस्यता पर पड़ेगा । धीरज खंडेलवाल पिछली बार ग्यारह सदस्यों में दसवें नंबर पर रहे थे; सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में भी धीरज खंडेलवाल ने ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे उनके समर्थन-आधार में बढ़ोत्तरी होती हुई देखी जाए । उधर रीजनल काउंसिल चेयरमैन के रूप में विष्णु अग्रवाल के कामकाज की काफी तारीफ हो रही है और रीजन में उनकी पहचान व समर्थन का दायरा खासा बढ़ा है ।  इसलिए विष्णु अग्रवाल की संभावित उम्मीदवारी में धीरज खंडेलवाल के लिए सीधा खतरा देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु अग्रवाल चूँकि उत्तम अग्रवाल के नजदीकी रिश्तेदार हैं, इसलिए दोनों का काफी समर्थन-आधार कॉमन है; यह तथ्य धीरज खंडेलवाल के लिए और भी मुसीबत भरा है । उत्तम अग्रवाल हालाँकि कई मौकों पर कह तो चुके हैं कि विष्णु अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं बनेंगे, वह उन्हें नहीं बनने देंगे - और यदि बनेंगे तो वह उनकी उम्मीदवारी का खुला विरोध करेंगे । विष्णु अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि विष्णु अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के लिए अवश्य ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । ऐसे में, समझा जाता है कि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए धीरज खंडेलवाल को उम्मीदवार बनवा कर उत्तम अग्रवाल ने उम्मीद यह की है कि इससे धीरज खंडेलवाल की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता में कुछ 'वजन' बढ़ेगा । बाद में वह लोगों के बीच कह/बता सकेंगे कि धीरज खंडेलवाल तो बस मामूली अंतर से ही वाइस प्रेसीडेंट बनने से रह गए हैं । उन्हें उम्मीद है कि इससे लोगों के बीच धीरज खंडेलवाल की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को लेकर विश्वास बनेगा/बढ़ेगा - और यह विश्वास ही विष्णु अग्रवाल की उम्मीदवारी से मिलने वाली चुनौती में उनकी मदद करेगा ।

Sunday, September 27, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अनिल भंडारी कहीं दूसरे मितिल चोकसी तो साबित नहीं होंगे

मुंबई । अनिल भंडारी ने सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु अपनी जिन खूबियों पर भरोसा किया है, उसे देखते/पहचानते हुए वेस्टर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के जानकारों और खिलाड़ियों को मितिल चोकसी की उम्मीदवारी याद आ रही है - किंतु इस 'याद' में अनिल भंडारी के लिए कुछेक सबक भी छिपे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए अनिल भंडारी अपनी स्मार्टनेस पर निर्भर कर रहे हैं । उनके समर्थकों के साथ साथ दूसरे लोगों का भी मानना और कहना है कि अनिल भंडारी में लोगों को प्रभावित करने का अच्छा हुनर है, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलेगा । लोगों का कहना है कि अपने व्यक्तित्व और अपने व्यवहार से अनिल भंडारी लोगों पर जैसे जादू सा कर देते हैं, और उनके द्वारा किए गए जादू से वशीभूत होकर लोग उनकी तरफ खिंचे चले आते हैं । अनिल भंडारी को 'मार्केटिंग' के मामले में खासा होशियार माना/समझा जाता है - और इसी आधार पर माना/समझा जा रहा है कि अनिल भंडारी सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी की भी मार्केटिंग कर लेंगे, और चुनाव में कामयाब हो जायेंगे । अनिल भंडारी के समर्थकों की इस 'राजनीतिक समझ' पर बात करते हुए इंस्टीट्यूट की वेस्टर्न रीजन की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कुछेक लोग लेकिन मितिल चोकसी को याद कर रहे हैं, और अनिल भंडारी के लिए सुझाव दे रहे हैं कि उन्हें मितिल चोकसी के अनुभव से सबक सीखना चाहिए । 
उल्लेखनीय है कि मितिल चोकसी वर्ष 2003 में वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे, और उसी वर्ष हुए चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार थे । स्मार्टनेस - व्यक्तित्व और व्यवहार के मामले में वह अनिल भंडारी से इक्कीस ही थे । मार्केटिंग के मामले में भी वह अनिल भंडारी पर भारी ही पड़ेंगे, और लोगों को प्रभावित करने की कला में खूब होशियार होने के बावजूद अनिल भंडारी यदि चाहें, तो मितिल चोकसी से बहुत कुछ सीख सकते हैं । वेस्टर्न रीजन में लोग आज भी याद करते हैं, और मानते व कहते हैं कि मितिल चोकसी जैसा चेयरमैन वेस्टर्न रीजन को अभी तक नहीं मिला है । इतने सब के बावजूद सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में मितिल चोकसी को इतने वोट नहीं मिल पाए, कि वह चुनाव जीत पाते । मितिल चोकसी के साथ तो एक और प्लस प्वाइंट था - और वह यह कि उनके चेयरमैन बनने से कुल तेरह वर्ष पहले, वर्ष 1990 में उनके पिता आरएस चोकसी वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे । आरएस चोकसी काफी लंबे समय तक रीजनल काउंसिल में रहे थे । उम्मीद की गई थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की गई मितिल चोकसी की उम्मीदवारी को उनके पिता आरएस चोकसी की सक्रियता का भी फायदा मिलेगा, किंतु जो नहीं मिल सका । अपने व्यक्तित्व और व्यवहार का जादू लोगों पर बिखेरने के बावजूद मितिल चोकसी सेंट्रल काउंसिल का चुनाव नहीं जीत सके थे, तो इसका कारण यही समझा/माना गया था कि तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद वह स्थितियों को अपने चुनाव के संदर्भ में व्यवस्थित नहीं कर पाए और वोट पाने में पिछड़ गए । मॉरल ऑफ द स्टोरी यह है कि सिर्फ जादुई व्यक्तित्व के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता । मितिल चोकसी की इस स्टोरी का अनिल भंडारी के लिए संदेश और सबक यही है कि वह अपने व्यक्तित्व और व्यवहार के भरोसे ही यदि रहे, तो मितिल चोकसी की तरह धोखा खा सकते हैं ।
अनिल भंडारी के मामले में यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रीजनल काउंसिल के पिछले चुनावी नतीजे भी 'बताते' हैं कि अनिल भंडारी को अपने जादुई व्यक्तित्व व व्यवहार का चुनाव में कोई खास फायदा नहीं हुआ है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार रीजनल काउंसिल के 49 उम्मीदवारों में अनिल भंडारी पहली वरीयता के 772 वोटों के साथ 16वें स्थान पर थे; और फाइनली अपने वोटों की संख्या को 1243 तक पहुँचाते हुए उन्होंने विजेता उम्मीदवारों में अपना स्थान एक ऊँचा करते हुए 15वाँ कर लिया था । उससे पिछली बार के, यानि वर्ष 2009 के चुनाव में उन्हें पहली वरीयता के 767 वोटों के साथ 14वाँ और फाइनली 1089 वोटों के साथ 13 वाँ स्थान मिला था । जाहिर है कि 2010 से 2012 के बीच के समय में काउंसिल में रहते हुए उन्होंने अपनी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं किया, और उनके लिए मामला जहाँ का तहाँ ही रहा । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में यह कोई बहुत उत्साहित करने वाला नतीजा नहीं कहा जा सकता है । जादुई व्यक्तित्व और व्यवहार के बावजूद अनिल भंडारी यदि वर्ष 2010 से 2012 के बीच अपनी चुनावी स्थिति में कोई सुधार नहीं कर सके थे, तो आखिर क्या गारंटी है कि वर्ष 2013 से 2015 के बीच उन्होंने बहुत कमाल कर दिया होगा ? मितिल चोकसी का किस्सा और रीजनल काउंसिल चुनाव में खुद अनिल भंडारी का परफॉर्मेंस कहता/बताता है कि सिर्फ स्मार्टनेस के भरोसे वोट नहीं पाए जा सकते हैं ?
संजीव माहेश्वरी, राजकुमार अदुकिया और पंकज जैन द्वारा खाली की गईं सेंट्रल काउंसिल की सीटों को कब्जाने के लिए दुर्गेश काबरा, बीएम अग्रवाल, अनिल भंडारी और धीरज खण्डेलवाल ने जिस तरह की तैयारी की है, उसे देखते/समझते हुए रीजन के चुनावी खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि इनमें से एक का जीतना तो पक्का है; चुनावी गणित यदि किसी खास ऐंगल पर बैठा तो दो लोग भी जीत सकते हैं - जीतने वाले कौन होंगे, यह अभी किसी के लिए भी कह पाना मुश्किल हो रहा है । मारवाड़ी वोटों पर भरोसा करने वाले इन चारों उम्मीदवारों के साथ खूबियों और कमजोरियों की अपनी अपनी फेहरिस्त है; और इनके बीच मुकाबला टक्कर का है और खासा दिलचस्प है । अनिल भंडारी के समर्थक अनिल भंडारी के जादुई व्यक्तित्व और व्यवहार के भरोसे अनिल भंडारी की नाव पार हो जाने का जो विश्वास दिखा/जता रहे हैं, उस विश्वास की पड़ताल बाकी तीनों उम्मीदवारों की संभावनाओं के संदर्भ में करने पर ही लोगों को मितिल चोकसी का चुनाव याद आया है ।  

Saturday, September 5, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत धीरज खण्डेलवाल तथा बीएम अग्रवाल की उम्मीदवारी ने अग्रवाल वोटों पर कब्जे की लड़ाई को दिलचस्प बनाया

मुंबई । बीएम अग्रवाल की सेंट्रल काउंसिल के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने धीरज खण्डेलवाल की उम्मीदवारी के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है । दरअसल धीरज खण्डेलवाल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और उत्तम अग्रवाल चूँकि इंस्टीट्यूट की राजनीति के साथ साथ अग्रवाल समाज की राजनीति में भी सक्रिय हैं - इस नाते उम्मीद की जाती है कि धीरज खण्डेलवाल अग्रवाल वोटों का अच्छा-खासा समर्थन प्राप्त कर सकेंगे । किंतु बीएम अग्रवाल की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने धीरज खण्डेलवाल की इन उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । धीरज खण्डेलवाल की उम्मीदवारी के लिए यह झटका इसलिए और बड़ा है - क्योंकि अभी तक अग्रवाल वोटों के सबसे बड़े सौदागर राजकुमार अदुकिया रहे हैं, जिनकी उत्तम अग्रवाल से बनती नहीं है; और ऐसे में समझा जाता है कि राजकुमार अदुकिया के जो समर्थक हैं, वह धीरज खण्डेलवाल की बजाए बीएम अग्रवाल के साथ जुड़ सकते हैं । उत्तम अग्रवाल के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाने के कारण धीरज खण्डेलवाल को एक तरफ बहुत से फायदे हैं, तो साथ ही साथ नुकसान भी बहुत हैं । उत्तम अग्रवाल ने दरअसल दुश्मनियाँ बहुत बनाई हैं; और समझा जाता है कि अलग अलग कारणों से जिन लोगों की भी दुश्मनियाँ उत्तम अग्रवाल से हैं, वह सब उसका बदला धीरज खण्डेलवाल से लेंगे । धीरज खण्डेलवाल का स्वभाव हालाँकि दोस्ती करने और निभाने का है - और इस तरह उत्तम अग्रवाल के स्वभाव के ठीक विपरीत है; लेकिन खतरा यह देखा जा रहा है कि चुनाव में लोग धीरज खण्डेलवाल को नहीं, उनके रूप में उत्तम अग्रवाल को देखेंगे । धीरज खण्डेलवाल के लिए यही बात सबसे बड़ी समस्या है, और उनकी इस समस्या को बीएम अग्रवाल की उम्मीदवारी ने और बड़ा कर दिया है । 
इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के जो खिलाड़ी हैं, वह बीएम अग्रवाल और धीरज खण्डेलवाल की तुलना करते हुए धीरज खण्डेलवाल का पलड़ा भारी पाते हैं । बीएम अग्रवाल पिछले छह वर्ष से लोगों के संपर्क में नहीं हैं, जबकि पिछले नौ वर्षों से रीजनल काउंसिल में होने के कारण धीरज खण्डेलवाल का लोगों के साथ निरंतर संपर्क बना हुआ है; मंच पर भूमिका निभाने के मामले में धीरज खण्डेलवाल, बीएम अग्रवाल के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट 'दिखते' रहे हैं; 'साधनों' के मामले में भी धीरज खण्डेलवाल को बीएम अग्रवाल से ज्यादा समर्थ माना जाता है - धीरज खण्डेलवाल ने पिछले दिनों ही अपनी पत्नी के जन्मदिन पर उन्हें महंगी बीएमडब्ल्यूएक्सथ्री कार गिफ्ट करके अपने 'साधनों' की जो धमक प्रस्तुत की है, उसकी गूँज दूर और देर तक सुनाई दी है; इन सबसे बड़ी बात यह कि धीरज खण्डेलवाल के पास उत्तम अग्रवाल जैसा एक 'गॉडफादर' है, बीएम अग्रवाल के पास कोई 'गॉडफादर' तो नहीं ही है - जिन दोस्तों के समर्थन का वह भरोसा कर भी रहे हैं, उनका भी कोई भरोसा नहीं कि कौन कब किस राह मुड़ जाए ? जैसा कि एनसी हेगड़े के मामले में हुआ - बीएम अग्रवाल दावा कर रहे थे कि एनसी हेगड़े उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे और कॉर्पोरेट्स के वोट उन्हें दिलवायेंगे, बाद में लेकिन लोगों ने देखा/पाया कि एनसी हेगड़े खुद उम्मीदवार हो गए हैं । इन कुछेक तुलनाओं के आधार पर बीएम अग्रवाल के मुकाबले धीरज खण्डेलवाल का पलड़ा भारी भले ही देखा/पहचाना जा रहा हो - किंतु फिर भी उन्हें 'वॉकओवर' मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । 
राजनीति - और चुनावी राजनीति दरअसल अंतर्विरोधों को साधने तथा समन्वय बैठाने की कला है - जिसमें धीरज अग्रवाल व बीएम अग्रवाल के बीच तुलना करें तो बीएम अग्रवाल को बढ़त बनाते देखते/पाते हैं । इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि तमाम खूबियों के बावजूद धीरज खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल में चेयरमैन नहीं बन पाए । धीरज खण्डेलवाल का स्वभाव यूँ तो बहुत मिलनसार है, और राजनीतिक विरोधियों से भी वह संबंध बनाने का प्रयास करते हैं तथा उन्हें तवज्जो देते हैं - लेकिन राजनीतिक रूप से समीकरण बनाने/बैठाने के मामले में वह प्रायः फेल हो जाते हैं । रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की उनकी कोशिशें इसीलिए कामयाब नहीं हो पाई । इसके लिए हालाँकि उत्तम अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है । तमाम लोगों का कहना है कि उत्तम अग्रवाल के कारण ही धीरज खण्डेलवाल वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन नहीं बन पाए हैं । धीरज खण्डेलवाल ने यद्यपि उत्तम अग्रवाल के कारण होने वाले नुकसान से बचने का भरसक प्रयास किया है, और उत्तम अग्रवाल से अलग अपनी एक पहचान बनाने के लिए भी उन्होंने हाथ-पैर मारे हैं, किंतु सफलता प्राप्त करने में वह चूकते ही रहे हैं । दूसरी तरफ, बीएम अग्रवाल बिना किसी 'गॉडफादर' के होते हुए भी तथा अन्य कई 'कमजोरियों' के बावजूद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने हैं - जिससे साबित है कि राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए जिस तरह का लचीलापन चाहिए होता है, वह बीएम अग्रवाल में है और प्रतिकूल स्थितियों के बीच भी राह बनाने का हुनर उन्हें आता है । 
अपनी अपनी कमियों और अपनी अपनी खूबियों की इस पृष्ठभूमि के साथ बीएम अग्रवाल और धीरज खण्डेलवाल के बीच खासतौर से अग्रवाल वोटों पर कब्जे की लड़ाई खासी दिलचस्प हो जाती है । उत्तम अग्रवाल का जो समर्थन कुछेक लोगों के अनुसार धीरज खण्डेलवाल के लिए वरदान है, वही अन्य बहुत से लोगों के लिए अभिशाप है । हालाँकि चुनावी खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि धीरज खण्डेलवाल ने यदि उत्तम अग्रवाल के समर्थन को होशियारी से इस्तेमाल किया तथा अपनी भी एक अलग पहचान वह यदि बना सके तो अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटा सकेंगे । उधर बीएम अग्रवाल के सामने अपने समर्थक नेताओं को 'सचमुच में' सक्रिय बनाने/करने की चुनौती है - इस चुनौती को वह यदि संभव कर सके, तो अपनी उम्मीदवारी की बढ़त बनाने में सफल हो सकेंगे । बाकी तो जो है, सो हइये है !