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Thursday, October 8, 2020

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए बालकृष्ण अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी तो जता दी है, लेकिन उनके नजदीकियों का ही कहना है कि उनके लिए वोट जुटाना खासा मुश्किल ही होगा

सूरत । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए तैयारी कर रहे बालकृष्ण अग्रवाल अभी हार्दिक शाह की भी उम्मीदवारी के आ जाने के झटके से संभल भी नहीं पाए थे, कि सेंट्रल काउंसिल के अन्य उम्मीदवारों के सूरत में दस्तक देने की आहटों ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है । बालकृष्ण अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह है कि सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट जुटाने में जो संभावित उम्मीदवार दिलचस्पी ले रहे हैं, उनमें से अधिकतर की निगाह मारवाड़ी समुदाय के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर है - जिनके भरोसे बालकृष्ण अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं । ऐसे में, बालकृष्ण अग्रवाल के सामने अपने समर्थन आधार को ही बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है । बालकृष्ण अग्रवाल को सबसे गंभीर चुनौती सुनील पटोदिया से मिलती दिख रही है । सूरत में सुनील पटोदिया के कई समर्थक व शुभचिंतक हैं, जो उनके सरल तथा काम आने वाले व्यवहार से प्रभावित हैं, और उनकी उम्मीदवारी की खबर से खासे उत्साहित हैं । मजे की बात यह है कि सुनील पटोदिया ने अभी सूरत में कोई चुनावी संपर्क नहीं किया है, लेकिन उन्हें जानने वाले उनकी उम्मीदवारी की खबर से ही उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने की बातें करने लगे हैं ।
सुनील पटोदिया के अलावा अनिल भंडारी, धीरज खंडेलवाल तथा दुर्गेश काबरा की भी सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खास दिलचस्पी है; और यह सभी कुल मिलाकर बालकृष्ण अग्रवाल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम करते लग रहे हैं । हालाँकि बालकृष्ण अग्रवाल के नजदीकी रहे लोगों का कहना है कि बालकृष्ण अग्रवाल को कोई दूसरा नुकसान नहीं पहुँचायेगा - वह खुद ही खुद को नुकसान पहुंचायेंगे; और पहुँचायेंगे क्या, पहुँचा चुके हैं । बालकृष्ण अग्रवाल के नजदीकी रहे लोगों के अनुसार, वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चुने जाने के बाद बालकृष्ण अग्रवाल का रवैया व व्यवहार बिलकुल ही बदल गया, और वह अपने नजदीकियों व समर्थकों तक को अपने से दूर कर बैठे हैं । बालकृष्ण अग्रवाल के पार्टनर रहे लोग तक उनके खिलाफ बातें करते सुने जा रहे हैं । ऐसे में, बालकृष्ण अग्रवाल के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाना खासा मुश्किल ही होगा । विडंबना और मजे की बात लेकिन यह देखी/समझी जा रही है कि बालकृष्ण अग्रवाल की मुश्किल के चलते हार्दिक शाह को कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है । 
हार्दिक शाह के सामने सूरत के बाहर से वोट जुटाने की बड़ी चुनौती है । दरअसल सिर्फ सूरत के वोटों के भरोसे तो सेंट्रल काउंसिल का चुनाव नहीं जीता जा सकता है । जय छैरा पिछले तीन टर्म से इसलिए चुनाव जीतते रहे, क्योंकि उन्हें सूरत के बाहर से खूब वोट मिलते रहे हैं । जय छैरा को सूरत में भी एकतरफा वोट मिले, और सूरत में उन्हें किसी दूसरे उम्मीदवार ने डिस्टर्ब नहीं किया - तथा उनके उम्मीदवार रहते हुए बाहर के उम्मीदवारों ने भी सूरत से दूरी बना कर रखी । अब लेकिन ऐसी स्थिति नहीं रहेगी । प्रत्येक चुनाव परसेप्शन पर भी निर्भर करता है । सूरत में सेंट्रल काउंसिल के लिए दो उम्मीदवार होने से सूरत के लोगों के बीच यह परसेप्शन अभी से बनने लगा है कि दो उम्मीदवार होने से सेंट्रल काउंसिल में सूरत के प्रतिनिधित्व की संभावना पर ग्रहण लग गया है । इस परसेप्शन के चलते बालकृष्ण अग्रवाल तथा हार्दिक शाह के लिए वोट जुटाना और मुश्किल हो गया है, क्योंकि वोट देने वाले अधिकतर लोग ऐसे उम्मीदवारों को वोट देने से बचते हैं, जिनके जीतने की संभावना पर पहले से ही सवाल उठ खड़े हुए हों । इस स्थिति ने बाहर के, खासकर मुंबई के उम्मीदवारों को सूरत में समर्थन जुटाने के लिए और ज्यादा प्रेरित किया है, जिसके कारण सूरत में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चुनावी राजनीति के समीकरण और भी दिलचस्प हो गए हैं ।

Friday, December 27, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट का वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए जय छैरा ने प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के सूरत में आने को लेकर लगाया 'कर्फ्यू' उठाया और इस तरह प्रेसिडेंट बनने के ग्यारहवें महीने में प्रफुल्ल छाजेड़ का सूरत में सम्मान होने का मौका बना

सूरत । जय छैरा की 'कृपा' से इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ को सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच होने/पहुँचने का मौका आखिरकार मिल रहा है । इस 'कृपा' के पीछे जय छैरा की वाइस प्रेसीडेंट पद की उम्मीदवारी से जुड़ी 'मजबूरी' को देखा/समझा जा रहा है । जय छैरा की इस मजबूरी के चलते सूरत ब्रांच के पदाधिकारियों को अब, जब प्रफुल्ल छाजेड़ के लिए प्रेसीडेंट पद की कुर्सी से उतरने का समय नजदीक आ गया है, ध्यान आया कि उन्हें प्रेसीडेंट के रूप में प्रफुल्ल छाजेड़ का सम्मान कर लेना चाहिए । उल्लेखनीय है कि सूरत ब्रांच वेस्टर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की एक बड़ी और प्रमुख ब्रांच है, जिस नाते ब्रांच के सदस्यों व पदाधिकारियों के साथ-साथ प्रत्येक प्रेसीडेंट की भी इच्छा होती है कि वह सूरत अवश्य ही आए । प्रफुल्ल छाजेड़ तो इंस्टीट्यूट में वेस्टर्न रीजन का ही प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन प्रेसीडेंट के रूप में उन्हें सूरत आने का 'मौका' नहीं मिला । यहाँ तक कि वाइस प्रेसीडेंट के रूप में भी उन्हें यह मौका नहीं मिला था । इसके लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्य जय छैरा को जिम्मेदार माना/पहचाना जाता है । दरअसल सूरत में ही नहीं, वेस्टर्न रीजन में चर्चा यह है कि सूरत में कौन आयेगा, या नहीं आएगा - इसका फैसला जय छैरा ही करते हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य जय छैरा सूरत को अपनी कोंस्टीटुयेंसी के रूप में देखते/समझते हैं, और यह पसंद नहीं करते हैं कि इंस्टीट्यूट की राजनीति से जुड़े दूसरे नेता सूरत में नजर आएँ; इसके लिए वह सूरत ब्रांच के पदाधिकारियों पर भी दबाव बना कर रखते हैं । यही कारण है कि सूरत में होने वाले आयोजनों में वेस्टर्न रीजन के 'छोटे' 'बड़े' सदस्यों की उपस्थिति काफी कम रह गई है । प्रफुल्ल छाजेड़ के साथ तो जय छैरा के राजनीतिक खेमेबाजी वाले विरोध के झंझट भी हैं, जिनके कारण प्रेसीडेंट होने के बावजूद प्रफुल्ल छाजेड़ को जय छैरा ने सूरत आने का मौका नहीं मिलने दिया ।
वेस्टर्न रीजन की राजनीतिक खेमेबाजी में जय छैरा को पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के नजदीकियों में देखा/पहचाना जाता है, जिनका प्रफुल्ल छाजेड़ के साथ छत्तीस का रिश्ता देखा/समझा जाता है । माना जाता है कि इसी 'रिश्ते' को निभाते हुए जय छैरा ने प्रफुल्ल छाजेड़ के लिए सूरत आने का मौका नहीं बनने दिया । सिर्फ इतना ही नहीं, सूरत ब्रांच की नई बिल्डिंग के उद्घाटन का मौका प्रफुल्ल छाजेड़ से 'छीनने' के लिए बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में जय छैरा ने पिछले वर्ष ही आधी-अधूरी बिल्डिंग का उद्घाटन तत्कालीन प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता से करवा दिया था । नवीन गुप्ता के पास सूरत आने का समय नहीं था, लेकिन जय छैरा ने आनन-फानन में लगभग गुपचुप तरीके से बिल्डिंग का ई-उद्घाटन करवा दिया था । मजे की बात यह है कि पिछले वर्ष उद्घाटित हुई बिल्डिंग का काम अभी तक भी पूरा नहीं हुआ है और सूरत ब्रांच अभी भी करीब दो लाख रुपए प्रति माह के किराए वाली बिल्डिंग में ही चल रही है । यह किस्सा जय छैरा की प्रशासनिक क्षमताओं पर तो सवाल खड़े करता ही है, साथ ही यह भी बताता/दिखाता है कि जय छैरा राजनीतिक खेमेबाजी में विरोध के उस स्तर तक भी पहुँच जाते हैं, जहाँ प्रशासनिक फैसले भी मजाक बन कर रह जाते हैं । सूरत ब्रांच की अपनी बिल्डिंग का उद्घाटन करने का मौका वेस्टर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रफुल्ल छाजेड़ को न मिले, इसके लिए मनमाने व गुपचुप तरीके से, चलताऊ रूप में नवीन गुप्ता से आधी-अधूरी बिल्डिंग का ई-उद्घाटन करवा कर जय छैरा ने आखिर अपनी किस 'समझ' का परिचय दिया है ?
जय छैरा की उक्त समझ लेकिन अब वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव के चलते 'ढीली' पड़ रही है । माना जा रहा है कि इसीलिए जय छैरा को प्रफुल्ल छाजेड़ का सूरत ब्रांच में सम्मान करवाना जरूरी लगा है । जय छैरा के नजदीकियों के अनुसार, जय छैरा को यह उम्मीद तो नहीं है कि सूरत ब्रांच में सम्मान हो जाने के बाद प्रफुल्ल छाजेड़ वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने लगेंगे, लेकिन उन्हें यह उम्मीद जरूर है कि इसके बाद वेस्टर्न रीजन के वोटरों के बीच उनके विरोध की तल्खी कुछ कम जरूर हो जायेगी । जय छैरा ने दरअसल अपने रवैये और व्यवहार से वेस्टर्न रीजन के नेताओं के बीच अपने लिए विरोध का खासा घना माहौल बनाया हुआ है; उनके लिए बदकिस्मती की बात यह भी है कि उत्तम अग्रवाल खेमे में भी उनकी कोई अच्छी स्थिति नहीं है । जय छैरा ने वाइस प्रेसीडेंट पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए इसीलिए दूसरे रीजंस के वोटरों पर ध्यान देना शुरू किया है और उन्हें पटाने की मुहिम में वह जुटे हैं । अभी हाल ही में सूरत में हुई नेशनल कॉन्फ्रेंस में कॉन्फ्रेंस चेयरमैन के रूप में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से वेस्टर्न रीजन की बजाये दूसरे रीजंस के कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों - देवाशीष मित्रा, चनरजोत सिंह नंदा, प्रमोद जैन को बुलाया । वेस्टर्न रीजन से एक अकेले अनिकेत तलति के पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति को उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस में बुलाया । इससे पहले एक आयोजन में मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता भी बुलाए जा चुके हैं । वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में जय छैरा की क्या स्थिति बनेगी, यह तो आगे आने/होने वाली 'घटनाओं' पर निर्भर करेगा - अभी लेकिन जय छैरा की उम्मीदवारी के कारण प्रफुल्ल छाजेड़ को सूरत में आने का जो मौका मिला है, वह 'बड़ी बात' है । 

Sunday, February 17, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद पर अतुल गुप्ता को बैठाने के लिए हुई राजनीति के चलते एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के सामने पैदा हुई मुसीबत ने वेस्टर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर होने वाली होड़ को दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली/मुंबई । अतुल गुप्ता को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने के लिए चुनाव से पहले के करीब दस घंटों में जो राजनीतिक उठापटक हुई, उसने अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए ताल ठोंक रहे एनसी हेगड़े तथा जय छैरा की तैयारियों को तगड़ा झटका दिया है । मजे की बात यह है कि इस वर्ष के चुनावी नतीजे के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ की 'रणनीति' की तारीफ की जा रही है, और उसे श्रेय दिया जा रहा है; लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ की यह कामयाबी ही - प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थन के भरोसे अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी कर रहे एनसी हेगड़े के लिए मुसीबत बन गई है । दूसरी तरफ, पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के नजदीक तो क्या - दूर से भी तार जोड़े रहे उम्मीदवारों का जो बुरा हाल हुआ, उससे जय छैरा को अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए की जा रही अपनी तैयारी पर मिट्टी पड़ती दिख रही है । दरअसल इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उत्तम अग्रवाल समर्थित उम्मीदवारों को सफलता के आसपास भी न फटकने देने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ ने जो मोर्चा खोला, उसने कामयाबी तो प्राप्त कर ली, लेकिन उसके कारण उनके अपने 'ग्रुप' में संदेह और अविश्वास का जो महौल बना है, उसने अगले वर्ष के चुनावी समीकरणों को अनिश्चय में डाल दिया है । इस वर्ष हुए चुनाव में केमिशा सोनी तथा एमपी विजय कुमार को चुनाव से ठीक पहले 'अपने' ही लोगों से जो झटका लगा, उसके कारण यह दोनों अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं । इसी बात ने सत्ता खेमे में आपसी विश्वास को झटका दिया है, और इस झटके के चलते ही इंस्टीट्यूट की राजनीति के सत्ता खेमे में नए समीकरण बनने की संभावना बनी है - और इस संभावना में ही अलग अलग कारणों से एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के लिए मुसीबत के संकेत प्रकट हैं । 
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उम्मीदवार तो कई थे; लेकिन मुख्य प्रतिस्पर्धा में अतुल गुप्ता, केमिशा सोनी व अब्राहम बाबु के नाम थे । अब्राहम बाबु को उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जाने का खामियाजा भुगतना पड़ा, और चुनाव से दो/एक दिन पहले ही वह पिछड़ते हुए लगने लगे । अब्राहम बाबु के पिछड़ने से एमपी विजय कुमार के लिए मौका बना । इस वर्ष के चुनाव में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि काउंसिल सदस्यों के बीच उत्तम अग्रवाल को लेकर भारी विरोध का भाव रहा, जिस कारण हर उम्मीदवार जोरशोर से यह दावे करने को मजबूर हो रहा था कि उसका उत्तम अग्रवाल के साथ कोई लेना देना नहीं है । वास्तव में यही बात एमपी विजय कुमार के लिए घातक बनी । उत्तम अग्रवाल ने अपने सभी उम्मीदवारों की दुर्दशा देखी, तो उनकी तरफ से एमपी विजय कुमार को समर्थन देने की कार्रवाई हुई । एमपी विजय कुमार मौके की नजाकत को भाँप नहीं सके, और उत्तम अग्रवाल के साथ आने से पैदा होने वाले खतरे का आभास नहीं कर सके । दूसरी तरफ, उत्तम अग्रवाल की इस चाल को फेल करने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ के नेतृत्व में सत्ता खेमे ने अपनी तैयारी की, और अतुल गुप्ता पर ध्यान केंद्रित किया । चुनाव से पहले के करीब दस घंटों में जो राजनीतिक उठापटक चली और जिसमें प्रफुल्ल छाजेड़ तथा पूर्व प्रेसीडेंट्स नीलेश विकमसे व सुबोध अग्रवाल ने अपने अपने स्तर पर मोर्चा संभाला - उसमें केमिशा सोनी को इंस्टीट्यूट की प्रेसीडेंट पद की चुनावी राजनीति पर हावी रहने वाली पुरुषवादी सोच का शिकार बनना पड़ा और उनके व अतुल गुप्ता के बीच चलने वाली प्रतिस्पर्धा में पलड़ा अतुल गुप्ता की तरफ पूरी तरह झुक गया । केमिशा सोनी को तगड़ा झटका पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की तरफ से लगा; अमरजीत चोपड़ा शुरू से केमिशा सोनी की उम्मीदवारी के पक्ष में थे - लेकिन ऐन मौके पर वह अतुल गुप्ता की तरफदारी में जुट गए । अमरजीत चोपड़ा की पाला बदलने की इस कार्रवाई के पीछे पूर्व प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को देखा/पहचाना गया । 
चुनाव से ठीक पहले इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े महारथियों के अतुल गुप्ता के पक्ष में जुटने के पीछे दरअसल उत्तम अग्रवाल की राजनीति को पूरी तरह से फेल करने की कोशिश थी । यह कोशिश तो सफल रही, लेकिन इस कोशिश के चलते एमपी विजय कुमार और केमिशा सोनी को जो झटका लगा, उसने सत्ता खेमे में परस्पर अविश्वास की बीज बो दिए हैं । इन दोनों को लगा है कि इन्हें इनके अपने लोगों ने ही धोखा दिया है । मजे की बात यह रही कि पिछली काउंसिल में मधुकर हिरगंगे ने अतुल गुप्ता की 'प्रोफेशनल बेईमानियों' को लेकर जो मुहिम चलाई हुई थी, उसे सभी प्रमुख लोगों का समर्थन प्राप्त था, और जिसके चलते इंस्टीट्यूट की इनडायरेक्ट टैक्सेस कमेटी पर कब्जे की अतुल गुप्ता की कोशिशें सफल नहीं हो सकीं थीं - लेकिन वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में अचानक से सभी लोग अतुल गुप्ता के समर्थक बन गए । इस बात ने वाइस प्रेसीडेंट पद की राजनीति में केमिशा सोनी के लिए चुनौती बढ़ा दी है । इस वर्ष हुए वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उत्तम अग्रवाल की जो राजनीतिक फजीहत हुई है, उसका श्रेय भले ही प्रफुल्ल छाजेड़ की रणनीति को दिया जा रहा है; लेकिन रणनीतिक सफलता के बाद सत्ता खेमे में परस्पर अविश्वास का जो माहौल बना है, उसमें प्रफुल्ल छाजेड़ को राजनीतिक नुकसान होने का खतरा भी छिपा है । यह खतरा एनसी हेगड़े की अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी को झटका देता है । एनसी हेगड़े दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट बनने की तैयारी में हैं; ऐसे में प्रफुल्ल छाजेड़ का नुकसान वास्तव में एनसी हेगड़े का ही नुकसान होगा । इस वर्ष जो हुआ, उसने जय छैरा के लिए भी मुसीबत खड़ी की है । जय छैरा को उत्तम अग्रवाल के 'कवरिंग' उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । जय छैरा ने अपनी तरफ से होशियारीभरी चाल तो काफी दिखाई हुई है - जिसके तहत एक तरफ उन्होंने उत्तम अग्रवाल से भी तार जोड़े हुए हैं, और दूसरी तरफ वह उत्तम अग्रवाल के विरोधियों के साथ भी 'खड़े' रहने की कोशिश करते रहते हैं; लेकिन इस बार जो हुआ, उससे एक बात साफ हो गई है कि इस तरह की चालबाजी अब काम नहीं आएगी । वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर एनसी हेगड़े तथा जय छैरा के सामने पैदा हुई नई मुसीबतों ने वेस्टर्न रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट पद को लेकर होने वाली होड़ को दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, January 30, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सूरत ब्रांच की नई बिल्डिंग के उद्घाटन को लेकर चेयरमैन भविन हिंगर तथा सेंट्रल काउंसिल सदस्य जय छैरा की 'धोखाधड़ी' भरी सोच व हरकत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर भी सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'ठगा'

सूरत । सूरत ब्रांच की नई बनी बिल्डिंग के उद्घाटन के नाम पर ब्रांच के पदाधकारियों तथा सेंट्रल काउंसिल सदस्य जय छैरा ने जिस तरह की धोखाधड़ी और बेईमानी की, उसने सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बुरी तरह निराश और नाराज किया है । जय छैरा बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन हैं । सेंट्रल काउंसिल के लिए उन्हें सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का भरपूर और एकतरफा समर्थन मिलता रहा है, जिसके बूते वह शानदार तरीके से सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतते रहे हैं । हाल ही में संपन्न हुए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में वेस्टर्न रीजन में जय छैरा को सबसे ज्यादा वोट मिले और सबसे पहले वही विजेता घोषित किए गए । सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को दुःख और नाराजगी इसी बात पर है कि उन्होंने तो जय छैरा को खूब खूब प्यार और सम्मान दिया, और जय छैरा ने ब्रांच की बिल्डिंग के उद्घाटन जैसे छोटे से मामले में उन्हें ही 'धोखा' दे दिया । इस मामले में गंभीर बात यह है कि जय छैरा और ब्रांच के पदाधिकारियों ने बिल्डिंग के उद्घाटन की धोखाधड़ी में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के नाम का इस्तेमाल कर लिया - और वह भी तब, जब कि नई बिल्डिंग का काम अभी पूरा नहीं हुआ है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बनने की इच्छा रखने तथा अभी से उसके लिए तैयारी शुरू करने वाले जय छैरा की तरफ से मजेदार हरकत अब यह देखने/सुनने को मिल रही है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी को देखते हुए वह सारे झमेले की जिम्मेदारी ब्रांच के चेयरमैन भविन हिंगर के सिर थोपने की कोशिश कर रहे हैं । जय छैरा की तरफ से सुनने को मिल रहा है कि नई बिल्डिंग के नाम-पट्ट पर अपना नाम खुदवाने के स्वार्थ में भविन हिंगर ने उद्घाटन करवाने में जल्दबाजी की और जिसके चलते सारा तमाशा हुआ ।
इस तमाशे की शुरुआत उस मैसेज से हुई, जिसे ब्रांच पदाधिकारियों की तरफ से भेजा गया और जिसमें बताया गया कि 30 जनवरी को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूरत में हो रहे एक कार्यक्रम में मौजूद होंगे, इसलिए 'हमने उनसे अनुरोध किया है' कि वह ब्रांच की नई बिल्डिंग का ई-उद्घाटन कर दें । इस मैसेज में यह दावा भी किया गया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता और वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ भी मौके पर मौजूद होंगे । ब्रांच के पदाधिकारियों की तरफ से भेजा गया यह संदेश मूर्खता का चरम उदाहरण है । ब्रांच के पदाधिकारियों को क्या इतनी भी अक्ल नहीं है, और कि उन्हें यह भी पता नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री का 'कार्यक्रम' क्या ऐसे मिलता है ? ब्रांच के पदाधिकारी आखिर किस नशे में रहते हैं कि उन्होंने मान/सोच लिया कि प्रधानमंत्री चूँकि उनके शहर में होंगे, तो वह उनसे अनुरोध करेंगे कि सर, हमारे ऑफिस का भी उद्घाटन कर दो, और वह कर देंगे । कुछेक लोगों का कहना है कि ब्रांच के पदाधिकारियों और जय छैरा को भी पता था कि प्रधानमंत्री के हाथों ई-उद्घाटन होने का अवसर नहीं मिलेगा; लेकिन फिर भी उन्होंने यह तमाशा इसलिए किया ताकि वह लोगों को दिखा सकें कि देखो, उन्होंने तो प्रधानमंत्री से बिल्डिंग का उद्घाटन करवाने का प्रयास किया था । जिस उतावलेपन, मूर्खता और धोखाधड़ी के साथ, प्रधानमंत्री से ब्रांच की बिल्डिंग का ई-उद्घाटन करवाने का प्रयास किया गया था, वह न तो सफल होना था और न वह हुआ । तब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता से उद्घाटन करवाने का 'प्रोग्राम' सामने आया । कुछेक लोगों ने कहा भी कि नई बिल्डिंग का काफी काम अभी बाकी है, इसलिए अभी इस आधी-अधूरी बिल्डिंग का उद्घाटन करवाना उचित नहीं होगा । किंतु जय छैरा तथा ब्रांच के पदाधिकारियों ने इस बात को अनसुना ही कर दिया, और नवीन गुप्ता को ई-उद्घाटन करने के लिए राजी कर लिया ।
इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता को कुछेक और आधी-अधूरी ब्रांच-बिल्डिंग्स का उद्घाटन करने का 'गौरव' प्राप्त है, इसलिए उन्हें सूरत ब्रांच की बिल्डिंग का भी उद्घाटन करने करने में कोई हिचक नहीं हुई । ब्रांच के चेयरमैन और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट की कुर्सी पर चूँकि अब जल्दी ही नए लोगों को बैठना है, इसलिए उन पर अभी बैठे लोगों का 'स्वार्थ' तो समझ में आता है; लेकिन यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही है कि जय छैरा आधी-अधूरी बिल्डिंग का उद्घाटन करवाने की जल्दी में क्यों रहे ? कुछेक लोगों को शक है कि जय छैरा शायद सूरत ब्रांच की नई बिल्डिंग का उद्घाटन प्रफुल्ल छाजेड़ से नहीं करवाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें उद्घाटन अभी करवा लेने की जल्दी रही । गौर करने की बात यह है कि करीब आठ/दस दिन बाद प्रफुल्ल छाजेड़ इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हो जायेंगे; सूरत ब्रांच की बिल्डिंग का उद्घाटन यदि अभी नहीं होता - तो फिर उद्घाटन करने का मौका प्रफुल्ल छाजेड़ को मिलता; प्रफुल्ल छाजेड़ को मौका न मिले, इसके लिए जय छैरा भी जल्दबाजी में अभी ही उद्घाटन करवाने के लिए उतावले हो गए । नवीन गुप्ता ने भी दिल्ली में बैठे बैठे जो ई-उद्घाटन किया, उसमें भी तमाशा हो गया । ब्रांच के अधिकतर लोगों को उद्घाटन-कार्यक्रम की सूचना ही नहीं मिली, जिस कारण उद्घाटन अवसर पर गिनती के लोग ही उपस्थित हो पाए । गिनती के जो लोग उपस्थित हुए भी, उनके बैठने के लिए कुर्सी आदि की तथा पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं थी । उद्घाटन के लिए जो समय तय हुआ था, नवीन गुप्ता उस समय तक दिल्ली मुख्यालय में पहुँच ही नहीं सके । उनका इंतजार करते हुए सूरत ब्रांच में उपस्थित हुए लोगों को करीब एक-डेढ़ घंटा इंतजार करना पड़ा, और जैसे-तैसे बड़े ही उजाड़ तरीके से बिल्डिंग का उद्घाटन हुआ । 
सूरत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को दुःख और नाराजगी इस बात की है कि सूरत जैसी बड़ी और प्रमुख ब्रांच, जिसमें करीब पाँच हजार सदस्य हैं और जिनमें से करीब तीन हजार ने अभी हाल ही में हुए चुनाव में वोट दिया था, की जो बड़ी और बढ़िया बिल्डिंग बनी है - उसका उद्घाटन भी शानदार तरीके से होना चाहिए था, और ब्रांच के पूर्व पदाधिकारियों तथा सदस्यों को उसमें शामिल होने का अवसर मिलना चाहिए था; लेकिन भविन हिंगर, जय छैरा और नवीन गुप्ता की स्वार्थी व 'धोखाधड़ी' भरी सोच व हरकत ने उनसे वह अवसर छीन लिया ।