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Thursday, February 13, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद पर निहार जंबुसारिया की अप्रत्याशित जीत इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े तुर्रमखाँ नेताओं के लिए खासी झटके वाली बात भी है; लगता है कि उनसे धोखा खाए पूर्व व मौजूदा काउंसिल सदस्यों ने ही उनकी राजनीति को फेल कर दिया है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद पर हुई निहार जंबुसारिया की चुनावी जीत इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को हैरान करने वाली तो है ही, इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के तुर्रमखांओं को झटका देने वाली भी है । हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पूर्व प्रेसीडेंट्स अमरजीत चोपड़ा, उत्तम अग्रवाल और सुबोध अग्रवाल अपने अपने उम्मीदवारों को जितवाने के लिए चालें चल रहे थे, लेकिन इस वर्ष इन्हें बुरी तरह मुहँकी खानी पड़ी । बुरी तरह इसलिए, क्योंकि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इनके सारे प्लान - प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी ..... आदि-इत्यादि सब फेल हो गए । दरअसल इन नेताओं का खेल हर वर्ष होता/रहता यह है कि अपने प्रमुख उम्मीदवारों के साथ-साथ यह दो-तीन और उम्मीदवारों को भी 'गोली' दिए रहते हैं, और वोटों का आदान-प्रदान करवा कर अपने पहले नहीं, तो दूसरे; दूसरे नहीं, तो तीसरे; और तीसरे नहीं, तो चौथे उम्मीदवार के जीतने की स्थिति बना लेते थे - और फिर श्रेय 'लूटते' थे । इसी 'परंपरा' के तहत इस वर्ष अनिल भंडारी, सुशील गोयल, मनु अग्रवाल, धीरज खंडेलवाल इन नेताओं के पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे नंबर के उम्मीदवार थे ।
अमरजीत चोपड़ा ने अनिल भंडारी और मनु अग्रवाल को 'गोली' दी हुई थी; सुबोध अग्रवाल ने सुशील गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ था; और उत्तम अग्रवाल ने धीरज खंडेलवाल के लिए दाँव लगाया हुआ था । तत्कालीन प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के अनिल भंडारी के तथा तत्कालीन वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के सुशील गोयल के समर्थन में होने के कारण इनका पलड़ा भारी दिख रहा था । उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार की पहचान रखने के कारण धीरज खंडेलवाल को समर्थन का टोटा पड़ता दिखा, तो उत्तम अग्रवाल ने मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा इस उम्मीद से उठा लिया कि अमरजीत चोपड़ा का समर्थन मनु अग्रवाल को मिलेगा ही, तो धीरज खंडेलवाल न सही मनु अग्रवाल को ही वह वाइस प्रेसीडेंट चुनवा लेते हैं । वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में दिलचस्पी लेते रहे पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता दिल्ली विधानसभा की राजनीति में व्यस्त रहने के कारण इस वर्ष वाइस प्रेसीडेंट की राजनीति से दूर रहे, जिस कारण उम्मीद रही कि अमरजीत चोपड़ा, सुबोध अग्रवाल और उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवारों में से ही कोई उम्मीदवार कामयाब हो जायेगा । लेकिन नतीजा आया, तो उक्त उम्मीदों को धराशाही पाया । समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य, खासकर नए सदस्य पूर्व प्रेसीडेंट्स के खेल को समझ गए हैं, और इस बार वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उनके हाथ की कठपुतली नहीं बने और उन्होंने अपने विवेक से फैसला किया ।
वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव के चक्कर में काउंसिल सदस्य दरअसल इन पूर्व प्रेसीडेंट्स के द्वारा कई बार इस्तेमाल हो चुके हैं; काउंसिल सदस्यों को वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए वोट दिलवाने का वास्ता देकर नेता लोग अपने समर्थक बनाते हैं, और फिर अपनी राजनीति के लिए उन्हें इस्तेमाल करते हैं । वाइस प्रेसीडेंट बनने की दौड़ में शामिल होने वाले काउंसिल सदस्यों का तो बहुत ही बुरा अनुभव रहा है; और अधिकतर ने अपने आप को 'ठगा' हुआ ही पाया है । वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उत्तम अग्रवाल तथा अमरजीत चोपड़ा से वादानुरूप अपेक्षित समर्थन न मिलने से पूर्व काउंसिल सदस्य विजय गुप्ता ने तो अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी । पूर्व प्रेसीडेंट्स की राजनीति में इस्तेमाल होने और या इस्तेमाल होने के किस्से सुन कर ही काउंसिल सदस्यों ने इस बार लगता है कि उनके झाँसे में आने से अपने आप को बचा लिया और इस कारण से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी चौधराहट बनाने/जमाने के चक्कर में लगे रहने वाले नेताओं को मात खाना पड़ी । समझा जाता है कि वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में नेताओं की वादाखिलाफी के शिकार हो चुके पूर्व व मौजूदा काउंसिल सदस्यों ने भी सक्रिय भूमिका निभा कर नेताओं की राजनीति को फेल करने का काम किया और निहार जंबुसारिया की उम्मीदवारी को सफल बनाया/बनवाया । इस तरह निहार जंबुसारिया का अप्रत्याशित तरीके से वाइस प्रेसीडेंट बनना इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के बड़े नेताओं के लिए खासे झटके वाली बात रही है ।

Thursday, January 30, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अगले वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के अपने अपने उम्मीदवारों के साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ने से वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनावी मुकाबला रोचक हुआ

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ तथा वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता जिस तरह से आपने-सामने खड़े हो गए हैं, उसके चलते वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है ।  उल्लेखनीय है कि प्रफुल्ल छाजेड़ ने वेस्टर्न रीजन के अनिल भंडारी की उम्मीदवारी का झंडा उठाया हुआ है, जबकि अतुल गुप्ता ने ईस्टर्न रीजन के सुशील गोयल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान छेड़ा हुआ है । सुशील गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुबोध अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में सुशील गोयल को लोग ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन जब से अतुल गुप्ता ने उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की जिम्मेदारी सँभाली है, तब से सुशील गोयल की उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जाने लगा है । संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि सुशील गोयल यदि सचमुच प्रफुल्ल छाजेड़  उम्मीदवार अनिल भंडारी को टक्कर देते हुए नजर आए, तो इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल का समर्थन भी उन्हें मिल जायेगा । वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उत्तम अग्रवाल का एकमात्र एजेंडा दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार को सफल होने से रोकने का है, और इसीलिए सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल का समर्थन मिल सकने का भरोसा जताया जा रहा है ।
अतुल गुप्ता की तरफ से लेकिन मजे की बात यह देखने में आ रही है कि वह सुशील गोयल की उम्मीदवारी को उत्तम अग्रवाल के समर्थन से बचाने की कोशिश कर रहे हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अतुल गुप्ता दो वजहों से ऐसा कर रहे हैं : एक तो उन्हें डर है कि सुशील गोयल की उम्मीदवारी के साथ उत्तम अग्रवाल का नाम जुड़ा तो सुशील गोयल का बनता दिख रहा 'काम' बिगड़ जायेगा, और दूसरी बात यह कि सुशील गोयल की सफलता में यदि उत्तम अग्रवाल की भूमिका बनी/दिखी, तो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति तथा व्यवस्था में उत्तम अग्रवाल को महत्त्व मिलने लगेगा । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उत्तम अग्रवाल अभी पूरी तरह अलग-थलग पड़े हुए हैं; वह उछल-कूद तो खूब मचाये रखते हैं, लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता है - उनके अपने भी नहीं । यही कारण है कि उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में जो धीरज खंडेलवाल वाइस प्रेसीडेंट बनने की लाइन में हैं, उन धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है - खुद धीरज खंडेलवाल भी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । इसीलिए, अब जब चुनाव सिर पर है तब भी धीरज खंडेलवाल चुनावी परिदृश्य से 'दूर' दूसरे कामों में व्यस्त हैं ।
सुशील गोयल की उम्मीदवारी को अतुल गुप्ता के समर्थन से जो ताकत मिलती है, वह उत्तम अग्रवाल के समर्थन की संभावना से बिगड़ भी जाती है - और यही बात अनिल भंडारी की उम्मीदवारी को बढ़त दिलाती लग रही है । लेकिन उनके साथ भी मुश्किलें कम नहीं हैं । दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ के भरोसे एक अनिल भंडारी ही नहीं हैं, बल्कि वेस्टर्न रीजन के एनसी हेगड़े तथा सेंट्रल रीजन के मनु अग्रवाल भी चुनावी मैदान में कूदे हुए हैं । इन्हें प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार 'बी' और उम्मीदवार 'सी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इसके चलते प्रफुल्ल छाजेड़ के समर्थकों व नजदीकियों के बीच असमंजस बन गया है, और इस असमंजस के चलते प्रफुल्ल छाजेड़ ग्रुप में एकता बने रह पाने को लेकर संदेह पैदा हो गया है । अनिल भंडारी और सुशील गोयल को अलग अलग कारणों से मुसीबत में घिरा पाकर वेस्टर्न रीजन के निहार जंबुसारिया व जय छैरा तथा सदर्न रीजन के अब्राहम बाबु व जी शेखर अपनी अपनी दाल गलाने की कोशिशों में हैं । दरअसल अलग अलग कारणों से इनके लिए काउंसिल सदस्यों के बीच समर्थन का 'भाव' तो है, लेकिन इस भाव को वोट में बदलने के लिए जो मैकेनिज्म चाहिए होता है - उसका इनके पास नितांत अभाव है । यह तो बस किस्मत के भरोसे हैं । इन्हें भी पता है कि इंस्टीट्यूट को कई (वाइस) प्रेसीडेंट किस्मत के चलते ही मिले हैं । 

Saturday, February 8, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनाव जीतने का दावा करके विजय गुप्ता और अनुज गोयल ने चुनावी माहौल को खासा दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली । विजय गुप्ता और अनुज गोयल के नजदीकियों का दावा है कि इस बार तो वह निश्चित ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट बन जायेंगे । दोनों के नजदीकियों के इस दावे में समस्या लेकिन यही है कि इंस्टीट्यूट का वाइस प्रेसीडेंट तो एक ही बनेगा - ऐसे में दोनों के दावों में किसी एक का दावा तो कोरा दावा ही रह जाना है । दोनों में से लेकिन कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि उसका दावा ख़ारिज हो सकता है ।
विजय गुप्ता इस बार वाइस प्रेसीडेंट चुने जाने के लिए इस कारण से आश्वस्त हैं, क्योंकि उन्हें इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल और वाइस प्रेसीडेंट के रघु के सहयोग/समर्थन का भरोसा है । विजय गुप्ता का कहना है कि सुबोध अग्रवाल के प्रेसीडेंट-काल में उन्होंने जिस तरह से सुबोध अग्रवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है, उसके चलते सुबोध अग्रवाल उनसे बहुत ही खुश हैं और खुश होने के कारण सुबोध अग्रवाल निश्चित ही उन्हें वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में मदद करेंगे । के रघु को लेकर विजय गुप्ता का दावा है कि पिछली बार के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में चूँकि उन्होंने बहुत मेहनत और तिकड़म की थी तथा कई लोगों का समर्थन के रघु को दिलवाया था इसलिए इस बार 'अपने' लोगों का समर्थन के रघु उन्हें दिलवायेंगे । विजय गुप्ता का एक जोरदार तर्क यह भी है कि वह जब के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवा सकते हैं, तो अपने आप को क्यों नहीं चुनवा सकते हैं ? विजय गुप्ता ने दावा किया है कि पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की मदद भी उन्हें मिल रही है । विजय गुप्ता ने अपने नजदीकियों को बताया/जताया है कि जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट के साथ-साथ एक पूर्व प्रेसीडेंट का सहयोग/समर्थन उनके साथ है तो फिर भला वह क्यों नहीं चुने जायेंगे ?
अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम कुमार अग्रवाल का भरोसा है । उत्तम कुमार अग्रवाल हालाँकि इंस्टीट्यूट की काउंसिल में नहीं हैं, लेकिन फिर भी काउंसिल के कई सदस्यों पर उनका असर/प्रभाव माना/बताया जाता है । अनुज गोयल के साथ उत्तम कुमार अग्रवाल की अच्छी दोस्ती रही है - उस दोस्ती के चलते अनुज गोयल को यद्यपि काफी बदनामी भी उठानी पड़ी है, लेकिन उन दोनों की दोस्ती पर उससे कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा । उत्तम कुमार अग्रवाल का इंस्टीट्यूट की मौजूदा काउंसिल के कुछेक सदस्यों के साथ तो अच्छे संबंध हैं ही, साथ ही समर्थन जुटाने का हुनर भी उन्हें खूब आता है । इसी हुनर के चलते वह ऐसी स्थिति में (वाइस) प्रेसीडेंट चुने गए थे, जबकि किसी को उनके चुनने/बनने की कतई उम्मीद नहीं थी । प्रेसीडेंट के रूप में उत्तम कुमार अग्रवाल के साथ अनुज गोयल का 'जिस तरह' का एसोसिएशन  रहा था, उसके चलते उत्तम कुमार अग्रवाल का एक एजेंडा/लक्ष्य अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट का (वाइस) प्रेसीडेंट बनवाना/चुनवाना भी है । पिछले वर्षों में उत्तम कुमार अग्रवाल ने हालाँकि अनुज गोयल को चुनवाने का प्रयास किया था, लेकिन तब उनकी दाल नहीं गाल सकी । अनुज गोयल काउंसिल सदस्यों के बीच दरअसल इतनी बुरी तरह से बदनाम हैं, कि हर कोई यही मानता है कि अनुज गोयल यदि इंस्टीट्यूट के (वाइस) प्रेसीडेंट बनते हैं तो यह इंस्टीट्यूट के लिए और प्रोफेशन के लिए बहुत ही बदकिस्मती की बात होगी । असल में, बदनामी के कारण ही अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कोई गंभीरता से नहीं लेता है । अनुज गोयल लेकिन इस बार बहुत उम्मीद में हैं । बदनामी वाले पक्ष से वह इसलिए चिंतित नहीं हैं क्योंकि बदनामी के बाद भी उत्तम कुमार अग्रवाल और सुबोध अग्रवाल भी (वाइस) प्रेसीडेंट बने ही न ! अनुज गोयल आश्वस्त हैं क्योंकि वह जानते हैं कि फूलन देवी भी संसद का चुनाव जीती ही थी । इसी विश्वास के भरोसे अनुज गोयल ने इस बार काफी मेहनत की है और काउंसिल के सदस्यों के वोट जुटाने के लिए उन्हें हर तरह से घेरने का काम किया है ।
विजय गुप्ता और अनुज गोयल की तैयारी ने लेकिन चरनजोत सिंह नंदा के गेम प्लान को गड़बड़ कर दिया है । चरनजोत सिंह नंदा ने भी वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी हुई है । मजे की बात लेकिन यह है कि अपनी निरंतर तैयारी के बाद भी चरनजोत सिंह नंदा अपने चुने जाने को लेकर खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं - जैसे कि विजय गुप्ता और अनुज गोयल हैं । चरनजोत सिंह नंदा दरअसल अपना अभियान खुद ही चला रहे हैं, उन्हें किसी 'नामी' व्यक्ति का समर्थन घोषित रूप से नहीं सुना जा रहा है - इसलिए उनकी उम्मीदवारी में 'वजन' ज्यादा नहीं बन पा रहा है । नीलेश विकमसे, संजीव माहेश्वरी, मनोज फडनिस, संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को भी किसी बड़े नेता का समर्थन हालाँकि प्राप्त नहीं है - लेकिन फिर भी उनकी उम्मीदवारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है तो इसका कारण इनके अपने अपने व्यक्तित्व में हैं । इन्होँने अपने कामकाज, अपने व्यवहार, अपनी सक्रियता और अपनी सामर्थ्य से अपनी पहचान बनाई है और अब उसी पहचान के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उम्मीदवार बने हैं ।
वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी प्रक्रिया से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव एक घोर अनिश्चितता भरा चुनाव है और किसी के लिए भी यह समझना/पहचानना सिर्फ मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव भी है कि वाइस प्रेसीडेंट पद की कुर्सी पर कौन बैठेगा । अक्सर ही, जीतने/बनने वाले को भी यह भरोसा नहीं होता है कि वह जीत/बन ही जायेगा । यह एक ऐसा चुनाव है जहाँ हर पल नए समीकरण बनते और बिगड़ते हैं, इसलिए किसी नए बने समीकरण के हवाले से अनुमान लगाना धोखापूर्ण हो जाता है । इसके बावजूद उम्मीदवारों को अनुमानों के आधार पर और उनके भरोसे ही काम करना पड़ता है । इस बार भी वाइस प्रेसीडेंट पद के सभी उम्मीदवार अपने अपने अनुमानों के आधार पर ही बनाई गईं अपनी अपनी रणनीतियों के आधार पर ही अपने लिए मौका बनाने का प्रयास कर रहे हैं । दूसरे उम्मीदवार जहाँ अपने अपने तरीके से सिर्फ प्रयास कर रहे हैं, वहाँ विजय गुप्ता और अनुज गोयल प्रयासों के साथ-साथ जीत का दावा भी कर रहे हैं । उनका दावा सच होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा, अभी लेकिन उनके दावों ने इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को खासा दिलचस्प बना तो दिया है ।

Sunday, February 24, 2013

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन के चुनाव में गोपाल कुमार केडिया को प्रेसीडेंट सुबोध कुमार अग्रवाल की मदद सचमुच मिल पायेगी क्या

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन के चुनाव में गोपाल कुमार केडिया द्धारा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट सुबोध कुमार अग्रवाल की मदद जुटाने की कोशिशों ने खासी गर्मी पैदा कर दी है । गोपाल कुमार केडिया दरअसल इस वर्ष चेयरमैन बनने के लिए अपने आप को पूरी तरह उपर्युक्त मान रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या यह है कि जिन लोगों को चेयरमैन चुनना है, उनके बीच उनके पक्ष में पर्याप्त समर्थन दिख नहीं रहा है । गोपाल कुमार केडिया रीजनल काउंसिल में अभी वाइस चेयरमैन के पद पर हैं और अभी हाल ही में हुए चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले हैं - जिसे वह इस बात के सुबूत के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं कि उन्हें अनुभव भी है और लोगों का समर्थन भी उनके साथ है; और इसलिए चेयरमैन बनने के लिए वह सर्वथा उपर्युक्त हैं । लेकिन उनकी मुसीबत यह है कि जिन बातों को वह अपनी 'उपलब्धियों' के रूप में देख/बता रहे हैं, उनकी वही उपलब्धियाँ उनकी राह का रोड़ा बनी हुईं हैं ।
रीजनल काउंसिल में वाइस चेयरमैन होने को गोपाल कुमार केडिया भले ही अपनी उपलब्धि के रूप में देख/बता रहे हों, लेकिन दूसरे लोगों का कहना है कि उनके वाइस चेयरमैन होने के बावजूद रीजनल काउंसिल का यह वर्ष सबसे ख़राब वर्ष रहा है - क्या इससे यह साबित नहीं होता कि प्रतिकूल स्थितियों से निपटने की उनमें जरा भी काबिलियत नहीं है ? यह ठीक है कि रीजनल काउंसिल में इस वर्ष जो भी गड़बड़ियाँ रहीं, गोपाल कुमार केडिया उनके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं रहे हैं; लेकिन उन्होंने हालात को सँभालने की भी तो कोई कोशिश नहीं की, और यदि की तो सँभाल नहीं सके - और इस कारण से वाइस चेयरमैन होने के कारण चेयरमैन बनने के उनके तर्क का दम निकल जाता है । रीजन में ज्यादा वोट पाना भी गोपाल कुमार केडिया के लिए मुसीबत बन गया है । अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार होने के लिए तैयारी कर रहे लोगों को गोपाल कुमार केडिया में एक दमदार प्रतिद्धन्द्धी दिख रहा है । उन्हें डर हो रहा है कि चेयरमैन होने के बाद गोपाल कुमार केडिया सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे और तब उनके लिए मुश्किलें खड़ी करेंगे - इसलिए उन्हें गोपाल कुमार केडिया को खींचे रखने में ही अपनी भलाई दिख रही है । गोपाल कुमार केडिया ऐसे लोगों को हालाँकि यह विश्वास दिलाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन कोई भी उनकी बात का भरोसा ही नहीं कर रहा है ।
गोपाल कुमार केडिया अपनी खूबियों के कमजोरियाँ बन जाने के कारण रीजनल काउंसिल के नए सदस्यों के बीच पूरी तरह अकेले और अलग-थलग पड़ गए नजर आ रहे हैं । इसके बावजूद खेल अभी भी उनके लिए पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है । प्रतिकूल स्थितियों में भी गोपाल कुमार केडिया के लिए अपने पक्ष में मौका बनाने का अवसर छिपा हुआ है । गोपाल कुमार केडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती आठ सदस्यों वाला जो ग्रुप बना हुआ है, उसमें चेयरमैन पद के कई उम्मीदवारों के होने में गोपाल कुमार केडिया की उम्मीद बनी हुई है । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अगले सत्र के लिए चुने गए तेरह सदस्यों में से आठ सदस्यों का जो ग्रुप बना है, वह ऊपर से देखने पर तो बाकी बचे पाँच सदस्यों - जिनमें एक गोपाल कुमार केडिया भी हैं - को सत्ता से बाहर रखने का आभास देता है; लेकिन कई लोगों को लगता है कि ग्रुप बना चुके लोगों में चूँकि चेयरमैन पद के कई उम्मीदवार हैं इसलिए इस ग्रुप के एक बने रहने को लेकर संदेह है । आठ लोगों के ग्रुप में हंसराज चुग, विशाल गर्ग, राधे श्याम बंसल और राज चावला को चेयरमैन पद के घोषित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और कई लोगों को लगता है कि जिस दिन चेयरमैन पद के लिए उम्मीदवार तय करने का मौका आएगा, उस दिन यह ग्रुप टूट जायेगा । ग्रुप के कर्ता-धर्ताओं को भी शायद इस बात का अंदेशा है, इसीलिये वह अभी तक चेयरमैन पद की उम्मीदवारी पर आपस में बात करने से बच रहे हैं ।
आठ सदस्यों के ग्रुप में टूट की यही आशंका गोपाल कुमार केडिया की उम्मीद को बनाये हुए है । गोपाल कुमार केडिया को ग्रुप से बाहर रह गए बाकी चार सदस्यों के समर्थन की भी उम्मीद है । यूँ तो 'यह' चारों अलग-अलग 'मिजाज' और खेमों के लोग हैं, लेकिन मजबूरी में यह एक हो सकते हैं - गोपाल कुमार केडिया के सामने चुनौती सिर्फ इस बात की है कि वह इन्हें अपने पक्ष में 'एक' कैसे करें ? यहीं इन्हें इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट सुबोध कुमार अग्रवाल की मदद की जरूरत नजर आती है । गोपाल कुमार केडिया को लगता है कि सुबोध कुमार अग्रवाल के दिलचस्पी लेने पर ग्रुप से बाहर रह गए चारों सदस्यों को उनके पक्ष में किया जा सकता है और फिर उसके बाद आठ सदस्यीय ग्रुप में तोड़-फोड़ करवा कर से उसके दो-तीन सदस्यों को अपनी तरफ कर लेने में भी कोई मुश्किल नहीं होंगी; और इस तरह वह चेयरमैन बन जायेंगे । किंतु सवाल यह है कि सुबोध कुमार अग्रवाल आखिर क्यों गोपाल कुमार केडिया की मदद करेंगे ? गोपाल कुमार केडिया को इसका भरोसा इस कारण से क्योंकि सुबोध कुमार अग्रवाल से उनका नजदीकी रिश्ता है । गोपाल कुमार केडिया कई मौकों पर सुबोध कुमार अग्रवाल को अपना साढु भाई बता चुके हैं । अब साढु भाई वाले रिश्ते में सुबोध कुमार अग्रवाल से गोपाल कुमार केडिया इतनी मदद की उम्मीद तो कर ही सकते हैं । सुबोध कुमार अग्रवाल भी चूँकि चुनावी राजनीति की तिकड़मों के ऊँचे खिलाड़ी हैं, इसलिए गोपाल कुमार केडिया की उनसे जो उम्मीद है वह संभव और प्रासंगिक दिखती है । इस संभावना को सच बनाने को लेकर गोपाल कुमार केडिया की जो सक्रियता है, उसके चलते नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन पद का चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है - और रोज नये-नये तमाशे देखने को मिल सकते हैं ।