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Saturday, February 8, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनाव जीतने का दावा करके विजय गुप्ता और अनुज गोयल ने चुनावी माहौल को खासा दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली । विजय गुप्ता और अनुज गोयल के नजदीकियों का दावा है कि इस बार तो वह निश्चित ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट बन जायेंगे । दोनों के नजदीकियों के इस दावे में समस्या लेकिन यही है कि इंस्टीट्यूट का वाइस प्रेसीडेंट तो एक ही बनेगा - ऐसे में दोनों के दावों में किसी एक का दावा तो कोरा दावा ही रह जाना है । दोनों में से लेकिन कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि उसका दावा ख़ारिज हो सकता है ।
विजय गुप्ता इस बार वाइस प्रेसीडेंट चुने जाने के लिए इस कारण से आश्वस्त हैं, क्योंकि उन्हें इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल और वाइस प्रेसीडेंट के रघु के सहयोग/समर्थन का भरोसा है । विजय गुप्ता का कहना है कि सुबोध अग्रवाल के प्रेसीडेंट-काल में उन्होंने जिस तरह से सुबोध अग्रवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है, उसके चलते सुबोध अग्रवाल उनसे बहुत ही खुश हैं और खुश होने के कारण सुबोध अग्रवाल निश्चित ही उन्हें वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में मदद करेंगे । के रघु को लेकर विजय गुप्ता का दावा है कि पिछली बार के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में चूँकि उन्होंने बहुत मेहनत और तिकड़म की थी तथा कई लोगों का समर्थन के रघु को दिलवाया था इसलिए इस बार 'अपने' लोगों का समर्थन के रघु उन्हें दिलवायेंगे । विजय गुप्ता का एक जोरदार तर्क यह भी है कि वह जब के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवा सकते हैं, तो अपने आप को क्यों नहीं चुनवा सकते हैं ? विजय गुप्ता ने दावा किया है कि पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की मदद भी उन्हें मिल रही है । विजय गुप्ता ने अपने नजदीकियों को बताया/जताया है कि जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट के साथ-साथ एक पूर्व प्रेसीडेंट का सहयोग/समर्थन उनके साथ है तो फिर भला वह क्यों नहीं चुने जायेंगे ?
अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम कुमार अग्रवाल का भरोसा है । उत्तम कुमार अग्रवाल हालाँकि इंस्टीट्यूट की काउंसिल में नहीं हैं, लेकिन फिर भी काउंसिल के कई सदस्यों पर उनका असर/प्रभाव माना/बताया जाता है । अनुज गोयल के साथ उत्तम कुमार अग्रवाल की अच्छी दोस्ती रही है - उस दोस्ती के चलते अनुज गोयल को यद्यपि काफी बदनामी भी उठानी पड़ी है, लेकिन उन दोनों की दोस्ती पर उससे कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा । उत्तम कुमार अग्रवाल का इंस्टीट्यूट की मौजूदा काउंसिल के कुछेक सदस्यों के साथ तो अच्छे संबंध हैं ही, साथ ही समर्थन जुटाने का हुनर भी उन्हें खूब आता है । इसी हुनर के चलते वह ऐसी स्थिति में (वाइस) प्रेसीडेंट चुने गए थे, जबकि किसी को उनके चुनने/बनने की कतई उम्मीद नहीं थी । प्रेसीडेंट के रूप में उत्तम कुमार अग्रवाल के साथ अनुज गोयल का 'जिस तरह' का एसोसिएशन  रहा था, उसके चलते उत्तम कुमार अग्रवाल का एक एजेंडा/लक्ष्य अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट का (वाइस) प्रेसीडेंट बनवाना/चुनवाना भी है । पिछले वर्षों में उत्तम कुमार अग्रवाल ने हालाँकि अनुज गोयल को चुनवाने का प्रयास किया था, लेकिन तब उनकी दाल नहीं गाल सकी । अनुज गोयल काउंसिल सदस्यों के बीच दरअसल इतनी बुरी तरह से बदनाम हैं, कि हर कोई यही मानता है कि अनुज गोयल यदि इंस्टीट्यूट के (वाइस) प्रेसीडेंट बनते हैं तो यह इंस्टीट्यूट के लिए और प्रोफेशन के लिए बहुत ही बदकिस्मती की बात होगी । असल में, बदनामी के कारण ही अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कोई गंभीरता से नहीं लेता है । अनुज गोयल लेकिन इस बार बहुत उम्मीद में हैं । बदनामी वाले पक्ष से वह इसलिए चिंतित नहीं हैं क्योंकि बदनामी के बाद भी उत्तम कुमार अग्रवाल और सुबोध अग्रवाल भी (वाइस) प्रेसीडेंट बने ही न ! अनुज गोयल आश्वस्त हैं क्योंकि वह जानते हैं कि फूलन देवी भी संसद का चुनाव जीती ही थी । इसी विश्वास के भरोसे अनुज गोयल ने इस बार काफी मेहनत की है और काउंसिल के सदस्यों के वोट जुटाने के लिए उन्हें हर तरह से घेरने का काम किया है ।
विजय गुप्ता और अनुज गोयल की तैयारी ने लेकिन चरनजोत सिंह नंदा के गेम प्लान को गड़बड़ कर दिया है । चरनजोत सिंह नंदा ने भी वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी हुई है । मजे की बात लेकिन यह है कि अपनी निरंतर तैयारी के बाद भी चरनजोत सिंह नंदा अपने चुने जाने को लेकर खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं - जैसे कि विजय गुप्ता और अनुज गोयल हैं । चरनजोत सिंह नंदा दरअसल अपना अभियान खुद ही चला रहे हैं, उन्हें किसी 'नामी' व्यक्ति का समर्थन घोषित रूप से नहीं सुना जा रहा है - इसलिए उनकी उम्मीदवारी में 'वजन' ज्यादा नहीं बन पा रहा है । नीलेश विकमसे, संजीव माहेश्वरी, मनोज फडनिस, संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को भी किसी बड़े नेता का समर्थन हालाँकि प्राप्त नहीं है - लेकिन फिर भी उनकी उम्मीदवारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है तो इसका कारण इनके अपने अपने व्यक्तित्व में हैं । इन्होँने अपने कामकाज, अपने व्यवहार, अपनी सक्रियता और अपनी सामर्थ्य से अपनी पहचान बनाई है और अब उसी पहचान के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उम्मीदवार बने हैं ।
वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी प्रक्रिया से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव एक घोर अनिश्चितता भरा चुनाव है और किसी के लिए भी यह समझना/पहचानना सिर्फ मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव भी है कि वाइस प्रेसीडेंट पद की कुर्सी पर कौन बैठेगा । अक्सर ही, जीतने/बनने वाले को भी यह भरोसा नहीं होता है कि वह जीत/बन ही जायेगा । यह एक ऐसा चुनाव है जहाँ हर पल नए समीकरण बनते और बिगड़ते हैं, इसलिए किसी नए बने समीकरण के हवाले से अनुमान लगाना धोखापूर्ण हो जाता है । इसके बावजूद उम्मीदवारों को अनुमानों के आधार पर और उनके भरोसे ही काम करना पड़ता है । इस बार भी वाइस प्रेसीडेंट पद के सभी उम्मीदवार अपने अपने अनुमानों के आधार पर ही बनाई गईं अपनी अपनी रणनीतियों के आधार पर ही अपने लिए मौका बनाने का प्रयास कर रहे हैं । दूसरे उम्मीदवार जहाँ अपने अपने तरीके से सिर्फ प्रयास कर रहे हैं, वहाँ विजय गुप्ता और अनुज गोयल प्रयासों के साथ-साथ जीत का दावा भी कर रहे हैं । उनका दावा सच होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा, अभी लेकिन उनके दावों ने इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को खासा दिलचस्प बना तो दिया है ।

Saturday, February 9, 2013

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव चुनावी पंडितों के लिए चौंकाने वाला भी हो सकता है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी लड़ाई अब पूरी तरह दिल्ली आ गई है और चूँकि इस लड़ाई के सारे खिलाड़ी और प्यादे दिल्ली आ गए हैं, इसलिए इस लड़ाई की सारी तीन-तिकड़में अब यहीं अपने को संभव करने में जुट गई हैं । वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी लड़ाई के दिल्ली में केंद्रित हो जाने के चलते, इस लड़ाई के फिलबक्त सबसे बड़े खिलाड़ी समझे जाने वाले संजीव माहेश्वरी को एक बड़ा फायदा यह हुआ है कि अभी तक परदे के पीछे से उनका समर्थन करने वाले इंस्टीट्यूट के पूर्व अध्यक्ष अमरजीत चोपड़ा अब परदे के आगे आ गए हैं । मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट सुबोध कुमार अग्रवाल के समर्थन के कारण संजीव माहेश्वरी की स्थिति पहले से ही अच्छी समझी जा रही है, उसमें अमरजीत चोपड़ा का समर्थन भी जुट जाने से उनके नजदीकियों को उनका कम 'बनता' हुआ दिख रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों को लगता है कि सुबोध कुमार अग्रवाल और अमरजीत चोपड़ा का समर्थन संजीव माहेश्वरी के लिए 'बिल्ली के रास्ता काटने वाला काम करेगा' और संजीव माहेश्वरी के लिए भारी पड़ेगा ।
निलेश विकमसे ने इसका फायदा उठाना शुरू कर भी दिया है । उल्लेखनीय है कि निलेश विकमसे को भी वाइस प्रेसीडेंट पद के प्रबल दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, लेकिन संजीव माहेश्वरी की तुलना में उन्हें अभी तक पीछे ही पाया जा रहा था । लेकिन जैसे ही उन्हें भनक लगी है कि सुबोध कुमार अग्रवाल और अमरजीत चोपड़ा के समर्थन के कारण कुछेक लोग संजीव माहेश्वरी से बिदक रहे हैं और विरोधी लोगों ने सुबोध और अमरजीत की न चलने देने का 'फैसला' किया है, निलेश विकमसे उन विरोधी लोगों का समर्थन जुटाने में लग गए हैं । निलेश विकमसे की सक्रियता से संजीव माहेश्वरी के लिए खतरा तो पैदा हुआ है, लेकिन उनकी उम्मीद पंकज जैन की सक्रियता पर टिकी है । संजीव माहेश्वरी के समर्थक मान रहे हैं कि निलेश विकमसे और पंकज जैन के बीच आगे निकलने की जो होड़ है, वह संजीव माहेश्वरी का काम आसान करेगी । सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों के बीच जो समीकरण बनते हुए दिख रहे हैं, उसमें संजीव माहेश्वरी, निलेश विकमसे और पंकज जैन - तीनों को अपनी अपनी जीत नज़र आ रही ।
इन तीनों के अपनी-अपनी जीत के दावों के बावजूद वेंकटेश्वरलु अपनी जीत को लेकर बिलकुल भी चिंतित नहीं दिख रहे हैं । संथानाकृष्णन के उम्मीदवारी से हटने के बाद वेंकटेश्वरलु को अपनी स्थति और भी सुरक्षित दिखने लगी है । वेंकटेश्वरलु की सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अच्छी स्वीकार्यता है और उनका नाम किसी झगड़े-झंझट में भी नहीं सुना गया है । चरनजोत सिंह नंदा, नवीन गुप्ता और अनुज गोयल सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अलग-अलग कारणों से बुरी तरह बदनाम होने के बावजूद नाउम्मीद नहीं हैं । उनकी तरफ से तर्क भी सुने जाते हैं कि बदनाम और घटिया आचरण रखने वाले वाले लोग क्या पहले (वाइस) प्रेसीडेंट नहीं बने हैं क्या ? नवीन गुप्ता के लिए तो बहुत ही कन्विंसिंग तर्क चर्चा में है - और वह यह कि उनके पिता एनडी गुप्ता तो बहुत ही बदनाम थे, लेकिन फिर भी वह (वाइस) प्रेसीडेंट बने ही थे न ? इस तरह के तर्कों और बदनामियों वाले सदस्यों के भी वाइस प्रेसीडेंट बनने की कोशिशों के चलते इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव का नजारा खासा दिलचस्प हो गया है ।
इस दिलचस्प नज़ारे में के रघु, संजय अग्रवाल और शिवाजी जावरे भी अपनी-अपनी उम्मीदवारी लेकर सक्रिय हैं । ये तीनों चूँकि अपने-अपने दम पर सक्रिय हैं इसलिए इनकी उम्मीदवारी का ज्यादा हल्ला नहीं है । संजय अग्रवाल और शिवाजी जावरे हमेशा ही अंडर ऐस्टीमेट किये जाने के शिकार बने हैं । नॉर्दर्न रीजन में संजय अग्रवाल और वेस्टर्न रीजन में शिवाजी जावरे को चुनाव में ही घेरने की चौतरफा कोशिश की गई थी और इनके चुनाव जीतने पर ही सवालिया निशान लगाये गए थे, लेकिन यह दोनों अपने अपने रीजन में अच्छे समर्थन के साथ चुनाव जीते । वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में भी - अभी तक लगभग वैसी ही कहानी दोहराई जाती दिख रही है; खिलाड़ी नेताओं का प्रचार इनके पक्ष में नहीं है लेकिन कई लोग हैं जो मान रहे हैं कि जैसा चमत्कार इन्होंने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में किया वैसा ही चमत्कार यह यहाँ भी कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा । जो लोग ऐसा मान रहे हैं उन्होंने ऐसा मानने का कारण यह बताया कि संजय अग्रवाल और शिवाजी जावरे बहुत ही साफ-सुथरे तरीके से अपना अभियान चला रहे हैं और सचमुच इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन के प्रति अपना कंसर्न दिखा/जाता रहे हैं । कई लोगों को लगता है कि इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव चुनावी पंडितों के लिए चौंकाने वाला हो सकता है ।

Monday, February 4, 2013

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद की राह में संजीव माहेश्वरी रूपी काँटे को मनोज फडनिस पहचान तो रहे हैं और 'इस' काँटे को निकालने की तरकीबें भी भिड़ा रहे हैं

नई दिल्ली । मनोज फडनिस को इस बार अपनी 'लॉटरी' लगने का पूरा भरोसा है । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के (वाइस) प्रेसीडेंट चुने जाने को मनोज फडनिस लॉटरी लगने जैसा ही मानते और बताते रहे हैं । हालाँकि इस बार वह पूरी तैयारी के साथ जुटे नज़र आ रहे हैं और 'लॉटरी' को अपने पक्ष में कर लेने का हर संभव उपाय आजमा रहे हैं । मनोज फडनिस कई वर्षों से सेंट्रल काउंसिल में हैं और इस नाते वाइस प्रेसीडेंट के कई चुनावों के बनते-बिगड़ते, बनते-बनते बिगड़ते और अचानक से बनते समीकरणों को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा/पहचाना है । वाइस प्रेसीडेंट चुनने वाले 'वोटर' किस किस तरह झांसा देते हैं - मनोज फडनिस इसे भी अच्छी तरह जानते/समझते हैं । देखी/पहचानी/जानी/समझी स्थितियों के बीच मनोज फडनिस ने इस बार मैदान मार लेने की लेकिन अच्छी तैयारी की है । सेंट्रल काउंसिल में उनके साथ रहे सदस्य बताते हैं कि यह 'तैयारी' वह पिछले तीन वर्षों से सुनियोजित तरीके से कर रहे हैं ।
मनोज फडनिस के साथ रहे दूसरे काउंसिल सदस्यों के अनुसार, पिछले वर्षों में मनोज फडनिस ने बिग फोर खेमे में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की है । इंस्टीट्यूट की विभिन्न कमेटियों के सदस्य-पदाधिकारियों के रूप में उन्होंने इस तरह की गतिविधियाँ संयोजित कीं जिससे कि बिग फोर खेमे में उन्हें स्वीकार्यता मिले । हालाँकि सेंट्रल काउंसिल में बिग फोर खेमे की नुमाइंदगी करने वाले अपने 'लोग' भी रहे हैं और उनमें से कुछ लगातार वाइस प्रेसीडेंट बनने की लाइन में भी लगे रहे हैं - जाहिर है कि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए मनोज फडनिस का उनसे सीधा मुकाबला रहा और रहेगा; लेकिन फिर भी मनोज फडनिस ने बिग फोर खेमे में अपनी स्वीकार्यता बनाने की कोशिश की तो इसका कारण उनका यह मानना रहा कि बिग फोर खेमे का समर्थन उन्हें यदि निचली प्राथमिकताओं पर भी मिला तो हो सकता है कि उनका काम बन जाये ।
मनोज फडनिस की इस रणनीति को हालाँकि इस बार के चुनावों ने तगड़ा झटका दिया है । इस बार के चुनावी नतीजों ने सेंट्रल काउंसिल में बिग फोर की आधिकारिक ताकत को घटा दिया है । इससे बिग फोर से मदद मिलने की मनोज फडनिस की उम्मीद की 'मात्रा' काफी घट गई है; लेकिन फिर भी मनोज फडनिस के लिए सौदा कोई बुरा नहीं हुआ है । उन्हें उम्मीद है कि बिग फोर खेमा यदि अपने आधिकारिक प्रतिनिधि को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने की स्थिति में नहीं होता है तो उसका समर्थन उन्हें मिल सकेगा । मनोज फडनिस को विश्वास है कि बिग फोर के बीच अपनी स्वीकार्यता को बनाने के उन्होंने जो प्रयास लगातार किये हैं, उसका सुफल उन्हें अवश्य ही मिलेगा ।
मनोज फडनिस को इंस्टीट्यूट के मौजूदा वाइस प्रेसीडेंट सुबोध कुमार अग्रवाल की मदद मिलने की भी उम्मीद है । मनोज फडनिस एकेडमीकली स्ट्रांग माने/समझे जाते हैं - जिसे सुबोध कुमार अग्रवाल की बड़ी कमजोरी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । सुबोध कुमार अग्रवाल राजनीतिक रूप से तो बहुत पहुँच वाले और तिकड़मी माने जाते हैं, लेकिन एकेडमीकली उनका हाथ जरा तंग माना/समझा जाता है । इसके चलते समझा जाता है कि प्रेसीडेंट के रूप में वह एक ऐसा वाइस प्रेसीडेंट चाहेंगे जो उनकी एकेडमिक कमजोरी को ढँक सके । मनोज फडनिस को लगता है कि यह 'काम' उनसे अच्छा कोई और नहीं कर सकेगा और इसी कारण से उन्हें उम्मीद है कि सुबोध कुमार अग्रवाल वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में उनकी मदद करेंगे ।
सुबोध कुमार अग्रवाल के भरोसे लेकिन वेस्टर्न रीजन के संजीव माहेश्वरी भी हैं । संजीव माहेश्वरी और सुबोध कुमार अग्रवाल के बीच पिछले वर्षों में काफी नजदीकी देखी गई है और दोनों के बीच कई मामलों में अच्छी ट्यूनिंग रही है । संजीव माहेश्वरी को वाइस प्रेसीडेंट पद के एक गंभीर उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, तो इसका एक बड़ा कारण सुबोध कुमार अग्रवाल के साथ उनकी नजदीकी भी है । संजीव माहेश्वरी रूपी काँटे को मनोज फडनिस पहचान भी रहे हैं और 'इस' काँटे को निकालने की तरकीबें भी भिड़ा रहे हैं - क्योंकि मनोज फडनिस इस बार के मौके को अपने लिए बहुत अनुकूल पा रहे हैं ।