Showing posts with label ANUJ GOYAL. Show all posts
Showing posts with label ANUJ GOYAL. Show all posts

Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।

Thursday, November 22, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में गाजियाबाद के एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता को राहत दिलवाने का भरोसा देकर अनुज गोयल ने अपना समर्थक बनाया, और मुकेश कुशवाह के लिए मुसीबत खड़ी की

गाजियाबाद । एक बैंक लोन डिफॉल्टर चार्टर्ड एकाउंटेंट संजय गुप्ता की चुनावी सक्रियता ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने की मुकेश कुशवाह व अनुज गोयल की कोशिशों ने चुनावी परिदृश्य को एक मजेदार रंग दे दिया है । संजय गुप्ता पहले मुकेश कुशवाह के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते थे; लेकिन स्टेट बैंक से लिए गए लोन्स को न चुकाने के मामले में वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट व स्टेट बैंक के डायरेक्टर गिरीश आहुजा की मदद दिलवा पाने में असफल रहने के कारण वह मुकेश कुशवाह के खिलाफ हो गए हैं, और उन्होंने अनुज गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । संजय गुप्ता इससे पहले इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में किसी न किसी के समर्थक तो रहे हैं, लेकिन ज्यादा सक्रिय नहीं रहे; किंतु इस बार वह अनुज गोयल की उम्मीदवारी के पक्ष में घर घर जा कर जमकर प्रचार कर रहे हैं । उनके प्रचार में ज्यादातर मुकेश कुशवाह के प्रति जहरभरी बातें उगलना होता है, इसलिए उनकी सक्रियता ने गाजियाबाद में जोरों की तथा सेंट्रल रीजन के दूसरे हिस्सों में फुसफुसाहटभरी गर्मी पैदा की हुई है । इस मामले में गिरीश आहुजा जैसी बड़ी शख्सियत का नाम शामिल होने से बात और गंभीर भी हो गई है । संजय गुप्ता का मुकेश कुशवाह पर तो सीधा सीधा आरोप है ही कि उनके मामले में मुकेश कुशवाह को चूँकि पैसे मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उनके मामले में दिलचस्पी नहीं ली; कहीं कहीं संजय गुप्ता ने इस आरोप के लपेटे में गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । 
उल्लेखनीय है कि संजय गुप्ता ने कई वर्ष पहले ज्वैलरी का बिजनेस किया था, जिसके लिए उन्होंने स्टेट बैंक से भारी लोन लिया था । स्टेट बैंक से ही उनके नाम एक हाऊसिंग लोन भी रहा । बिजनेस उनका चला नहीं, फलस्वरूप लोन वह चुका नहीं सके । समय से लोन चुकाने की कोशिश करने की बजाये संजय गुप्ता तरह तरह के आरोप लगाते हुए बैंक पदाधिकारियों से उलझते और रहे, जिसके कारण उनका मामला गंभीर होता गया । संजय गुप्ता ने बैंक पदाधिकारियों पर जो जो आरोप लगाये, उनमें झूठ/सच चाहें जो हो; मामले में बुनियादी बात लोन चुकाने की जो थी - उसे पूरा करने में संजय गुप्ता असफल ही रहे, जिस कारण उनकी गर्दन फँसती गई । पिछले दिनों बैंक की तरफ से संजय गुप्ता को ओटीएस (वन टाइम सेटलमेंट) का ऑफर मिला । इस ऑफर को निपटाने के बावजूद संजय गुप्ता को मुसीबत से छुटकारा लेकिन नहीं मिला । बैंक ने लोन बसूलने के लिए सख्ती दिखाई और उनकी संपत्ति को 'कब्जे' में ले लिया । इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने एक बड़ी सिफारिश खोजी, जो उन्हें स्टेट बैंक में डायरेक्टर गिरीश आहुजा के रूप में नजर आई । गिरीश आहुजा तक पहुँच बनाने में संजय गुप्ता ने मुकेश कुशवाह की मदद ली । गिरीश आहुजा ने लेकिन जब संजय गुप्ता के मामले को देखा/जाना और उसे बुरी तरह उलझा हुआ पाया तो उन्होंने कुछ करने से साफ इंकार कर दिया । चर्चा है कि गिरीश आहुजा ने संजय गुप्ता को इस बात के लिए लताड़ भी लगाई कि बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों से उलझने की बजाये उन्होंने यदि लोन चुकाने में दिलचस्पी ली होती, तो नौबत यहाँ तक न आती । गिरीश आहुजा की इस लताड़ को सुन तथा उनके रवैये को देख कर मुकेश कुशवाह ने संजय गुप्ता की मदद करने के मामले से हाथ खींच लिया । इससे संजय गुप्ता बुरी तरह भड़क गए ।
मुकेश कुशवाह के लिए कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि चुनावी राजनीति के नाजुक मौके पर अनुज गोयल ने संजय गुप्ता को 'पकड़' लिया और उन्हें आश्वस्त किया कि उनके झंझट से वह उन्हें राहत दिलवायेंगे । संजय गुप्ता को अभी तक कोई राहत नहीं मिली है - और जो लोग उनके मामले से परिचित हैं, उनका कहना है कि संजय गुप्ता को वैसी कोई राहत मिल भी नहीं पायेगी जैसी राहत वह चाहते हैं - लेकिन अनुज गोयल ने कुछेक प्रभावी लोगों से उनकी बात चूँकि करवा दी है या करवा देने का भरोसा दिया है, इसलिए संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के बड़े समर्थक बन गए हैं । वर्षों अनुज गोयल के घोर विरोधी रहे संजय गुप्ता फिलहाल अनुज गोयल के चुनाव प्रचार में जोरशोर से लगे हैं, और अपने लोन को चुकाने की चिंता करने की बजाये अनुज गोयल को वोट दिलवाने के अभियान में सक्रिय दिलचस्पी ले रहे हैं - जिसके तहत वह अनुज गोयल के साथ जा जा कर न सिर्फ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिल रहे हैं, बल्कि फोन से तथा वाट्स-ऐप में मुकेश कुशवाह के खिलाफ तरह तरह के आरोप लगाते हुए बातें बताने व पोस्ट्स लिखने का काम कर रहे हैं । संजय गुप्ता की तरफ से गंभीर आरोप यह सुना गया है कि मुकेश कुशवाह उनका काम करवाने के बदले में पैसे चाहते थे, और जब मुकेश कुशवाह को लगा कि उनसे उन्हें पैसे नहीं मिल पायेंगे, तो वह उनकी मदद करने से पीछे हट गए । इस तरह के आरोप के लपेटे में कहीं कहीं संजय गुप्ता ने गिरीश आहुजा को भी ले लिया है । संजय गुप्ता की इस तरह की बातें मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को कितना नुकसान और अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कितना फायदा पहुँचायेंगी, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनकी बातों ने खास तौर से गाजियाबाद में तथा आम तौर से सेंट्रल रीजन में चुनावी माहौल में गर्मी जरूर पैदा कर दी है । 

Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते समय जयपुर के चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखी जा रही रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी में आई ऊँची उछाल ने चुनावी मुकाबले को टक्कर का बनाया

जयपुर । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी ने जिस तेजी और अप्रत्याशित तरीके से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी पैठ बनाई है, उसके कारण जयपुर/राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल चुनाव का पूरा नजारा बदलता हुआ नजर आ रहा है और चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है । इस बदलते नजारे का ही परिणाम है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने आने पर जो लोग उनकी उम्मीदवारी को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, वही लोग अब रोहित अग्रवाल को न सिर्फ मुकाबले में देख रहे हैं - बल्कि कई कई मामलों में वह उन्हें जयपुर के बाकी तीनों उम्मीदवारों से बेहतर स्थिति में भी पा रहे हैं । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रोहित अग्रवाल को युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच तो अच्छा समर्थन मिल ही रहा है, वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखा रहे हैं और उनमें संभावनाएँ देख रहे हैं । सक्रियता के लिहाज से जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में चूँकि रोहित अग्रवाल का ही पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए भी उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच महत्त्वपूर्ण हो उठी है । जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों के लोगों का भी मानना और कहना है कि जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में एक अकेले रोहित अग्रवाल ही चुनाव को चुनाव की तरह गंभीरता से 'लड़ते' दिख रहे हैं; एक अकेले वही हैं जिनके पास ऐसे समर्थकों/शुभचिंतकों की टीम है जो वास्तव में चुनावी मैदान में सक्रिय है - और इसी का उन्हें फायदा मिलता दिख रहा है । चुनावी राजनीति की बारीकियों को समझने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ते दिख रहे उत्साह को वोट में बदलने की चुनौती रोहित अग्रवाल के सामने अभी बाकी है ।
जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में शामिल और सक्रिय रहे अनुभवी लोगों का मानना और बताना है कि ऑरा (आभामंडल) के लिहाज से रोहित अग्रवाल बाकी तीनों उम्मीदवारों से कमजोर पड़ते हैं; उनकी सबसे बड़ी समस्या उनका युवा होना है । युवा होने के कारण उनकी उम्मीदवारी को लोग आसानी से तवज्जो देते हुए नहीं दिखते हैं । रोहित अग्रवाल की यही कमजोरी लेकिन उनके लिए वरदान बनती नजर आ रही है । इसमें काफी योगदान हालाँकि परिस्थितियों का भी है । परिस्थितियों ने दो तरह से रोहित अग्रवाल की 'मदद' की है । राजस्थान विधानसभा चुनाव में तमाम वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद जिस तरह सचिन पायलट का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, उसके चलते चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी यह भावना जोर मार रही है कि एक युवा नेता को यदि प्रदेश की बागडोर सौंपी जा सकती है, तो इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की एक सीट क्यों नहीं दी जा सकती है ? इसके अलावा, सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले बाकी तीन उम्मीदवार 'बड़े' तो हैं, लेकिन वह उस कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसमें कहा गया है - 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खुजूर ...।इसका फायदा रोहित अग्रवाल को मिलता बताया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि बाकी तीन उम्मीदवारों में सतीश गुप्ता दो बार पहले सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं, और पिछली व तीसरी बार पीछे हट चुके हैं । उनके बड़े होने पर उनका यह 'रिकॉर्ड' भारी है और इस बार भी वह कोई चमत्कार करते हुए नहीं दिख रहे हैं । प्रमोद बूब पिछली बार उम्मीदवार के रूप में कोई सक्रियता दिखाये बिना सबसे ज्यादा वोटों से रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते थे; इस बार सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में भी वह उसी ढर्रे पर हैं - इस बीच लेकिन लोगों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वह बड़े तो हैं, लेकिन हैं 'पेड़ खुजूर' । रीजनल काउंसिल में उनकी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं दिखी; कुछेक मुद्दों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के साथ उनकी जो 'मुठभेड़े' हुईं भी, वह निजी लड़ाई/खुन्नस के रूप में ज्यादा नजर आईं - और व्यापक सरोकार से जुड़ती हुई नहीं दिखीं । उम्मीदवार के रूप में वह लोगों से जुड़ते हुए और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु लोगों तक अपनी पहुँच बनाते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर जयपुर में ही कोई खास उत्साह नहीं देखा/पहचाना जा रहा है ।  
प्रकाश शर्मा तक के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट को बचाना मुश्किल हो रहा है । आमतौर पर माना/समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य तो अपनी सीट आसानी से निकाल ही लेता है; लेकिन पिछली बार वेस्टर्न और ईस्टर्न रीजन में एक एक सेंट्रल काउंसिल सदस्य को अपनी अपनी सीट गँवानी पड़ी थी, और सेंट्रल रीजन में भी 'स्टार' उम्मीदवार समझे जाने वाले अनुज गोयल अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाने में असफल रहे थे । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि काउंसिल सदस्य होना चुनावी जीत की कोई गारंटी नहीं है । प्रकाश शर्मा तो पिछला चुनाव ही जैसे-तैसे मुश्किल से जीते थे । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में उन्होंने दिखाया/जताया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट वह भले ही 'बड़े' हैं, लेकिन सोच व व्यवहार के मामले में वह बहुत 'छोटे' हैं । अपने व्यवहार और रवैये से प्रकाश शर्मा ने जो नकारात्मक पहचान बनाई है, उसके कारण उनके नजदीकियों व समर्थकों को ही उनकी जीत को लेकर आशंका है । मजे की बात है कि जयपुर और राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के अच्छे अच्छे जानकर भी विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों के बारे में अनुमान लगा पाने में गच्चा खा रहे हैं । वह यह तो मान रहे हैं कि जयपुर/राजस्थान की जो वोटिंग 'ताकत' है, उसके चलते जयपुर के दो उम्मीदवार तो सेंट्रल काउंसिल में पहुँच ही जायेंगे - लेकिन वह दो उम्मीदवार कौन से होंगे, इस सवाल पर उनकी बोलती बंद हो जाती है । विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों को लेकर बनी इस असमंजसता के चलते भी रोहित अग्रवाल के लिए तेजी से मुकाबले में आना आसान हुआ है । नामांकन होने के समय उन्हें चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन परिस्थितिवश मिले अवसर को अपनी सक्रियता से इस्तेमाल करके रोहित अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को जो ऊँची उछाल दी है, उससे उनकी उम्मीदवारी टक्कर में आ गई है - और इस तथ्य ने बाकी तीनों उम्मीदवारों तथा उनके समर्थकों को मुसीबत में डाल दिया है ।

Tuesday, July 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में अनुज गोयल की वापसी की कोशिश सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह व मुकेश बंसल की बनती दिख रही जोड़ी के कारण मुसीबत में फँसती नजर आ रही है क्या ?

गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्यता जुगाड़ने में असफल रहने के बाद अनुज गोयल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में ही फिर से शरण लेने का जो फैसला किया है, उसने उनके समर्थकों को ही बुरी तरह बिदका दिया है और उनके कई समर्थक उनके खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं । अनुज गोयल को सबसे तगड़ा झटका गाजियाबाद में ही लगा है, जहाँ उनके घनघोर समर्थक रहे मुकेश बंसल ने ही बगावत का झंडा उठा लिया है । मुकेश बंसल के विरोध का अनुज गोयल को ऐसा झटका लगा है कि वह हर जगह मुकेश बंसल के रवैये का रोना रोते हैं और मुकेश बंसल पर धोखा देने का आरोप लगाते हैं । अनुज गोयल जगह जगह लोगों को बता रहे हैं कि मुकेश बंसल को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह लेकर आये हैं, लेकिन मुकेश बंसल ने अब मुकेश कुशवाह से तार जोड़ लिए हैं; उनका गंभीर आरोप यह है कि पिछले चुनाव में मुकेश बंसल ने उनके भाई जितेंद्र गोयल की बजाये मुकेश कुशवाह का साथ दिया था - और जितेंद्र गोयल की हार का एक प्रमुख कारण मुकेश बंसल से मिला यह धोखा भी था । अनुज गोयल और जितेंद्र गोयल इन दिनों जहाँ कहीं भी जिस किसी से भी बात कर रहे हैं, मुकेश बंसल के रवैये का रोना जरूर रो रहे हैं । उनके लगातार जारी 'विलाप' से ऐसा लग रहा है जैसे अनुज गोयल की उम्मीदवारी को सबसे बड़ा खतरा मुकेश बंसल से ही है । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल यह सुन/जान कर दरअसल डरे हुए हैं कि मुकेश बंसल ने कई जगह लोगों के बीच यह कहा हुआ है कि वह अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे । 
मुकेश बंसल दरअसल 2021 के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस वर्ष हो रहा चुनाव मुकेश कुशवाह के लिए तीसरा और आखिरी चुनाव है, मुकेश बंसल की 'तैयारी' है कि मुकेश कुशवाह द्वारा की जाने वाली खाली जगह को वह भरें; इसके लिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि अनुज गोयल चुनाव न जीत सकें । सेंट्रल रीजन में कई लोग अनुज गोयल को करिश्माई नेता मानते हैं, और दावा करते हैं कि वह तो चुनाव जीत ही जायेंगे - लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं होगा । दरअसल उनके करिश्मे की पोल तो पिछली बार खुल गई थी, जब वह अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव नहीं जितवा सके थे । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में जितेंद्र गोयल 22 उम्मीदवारों में 943 वोटों के साथ नवें नंबर पर रहे थे, और 1237 वोटों के साथ पाँचवें नंबर पर रहे मुकेश कुशवाह से 294 वोट पीछे थे । फाइनल गिनती तक पहुँचते पहुँचते जितेंद्र गोयल छठे नंबर तक तो पहुँच गए थे, लेकिन विजेता बनने से रह गए थे । जितेंद्र गोयल की यह हार उनके साथ-साथ वास्तव में अनुज गोयल की भी हार थी । उनसे पहले, नॉर्दर्न रीजन में एनडी गुप्ता ने अपने बेटे नवीन गुप्ता को तथा वेस्टर्न रीजन में कमलेश विकमसे ने अपने भाई नीलेश विकमसे को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाया है । उम्मीद की जा रही थी कि अनुज गोयल भी अपने भाई को चुनाव जितवा देंगे । नवीन गुप्ता अपने पिता तथा नीलेश विकमसे अपने भाई के चुनाव में कभी भी सक्रिय नहीं देखे गए थे;जबकि जितेंद्र गोयल तो हमेशा ही अनुज गोयल के 'स्टार प्रचारक' रहे हैं - इसलिए भी उम्मीद की गई थी कि जितेंद्र गोयल तो आसानी से चुनाव जीत जायेंगे । लेकिन वह चुनाव हार गए । जितेंद्र गोयल की हार ने अनुज गोयल के तथाकथित करिश्मे की ही पोल नहीं खोली, बल्कि यह भी दिखाया/बताया कि सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को अपनी ही जेब में रखने की अनुज गोयल की 'कोशिश' को लोगों ने अच्छा नहीं माना और जितेंद्र गोयल के समर्थन से हाथ खींच कर वास्तव में अनुज गोयल की सत्ता-लोभी सोच को सबक सिखाया ।
सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अनुज गोयल ने अपनी उसी सत्ता-लोभी सोच को एक बार फिर प्रदर्शित किया है, जिसके विरोध के कारण पिछली बार उनके भाई जितेंद्र गोयल को हार का सामना करना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि अनुज गोयल पिछले दिनों बाबा रामदेव के भरोसे उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य होने की जुगाड़ में थे, और इसलिए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के मैदान से मुँह मोड़े हुए थे । लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो वह फिर से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मुँह मारने आ गए हैं । मुकेश बंसल जैसे उनके नजदीकी रहे लोगों तक को उनका यह सत्ता-लोभी रवैया बुरा लगा है । उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों का ही कहना/पूछना है कि अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता अपने और अपने भाई के लिए ही क्यों चाहिए ? अनुज गोयल के इस सत्ता-लोभी रवैये के सवाल बन जाने के कारण ही अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ी चुनौती है । दरअसल सेंट्रल रीजन में एक सीट बढ़ जाने का फायदा जयपुर को मिलता दिख रहा है । जयपुर/राजस्थान में बढ़े वोटों के भरोसे माना जा रहा है कि जयपुर में इस बार तीन लोग सेंट्रल काउंसिल में आ जायेंगे । सेंट्रल रीजन में पिछली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले श्याम लाल अग्रवाल के इस बार चुनाव से दूर रहने की चर्चा है; चर्चा हालाँकि यह भी है कि उनके समर्थक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए राजी करने के वास्ते उन पर दबाव भी बना रहे हैं, और साथ ही उनके किसी विकल्प को लाने के लिए भी प्रयासरत हैं । जयपुर और या राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल के लिए तीन उम्मीदवार रहें या चार - उम्मीद की जा रही है कि जयपुर के तीन उम्मीदवार तो जीत ही जायेंगे । 
ऐसे में, अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए मनु अग्रवाल और मुकेश कुशवाह में से किसी एक की उम्मीदवारी की बलि लेनी होगी । इसके लिए उन्हें पहली वरीयता में इनमें से किसी एक से ज्यादा वोट पाने का प्रयास करना होगा । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल ने अभी मुकेश कुशवाह को निशाने पर लिया है । उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से चार उम्मीदवार होने के कारण जो समस्या उनके सामने है, वही समस्या मुकेश कुशवाह के सामने भी है और इसलिए वह कोशिश करें तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में मुकेश कुशवाह से आगे हो सकते हैं और सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर सकते हैं । इस कोशिश में अनुज गोयल को लेकिन मुकेश बंसल बाधा बनते हुए दिख रहे हैं । मुकेश बंसल पिछले चुनाव में 31 उम्मीदवारों में 968 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे । उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों में उनका नंबर पहला था । इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों पर उनका अच्छा प्रभाव है । इस प्रभाव के साथ मुकेश बंसल यदि अनुज गोयल को हरवाने की बात कहते/करते हैं, और मुकेश कुशवाह का साथ देते हैं - तो अनुज गोयल के लिए मामला मुश्किल तो बनता है । मुकेश बंसल पर दबाव बनाने के लिए अनुज गोयल गाजियाबाद में नितिन गुप्ता को समर्थन देने की बात करते सुने जा रहे हैं । नितिन गुप्ता पिछली बार भी उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 487 वोट के साथ 17 वे नंबर पर थे । इस रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है कि अनुज गोयल का समर्थन नितिन गुप्ता को कोई लाभ पहुँचा कर मुकेश बंसल का कुछ बिगाड़ सकेगा । क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन अनुज गोयल के खिलाफ कभी उनके ही नजदीकी रहे मुकेश बंसल के आक्रामक रवैये से सेंट्रल रीजन में चुनावी परिदृश्य दिलचस्प हो उठा है । 

Thursday, March 22, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की राजनीति को छोड़ अनुज गोयल का विधान परिषद का टिकट जुगाड़ने में लगने और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र के सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारी में जुटने की खबरों ने उत्तर प्रदेश में इंस्टीट्यूट की राजनीति के समीकरण बिगाड़े

गाजियाबाद । अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट की राजनीति में दिलचस्पी लेना छोड़ कर उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की सदस्यता जुगाड़ने में लग जाने से मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ आदि ने राहत की जो साँस लेना शुरू किया था, उसमें ज्ञान चंद्र मिश्र की सेंट्रल काउंसिल के लिए दिखाई गई दिलचस्पी ने फिर से मुसीबत खड़ी कर दी है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह और मनु अग्रवाल सेंट्रल रीजन से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में हैं, और इन्हें इस वर्ष दिसंबर में होने वाले चुनाव में पुनर्वापसी के लिए फिर से चुनाव का सामना करना है; जबकि विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश करने की कोशिश के तहत चुनाव में उतरने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं । विनय मित्तल पिछली बार चुनाव हार गए थे, और अमरेश वशिष्ठ पिछले तीन चुनावों से लगातार हारते आ रहे हैं । इन चारों को पिछले महीनों में यह देख कर खासा तगड़ा झटका लगा कि अनुज गोयल एक बार फिर से सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं, जिसके चलते वह ब्रांचेज के कार्यक्रमों में बाहर ही हाथ जोड़े खड़े मिल/दिख जा रहे हैं । लगातार तीन टर्म ही सेंट्रल काउंसिल में रहने के नियम के चलते अनुज गोयल को पिछली बार चुनाव से बाहर बैठना पड़ा था; हालाँकि बाहर बैठ कर भी उन्होंने अपने भाई जितेंद्र गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़वा दिया था - जितेंद्र गोयल लेकिन चुनाव हार गए थे, यद्यपि वोट उन्हें अच्छे मिल गए थे । जितेंद्र गोयल की हार से लोगों ने मान लिया था कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीती में अनुज गोयल के दिन पूरे हो गए हैं । अनुज गोयल लेकिन जब चुनाव की तैयारी करते नजर आए - तो मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल और अमरेश वशिष्ठ को डर हुआ कि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल की उम्मीदवारी उनमें से न जाने किसका खेल बिगाड़ दे ?
अनुज गोयल लेकिन चुनावी सीन से अचानक से गायब हो गए । अभी कुछ महीने पहले तक वह सेंट्रल रीजन की हर ब्रांच के हर प्रमुख कार्यक्रम में हाथ जोड़े बाहर ही खड़े मिलते/दिखते थे, किंतु काफी दिनों से रीजन के लोगों को वह न कहीं दिख रहे हैं और न उनके फोन और मैसेज लोगों को मिल रहे हैं । उनके शुभचिंतकों ने पता किया तो मालुम चला कि अनुज गोयल आजकल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य होने का जुगाड़ बैठाने में लगे हैं, और इसके लिए आजकल रामदेव की सेवा में हैं । उनके नजदीकियों का तो कहना/बताना है कि रामदेव की सिफारिश पर विधान परिषद की सदस्यता मिलने का अनुज गोयल को पूरा पूरा भरोसा है, इसलिए उन्होंने इंस्टीट्यूट की राजनीति से ध्यान हटा कर अपनी सक्रियता का केंद्र रामदेव तक सीमित किया हुआ है । उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2012 में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की ब्रांचेज के चेयरमेंस की हरिद्वार में मीटिंग हुई थी, जिसमें एक वक्ता के रूप में रामदेव को भी बुलाया गया था । अनुज गोयल ने तभी से रामदेव से पींगें बढ़ाना शुरू कर दिया था । अनुज गोयल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि रामदेव की सत्ताधारी नेताओं से नजदीकी का फायदा उठा कर अनुज गोयल ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद के टिकट के लिए चक्कर चलाया है; और चूँकि उत्तर प्रदेश में जल्दी ही विधान परिषद के चुनाव होने हैं - इसलिए अनुज गोयल ने अपना सारा ध्यान रामदेव पर और विधान परिषद के टिकट पर लगाना शुरू किया है, और इस कारण से इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य से वह गायब हैं ।
अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य से गायब होने पर मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, विनय मित्तल, अमरेश वशिष्ठ को एक बड़े दबाव से मुक्ति मिलने का अहसास हुआ और उन्होंने राहत की साँस ली थी । लेकिन यह बेचारे अभी राहत की साँस पूरी तरह ले भी नहीं पाए थे कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के नए बने चेयरमैन ज्ञान चंद्र मिश्र की तरफ से सेंट्रल काउंसिल का उम्मीदवार बनने की तैयारियाँ शुरू होने की खबरें मिलने लगीं । ज्ञान चंद्र मिश्र ने जिस तरह से पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव जीता था, और जिन हालात में वह चेयरमैन बने हैं - उससे लोगों के बीच यह संदेश तो है ही कि उनका नेटवर्क भी अच्छा है और उनकी किस्मत भी तेज है । पिछले चुनाव के दौरान वह जिस पारिवारिक मुसीबत में घिरे थे, उसके कारण उन्हें चुनावी दौड़ से बाहर ही मान लिया गया था - लेकिन वह न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि जीते भी तो इसे उनके प्रभावी नेटवर्क के सुबूत के तौर पर देखा गया । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में भी उनकी उम्मीदवारी के सामने ऐन मौके पर भारी मुसीबत खड़ी हो गयी थी, लेकिन फिर भी वह चेयरमैन बन गए - तो इसे उनकी तेज किस्मत के रूप में देखा/पहचाना गया है । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि ज्ञान चंद्र मिश्र ने यदि सचमुच सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिए तो उनका प्रभावी नेटवर्क और उनकी तेज किस्मत उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है । इस तरह उत्तर प्रदेश में सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवारों के लिए मामला 'आसमान से गिरे, खजूर पर अटके' की तर्ज पर 'अनुज गोयल से गिरे, ज्ञान चंद्र मिश्र पर अटके' जैसा हो गया है ।

Monday, October 26, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल रीजन में नितिन गुप्ता को अनुज गोयल की चालों में मदद करता देख विनय मित्तल ऐसा भड़के हैं कि अपना चुनाव छोड़ कर उन्होंने नितिन गुप्ता के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है

गाजियाबाद । नितिन गुप्ता के अनुज गोयल से हाथ मिला लेने की खबरें सुन कर विनय मित्तल इतने खफा हुए हैं कि वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की बात भूल कर रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत नितिन गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार करने में जुट गए हैं । इस 'जुटने' के तहत ही विनय मित्तल जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के लोगों को नितिन गुप्ता की धोखेबाजी का किस्सा बताने से नहीं चूकते हैं । किस्सा भी सिर्फ यह कि नितिन गुप्ता ने उनसे उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने का वायदा किया था, लेकिन फिर अचानक से पता नहीं क्या हुआ कि अपने वायदे को भूल कर नितिन गुप्ता खुद ही उम्मीदवार हो गए । विनय मित्तल को लगता है कि उनके चुनाव अभियान को नुकसान पहुँचाने के इरादे से अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता को उम्मीदवारी के लिए प्रेरित किया; और अनुज गोयल की बातों में आकर नितिन गुप्ता ने उनके साथ धोखा किया । विनय मित्तल लोगों को यह भी बताते हैं कि नितिन गुप्ता को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाने का लालच देकर अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता को पूरी तरह अपने वश में कर लिया है, तथा नितिन गुप्ता के जरिए उनके समर्थकों को बरगलाने व तोड़ने का काम करते हुए सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं । 
उल्लेखनीय है कि नितिन गुप्ता पिछले चुनाव में विनय मित्तल के साथ थे, और पिछली बार रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत विनय मित्तल की उम्मीदवारी के पक्ष में उन्होंने जम कर काम किया था । गाजियाबाद में ही नहीं, गाजियाबाद के आसपास की ब्रांचेज में भी लोगों का मानना और कहना रहा है कि पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में विनय मित्तल को जो जीत मिली थी - उसमें नितिन गुप्ता की महत्वपूर्ण भूमिका थी । पिछले चुनाव के दौरान लोगों को विनय मित्तल और नितिन गुप्ता के बीच जो केमिस्ट्री देखने को मिली थी, उसके आधार पर ही अनुमान लगाया जा रहा था कि अबकी बार सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत विनय मित्तल की उम्मीदवारी के अभियान की बागडोर नितिन गुप्ता के हाथ में ही होगी । खुद विनय मित्तल भी नितिन गुप्ता के सहयोग को लेकर आश्वस्त थे । किंतु नितिन गुप्ता ने सभी अनुमानों और आश्वस्तियों को गलत साबित करते हुए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी । नितिन गुप्ता की इस घोषणा से विनय मित्तल को तगड़ा वाला झटका तो लगा, तथा दूसरों को भी आश्चर्य तो हुआ - लेकिन यह मान लिया गया कि आखिर नितिन गुप्ता की भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ हैं और यदि वह उन्हें पूरा करना चाहते हैं, तो किसी को भी उन पर ऊँगली उठाने का हक नहीं है । विनय मित्तल ने भी इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया कि सेंट्रल काउंसिल का चुनाव उन्हें नितिन गुप्ता की मदद के बिना ही लड़ना होगा; तथा इस हकीकत के चलते पैदा हुई स्थितियों से निपटने लिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में तैयारी भी कर ली । 
विनय मित्तल लेकिन यह देख/जान कर भड़क गए हैं कि नितिन गुप्ता ने अनुज गोयल से नजदीकी बना ली है । रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में अनुज गोयल को पहले हालाँकि मुकेश बंसल के समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा था, और अनुज गोयल कुछेक जगह मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को समर्थन दिलाने के प्रयास करते देखे/सुने भी गए थे; किंतु अभी उन्हें नितिन गुप्ता के साथ देखा जाने लगा है । लोगों के बीच चर्चा है कि अनुज गोयल ने मुकेश बंसल का साथ छोड़ कर अब नितिन गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । यह तो कोई ऐसी बात नहीं है, जिस पर विनय मित्तल भड़कें - लेकिन उनके भड़कने का कारण अनुज गोयल का नितिन गुप्ता को उनके खिलाफ इस्तेमाल करना बना । नितिन गुप्ता का अनुज गोयल के हाथों इस्तेमाल होने के लिए तैयार जाने ने उनके 'भड़कने' को और ज्यादा भड़काने का काम किया । दरअसल देखा/पाया यह गया कि अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता की मदद से विनय मित्तल की जड़ें खोदने का काम शुरू किया है, और चुन चुन कर विनय मित्तल के समर्थकों व शुभचिंतकों को 'तोड़ने' व विनय मित्तल से दूर करने का प्रयास कर रहे हैं । नितिन गुप्ता चूँकि विनय मित्तल के समर्थकों व शुभचिंतकों को अच्छे से जानते/पहचानते हैं, इसलिए नितिन गुप्ता की मदद अनुज गोयल के खूब काम आ रही है । नितिन गुप्ता की मदद से अनुज गोयल सिर्फ विनय मित्तल के नजदीकियों को पहचानने का ही काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि नितिन गुप्ता की मदद से वह विनय मित्तल के खिलाफ नकारात्मक अभियान भी चला रहे हैं । अनुज गोयल जो कर रहे हैं, या करना चाहते हैं - वह तो अपनी जगह है ही; विनय मित्तल के लिए झटके की बात यह है कि नितिन गुप्ता इस काम में बढ़चढ़ कर अनुज गोयल की मदद कर रहे हैं । 
अनुज गोयल दरअसल नहीं चाहते हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उनके द्वारा खाली की गई सीट पर विनय मित्तल काबिज हों । इसके लिए उन्होंने अपने भाई जितेंद्र गोयल को भी बलि का बकरा बना दिया, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि जितेंद्र गोयल के जरिए वह विनय मित्तल को शायद न रोक सकें । जितेंद्र गोयल को समर्थन दिलाने की अनुज गोयल ने जितनी जो कोशिशें  की हैं, उनसे फायदा होना तो दूर की बात - रीजन में उनकी फजीहत और हुई है । लोग खुलेआम कहने भी लगे हैं कि चुनाव में जितेंद्र गोयल की हालत तो अमरेश वशिष्ट से भी बुरी होनी है । जितेंद्र गोयल के जरिए विनय मित्तल को 'रोकने' में असफलता मिलती देख कर ही अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता के मार्फत विनय मित्तल का शिकार करने की योजना बनाई । नितिन गुप्ता को अपनी तरफ मिलाना अनुज गोयल के लिए इसलिए भी आसान हुआ, क्योंकि खुद नितिन गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में विनय मित्तल के रवैये से आहत थे । असल में, नितिन गुप्ता को विश्वास था कि विनय मित्तल के साथ पीछे उनके जैसे सहयोगात्मक संबंध रहे हैं, उसके कारण विनय मित्तल उनकी मदद करेंगे । लेकिन मदद करना तो दूर की बात, विनय मित्तल ने उनकी उम्मीदवारी के प्रति दुश्मनी जैसा भाव रखा । इसीलिए अनुज गोयल ने जैसे ही उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया, तो उन्होंने हाथ पकड़ने में देर नहीं लगाई - और फिर वह विनय मित्तल को उखाड़ने के लिए चली जा रही अनुज गोयल की चालों में भी मदद करते हुए दिखने लगे । यह देख/जान कर विनय मित्तल ने नितिन गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । लोगों का कहना है कि विनय मित्तल सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की बजाए नितिन गुप्ता की रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी के खिलाफ काम करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं । 

Monday, September 28, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदवारी 'अपने ही घर' में मुसीबतों से घिरी

गाजियाबाद । अमरेश वशिष्ट, जितेंद्र गोयल व ध्रुव अग्रवाल जैसे नॉन सीरियस उम्मीदवारों ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की गाजियाबाद क्षेत्र की चुनावी राजनीति में ऐसा घपड़चौथ मचा दिया है कि मुकेश कुशवाह व विनय मित्तल जैसे सीरियस उम्मीदवारों के लिए अपनी अपनी सीरियसनेस बचाना/दिखाना मुश्किल हो गया है । इंस्टीट्यूट की मौजूदा 22वीं सेंट्रल काउंसिल में गाजियाबाद के दो सदस्य हैं, लेकिन 23वीं काउंसिल में एक भी सीट मिलने का संदेह बन गया है । बात सिर्फ उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की नहीं है, क्योंकि पिछली बार भी इस क्षेत्र में चार उम्मीदवार तो थे ही; इसलिए इस बार पाँच उम्मीदवार हो जाने से कोई खास फर्क पड़ना नहीं चाहिए था - किंतु इस बार के पाँच उम्मीदवारों ने चुनावी गणित कुछ ऐसा बनाया है कि किसी एक का जीतना भी मुश्किल लग रहा है ।
सबसे बड़ी मुश्किल मुकेश कुशवाह के सामने हैं - उन्हें काउंसिल में अपनी सीट बचाने के लिए कठिन जद्दोजहद करना पड़ रही है । पिछली बार मुकेश कुशवाह बहुत मामूली अंतर से जीते थे । इस जीत में उन्हें मनु अग्रवाल की चुनावी नादानियों से बड़ा फायदा मिला था । मनु अग्रवाल लेकिन इस बार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं । मनु अग्रवाल ने पिछली बार जो चुनावी मूर्खताएँ की थीं, इस बार वह उन्हें दोहराने से बचने की कोशिश करते हुए नजर आ रहे हैं; लगता है कि उन्होंने समझ लिया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सॉफ्टवेयर बेचना जितना मुश्किल काम है, चार्टर एकाउंटेंट्स के वोट पाना उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है । मनु अग्रवाल के लिए मुश्किलें हालाँकि कम नहीं हैं, किंतु इस बार चूँकि वह मुश्किलों को पहचानने/समझने तथा उन्हें दूर करने को लेकर तत्पर दिख रहे हैं - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार उनकी नाव पार लग जानी चाहिए । मनु अग्रवाल की नाव के पार लगने की स्थिति में मुकेश कुशवाह की नाव के डूबने का खतरा देखा जा रहा है ।
मुकेश कुशवाह को खतरा मनु अग्रवाल से नहीं है; खतरा तो उन्हें गाजियाबाद क्षेत्र में है । मुकेश कुशवाह के लिए समस्या की बात यह है कि 'अपने घर में' उनके सामने जो खतरा पैदा हो गया है, उससे उनकी स्थिति बिगड़ी - और कानपुर में मनु अग्रवाल की स्थिति सुधरी तो फिर उनके लिए अपनी सीट बचाना मुश्किल हो जायेगा । इसीलिए मुकेश कुशवाह के लिए सेंट्रल काउंसिल के लिए राह आसान नहीं दिख रही है । मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को इस बार सबसे बड़ी 'मार' यह पड़ेगी कि पिछली बार गाजियाबाद क्षेत्र में उन्हें अनुज गोयल विरोधी जो वोट मिले थे, उन वोटों को इस बार उन्हें विनय मित्तल के साथ बाँटना पड़ेगा । अनुज गोयल ने अपने भाई जितेंद्र गोयल को उम्मीदवार बना कर अपने वोटों को बँटने से रोकने की जो व्यवस्था की है, दरअसल उसके कारण मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल का मामला फँस गया है । यूँ तो हर कोई यह मान रहा है कि जितेंद्र गोयल एक कठपुतली उम्मीदवार हैं, और अनुज गोयल 'भाई साहब का ख्याल रखना' कहते हुए लोगों के चाहें जितना हाथ जोड़ लें, वह 'भाई साहब' को चुनाव जितवा तो नहीं पायेंगे; लेकिन 'भाई साहब' की उम्मीदवारी अनुज गोयल के पक्के वाले वोटों को अपने पास/साथ बाँधे रखने में कामयाब हो सकती है । इससे जो हालात बने हैं, उसमें मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदें ध्वस्त होती नजर आ रही हैं । अनुज गोयल के उम्मीदवार न होने में विनय मित्तल ने फायदा उठाने की जो योजना बनाई थी, वह योजना तो फेल हुई ही; उनकी योजना के चक्कर में मुकेश कुशवाह को बैठे-बिठाए मुसीबत और मिल गई । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी से मुकेश कुशवाह को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के साथ साथ लेकिन विनय मित्तल की उम्मीदवारी आने से अनुज गोयल विरोधी वोटों का बँटवारा होने की जो स्थिति बनी है, उसमें मुकेश कुशवाह घिरते हुए नजर आ रहे हैं ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिए अनुज गोयल ने जो चाल चली है, उससे विनय मित्तल को खासा धोखा मिला है । विनय मित्तल ने अनुज गोयल की खाली होने वाली सीट पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से बहुत पहले से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी थी । उनके समर्थकों में से ही कईयों का मानना और कहना हालाँकि यह था कि उन्हें अभी एक टर्म और रीजनल काउंसिल में रहना चाहिए और यहाँ चेयरमैन बनना चाहिए तथा अपने अनुभव व अपने समर्थन-आधार में इजाफा करना चाहिए - फिर उसके बाद उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए आना चाहिए । विनय मित्तल को किंतु लगा कि अनुज गोयल की खाली हो रही सीट के कारण जो मौका बन रहा है, उससे अच्छा मौका उन्हें फिर नहीं मिलेगा; लिहाजा उन्होंने अपने ही समर्थकों की एक न सुनी और सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बन गए । विनय मित्तल ने जो सोचा, वह गलत नहीं था - उनकी जगह कोई भी होता, संभवतः ऐसा ही सोचता और करता । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी न होती, तो मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए इंस्टीट्यूट की 23वीं काउंसिल में अपनी अपनी जगह बनाना कोई मुश्किल भी नहीं होता । विनय मित्तल के नजदीकियों के अनुसार, विनय मित्तल लेकिन अब पछता रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि वह न तो इधर के रहे, और न उधर के रहे । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते विनय मित्तल की योजना तो पिटी ही, विनय मित्तल की उम्मीदवारी ने मुकेश कुशवाह के लिए भी आफत खड़ी कर दी है । 
मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल जैसे-तैसे करके जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के कारण पैदा हुई समस्या से निपट भी लेते; लेकिन अमरेश वशिष्ट व ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने उनके लिए वह रास्ता भी बंद कर दिया लगता है । अमरेश वशिष्ट का मामला तो खासा दिलचस्प है - पिछले दोनों चुनावों में वह अंगद के पाँव की तरह दसवें नंबर पर ही पैर जमाए मिले थे । अमरेश वशिष्ट पिछली बार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खासे गंभीर थे, किंतु वोटर उनकी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नहीं हो सके । वोटरों की इस बेवफाई से अमरेश वशिष्ट इतने निराश और नाराज हुए कि उन्होंने चुनावी नतीजा आते ही सार्वजनिक रूप से आगे कभी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया । लेकिन जैसे ही इस बार के चुनाव नजदीक आए, उनके चुनावी कीड़े कुलबुलाये और वह तीसरी बार फिर उम्मीदवार हो गए । लोगों का कहना है कि जो व्यक्ति अपनी ही घोषणा पर न टिका रह पाता हो, उसकी उम्मीदवारी के साथ भला कौन टिकना चाहेगा ? जाहिर है कि अमरेश वशिष्ट के लिए दिल्ली बहुत बहुत दूर है; उनकी उम्मीदवारी को लेकिन जो वोट मिलेंगे, वह मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए दिल्ली को दूर करने का काम तो करेंगे ही । ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने कभी उनके नजदीकी रहे लोगों को ही हैरान किया है । वर्ष 2009 के चुनाव में वह जिस बुरी तरह से हारे थे, उसके कारण वह वर्ष 2012 में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की हिम्मत तक नहीं कर पाए थे । इस बार उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई आहट या अफवाह तक नहीं थी । पर अब जब उनकी उम्मीदवारी एक सच है, तो माना/समझा यही जा रहा है कि उनकी उम्मीदवारी का तो कुछ नहीं होना है, वह लेकिन मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की संभावनाओं को अवश्य ही नुकसान पहुँचायेंगे । 
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के संदर्भ में गाजियाबाद क्षेत्र में जितेंद्र गोयल, अमरेश वशिष्ट और ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन इनकी उम्मीदवारी ने अपनी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेने वाले मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के सामने खासा गंभीर संकट जरूर खड़ा कर दिया है । 

Friday, March 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन में जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने तथा विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोकने की व्यवस्था की है क्या ?

गाजियाबाद । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे विनय मित्तल के लिए कड़ी चुनौती पैदा कर दी है । विनय मित्तल फिलहाल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, जहाँ उनका इस वर्ष पहला टर्म पूरा हो रहा है । अगले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की चर्चा तो लगातार थी, लेकिन पिछले दिनों इस चर्चा पर कुछ समय के लिए ब्रेक तब लगा जब सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए लगातार तीन की बजाये चार टर्म तक सदस्य बने रहने का कानून बनने/बनाने की कोशिशों की बात पता चली । उक्त कोशिशें यदि सफल होतीं, तो अनुज गोयल एक बार फिर सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनते - और इसी आशंका में विनय मित्तल ने कहना/बताना शुरू कर दिया था कि तब वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । अभी हाल तक विनय मित्तल लोगों से यही कहते रहे थे कि यदि अनुज गोयल के लिए उम्मीदवार बनने की स्थितियाँ बनीं, तो फिर वह सेंट्रल काउंसिल की बजाये रीजनल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । किंतु जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि लगातार तीन टर्म वाले कानून में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, और वर्ष 2015 के चुनाव में अनुज गोयल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे; वैसे ही विनय मित्तल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करना पुनः शुरू कर दिया ।
सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के संदर्भ में विनय मित्तल की समझ यही रही कि उनके लिए कोई भी मौका अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही बन सकता है । अगले चुनाव में अनुज गोयल के उम्मीदवार न बन सकने की बात चूँकि पहले से ही लगभग स्पष्ट थी, इसलिए विनय मित्तल लगातार अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । इस बात में पिछले दिनों हालाँकि छोटा-सा ब्रेक आया, लेकिन फिर जल्दी ही सेंट्रल काउंसिल के लिए विनय मित्तल की उम्मीदवारी की बात दोबारा से पटरी पर आ गई । किंतु जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने विनय मित्तल के लिए समस्या खड़ी कर दी है । जितेंद्र गोयल, अनुज गोयल के भाई हैं और जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी को अनुज गोयल द्धारा अपनी सीट को बचाये/बनाये रखने की एक कसरत के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल दरअसल विनय मित्तल की जीत  की संभावना को रोकना चाहते हैं । अनुज गोयल को डर यह है कि उनकी खाली हुई सीट पर यदि विनय मित्तल काबिज हो गए तो फिर इंस्टीट्यूट की उनकी राजनीति तो पूरी तरह चौपट ही हो जाएगी । अनुज गोयल को विश्वास है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये वह विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोक लेंगे; और इस तरह से अगली से अगली बार - यानि वर्ष 2018 के लिए अपने लिए मौका बनाये रख सकेंगे ।
विनय मित्तल के शुभचिंतक तथा दूसरे लोग भी यह दावा तो कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल के लिए संभव नहीं होगा; लेकिन वह अनुज गोयल के नजदीकियों की इस बात पर गौर नहीं कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल का उद्देश्य है भी नहीं । चुनावी राजनीति के लिए जिस तरह के लटकों-झटकों की जरूरत होती है, उसमें जितेंद्र गोयल का हाथ खासा तंग रहता है और इसीलिए वह चुनावी राजनीति से हमेशा दूर ही रहे हैं । नजदीकियों के अनुसार, जितेंद्र गोयल भी जानते हैं और अनुज गोयल भी समझते हैं कि जितेंद्र गोयल के बस की चुनाव जीतना नहीं है; जितेंद्र गोयल जीतने के लिए उम्मीदवार बने भी नहीं है - वह तो बस अनुज गोयल के वोटों की चौकीदारी करने के लिए उम्मीदवार बने हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की है, ताकि विनय मित्तल उन्हें न ले लें । अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी लाने के बारे में सोचा था, तो इसके पीछे भी यही कारण था कि खुद विनय मित्तल को भी लगता है कि वह अनुज गोयल के वोटों के सहारे ही सेंट्रल काउंसिल में पहुँच सकते हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने विनय मित्तल के इसी सहारे को छीनने का जुगाड़ बैठाया है ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने मुकेश कुशवाह को भी लपेटे में लेने का दाँव चला है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह पिछली बार बहुत ही मामूली अंतर से जीते थे । मामूली अंतर से मिली जीत में भी गाजियाबाद तथा आसपास के क्षेत्रों में अनुज विरोधी वोटों का बड़ा सहयोग था । पिछली बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह को मिले थे; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते अबकी बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के बीच बंटेंगे तो नुकसान मुकेश कुशवाह को ही होगा । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में मुकेश कुशवाह ने ऐसा कुछ किया भी नहीं है, जिससे उनके समर्थन-आधार को बढ़ा हुआ माना/देखा जाये । मुकेश कुशवाह को रवींद्र होलानी के रूप में देखा जा रहा है, जिनकी उम्मीदवारी सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के बावजूद पिछली बार वीरगति को प्राप्त हुई थी । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने जो जाल बिछाया है, उसमें हो सकता है कि गाजियाबाद के तीनों ही उम्मीदवार ढेर हो जाएँ - जैसा कि पिछली बार कानपुर में हुआ था; तो यह स्थिति अनुज गोयल को सूट करती है । वर्ष 2018 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए अनुज गोयल ने 2015 के चुनाव की जो फील्डिंग सजाई है, उसने विनय मित्तल के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती खड़ी की है क्योंकि विनय मित्तल इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को मुकेश कुशवाह के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से लेते दिखे हैं और लंबी पारी खेलने की तैयारी किये बैठे हैं ।

Saturday, February 8, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनाव जीतने का दावा करके विजय गुप्ता और अनुज गोयल ने चुनावी माहौल को खासा दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली । विजय गुप्ता और अनुज गोयल के नजदीकियों का दावा है कि इस बार तो वह निश्चित ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट बन जायेंगे । दोनों के नजदीकियों के इस दावे में समस्या लेकिन यही है कि इंस्टीट्यूट का वाइस प्रेसीडेंट तो एक ही बनेगा - ऐसे में दोनों के दावों में किसी एक का दावा तो कोरा दावा ही रह जाना है । दोनों में से लेकिन कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि उसका दावा ख़ारिज हो सकता है ।
विजय गुप्ता इस बार वाइस प्रेसीडेंट चुने जाने के लिए इस कारण से आश्वस्त हैं, क्योंकि उन्हें इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट सुबोध अग्रवाल और वाइस प्रेसीडेंट के रघु के सहयोग/समर्थन का भरोसा है । विजय गुप्ता का कहना है कि सुबोध अग्रवाल के प्रेसीडेंट-काल में उन्होंने जिस तरह से सुबोध अग्रवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है, उसके चलते सुबोध अग्रवाल उनसे बहुत ही खुश हैं और खुश होने के कारण सुबोध अग्रवाल निश्चित ही उन्हें वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में मदद करेंगे । के रघु को लेकर विजय गुप्ता का दावा है कि पिछली बार के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवाने में चूँकि उन्होंने बहुत मेहनत और तिकड़म की थी तथा कई लोगों का समर्थन के रघु को दिलवाया था इसलिए इस बार 'अपने' लोगों का समर्थन के रघु उन्हें दिलवायेंगे । विजय गुप्ता का एक जोरदार तर्क यह भी है कि वह जब के रघु को वाइस प्रेसीडेंट चुनवा सकते हैं, तो अपने आप को क्यों नहीं चुनवा सकते हैं ? विजय गुप्ता ने दावा किया है कि पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की मदद भी उन्हें मिल रही है । विजय गुप्ता ने अपने नजदीकियों को बताया/जताया है कि जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट के साथ-साथ एक पूर्व प्रेसीडेंट का सहयोग/समर्थन उनके साथ है तो फिर भला वह क्यों नहीं चुने जायेंगे ?
अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम कुमार अग्रवाल का भरोसा है । उत्तम कुमार अग्रवाल हालाँकि इंस्टीट्यूट की काउंसिल में नहीं हैं, लेकिन फिर भी काउंसिल के कई सदस्यों पर उनका असर/प्रभाव माना/बताया जाता है । अनुज गोयल के साथ उत्तम कुमार अग्रवाल की अच्छी दोस्ती रही है - उस दोस्ती के चलते अनुज गोयल को यद्यपि काफी बदनामी भी उठानी पड़ी है, लेकिन उन दोनों की दोस्ती पर उससे कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा । उत्तम कुमार अग्रवाल का इंस्टीट्यूट की मौजूदा काउंसिल के कुछेक सदस्यों के साथ तो अच्छे संबंध हैं ही, साथ ही समर्थन जुटाने का हुनर भी उन्हें खूब आता है । इसी हुनर के चलते वह ऐसी स्थिति में (वाइस) प्रेसीडेंट चुने गए थे, जबकि किसी को उनके चुनने/बनने की कतई उम्मीद नहीं थी । प्रेसीडेंट के रूप में उत्तम कुमार अग्रवाल के साथ अनुज गोयल का 'जिस तरह' का एसोसिएशन  रहा था, उसके चलते उत्तम कुमार अग्रवाल का एक एजेंडा/लक्ष्य अनुज गोयल को इंस्टीट्यूट का (वाइस) प्रेसीडेंट बनवाना/चुनवाना भी है । पिछले वर्षों में उत्तम कुमार अग्रवाल ने हालाँकि अनुज गोयल को चुनवाने का प्रयास किया था, लेकिन तब उनकी दाल नहीं गाल सकी । अनुज गोयल काउंसिल सदस्यों के बीच दरअसल इतनी बुरी तरह से बदनाम हैं, कि हर कोई यही मानता है कि अनुज गोयल यदि इंस्टीट्यूट के (वाइस) प्रेसीडेंट बनते हैं तो यह इंस्टीट्यूट के लिए और प्रोफेशन के लिए बहुत ही बदकिस्मती की बात होगी । असल में, बदनामी के कारण ही अनुज गोयल की उम्मीदवारी को कोई गंभीरता से नहीं लेता है । अनुज गोयल लेकिन इस बार बहुत उम्मीद में हैं । बदनामी वाले पक्ष से वह इसलिए चिंतित नहीं हैं क्योंकि बदनामी के बाद भी उत्तम कुमार अग्रवाल और सुबोध अग्रवाल भी (वाइस) प्रेसीडेंट बने ही न ! अनुज गोयल आश्वस्त हैं क्योंकि वह जानते हैं कि फूलन देवी भी संसद का चुनाव जीती ही थी । इसी विश्वास के भरोसे अनुज गोयल ने इस बार काफी मेहनत की है और काउंसिल के सदस्यों के वोट जुटाने के लिए उन्हें हर तरह से घेरने का काम किया है ।
विजय गुप्ता और अनुज गोयल की तैयारी ने लेकिन चरनजोत सिंह नंदा के गेम प्लान को गड़बड़ कर दिया है । चरनजोत सिंह नंदा ने भी वाइस प्रेसीडेंट बनने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी हुई है । मजे की बात लेकिन यह है कि अपनी निरंतर तैयारी के बाद भी चरनजोत सिंह नंदा अपने चुने जाने को लेकर खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं - जैसे कि विजय गुप्ता और अनुज गोयल हैं । चरनजोत सिंह नंदा दरअसल अपना अभियान खुद ही चला रहे हैं, उन्हें किसी 'नामी' व्यक्ति का समर्थन घोषित रूप से नहीं सुना जा रहा है - इसलिए उनकी उम्मीदवारी में 'वजन' ज्यादा नहीं बन पा रहा है । नीलेश विकमसे, संजीव माहेश्वरी, मनोज फडनिस, संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को भी किसी बड़े नेता का समर्थन हालाँकि प्राप्त नहीं है - लेकिन फिर भी उनकी उम्मीदवारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है तो इसका कारण इनके अपने अपने व्यक्तित्व में हैं । इन्होँने अपने कामकाज, अपने व्यवहार, अपनी सक्रियता और अपनी सामर्थ्य से अपनी पहचान बनाई है और अब उसी पहचान के भरोसे वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उम्मीदवार बने हैं ।
वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी प्रक्रिया से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव एक घोर अनिश्चितता भरा चुनाव है और किसी के लिए भी यह समझना/पहचानना सिर्फ मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव भी है कि वाइस प्रेसीडेंट पद की कुर्सी पर कौन बैठेगा । अक्सर ही, जीतने/बनने वाले को भी यह भरोसा नहीं होता है कि वह जीत/बन ही जायेगा । यह एक ऐसा चुनाव है जहाँ हर पल नए समीकरण बनते और बिगड़ते हैं, इसलिए किसी नए बने समीकरण के हवाले से अनुमान लगाना धोखापूर्ण हो जाता है । इसके बावजूद उम्मीदवारों को अनुमानों के आधार पर और उनके भरोसे ही काम करना पड़ता है । इस बार भी वाइस प्रेसीडेंट पद के सभी उम्मीदवार अपने अपने अनुमानों के आधार पर ही बनाई गईं अपनी अपनी रणनीतियों के आधार पर ही अपने लिए मौका बनाने का प्रयास कर रहे हैं । दूसरे उम्मीदवार जहाँ अपने अपने तरीके से सिर्फ प्रयास कर रहे हैं, वहाँ विजय गुप्ता और अनुज गोयल प्रयासों के साथ-साथ जीत का दावा भी कर रहे हैं । उनका दावा सच होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा, अभी लेकिन उनके दावों ने इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव को खासा दिलचस्प बना तो दिया है ।

Wednesday, January 23, 2013

अनुज गोयल को लगता है कि लोग उनकी करतूतों को भूल गए होंगे और तीन-तिकड़मों के भरोसे वह इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का वाइस प्रेसीडेंट पद पा लेंगे

नई दिल्ली/गाजियाबाद । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के वाइस प्रेसीडेंट पद की दौड़ में अनुज गोयल के शामिल हो जाने से उन लोगों को तगड़ा झटका लगा है जो इंस्टीट्यूट को और प्रोफेशन को बहुत ही आदर्श और पवित्र निगाह से देखते हैं । ऐसे लोगों के बीच डर यह पैदा हुआ है कि अनुज गोयल यदि वाइस प्रेसीडेंट बन गए तो इंस्टीट्यूट की साख और प्रतिष्ठा का क्या होगा ? लोग करीब तीन वर्ष पहले की उस घटना को अभी भूले नहीं हैं, जब इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में एक लड़की को लेकर मारपिटाई और तमाम हंगामा हो गया था तथा मुख्यालय में पुलिस बुलानी पड़ गई थी । उत्तम अग्रवाल के अध्यक्ष-काल में घटी इस घटना के प्रमुख सूत्रधार अनुज गोयल ही थे । अनुज गोयल चूँकि उत्तम के बहुत ही खास थे, इसलिए अनुज गोयल ने यह एक ऐसा कांड रचा कि इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की साख और प्रतिष्ठा के धूल में मिलने का खतरा पैदा हो गया था । लीपा-पोती करके किसी तरफ मामले को रफा-दफा किया गया ।
अनुज गोयल ने लेकिन उसके बाद इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को तब सुर्ख़ियों में ला दिया जब इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के इतिहास में पहली बार बूथ कैप्चरिंग जैसी घटना हुई । गाजियाबाद के एक पोलिंग बूथ पर हुई बूथ कैप्चरिंग की घटना के पीछे अनुज गोयल को पहचाना गया और इसे लेकर इंस्टीट्यूट में जाँच आदि का नाटक भी रचा गया - पर किसी को उम्मीद नहीं थी कि उस जाँच का कोई नतीजा निकलेगा, सो बात आई-गई हो गई । इन घटनाओं से लेकिन अनुज गोयल सेंट्रल काउंसिल के दूसरे सदस्यों के बीच अलग-थलग जरूर पड़ गए । सेंट्रल काउंसिल में अपने दूसरे टर्म के तीन वर्ष अनुज गोयल ने कतई अकेलेपन और बेगानेपन में काटे । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अपने पहले ही टर्म में प्रयास करने वाले अनुज गोयल ने दूसरे टर्म में - इसी कारण से कोई प्रयास नहीं किया । तीसरे टर्म में अनुज गोयल ने लेकिन फिर अपने आप को सक्रिय किया है और वाइस प्रेसीडेंट पद की दौड़ में शामिल हो गए हैं । अनुज गोयल को लगता है कि लोग उनकी करतूतों को भूल गए होंगे और तीन-तिकड़मों के भरोसे वह वाइस प्रेसीडेंट पद पा लेंगे ।
अनुज गोयल की बदकिस्मती लेकिन यह है कि लोग उनकी करतूतों को भूले नहीं हैं और मानते हैं कि उनके जैसा व्यक्ति यदि वाइस प्रेसीडेंट बन गया तो यह इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा । अनुज गोयल के इंस्टीट्यूट - रिलाइबल इंस्टीट्यूट में हाल ही में घटी एक घटना ने अनुज गोयल की करतूतों की याद को और ताज़ा बना दिया है । रिलाइबल इंस्टीट्यूट अनुज गोयल का अपना निजी पारिवारिक किस्म का इंस्टीट्यूट है जिसमें वह प्रेसीडेंट हैं । अनुज गोयल का यह इंस्टीट्यूट एकेडमिक क्षेत्र में तो अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया है, लेकिन पिछले दिनों इसने अश्लील मैसेज को लेकर अख़बारों की सुर्खियाँ जरूर बटोरी । अखबारी ख़बरों के अनुसार, यहाँ भी अनुज गोयल के नेतृत्व वाले प्रबंधन ने मामले को दबाने और रफा-दफा करवाने में दिलचस्पी ली । रिलाइबल इंस्टीट्यूट में घटी घटना और अनुज गोयल के नेतृत्व वाले प्रबंधन के रवैये ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में की गई अनुज गोयल की कारस्तानियों को लोगों के ध्यान में ला दिया है और इसके चलते अनुज गोयल की अध्यक्ष पद की चुनावी दौड़ पर प्रतिकूल असर पड़ा है ।


Friday, November 30, 2012

जीसी मिश्र के साथ की गई अनुज गोयल की चालबाजी ने रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बना दिया है

गाजियाबाद । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट को 'दिखा' 'दिखा' कर सहानुभूति जुटाने में इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्राँच के प्रमुख पदाधिकारी जीसी मिश्र का जैसा जो इस्तेमाल करने की कोशिश की, उसके कारण सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को खासी धमक मिली है । उल्लेखनीय है कि जीसी मिश्र सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थकों में हैं और चुनावी राजनीति की खेमेबाजी में अनुज गोयल के धुर विरोधी हैं । अभी पिछले दिनों ही गाजियाबाद ब्राँच में अनुज गोयल ने जब फर्जी तिकड़मों से अपने भाई जितेंद्र गोयल को को-ऑप्ट करवाया था तो ब्राँच में एक अकेले जीसी मिश्र ने ही उनकी इस भाई-भतीजा वाली कार्यवाई का विरोध किया था । रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल ने मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाया है । लेकिन उम्मीदवार के रूप में मुकेश बंसल की पतली हालत को देखते हुए अनुज गोयल ने उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं और जीसी मिश्र/राघवेन्द्र के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं ।
अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी सामान्य सी चोट पर खुद रो-रो कर और अपनी पत्नी को दूसरों के सामने रुला-रुला कर सहानुभूति जुटाने का जो ड्रामा रचा, उसमें जीसी मिश्र को शामिल करने के पीछे अनुज गोयल की यही समझ काम कर रही थी कि मुकेश बंसल उनके किसी काम नहीं आयेंगे, और उन्हें जीसी मिश्र/राघवेन्द्र की मदद ही लेनी पड़ेगी । अनुज गोयल को सिर्फ सहानुभूति ही जुटानी होती तो उन्हें जीसी मिश्र के नाम का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती । अनुज गोयल किंतु अपनी चोट का दो तरह से फायदा उठाना चाहते थे । एक तरफ तो उन्होंने लोगों के बीच सहानुभूति जुटाने की कोशिश की; और दूसरी तरफ उन्होंने जीसी मिश्र/राघवेन्द्र को अपने साथ दिखाने की चाल चली । अपनी इस चाल के लिए अनुज गोयल ने अपनी पत्नी का इस्तेमाल किया । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट का उपचार हो जाने के कई घंटे बाद अपनी पत्नी से जीसी मिश्र को फोन करवाया । अनुज गोयल की पत्नी ने रोते-रोते जीसी मिश्र को अनुज गोयल के अस्पताल में होने की बात बताई । अनुज गोयल की पत्नी ने जैसा जो बताया उससे ऐसा लगा जैसे अनुज गोयल का कोई भारी एक्सीडेंट हुआ है और वह बड़ी क्रिटिकल स्थिति में हैं । अनुज गोयल की पत्नी का रोना-धोना सुन कर जीसी मिश्र ने राघवेन्द्र को खबर की और दोनों ने ही तय किया कि उनके अनुज गोयल के साथ राजनीतिक रिश्ते भले ही जो भी हों, किंतु इस मुश्किल घड़ी में उन्हें अनुज गोयल की मदद में खड़े होना चाहिए । जीसी मिश्र और राघवेन्द्र तुरंत अस्पताल दौड़े । जीसी मिश्र अपनी पत्नी को भी अपने साथ लाये ।
अस्पताल पहुँच कर जो नजारा इन्होंने वहाँ देखा, तो यह हक्के-बक्के रह गए । चोट का उपचार करा चुके अनुज गोयल फोन पर लोगों को अपने अस्पताल में होने की जानकारी दे रहे थे । कुछेक दूसरे लोग भी फोन पर यही सूचना लगातार प्रचारित करने में लगे हुए थे । वह बाकायदा एक दूसरे से टिप्स ले/दे रहे थे कि फलाँ को फोन हो गया या नहीं । यह नजारा देख कर जीसी मिश्र और राघवेन्द्र ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । इन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि अनुज गोयल ने इन्हें इस्तेमाल किया है । इन्हें लेकिन अनुज गोयल की अगली चाल की भनक नहीं हो पाई । इन्हें यह तो पहले भी पता था, और यह साबित भी हो रहा था कि अनुज गोयल बहुत ही धूर्त किस्म का व्यक्ति है - लेकिन उसकी धूर्तता की हद क्या है, इसका अंदाजा नहीं था । इसका एक आभास तब हुआ जब जीसी मिश्र को पता चला कि उनके नाम से अनुज गोयल की सहानुभूति में एक एसएमएस रीजन के लोगों को भेजा गया है । अनुज गोयल को ऐसा फर्जीवाड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी ? सिर्फ इसलिए ताकि वह रीजन के लोगों को बता/दिखा सकें कि जीसी मिश्र और राघवेन्द्र उनके साथ हैं । अनुज गोयल की यह चालबाजी सामने आते ही जीसी मिश्र ने रीजन के लोगों को एसएमएस करके जानकारी दी कि अनुज गोयल के जो चोट लगी है, उसका उन्हें दुःख है और वह प्रार्थना करते हैं कि अनुज गोयल जल्दी स्वस्थ हों, लेकिन वह लोगों को बताना चाहते हैं कि पहले वाला एसएमएस उन्होंने नहीं किया था ।
जीसी मिश्र के इस एसएमएस से अनुज गोयल की किरकिरी तो खूब हुई - लेकिन उनकी किरकिरी ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी की धमक भी पैदा की । अनुज गोयल ने जो हरकत की, उससे साबित हुआ कि अनुज गोयल भी मान गए हैं कि राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है; लोगों के बीच राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन का फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने जीसी मिश्र के नाम का धोखाधड़ी के साथ इस्तेमाल किया । अनुज गोयल की इस हरकत ने उनके समर्थन के भरोसे उम्मीदवार बने मुकेश बंसल की उम्मीदवारी के लिए अजीब समस्या पैदा कर दी है । रीजन में लोगों को लग रहा है कि मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाने वाले अनुज गोयल को ही जब उन पर भरोसा नहीं रह गया है और अनुज गोयल तीन-तिकड़म से राघवेन्द्र के नजदीकियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं - तो दूसरों को उनसे जुड़ने में फिर क्या दिलचस्पी होगी । अनुज गोयल की इस हरकत से मुकेश बंसल के समर्थकों को भी लग रहा है कि अनुज गोयल ने उनके साथ धोखा किया है । मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को अपने खिलाफ अनुज गोयल का षड़यंत्र बताने वाले विनय मित्तल इस मामले में मजा ले रहे हैं । उन्हें लोगों को यह बताने का मौका मिला है कि अनुज गोयल ने पहले उनके साथ धोखा किया और अब अपने धोखे का शिकार उन्होंने मुकेश बंसल को बनाया है । अनुज गोयल के रवैये को लेकर अनुज गोयल के भूतपूर्व सहयोगी रहे विनय मित्तल के इस तरह के विचार और अनुज गोयल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले मुकेश बंसल के समर्थकों की आशंका ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिलने वाले समर्थन का स्पेस बढ़ाने का ही काम किया है । अनुज गोयल ने अपने स्वार्थ में जीसी मिश्र के साथ जो चालबाजी खेली, उसने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बनाने का ही काम किया है ।

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।