Showing posts with label Jaipur Branch of CIRC of ICAI. Show all posts
Showing posts with label Jaipur Branch of CIRC of ICAI. Show all posts

Monday, May 20, 2019

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव में सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा द्वारा पर्दे के पीछे से खड़ी की गई बाधा रूपी कारगुजारी के सामने सेंट्रल काउंसिल के अन्य दोनों सदस्यों - सतीश गुप्ता और प्रमोद बूब ने सरेंडर आखिर किस डर से किया हुआ है ?

जयपुर । जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव का मामला अब इंस्टीट्यूट मुख्यालय जा पहुँचा है, और दावा किया जा रहा है कि वहाँ भी यदि न्यायपूर्ण फैसला जल्दी ही नहीं हुआ - तब फिर मामले की शिकायत केंद्रीय मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में की जाएगी । उल्लेखनीय है कि जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चुनाव को लेकर 6 मार्च से झगड़ा पड़ा हुआ है, और इस झगड़े को सुलझाने के लिए तमाम शिकायतें और अनुरोध किए जा चुके हैं; इंस्टीट्यूट के संबंधित विभाग से स्पष्ट निर्देश मिल चुके हैं, लेकिन कुछेक लोगों की जिद के चलते झगड़ा अभी तक अनसुलझा हुआ पड़ा है । उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि जयपुर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में प्रकाश शर्मा, सतीश गुप्ता, प्रमोद बूब; तथा रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में अभिषेक शर्मा, सचिन जैन, दिनेश जैन भी एक्सऑफिसो सदस्य हैं - लेकिन फिर भी ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के चुनाव जैसा 'मामूली' सा काम करीब ढाई महीने से झगड़े में पड़ा हुआ है । जयपुर में तमाम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स मान रहे हैं औरकह रहे हैं कि इस मामले में सबसे ज्यादा निराशा और शर्म की बात यह है कि सेंट्रल काउंसिल के तीन तीन सदस्यों के होते/रहते हुए सिकासा चेयरमैन के चयन/चुनाव जैसा मामूली सा फैसला नहीं हो पा रहा है - क्या इन लोगों से बड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करने की उम्मीद की जा सकती है ? और यदि इन्हें कहीं कुछ करना ही नहीं है, तो यह सेंट्रल काउंसिल सदस्य आखिर बने क्यों हैं ? सिकासा चेयरमैन के चुनाव का झगड़ा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँचने की स्थिति में आ पहुँचा है, लेकिन इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में जयपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले तीनों सदस्य मुँह में दही जमा कर बैठे हुए हैं ।
झगड़ा क्या है, पहले यह जान/समझ लिया जाये : जयपुर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में चुने गए सात सदस्य हैं, जो खेमेबाजी के लिहाज से दो ग्रुप्स में बँटे हैं । एक ग्रुप में चार सदस्य हैं - लोकेश कासट, अमित यादव, कुलदीप गुप्ता और आकाश बरगोटी; जो क्रमशः चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, सेक्रेटरी तथा ट्रेजरर हैं । दूसरे ग्रुप में बाकी तीन सदस्य हैं - शिशिर अग्रवाल, अंकित माहेश्वरी और विजय अग्रवाल । यह तीनों सत्ता में बैठे चार सदस्यों से ज्यादा वोट पाकर मैनेजिंग कमेटी में पहुँचे हैं, लेकिन फिर भी सत्ता से बाहर हैं । हालाँकि यह कोई खास बात नहीं है; चुनावी राजनीति में यह सब होता है और चुनावी राजनीति की यही खूबी भी है । समस्या लेकिन यहाँ से शुरू होती है । इंस्टीट्यूट के नियमों के अनुसार, मैनेजिंग कमेटी के सदस्य एक पद के अधिकारी ही हो सकते हैं । इस नियम के चलते सिकासा चेयरमैन का पद विरोधी खेमे के किसी सदस्य को ही मिल सकता है; लेकिन चार सदस्यीय सत्ता खेमा इसके लिए तैयार नहीं है । 6 मार्च को हुई मैनेजिंग कमेटी की मीटिंग में चार सदस्यीय सत्ता खेमे ने सिकासा चेयरमैन का पद पर अपने ही किसी सदस्य को सौंपने की तैयारी दिखाई, तो उन्हें इंस्टीट्यूट का नियम पढ़ा दिया गया । इस पर सत्ता खेमे के सदस्यों ने सिकासा चेयरमैन के पद पर फैसला करना टाल दिया और वह अभी तक टलता ही आ रहा है । इंस्टीट्यूट के पदाधिकारी की तरफ से ब्रांच के चेयरमैन व सेक्रेटरी को स्पष्ट निर्देश मिले हैं कि सिकासा चेयरमैन का पद उन्हें उन तीन सदस्यों में से ही किसी एक को सौंपना है, जो अभी किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन उनके कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है; और इस तरह जयपुर ब्रांच के चार सदस्यीय सत्ता खेमे ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट को और उसके पदाधिकारियों को 'बंधक' बना छोड़ा है ।
हालाँकि यह बात किसी को हजम नहीं हो रही है और हर किसी को लग रहा है कि जयपुर ब्रांच के पदाधिकारियों की इतनी 'हिम्मत' नहीं हो सकती है कि वह इंस्टीट्यूट को 'बंधक' बना लें । हर किसी को शक है कि इनके पीछे असली 'खिलाड़ी' कोई और है जो इन पदाधिकारियों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रहा है; और हर कोई अपनी शक की सुईं सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा पर टिका रहा है । आरोपपूर्ण चर्चाओं में कहा/सुना जा रहा है कि प्रकाश शर्मा ने विरोधी ग्रुप के तीनों सदस्यों को आफॅर दिया हुआ है कि जो कोई उनकी शरण में आ जायेगा, उसके अगले ही पल सिकासा चेयरमैन का पद पा लेगा; अन्यथा शिकायतें करते रह जाओगे और कहीं कोई सुनवाई नहीं होगी । विरोधी खेमे के तीनों सदस्यों में से कोई भी लेकिन प्रकाश शर्मा की शरण में जाने को तैयार नहीं हो रहा है । दरअसल विरोधी खेमे के तीनों सदस्य प्रकाश शर्मा से एक बार धोखा खा चुके हैं । बताया जाता है कि जयपुर ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में प्रकाश शर्मा ने इन्हीं तीनों को लेकर सत्ता ग्रुप बनाने की तैयारी की थी, जिसके तहत इन्हीं तीनों को पदाधिकारी बनना था; लेकिन ऐन मौके पर प्रकाश शर्मा ने इन्हें अलग-थलग कर दिया और इन्होंने अपने आप को ठगा हुआ पाया । उसी अनुभव के चलते विरोधी खेमे के तीनों सदस्य अब दोबारा से प्रकाश शर्मा पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं । सात सदस्यीय जयपुर ब्रांच में प्रकाश शर्मा को चूँकि पाँचवाँ सदस्य अपनी शरण में नहीं मिल रहा है, इसलिए जयपुर ब्रांच में सिकासा चेयरमैन के पद पर कोई नियुक्ति नहीं हो रही है । ऐसे में, सिकासा चेयरमैन की जिम्मेदारी का निर्वाह ब्रांच के चेयरमैन लोकेश कासट कर रहे हैं, जो 'चोर दरवाजे' से इंस्टीट्यूट के नियम का सीधा सीधा उल्लंघन है - जिसके अनुसार, ब्रांच का चेयरमैन निकासा का चेयरमैन नहीं हो सकता है । जयपुर में प्रकाश शर्मा की कारगुजारी पर तो किसी को हैरानी नहीं है; लेकिन सतीश गुप्ता और प्रमोद बूब की चुप्पी पर सभी को आश्चर्य जरूर है कि जयपुर ब्रांच में नियमविरुद्ध काम हो रहा है और इन्होंने प्रकाश शर्मा से डर कर उनके सामने सरेंडर क्यों किया हुआ है ? 

Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते समय जयपुर के चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखी जा रही रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी में आई ऊँची उछाल ने चुनावी मुकाबले को टक्कर का बनाया

जयपुर । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी ने जिस तेजी और अप्रत्याशित तरीके से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी पैठ बनाई है, उसके कारण जयपुर/राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल चुनाव का पूरा नजारा बदलता हुआ नजर आ रहा है और चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है । इस बदलते नजारे का ही परिणाम है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने आने पर जो लोग उनकी उम्मीदवारी को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, वही लोग अब रोहित अग्रवाल को न सिर्फ मुकाबले में देख रहे हैं - बल्कि कई कई मामलों में वह उन्हें जयपुर के बाकी तीनों उम्मीदवारों से बेहतर स्थिति में भी पा रहे हैं । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रोहित अग्रवाल को युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच तो अच्छा समर्थन मिल ही रहा है, वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखा रहे हैं और उनमें संभावनाएँ देख रहे हैं । सक्रियता के लिहाज से जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में चूँकि रोहित अग्रवाल का ही पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए भी उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच महत्त्वपूर्ण हो उठी है । जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों के लोगों का भी मानना और कहना है कि जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में एक अकेले रोहित अग्रवाल ही चुनाव को चुनाव की तरह गंभीरता से 'लड़ते' दिख रहे हैं; एक अकेले वही हैं जिनके पास ऐसे समर्थकों/शुभचिंतकों की टीम है जो वास्तव में चुनावी मैदान में सक्रिय है - और इसी का उन्हें फायदा मिलता दिख रहा है । चुनावी राजनीति की बारीकियों को समझने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ते दिख रहे उत्साह को वोट में बदलने की चुनौती रोहित अग्रवाल के सामने अभी बाकी है ।
जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में शामिल और सक्रिय रहे अनुभवी लोगों का मानना और बताना है कि ऑरा (आभामंडल) के लिहाज से रोहित अग्रवाल बाकी तीनों उम्मीदवारों से कमजोर पड़ते हैं; उनकी सबसे बड़ी समस्या उनका युवा होना है । युवा होने के कारण उनकी उम्मीदवारी को लोग आसानी से तवज्जो देते हुए नहीं दिखते हैं । रोहित अग्रवाल की यही कमजोरी लेकिन उनके लिए वरदान बनती नजर आ रही है । इसमें काफी योगदान हालाँकि परिस्थितियों का भी है । परिस्थितियों ने दो तरह से रोहित अग्रवाल की 'मदद' की है । राजस्थान विधानसभा चुनाव में तमाम वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद जिस तरह सचिन पायलट का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, उसके चलते चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी यह भावना जोर मार रही है कि एक युवा नेता को यदि प्रदेश की बागडोर सौंपी जा सकती है, तो इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की एक सीट क्यों नहीं दी जा सकती है ? इसके अलावा, सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले बाकी तीन उम्मीदवार 'बड़े' तो हैं, लेकिन वह उस कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसमें कहा गया है - 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खुजूर ...।इसका फायदा रोहित अग्रवाल को मिलता बताया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि बाकी तीन उम्मीदवारों में सतीश गुप्ता दो बार पहले सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं, और पिछली व तीसरी बार पीछे हट चुके हैं । उनके बड़े होने पर उनका यह 'रिकॉर्ड' भारी है और इस बार भी वह कोई चमत्कार करते हुए नहीं दिख रहे हैं । प्रमोद बूब पिछली बार उम्मीदवार के रूप में कोई सक्रियता दिखाये बिना सबसे ज्यादा वोटों से रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते थे; इस बार सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में भी वह उसी ढर्रे पर हैं - इस बीच लेकिन लोगों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वह बड़े तो हैं, लेकिन हैं 'पेड़ खुजूर' । रीजनल काउंसिल में उनकी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं दिखी; कुछेक मुद्दों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के साथ उनकी जो 'मुठभेड़े' हुईं भी, वह निजी लड़ाई/खुन्नस के रूप में ज्यादा नजर आईं - और व्यापक सरोकार से जुड़ती हुई नहीं दिखीं । उम्मीदवार के रूप में वह लोगों से जुड़ते हुए और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु लोगों तक अपनी पहुँच बनाते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर जयपुर में ही कोई खास उत्साह नहीं देखा/पहचाना जा रहा है ।  
प्रकाश शर्मा तक के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट को बचाना मुश्किल हो रहा है । आमतौर पर माना/समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य तो अपनी सीट आसानी से निकाल ही लेता है; लेकिन पिछली बार वेस्टर्न और ईस्टर्न रीजन में एक एक सेंट्रल काउंसिल सदस्य को अपनी अपनी सीट गँवानी पड़ी थी, और सेंट्रल रीजन में भी 'स्टार' उम्मीदवार समझे जाने वाले अनुज गोयल अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाने में असफल रहे थे । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि काउंसिल सदस्य होना चुनावी जीत की कोई गारंटी नहीं है । प्रकाश शर्मा तो पिछला चुनाव ही जैसे-तैसे मुश्किल से जीते थे । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में उन्होंने दिखाया/जताया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट वह भले ही 'बड़े' हैं, लेकिन सोच व व्यवहार के मामले में वह बहुत 'छोटे' हैं । अपने व्यवहार और रवैये से प्रकाश शर्मा ने जो नकारात्मक पहचान बनाई है, उसके कारण उनके नजदीकियों व समर्थकों को ही उनकी जीत को लेकर आशंका है । मजे की बात है कि जयपुर और राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के अच्छे अच्छे जानकर भी विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों के बारे में अनुमान लगा पाने में गच्चा खा रहे हैं । वह यह तो मान रहे हैं कि जयपुर/राजस्थान की जो वोटिंग 'ताकत' है, उसके चलते जयपुर के दो उम्मीदवार तो सेंट्रल काउंसिल में पहुँच ही जायेंगे - लेकिन वह दो उम्मीदवार कौन से होंगे, इस सवाल पर उनकी बोलती बंद हो जाती है । विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों को लेकर बनी इस असमंजसता के चलते भी रोहित अग्रवाल के लिए तेजी से मुकाबले में आना आसान हुआ है । नामांकन होने के समय उन्हें चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन परिस्थितिवश मिले अवसर को अपनी सक्रियता से इस्तेमाल करके रोहित अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को जो ऊँची उछाल दी है, उससे उनकी उम्मीदवारी टक्कर में आ गई है - और इस तथ्य ने बाकी तीनों उम्मीदवारों तथा उनके समर्थकों को मुसीबत में डाल दिया है ।

Tuesday, January 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल और जयपुर ब्रांच की राजनीति में गौतम शर्मा को जब-तब इस्तेमाल करते रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा क्या अब सचमुच उनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं

जयपुर । प्रकाश शर्मा के बदलते तेवरों के चलते गौतम शर्मा को सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने की पिछले करीब एक वर्ष से पाली हुई अपनी उम्मीद खतरे में पड़ती दिख रही है । मजे की बात यह है कि यह खतरा प्रकाश शर्मा का 'आदमी' होने के कारण ही वास्तव में उनके सामने आ खड़ा हुआ है । चुनावी वर्ष होने के कारण सेंट्रल काउंसिल सदस्य पिछली बार की ही तरह इस बार भी 'एकता' बना कर किसी ऐसे सदस्य को तो चेयरमैन बनाने/बनवाने का प्रयास करेंगे, जो मौजूदा चेयरमैन दीप मिश्र की तरह ही उनकी कठपुतली बन कर रहे - लेकिन यह तय माना जा रहा है कि वह सदस्य गौतम शर्मा तो नहीं ही होंगे । कहा/सुना जा रहा है कि गौतम शर्मा को प्रकाश शर्मा के 'आदमी' के रूप में देखने/पहचानने के कारण 'एका' बनाने वाले बाकी सेंट्रल काउंसिल सदस्य चेयरमैन के रूप में उनके नाम पर सहमत नहीं होंगे । गौतम शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, प्रकाश शर्मा ने उन्हें सेक्रेटरी बनवाने का आश्वासन जरूर दिया हुआ है । गौतम शर्मा और उनके समर्थक दरअसल यह देख/जान कर ज्यादा निराश हैं कि जो प्रकाश शर्मा पिछले करीब एक वर्ष से उन्हें चेयरमैन बनवाने का आश्वासन दे रहे थे, वही प्रकाश शर्मा मौका नजदीक आने पर गौतम शर्मा को इस बार चेयरमैन पद की चुनावी दौड़ से बाहर ही मान/बता रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें रीजनल काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । गौतम शर्मा इसी समीकरण के भरोसे इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की कोशिश में थे, लेकिन इंस्टीट्यूट में चुनावी वर्ष होने के कारण सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच गौतम शर्मा के नाम पर सहमती बनती हुई नहीं दिख रही है ।
दरअसल सेंट्रल काउंसिल के लिए इस बार अनुज गोयल, अभय छाजेड़ और प्रमोद बूब के उम्मीदवार बनने की संभावनाओं के चलते सेंट्रल रीजन के पाँचों मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सदस्यता खतरे में पड़ी दिख रही है - इसलिए वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहेंगे, जो लोगों के बीच उनकी पहचान को नकारात्मक बनाए । अनुज गोयल की संभावित उम्मीदवारी के चलते मुकेश कुशवाह और मनु अग्रवाल की सदस्यता पर खतरा दिख रहा है । यह तो हर कोई मान रहा है कि उत्तर प्रदेश में इन तीनों में से दो लोग तो आ जायेंगे, लेकिन वह दो लोग कौन होंगे - इसे लेकर कोई भी निश्चिन्त नहीं है । यही हाल राजस्थान में है, जहाँ कि प्रमोद बूब की संभावित उम्मीदवारी प्रकाश शर्मा और श्यामलाल अग्रवाल के लिए खतरा बनी है; इस खतरे को सतीश गुप्ता व विजय गर्ग में से किसी एक की संभावित उम्मीदवारी और बढ़ा देती है । जातीय आधार पर प्रकाश शर्मा ही सबसे ज्यादा खतरे में नजर आ रहे हैं । अभय छाजेड़ की संभावित उम्मीदवारी मध्य प्रदेश में केमिशा सोनी के लिए चुनौती बनी है । अपनी कई गतिविधियों और अपने रवैये के चलते केमिशा सोनी ने इंदौर में अपने विरोधियों की संख्या को बढ़ाने का जो काम किया है, वह भी चुनाव में उनकी मुश्किलों को बढ़ाने वाला साबित होगा और इसलिए भी इस बार का चुनाव उनके लिए खासा चुनौतीपूर्ण होगा । सेंट्रल काउंसिल के सदस्य चुनावी नजरिये से अपने अपने क्षेत्रों में जिस तरह से मुसीबत में घिरे हैं, उसके चलते सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इस वर्ष होने वाले चुनाव में वह पिछली बार की तरह आरोपपूर्ण तरीके से शामिल होने से बचने की कोशिश - उम्मीद है कि करेंगे ।
इस बात ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इस बार होने वाले चुनावों को दिलचस्प बना दिया है । प्रकाश शर्मा जिस तरह से गौतम शर्मा को सेक्रेटरी बनवाने की बात कर रहे हैं, उसके चलते माना जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य विरोधी खेमे के दो/तीन सदस्यों को तोड़ कर रीजनल काउंसिल में अपना बहुमत बनाने का प्रयास करेंगे । रीजनल काउंसिल के दस सदस्यों में छह सदस्यों वाला विरोधी खेमा यदि एकजुट बना रहता है, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य रीजनल काउंसिल की राजनीति से अपने आप को दूर रखते हैं - तब तो गौतम शर्मा और सत्ता पक्ष के बाकी सदस्यों को अबकी बार सिर्फ झुनझुना मिलने की ही स्थिति है । छह सदस्यीय विरोधी खेमे में चेयरमैन बनने के प्रबल आकांक्षी तो हालाँकि दो/तीन सदस्य हैं, लेकिन उनके बीच गलाकाट स्पर्धा के संकेत अभी तो नहीं दिख रहे हैं - इसलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए उनमें फूट डालना भी आसान काम नहीं होगा । इसलिए गौतम शर्मा के लिए चेयरमैन तो दूर, सेक्रेटरी बनने के भी लाले दिख रहे हैं । गौतम शर्मा के नजदीकियों के अनुसार, गौतम शर्मा और उनके समर्थक लेकिन इस बात से निराश और नाराज हैं कि प्रकाश शर्मा अपने स्वार्थ में उन्हें जब-तब इस्तेमाल तो करते रहे, लेकिन अब वह उनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं और उन्हें अकेला छोड़ दिया । प्रकाश शर्मा के चक्कर में गौतम शर्मा ने रीजनल काउंसिल और जयपुर ब्रांच में भी लोगों से 'दुश्मनी' कर ली - और अब प्रकाश शर्मा ने भी उन्हें अकेला कर दिया है ।

Friday, November 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच में अपने लोगों को न जितवा पाने की खुन्नस में नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी का उसका अधिकार छिनवा कर प्रकाश शर्मा ने जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गौरव पर तो चोट की ही है, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को भी दाँव पर लगा दिया है

जयपुर । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी द्वारा जयपुर में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की फजीहत का कारण बन रही है । विवादपूर्ण मुद्दों पर नीलेश विकमसे के फैसला न करने के रवैये के चलते इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी बेचारे वी सागर की बड़ी आफत हो जाती है - क्योंकि अक्सर उनकी सुनी नहीं जाती है और कोई भी उन्हें कभी भी लताड़ देता है । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने समझ लिया है कि नीलेश विकमसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बन जरूर गए हैं, लेकिन प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी सँभाल और निभा पाना उनके बस की बात है नहीं, और इसलिए वह इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी को भी कुछ नहीं समझते और मनमानियों पर उतरे रहते हैं । जयपुर में 24/25 नबंवर को हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट में फैली अराजकता का दिलचस्प उदाहरण है । इस नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी को लेकर विवाद है - इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, जयपुर में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट के कार्यक्रम की मेज़बानी इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच को करनी/मिलनी चाहिए; लेकिन मेज़बानी निभा रही है सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल । मजे की बात यह है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में इस बारे में जो विचार-विमर्श हुआ, उसमें भी नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी जयपुर ब्रांच को सौंपने का फैसला हुआ - लेकिन उसके बाद भी मेज़बानी का अधिकार जयपुर ब्राँच से छीन कर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को सौंप दिया गया है ।
यह पूछना बेकार है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीप मिश्र आखिर काउंसिल की मीटिंग में ही हुए फैसले पर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह पूछना इसलिए बेकार है क्योंकि दीप मिश्र को एक 'कठपुतली' चेयरमैन के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, और माना/समझा जाता है कि उन्हें चेयरमैन की कुर्सी दिलवाने वाले ऊपर के लोग जैसे 'नचाते' हैं, वह वैसे ही 'नाचते' हैं । दरअसल दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । ऐसे में, बेचारे दीप मिश्र की मजबूरी और व्यथा को समझा जा सकता है । संदर्भित मामले में दरअसल हुआ यह कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उपस्थित हुए सदस्यों के बहुमत ने मेज़बानी की जिम्मेदारी जयपुर ब्राँच को सौंपने का फैसला लिया; लेकिन इस फैसले को मानने से यह कहते/बताते हुए इंकार कर दिया गया कि काउंसिल का बहुमत इस फैसले से सहमत नहीं है । निश्चित रूप से बहुमत को अपना फैसला लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह तथाकथित बहुमत है कहाँ ? यह तथाकथित बहुमत उस मीटिंग में नजर क्यों नहीं आया, जिस मीटिंग में जयपुर में हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी सुनिश्चित करने का मामला तय हो रहा था ? कम से कम न्याय का दिखावा ही कर लिया जाता और यह तथाकथित बहुमत दूसरी मीटिंग करके पहली मीटिंग के फैसले को पलट देता - लेकिन ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गई । असल में, ऐसा करने में एक समस्या यह भी थी कि तथाकथित बहुमत के ठेकेदार सेंट्रल काउंसिल सदस्य मनु अग्रवाल को अपने साथ मान रहे हैं, लेकिन मनु अग्रवाल जयपुर ब्राँच को मेज़बानी देने का फैसला करने वाली मीटिंग में मौजूद थे और इस फैसले के साथ थे - ऐसे में यदि इसी मुद्दे पर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दूसरी मीटिंग होती तो पहले हुए फैसले को बदलने के लिए मनु अग्रवाल को अपना स्टैंड बदलना होता, और तब उनका दोहरा चरित्र 'रिकॉर्ड' पर आता ।
मनु अग्रवाल के दोहरे चरित्र को रिकॉर्ड पर आने से तो बचा लिया गया है, लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में हुए फैसले को खुद सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा ठेंगा दिखाए जाने की हरकत पर उनकी चुप्पी से उनका दोहरा चरित्र लोगों के सामने तो आ ही गया है । क्योंकि मनु अग्रवाल यदि अभी भी मीटिंग में लिए गए अपने स्टैंड पर कायम हैं तो तथाकथित बहुमत का दावा झूठा है; बहुमत का दावा करने वाले लोग मनु अग्रवाल की चुप्पी के सहारे/भरोसे ही अपने दावे को सच 'दिखा' रहे हैं । बहुमत की इस तरह की मनमानी व्याख्या और दिखावेबाजी से सवाल पैदा हुआ है कि बहुमत यदि 'ऐसे' ही तय होना है, तो फिर मीटिंग आदि की जरूरत ही क्या है ? और क्यों मीटिंग के रिकॉर्ड और मिनिट्स तैयार करने व रखने की जरूरत है ? इस मामले को लेकर इंस्टीट्यूट में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें प्रथम दृष्टया उचित मानते/देखते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने संबंधित पार्टियों से जबाव तलब किया है । वी सागर की इस कार्रवाई से लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में हो रही मनमानियों पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को इस बात से जैसे कोई मतलब ही नहीं है कि उनके प्रेसीडेंट-काल में हर कोई मनमानी कर रहा है, जिसके चलते नाहक ही विवाद पैदा हो रहे हैं - और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो रही है । जयपुर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विजय गुप्ता से भी मेज़बानी के मामले में हो रहे नियम के उल्लंघन को लेकर शिकायत की गई, लेकिन विजय गुप्ता ने जब देखा/पाया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ही कोई फिक्र नहीं है - तो वह ही मामले में क्यों पड़ें ? विजय गुप्ता इसलिए भी मामले से दूर रहना और बचना चाहते हैं, क्योंकि इस सारे झमेले के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं - जिन्हें नाराज करना सेंट्रल काउंसिल की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को नुकसान पहुँचाना हो सकता है ।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम की और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में लिए गए फैसले की ऐसी-तैसी करने के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा की निजी खुन्नस को देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर ब्राँच के सदस्यों के अनुसार, प्रकाश शर्मा को लगता है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके कहे में नहीं चलते हैं, और उनकी बजाए सेंट्रल काउंसिल के ही एक दूसरे सदस्य श्याम लाल अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो देते हैं । सेंट्रल काउंसिल के इन दोनों ही सदस्यों के बीच जयपुर में अपने अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर एक स्वाभाविक सी होड़ रहती ही है; इस होड़ में श्याम लाल गुप्ता का पलड़ा इसलिए भारी दिखता है, क्योंकि जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों में दो - प्रमोद बूब और रोहित रुवाटिया उनके साथ देखे/पहचाने जाते हैं तथा जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके नजदीक हैं । प्रकाश शर्मा को जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीसरे सदस्य गौतम शर्मा का ही समर्थन है । जयपुर ब्राँच और रीजनल काउंसिल में प्रकाश शर्मा भले ही श्याम लाल अग्रवाल से पिछड़ रहे हैं, लेकिन सेंट्रल काउंसिल में सेंट्रल रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सदस्यों में प्रकाश शर्मा का पलड़ा फिलहाल भारी है । खेमेबाजी के चलते कहीं कभी 'जीत' कभी कहीं 'हार' का नजारा बनता/दिखता रहता ही है - लेकिन जयपुर में अपनी 'हार' का बदला लेने के लिए प्रकाश शर्मा इस स्तर तक जायेंगे कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को ही दाँव पर लगा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । जयपुर ब्राँच जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए गौरव का प्रतीक है - राजनीति में आगे/पीछे होता ही रहता है; जयपुर ब्राँच में प्रकाश शर्मा यदि 'अपने' लोगों को नहीं जितवा सके और इस कारण से उन्हें ब्राँच में अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अवसर यदि नहीं मिल पा रहा है, तो इसकी खुन्नस में वह जयपुर ब्राँच का हक़ ही छिनवा देंगे - इसकी कल्पना उनके नजदीकियों और शुभचिंतकों तक ने नहीं की थी । जयपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारियों के साथ प्रकाश शर्मा की नाराजगी हो सकती है, लेकिन उनसे बदला लेने के लिए वह जयपुर ब्राँच की पहचान और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करेंगे - यह प्रकाश शर्मा की छोटी सोच का सुबूत और उदाहरण है ।

Thursday, March 16, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा होने की घोषणा से सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह की फजीहत हुई और प्रकाश शर्मा की मुसीबत बढ़ी

कानपुर । मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने की जो हरकत की, उसके निशान मिटाने के लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कदम तो उठाया है - लेकिन मुकेश कुशवाह की हरकतों के दाग इतने गहरे हैं कि लगता नहीं है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के प्रयासों के बावजूद वह पूरी तरह मिट पायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी की भूमिका निभा रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह ने अपनी मनमानीपूर्ण बेईमानी से दीप कुमार मिश्र को चेयरमैन 'चुनवाने' का जो कांड किया, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने उसे रद्द कर दिया है - और चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब उसकी किसी रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने का निर्णय हुआ है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इस काले अध्याय को जोड़ने की जिम्मेदारी के लिए मुकेश कुशवाह को याद किया जायेगा । इस कलंक-कथा की खास बात यह है कि मुकेश कुशवाह जब इसे 'लिख' ही रहे थे, तब ही इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से साफ शब्दों में बता दिया गया था कि वह जो कर रहे हैं - वह नियम विरुद्ध है और गलत है; मुकेश कुशवाह उस समय लेकिन पद की गर्मी और अहंकार में इस कदर जकड़े हुए थे कि उन्होंने साफ साफ लिखे उन शब्दों को कोई अहमियत ही नहीं दी ।
मुकेश कुशवाह को दरअसल उम्मीद थी कि वह जो फैसला कर देंगे, इंस्टीट्यूट प्रशासन अंततः उसे स्वीकार कर ही लेगा । मुकेश कुशवाह की तरफ से उस समय दावा किया भी गया था कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । अनिल भंडारी से मिले आश्वासन के भरोसे ही मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से नियमों के मिले हवाले की परवाह करने की जरूरत नहीं समझी । मुकेश कुशवाह अपनी कारस्तानी को लेकर इसलिए भी आश्वस्त थे क्योंकि उनके किए-धरे को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन मिला था । किंतु किसी का भी आश्वासन और समर्थन उनके काम नहीं आया । लोगों का कहना/मानना है कि दरअसल मुकेश कुशवाह की जैसी छवि है, उसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को लगा होगा कि मुकेश कुशवाह की इस हरकत पर उन्होंने यदि कोई कार्रवाई नहीं की तो मुकेश कुशवाह का हौंसला बढ़ेगा और फिर वह अपनी कारस्तानियों से इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को बदनाम करते रहेंगे । इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह द्धारा मनमानीपूर्ण बेईमानी से कराए गए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव को रद्द करके उक्त चुनाव को दोबारा कराने का आदेश दिया गया है ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंस्टीट्यूट के इतिहास और उसकी पहचान/प्रतिष्ठा पर मुकेश कुशवाह द्धारा पोती गई कालिख को इस तरह से पौंछने की कोशिश तो की गई है, लेकिन उसकी यह कोशिश अधिकतर लोगों को आधी-अधूरी भी लग रही है । लोगों का मानना/कहना है कि सिर्फ चेयरमैन का ही नहीं, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का पूरा चुनाव ही दोबारा होना चाहिए । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में पहले चेयरमैन का चुनाव होता है, और यह चुनाव बाकी पदों के लिए होने वाले चुनाव की भावभूमि और केमिस्ट्री तय करता है - इसलिए चेयरमैन के चुनाव में हुई बेईमानी ने बाकी सभी चुनावों पर अपना असर डाला है, इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन यदि वास्तव में न्याय करना चाहता है तो उसे पूरा चुनाव दोबारा कराना चाहिए; अन्यथा चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाला चुनाव महज खानापूर्ति करना होगा । मुकेश कुशवाह की मनमानीपूर्ण बेईमानी के चलते चेयरमैन पद पाने से वंचित रहे रोहित रुवाटिया अग्रवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगता है कि तीन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के समर्थन के बूते मुकेश कुशवाह जो बेईमानी कर सके, उसके चलते दोबारा होने वाले चुनाव में 'वास्तविक चुनाव' नहीं हो सकेगा - और रोहित रुवाटिया अग्रवाल के साथ सचमुच न्याय नहीं हो पायेगा । समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से रोहित रुवाटिया अग्रवाल को सलाह दी जा रही है कि उन्हें सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पदों का चुनाव दोबारा कराने हेतु इंस्टीट्यूट प्रशासन को राजी करने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । माना/समझा जाता है कि रद्द हुए चुनाव में प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को समर्थन नहीं दिया था । इसके लिए जयपुर और राजस्थान में उन्हें भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा है । लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जयपुर और राजस्थान का वास्ता देकर ही समर्थन जुटाया था, और अगले चुनाव में भी उन्हें यही 'वास्ता' देना पड़ेगा - ऐसे में जयपुर और राजस्थान को चेयरमैन 'मिलने' के मौके के साथ उन्होंने धोखा क्यों कर दिया ? प्रकाश शर्मा समय के साथ जयपुर और राजस्थान के लोगों के 'घाव' के भरने का इंतजार कर रहे थे कि दोबारा चुनाव होने/कराने की घोषणा ने उनके घावों को कुरेद कर फिर से ताजा कर दिया है । प्रकाश शर्मा और उनके नजदीकियों को यह डर सता रहा है कि चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में रोहित रुवाटिया अग्रवाल यदि नहीं जीते, तो जयपुर और राजस्थान में लोग इसके लिए प्रकाश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे और इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव का नतीजा क्या होगा, इसका जबाव तो जल्दी ही मिल जायेगा - लेकिन दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने मुकेश कुशवाह की बेईमानीपूर्ण कारस्तानी पर जो मोहर लगाई है और प्रकाश शर्मा के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसने सेंट्रल रीजन में एक दिलचस्प नजारा खड़ा किया है ।

Wednesday, March 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में मुकेश कुशवाह की नियम विरुद्ध मनमानी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे असहाय क्यों बने हुए हैं ?

कानपुर । दीप कुमार मिश्र को बेईमानीपूर्ण तरीके से सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन 'चुनवा' कर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के नए बने प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को खासे धर्मसंकट में फँसा दिया है । उन पर एक तरफ मुकेश कुशवाह की कारस्तानी को अनदेखा करने का दबाव है, तो दूसरी तरफ प्रेसीडेंट पद के रूप में अपने पद व इंस्टीट्यूट की गरिमा को बचाने की चुनौती है । मुकेश कुशवाह की तरफ से दावा सुना गया है कि उन्होंने नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । मुकेश कुशवाह इसलिए भी आश्वस्त हैं क्योंकि उनकी कारस्तानी को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नीलेश विकमसे के जो अन्य नजदीकी हैं, उनका कहना लेकिन यह भी है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह ने जो हरकत की है - उसे लेकर नीलेश विकमसे खासे परेशान भी हैं और उनका मानना है कि इस तरह की हरकतों पर वह यदि चुप रहे तो मुकेश कुशवाह जैसे लोग इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को अपनी कारस्तानी से बदनाम करते रहेंगे । 
मुकेश कुशवाह सहित सेंट्रल रीजन के चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मनमानीभरी दादागिरी का पहला लक्षण तो तब दिखा, जब उन्होंने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में वोट डालने का फैसला किया । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को वोटिंग में शामिल नहीं होना चाहिए, और रीजनल काउंसिल के सदस्यों को ही पदाधिकारी चुनने देना चाहिए । मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा व केमिशा सोनी ने लेकिन लगता है कि नैतिकता का पाठ पढ़ा ही नहीं है । इनकी बदकिस्मती लेकिन यह रही कि निर्लज्जता के साथ नैतिकता के पाठ की अनदेखी करने के बाद भी चेयरमैन पद के इनके उम्मीदवार दीप कुमार मिश्र को जीत नहीं मिल सकी । पंद्रह वोटों में दीप कुमार मिश्र और चेयरमैन पद के दूसरे उम्मीदवार रोहित रुवाटिया अग्रवाल को पहली वरीयता के सात-सात वोट मिले और एक वोट में पहली वरीयता का वोट नहीं दिया गया था, जबकि दूसरी वरीयता का वोट दीप कुमार मिश्र के लिए था । तर्कशील तरीके से देखें तो जो वोटर दीप कुमार मिश्र को दूसरी वरीयता का वोट दे रहा है, उसका पहली वरीयता का वोट रोहित रुवाटिया अग्रवाल के लिए ही रहा होगा - जो किसी तकनीकी गड़बड़ी के चलते मार्क नहीं हो पाया होगा । इंस्टीट्यूट का कामकाज लेकिन तर्कशीलता के आधार पर नहीं चलता है, वह ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही काम करेगा - और इसके लिए ही नियम-कानून बनाए गए हैं । इंस्टीट्यूट के नियम-कानून के अनुसार, इस पंद्रहवें वोट को रद्द होना चाहिए था ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में लेकिन इंस्टीट्यूट के नियम-कानून की अनदेखी करते हुए इस पंद्रहवें वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ कर उन्हें विजेता घोषित कर दिया । इससे पहले मुकेश कुशवाह ने एक हरकत यह और की थी कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल को मिले एक वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ दिया था, उनकी यह हरकत लेकिन तुरंत से पकड़ में आ गई थी । रद्द हो जाने वाले वोट को गिनती में शामिल करने के मामले में भी मुकेश कुशवाह की मनमानी का आलम यह रहा कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन अभय छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट के मुख्यालय से इस मामले में निर्देश लिया, तो संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से ईमेल के जरिये उनसे स्पष्ट कहा गया कि नियमानुसार उक्त वोट रद्द होगा - मुकेश कुशवाह ने लेकिन उनके फैसले को भी मानने से इंकार करते हुए दीप कुमार मिश्र को विजेता घोषित कर दिया । मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी  के रूप में जिस निर्लज्जता के साथ इंस्टीट्यूट के नियम की ऐसीतैसी की है, उसके कारण वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के पात्र बनते हैं - लेकिन उनका आत्मविश्वास दिखाता है कि इस मामले में उनकी इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के साथ सेटिंग हो चुकी है, और वह आश्वस्त हैं कि उनकी हरकत के चलते न तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी और न उनका फैसला ही बदला जायेगा ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में जो हरकत की है, उसे जयपुर ब्रांच की राजनीति के संदर्भ में बदले की कार्रवाई के रूप में भी देखा/बताया जा रहा है । जयपुर ब्रांच पर कब्जे की लड़ाई में प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा की जोड़ी को श्याम लाल अग्रवाल, प्रमोद कुमार बूब व रोहित रुवाटिया अग्रवाल की तिकड़ी से मात खानी पड़ रही है । प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को अपनी तरफ करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन उन्हें किसी भी तरह से सफलता नहीं मिली । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में रीजनल काउंसिल के सदस्यों में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा जब भारी दिखा, तो प्रकाश शर्मा को उन्हें दबाव में लेकर जयपुर ब्रांच पर कब्जे को लेकर सौदेबाजी करने का मौका मिला । चर्चा है कि प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को साफ बता दिया था कि जयपुर ब्रांच के मामले में वह यदि उनके ग्रुप का समर्थन नहीं करेंगे, तो उन्हें किसी भी कीमत पर रीजनल काउंसिल का चेयरमैन नहीं बनने दिया जायेगा । जो हुआ, उसके जरिये प्रकाश शर्मा ने अपनी धमकी को सच साबित करके दिखा दिया । उल्लेखनीय है कि जयपुर को आठ वर्ष बाद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन पद मिलने जा रहा था - जिसे लेकिन मुकेश कुशवाह, मनु शर्मा, केमिशा सोनी की मदद से प्रकाश शर्मा व गौतम शर्मा की ब्लैकमेल की राजनीति ने संभव नहीं होने दिया ।

Friday, November 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की चुनावी लड़ाई में रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता से गौतम शर्मा को रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की अपनी योजना में पलीता लगता दिख रहा है

जयपुर । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जिस तरह की सक्रियता दिखाई हुई है, उसके चलते गौतम शर्मा के लिए रीजनल काउंसिल में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य दूर जाता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि उम्मीदवार के रूप में गौतम शर्मा ने चुनाव में अपनी अच्छी पकड़ प्रदर्शित की है, और राजस्थान के उम्मीदवारों में उन्हें सबसे आगे देखा/पहचाना जा रहा है । उनके इस प्रदर्शन को देखते हुए उनके कुछेक समर्थक दावा करने लगे कि गौतम शर्मा राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे रीजन में सबसे ज्यादा वोट पायेंगे और रीजन में सबसे आगे रहेंगे ।
रीजन में सबसे आगे रहने वाले उम्मीदवार के रूप में हालाँकि अभी तक भोपाल के अभय छाजेड़ को देखा/पहचाना जा रहा है । अभय छाजेड़ अकेले उम्मीदवार हैं, जो सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा टर्म में सदस्य होते हुए अगली टर्म के लिए चुनावी मैदान में हैं । इस नाते, इस बार के चुनावी खेल में अभय छाजेड़ को न सिर्फ सबसे सुरक्षित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, बल्कि नंबर एक की पोजीशन पर भी माना जाता रहा है । लेकिन जैसे जैसे चुनाव अभियान ने गर्मी पकड़ी, वैसे वैसे गौतम शर्मा के भी 'भाव' बढ़े और नंबर एक की पोजीशन के लिए उन्हें भी दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा । जयपुर में उनके समर्थकों की तरफ से सुनाई देने लगा कि काउंसिल में सदस्य होने के नाते रीजन में अभय छाजेड़ की पहचान का दायरा भले ही बड़ा हो, लेकिन गौतम शर्मा ने अपने चुनावी प्रबंधन को जिस तरह से मैनेज किया है और खास तौर से जयपुर व राजस्थान में अपने लिए समर्थन जुटाया है, उसके चलते रीजनल काउंसिल के चुनाव में उनके लिए वोट प्राप्त करने के मामले में अभय छाजेड़ से आगे निकलना मुश्किल नहीं होगा । 
किंतु जयपुर में गौतम शर्मा के जो समर्थक अभी कल तक यह दावा करते हुए सुने जा रहे थे, उन्हीं में से कुछेक समर्थक अब यह आशंका व्यक्त करने लगे हैं कि रोहित रुवाटिया के कारण गौतम शर्मा का रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य खतरे में पड़ सकता है । गौतम शर्मा के ही समर्थकों का कहना है कि राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के लोगों से उन्हें जो फीडबैक मिल रहा है, उसमें यह बात कॉमन रूप से सामने आ रही है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज में अपने लिए समर्थन पैदा किया है । इसे उनके आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए जा रहे प्रचार/संपर्क अभियान के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपने आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए गए प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित तो कराया है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि इस परिचय से उन्हें वोट भी मिलेंगे ही । तकनीकी रूप से यह बात सच तो है, लेकिन यह एक ऐसा सच है जो प्रत्येक उम्मीदवार पर लागू होता है । उम्मीदवार अपने प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित कराता है, और कोई नहीं सकता कि इस परिचय के चलते उसे वोट सचमुच में कितने मिलेंगे । यह बात रोहित रुवाटिया अग्रवाल के बारे में भी सच है, तो गौतम शर्मा के बारे में भी सच है, और अन्य दूसरे उम्मीदवार भी इस सच के दायरे में हैं । 
गौतम शर्मा के समर्थकों को डर दरअसल यह जान/देख कर हुआ कि प्रचार/संपर्क अभियान में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा सबसे भारी है; हालाँकि कुछेक लोग उनकी बातों और उनके दावों को लेकर उनके मैच्योरिटी लेबल के बारे में सवाल जरूर उठा रहे हैं - लेकिन इससे उनकी चुनावी संभावना पर कोई प्रतिकूल असर पड़ता नहीं दिख रहा है । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच जिस तरह का परिचय बनाया है, उसके कारण तो गौतम शर्मा के लिए अपना लक्ष्य पाना मुश्किल बना ही है; अग्रवाल वोटों के मामले में भी रोहित रुवाटिया अग्रवाल उनकी योजना को लंगड़ी लगाते दिख रहे हैं । अग्रवाल समाज में प्रभाव रखने वाले एक बड़े नेता ओपी अग्रवाल का समर्थन जुटा कर गौतम शर्मा ने अग्रवालों का वोट जुटाने का जो जुगाड़ किया था, रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपनी सक्रियता से उनके उस जुगाड़ में भारी सेंध लगा दी है । हर उम्मीदवार का अपना अपना समर्थन आधार होता है, और हर समर्थन-आधार में एक से अधिक उम्मीदवारों को खपाने की क्षमता भी होती है; इसलिए रोहित रुवाटिया अग्रवाल की सक्रियता गौतम शर्मा को कोई सीधी चुनौती नहीं देती है - लेकिन खुद गौतम शर्मा के समर्थकों का ही कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की गौतम शर्मा की योजना में पलीता जरूर लगाती दिख रही है ।

Tuesday, November 3, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को मिल रहा जयपुर की बड़ी फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की सीट के लिए सचमुच खतरा बनेगा क्या ?

जयपुर । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को पहले भले ही गंभीरता से नहीं लिया हो, लेकिन अब उन्हें समझ में आने लगा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में उनकी वापसी को मुश्किल बना सकती है । दरअसल यह दोनों एक ही खेमे के हैं; और खेमे की तरफ से श्याम लाल अग्रवाल पिछली बार इस समझौते के तहत ही उम्मीदवार बने थे - कि अबकी बार श्याम लाल अग्रवाल और अगली बार प्रकाश शर्मा उम्मीदवार होंगे । उक्त समझौते के तहत इस बार प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार होना था । श्याम लाल अग्रवाल ने लेकिन पिछली बार हुए समझौते को मानने से इंकार दिया और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों को विश्वास रहा कि मौजूदा सेंट्रल काउंसिल में उनकी जो सक्रियता रही है, उससे उनका अपना एक खेमा बन गया है और इसलिए उन्हें अब पहले वाले खेमे के लोगों के सहयोग/समर्थन की कोई जरूरत नहीं है । इसके अलावा, उन्होंने यह भी माना/समझा कि पहले वाले खेमे के अधिकतर लोग भी उनके साथ सीधे जुड़ गए हैं - इसलिए उन्हें खेमे के नेताओं की परवाह करने की जरूरत नहीं है । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने यह भी माना और कहा/बताया कि पिछली बार हुए समझौते का नाम लेकर खेमे के जो तथाकथित नेता प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाने की जिद पर अड़े हैं, उन्हें जल्दी ही वास्तविकता का अहसास हो जायेगा और फिर वह भी प्रकाश शर्मा का साथ छोड़ कर उनके समर्थन में आ जायेंगे । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थक लेकिन यह देख/जान कर परेशान हो रहे हैं कि उन्होंने जैसा जो कुछ सोचा था, वैसा कुछ तो हो नहीं रहा है - बल्कि उल्टा ही हो रहा है । उम्मीदवार के रूप में प्रकाश शर्मा ने भी अपनी अच्छी सक्रियता दिखाई है, और खेमे के नेताओं की तरफ से भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ दिख रहा है । श्याम लाल अग्रवाल के ही कुछेक समर्थकों का कहना है कि पिछली बार हुए समझौते की श्याम लाल अग्रवाल ने जिस तरह से अवमानना की और खेमे के नेताओं को नीचा समझने/दिखाने का एटीट्यूड प्रदर्शित किया, उससे खेमे के नेताओं ने अपने आप को हर्ट व अपमानित महसूस किया है - और इसी की प्रतिक्रिया में वह अब श्याम लाल अग्रवाल को सबक सिखाने के लिए सक्रिय हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि खेमे की पहचान जयपुर की कुछेक बड़ी फर्म से है और जयपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इन्हीं फर्मों का दबदबा रहा है । इन्हीं फर्मों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की कमान जिस तरह से सँभाल ली है, उसके कारण ही श्याम लाल अग्रवाल के लिए मामला गंभीर हो गया है । श्याम लाल अग्रवाल के ही नजदीकियों व समर्थकों का मानना/कहना है कि पिछली बार इन्हीं फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की जीत का प्रमुख कारण था - इसलिए इस बार यदि इनका समर्थन नहीं मिल रहा है, तो श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुश्किल पैदा होना स्वाभाविक ही है । 
प्रकाश शर्मा और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय बड़ी फर्मों से श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए जो चुनौती खड़ी हुई है, वह सेंट्रल काउंसिल के लिए राजस्थान के छह उम्मीदवार होने के कारण और गंभीर हो गई है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार राजस्थान से कुल तीन उम्मीदवार थे, और तीनों जयपुर के थे । इस बार जयपुर के चार उम्मीदवारों के साथ राजस्थान के छह उम्मीदवार हैं । इससे श्याम लाल अग्रवाल को दोहरा नुकसान है - एक तरफ तो उन्हें अपने ही खेमे के प्रमुख लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है; और दूसरी तरफ ज्यादा उम्मीदवार होने से वोट बँटने की जो स्थिति बनेगी, उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा । इससे भी बड़ी समस्या यह है कि राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज के लोगों में ऐंटी-जयपुर वाली जो भावना रहती है, उसका फायदा उठाने के लिए जयपुर से बाहर के दो उम्मीदवार हैं; और इसलिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज के लोगों के लिए ऐंटी-जयपुर वाली भावना के बावजूद जयपुर के उम्मीदवारों के साथ जाने की मजबूरी नहीं है - और इससे जयपुर के उम्मीदवारों को नुकसान होना लाजिमी ही है । यहाँ श्याम लाल अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि दूसरी ब्रांचेज के जो लोग ऐंटी-जयपुर वाली भावना में नहीं भी पड़ेंगे/फँसेंगे, वह भी प्रोफेशनल कारणों से जयपुर की बड़ी फर्मों के कहे के अनुसार ही वोट देना चाहेंगे - और जहाँ श्याम लाल अग्रवाल की तुलना में प्रकाश शर्मा का पलड़ा भारी पड़ता है । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का हालाँकि दावा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन 'दिख' चाहें जो रहा हो, उस समर्थन को वोट में बदलने का मैनेजमेंट चूँकि उनके पास नहीं है - इसलिए वह उनके लिए कोई खतरा नहीं खड़ा कर पायेंगे । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का यह भी दावा है कि बड़ी फर्मों के लोग पार्टियों में तो इकट्ठा हो सकते हैं, लेकिन अपने उम्मीदवार को वोट नहीं दिला सकते । अपने इन दावों को तर्कपूर्ण बनाने हेतु उनका तर्क है कि प्रकाश शर्मा को आज जिन बड़ी फर्मों का समर्थन मिल रहा है, उनका समर्थन उन्हें वर्ष 2009 में भी मिला था - किंतु फिर भी प्रकाश शर्मा चुनाव में जीत नहीं पाए थे । जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के अनुसार, श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों के इन तर्कों में सच्चाई हो सकती है - लेकिन सवाल प्रकाश शर्मा के जीतने या हारने को लेकर नहीं है; सवाल प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल की चुनावी संभावना पर पड़ने वाले असर को लेकर है । श्याम लाल अग्रवाल के ही समर्थकों के बीच चर्चा और स्वीकारोक्ति है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल के लिए चुनावी मुकाबला खासा मुश्किल हो गया है । मजे की बात यह हुई है कि काउंसिल के सदस्य होने के नाते जिन श्याम लाल अग्रवाल की जीत को आसान और सुनिश्चित माना जा रहा था, प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की हवा बनने के चलते उन्हीं श्याम लाल अग्रवाल की जीत को लेकर संदेह बनने लगा है ।

Thursday, October 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राजस्थान में उम्मीदवारों की चुनावी तैयारियों को देखते हुए फिलवक्त गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है

जयपुर । गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर जो गंभीरता दिखाई है - उसके चलते प्रमोद बूब, रोहित माहेश्वरी, सचिन जैन व निर्मल सोनी के लिए चुनावी मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो गया दिख रहा है । यह सातों इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दस सीटों के लिए होने वाले चुनाव में राजस्थान के उम्मीदवार हैं - जिनमें देवेंद्र सोमानी व निर्मल सोनी उदयपुर के हैं तथा बाकी पाँचों जयपुर के हैं । यह छोटी सी जानकारी इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अभी जो नौ सदस्य हैं, उनमें तीन राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं; और इन तीन में से दो जयपुर के हैं तथा एक जयपुर के बाहर के शहर के हैं । दरअसल इसी तर्ज पर उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी जयपुर के दो और जयपुर के बाहर के एक उम्मीदवार तो चुनाव जीत ही जायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इस बार जो एक सीट बढ़ी है, उसके जयपुर को मिल जाने का अनुमान भी लगाया जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों की खामख्याली यह भी है कि रीजनल काउंसिल में इस बार राजस्थान को चार सीटें मिल जायेंगी और यह चारों सीटें जयपुर के हिस्से में आयेंगी । जयपुर के अलावा उदयपुर से चूँकि दो उम्मीदवार हैं, इसलिए जयपुर के कुछेक लोगों को लगता है कि वह दोनों एक दूसरे को ही मार-काट लेंगे, और इसका फायदा जयपुर को मिलेगा । इस तर्क का जबाव लेकिन इसी तर्ज के तर्क से मिल रहा है कि जयपुर में भी तो पाँच उम्मीदवार हैं, क्या वहाँ मार-काट नहीं मचेगी - और उस मार-काट का फायदा उदयपुर के उम्मीदवारों को क्यों नहीं मिलेगा ?
गौर करने वाला तथ्य यह है कि चुनावी नजरिए से सकारात्मक समझी जाने वाली बातों के आधार पर राजस्थान के सातों उम्मीदवारों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है और कोई भी किसी दूसरे से कम साबित होता नहीं दिख रहा है : प्रमोद बूब वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते जयपुर में एक जाना-पहचाना चेहरा हैं; गौतम शर्मा ने नेटवर्किंग अच्छी जमाई हुई है; रोहित माहेश्वरी ने राजस्थान के बाहर की ब्रांचेज में अपनी अच्छी पकड़ बनाई हुई है; रोहित अग्रवाल की युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में अच्छी पैठ है; सचिन जैन को रीजन के जैन वोट मिलने का भरोसा है; देवेंद्र सोमानी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हितों के लिए संघर्ष करने को लेकर पीछे जिस तरह की सक्रियता दिखाई, उसके चलते रीजन में उन्होंने संघर्षशील व्यक्तित्व की पहचान बनाई; निर्मल सोनी पिछले चुनाव में हालाँकि कामयाब नहीं हो पाए थे, किंतु उनका प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह ग्यारहवें नंबर पर थे तथा नितीश अग्रवाल से आगे थे । जाहिर है कि आधार-क्षेत्र के आकलन के अनुसार राजस्थान के सभी सातों उम्मीदवार मजबूत दिखाई दे रहे हैं - लेकिन समस्या की बात यह है कि सातों को तो जीतना नहीं है; इसलिए मुसीबत दरअसल यहाँ से शुरू होती है । कोई भी चुनाव सिर्फ समर्थन के आधार-क्षेत्र की मजबूती के भरोसे नहीं जीता जा सकता है ! चुनाव वास्तव में एक प्रबंधन-कला भी है । चुनाव में जीतता वह है जो अपने समर्थन-आधार को व्यावहारिक तरीके से मैनेज कर पाता है । 
पिछली बार अशोक ताम्बी चुनावी प्रबंधन में कौशल न दिखा पाने के कारण ही जीतते-जीतते हार गए थे; और आशीष व्यास जीतने की तरफ बढ़ते बढ़ते हार की तरफ निकल गए । गौर करने वाला तथ्य यह है कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में अशोक ताम्बी सातवें नंबर पर तथा आशीष व्यास नौवें नंबर पर थे, लेकिन फिर भी काउंसिल में नहीं जा पाए । राजस्थान के इस बार के जो उम्मीदवार हैं, वह अशोक ताम्बी व आशीष व्यास के साथ पिछली बार जो हुआ - चाहें तो उससे सबक ले सकते हैं । पिछली बार के चुनावी नतीजों का विश्लेषण यदि करें, तो एक मजेदार तथ्य यह पता चलता है कि एक नितीश अग्रवाल को छोड़ कर राजस्थान के बाकी सभी उम्मीदवारों को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का टोटा पड़ गया था, और इस कारण उनकी रैंकिंग पीछे गई । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में तीसरे नंबर पर रहने वाले सीएल यादव फाइनली पाँचवें नंबर पर रहे; मनीष बारोद छठे नंबर से पहले तो सातवें नंबर पर खिसके, लेकिन अंततः अपने छठे नंबर को बचाए रखने में कामयाब रहे; अशोक ताम्बी और आशीष व्यास का हाल पहले ही बताया जा चुका है; निर्मल सोनी के लिए भी अपने ग्यारहवें नंबर को बचाये रख पाना संभव नहीं हुआ । एक अकेले नितीश अग्रवाल ने अपनी स्थिति सुधारी थी और वह बारहवें नंबर से आठवें नंबर पर पहुँचे थे । यह नतीजा बताता है कि राजस्थान के उम्मीदवार दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का फायदा उठाने की व्यवस्था करने में पिछड़ जाते हैं । पिछली बार जयपुर के बाहर के शहरों के उम्मीदवार के रूप में नितीश अग्रवाल, आशीष व्यास और निर्मल सोनी का जो प्रदर्शन रहा, वह जयपुर के उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम करता है । 
समझा जाता है कि जयपुर के बाहर के शहरों के तीनों उम्मीदवारों का जो प्रदर्शन रहा था, उसमें जयपुर-विरोधी भावना की महत्वपूर्ण भूमिका थी । उल्लेखनीय है कि राजस्थान में कई ब्रांचेज में लोगों को इस बात पर बड़ी चिढ़ है कि इंस्टीट्यूट की दोनों काउंसिल में सारी सीटें जयपुर के लोग ही हथिया लेना चाहते हैं । इसी चिढ़ के कारण जयपुर के उम्मीदवारों के लिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज में वोट जुटाना मुश्किल हो जाता है; और यही बात जयपुर के बाहर के उम्मीदवारों के लिए वरदान बन जाती है । देवेंद्र सोमानी ने इसी स्थिति का फायदा उठाने की अच्छी तैयारी दिखाई है, और इसी बिना पर उनकी चुनावी स्थिति को मजबूत देखा/पहचाना जा रहा है । उनकी स्थिति को खतरा बस निर्मल सोनी की तरफ से देखा जा रहा है । दोनों चूँकि एक ही शहर के हैं, और निर्मल सोनी का पिछली बार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक ही रहा था - इसलिए कुछेक लोगों को लगता है कि देवेंद्र सोमानी के लिए मामला आसान नहीं होगा । किंतु उदयपुर में लोगों का मानना/कहना है कि निर्मल सोनी को पिछली बार जो वोट मिले थे, वह इसलिए मिले थे क्योंकि पिछली बार वह पूरे रीजन में अकेले माहेश्वरी थे; इस बार राजस्थान में ही चार माहेश्वरी हैं । दावा किया जा रहा है कि उदयपुर में ही निर्मल सोनी को खास समर्थन नहीं है; और उदयपुर में इस बार उनकी उम्मीदवारी के पीछे उन लोगों को देखा/पहचाना जा रहा है, जो पिछली बार उनके खिलाफ थे - और जो इस बार सिर्फ उनके साथ इसलिए हैं क्योंकि उन्हें देवेंद्र सोमानी का विरोध करने के लिए कोई 'मोहरा' चाहिए । देवेंद्र सोमानी ने निर्मल सोनी की तरफ से मिलने वाली चुनौती को पहचाना हुआ है, और उससे निपटने की रणनीति के तहत राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के साथ-साथ मध्य प्रदेश की इंदौर ब्रांच में तथा बिहार की कुछेक ब्रांचेज में समर्थन जुटाने की कोशिशें की हैं । देवेंद्र सोमानी ने अपने पक्ष में 'हवा' तो अच्छी बनाई है, लेकिन फिर भी उनकी सफलता इस बात पर निर्भर होगी कि अपने समर्थन-आधार को वह व्यवस्थित कैसे करते हैं । 
जयपुर के उम्मीदवारों में गौतम शर्मा और रोहित अग्रवाल अपनी चुनावी तैयारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं - इसलिए उनकी चुनावी स्थिति को बाकी उम्मीदवारों की तुलना में फिलवक्त बेहतर देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर में कई लोगों का हालाँकि यह भी मानना/कहना है कि जयपुर के दूसरे उम्मीदवारों का भी समर्थन-आधार चूँकि अच्छा है, इसलिए यदि वह अपनी अपनी चुनावी तैयारियों को लेकर वास्तव में गंभीर हो जाते हैं - तब फिर गौतम शर्मा व रोहित अग्रवाल के लिए मामला उतना आसान शायद नहीं रह जायेगा, जितना आसान वह अभी दिख रहा है । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में राजस्थान का चुनावी परिदृश्य इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यहाँ सीन बहुत कुछ स्पष्ट होने के बावजूद अभी भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं माना/कहा जा सकता है ।