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Friday, November 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच में अपने लोगों को न जितवा पाने की खुन्नस में नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी का उसका अधिकार छिनवा कर प्रकाश शर्मा ने जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गौरव पर तो चोट की ही है, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को भी दाँव पर लगा दिया है

जयपुर । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी द्वारा जयपुर में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की फजीहत का कारण बन रही है । विवादपूर्ण मुद्दों पर नीलेश विकमसे के फैसला न करने के रवैये के चलते इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी बेचारे वी सागर की बड़ी आफत हो जाती है - क्योंकि अक्सर उनकी सुनी नहीं जाती है और कोई भी उन्हें कभी भी लताड़ देता है । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने समझ लिया है कि नीलेश विकमसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बन जरूर गए हैं, लेकिन प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी सँभाल और निभा पाना उनके बस की बात है नहीं, और इसलिए वह इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी को भी कुछ नहीं समझते और मनमानियों पर उतरे रहते हैं । जयपुर में 24/25 नबंवर को हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट में फैली अराजकता का दिलचस्प उदाहरण है । इस नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी को लेकर विवाद है - इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, जयपुर में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट के कार्यक्रम की मेज़बानी इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच को करनी/मिलनी चाहिए; लेकिन मेज़बानी निभा रही है सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल । मजे की बात यह है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में इस बारे में जो विचार-विमर्श हुआ, उसमें भी नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी जयपुर ब्रांच को सौंपने का फैसला हुआ - लेकिन उसके बाद भी मेज़बानी का अधिकार जयपुर ब्राँच से छीन कर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को सौंप दिया गया है ।
यह पूछना बेकार है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीप मिश्र आखिर काउंसिल की मीटिंग में ही हुए फैसले पर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह पूछना इसलिए बेकार है क्योंकि दीप मिश्र को एक 'कठपुतली' चेयरमैन के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, और माना/समझा जाता है कि उन्हें चेयरमैन की कुर्सी दिलवाने वाले ऊपर के लोग जैसे 'नचाते' हैं, वह वैसे ही 'नाचते' हैं । दरअसल दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । ऐसे में, बेचारे दीप मिश्र की मजबूरी और व्यथा को समझा जा सकता है । संदर्भित मामले में दरअसल हुआ यह कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उपस्थित हुए सदस्यों के बहुमत ने मेज़बानी की जिम्मेदारी जयपुर ब्राँच को सौंपने का फैसला लिया; लेकिन इस फैसले को मानने से यह कहते/बताते हुए इंकार कर दिया गया कि काउंसिल का बहुमत इस फैसले से सहमत नहीं है । निश्चित रूप से बहुमत को अपना फैसला लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह तथाकथित बहुमत है कहाँ ? यह तथाकथित बहुमत उस मीटिंग में नजर क्यों नहीं आया, जिस मीटिंग में जयपुर में हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी सुनिश्चित करने का मामला तय हो रहा था ? कम से कम न्याय का दिखावा ही कर लिया जाता और यह तथाकथित बहुमत दूसरी मीटिंग करके पहली मीटिंग के फैसले को पलट देता - लेकिन ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गई । असल में, ऐसा करने में एक समस्या यह भी थी कि तथाकथित बहुमत के ठेकेदार सेंट्रल काउंसिल सदस्य मनु अग्रवाल को अपने साथ मान रहे हैं, लेकिन मनु अग्रवाल जयपुर ब्राँच को मेज़बानी देने का फैसला करने वाली मीटिंग में मौजूद थे और इस फैसले के साथ थे - ऐसे में यदि इसी मुद्दे पर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दूसरी मीटिंग होती तो पहले हुए फैसले को बदलने के लिए मनु अग्रवाल को अपना स्टैंड बदलना होता, और तब उनका दोहरा चरित्र 'रिकॉर्ड' पर आता ।
मनु अग्रवाल के दोहरे चरित्र को रिकॉर्ड पर आने से तो बचा लिया गया है, लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में हुए फैसले को खुद सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा ठेंगा दिखाए जाने की हरकत पर उनकी चुप्पी से उनका दोहरा चरित्र लोगों के सामने तो आ ही गया है । क्योंकि मनु अग्रवाल यदि अभी भी मीटिंग में लिए गए अपने स्टैंड पर कायम हैं तो तथाकथित बहुमत का दावा झूठा है; बहुमत का दावा करने वाले लोग मनु अग्रवाल की चुप्पी के सहारे/भरोसे ही अपने दावे को सच 'दिखा' रहे हैं । बहुमत की इस तरह की मनमानी व्याख्या और दिखावेबाजी से सवाल पैदा हुआ है कि बहुमत यदि 'ऐसे' ही तय होना है, तो फिर मीटिंग आदि की जरूरत ही क्या है ? और क्यों मीटिंग के रिकॉर्ड और मिनिट्स तैयार करने व रखने की जरूरत है ? इस मामले को लेकर इंस्टीट्यूट में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें प्रथम दृष्टया उचित मानते/देखते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने संबंधित पार्टियों से जबाव तलब किया है । वी सागर की इस कार्रवाई से लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में हो रही मनमानियों पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को इस बात से जैसे कोई मतलब ही नहीं है कि उनके प्रेसीडेंट-काल में हर कोई मनमानी कर रहा है, जिसके चलते नाहक ही विवाद पैदा हो रहे हैं - और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो रही है । जयपुर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विजय गुप्ता से भी मेज़बानी के मामले में हो रहे नियम के उल्लंघन को लेकर शिकायत की गई, लेकिन विजय गुप्ता ने जब देखा/पाया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ही कोई फिक्र नहीं है - तो वह ही मामले में क्यों पड़ें ? विजय गुप्ता इसलिए भी मामले से दूर रहना और बचना चाहते हैं, क्योंकि इस सारे झमेले के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं - जिन्हें नाराज करना सेंट्रल काउंसिल की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को नुकसान पहुँचाना हो सकता है ।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम की और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में लिए गए फैसले की ऐसी-तैसी करने के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा की निजी खुन्नस को देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर ब्राँच के सदस्यों के अनुसार, प्रकाश शर्मा को लगता है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके कहे में नहीं चलते हैं, और उनकी बजाए सेंट्रल काउंसिल के ही एक दूसरे सदस्य श्याम लाल अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो देते हैं । सेंट्रल काउंसिल के इन दोनों ही सदस्यों के बीच जयपुर में अपने अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर एक स्वाभाविक सी होड़ रहती ही है; इस होड़ में श्याम लाल गुप्ता का पलड़ा इसलिए भारी दिखता है, क्योंकि जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों में दो - प्रमोद बूब और रोहित रुवाटिया उनके साथ देखे/पहचाने जाते हैं तथा जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके नजदीक हैं । प्रकाश शर्मा को जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीसरे सदस्य गौतम शर्मा का ही समर्थन है । जयपुर ब्राँच और रीजनल काउंसिल में प्रकाश शर्मा भले ही श्याम लाल अग्रवाल से पिछड़ रहे हैं, लेकिन सेंट्रल काउंसिल में सेंट्रल रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सदस्यों में प्रकाश शर्मा का पलड़ा फिलहाल भारी है । खेमेबाजी के चलते कहीं कभी 'जीत' कभी कहीं 'हार' का नजारा बनता/दिखता रहता ही है - लेकिन जयपुर में अपनी 'हार' का बदला लेने के लिए प्रकाश शर्मा इस स्तर तक जायेंगे कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को ही दाँव पर लगा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । जयपुर ब्राँच जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए गौरव का प्रतीक है - राजनीति में आगे/पीछे होता ही रहता है; जयपुर ब्राँच में प्रकाश शर्मा यदि 'अपने' लोगों को नहीं जितवा सके और इस कारण से उन्हें ब्राँच में अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अवसर यदि नहीं मिल पा रहा है, तो इसकी खुन्नस में वह जयपुर ब्राँच का हक़ ही छिनवा देंगे - इसकी कल्पना उनके नजदीकियों और शुभचिंतकों तक ने नहीं की थी । जयपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारियों के साथ प्रकाश शर्मा की नाराजगी हो सकती है, लेकिन उनसे बदला लेने के लिए वह जयपुर ब्राँच की पहचान और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करेंगे - यह प्रकाश शर्मा की छोटी सोच का सुबूत और उदाहरण है ।

Tuesday, November 3, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को मिल रहा जयपुर की बड़ी फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की सीट के लिए सचमुच खतरा बनेगा क्या ?

जयपुर । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को पहले भले ही गंभीरता से नहीं लिया हो, लेकिन अब उन्हें समझ में आने लगा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में उनकी वापसी को मुश्किल बना सकती है । दरअसल यह दोनों एक ही खेमे के हैं; और खेमे की तरफ से श्याम लाल अग्रवाल पिछली बार इस समझौते के तहत ही उम्मीदवार बने थे - कि अबकी बार श्याम लाल अग्रवाल और अगली बार प्रकाश शर्मा उम्मीदवार होंगे । उक्त समझौते के तहत इस बार प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार होना था । श्याम लाल अग्रवाल ने लेकिन पिछली बार हुए समझौते को मानने से इंकार दिया और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों को विश्वास रहा कि मौजूदा सेंट्रल काउंसिल में उनकी जो सक्रियता रही है, उससे उनका अपना एक खेमा बन गया है और इसलिए उन्हें अब पहले वाले खेमे के लोगों के सहयोग/समर्थन की कोई जरूरत नहीं है । इसके अलावा, उन्होंने यह भी माना/समझा कि पहले वाले खेमे के अधिकतर लोग भी उनके साथ सीधे जुड़ गए हैं - इसलिए उन्हें खेमे के नेताओं की परवाह करने की जरूरत नहीं है । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने यह भी माना और कहा/बताया कि पिछली बार हुए समझौते का नाम लेकर खेमे के जो तथाकथित नेता प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाने की जिद पर अड़े हैं, उन्हें जल्दी ही वास्तविकता का अहसास हो जायेगा और फिर वह भी प्रकाश शर्मा का साथ छोड़ कर उनके समर्थन में आ जायेंगे । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थक लेकिन यह देख/जान कर परेशान हो रहे हैं कि उन्होंने जैसा जो कुछ सोचा था, वैसा कुछ तो हो नहीं रहा है - बल्कि उल्टा ही हो रहा है । उम्मीदवार के रूप में प्रकाश शर्मा ने भी अपनी अच्छी सक्रियता दिखाई है, और खेमे के नेताओं की तरफ से भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ दिख रहा है । श्याम लाल अग्रवाल के ही कुछेक समर्थकों का कहना है कि पिछली बार हुए समझौते की श्याम लाल अग्रवाल ने जिस तरह से अवमानना की और खेमे के नेताओं को नीचा समझने/दिखाने का एटीट्यूड प्रदर्शित किया, उससे खेमे के नेताओं ने अपने आप को हर्ट व अपमानित महसूस किया है - और इसी की प्रतिक्रिया में वह अब श्याम लाल अग्रवाल को सबक सिखाने के लिए सक्रिय हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि खेमे की पहचान जयपुर की कुछेक बड़ी फर्म से है और जयपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इन्हीं फर्मों का दबदबा रहा है । इन्हीं फर्मों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की कमान जिस तरह से सँभाल ली है, उसके कारण ही श्याम लाल अग्रवाल के लिए मामला गंभीर हो गया है । श्याम लाल अग्रवाल के ही नजदीकियों व समर्थकों का मानना/कहना है कि पिछली बार इन्हीं फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की जीत का प्रमुख कारण था - इसलिए इस बार यदि इनका समर्थन नहीं मिल रहा है, तो श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुश्किल पैदा होना स्वाभाविक ही है । 
प्रकाश शर्मा और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय बड़ी फर्मों से श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए जो चुनौती खड़ी हुई है, वह सेंट्रल काउंसिल के लिए राजस्थान के छह उम्मीदवार होने के कारण और गंभीर हो गई है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार राजस्थान से कुल तीन उम्मीदवार थे, और तीनों जयपुर के थे । इस बार जयपुर के चार उम्मीदवारों के साथ राजस्थान के छह उम्मीदवार हैं । इससे श्याम लाल अग्रवाल को दोहरा नुकसान है - एक तरफ तो उन्हें अपने ही खेमे के प्रमुख लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है; और दूसरी तरफ ज्यादा उम्मीदवार होने से वोट बँटने की जो स्थिति बनेगी, उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा । इससे भी बड़ी समस्या यह है कि राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज के लोगों में ऐंटी-जयपुर वाली जो भावना रहती है, उसका फायदा उठाने के लिए जयपुर से बाहर के दो उम्मीदवार हैं; और इसलिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज के लोगों के लिए ऐंटी-जयपुर वाली भावना के बावजूद जयपुर के उम्मीदवारों के साथ जाने की मजबूरी नहीं है - और इससे जयपुर के उम्मीदवारों को नुकसान होना लाजिमी ही है । यहाँ श्याम लाल अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि दूसरी ब्रांचेज के जो लोग ऐंटी-जयपुर वाली भावना में नहीं भी पड़ेंगे/फँसेंगे, वह भी प्रोफेशनल कारणों से जयपुर की बड़ी फर्मों के कहे के अनुसार ही वोट देना चाहेंगे - और जहाँ श्याम लाल अग्रवाल की तुलना में प्रकाश शर्मा का पलड़ा भारी पड़ता है । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का हालाँकि दावा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन 'दिख' चाहें जो रहा हो, उस समर्थन को वोट में बदलने का मैनेजमेंट चूँकि उनके पास नहीं है - इसलिए वह उनके लिए कोई खतरा नहीं खड़ा कर पायेंगे । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का यह भी दावा है कि बड़ी फर्मों के लोग पार्टियों में तो इकट्ठा हो सकते हैं, लेकिन अपने उम्मीदवार को वोट नहीं दिला सकते । अपने इन दावों को तर्कपूर्ण बनाने हेतु उनका तर्क है कि प्रकाश शर्मा को आज जिन बड़ी फर्मों का समर्थन मिल रहा है, उनका समर्थन उन्हें वर्ष 2009 में भी मिला था - किंतु फिर भी प्रकाश शर्मा चुनाव में जीत नहीं पाए थे । जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के अनुसार, श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों के इन तर्कों में सच्चाई हो सकती है - लेकिन सवाल प्रकाश शर्मा के जीतने या हारने को लेकर नहीं है; सवाल प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल की चुनावी संभावना पर पड़ने वाले असर को लेकर है । श्याम लाल अग्रवाल के ही समर्थकों के बीच चर्चा और स्वीकारोक्ति है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल के लिए चुनावी मुकाबला खासा मुश्किल हो गया है । मजे की बात यह हुई है कि काउंसिल के सदस्य होने के नाते जिन श्याम लाल अग्रवाल की जीत को आसान और सुनिश्चित माना जा रहा था, प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की हवा बनने के चलते उन्हीं श्याम लाल अग्रवाल की जीत को लेकर संदेह बनने लगा है ।