Showing posts with label Rohit Ruwatia Agarwal. Show all posts
Showing posts with label Rohit Ruwatia Agarwal. Show all posts

Monday, November 19, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते समय जयपुर के चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखी जा रही रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी में आई ऊँची उछाल ने चुनावी मुकाबले को टक्कर का बनाया

जयपुर । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी ने जिस तेजी और अप्रत्याशित तरीके से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी पैठ बनाई है, उसके कारण जयपुर/राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल चुनाव का पूरा नजारा बदलता हुआ नजर आ रहा है और चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है । इस बदलते नजारे का ही परिणाम है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए रोहित अग्रवाल की उम्मीदवारी के सामने आने पर जो लोग उनकी उम्मीदवारी को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, वही लोग अब रोहित अग्रवाल को न सिर्फ मुकाबले में देख रहे हैं - बल्कि कई कई मामलों में वह उन्हें जयपुर के बाकी तीनों उम्मीदवारों से बेहतर स्थिति में भी पा रहे हैं । मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रोहित अग्रवाल को युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच तो अच्छा समर्थन मिल ही रहा है, वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उनकी उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखा रहे हैं और उनमें संभावनाएँ देख रहे हैं । सक्रियता के लिहाज से जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में चूँकि रोहित अग्रवाल का ही पलड़ा भारी देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए भी उनकी उम्मीदवारी लोगों के बीच महत्त्वपूर्ण हो उठी है । जयपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों के लोगों का भी मानना और कहना है कि जयपुर/राजस्थान के चारों उम्मीदवारों में एक अकेले रोहित अग्रवाल ही चुनाव को चुनाव की तरह गंभीरता से 'लड़ते' दिख रहे हैं; एक अकेले वही हैं जिनके पास ऐसे समर्थकों/शुभचिंतकों की टीम है जो वास्तव में चुनावी मैदान में सक्रिय है - और इसी का उन्हें फायदा मिलता दिख रहा है । चुनावी राजनीति की बारीकियों को समझने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच बढ़ते दिख रहे उत्साह को वोट में बदलने की चुनौती रोहित अग्रवाल के सामने अभी बाकी है ।
जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में शामिल और सक्रिय रहे अनुभवी लोगों का मानना और बताना है कि ऑरा (आभामंडल) के लिहाज से रोहित अग्रवाल बाकी तीनों उम्मीदवारों से कमजोर पड़ते हैं; उनकी सबसे बड़ी समस्या उनका युवा होना है । युवा होने के कारण उनकी उम्मीदवारी को लोग आसानी से तवज्जो देते हुए नहीं दिखते हैं । रोहित अग्रवाल की यही कमजोरी लेकिन उनके लिए वरदान बनती नजर आ रही है । इसमें काफी योगदान हालाँकि परिस्थितियों का भी है । परिस्थितियों ने दो तरह से रोहित अग्रवाल की 'मदद' की है । राजस्थान विधानसभा चुनाव में तमाम वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद जिस तरह सचिन पायलट का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, उसके चलते चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी यह भावना जोर मार रही है कि एक युवा नेता को यदि प्रदेश की बागडोर सौंपी जा सकती है, तो इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की एक सीट क्यों नहीं दी जा सकती है ? इसके अलावा, सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले बाकी तीन उम्मीदवार 'बड़े' तो हैं, लेकिन वह उस कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसमें कहा गया है - 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खुजूर ...।इसका फायदा रोहित अग्रवाल को मिलता बताया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि बाकी तीन उम्मीदवारों में सतीश गुप्ता दो बार पहले सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं, और पिछली व तीसरी बार पीछे हट चुके हैं । उनके बड़े होने पर उनका यह 'रिकॉर्ड' भारी है और इस बार भी वह कोई चमत्कार करते हुए नहीं दिख रहे हैं । प्रमोद बूब पिछली बार उम्मीदवार के रूप में कोई सक्रियता दिखाये बिना सबसे ज्यादा वोटों से रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते थे; इस बार सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में भी वह उसी ढर्रे पर हैं - इस बीच लेकिन लोगों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वह बड़े तो हैं, लेकिन हैं 'पेड़ खुजूर' । रीजनल काउंसिल में उनकी कोई सकारात्मक भूमिका नहीं दिखी; कुछेक मुद्दों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के साथ उनकी जो 'मुठभेड़े' हुईं भी, वह निजी लड़ाई/खुन्नस के रूप में ज्यादा नजर आईं - और व्यापक सरोकार से जुड़ती हुई नहीं दिखीं । उम्मीदवार के रूप में वह लोगों से जुड़ते हुए और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु लोगों तक अपनी पहुँच बनाते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर जयपुर में ही कोई खास उत्साह नहीं देखा/पहचाना जा रहा है ।  
प्रकाश शर्मा तक के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट को बचाना मुश्किल हो रहा है । आमतौर पर माना/समझा जाता है कि काउंसिल सदस्य तो अपनी सीट आसानी से निकाल ही लेता है; लेकिन पिछली बार वेस्टर्न और ईस्टर्न रीजन में एक एक सेंट्रल काउंसिल सदस्य को अपनी अपनी सीट गँवानी पड़ी थी, और सेंट्रल रीजन में भी 'स्टार' उम्मीदवार समझे जाने वाले अनुज गोयल अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाने में असफल रहे थे । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि काउंसिल सदस्य होना चुनावी जीत की कोई गारंटी नहीं है । प्रकाश शर्मा तो पिछला चुनाव ही जैसे-तैसे मुश्किल से जीते थे । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में उन्होंने दिखाया/जताया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट वह भले ही 'बड़े' हैं, लेकिन सोच व व्यवहार के मामले में वह बहुत 'छोटे' हैं । अपने व्यवहार और रवैये से प्रकाश शर्मा ने जो नकारात्मक पहचान बनाई है, उसके कारण उनके नजदीकियों व समर्थकों को ही उनकी जीत को लेकर आशंका है । मजे की बात है कि जयपुर और राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के अच्छे अच्छे जानकर भी विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों के बारे में अनुमान लगा पाने में गच्चा खा रहे हैं । वह यह तो मान रहे हैं कि जयपुर/राजस्थान की जो वोटिंग 'ताकत' है, उसके चलते जयपुर के दो उम्मीदवार तो सेंट्रल काउंसिल में पहुँच ही जायेंगे - लेकिन वह दो उम्मीदवार कौन से होंगे, इस सवाल पर उनकी बोलती बंद हो जाती है । विजेता हो सकने वाले उम्मीदवारों को लेकर बनी इस असमंजसता के चलते भी रोहित अग्रवाल के लिए तेजी से मुकाबले में आना आसान हुआ है । नामांकन होने के समय उन्हें चारों उम्मीदवारों में सबसे पीछे देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन परिस्थितिवश मिले अवसर को अपनी सक्रियता से इस्तेमाल करके रोहित अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी को जो ऊँची उछाल दी है, उससे उनकी उम्मीदवारी टक्कर में आ गई है - और इस तथ्य ने बाकी तीनों उम्मीदवारों तथा उनके समर्थकों को मुसीबत में डाल दिया है ।

Monday, February 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत वाले सत्ता खेमे के सदस्यों की चालबाजियों को पिटता देख उम्मीद बनी है कि इस बार बहुमत के समर्थन वाला सदस्य ही चेयरमैन बनेगा, और वह ज्ञान चंद्र मिश्र होंगे

कानपुर । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव करने के लिए अल्पमत वाले सत्ता खेमे ने काउंसिल सदस्यों की मीटिंग 22 फरवरी को करने की जो योजना बनाई थी, उसके फेल हो जाने के कारण अभी के सत्ता खेमे के सदस्यों के सामने सत्ता से बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है - और सभी को विश्वास है कि सत्ता खेमे के सदस्यों तथा उनके समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने यदि कोई घटिया हरकत नहीं की तो चेयरमैन पद पर ज्ञान चंद्र मिश्र की ताजपोशी हो जाएगी । यह उम्मीद तो हालाँकि पहले से ही थी कि प्रकाश शर्मा, मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल व केमिशा सोनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों ने एक्स-ऑफिसो के रूप में अल्पमत वाले चेयरमैन को चुनवाने की जो हरकत पिछली बार की थी, उसे वह इस बार नहीं दोहरायेंगे । दरअसल इस हरकत के लिए उनकी भारी फजीहत हुई और अल्पमत वाला चेयरमैन जिस तरह सिर्फ एक कठपुतली बन कर रह गया और काउंसिल के कामकाज का बेड़ागर्क कर गया, उसके लिए लोगों ने चेयरमैन को कम तथा उन्हें समर्थन देने वाले चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को ज्यादा कोसा । चुनावी वर्ष में ऐसी फजीहत झेलना उनके लिए आत्मघाती हो सकता है, इसलिए अब की बार उनके रीजनल काउंसिल की चुनावी राजनीति से दूर रहने की उम्मीद की गई थी - और लोगों की यह उम्मीद काउंसिल सदस्यों की 22 फरवरी की मीटिंग को लेकर छिड़े विवाद में उनके रवैये से पूरी होती हुई दिखी भी । मजे की बात यह देखने में आई कि पूरे वर्ष सत्ताधारियों की जो फजीहत हुई, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य तो सबक लेते हुए दिखे, लेकिन रीजनल काउंसिल के सदस्य पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए नजर आए । मीटिंग के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करके उन्होंने यही साबित किया कि उनके लिए मानवीयता का कोई मूल्य और महत्ता नहीं है, और अपने साथ के लोगों के दुःख में भी वह अपना फायदा लेने/उठाने का काम कर सकते हैं ।
22 फरवरी को दरअसल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के ही एक सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं का कार्यक्रम था । रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्यों ने आकलन किया कि रोहित रुवाटिया तो वहाँ व्यस्त होंगे, और इस कारण से काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं हो सकेंगे - इससे विरोधी खेमे की ताकत घटेगी, जिसका फायदा वह उठा सकेंगे । काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने ही साथी की माँ के निधन में राजनीतिक फायदा उठा लेने का मौका बनाने की यह हरकत साबित करती है कि सत्ता खेमे के सदस्यों के लिए राजनीति और कुर्सी ही सर्वोपरि है । अन्य कुछेक लोगों के साथ-साथ पिछले चेयरमैन अभय छाजेड़ ने भी काउंसिल के सेक्रेटरी मुकेश बंसल से अनुरोध किया कि वह जानते तो हैं ही कि 22 फरवरी को रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं हैं, इसलिए उस दिन मीटिंग न रखें, बाद की किसी भी तारीख में मीटिंग रख लें । इसके बावजूद मुकेश बंसल ने 22 फरवरी की ही मीटिंग रख ली और उसका नोटिस निकाल दिया । इस पर बबाल होना ही था, और वह हुआ भी । मुकेश बंसल की तरफ से सुना गया कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा ने उन्हें आश्वस्त किया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने को लेकर जो हाय/हल्ला है, उसे अनसुना करो - क्योंकि यह हाय/हल्ला करने वाले लोग इससे ज्यादा और कुछ कर भी नहीं सकेंगे । प्रकाश शर्मा को दरअसल गौतम शर्मा को रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की टीम में फिट करना था, और उन्हें लगता रहा कि 22 फरवरी को मीटिंग करके ही वह इस काम को कर सकते हैं । लेकिन जल्दी ही प्रकाश शर्मा और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की उनकी चालबाजी कामयाब हो नहीं पाएगी ।
दरअसल काउंसिल सदस्य रोहित रुवाटिया की माँ की तेरहवीं वाले दिन ही मीटिंग करने को लेकर रीजन के लोगों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसके चलते सेंट्रल काउंसिल में प्रकाश शर्मा के संगी-साथियों ने इस मुद्दे पर उनसे अलग राय रखना शुरू की । इससे जो माहौल बना, उससे 22 फरवरी को मीटिंग करके अपना राजनीतिक हित साधने वाले काउंसिल सदस्यों को समझ में आ गया कि 22 फरवरी को मीटिंग करने की जिद करके कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लोगों के बीच बदनामी भी मिले, और कोई पद भी न मिले । लिहाजा 22 फरवरी की मीटिंग स्थगित करके, मीटिंग के लिए 28 फरवरी की नई तारीख घोषित की गई । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सत्ता खेमे में 10 में से कुल चार सदस्य ही हैं; पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के जिन चार सदस्यों के समर्थन से इन्होंने अल्पमत में होने के बावजूद सत्ता पा ली थी, वह इस बार पिछली बार जैसी भूमिका निभाने को तैयार नहीं नजर आ रहे हैं । इससे लग रहा है कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को बहुमत के समर्थन वाला चेयरमैन मिल जायेगा । बहुमत वाले खेमे में चेयरमैन पद के लिए ज्ञान चंद्र मिश्र के नाम पर सहमति है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि 28 फरवरी को ज्ञान चंद्र मिश्र नए चेयरमैन चुन ही लिए जायेंगे ।

Thursday, March 16, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा होने की घोषणा से सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह की फजीहत हुई और प्रकाश शर्मा की मुसीबत बढ़ी

कानपुर । मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने की जो हरकत की, उसके निशान मिटाने के लिए इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कदम तो उठाया है - लेकिन मुकेश कुशवाह की हरकतों के दाग इतने गहरे हैं कि लगता नहीं है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के प्रयासों के बावजूद वह पूरी तरह मिट पायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी की भूमिका निभा रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्य मुकेश कुशवाह ने अपनी मनमानीपूर्ण बेईमानी से दीप कुमार मिश्र को चेयरमैन 'चुनवाने' का जो कांड किया, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने उसे रद्द कर दिया है - और चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब उसकी किसी रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराने का निर्णय हुआ है । इंस्टीट्यूट के इतिहास में इस काले अध्याय को जोड़ने की जिम्मेदारी के लिए मुकेश कुशवाह को याद किया जायेगा । इस कलंक-कथा की खास बात यह है कि मुकेश कुशवाह जब इसे 'लिख' ही रहे थे, तब ही इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से साफ शब्दों में बता दिया गया था कि वह जो कर रहे हैं - वह नियम विरुद्ध है और गलत है; मुकेश कुशवाह उस समय लेकिन पद की गर्मी और अहंकार में इस कदर जकड़े हुए थे कि उन्होंने साफ साफ लिखे उन शब्दों को कोई अहमियत ही नहीं दी ।
मुकेश कुशवाह को दरअसल उम्मीद थी कि वह जो फैसला कर देंगे, इंस्टीट्यूट प्रशासन अंततः उसे स्वीकार कर ही लेगा । मुकेश कुशवाह की तरफ से उस समय दावा किया भी गया था कि उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । अनिल भंडारी से मिले आश्वासन के भरोसे ही मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से नियमों के मिले हवाले की परवाह करने की जरूरत नहीं समझी । मुकेश कुशवाह अपनी कारस्तानी को लेकर इसलिए भी आश्वस्त थे क्योंकि उनके किए-धरे को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन मिला था । किंतु किसी का भी आश्वासन और समर्थन उनके काम नहीं आया । लोगों का कहना/मानना है कि दरअसल मुकेश कुशवाह की जैसी छवि है, उसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को लगा होगा कि मुकेश कुशवाह की इस हरकत पर उन्होंने यदि कोई कार्रवाई नहीं की तो मुकेश कुशवाह का हौंसला बढ़ेगा और फिर वह अपनी कारस्तानियों से इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को बदनाम करते रहेंगे । इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह द्धारा मनमानीपूर्ण बेईमानी से कराए गए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव को रद्द करके उक्त चुनाव को दोबारा कराने का आदेश दिया गया है ।
इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इंस्टीट्यूट के इतिहास और उसकी पहचान/प्रतिष्ठा पर मुकेश कुशवाह द्धारा पोती गई कालिख को इस तरह से पौंछने की कोशिश तो की गई है, लेकिन उसकी यह कोशिश अधिकतर लोगों को आधी-अधूरी भी लग रही है । लोगों का मानना/कहना है कि सिर्फ चेयरमैन का ही नहीं, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का पूरा चुनाव ही दोबारा होना चाहिए । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में पहले चेयरमैन का चुनाव होता है, और यह चुनाव बाकी पदों के लिए होने वाले चुनाव की भावभूमि और केमिस्ट्री तय करता है - इसलिए चेयरमैन के चुनाव में हुई बेईमानी ने बाकी सभी चुनावों पर अपना असर डाला है, इसलिए इंस्टीट्यूट प्रशासन यदि वास्तव में न्याय करना चाहता है तो उसे पूरा चुनाव दोबारा कराना चाहिए; अन्यथा चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाला चुनाव महज खानापूर्ति करना होगा । मुकेश कुशवाह की मनमानीपूर्ण बेईमानी के चलते चेयरमैन पद पाने से वंचित रहे रोहित रुवाटिया अग्रवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी लगता है कि तीन सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के समर्थन के बूते मुकेश कुशवाह जो बेईमानी कर सके, उसके चलते दोबारा होने वाले चुनाव में 'वास्तविक चुनाव' नहीं हो सकेगा - और रोहित रुवाटिया अग्रवाल के साथ सचमुच न्याय नहीं हो पायेगा । समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से रोहित रुवाटिया अग्रवाल को सलाह दी जा रही है कि उन्हें सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सभी पदों का चुनाव दोबारा कराने हेतु इंस्टीट्यूट प्रशासन को राजी करने के लिए उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । माना/समझा जाता है कि रद्द हुए चुनाव में प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को समर्थन नहीं दिया था । इसके लिए जयपुर और राजस्थान में उन्हें भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा है । लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्होंने जयपुर और राजस्थान का वास्ता देकर ही समर्थन जुटाया था, और अगले चुनाव में भी उन्हें यही 'वास्ता' देना पड़ेगा - ऐसे में जयपुर और राजस्थान को चेयरमैन 'मिलने' के मौके के साथ उन्होंने धोखा क्यों कर दिया ? प्रकाश शर्मा समय के साथ जयपुर और राजस्थान के लोगों के 'घाव' के भरने का इंतजार कर रहे थे कि दोबारा चुनाव होने/कराने की घोषणा ने उनके घावों को कुरेद कर फिर से ताजा कर दिया है । प्रकाश शर्मा और उनके नजदीकियों को यह डर सता रहा है कि चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव में रोहित रुवाटिया अग्रवाल यदि नहीं जीते, तो जयपुर और राजस्थान में लोग इसके लिए प्रकाश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे और इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है ।
सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के लिए दोबारा होने वाले चुनाव का नतीजा क्या होगा, इसका जबाव तो जल्दी ही मिल जायेगा - लेकिन दोबारा चुनाव होने की स्थिति ने मुकेश कुशवाह की बेईमानीपूर्ण कारस्तानी पर जो मोहर लगाई है और प्रकाश शर्मा के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसने सेंट्रल रीजन में एक दिलचस्प नजारा खड़ा किया है ।

Wednesday, March 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में मुकेश कुशवाह की नियम विरुद्ध मनमानी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे असहाय क्यों बने हुए हैं ?

कानपुर । दीप कुमार मिश्र को बेईमानीपूर्ण तरीके से सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन 'चुनवा' कर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के नए बने प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को खासे धर्मसंकट में फँसा दिया है । उन पर एक तरफ मुकेश कुशवाह की कारस्तानी को अनदेखा करने का दबाव है, तो दूसरी तरफ प्रेसीडेंट पद के रूप में अपने पद व इंस्टीट्यूट की गरिमा को बचाने की चुनौती है । मुकेश कुशवाह की तरफ से दावा सुना गया है कि उन्होंने नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । मुकेश कुशवाह इसलिए भी आश्वस्त हैं क्योंकि उनकी कारस्तानी को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नीलेश विकमसे के जो अन्य नजदीकी हैं, उनका कहना लेकिन यह भी है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह ने जो हरकत की है - उसे लेकर नीलेश विकमसे खासे परेशान भी हैं और उनका मानना है कि इस तरह की हरकतों पर वह यदि चुप रहे तो मुकेश कुशवाह जैसे लोग इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को अपनी कारस्तानी से बदनाम करते रहेंगे । 
मुकेश कुशवाह सहित सेंट्रल रीजन के चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मनमानीभरी दादागिरी का पहला लक्षण तो तब दिखा, जब उन्होंने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में वोट डालने का फैसला किया । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को वोटिंग में शामिल नहीं होना चाहिए, और रीजनल काउंसिल के सदस्यों को ही पदाधिकारी चुनने देना चाहिए । मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा व केमिशा सोनी ने लेकिन लगता है कि नैतिकता का पाठ पढ़ा ही नहीं है । इनकी बदकिस्मती लेकिन यह रही कि निर्लज्जता के साथ नैतिकता के पाठ की अनदेखी करने के बाद भी चेयरमैन पद के इनके उम्मीदवार दीप कुमार मिश्र को जीत नहीं मिल सकी । पंद्रह वोटों में दीप कुमार मिश्र और चेयरमैन पद के दूसरे उम्मीदवार रोहित रुवाटिया अग्रवाल को पहली वरीयता के सात-सात वोट मिले और एक वोट में पहली वरीयता का वोट नहीं दिया गया था, जबकि दूसरी वरीयता का वोट दीप कुमार मिश्र के लिए था । तर्कशील तरीके से देखें तो जो वोटर दीप कुमार मिश्र को दूसरी वरीयता का वोट दे रहा है, उसका पहली वरीयता का वोट रोहित रुवाटिया अग्रवाल के लिए ही रहा होगा - जो किसी तकनीकी गड़बड़ी के चलते मार्क नहीं हो पाया होगा । इंस्टीट्यूट का कामकाज लेकिन तर्कशीलता के आधार पर नहीं चलता है, वह ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही काम करेगा - और इसके लिए ही नियम-कानून बनाए गए हैं । इंस्टीट्यूट के नियम-कानून के अनुसार, इस पंद्रहवें वोट को रद्द होना चाहिए था ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में लेकिन इंस्टीट्यूट के नियम-कानून की अनदेखी करते हुए इस पंद्रहवें वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ कर उन्हें विजेता घोषित कर दिया । इससे पहले मुकेश कुशवाह ने एक हरकत यह और की थी कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल को मिले एक वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ दिया था, उनकी यह हरकत लेकिन तुरंत से पकड़ में आ गई थी । रद्द हो जाने वाले वोट को गिनती में शामिल करने के मामले में भी मुकेश कुशवाह की मनमानी का आलम यह रहा कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन अभय छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट के मुख्यालय से इस मामले में निर्देश लिया, तो संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से ईमेल के जरिये उनसे स्पष्ट कहा गया कि नियमानुसार उक्त वोट रद्द होगा - मुकेश कुशवाह ने लेकिन उनके फैसले को भी मानने से इंकार करते हुए दीप कुमार मिश्र को विजेता घोषित कर दिया । मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी  के रूप में जिस निर्लज्जता के साथ इंस्टीट्यूट के नियम की ऐसीतैसी की है, उसके कारण वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के पात्र बनते हैं - लेकिन उनका आत्मविश्वास दिखाता है कि इस मामले में उनकी इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के साथ सेटिंग हो चुकी है, और वह आश्वस्त हैं कि उनकी हरकत के चलते न तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी और न उनका फैसला ही बदला जायेगा ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में जो हरकत की है, उसे जयपुर ब्रांच की राजनीति के संदर्भ में बदले की कार्रवाई के रूप में भी देखा/बताया जा रहा है । जयपुर ब्रांच पर कब्जे की लड़ाई में प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा की जोड़ी को श्याम लाल अग्रवाल, प्रमोद कुमार बूब व रोहित रुवाटिया अग्रवाल की तिकड़ी से मात खानी पड़ रही है । प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को अपनी तरफ करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन उन्हें किसी भी तरह से सफलता नहीं मिली । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में रीजनल काउंसिल के सदस्यों में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा जब भारी दिखा, तो प्रकाश शर्मा को उन्हें दबाव में लेकर जयपुर ब्रांच पर कब्जे को लेकर सौदेबाजी करने का मौका मिला । चर्चा है कि प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को साफ बता दिया था कि जयपुर ब्रांच के मामले में वह यदि उनके ग्रुप का समर्थन नहीं करेंगे, तो उन्हें किसी भी कीमत पर रीजनल काउंसिल का चेयरमैन नहीं बनने दिया जायेगा । जो हुआ, उसके जरिये प्रकाश शर्मा ने अपनी धमकी को सच साबित करके दिखा दिया । उल्लेखनीय है कि जयपुर को आठ वर्ष बाद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन पद मिलने जा रहा था - जिसे लेकिन मुकेश कुशवाह, मनु शर्मा, केमिशा सोनी की मदद से प्रकाश शर्मा व गौतम शर्मा की ब्लैकमेल की राजनीति ने संभव नहीं होने दिया ।

Friday, November 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की चुनावी लड़ाई में रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता से गौतम शर्मा को रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की अपनी योजना में पलीता लगता दिख रहा है

जयपुर । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जिस तरह की सक्रियता दिखाई हुई है, उसके चलते गौतम शर्मा के लिए रीजनल काउंसिल में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य दूर जाता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि उम्मीदवार के रूप में गौतम शर्मा ने चुनाव में अपनी अच्छी पकड़ प्रदर्शित की है, और राजस्थान के उम्मीदवारों में उन्हें सबसे आगे देखा/पहचाना जा रहा है । उनके इस प्रदर्शन को देखते हुए उनके कुछेक समर्थक दावा करने लगे कि गौतम शर्मा राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे रीजन में सबसे ज्यादा वोट पायेंगे और रीजन में सबसे आगे रहेंगे ।
रीजन में सबसे आगे रहने वाले उम्मीदवार के रूप में हालाँकि अभी तक भोपाल के अभय छाजेड़ को देखा/पहचाना जा रहा है । अभय छाजेड़ अकेले उम्मीदवार हैं, जो सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा टर्म में सदस्य होते हुए अगली टर्म के लिए चुनावी मैदान में हैं । इस नाते, इस बार के चुनावी खेल में अभय छाजेड़ को न सिर्फ सबसे सुरक्षित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, बल्कि नंबर एक की पोजीशन पर भी माना जाता रहा है । लेकिन जैसे जैसे चुनाव अभियान ने गर्मी पकड़ी, वैसे वैसे गौतम शर्मा के भी 'भाव' बढ़े और नंबर एक की पोजीशन के लिए उन्हें भी दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा । जयपुर में उनके समर्थकों की तरफ से सुनाई देने लगा कि काउंसिल में सदस्य होने के नाते रीजन में अभय छाजेड़ की पहचान का दायरा भले ही बड़ा हो, लेकिन गौतम शर्मा ने अपने चुनावी प्रबंधन को जिस तरह से मैनेज किया है और खास तौर से जयपुर व राजस्थान में अपने लिए समर्थन जुटाया है, उसके चलते रीजनल काउंसिल के चुनाव में उनके लिए वोट प्राप्त करने के मामले में अभय छाजेड़ से आगे निकलना मुश्किल नहीं होगा । 
किंतु जयपुर में गौतम शर्मा के जो समर्थक अभी कल तक यह दावा करते हुए सुने जा रहे थे, उन्हीं में से कुछेक समर्थक अब यह आशंका व्यक्त करने लगे हैं कि रोहित रुवाटिया के कारण गौतम शर्मा का रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य खतरे में पड़ सकता है । गौतम शर्मा के ही समर्थकों का कहना है कि राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के लोगों से उन्हें जो फीडबैक मिल रहा है, उसमें यह बात कॉमन रूप से सामने आ रही है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज में अपने लिए समर्थन पैदा किया है । इसे उनके आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए जा रहे प्रचार/संपर्क अभियान के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपने आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए गए प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित तो कराया है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि इस परिचय से उन्हें वोट भी मिलेंगे ही । तकनीकी रूप से यह बात सच तो है, लेकिन यह एक ऐसा सच है जो प्रत्येक उम्मीदवार पर लागू होता है । उम्मीदवार अपने प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित कराता है, और कोई नहीं सकता कि इस परिचय के चलते उसे वोट सचमुच में कितने मिलेंगे । यह बात रोहित रुवाटिया अग्रवाल के बारे में भी सच है, तो गौतम शर्मा के बारे में भी सच है, और अन्य दूसरे उम्मीदवार भी इस सच के दायरे में हैं । 
गौतम शर्मा के समर्थकों को डर दरअसल यह जान/देख कर हुआ कि प्रचार/संपर्क अभियान में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा सबसे भारी है; हालाँकि कुछेक लोग उनकी बातों और उनके दावों को लेकर उनके मैच्योरिटी लेबल के बारे में सवाल जरूर उठा रहे हैं - लेकिन इससे उनकी चुनावी संभावना पर कोई प्रतिकूल असर पड़ता नहीं दिख रहा है । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच जिस तरह का परिचय बनाया है, उसके कारण तो गौतम शर्मा के लिए अपना लक्ष्य पाना मुश्किल बना ही है; अग्रवाल वोटों के मामले में भी रोहित रुवाटिया अग्रवाल उनकी योजना को लंगड़ी लगाते दिख रहे हैं । अग्रवाल समाज में प्रभाव रखने वाले एक बड़े नेता ओपी अग्रवाल का समर्थन जुटा कर गौतम शर्मा ने अग्रवालों का वोट जुटाने का जो जुगाड़ किया था, रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपनी सक्रियता से उनके उस जुगाड़ में भारी सेंध लगा दी है । हर उम्मीदवार का अपना अपना समर्थन आधार होता है, और हर समर्थन-आधार में एक से अधिक उम्मीदवारों को खपाने की क्षमता भी होती है; इसलिए रोहित रुवाटिया अग्रवाल की सक्रियता गौतम शर्मा को कोई सीधी चुनौती नहीं देती है - लेकिन खुद गौतम शर्मा के समर्थकों का ही कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की गौतम शर्मा की योजना में पलीता जरूर लगाती दिख रही है ।

Thursday, October 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राजस्थान में उम्मीदवारों की चुनावी तैयारियों को देखते हुए फिलवक्त गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है

जयपुर । गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर जो गंभीरता दिखाई है - उसके चलते प्रमोद बूब, रोहित माहेश्वरी, सचिन जैन व निर्मल सोनी के लिए चुनावी मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो गया दिख रहा है । यह सातों इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दस सीटों के लिए होने वाले चुनाव में राजस्थान के उम्मीदवार हैं - जिनमें देवेंद्र सोमानी व निर्मल सोनी उदयपुर के हैं तथा बाकी पाँचों जयपुर के हैं । यह छोटी सी जानकारी इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अभी जो नौ सदस्य हैं, उनमें तीन राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं; और इन तीन में से दो जयपुर के हैं तथा एक जयपुर के बाहर के शहर के हैं । दरअसल इसी तर्ज पर उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी जयपुर के दो और जयपुर के बाहर के एक उम्मीदवार तो चुनाव जीत ही जायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इस बार जो एक सीट बढ़ी है, उसके जयपुर को मिल जाने का अनुमान भी लगाया जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों की खामख्याली यह भी है कि रीजनल काउंसिल में इस बार राजस्थान को चार सीटें मिल जायेंगी और यह चारों सीटें जयपुर के हिस्से में आयेंगी । जयपुर के अलावा उदयपुर से चूँकि दो उम्मीदवार हैं, इसलिए जयपुर के कुछेक लोगों को लगता है कि वह दोनों एक दूसरे को ही मार-काट लेंगे, और इसका फायदा जयपुर को मिलेगा । इस तर्क का जबाव लेकिन इसी तर्ज के तर्क से मिल रहा है कि जयपुर में भी तो पाँच उम्मीदवार हैं, क्या वहाँ मार-काट नहीं मचेगी - और उस मार-काट का फायदा उदयपुर के उम्मीदवारों को क्यों नहीं मिलेगा ?
गौर करने वाला तथ्य यह है कि चुनावी नजरिए से सकारात्मक समझी जाने वाली बातों के आधार पर राजस्थान के सातों उम्मीदवारों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है और कोई भी किसी दूसरे से कम साबित होता नहीं दिख रहा है : प्रमोद बूब वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते जयपुर में एक जाना-पहचाना चेहरा हैं; गौतम शर्मा ने नेटवर्किंग अच्छी जमाई हुई है; रोहित माहेश्वरी ने राजस्थान के बाहर की ब्रांचेज में अपनी अच्छी पकड़ बनाई हुई है; रोहित अग्रवाल की युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में अच्छी पैठ है; सचिन जैन को रीजन के जैन वोट मिलने का भरोसा है; देवेंद्र सोमानी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हितों के लिए संघर्ष करने को लेकर पीछे जिस तरह की सक्रियता दिखाई, उसके चलते रीजन में उन्होंने संघर्षशील व्यक्तित्व की पहचान बनाई; निर्मल सोनी पिछले चुनाव में हालाँकि कामयाब नहीं हो पाए थे, किंतु उनका प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह ग्यारहवें नंबर पर थे तथा नितीश अग्रवाल से आगे थे । जाहिर है कि आधार-क्षेत्र के आकलन के अनुसार राजस्थान के सभी सातों उम्मीदवार मजबूत दिखाई दे रहे हैं - लेकिन समस्या की बात यह है कि सातों को तो जीतना नहीं है; इसलिए मुसीबत दरअसल यहाँ से शुरू होती है । कोई भी चुनाव सिर्फ समर्थन के आधार-क्षेत्र की मजबूती के भरोसे नहीं जीता जा सकता है ! चुनाव वास्तव में एक प्रबंधन-कला भी है । चुनाव में जीतता वह है जो अपने समर्थन-आधार को व्यावहारिक तरीके से मैनेज कर पाता है । 
पिछली बार अशोक ताम्बी चुनावी प्रबंधन में कौशल न दिखा पाने के कारण ही जीतते-जीतते हार गए थे; और आशीष व्यास जीतने की तरफ बढ़ते बढ़ते हार की तरफ निकल गए । गौर करने वाला तथ्य यह है कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में अशोक ताम्बी सातवें नंबर पर तथा आशीष व्यास नौवें नंबर पर थे, लेकिन फिर भी काउंसिल में नहीं जा पाए । राजस्थान के इस बार के जो उम्मीदवार हैं, वह अशोक ताम्बी व आशीष व्यास के साथ पिछली बार जो हुआ - चाहें तो उससे सबक ले सकते हैं । पिछली बार के चुनावी नतीजों का विश्लेषण यदि करें, तो एक मजेदार तथ्य यह पता चलता है कि एक नितीश अग्रवाल को छोड़ कर राजस्थान के बाकी सभी उम्मीदवारों को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का टोटा पड़ गया था, और इस कारण उनकी रैंकिंग पीछे गई । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में तीसरे नंबर पर रहने वाले सीएल यादव फाइनली पाँचवें नंबर पर रहे; मनीष बारोद छठे नंबर से पहले तो सातवें नंबर पर खिसके, लेकिन अंततः अपने छठे नंबर को बचाए रखने में कामयाब रहे; अशोक ताम्बी और आशीष व्यास का हाल पहले ही बताया जा चुका है; निर्मल सोनी के लिए भी अपने ग्यारहवें नंबर को बचाये रख पाना संभव नहीं हुआ । एक अकेले नितीश अग्रवाल ने अपनी स्थिति सुधारी थी और वह बारहवें नंबर से आठवें नंबर पर पहुँचे थे । यह नतीजा बताता है कि राजस्थान के उम्मीदवार दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का फायदा उठाने की व्यवस्था करने में पिछड़ जाते हैं । पिछली बार जयपुर के बाहर के शहरों के उम्मीदवार के रूप में नितीश अग्रवाल, आशीष व्यास और निर्मल सोनी का जो प्रदर्शन रहा, वह जयपुर के उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम करता है । 
समझा जाता है कि जयपुर के बाहर के शहरों के तीनों उम्मीदवारों का जो प्रदर्शन रहा था, उसमें जयपुर-विरोधी भावना की महत्वपूर्ण भूमिका थी । उल्लेखनीय है कि राजस्थान में कई ब्रांचेज में लोगों को इस बात पर बड़ी चिढ़ है कि इंस्टीट्यूट की दोनों काउंसिल में सारी सीटें जयपुर के लोग ही हथिया लेना चाहते हैं । इसी चिढ़ के कारण जयपुर के उम्मीदवारों के लिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज में वोट जुटाना मुश्किल हो जाता है; और यही बात जयपुर के बाहर के उम्मीदवारों के लिए वरदान बन जाती है । देवेंद्र सोमानी ने इसी स्थिति का फायदा उठाने की अच्छी तैयारी दिखाई है, और इसी बिना पर उनकी चुनावी स्थिति को मजबूत देखा/पहचाना जा रहा है । उनकी स्थिति को खतरा बस निर्मल सोनी की तरफ से देखा जा रहा है । दोनों चूँकि एक ही शहर के हैं, और निर्मल सोनी का पिछली बार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक ही रहा था - इसलिए कुछेक लोगों को लगता है कि देवेंद्र सोमानी के लिए मामला आसान नहीं होगा । किंतु उदयपुर में लोगों का मानना/कहना है कि निर्मल सोनी को पिछली बार जो वोट मिले थे, वह इसलिए मिले थे क्योंकि पिछली बार वह पूरे रीजन में अकेले माहेश्वरी थे; इस बार राजस्थान में ही चार माहेश्वरी हैं । दावा किया जा रहा है कि उदयपुर में ही निर्मल सोनी को खास समर्थन नहीं है; और उदयपुर में इस बार उनकी उम्मीदवारी के पीछे उन लोगों को देखा/पहचाना जा रहा है, जो पिछली बार उनके खिलाफ थे - और जो इस बार सिर्फ उनके साथ इसलिए हैं क्योंकि उन्हें देवेंद्र सोमानी का विरोध करने के लिए कोई 'मोहरा' चाहिए । देवेंद्र सोमानी ने निर्मल सोनी की तरफ से मिलने वाली चुनौती को पहचाना हुआ है, और उससे निपटने की रणनीति के तहत राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के साथ-साथ मध्य प्रदेश की इंदौर ब्रांच में तथा बिहार की कुछेक ब्रांचेज में समर्थन जुटाने की कोशिशें की हैं । देवेंद्र सोमानी ने अपने पक्ष में 'हवा' तो अच्छी बनाई है, लेकिन फिर भी उनकी सफलता इस बात पर निर्भर होगी कि अपने समर्थन-आधार को वह व्यवस्थित कैसे करते हैं । 
जयपुर के उम्मीदवारों में गौतम शर्मा और रोहित अग्रवाल अपनी चुनावी तैयारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं - इसलिए उनकी चुनावी स्थिति को बाकी उम्मीदवारों की तुलना में फिलवक्त बेहतर देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर में कई लोगों का हालाँकि यह भी मानना/कहना है कि जयपुर के दूसरे उम्मीदवारों का भी समर्थन-आधार चूँकि अच्छा है, इसलिए यदि वह अपनी अपनी चुनावी तैयारियों को लेकर वास्तव में गंभीर हो जाते हैं - तब फिर गौतम शर्मा व रोहित अग्रवाल के लिए मामला उतना आसान शायद नहीं रह जायेगा, जितना आसान वह अभी दिख रहा है । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में राजस्थान का चुनावी परिदृश्य इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यहाँ सीन बहुत कुछ स्पष्ट होने के बावजूद अभी भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं माना/कहा जा सकता है ।