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Tuesday, July 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में अनुज गोयल की वापसी की कोशिश सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह व मुकेश बंसल की बनती दिख रही जोड़ी के कारण मुसीबत में फँसती नजर आ रही है क्या ?

गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्यता जुगाड़ने में असफल रहने के बाद अनुज गोयल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में ही फिर से शरण लेने का जो फैसला किया है, उसने उनके समर्थकों को ही बुरी तरह बिदका दिया है और उनके कई समर्थक उनके खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं । अनुज गोयल को सबसे तगड़ा झटका गाजियाबाद में ही लगा है, जहाँ उनके घनघोर समर्थक रहे मुकेश बंसल ने ही बगावत का झंडा उठा लिया है । मुकेश बंसल के विरोध का अनुज गोयल को ऐसा झटका लगा है कि वह हर जगह मुकेश बंसल के रवैये का रोना रोते हैं और मुकेश बंसल पर धोखा देने का आरोप लगाते हैं । अनुज गोयल जगह जगह लोगों को बता रहे हैं कि मुकेश बंसल को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह लेकर आये हैं, लेकिन मुकेश बंसल ने अब मुकेश कुशवाह से तार जोड़ लिए हैं; उनका गंभीर आरोप यह है कि पिछले चुनाव में मुकेश बंसल ने उनके भाई जितेंद्र गोयल की बजाये मुकेश कुशवाह का साथ दिया था - और जितेंद्र गोयल की हार का एक प्रमुख कारण मुकेश बंसल से मिला यह धोखा भी था । अनुज गोयल और जितेंद्र गोयल इन दिनों जहाँ कहीं भी जिस किसी से भी बात कर रहे हैं, मुकेश बंसल के रवैये का रोना जरूर रो रहे हैं । उनके लगातार जारी 'विलाप' से ऐसा लग रहा है जैसे अनुज गोयल की उम्मीदवारी को सबसे बड़ा खतरा मुकेश बंसल से ही है । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल यह सुन/जान कर दरअसल डरे हुए हैं कि मुकेश बंसल ने कई जगह लोगों के बीच यह कहा हुआ है कि वह अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे । 
मुकेश बंसल दरअसल 2021 के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस वर्ष हो रहा चुनाव मुकेश कुशवाह के लिए तीसरा और आखिरी चुनाव है, मुकेश बंसल की 'तैयारी' है कि मुकेश कुशवाह द्वारा की जाने वाली खाली जगह को वह भरें; इसके लिए उन्हें जरूरी लग रहा है कि अनुज गोयल चुनाव न जीत सकें । सेंट्रल रीजन में कई लोग अनुज गोयल को करिश्माई नेता मानते हैं, और दावा करते हैं कि वह तो चुनाव जीत ही जायेंगे - लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं होगा । दरअसल उनके करिश्मे की पोल तो पिछली बार खुल गई थी, जब वह अपने भाई जितेंद्र गोयल को चुनाव नहीं जितवा सके थे । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में जितेंद्र गोयल 22 उम्मीदवारों में 943 वोटों के साथ नवें नंबर पर रहे थे, और 1237 वोटों के साथ पाँचवें नंबर पर रहे मुकेश कुशवाह से 294 वोट पीछे थे । फाइनल गिनती तक पहुँचते पहुँचते जितेंद्र गोयल छठे नंबर तक तो पहुँच गए थे, लेकिन विजेता बनने से रह गए थे । जितेंद्र गोयल की यह हार उनके साथ-साथ वास्तव में अनुज गोयल की भी हार थी । उनसे पहले, नॉर्दर्न रीजन में एनडी गुप्ता ने अपने बेटे नवीन गुप्ता को तथा वेस्टर्न रीजन में कमलेश विकमसे ने अपने भाई नीलेश विकमसे को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जितवाया है । उम्मीद की जा रही थी कि अनुज गोयल भी अपने भाई को चुनाव जितवा देंगे । नवीन गुप्ता अपने पिता तथा नीलेश विकमसे अपने भाई के चुनाव में कभी भी सक्रिय नहीं देखे गए थे;जबकि जितेंद्र गोयल तो हमेशा ही अनुज गोयल के 'स्टार प्रचारक' रहे हैं - इसलिए भी उम्मीद की गई थी कि जितेंद्र गोयल तो आसानी से चुनाव जीत जायेंगे । लेकिन वह चुनाव हार गए । जितेंद्र गोयल की हार ने अनुज गोयल के तथाकथित करिश्मे की ही पोल नहीं खोली, बल्कि यह भी दिखाया/बताया कि सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को अपनी ही जेब में रखने की अनुज गोयल की 'कोशिश' को लोगों ने अच्छा नहीं माना और जितेंद्र गोयल के समर्थन से हाथ खींच कर वास्तव में अनुज गोयल की सत्ता-लोभी सोच को सबक सिखाया ।
सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अनुज गोयल ने अपनी उसी सत्ता-लोभी सोच को एक बार फिर प्रदर्शित किया है, जिसके विरोध के कारण पिछली बार उनके भाई जितेंद्र गोयल को हार का सामना करना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि अनुज गोयल पिछले दिनों बाबा रामदेव के भरोसे उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य होने की जुगाड़ में थे, और इसलिए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के मैदान से मुँह मोड़े हुए थे । लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो वह फिर से इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में मुँह मारने आ गए हैं । मुकेश बंसल जैसे उनके नजदीकी रहे लोगों तक को उनका यह सत्ता-लोभी रवैया बुरा लगा है । उनके अपने नजदीकियों और समर्थकों का ही कहना/पूछना है कि अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता अपने और अपने भाई के लिए ही क्यों चाहिए ? अनुज गोयल के इस सत्ता-लोभी रवैये के सवाल बन जाने के कारण ही अनुज गोयल के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ी चुनौती है । दरअसल सेंट्रल रीजन में एक सीट बढ़ जाने का फायदा जयपुर को मिलता दिख रहा है । जयपुर/राजस्थान में बढ़े वोटों के भरोसे माना जा रहा है कि जयपुर में इस बार तीन लोग सेंट्रल काउंसिल में आ जायेंगे । सेंट्रल रीजन में पिछली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले श्याम लाल अग्रवाल के इस बार चुनाव से दूर रहने की चर्चा है; चर्चा हालाँकि यह भी है कि उनके समर्थक उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए राजी करने के वास्ते उन पर दबाव भी बना रहे हैं, और साथ ही उनके किसी विकल्प को लाने के लिए भी प्रयासरत हैं । जयपुर और या राजस्थान में सेंट्रल काउंसिल के लिए तीन उम्मीदवार रहें या चार - उम्मीद की जा रही है कि जयपुर के तीन उम्मीदवार तो जीत ही जायेंगे । 
ऐसे में, अनुज गोयल को सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने के लिए मनु अग्रवाल और मुकेश कुशवाह में से किसी एक की उम्मीदवारी की बलि लेनी होगी । इसके लिए उन्हें पहली वरीयता में इनमें से किसी एक से ज्यादा वोट पाने का प्रयास करना होगा । अनुज गोयल के नजदीकियों के अनुसार, अनुज गोयल ने अभी मुकेश कुशवाह को निशाने पर लिया है । उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से चार उम्मीदवार होने के कारण जो समस्या उनके सामने है, वही समस्या मुकेश कुशवाह के सामने भी है और इसलिए वह कोशिश करें तो पहली वरीयता के वोटों की गिनती में मुकेश कुशवाह से आगे हो सकते हैं और सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर सकते हैं । इस कोशिश में अनुज गोयल को लेकिन मुकेश बंसल बाधा बनते हुए दिख रहे हैं । मुकेश बंसल पिछले चुनाव में 31 उम्मीदवारों में 968 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर थे । उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों में उनका नंबर पहला था । इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के वोटरों पर उनका अच्छा प्रभाव है । इस प्रभाव के साथ मुकेश बंसल यदि अनुज गोयल को हरवाने की बात कहते/करते हैं, और मुकेश कुशवाह का साथ देते हैं - तो अनुज गोयल के लिए मामला मुश्किल तो बनता है । मुकेश बंसल पर दबाव बनाने के लिए अनुज गोयल गाजियाबाद में नितिन गुप्ता को समर्थन देने की बात करते सुने जा रहे हैं । नितिन गुप्ता पिछली बार भी उम्मीदवार थे, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 487 वोट के साथ 17 वे नंबर पर थे । इस रिकॉर्ड को देखते हुए लगता नहीं है कि अनुज गोयल का समर्थन नितिन गुप्ता को कोई लाभ पहुँचा कर मुकेश बंसल का कुछ बिगाड़ सकेगा । क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन अनुज गोयल के खिलाफ कभी उनके ही नजदीकी रहे मुकेश बंसल के आक्रामक रवैये से सेंट्रल रीजन में चुनावी परिदृश्य दिलचस्प हो उठा है । 

Monday, September 28, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदवारी 'अपने ही घर' में मुसीबतों से घिरी

गाजियाबाद । अमरेश वशिष्ट, जितेंद्र गोयल व ध्रुव अग्रवाल जैसे नॉन सीरियस उम्मीदवारों ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की गाजियाबाद क्षेत्र की चुनावी राजनीति में ऐसा घपड़चौथ मचा दिया है कि मुकेश कुशवाह व विनय मित्तल जैसे सीरियस उम्मीदवारों के लिए अपनी अपनी सीरियसनेस बचाना/दिखाना मुश्किल हो गया है । इंस्टीट्यूट की मौजूदा 22वीं सेंट्रल काउंसिल में गाजियाबाद के दो सदस्य हैं, लेकिन 23वीं काउंसिल में एक भी सीट मिलने का संदेह बन गया है । बात सिर्फ उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की नहीं है, क्योंकि पिछली बार भी इस क्षेत्र में चार उम्मीदवार तो थे ही; इसलिए इस बार पाँच उम्मीदवार हो जाने से कोई खास फर्क पड़ना नहीं चाहिए था - किंतु इस बार के पाँच उम्मीदवारों ने चुनावी गणित कुछ ऐसा बनाया है कि किसी एक का जीतना भी मुश्किल लग रहा है ।
सबसे बड़ी मुश्किल मुकेश कुशवाह के सामने हैं - उन्हें काउंसिल में अपनी सीट बचाने के लिए कठिन जद्दोजहद करना पड़ रही है । पिछली बार मुकेश कुशवाह बहुत मामूली अंतर से जीते थे । इस जीत में उन्हें मनु अग्रवाल की चुनावी नादानियों से बड़ा फायदा मिला था । मनु अग्रवाल लेकिन इस बार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं । मनु अग्रवाल ने पिछली बार जो चुनावी मूर्खताएँ की थीं, इस बार वह उन्हें दोहराने से बचने की कोशिश करते हुए नजर आ रहे हैं; लगता है कि उन्होंने समझ लिया है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सॉफ्टवेयर बेचना जितना मुश्किल काम है, चार्टर एकाउंटेंट्स के वोट पाना उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है । मनु अग्रवाल के लिए मुश्किलें हालाँकि कम नहीं हैं, किंतु इस बार चूँकि वह मुश्किलों को पहचानने/समझने तथा उन्हें दूर करने को लेकर तत्पर दिख रहे हैं - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार उनकी नाव पार लग जानी चाहिए । मनु अग्रवाल की नाव के पार लगने की स्थिति में मुकेश कुशवाह की नाव के डूबने का खतरा देखा जा रहा है ।
मुकेश कुशवाह को खतरा मनु अग्रवाल से नहीं है; खतरा तो उन्हें गाजियाबाद क्षेत्र में है । मुकेश कुशवाह के लिए समस्या की बात यह है कि 'अपने घर में' उनके सामने जो खतरा पैदा हो गया है, उससे उनकी स्थिति बिगड़ी - और कानपुर में मनु अग्रवाल की स्थिति सुधरी तो फिर उनके लिए अपनी सीट बचाना मुश्किल हो जायेगा । इसीलिए मुकेश कुशवाह के लिए सेंट्रल काउंसिल के लिए राह आसान नहीं दिख रही है । मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को इस बार सबसे बड़ी 'मार' यह पड़ेगी कि पिछली बार गाजियाबाद क्षेत्र में उन्हें अनुज गोयल विरोधी जो वोट मिले थे, उन वोटों को इस बार उन्हें विनय मित्तल के साथ बाँटना पड़ेगा । अनुज गोयल ने अपने भाई जितेंद्र गोयल को उम्मीदवार बना कर अपने वोटों को बँटने से रोकने की जो व्यवस्था की है, दरअसल उसके कारण मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल का मामला फँस गया है । यूँ तो हर कोई यह मान रहा है कि जितेंद्र गोयल एक कठपुतली उम्मीदवार हैं, और अनुज गोयल 'भाई साहब का ख्याल रखना' कहते हुए लोगों के चाहें जितना हाथ जोड़ लें, वह 'भाई साहब' को चुनाव जितवा तो नहीं पायेंगे; लेकिन 'भाई साहब' की उम्मीदवारी अनुज गोयल के पक्के वाले वोटों को अपने पास/साथ बाँधे रखने में कामयाब हो सकती है । इससे जो हालात बने हैं, उसमें मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की उम्मीदें ध्वस्त होती नजर आ रही हैं । अनुज गोयल के उम्मीदवार न होने में विनय मित्तल ने फायदा उठाने की जो योजना बनाई थी, वह योजना तो फेल हुई ही; उनकी योजना के चक्कर में मुकेश कुशवाह को बैठे-बिठाए मुसीबत और मिल गई । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी से मुकेश कुशवाह को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के साथ साथ लेकिन विनय मित्तल की उम्मीदवारी आने से अनुज गोयल विरोधी वोटों का बँटवारा होने की जो स्थिति बनी है, उसमें मुकेश कुशवाह घिरते हुए नजर आ रहे हैं ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिए अनुज गोयल ने जो चाल चली है, उससे विनय मित्तल को खासा धोखा मिला है । विनय मित्तल ने अनुज गोयल की खाली होने वाली सीट पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से बहुत पहले से ही सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी थी । उनके समर्थकों में से ही कईयों का मानना और कहना हालाँकि यह था कि उन्हें अभी एक टर्म और रीजनल काउंसिल में रहना चाहिए और यहाँ चेयरमैन बनना चाहिए तथा अपने अनुभव व अपने समर्थन-आधार में इजाफा करना चाहिए - फिर उसके बाद उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए आना चाहिए । विनय मित्तल को किंतु लगा कि अनुज गोयल की खाली हो रही सीट के कारण जो मौका बन रहा है, उससे अच्छा मौका उन्हें फिर नहीं मिलेगा; लिहाजा उन्होंने अपने ही समर्थकों की एक न सुनी और सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बन गए । विनय मित्तल ने जो सोचा, वह गलत नहीं था - उनकी जगह कोई भी होता, संभवतः ऐसा ही सोचता और करता । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी न होती, तो मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए इंस्टीट्यूट की 23वीं काउंसिल में अपनी अपनी जगह बनाना कोई मुश्किल भी नहीं होता । विनय मित्तल के नजदीकियों के अनुसार, विनय मित्तल लेकिन अब पछता रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि वह न तो इधर के रहे, और न उधर के रहे । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते विनय मित्तल की योजना तो पिटी ही, विनय मित्तल की उम्मीदवारी ने मुकेश कुशवाह के लिए भी आफत खड़ी कर दी है । 
मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल जैसे-तैसे करके जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के कारण पैदा हुई समस्या से निपट भी लेते; लेकिन अमरेश वशिष्ट व ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने उनके लिए वह रास्ता भी बंद कर दिया लगता है । अमरेश वशिष्ट का मामला तो खासा दिलचस्प है - पिछले दोनों चुनावों में वह अंगद के पाँव की तरह दसवें नंबर पर ही पैर जमाए मिले थे । अमरेश वशिष्ट पिछली बार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खासे गंभीर थे, किंतु वोटर उनकी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नहीं हो सके । वोटरों की इस बेवफाई से अमरेश वशिष्ट इतने निराश और नाराज हुए कि उन्होंने चुनावी नतीजा आते ही सार्वजनिक रूप से आगे कभी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया । लेकिन जैसे ही इस बार के चुनाव नजदीक आए, उनके चुनावी कीड़े कुलबुलाये और वह तीसरी बार फिर उम्मीदवार हो गए । लोगों का कहना है कि जो व्यक्ति अपनी ही घोषणा पर न टिका रह पाता हो, उसकी उम्मीदवारी के साथ भला कौन टिकना चाहेगा ? जाहिर है कि अमरेश वशिष्ट के लिए दिल्ली बहुत बहुत दूर है; उनकी उम्मीदवारी को लेकिन जो वोट मिलेंगे, वह मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के लिए दिल्ली को दूर करने का काम तो करेंगे ही । ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी ने कभी उनके नजदीकी रहे लोगों को ही हैरान किया है । वर्ष 2009 के चुनाव में वह जिस बुरी तरह से हारे थे, उसके कारण वह वर्ष 2012 में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की हिम्मत तक नहीं कर पाए थे । इस बार उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई आहट या अफवाह तक नहीं थी । पर अब जब उनकी उम्मीदवारी एक सच है, तो माना/समझा यही जा रहा है कि उनकी उम्मीदवारी का तो कुछ नहीं होना है, वह लेकिन मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल की संभावनाओं को अवश्य ही नुकसान पहुँचायेंगे । 
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के संदर्भ में गाजियाबाद क्षेत्र में जितेंद्र गोयल, अमरेश वशिष्ट और ध्रुव अग्रवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन इनकी उम्मीदवारी ने अपनी अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेने वाले मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के सामने खासा गंभीर संकट जरूर खड़ा कर दिया है । 

Friday, March 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन में जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने तथा विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोकने की व्यवस्था की है क्या ?

गाजियाबाद । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सेंट्रल रीजन से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे विनय मित्तल के लिए कड़ी चुनौती पैदा कर दी है । विनय मित्तल फिलहाल सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, जहाँ उनका इस वर्ष पहला टर्म पूरा हो रहा है । अगले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की चर्चा तो लगातार थी, लेकिन पिछले दिनों इस चर्चा पर कुछ समय के लिए ब्रेक तब लगा जब सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए लगातार तीन की बजाये चार टर्म तक सदस्य बने रहने का कानून बनने/बनाने की कोशिशों की बात पता चली । उक्त कोशिशें यदि सफल होतीं, तो अनुज गोयल एक बार फिर सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनते - और इसी आशंका में विनय मित्तल ने कहना/बताना शुरू कर दिया था कि तब वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । अभी हाल तक विनय मित्तल लोगों से यही कहते रहे थे कि यदि अनुज गोयल के लिए उम्मीदवार बनने की स्थितियाँ बनीं, तो फिर वह सेंट्रल काउंसिल की बजाये रीजनल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । किंतु जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि लगातार तीन टर्म वाले कानून में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, और वर्ष 2015 के चुनाव में अनुज गोयल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे; वैसे ही विनय मित्तल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करना पुनः शुरू कर दिया ।
सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के संदर्भ में विनय मित्तल की समझ यही रही कि उनके लिए कोई भी मौका अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही बन सकता है । अगले चुनाव में अनुज गोयल के उम्मीदवार न बन सकने की बात चूँकि पहले से ही लगभग स्पष्ट थी, इसलिए विनय मित्तल लगातार अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात चला रहे थे । इस बात में पिछले दिनों हालाँकि छोटा-सा ब्रेक आया, लेकिन फिर जल्दी ही सेंट्रल काउंसिल के लिए विनय मित्तल की उम्मीदवारी की बात दोबारा से पटरी पर आ गई । किंतु जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी की घोषणा ने विनय मित्तल के लिए समस्या खड़ी कर दी है । जितेंद्र गोयल, अनुज गोयल के भाई हैं और जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी को अनुज गोयल द्धारा अपनी सीट को बचाये/बनाये रखने की एक कसरत के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल दरअसल विनय मित्तल की जीत  की संभावना को रोकना चाहते हैं । अनुज गोयल को डर यह है कि उनकी खाली हुई सीट पर यदि विनय मित्तल काबिज हो गए तो फिर इंस्टीट्यूट की उनकी राजनीति तो पूरी तरह चौपट ही हो जाएगी । अनुज गोयल को विश्वास है कि जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये वह विनय मित्तल को सेंट्रल काउंसिल में घुसने से रोक लेंगे; और इस तरह से अगली से अगली बार - यानि वर्ष 2018 के लिए अपने लिए मौका बनाये रख सकेंगे ।
विनय मित्तल के शुभचिंतक तथा दूसरे लोग भी यह दावा तो कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल के लिए संभव नहीं होगा; लेकिन वह अनुज गोयल के नजदीकियों की इस बात पर गौर नहीं कर रहे हैं कि जितेंद्र गोयल को चुनाव जितवाना अनुज गोयल का उद्देश्य है भी नहीं । चुनावी राजनीति के लिए जिस तरह के लटकों-झटकों की जरूरत होती है, उसमें जितेंद्र गोयल का हाथ खासा तंग रहता है और इसीलिए वह चुनावी राजनीति से हमेशा दूर ही रहे हैं । नजदीकियों के अनुसार, जितेंद्र गोयल भी जानते हैं और अनुज गोयल भी समझते हैं कि जितेंद्र गोयल के बस की चुनाव जीतना नहीं है; जितेंद्र गोयल जीतने के लिए उम्मीदवार बने भी नहीं है - वह तो बस अनुज गोयल के वोटों की चौकीदारी करने के लिए उम्मीदवार बने हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की है, ताकि विनय मित्तल उन्हें न ले लें । अनुज गोयल की अनुपस्थिति में ही विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी लाने के बारे में सोचा था, तो इसके पीछे भी यही कारण था कि खुद विनय मित्तल को भी लगता है कि वह अनुज गोयल के वोटों के सहारे ही सेंट्रल काउंसिल में पहुँच सकते हैं । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने विनय मित्तल के इसी सहारे को छीनने का जुगाड़ बैठाया है ।
जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने मुकेश कुशवाह को भी लपेटे में लेने का दाँव चला है । उल्लेखनीय है कि मुकेश कुशवाह पिछली बार बहुत ही मामूली अंतर से जीते थे । मामूली अंतर से मिली जीत में भी गाजियाबाद तथा आसपास के क्षेत्रों में अनुज विरोधी वोटों का बड़ा सहयोग था । पिछली बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह को मिले थे; जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के चलते अबकी बार अनुज विरोधी वोट मुकेश कुशवाह और विनय मित्तल के बीच बंटेंगे तो नुकसान मुकेश कुशवाह को ही होगा । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में मुकेश कुशवाह ने ऐसा कुछ किया भी नहीं है, जिससे उनके समर्थन-आधार को बढ़ा हुआ माना/देखा जाये । मुकेश कुशवाह को रवींद्र होलानी के रूप में देखा जा रहा है, जिनकी उम्मीदवारी सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के बावजूद पिछली बार वीरगति को प्राप्त हुई थी । जितेंद्र गोयल की उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने जो जाल बिछाया है, उसमें हो सकता है कि गाजियाबाद के तीनों ही उम्मीदवार ढेर हो जाएँ - जैसा कि पिछली बार कानपुर में हुआ था; तो यह स्थिति अनुज गोयल को सूट करती है । वर्ष 2018 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए अनुज गोयल ने 2015 के चुनाव की जो फील्डिंग सजाई है, उसने विनय मित्तल के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती खड़ी की है क्योंकि विनय मित्तल इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को मुकेश कुशवाह के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से लेते दिखे हैं और लंबी पारी खेलने की तैयारी किये बैठे हैं ।

Wednesday, July 16, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सदस्य डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत करके आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच अपनी पहचान को और समृद्ध किया है

गाजियाबाद । डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत किया है । इस प्रिंटेड प्रारूप से डॉक्टर सुनील गुप्ता को तो एक नया पाठक-वर्ग मिलेगा ही, साथ ही उन लोगों को भी डॉक्टर सुनील गुप्ता के विचारों से परिचित होने का अवसर मिलेगा जो सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हैं । डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेखों और टिप्पणियों का यह प्रिंटेड प्रारूप उन लोगों के लिए भी उपयोगी साबित होगा जो सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों पर उपलब्ध इन आलेखों व टिप्पणियों को देख/पढ़ तो चुके होंगे, लेकिन जिन्हें कभी अचानक उनके किसी आलेख या टिप्पणी को देखने/पढ़ने की या उसका संदर्भ लेने की जरूरत आ पड़े । प्रिंटेड प्रारूप के शुरू में ही दिए गए इंडेक्स में आलेख/टिप्पणी का शीर्षक इस जानकारी के साथ दिया गया है कि वह किस तारीख को सोशल मीडिया में जारी हुआ और प्रिंटेड प्रारूप में वह किस पृष्ठ पर उपलब्ध है । इस जानकारी के साथ उपलब्ध प्रिंटेड प्रारूप शोधछात्रों के काम को आसान कर देता है ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेखों व टिप्पणियों के विषयों का दायरा बहुत व्यापक है । अर्थव्यवस्था के नवीनीकरण (रीस्ट्रक्चरिंग) का मुद्दा हो, या नए भूमि अधिग्रहण कानून का मसला हो, या स्वच्छ भारत की बात हो, या रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियम-कानूनों की व्याख्या हो - डॉक्टर सुनील गुप्ता ने सभी विषयों पर तथ्यपरक तरीके से अपनी कलम चलाई है । रोजगार, महँगाई, लघु उद्योगों से जुड़े विषय हों और या नौजवानों, महिलाओं, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के उत्थान से संबद्ध मामले हों - डॉक्टर सुनील गुप्ता ने समस्या को संपूर्णता में समझने का प्रयास किया है । कॉरपोरेट क्षेत्र में होने वाले बदलाव भी डॉक्टर सुनील गुप्ता की निगाह से नहीं बच पाते हैं और वहाँ नतीजों को प्रभावित करने वाली बातों को पहचानने का तथा उनका आकलन करने का उन्होंने भरसक प्रयास किया है । इसके साथ ही, देश में होने वाली राजनीतिक व सामाजिक हलचलों पर भी डॉक्टर सुनील गुप्ता की निगाह बराबर बनी रहती है । उनके आलेखों व टिप्पणियों के विषय देख कर ही लगता है देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा शायद ही कोई विषय हो जो उनसे छूटा हो ।
इसी कारण से डॉक्टर सुनील गुप्ता के आलेख और टिप्पणियाँ प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने वालों से लेकर देश और समाज के प्रति जागरूक रहने वाले लोगों के लिए - तथा देश और समाज के विकास में किसी भी स्तर की भूमिका निभाने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए उपयोगी हैं । शायद यही कारण है कि अपने आलेखों व टिप्पणियों को लेकर शुरू किए गए उनके फेसबुक पेज को तीन-साढ़े तीन माह की अवधि में ही सोलह हजार से ज्यादा पाठक मिल गए हैं । कम समय में उनको प्राप्त हुई पाठक संख्या से यह भी पता चलता है कि जिस तरह के विषयों को डॉक्टर सुनील गुप्ता ने साधा है, उन विषयों पर जानकारी पाने की लोगों के बीच कितनी ज्ञानात्मक 'भूख' है और इस ज्ञानात्मक 'भूख' को दूर करने के साधन कितने कम हैं । डॉक्टर सुनील गुप्ता ने इस तरह लोगों की एक बड़ी जरूरत को पूरा करने का महत्वपूर्ण काम किया है ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं । 15 नबंवर 1966 को एक कृषक परिवार में जन्मे डॉक्टर सुनील गुप्ता ने 1990 में चार्टर्ड एकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी कर ली थी । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सदस्य के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता ने शुरू से ही प्रोफेशन और प्रोफेशन से जुड़े लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाना और उन्हें हल करने की दिशा में आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था । इस सक्रियता के चलते ही डॉक्टर सुनील गुप्ता बहुत जल्दी ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की गाजियाबाद ब्रांच के चेयरमैन बने । चेयरमैन के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता की पहल से किए गए प्रयत्नों के चलते ही गाजियाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्रों को गाजियाबाद में ही परीक्षा देने की सुविधा प्राप्त हुई; अन्यथा उन्हें परीक्षा देने के लिए दिल्ली जाना पड़ता था । डॉक्टर सुनील गुप्ता द्धारा दिलचस्पी लेने के बाद ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया ने गाजियाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंसी के छात्रों के लिए कोचिंग की व्यवस्था शुरू की । इन सफलताओं से डॉक्टर सुनील गुप्ता की सक्रियता का क्षेत्र बढ़ा और उन्होंने बड़े स्तर पर अपने आपको खड़ा किया । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के जब वह सदस्य बने, तो वह उक्त काउंसिल के सदस्य बनने वाले गाजियाबाद के पहले चार्टर्ड एकाउंटेंट थे । इसके बाद, डॉक्टर सुनील गुप्ता ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।
डॉक्टर सुनील गुप्ता आज पंजाब नेशनल बैंक, जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया तथा रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के निदेशक मंडल के सदस्य हैं । इसके साथ ही वह मिनिस्ट्री ऑफ स्टील की स्टील कंज्यूमर्स काउंसिल के सक्रिय सदस्य भी हैं । एसोचैम, सीआईआई तथा पीएचडी चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज तथा प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की सदस्यता के जरिये भी उनकी संलग्नता और सक्रियता का व्यापक दायरा है । फिक्की की नेशनल एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य के रूप में फिक्की की गतिविधियों और उसके फैसलों में डॉक्टर सुनील गुप्ता की निर्णायक भूमिका रहती है । यूनिटी इंटरनेशनल फाउंडेशन की इकोनोमिक अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन के रूप में डॉक्टर सुनील गुप्ता ने विभिन्न देशों के बीच के व्यापारिक संबंधों को और प्रगाढ़ तथा व्यावहारिक बनाने के लिए नीति संबंधी एक ड्राफ्ट तैयार करने का एक महत्वपूर्ण काम किया है । इंडिया सेंटर फाउंडेशन ने इंडिया-जापान ग्लोबल पार्टनरशिप तथा देहली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की प्रस्तुति में जो कामयाबी प्राप्त की है, उसमें डॉक्टर सुनील गुप्ता की सक्रिय भागीदारी रही है ।
विभिन्न संस्थाओं में विविधतापूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह करते रहने के बावजूद डॉक्टर सुनील गुप्ता ने अपनी स्वतंत्र एकेडमिक पहचान को भी बनाये रहने का अनोखा काम किया है । इसी का नतीजा है कि वह एक स्वतंत्र लेखक, विचारक और व्याख्याकार के रूप में भी पहचाने जाते हैं । आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों पर समाचार पत्रों में लेख लिखते रहने तथा टेलीविजन चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित रूप से भाग लेते रहने के चलते डॉक्टर सुनील गुप्ता आर्थिक, वाणिज्यिक व सामाजिक विषयों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच एक जाना-पहचाना नाम है । आर्थिक व वाणिज्यिक विषयों पर उनकी कुछेक किताबें भी प्रकाशित हैं । सोशल मीडिया के विभिन्न चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित अपने आलेखों और अपनी टिप्पणियों का प्रिंटेड प्रारूप प्रस्तुत करके डॉक्टर सुनील गुप्ता ने एक एकेडमिक की अपनी पहचान को और समृद्ध करने की दिशा में ही कदम बढ़ाया है ।