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Tuesday, September 29, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में पहले तो प्रेसीडेंट पद का निजी खुन्नस में दुरुपयोग करने और अब वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में अपना वोट/समर्थन राजेश शर्मा को 'बेचने' के आरोपों के चलते अतुल गुप्ता की मुसीबतें और बढ़ीं; तथा उन्हें बचाने की कोशिशों में विजय झालानी भी विवाद में फँसे

नई दिल्ली । मोहित बंसल मामले में फँसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता को बचाने के लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा तथा विजय झालानी ने जो मोर्चा संभाला है, उससे इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी आ गई है । उक्त मामले में अतुल गुप्ता की बुरी तरह फँसी गर्दन को निकालने के लिए राजेश शर्मा लगातार मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के मंत्री से लेकर अधिकारियों तक के चक्कर काट रहे हैं, और अतुल गुप्ता को बचाने की तरकीबें ढूँढ़ने में लगे हुए हैं । अपने इस 'लगे होने' का कारण बताते हुए खुद राजेश शर्मा ने दावा किया है कि उक्त मामले में बचाने की उनकी कोशिशों के बदले में अतुल गुप्ता ने वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उनका समर्थन करने की कसम खाई है । राजेश शर्मा के इस दावे ने वाइस प्रेसीडेंट पद के दूसरे संभावित उम्मीदवारों को भड़का दिया है, और वह प्रेसीडेंट के रूप में अतुल गुप्ता की निजी खुन्नस निकालने की हरकत को लेकर अतुल गुप्ता को निशाना बना रहे हैं । अतुल गुप्ता को निशाना बनाने वाले सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को मनाने की जिम्मेदारी विजय झालानी ने संभाली है, जिसके तहत उनके द्वारा कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को अपने घर पार्टी देने की बात भी चर्चा में है ।
विजय झालानी की सक्रियता ने सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को और भड़का दिया है । दरअसल विजय झालानी सेंट्रल काउंसिल में गवर्नमेंट नॉमिनी हैं, इसलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्य यह बात पसंद नहीं करते हैं कि वह इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति/व्यवस्था में किसी भी तरह से कोई हस्तक्षेप करें । गवर्नमेंट नॉमिनी हस्तक्षेप करते भी नहीं हैं । विजय झालानी का मामला लेकिन अलग है । असल में, कुछ समय पहले तक वह इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासे सक्रिय थे, और चुनाव जीत कर सेंट्रल काउंसिल में आने की हसरत रखते थे । चुनाव जीत कर सेंट्रल काउंसिल में आने की हसरत तो उनकी पूरी नहीं हो सकी, लेकिन गवर्नमेंट नॉमिनी के रूप में सेंट्रल काउंसिल में आने का जुगाड़ उन्होंने कर लिया । जुगाड़ तो उन्होंने कर लिया, लेकिन गवर्नमेंट नॉमिनी के रूप में वह उन भटकती आत्माओं का प्रतिरूप बन गए, जो मुक्ति की तलाश में रहती हैं; मुक्ति पाने की 'कोशिशों' में विजय झालानी कई बार यह भूल जाते हैं कि सेंट्रल काउंसिल में वह सामने के रास्ते से नहीं, बल्कि पीछे के रास्ते से आए हैं - और इस चक्कर में कई बार उनकी सामने से आए सदस्यों से झड़पें भी हो चुकी हैं । मोहित बंसल के मामले में अतुल गुप्ता पर निजी खुन्नस के चलते प्रेसीडेंट पद का दुरुपयोग करने तथा कानूनी कार्रवाई में मोटी रकम खर्च करने को लेकर लगने वाले आरोपों से बनी स्थिति में विजय झालानी जिस तरह से अतुल गुप्ता का पक्ष लेते हुए नजर आ रहे हैं, उसे सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों ने गवर्नमेंट नॉमिनी के व्यवहार के अनुरूप नहीं माना/पाया है ।
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों का कहना है कि मोहित बंसल के मामले में दो वर्ष पहले के मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के स्पष्टीकरण का संज्ञान लेते हुए गवर्नमेंट नॉमिनी के रूप में विजय झालानी अपने कर्तव्य व जिम्मेदारी का पालन करने में तो विफल रहे ही, अतुल गुप्ता की हरकत पर सवाल उठाने वाले सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को 'चुप' करने/करवाने की उनकी कोशिशों ने तो 'हद ही पार' कर दी है । विजय झालानी के रवैये के खिलाफ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अलग तरह की नाराजगी है, तो राजेश शर्मा के दावे पर अलग तरह का बबाल है । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों का कहना है कि अतुल गुप्ता ने पहले तो अपनी निजी खुन्नस में प्रेसीडेंट पद का दुरुपयोग किया, और अब वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में अपना वोट/समर्थन 'बेच' कर वह और गंदगी फैला रहे हैं । अतुल गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उनका वोट और समर्थन राजेश शर्मा के लिए होने की बात 'खुल' जाने के बाद वाइस प्रेसीडेंट पद के अन्य संभावित उम्मीदवारों ने अतुल गुप्ता के प्रति हमलावर रवैया अपना लिया है । ऐसे में, राजेश शर्मा की कोशिशों से तो अतुल गुप्ता को मदद मिलती फिलहाल नहीं दिख रही है, लेकिन राजेश शर्मा के 'दावे' के बाद भड़के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने अतुल गुप्ता के लिए फजीहत वाले हालात बना/बढ़ा दिए हैं । 

Tuesday, February 18, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता से अपने बदले हुए नाम तथा अपने विज्ञापन को लेकर फटकारे जा चुके राजिंदर अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने लिए अतुल गुप्ता के भाई अरुण गुप्ता को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं क्या ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट मुख्यालय में गैर काउंसिल सदस्यों के प्रवेश के लिए निषिद्ध घोषित कैंटीन में राजिंदर अरोड़ा और अतुल गुप्ता की लंच मीटिंग की संलग्न तस्वीर नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के गठन की  पर्दे के पीछे चल रही कोशिशों का संकेत दे रही है क्या ? इस तस्वीर में सेंट्रल काउंसिल में सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी तथा अतुल गुप्ता के भाई अरुण गुप्ता की मौजूदगी दरअसल मामले को संदेहास्पद बना रही है । तस्वीर में नजर आने वाले बाकी चेहरे संगरूर ब्रांच के पदाधिकारियों के हैं, जो अतुल गुप्ता को प्रेसीडेंट बनने की बधाई देने मुख्यालय आये थे । मुख्यालय में इन्हें अतुल गुप्ता से मिलवाने की जिम्मेदारी राजिंदर अरोड़ा ने ही ली और निभाई थी । राजिंदर अरोड़ा ने इस जिम्मेदारी को अतुल गुप्ता के भाई अरुण गुप्ता के जरिये निभाया था । प्रेसीडेंट ऑफिस के स्टॉफ के अनुसार, अतुल गुप्ता के प्रेसीडेंट के बनने बाद से प्रेसीडेंट ऑफिस पर अरुण गुप्ता ने ही 'कब्जा' किया हुआ है, और ऑफिसियल काम के अलावा दूसरे काम वही देखते/करते हैं । कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्य तथा वरिष्ठ स्टॉफ अरुण गुप्ता की दखलंदाजी को लेकर इशारों इशारों अपनी नाराजगी जता चुका है, लेकिन अतुल गुप्ता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है ।
इस मामले में विजय झालानी के रवैये पर भी सभी को हैरानी है । लोगों का कहना है कि विजय झालानी वैसे तो हमेशा ही नियम-कायदों की दुहाई देते रहते हैं, लेकिन अरुण गुप्ता मुख्यालय में जिस तरह से 'नॉन-कॉन्स्टीट्यूशनल पॉवर' बन गए हैं, उस पर न केवल चुप्पी साधे हुए हैं, बल्कि अरुण गुप्ता के साथ सहभागिता दिखाते हुए भी नजर आते हैं । इन शब्दों के साथ संलग्न तस्वीर से जुड़े मामले को ही लें : संगरूर ब्रांच के पदाधिकारी अतुल गुप्ता को प्रेसीडेंट बनने की बधाई देने मुख्यालय आते हैं, और चूँकि लंच के टाइम पर आते हैं, इसलिए अतुल गुप्ता उन्हें लंच करवाते हैं - यह बात तो समझ में आती है; राजिंदर अरोड़ा चूँकि संगरूर ब्रांच के पदाधिकारियों को लेकर आते हैं, इसलिए राजिंदर अरोड़ा भी लंच करने बैठ जाते हैं - यह बात भी स्वीकार्य कर ली जा सकती है । लेकिन यहाँ विजय झालानी और अरुण गुप्ता की मौजूदगी का क्या मतलब है ? विजय झालानी सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने के नाते इस कैंटीन में आने के अधिकारी तो हैं, लेकिन अरुण गुप्ता यहाँ क्या रहे हैं ? यहाँ विजय झालानी की उपस्थिति दरअसल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण और सवालिया बनी है, कि हमेशा ही नियम-कानूनों की बात करने वाले विजय झालानी ने इस बात पर आपत्ति क्यों नहीं की, कि सिर्फ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के लिए अधिकृत कैंटीन में गैर काउंसिल सदस्य कैसे बैठे हैं ? यूँ बात बहुत छोटी सी है, लेकिन यह दिखाने के लिए काफी है कि प्रेसीडेंट और उनके नजदीकी किस तरह इंस्टीट्यूट में नियम-कानूनों का मजाक बनाते हैं, और सरकार द्वारा नामित सदस्य कैसे उनके साथ मिले होते हैं ।
राजिंदर अरोड़ा के नजदीकियों के अनुसार, संगरूर ब्रांच के पदाधिकारियों को अतुल गुप्ता से मिलवाने ले जाना तो एक बहाना था - राजिंदर अरोड़ा वास्तव में अतुल गुप्ता के साथ नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के नए पॉवर ग्रुप के गठन को लेकर बात करने का मौका खोज रहे थे । राजिंदर अरोड़ा दरअसल नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसके लिए वह रीजनल काउंसिल के सदस्यों को यह दिखाना चाहते हैं कि अतुल गुप्ता के साथ उनके बड़े नजदीकी के और बड़े खास संबंध हैं । राजिंदर अरोड़ा के लिए समस्या की बात यह है कि उन्होंने सोशल मीडिया में जिस तरह से अपना नाम 'जीएसटी सीए राजिंदर अरोड़ा' किया हुआ है और अपनी सेवाओं के लिए तरह तरह से विज्ञापन करते रहते हैं, उसे लेकर अतुल गुप्ता कुछेक बार अपनी नाराजगी दिखा चुके हैं, और उनसे कह चुके हैं कि इस तरह की बातें प्रोफेशन तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों को बदनाम करती हैं । राजिंदर अरोड़ा पर लेकिन इन बातों का कोई असर नहीं पड़ा है । लोगों के बीच भी चर्चा है कि राजिंदर अरोड़ा की जो राजनीतिक सक्रियता है, उसके पीछे उनका वास्तविक उद्देश्य अपना धंधा बढ़ाना है । लोगों को लगता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन वह इसलिए ही बनना चाहते हैं, ताकि उन्हें लोगों तक एक विश्वसनीय पहुँच बनाने का मौका मिले और उन्हें क्लाइंट्स मिलें । अतुल गुप्ता के साथ नजदीकी दिखा कर राजिंदर अरोड़ा को लगता है कि वह रीजनल काउंसिल में चेयरमैन का पद पा लेंगे, जिससे फिर उन्हें अपना धंधा बढ़ाने में भी मदद मिलेगी । 

Monday, July 29, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग तथा विजय झालानी पर हालात को बिगाड़ने का आरोप लगा कर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों ने रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास किया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा काउंसिल में उनके नजदीकी सदस्यों ने काउंसिल में फैली/पसरी अराजकता के लिए इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल सदस्य चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग और सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकी सदस्य लोगों के साथ की जाने वाली बातचीतों में लगातार आरोप लगाने लगे हैं कि अपने अपने स्वार्थ में यह तीनों रीजनल काउंसिल के दूसरे सदस्यों को भड़काए रखते हैं, और तरह तरह से उन्हें समर्थन देते रहते हैं - जिसके चलते काउंसिल के कुछेक पदाधिकारी तथा सदस्य किसी न किसी बहानेबाजी से कामकाज में बाधा डालते हुए झगड़े बनाए/बढ़ाए रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों का मानना/कहना है कि विजय झालानी ने अविनाश गुप्ता व श्वेता पाठक के बीच हुए मामले में श्वेता पाठक का पक्ष लेते हुए 10 अप्रैल को चैयरमैन हरीश चौधरी जैन को फटकार लगाने वाला ईमेल संदेश न लिखा होता, तो मामला इतना न बिगड़ता । उनका कहना है कि सरकार ने विजय झालानी को इंस्टीट्यूट में इसलिए नामित नहीं किया है कि वह रीजनल काउंसिल के मामलों में अपनी टाँग अड़ाते फिरे और वहाँ झगड़े बढ़ाएँ । उसके बाद, 6 जून को बुलाई गई रीजनल काउंसिल की अधिकृत मीटिंग के रद्द हो जाने के बाद हुई अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने नियम-कानूनों का वास्ता देकर मेलमिलाप कराने के जो प्रयास किए, वह वास्तव में हरीश चौधरी और उनके नजदीकियों को हतोत्साहित करने वाले थे । उक्त अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने साफ साफ कहा कि यह नियम भी है और भलाई भी इसी में है कि चेयरमैन और सेक्रेटरी मिलजुल कर फैसले लें और हर फैसले में दोनों की भागीदारी सुनिश्चित हो । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि उक्त मीटिंग के बाद से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में झगड़े और बढ़े हैं तथा हालात और ज्यादा बिगड़े हैं । 
हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि विजय झालानी को चूँकि सेंट्रल काउंसिल में कोई खास तवज्जो नहीं मिल रही है, इसलिए अपने आप को व्यस्त रखने के लिए वह रीजनल काउंसिल के मामले में दिलचस्पी लेते हैं और यहाँ अपनी अहमियत दिखाने का प्रयास करते रहते हैं; चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को चिंता है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर के सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने से उनके लिए मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो जायेगा - इसलिए वह अभी से ही उन दोनों के पर कतर कर रखना चाहते हैं । उनकी खुशकिस्मती है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर ने अपनी अपनी हरकतों से उन्हें मौका भी दे दिया है । हंसराज चुग को सुमित गर्ग व अविनाश गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी से भी चुनौती मिल सकने का डर है ।कई लोगों को लगता है कि यह दोनों भी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकते हैं, और इन्होंने यदि सचमुच उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तो यह हंसराज चुग के लिए मुसीबत बनेंगे । मजेदार संयोग यह है कि राजेंद्र अरोड़ा, नितिन कँवर, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता को ही चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । गंभीर आरोप यही है कि इन्हीं चारों के दबाव में हरीश चौधरी जैन फैसले करते हैं और काउंसिल के वाइस चेयरपरसन, सेक्रेटरी व ट्रेजरर को अलग थलग रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों के लिए मुसीबत की बात यह है कि उन्हें 'बाहर' से कहीं किसी का समर्थन प्राप्त नहीं है; उनकी कार्रवाईयों को उचित ठहराने वाला कोई नहीं है । विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग को लेकर उनके आरोप यदि सच भी हैं, तो भी कोई भी यह कहने/मानने वाला नहीं है कि उन्होंने कोई अनुचित बात की है, या अनामंत्रित रूप से घुसपैठ करने की कोशिश की है; वह तो मामले में तभी पड़े हैं, जब उनसे शिकायत की गई और उन्हें हालात को निपटाने में भूमिका निभाने के लिए आमंत्रित किया गया । यह अलग बात है कि उन्हें मौका मिला और उन्होंने अपनी अपनी 'जरूरतों' के हिसाब से मौके का फायदा उठाया ।
हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों ने विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को जिस तरह से निशाना बनाना शुरू किया है - उससे रीजनल काउंसिल में हालात सुधरेंगे, इसकी तो किसी को उम्मीद नहीं है; उससे लेकिन रीजन की चुनावी राजनीति में नए बबाल जरूर पैदा होंगे । समझा जाता है कि विजय झालानी के साथ-साथ चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को निशाने पर लेकर हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने दो उद्देश्य एक साथ साधने का प्रयास किया है - एक तरफ तो वह इन्हें दबाव में लेना/रखना चाहते हैं ताकि यह रीजनल काउंसिल के मामलों से दूर रहें, और दूसरी तरफ सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में यह अपनी अहमियत दिखाना चाहते हैं; लोगों के बीच यह अभी से इस बात को पहुँचाना चाहते हैं कि इनकी उम्मीदवारी की संभावना मात्र से सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को अगले चुनाव में अपने पुनर्निर्वाचन को लेकर डर पैदा हो गया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों को एक तीसरा फायदा यह होता दिख रहा है कि उनके आरोपों से लोगों का ध्यान चुनावी राजनीति के समीकरणों पर जायेगा और रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से हटेगा । हालाँकि कई लोगों को लगता है कि हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने यह जो राजनीति खेली है, इससे उन्हें तात्कालिक रूप से भले ही कोई फायदा होता हुआ दिखे, लेकिन कुल मिलाकर यह राजनीति उनकी मुसीबतों को बढ़ाने वाली ही साबित होगी । उनकी राजनीति क्या करेगी और उसका क्या नतीजा होगा, यह तो आगे पता चलेगा - अभी लेकिन उनके दाँव ने नॉर्दर्न रीजन के राजनीतिक खिलाड़ियों को चर्चा/कुचर्चा का अच्छा मौका जरूर दे दिया है ।

Friday, June 7, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग तो रद्द हो गई; लेकिन अनौपचारिक मीटिंग में बने माहौल ने झगड़े-झंझट का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को भड़काया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई रीजनल काउंसिल की मीटिंग, इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी के हस्तक्षेप के बाद, रद्द हो गई । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी पंकज गुप्ता ने हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई मीटिंग को इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों से खिलवाड़ बताया था और इंस्टीट्यूट में इसकी शिकायत करते हुए इसे रद्द करने की माँग की थी । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी ने पंकज गुप्ता की आपत्ति को स्वीकार करते हुए चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को ऐन मौके पर मीटिंग रद्द कर देने के लिए कहा । मीटिंग रद्द होने से बौखलाए हरीश चौधरी जैन तथा गौरव गर्ग ने इसका ठीकरा इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी के सिर फोड़ा है । इनका आरोप है कि विजय झालानी ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी पर दबाव बना कर मीटिंग रद्द करने/करवाने का फैसला करवाया है । हरीश चौधरी जैन तो इसलिए बौखलाए हैं क्योंकि मीटिंग रद्द होने से उनकी भारी फजीहत हुई है; गौरव गर्ग इसलिए बौखलाए हैं क्योंकि पिछले कुछेक दिनों से वह हरीश चौधरी जैन के नजदीक होने की कोशिश कर रहे हैं और संदर्भित मीटिंग के सबसे बड़े समर्थक व 'वकील' बने हुए थे; मीटिंग के जरिये उन्होंने पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता को 'फँसाने' के मंसूबे बनाए हुए थे - मीटिंग रद्द हो जाने से लेकिन उनके मंसूबे धरे रह गए । 'कोढ़ में खाज' वाली बात यह हुई कि हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई और गौरव गर्ग द्वारा जोरशोर से समर्थित मीटिंग तो रद्द हो गई; लेकिन रीजनल काउंसिल सदस्यों व कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच रीजनल काउंसिल में चल रहे झगड़े-झंझट को लेकर अनौपचारिक मीटिंग हुई, जिसमें जो माहौल बना और बातें हुईं - वह हरीश चौधरी जैन तथा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के बीच चल रहे झगड़े-झंझट में अपना फायदा देख रहे गौरव गर्ग, नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग और रतन सिंह यादव की 'उम्मीदों' पर पानी फेरने वाला साबित हुआ । 
अनौपचारिक मीटिंग में मौजूद सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों को यह बात साफ साफ बता दी कि जैसा चल रहा है, यदि ऐसा ही चलता रहा तो रीजनल काउंसिल पदाधिकारियों के अधिकार 'छीन' लिए जायेंगे और रीजनल काउंसिल का काम इंस्टीट्यूट के अधिकारी करेंगे । यह सुन कर चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के तेवर ढीले पड़े । हरीश चौधरी जैन को यह सुन/जान कर और झटका लगा कि वह कोई भी काम और कोई भी फैसला सेक्रेटरी को विश्वास में लिए बिना नहीं कर सकते हैं । इस पर नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, गौरव गर्ग ने आपत्ति की, तो सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने बड़े 'प्यार' से उन्हें समझा दिया कि चेयरमैन के लिए ऐसा करना नियमानुसार जरूरी है; यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो फिर इंस्टीट्यूट कार्रवाई कर सकता है - सेक्रेटरी को विश्वास में लिए बिना बुलाई गई मीटिंग को रद्द करके इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इसका संकेत दे दिया है; अब यह चेयरमैन पर निर्भर करता है कि वह इस संकेत को समझे या न समझे । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को भी नसीहत दी कि उन्हें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के पालन पर भी ध्यान देना चाहिए; उन्हें यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उन्हें शामिल किए बिना कोई फैसला नहीं होने के नियम के चलते उन्हें मनमानी करने की छूट मिल जाएगी । दरअसल चेयरमैन हरीश चौधरी जैन का आरोप रहा कि सेक्रेटरी के रूप में पंकज गुप्ता काउंसिल के ऑफिस में तो कई कई दिनों तक आते नहीं हैं, और चाहते यह हैं कि काउंसिल में 'कोई वॉशरूम भी जाए तो उनसे पूछ कर जाए ।' सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने हरीश चौधरी जैन की इस शिकायत को गंभीरता से लिया, और पंकज गुप्ता को ऊपर वर्णित नसीहत दी । 
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने कुछ नियमों का हवाला देकर, कुछ इंस्टीट्यूट प्रशासन की कार्रवाई का डर दिखा कर और कुछ 'बड़े भाई' जैसी भूमिका निभाते हुए प्यार से समझा कर रीजनल काउंसिल सदस्यों - खासकर पदाधिकारियों को यह संदेश देने में फिलहाल तो कामयाबी प्राप्त कर ली है कि उन्हें मिलजुल कर काम करना है । इससे उम्मीद बनी है कि रीजनल काउंसिल में पिछले काफी समय से चला आ रहा गतिरोध खत्म होगा और अराजकता की जो स्थिति बनी थी, उससे छुटकारा मिलेगा । अधिकतर लोग इस 'नतीजे' से संतुष्ट हैं; लेकिन इस नतीजे से गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को चूँकि अपनी 'राजनीति' पिटती हुई दिख रही है, इसलिए वह इस नतीजे पर तरह तरह के 'किंतु' 'परंतु' लगा रहे हैं । मीटिंग में गौरव गर्ग ने तो सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ कुछेक मौकों पर बदतमीजीपूर्ण व्यवहार करने की कोशिश भी की । गौरव गर्ग ने एक मौके पर, जरूरत पड़ने पर दोबारा धरने पर बैठने की बात भी कही । पिछले दिनों धरने की नाटकबाजी के बाद कुछेक लोगों ने गौरव गर्ग को 'मिस्टर धरना गर्ग' कहना शुरू कर दिया है, इसलिए कल की मीटिंग में उन्होंने जब दोबारा धरने पर बैठने की बात कही, तो मीटिंग में मौजूद सभी लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई थी । रतन सिंह यादव ने मीटिंग में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मीटिंग के बाद कुछेक लोगों के बीच सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की यह कहते हुए आलोचना की कि वह रीजनल काउंसिल के कामकाज में नाहक ही हस्तक्षेप कर रहे हैं । असल में, रीजनल काउंसिल में जो झगड़ा चल रहा था, उसका सबसे ज्यादा फायदा गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव ही उठा रहे थे । बिल्लियों के झगड़े में बंदर के फायदा उठाने वाले किस्से को चरितार्थ करते हुए गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव झगड़ते सदस्यों के साथ दोस्ती गाँठने की कोशिश करते हुए नए नए समीकरण बनाने का प्रयास कर रहे थे, ताकि अगले चेयरमैन के चुनाव में वह अपना दावा ठोक सकें । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल सदस्यों से बात करके रीजनल काउंसिल में माहौल सामान्य बनाने का जो प्रयास किया है, उसमें गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को अपनी अपनी योजना फेल होती हुई दिख रही है, इसलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की भूमिका से वह भड़के हुए हैं । 

Thursday, April 25, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को चेतावनी मिली कि वह अविनाश गुप्ता को पदाधिकारियों व महिलाओं के साथ सही व्यवहार करना सिखाएँ और अविनाश गुप्ता व नितिन कँवर को रीजनल काउंसिल 'ठेके' पर देने की कोशिश न करें


नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में लगातार दूसरे टर्म सरकार द्वारा नोमीनेट किए गए सदस्य विजय झालानी का यह चार लाइनों का संदेश नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सूरते-हाल और उसके चेयरमैन की दशा को खुद-ब-खुद बयाँ कर देता है । जिस किसी को इस मेल-संदेश की जानकारी है, उसका यही कहना है कि हरीश चौधरी जैन में यदि जरा सा भी आत्मसम्मान है, तो उन्हें तुरंत चेयरमैन पद से इस्तीफा दे देना चाहिए । विजय झालानी का यह मेल-संदेश इस बात का पुख्ता सुबूत है कि हरीश चौधरी जैन रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी निभाने में तो विफल हो ही रहे हैं, चेयरमैन पद की गरिमा को भी बनाये/बचाये रखने में फेल साबित हुए हैं । रीजनल काउंसिल के कामकाज को उन्होंने जिस तरह से अविनाश गुप्ता और नितिन कँवर को 'ठेके' पर देने की कोशिश की है, जिसके कारण विजय झालानी ने डीसी में उनकी शिकायत करने की बात की है - इंस्टीट्यूट और रीजनल काउंसिल के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल ने यूँ तो एक से बढ़ एक घटिया सोच व व्यवहार के नाकारा चेयरमैन देखे/झेले हैं, लेकिन हरीश चौधरी जैन तो उन सब के गुरु साबित हो रहे हैं । पिछले टर्म में भी खूब खूब घटियापन हुआ था, और चेयरमैन्स की भूमिकाएँ आरोपों के घेरे में रही थीं, लेकिन किसी भी चेयरमैन ने अपने 'अधिकार' हरीश चौधरी जैन की तरह किसी और को दे दिए हों - यह देखने को नहीं मिला था । लोगों को हैरानी इस बात पर है कि हरीश चौधरी जैन को चेयरमैन के अधिकार जब दूसरों को ही देने थे और खुद कठपुतली बन कर ही रहना था, तो चेयरमैन बनने के लिए धोखाधड़ीभरी तिकड़म करने की उन्हें क्या जरूरत थी ?
इसे हरीश चौधरी जैन के नाकारापन के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है कि रीजनल काउंसिल में किसी भी पद पर न होते हुए भी अविनाश गुप्ता वाइस चेयरपरसन से बदतमीजी करते रहते हैं, और अभद्र व अशालीन भाषा में उन्हें लिखित में जबाव देते हैं । अविनाश गुप्ता इस बात का भी ख्याल नहीं रखते हैं कि वाइस चेयरपरसन के पद पर एक महिला है, और कम से कम एक महिला के साथ संवाद करते हुए तो उन्हें शालीन शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए । समझा जा सकता है कि अविनाश गुप्ता जब लिखित में अभद्र व अशालीन शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकते हैं, तो बोलचाल में तो और भी गंदे शब्दों का इस्तेमाल करते होंगे । इसके साथ ही, अविनाश गुप्ता जब रीजनल काउंसिल की चेयरपरसन के साथ अभद्र व अशालीन भाषा में बात कर सकते हैं, तो फिर स्टाफ की महिलाओं तथा काउंसिल में अपने अपने काम से आने वाली छात्राओं को भी कहाँ बख्शते होंगे ? रीजनल काउंसिल के पिछले टर्म में नितिन कँवर पर बदतमीजी करने के आरोप लगते थे, जिसके कारण दो-तीन बार तो पुलिस बुलाने की नौबत आ गई थी; इस टर्म में नितिन कँवर और अविनाश गुप्ता मिलकर दो नहीं, बल्कि 'ग्यारह' हो रहे हैं - और खास बात यह कि दोनों ही चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के बड़े प्यारे हैं और हरीश चौधरी जैन रीजनल काउंसिल को इन्हें ही 'ठेके' पर सौंपने को तैयार हैं । यही कारण है कि वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक ने अविनाश गुप्ता के अभद्र व अशालीन व्यवहार की शिकायत पहले चेयरमैन से ही की थी, लेकिन जब उन्हें चेयरमैन सुनवाई करते हुए नहीं दिखे तब वह अपनी शिकायत ऊपर तक ले गईं और तब विजय झालानी को चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को लिखना पड़ा कि वह अविनाश गुप्ता को पदाधिकारियों व महिलाओं के साथ सही व्यवहार करना सिखाएँ और अविनाश गुप्ता व नितिन कँवर को रीजनल काउंसिल 'ठेके' पर देने की कोशिश न करें ।
देखना दिलचस्प होगा कि विजय झालानी की इस चेतावनी का हरीश चौधरी जैन, अविनाश गुप्ता और नितिन कँवर के व्यवहार तथा रवैये पर कैसा क्या असर पड़ता है ? उनमें सचमुच कोई सुधार होता है, या वह अपने नाकारा व बदतमीजीभरे रवैये को ही बनाये रखते हैं ।

Saturday, March 3, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में पूजा बंसल का वोट जुटाने में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की मिलीभगत की चर्चाओं ने नवीन गुप्ता के कार्यकाल को संदेहों के घेरे में ला दिया है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में पूजा बंसल से पाला बदलवाने में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के 'इस्तेमाल' होने की खबरों/चर्चाओं ने मामले को खासा दिलचस्प और गंभीर बना दिया है । दरअसल पूजा बंसल के पाला बदलने और उन लोगों के साथ जा मिलने ने, जिनकी बेईमानी व बदतमीजी भरी हरकतों के खिलाफ वह पिछले करीब एक वर्ष से सघन और निरंतर अभियान चलाये हुए थीं - हर किसी को हैरान किया है । पूजा बंसल की तरफ से उनके पति मोहित बंसल जिस तरह चुनाव के कुल तीन-चार घंटे पहले तक विरोधी खेमे के नेताओं के साथ रणनीति तय कर रहे थे, उससे किसी को संदेह तक नहीं हुआ कि पूजा बंसल सत्ता खेमे के साथ मिल जा सकती हैं । पूजा बंसल की तरफ से पाला बदलने के कारण के रूप में विवेक खुराना का विरोध करने की मजबूरी का जो तर्क दिया जा रहा है, वह किसी को भी हजम नहीं हो रहा है । दरअसल पूजा बंसल के विरोध को देखते हुए ही विरोधी खेमे ने विवेक खुराना की जगह राजिंदर नारंग को चेयरमैन पद का उम्मीदवार चुन लिया था, लेकिन फिर भी पूजा बंसल का वोट पंकज पेरिवाल को ही मिला ।
इससे तथा अन्य कुछेक प्रसंगों से लोगों को आभास हुआ है कि पूजा बंसल का सत्ता खेमे के साथ जाना पहले ही तय हो चुका था, विरोधी खेमे के साथ अंत समय तक 'दिखने' के पीछे वास्तव में सत्ता खेमे को संचालित करने वाले नेताओं की सोची-समझी रणनीति थी - ताकि विरोधी खेमे के लोगों को अंत समय तक भ्रम में रखा जा सके । पूजा बंसल के पाला बदल ने सभी को हैरान तो किया ही, लोगों के बीच इस सवाल को भी पैदा किया कि पूजा बंसल ने आखिर किस स्वार्थ में यह कदम उठाया ? कोई भी यह मानने को तो तैयार नहीं ही है कि पूजा बंसल ने सेक्रेटरी बनने के लिए पाला बदला है । हर कोई मान रहा है कि पूजा बंसल के पाला बदलने के पीछे कोई बड़ा खेल है । तरह-तरह के कयासों के बीच जिस एक बात पर सभी की सहमति-सी बनती नजर आ रही है, वह मोहित बंसल को एक मामले में इंस्टीट्यूट से 'रिहा' करवाने का है ।
इसी मामले ने नवीन गुप्ता की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बना दिया है । उल्लेखनीय है कि एक पुराने आपराधिक मुकदमे को लेकर मोहित बंसल की शिकायत इंस्टीट्यूट में की गई है, जिस पर इंस्टीट्यूट पदाधिकारियों को फैसला लेना है । चर्चा है कि मोहित बंसल के पक्ष में फैसला करवाने का आश्वासन देकर पूजा बंसल के वोट की व्यवस्था की गई । एक आम समझ यह है कि ऐसा आश्वासन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट की तरफ से ही दिया जा सकता है । हालाँकि यह तो कोई भी नहीं मानेगा कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के लिए इस तरह ही डील प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता खुद करेंगे; लेकिन उनके नजदीकी सेंट्रल काउंसिल सदस्य - विजय झालानी, राजेश शर्मा और विजय गुप्ता जिस तरह पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के अभियान में लगे हुए थे; उससे किसी के लिए यह समझना भी मुश्किल नहीं हो रहा है कि पूजा बंसल का वोट जुटाने की डील प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के स्तर पर ही हुई होगी । नवीन गुप्ता के बारे में वैसे भी मशहूर है कि वह कोई भी 'डील' खुद नहीं करते हैं, बल्कि अपने लोगों के जरिए करते हैं । मजे की बात है कि जिन कुछेक लोगों को पूजा बंसल का वोट जुगाड़ने के लिए नवीन गुप्ता की मिलीभगत की थ्योरी पर विश्वास नहीं भी हो रहा है, उनके लिए भी नवीन गुप्ता के बचाव में कोई तर्क दे पाना संभव नहीं हो रहा है । किसी के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल ही है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की मिलीभगत के बिना अन्य कोई भी इंस्टीट्यूट से मोहित बंसल को - या अन्य किसी को भी अनुकूल फैसला करवाने का वायदा कर सकता है ।
नवीन गुप्ता की मिलीभगत से, पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के लिए पूजा बंसल का वोट जुटाने की चर्चाओं ने मामले को रोचक मोड़ दे दिया है । लोगों का कहना है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में नवीन गुप्ता की यदि कोई मिलीभगत नहीं भी है, तो भी यह कोई कम गंभीर बात नहीं है कि उनके नजदीकी - उनके साथ अपनी नजदीकियत का वास्ता देकर लोगों के साथ इंस्टीट्यूट में काम करवाने की 'सौदेबाजी' कर लें । लोगों का कहना है कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट यदि ऐसा व्यक्ति है, जिसे उसके नजदीकी जैसे जब चाहें - इस्तेमाल कर लेते हैं, तो यह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है । नवीन गुप्ता को एक शरीफ व्यक्ति के रूप में तो देखा/पहचाना जाता है, पर एक कुशल प्रशासक के रूप में लोगों को उनसे ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं - ऐसे में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में उनके इस्तेमाल हो जाने की चर्चाओं ने प्रेसीडेंट के रूप में उनके कार्यकाल को शुरुआत में ही संदेहों के घेरे में ला दिया है ।

Wednesday, February 21, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता और उनके पिता एनडी गुप्ता के नाम पर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनवाने की विजय झालानी की राजनीति ने पंकज पेरिवाल का और तमाशा बनाया

नई दिल्ली । राजेश शर्मा और विजय गुप्ता के बाद एनडी गुप्ता व नवीन गुप्ता का नाम लेकर विजय झालानी के भी पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के लिए कमर कस लेने के चलते, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन का चुनाव और भी दिलचस्प हो गया है । यह दिलचस्प इसलिए भी हो गया है क्योंकि इतने तुर्रमखाँओं के सक्रिय होने/रहने के बावजूद पंकज पेरिवाल छह सदस्यीय अल्पमत ग्रुप के उम्मीदवार ही बने हुए हैं, और सात सदस्यीय बहुमत ग्रुप के सदस्यों को उनके पक्ष में तोड़/जोड़ पाना मुश्किल क्या, असंभव बना हुआ है । दरअसल सात सदस्यीय बहुमत ग्रुप के सदस्यों को लग रहा है कि वह एकजुट रहते हैं, और अल्पमत के बाद भी पंकज पेरिवाल यदि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मदद से चेयरमैन बन भी जाते हैं - तो भी पूरे वर्ष महत्त्वपूर्ण मामलों में बहुमत की जरूरत को पूरा करने में वह पंकज पेरिवाल को नचाते रहेंगे और असली राजपाट उनके ही हाथ में होगा; और यह 'हार में भी जीत' का मजेदार नजारा होगा । इस नजारे को संभव करने के लिए सेंट्रल काउंसिल के बाकी सदस्यों ने चुपचाप बैठ तमाशा देखने की भूमिका में अपने आपको अवस्थित कर लिया है, और वह चाह रहे हैं कि राजेश शर्मा व विजय गुप्ता अपना वोट डाल कर पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवा ही दें - जिससे कि पूरे वर्ष उन्हें फजीहत का सामना करना पड़ेगा; चुनावी वर्ष में यह फजीहत राजेश शर्मा व विजय गुप्ता को भारी पड़ेगी और अपना गुल खिलायेगी ।
दरअसल इसी डर के चलते विजय गुप्ता ने अपने आप को राजेश शर्मा के साथ 'उस तरह से' नहीं जोड़ा है, जिस तरह से राजेश शर्मा उन्हें अपने साथ 'दिखा' रहे हैं । उल्लेखनीय है कि राजेश शर्मा दावा कर रहे हैं कि पंकज पेरिवाल के समर्थन में रीजनल काउंसिल में बहुमत यदि नहीं जुटा, तो वह और विजय गुप्ता वोट डाल कर पंकज पेरिवाल की बहुमत की जरूरत को पूरा करेंगे । विजय गुप्ता लेकिन एक अलग राग सुना रहे हैं - वह लोगों को बता रहे हैं कि विरोधी खेमे के सदस्यों में अधिकतर को नितिन कँवर व राजेंद्र अरोड़ा से समस्या है, इसलिए इन दोनों को निकाल कर पंकज पेरिवाल की चेयरमैनी में एक तीसरा नया ग्रुप बनाया जा सकता है । सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी ने दूर का पाँसा फेंका है, जिसके तहत वह विरोधी खेमे के कुछेक सदस्यों से कह रहे हैं कि एनडी गुप्ता और नवीन गुप्ता चाहते हैं कि पंकज पेरिवाल चेयरमैन बने - इसलिए कोई ऐसा समीकरण बनाओ कि राजेश शर्मा की पकड़ से छूट कर पंकज पेरिवाल चेयरमैन बन जाए । माना/समझा जा रहा है कि नवीन गुप्ता के प्रेसीडेंट-काल में उनका और उनके पिता एनडी गुप्ता का नाम लेकर विजय झालानी इंस्टीट्यूट में जो राजनीति करना चाह रहे हैं, उसकी शुरुआत उन्होंने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद को लेकर हो रही उखाड़-पछाड़ में शामिल होकर कर दी है । दरअसल इंस्टीट्यूट में विजय झालानी को सबसे पहले राजेश शर्मा से निपटना है, और इसके लिए वह पंकज पेरिवाल को राजेश शर्मा की गिरफ्त से निकाल कर अपनी पकड़ में लाना और रखना चाहते हैं और लोगों को 'दिखाना' चाहते हैं कि पंकज पेरिवाल को वह भी चेयरमैन बनवा सकते हैं ।
मजे की बात यह है कि इस सारी उठा-पटक में तमाशा बेचारे पंकज पेरिवाल का बन रहा है । रीजन के चुनावबाज नेताओं ने उन्हें फुटबॉल समझ रखा है, और उन पर अपनी अपनी किक इस्तेमाल कर रहे हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इससे पहले चेयरमैन पद के किसी उम्मीदवार का ऐसा तमाशा नहीं बना होगा, जैसा कि पंकज पेरिवाल का बना हुआ है । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने तो उन्हें लेकर अपनी अपनी पोजीशन ले ली है, और हर कोई उनके चेयरमैन बनने में अपना अपना फायदा देख रहा है । वास्तव में इसी से साबित हो रहा है कि हर कोई उन्हें मोहरा बना कर अपनी अपनी राजनीति सेट करने में लगा है, और कोई भी सचमुच में उनकी जीत का समीकरण बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रहा है । रीजनल काउंसिल में विरोधी खेमे के सदस्य उनके फोन तक नहीं उठा रहे हैं; चर्चा है कि चेयरमैन बनवाने की राजनीति से दूरी बनाए नजर आ रहे सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल के बहुमत ग्रुप के सदस्यों को समझा दिया है कि सारी कोशिश उनकी एकता को तोड़ने के लिए हो रही है, इसलिए पहली जरूरत अपनी एकता को बनाए रखने की है; रीजनल काउंसिल में बहुमत की एकता के विरोध के बाद भी पंकज पेरिवाल यदि चेयरमैन बन भी गया तो भी चुनावी वर्ष में यह उनके सभी विरोधियों के लिए फायदे की बात ही होगी । नॉदर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव का मजेदार सीन यही बना है कि हर किसी को लग रहा है कि चुनाव यदि रीजनल काउंसिल में बहुमत के आधार पर नहीं हुआ, तो पूरे वर्ष जो उठापटक होगी - वह पंकज पेरिवाल और उनके समर्थक सेंट्रल सदस्यों के लिए घातक ही साबित होगी ।

Saturday, October 21, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेक्रेटरी वी सागर के सख्त दिशा-निर्देशों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके 'लुटेरे गिरोह' के सदस्यों की मनमानियों पर रोक लगाने के साथ उनकी मुसीबतें भी बढ़ाई

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग दिल्ली में ही करने को लेकर जो कोड़ा फटकारा है, तो रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथी मीटिंग से बचने/भागने के लिए बहाने खोजने लगे हैं । बहाने खोजने में पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग ने जिस बेशर्मी का परिचय दिया, उसे देख कर बेशर्मी को भी शर्म आ गई होगी - दीपक गर्ग ने ऑडिट-सीजन का वास्ता देते हुए रीजनल काउंसिल की मीटिंग को स्थगित कर देने का सुझाव दिया है । मजे की बात है कि मीटिंग का समय तो उन्हीं लोगों ने तय किया है, समय तय करते हुए उन्हें ऑडिट-सीजन का ध्यान नहीं आया । ऑडिट-सीजन का ध्यान पिछले दस दिनों में उन्हें तब भी नहीं आया, जब रीजनल काउंसिल की मीटिंग लुधियाना में करने की तैयारी की जा रही थी । लुधियाना की बजाये दिल्ली में मीटिंग करने की बात आते ही दीपक गर्ग को ऑडिट-सीजन का ध्यान आ गया । दीपक गर्ग के बाद रीजनल काउंसिल के लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्यों ने भी जिस तरह से ऑडिट-सीजन का रोना शुरू किया है, उससे लग रहा है कि राकेश मक्कड़ इसी को बहाना बना कर ऐन मौके पर मीटिंग को स्थगित कर देने के चक्कर में हैं । राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्य हालाँकि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी की उस धमकी से भी डरे हुए हैं, जिसमें कहा गया है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने यदि नियमानुसार काम नहीं किया तो वह इंस्टीट्यूट में औपचारिक शिकायत दर्ज करवायेंगे ।
चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्यों को इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर के उस फैसले से भी तगड़ा झटका लगा है, जिसमें राजेश अग्रवाल की लगातार अनुपस्थिति का हवाला देते हुए रीजनल काउंसिल की सदस्यता को समाप्त करने के फैसले को निरस्त कर दिया गया है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के कुल 13 सदस्यों में सात सदस्यों के खिलाफ हो जाने की स्थिति को बैलेंस करने के लिए राकेश मक्कड़ ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता समाप्त करने की चाल चली । इसके लिए उन्हें इंस्टीट्यूट के एक नियम का सहारा भी मिल गया, जिसमें लंबे समय तक लगातार अनुपस्थित रहने वाले सदस्य की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान है । लेकिन इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता समाप्त करने के राकेश मक्कड़ के फैसले को मान्य नहीं किया । उनका तर्क है कि राजेश अग्रवाल जिस परिस्थिति में लगातार अनुपस्थित रहे, उस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए वह संदर्भित नियम के दायरे में नहीं आते हैं । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता के मुद्दे पर झटका देने के साथ-साथ ही रीजनल काउंसिल की मीटिंग दिल्ली में ही करने का फरमान जारी करके राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों की सारी योजना पर पानी फेरने का काम किया है । इसके बाद से ही राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग से बचने और मीटिंग को स्थगित कर देने के बहाने खोजना शुरू कर दिया है ।
उल्लेखनीय है कि राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने पहले तो रीजनल काउंसिल के 13 में से सात सदस्यों द्वारा की गई मीटिंग बुलाने की मांग को अनसुना करने का प्रयास किया; चौतरफा दबाव पड़ने पर जब रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग को अनसुना करना उनके लिए संभव नहीं रहा - तो उन्होंने मीटिंग दिल्ली में करने की बजाये लुधियाना में करने के जरिये अपने को बचाने की रणनीति बनाई । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने लेकिन राकेश मक्कड़ और उनके गिरोह के सदस्यों की लगातार जारी 'हरकतों' से तंग आकर जो सख्त रवैया अपनाया - उसके चलते राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा पाया है । उन्होंने जान/समझ लिया है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की सरपरस्ती भी अब उन्हें नहीं बचा पा रही है । कई लोगों को तो लगता है कि राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथियों की लगातार जो फजीहत और बदनामी हो रही है, उसके असली जिम्मेदार राजेश शर्मा ही हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की घटनाओं पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि राकेश मक्कड़ और उनके साथी मीटिंग को स्थगित करने के लिए जो चालबाजियाँ कर रहे हैं, उससे उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी ही । राजेश शर्मा की सलाहानुसार, राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने पिछले दिनों में अपने को बचाने के लिए जो भी हथकंडे आजमाये हैं, वह सभी न सिर्फ फेल हुए हैं - बल्कि उनकी परेशानियों को बढ़ाने और उनकी बदनामी करवाने वाले ही साबित हुए हैं । इसी से लगता है कि राकेश मक्कड़ 23 अक्टूबर की घोषित मीटिंग चाहें कर लें, या चाहें स्थगित कर दें - आगे का रास्ता उनके लिए मुसीबत और फजीहत भरा ही है ।

Saturday, September 30, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के मामले में राकेश मक्कड़ और उनके साथियों द्वारा दिखाई जा रही निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहेंगे ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे, वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा सेक्रेटरी वी सागर की बेपरवाही और कानों में तेल डाले बैठे होने की धृतराष्ट्री प्रवृत्ति ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी दिखाने का सुनहरा अवसर प्रदान किया हुआ है । गौरतलब है कि रीजनल काउंसिल के 13 में से सात सदस्यों ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए नोटिस दिया हुआ है, नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले सेंट्रल काउंसिल के तीन सदस्यों तथा एक नोमीनेटेड सदस्य ने उक्त नोटिस का समर्थन किया हुआ है - लेकिन फिर भी राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मी भरी चुप्पी साधे हुए हैं । इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के तीन सदस्य रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग कर सकते हैं । चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ इस नियम का खुल्लमखुल्ला मजाक बनाए हुए हैं - और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी आँखों पर पट्टी बाँध धृतराष्ट्र बने हुए हैं । राकेश मक्कड़ को अपनी इस बेशर्मीभरी निर्लज्जता में अपने साथी पदाधिकारियों का पूरा पूरा समर्थन मिला हुआ है । नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी या ट्रेजरर में से किसी एक के समर्थन से वाइस चेयरमैन भी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुला सकता है - लेकिन इस संबंध में वाइस चेयरमैन विवेक खुराना के प्रयासों को न तो सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा से और न ट्रेजरर सुमित गर्ग से समर्थन मिला है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन सहित सात सदस्यों - विवेक खुराना, राजिंदर नारंग, राजेश अग्रवाल, स्वदेश गुप्ता, आलोक जैन, योगिता आनंद और पूजा बंसल ने 17 सितंबर को सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा को संबोधित पत्र के जरिए 4 अक्टूबर को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग की । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हाल ही के दिनों में घटी घटनाओं के संदर्भ में विचार करने तथा जरूरी फैसले लेने का वास्ता देते हुए उक्त माँग की गई । उक्त माँग के साथ, बुलाई जाने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग के लिए रीजनल काउंसिल की कमेटियों के पुनर्गठन तथा चेयरमैन सहित रीजनल काउंसिल के अन्य पदाधिकारियों को दिए गए विशेषाधिकारों पर पुनर्विचार को प्रमुख एजेंडे के रूप में रेखांकित किया गया है । रीजनल काउंसिल के 13 सदस्यों में से सात सदस्यों द्वारा की जा रही इस माँग से स्वतः ही साबित है कि मीटिंग में राकेश मक्कड़ की मनमानी भरी लूट-खसोट पर लगाम लगना निश्चित ही है । पिछली एक मीटिंग में जिस तरह पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग तथा मौजूदा ट्रेजरर सुमित गर्ग द्वारा की गई लूट को पकड़ा गया था, जिसके चलते यह दोनों काउंसिल के खजाने से 'लूटी' गई रकम को वापस करने के लिए मजबूर हुए - उससे राकेश मक्कड़ बुरी तरह घबराए हुए हैं । अपनी बेईमानीभरी हरकतों के कारण राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल में बहुमत सदस्यों का समर्थन खो चुके हैं, इसलिए वह चुपचाप चेयरमैन पद पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर चुप्पी ओढ़े हुए हैं ।
राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि रीजनल काउंसिल में बहुमत बनाते सात सदस्यों की रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की तरफ से जोरदार और सक्रिय समर्थन मिला है । सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले संजय अग्रवाल, संजीव चौधरी तथा संजय वासुदेवा ने इंस्टीट्यूट के नियमों का हवाला देते हुए रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाए जाने की माँग का जोरदार तरीके से समर्थन किया । सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी का रवैया तो राकेश मक्कड़ के लिए खासा अप्रत्याशित रहा है । उल्लेखनीय है कि विजय झालानी कुछ समय पहले तक राकेश मक्कड़ के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं, जिसके चलते उनकी राजिंदर नारंग से झड़प भी हो गई थी - लेकिन राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत बनी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग का विजय झालानी ने खासी मुखरता के साथ समर्थन किया है । और सिर्फ समर्थन ही नहीं किया है, बल्कि इस मामले में लीपापोती-सी करते दिख रहे इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर तक से भिड़ गए । दरअसल, मामले में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियता से दबाव बढ़ता देख वी सागर ने राकेश मक्कड़ को संदेश लिखा/भेजा और उनसे मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया । इस पर विजय झालानी ने उन्हें तुरंत लिखा कि आप अनुरोध क्यों कर रहे हैं, नियमों के हवाले से आप मीटिंग बुलाने के लिए निर्देश दीजिए ।
राकेश मक्कड़ लेकिन तमाम हील-हुज्जत के बावजूद मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मों की तरह चुप्पी साधे हुए हैं । दरअसल वह समझ रहे हैं कि रीजनल काउंसिल की इस बार की मीटिंग उनकी और उनके साथियों की लूट-खसोट पर पूरी तरह रोक लगाने का काम करेगी - इसलिए वह किसी भी तरह मीटिंग करने से बचना चाहते हैं और इसके लिए अपनी फजीहत करवाने से लेकर इंस्टीट्यूट और उसके पदाधिकारियों तक की किरकिरी करवाने के लिए तैयार हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ और उनके साथियों की निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहते हैं ?

Tuesday, August 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत करने के कारण नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी को लेकर विवाद भड़का

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत के चक्कर में विजय झालानी खासे विवाद में फँस गए हैं । राकेश मक्कड़ की तरफ से सुनने को मिला कि 4 अगस्त को होने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग में विजय झालानी उनकी मदद के लिए उपस्थित रहेंगे, तो काउंसिल के कुछेक सदस्य भड़क उठे और उनकी तरफ से सुनाई दिया कि विजय झालानी यदि उक्त मीटिंग में आए और उन्होंने राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास किया तो उनका विरोध किया जाएगा । इन बातों के बीच विजय झालानी ने लोगों को कहा/बताया है कि 4 अगस्त को दिल्ली से बाहर होने के कारण उनका मीटिंग में शामिल हो सकना संभव ही नहीं होगा । इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए विजय झालानी ने यह भी साफ कहा कि उनका राकेश मक्कड़ से कोई संबंध नहीं है और उन्होंने कभी भी राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास नहीं किया है । उनका कहना है कि उन्हें नहीं पता कि राकेश मक्कड़ अपने साथ उनका नाम क्यों जोड़ते हैं, और क्यों कुछेक सदस्य उन्हें बदनाम करने का प्रयास करते हैं ? इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए उन्होंने दृढ़ता से कहा और दावा किया कि 4 अगस्त को वह यदि दिल्ली में होते भी, तो भी वह रीजनल काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं होते ।
विजय झालानी के स्पष्ट इंकार के बावजूद उन्हें लेकर विवाद यदि भड़का हुआ है, तो इसका कारण यह है कि सेंट्रल काउंसिल के कुछेक सदस्य भी इस विवाद को हवा देने में लगे हैं - जिनका कहना है कि कॉमन सेंस की बात है कि विवाद का यदि धुँआ है तो आग कहीं न कहीं तो होगी ही न ! विजय झालानी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य हैं । रीजनल काउंसिल के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल के भी कई सदस्यों का आरोप है कि नॉमिनेटेड सदस्य को अपनी जिस विशेष स्थिति तथा गरिमा का ध्यान रखना चाहिए, विजय झालानी प्रायः उसका उल्लंघन करते हैं और रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं । इस चक्कर में पिछली एक मीटिंग में रीजनल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य राजिंदर नारंग के साथ उनकी खासी झड़प भी हो गयी थी । काउंसिल सदस्यों का कहना है कि दूसरे नॉमिनेटेड सदस्य यदा-कदा ही इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नजर आते हैं, लेकिन विजय झालानी यहाँ अक्सर ही मौजूद रहते हैं और अपना ज्यादातर समय नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में बिताते हैं । राकेश मक्कड़ के चेयरमैन बनने के बाद से तो विजय झालानी का इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में उठना-बैठना और बढ़ गया है; राकेश मक्कड़ को उनके खाने-पीने की व्यवस्था करते/करवाते अक्सर ही देखा गया है ।
राकेश मक्कड़ की बड़ी समस्या यह है कि वह बेईमानियाँ और साजिशें तो कर सकते हैं, लेकिन अपने बचाव में अपनी वकालत नहीं कर सकते - इसलिए उन्हें हमेशा एक 'वकील' की जरूरत पड़ती है । विजय झालानी को उन्होंने अपने एक वकील के रूप में कुछेक मौकों पर इस्तेमाल किया । उनकी वकालत करने के कारण विजय झालानी की एक मीटिंग में राजिंदर नारंग से जो झड़प हुई थी, उसके बाद विजय झालानी हालाँकि राकेश मक्कड़ की वकालत करते हुए कहीं नहीं सुने/देखे गए हैं । किंतु 4 अगस्त को होने वाली मीटिंग में उनकी उपस्थिति की बात करके राकेश मक्कड़ ने उन्हें लेकर विवाद को खासा भड़का दिया है । उक्त मीटिंग में राकेश मक्कड़ के वकील की भूमिका सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा निभा सकते थे, लेकिन सीए डे फंक्शन में हुई बदइंतजामी और बेईमानी के आरोपों में राजेश शर्मा इस कदर घिरे हुए हैं कि अभी वह पर्दे के पीछे रहने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं । ऐसे में, राकेश मक्कड़ ने 4 अगस्त की मीटिंग में विजय झालानी को आगे रखने की योजना बनाई थी; उनकी इस योजना की भनक काउंसिल के दूसरे सदस्यों को लगी तो उन्होंने भी विजय झालानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया । विजय झालानी ने 4 अगस्त की रीजनल काउंसिल की मीटिंग से दूर रहने की घोषणा करके इस विवाद को थामने का प्रयास तो किया है, लेकिन नॉमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कामकाज में उनके द्वारा दिखाई जाती रही दिलचस्पी को देखते तथा याद करते हुए काउंसिल सदस्य विवाद को हवा देते हुए नजर आ रहे हैं - ताकि वह विजय झालानी को रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से सचमुच में रोके रख सकें ।

Tuesday, September 6, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विजय झालानी के साथ मिलकर तिकड़म लगाने की राकेश मक्कड़ की कोशिशों के बावजूद दीपक गर्ग के 'इस्तिफित चेयरमैन' बने रहने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 'इस्तिफित चेयरमैन' दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी रौनक को देख कर लोगों ने अनुमान लगाया है कि उन्हें अपनी कुर्सी बचने का पूरा भरोसा हो गया है । समझा जाता है कि दीपक गर्ग के इस्तीफे से शुरू हुए नाटक की रूपरेखा तैयार करने वाले मुख्य सूत्रधार राजेश शर्मा को इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी के कड़े रवैए के कारण अपनी योजना समेटनी पड़ रही है, और मामले को 'जहाँ जो जैसा है उसे वहीं पड़ा रहने देने' के लिए मजबूर होना पड़ा है । राजेश शर्मा के पीछे हटने से पंकज पेरिवाल के चेयरमैन बनने की संभावना पर तो ग्रहण लग ही गया है, चेयरमैन बनने की जुगाड़ में लगे दूसरे लोगों को भी अपनी दाल गलती हुई नहीं दिख रही है - और इसलिए वह भी अपनी अपनी कोशिशों को विराम देते हुए नहीं लग रहे हैं । राकेश मक्कड़ को हालाँकि अभी भी उम्मीद लगाए 'उम्मीदवार' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल पिछले दिनों उन्हीं की तरफ से यह बात लोगों को सुनने को मिली थी कि वह अभी हाल ही में सेंट्रल काउंसिल में नोमिनेट हुए विजय झालानी को नौ सितंबर की मीटिंग में लायेंगे तथा सत्ता गिरोह के बहुमत को और बढ़ायेंगे । उस बात से तथा उनकी कुछेक दूसरी बातों से लोगों को लगता है कि विजय झालानी के जरिए वह कोई चक्कर चलाने की फ़िराक में हैं और प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद नया चेयरमैन चुनवाने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं । राकेश मक्कड़ को लगता है कि प्रेसीडेंट के कोड़ा फटकारने के बाद चेयरमैन बनने/बनवाने वाले सारे सूरमा जब बिलों में दुबक गए हैं, तब सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी की मदद से वह चेयरमैन पद पा सकते हैं ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी के नोमीनेट होने से इंस्टीट्यूट की राजनीति में और 'रंगीनियत' व रोचकता आ गई है । इंस्टीट्यूट की राजनीति में नोमिनेटेड सदस्यों की और या उनकी किसी भूमिका की कभी कोई चर्चा नहीं सुनी गई, किंतु विजय झालानी नोमीनेट होते ही चर्चा में आ गए हैं - इससे ही साबित है कि विजय झालानी की बात ही कुछ खास है । वर्ष 1999-2000 में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके विजय झालानी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में काफी सक्रिय रहे हैं, और एनडी गुप्ता खेमे के 'आदमी' के रूप में पहचाने जाते हैं । सेंट्रल काउंसिल के पिछले तीनों चुनावों में उन्होंने एनडी गुप्ता के बेटे नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जमकर काम किया था । अगले चुनाव में उन्हें एनडी गुप्ता खेमे के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । विजय झालानी ने लेकिन सामने के रास्ते से आने की बजाए चोरी-छिपे खिड़की के रास्ते से सेंट्रल काउंसिल में आने का फैसला किया, और आ पहुँचे । इसके लिए उन्हें अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट रजिस्ट्रेशन को छोड़ने की जरूरत थी - जिसे छोड़ने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई । यानि जिस प्रोफेशन से उन्हें नाम और पहचान मिली, उस प्रोफेशन की गवर्निंग बॉडी में पद पाने के लिए उन्होंने उस प्रोफेशन को ही लात मार देने में देर नहीं लगाई । यह कुछ थोड़े से तथ्य जानना इसलिए जरूरी हैं, ताकि इस बात को समझा जा सके कि नोमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी की मौजूदगी क्यों कुछ खास है ? खास होने के कारण ही विजय झालानी के सहारे राकेश मक्कड़ यदि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने की तिकड़म लगा रहे हैं, तो यह बहुत स्वाभाविक सी बात है ।
विजय झालानी के साथ मिलकर राकेश मक्कड़ जो खिचड़ी पकाने की कोशिश कर रहे हैं, दीपक गर्ग और उनके नजदीकी उसे लेकिन गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग के नियमित संपर्क में रहने वाले लोगों में से उन कुछेक का, जिनसे बात हो सकी है, कहना है कि दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी खुशी से संकेत मिल रहा है कि चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर बने रहने का भरोसा मिल गया है । राजेश शर्मा की योजना में पंक्चर हो जाने को दीपक गर्ग अपनी एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं । दीपक गर्ग के चेयरमैन बने रहने की 'स्थितियाँ' बनाए रखने के लिए जो फार्मूला अपनाए जाने की चर्चा है, उसके अनुसार नौ सितंबर को होने वाली मीटिंग में दीपक गर्ग के इस्तीफे पर विचार ही नहीं किया जाएगा : इस तरफ न इस्तीफ़ा अस्वीकार करने की जरूरत पड़ेगी, और न दीपक गर्ग के लिए इस्तीफ़ा वापस लेने की नौबत होगी; और इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग चेयरमैन पर बने रहेंगे । दीपक गर्ग ने इस्तीफ़ा देने के लिए पाँच पृष्ठों में जो कारण बताए हैं, उन्हें देखते हुए तो दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर एक भी दिन बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है; लेकिन जहाँ पद पाने के लिए लोग ईमान और प्रोफेशन छोड़ने को तैयार बैठे हों, वहाँ दीपक गर्ग को नैतिकता की परवाह करने की जरूरत ही क्या है ?
राजेश शर्मा द्धारा संयोजित और निर्देशित नाटक को फेल करने के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट द्धारा जो फार्मूला बताया गया है, उसे नौ सितंबर की मीटिंग में यदि सफलतापूर्वक अपना लिया जाता है; और दीपक गर्ग के चेयरमैन पद पर बने रहने का रास्ता यदि साफ हो जाता है तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में एक नया पद देखने को मिलेगा : इंस्टीट्यूट में चेयरमैन अभी तक दो ही तरह के हैं - एक 'चेयरमैन' और दूसरा 'भूतपूर्व चेयरमैन'; दीपक गर्ग लेकिन तीसरी तरह के चेयरमैन होंगे - 'इस्तिफित चेयरमैन' यानि इस्तीफ़ा देने के बावजूद बना रहने वाला चेयरमैन । इंस्टीट्यूट के इतिहास में ऐसा चेयरमैन पहली बार देखने को मिलेगा ।