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Sunday, October 18, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी शुरू कर चुके पंकज पेरिवाल अपनी बिल्डिंग के किरायेदार एक उद्यमी की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने के आरोप में फँसे

लुधियाना । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन पंकज पेरिवाल के बारे में चर्चा तो यह सुनी/सुनाई जा रही थी कि वह इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन अखबारों में पढ़ने को मिल रहा है कि लुधियाना पुलिस उन्हें जेल ले जाने के लिए खोज रही है और वह बचते/छिपते फिर रहे हैं । अखबारी खबरों के अनुसार, पंकज पेरिवाल को एक उद्यमी सुरिंदर सिंह को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने का आरोपी बताया जा रहा है । मृतक की बेटी द्वारा लिखवाई रिपोर्ट में पंकज पेरिवाल पर आरोप है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर सुरिंदर सिंह का पैसा और जमीन हड़प लिया, जिससे परेशान और निराश होकर उन्होंने अपनी जान दे दी । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि दो वर्ष पहले भी लगभग इन्हीं दिनों पंकज पेरिवाल के ऑफिस पर पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे की खबरें प्रकाशित हुई थीं । उस समय पंकज पेरिवाल नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे । अपने ऑफिस पर पड़े छापे की खबर के अखबारों में छपने से पंकज पेरिवाल इस कदर फजीहत का शिकार बने थे, कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों का वह ठीक से निर्वाह नहीं कर पाए थे । 
अपने ऑफिस पर पड़े छापे की खबर के अखबारों में छपने के कारण हुई फजीहत के चलते पंकज पेरिवाल उस वर्ष हुए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव भी नहीं लड़ पाए थे । वर्ष 2018 में पंकज पेरिवाल ने रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने की तिकड़म दरअसल की ही इसलिए थी, क्योंकि उन्हें सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना था - और इसीलिए अपनी तिकड़म में कामयाब होने पर वह खासे उत्साहित थे और सेंट्रल काउंसिल पद के लिए उन्होंने जोरशोर से तैयारी शुरू कर दी थी । लेकिन ऑफिस पर पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे की खबरों ने उनकी तैयारी पर पानी फेर दिया था । उन्होंने छापे की खबरों को एक अलग रूप देने तथा अपने आप को पाकसाफ दिखाने/बताने का प्रयास तो खूब किया, लेकिन उन्होंने खुद महसूस किया कि उनके प्रयास ज्यादा सफल नहीं हो सके हैं - और इसलिए उन्होंने उस वर्ष सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का विचार छोड़ दिया । दो वर्ष पहले हुए सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उम्मीदवार न बन सकने की कमी को पंकज पेरिवाल ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए अगले वर्ष होने वाले चुनाव में दूर करने की बात करना शुरू कर दिया था और उन्हें अगले चुनाव के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा था ।
लेकिन, पंकज पेरिवाल ने अपनी उम्मीदवारी की चर्चा अभी शुरू ही की/करवाई थी कि वह एक बार फिर अखबारी सुर्खियों में छा गए । इस बार का मामला बल्कि ज्यादा गंभीर बताया/समझा जा रहा है ।पंकज पेरिवाल को एक उद्यमी की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । मामला हालाँकि अभी आरोप की शक्ल में है, और जाँच के बाद ही सारी सच्चाई सामने आ सकेगी - लेकिन आरोप चूँकि संगीन प्रकृति के हैं, इसलिए पंकज पेरिवाल के लिए मुसीबत की बात तो है ही । पंकज पेरिवाल पर आरोप है कि पहले तो उन्होंने सुरिंदर सिंह की कंपनी में तीन-तिकड़म से चार्टर्ड एकाउंटेंट का काम लिया । सुरिंदर सिंह की कंपनी का ऑफिस चूँकि पंकज पेरिवाल की बिल्डिंग में किराए पर है, इसलिए पंकज पेरिवाल के लिए उनका विश्वास जीतना आसान हुआ । विश्वास जीत कर पंकज पेरिवाल ने कंपनी के कामकाज तथा हिसाब-किताब में गड़बड़ियाँ करना शुरू किया, जिसके चलते कंपनी का घाटा बढ़ता गया । घाटे की भरपाई के लिए पंकज पेरिवाल ने सुरिंदर सिंह पर दबाव बना कर उनकी संपत्ति के कागज ले लिए । इसी बात से परेशान व निराश होकर सुरिंदर सिंह ने आत्महत्या कर ली । सुरिंदर सिंह की बेटी द्वारा लिखवाई गई पुलिस रिपोर्ट में पंकज पेरिवाल को ही सुरिंदर सिंह की आत्महत्या के लिए दोषी ठहराया गया है । पंकज पेरिवाल के नजदीकियों को भी लग रहा है कि इस मामले के चलते लगता है कि पंकज पेरिवाल की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी अबकी बार भी खतरे में पड़ गई है । 

Tuesday, February 5, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के यहाँ पड़े छापे की खबर का हवाला देते हुए वित्त मंत्रालय को भेजी चिट्ठी ने रीजनल कॉन्फ्रेंस में खिंची तस्वीरों के जरिये केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ नजदीकी दिखाने का पंकज पेरिवाल का 'टशन' सचमुच हवा कर दिया है क्या ?

नई दिल्ली/लुधियाना । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की रीजनल कॉन्फ्रेंस में जुगाड़बाजी से केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल का सम्मान करने का कार्यक्रम करके पंकज पेरिवाल ने करीब सात महीने पहले लुधियाना स्थित अपने ऑफिस में पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे के मामले को लोगों के बीच एक बार फिर चर्चा में ला दिया है । दिलचस्प नजारा यह देखने/सुनने में आया है कि पंकज पेरिवाल अपने एक कार्यक्रम में पीयूष गोयल को बुलवा कर जब 'टशन' दिखा रहे थे, लगभग तभी पीयूष गोयल को संबोधित एक चिट्ठी भेजी गई थी जिसमें पंकज पेरिवाल के यहाँ पड़े छापे का हवाला देकर आशंका व्यक्त की गई कि केंद्रीय मंत्री के साथ अपनी नजदीकी दिखा कर पंकज पेरिवाल अपने मामले को प्रभावित करने की 'व्यवस्था' तो नहीं कर रहे हैं ? पीयूष गोयल को संबोधित तथा वित्त मंत्रालय को भेजी चिट्ठी में जुलाई महीने में लुधियाना में पंकज पेरिवाल के ऑफिस पर पड़े छापे का पूरा विवरण दिया गया है तथा उक्त छापे को लेकर स्थानीय मीडिया में प्रकाशित हुई खबरों की क्लीपिंग्स भी नत्थी की गई हैं । उक्त चिट्ठी की फोटो प्रतिलिपि 'रचनात्मक संकल्प' को भी प्राप्त हुई है । चिट्ठी में अनुरोध किया गया है कि वित्त मंत्री और मंत्रालय के अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रीजनल कॉन्फ्रेंस में खिंची/खिंचवाई गई तस्वीरों के जरिये पंकज पेरिवाल वित्त मंत्री के साथ अपनी नजदीकी का संकेत और 'सुबूत' दिखा कर अपने मामले की जाँच को कहीं प्रभावित न कर/करवा लें ।
वित्त मंत्री को संबोधित और वित्त मंत्रालय को भेजी गई चिट्ठी में व्यक्त की गई आशंका इसलिए और गंभीर दिख रही है क्योंकि पंकज पेरिवाल ने कार्यक्रम में वित्त मंत्री पीयूष गोयल के साथ खिंची अपनी तस्वीरों को बड़े पैमाने पर प्रसारित किया है और इसके लिए सोशल मीडिया से लेकर रीजनल काउंसिल के संसाधनों का भरपूर उपयोग किया है । मजे की बात यह है कि रीजनल कॉन्फ्रेंस में पीयूष गोयल के सम्मान का कार्यक्रम पहले से प्रस्तावित नहीं था, और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों तक को उसकी भनक भी नहीं थी । खुद पंकज पेरिवाल ने काउंसिल के सदस्यों को बताया कि रीजनल कॉन्फ्रेंस जहाँ हो रही थी, उसके नजदीक ही हो रहे एक अन्य कार्यक्रम में पीयूष गोयल मौजूद थे; इसे जान/देख कर उनसे अनुरोध किया गया कि कुछ देर के लिए वह रीजनल कॉन्फ्रेंस में भी आ जाएँ - जहाँ उनका सम्मान किया जा सके, और पीयूष गोयल इसके लिए राजी हो गए । यानि पीयूष गोयल का रीजनल कॉन्फ्रेंस में आना पंकज पेरिवाल और सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा जैसे उनके साथी की जुगाड़बाजी के चलते हुआ । लोगों को शक है कि यह जुगाड़बाजी करते हुए पीयूष गोयल से इस तथ्य को भी अवश्य ही छिपाया गया होगा कि रीजनल कॉन्फ्रेंस करने वाली संस्था - नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के प्रमुख पंकज पेरिवाल, जिनके साथ उनकी तस्वीरें भी खिंचेंगी, इनकम टैक्स विभाग की जाँच-पड़ताल के 'राडार' पर हैं और जाँच-पड़ताल की प्रक्रिया में विभाग की एक टीम उनके यहाँ छापा मार चुकी है । 
जुगाड़बाजी से और पीयूष गोयल को अँधेरे में रख कर पंकज पेरिवाल ने पीयूष गोयल के साथ तस्वीरें तो खिंचवा लीं और उन्हें बड़े पैमाने पर प्रसारित भी करवा लिया, लेकिन इसके साथ ही करीब सात महीने पहले अपने यहाँ पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे की खबर को भी फिर से जीवित कर दिया - अन्यथा लोग उस बात को भूलभाल गए थे । पंकज पेरिवाल के नजदीकियों का कहना है कि छापे की खबर के फिर से जीवित हो उठने से अपने कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल को बुलवाने से बने/बनाये गए पंकज पेरिवाल के 'टशन' में खलल पड़ गया है । दरअसल, जैसा कि इन्हीं नजदीकियों का बताना/कहना है कि रीजनल कॉन्फ्रेंस में पीयूष गोयल के आने और तस्वीरें खिंचने/मिलने के बाद पंकज पेरिवाल खासे जोश में थे, और इतराते हुए बार बार कह रहे थे कि जिन केंद्रीय वित्त मंत्री को इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट अपने कार्यक्रम में नहीं बुलवा सके, उन्हें मैंने अपने कार्यक्रम में बुलवा लिया । इस बात से पंकज पेरिवाल इतने जोश और घमंड में थे कि रीजनल काउंसिल के अपने साथी पदाधिकारियों और सदस्यों की आपत्तियों/शिकायतों को लेकर बेपरवाह बने हुए थे । नजदीकियों का कहना/बताना है कि लेकिन जैसे ही पंकज पेरिवाल को अपने यहाँ पड़े छापे का हवाला देते हुए वित्त मंत्री को संबोधित तथा वित्त मंत्रालय को भेजी गई चिट्ठी का पता चला, उनका 'टशन' और घमंड जैसे हवा हो गया और उन्होंने अपने आप को फजीहत का शिकार बनते हुए पाया । 

Monday, October 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को प्रस्तुत करने के बावजूद, लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनके साथियों को बुरी तरह से निराश किया है

नई दिल्ली । गुड़गाँव ब्राँच के पूर्व चेयरमैन संजय कुमार अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हुए अपना 'विजनरी' रूप तो बहुत ही जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया है, लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके 'विजन' से उनकी उम्मीदवारी के लिए अपील पैदा होती नहीं दिख रही है । संजय कुमार अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि लोग उनकी बातें सुनते/पढ़ते तो हैं, लेकिन 'रिएक्ट' नहीं करते हैं - उत्साहित नहीं होते हैं । नजदीकियों के अनुसार, संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को उम्मीद थी कि वह एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर लोगों के बीच जायेंगे - तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एक नई ऊर्जा से भर जायेंगे और देखेंगे/सोचेंगे कि उनके बीच प्रोफेशनली उनकी फिक्र करने वाला उम्मीदवार आया है; और यह देख/सोच कर उन्हें हाथों-हाथ लेंगे । लेकिन लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को बुरी तरह से निराश किया है । किसी ने मजाक में कहा कि संजय कुमार अग्रवाल ने जिस तरह की बातें की हैं, उनमें प्रोफेशन में 'अच्छे दिन' लाने का वायदा है; लोग लेकिन 'अच्छे दिन' के वायदे से डरे हुए हैं - 'अच्छे दिन' के वायदे में ठगे जाने का उनका अनुभव चूँकि ताजा ताजा है, इसलिए संजय कुमार अग्रवाल की बातों में दिलचस्पी लेने में किसी ने जरूरत नहीं समझी । प्रोफेशन से जुड़े वरिष्ठ लोगों का यह भी कहना है कि तकनीकी विकास के चलते कई क्षेत्रों में कामकाज में जो परिवर्तन आए हैं, उसे और उसके प्रभाव को गहराई से समझे बिना उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर संजय कुमार अग्रवाल जिस तरह चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन में भी उसी फार्मूले को इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं - उससे वह साबित कर रहे हैं कि उन्होंने न उस 'परिवर्तन' को गहराई से समझा है और न चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन को तथा उससे जुड़े लोगों की जरूरतों को ही जाना/समझा है । 
संजय कुमार अग्रवाल 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे कामों का उदाहरण देते हुए आह्वान कर रहे हैं कि चार्टर एकाउंटेंट्स भी 'रिकॉर्डिंग' 'रिपोर्टिंग' के भरोसे कब तक काम करते रहेंगे ? बिना कैश के खरीदारी करने की सुविधा को वह बड़ी उपलब्धि की तरह पेश कर रहे हैं । उनके उदाहरण और तर्क से पहली ही नजर में लग गया है कि उन्हें मामलों की गहरी जानकारी नहीं है, और वह सिर्फ ऊपर ऊपर की बातों को लेकर जुमलेबाजी कर रहे हैं । दरअसल नई आर्थिक नीतियों और तकनीकी विकास ने कामकाज और समाज पर व्यापक असर डाला है, और कई कामकाज के रूपों में भारी बदलाव हुए हैं । इन बदलावों के चलते कामकाज की शक्ल तो बदली है, लेकिन बुनियादी समस्याएँ जहाँ की तहाँ ही बनी रही हैं । जैसे 'बिना दुकान के सामान बेचने' की व्यवस्था में बदलाव सिर्फ यही तो हुआ है कि दुकान वाले स्टॉक रखने वाले बन गए और दुकान में काम करने वाले कूरियर ब्यॉय बन गए । 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' वाला इसीलिए तो सर्विस दे पा रहा है, क्योंकि अपने खून-पसीने की कमाई की बचत से गाड़ी खरीदने वाला और उसकी ड्राईवरी करने वाला मौजूद है । तकनीकी विकास ने चूँकि लोगों के बीच संपर्क और पहुँच को आसान बना दिया है, इसलिए उसका फायदा उठा कर कुछेक लोगों ने नेटवर्किंग का विस्तार करके कामकाज को एक नया रूप दिया है । किंतु यह नया रूप दिया तो उन लोगों के भरोसे ही है, जो पहले से ही काम कर रहे थे - और नया रूप देने का काम करने वाले भी कितने लोग हैं ? और इस नए रूप में जिन लोगों को फायदा भी हुआ है, उनकी संख्या भी कोई बहुत ज्यादा नहीं है - और उनका यह फायदा भी पहले के लोगों के नुकसान की कीमत पर ही हुआ है । इसे उपलब्धि भला कैसे माना जा सकता है ? कैश के बिना खरीदारी करने के दावे का भला क्या मतलब है ? यह ठीक है कि तकनीकी विकास के चलते कैश जेब में रखने की मजबूरी खत्म हो गई है, और कॉर्ड से खरीदारी करने की सुविधा है - लेकिन इस बात को 'बिना कैश के खरीदारी' करना कैसे कहा जा सकता है ? बिना कैश के खरीदारी करने का दूसरा तरीका - उधार लेना है । संजय कुमार अग्रवाल क्या इसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं ?
कामकाज के जो तौर-तरीके बदले हैं, उसका प्रभाव तो चार्टर्ड एकाउंटेंट के काम पर भी पड़ा है । संजय कुमार अग्रवाल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' के झंझट से मुक्ति दिलवाने का जो आह्वान कर रहे हैं, एंट्री का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तो उससे पहले से ही मुक्त हैं । सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए उम्मीदवार बने राजेश शर्मा के बारे में तो लोग कहते ही हैं कि वह 'रिकॉर्डिंग' और रिपोर्टिंग' करते हुए एक चार्टर्ड एकाउंटेंट की तरह काम कहाँ करते हैं ? लेकिन सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स राजेश शर्मा जैसे तो नहीं हो सकते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पिछले दिनों इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों के आ धमकने के बाद पता चला कि पंकज पेरिवाल ने अपने दो क्लाइंट्स को अपने ऑफिस का पता इस्तेमाल करने का अधिकार दिया हुआ था । यह मुफ्त में तो नहीं ही दिया गया होगा, और इसके लिए कोई अधिकृत 'रिपोर्टिंग' और 'रिकॉर्डिंग' भी नहीं की गई होगी । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' से मुक्त करने/करवाने की इच्छा रखने वाले संजय कुमार अग्रवाल कहीं पंकज पेरिवाल से भी तो प्रेरणा नहीं ले रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि कुछेक चार्टेड एकाउंटेंट्स जुगाड़ और तिकड़म से काम जुटा लेते हैं, और फिर उस काम को दूसरे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से करवाते हैं । निस्संदेह इससे काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम तो मिलता है, लेकिन इसे क्या आदर्श स्थिति कह सकते हैं ? संजय कुमार अग्रवाल जिस तकनीकी विकास पर 'उछल' रहे हैं, उसने देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई को चौड़ी करने का ही काम किया है । प्रोफेशन में भी यही हुआ है - फर्जी और जुगाड़ू का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'बड़े' बनते गए हैं, जबकि जेनुइन काम करने वाले लोगों की सिर्फ मुश्किलें ही बढ़ी हैं । संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन में 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे जो उदाहरण दे रहे हैं, उसमें क्या सभी के लिए फलने-फूलने के मौके हैं ? यदि होते तो छोटे और मंझले दुकानदारों को बड़े स्टोर्स के कारण और शहरों में टैक्सी चालकों को टैक्सी सर्विस प्रोवाईडरों के कारण कामधंधे में नुकसान क्यों उठाना पड़ता ? 
तो क्या संजय कुमार अग्रवाल के विजन में सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए फलने-फूलने के मौके नहीं हैं, और उनका विजन तकनीकी विकास का सहारा लेकर सिर्फ कुछेक लोगों के लिए ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है ? दरअसल इसीलिए संजय अग्रवाल का विजन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच कोई दिलचस्पी और उत्साह पैदा करता हुआ नजर नहीं आया है । संजय कुमार अग्रवाल के कुछेक शुभचिंतकों का हालाँकि कहना है कि यह संजय कुमार अग्रवाल के विजन की नहीं, बल्कि संजय कुमार अग्रवाल की विफलता है - और वह इसलिए क्योंकि संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन को लोगों के बीच प्रभावी व कन्विंसिंग तरीके से नहीं रख पा रहे हैं । कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि अपने विजन के प्रति अपील पैदा करने के लिए संजय कुमार अग्रवाल को प्रमुखता से जिन बातों को रखना चाहिए, उनका चयन करने में वह विफल रहे हैं - और इस कारण लोगों के बीच उन्हें लेकर कोई उत्सुकता या समर्थन का भाव पैदा नहीं हुआ है और उनकी सारी कवायद बेकार जाती नजर आ रही है ।

Saturday, September 29, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के सामने एक सवाल : आप यह उम्मीद क्यों करते हैं कि आप खुद तो बहुत ही नीचता की, घटियापन की, टुच्चेपन की, बेईमानी की हरकतें करेंगे - और कोई पत्रकार और ब्लॉग आपकी हरकतों पर चुप रहे ?

['रचनात्मक संकल्प' के पते पर एक अनजान व्यक्ति एक लिफाफा दे गया, जिसे खोलने पर  सीए सत्येंद्र कुमार गुप्ता का एक पत्र मिला, जिसके साथ अनुरोध था कि यह पत्र यदि 'रचनात्मक संकल्प' में प्रकाशित होगा, तो ज्यादा लोगों तक पहुँच सकेगा और इसमें उठाए गए मुद्दे पर व्यापक चर्चा हो सकेगी । विषय की गंभीरता को देखते हुए उक्त पत्र को यहाँ हू-ब-हू प्रकाशित किया जा रहा है । संपादन के नाम पर हमने कुछेक मात्राओं को और कुछेक वाक्यों को दुरुस्त भर किया है ।]

टीम NIRC के प्रिय साथियों,
इंस्टीट्यूट और उसके पदाधिकारियों की पब्लिक इमेज को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए आपका खासा लंबा-चौड़ा मैसेज मैंने भी पढ़ा और मुझे यह देख कर वाकई अच्छा लगा कि आप लोग इंस्टीट्यूट के Torch Bearer पदाधिकारियों और सदस्यों की पब्लिक इमेज को लेकर चिंतित हैं और उसे सुरक्षित करने/रखने की जरूरत समझते हैं । इस जरूरत को समझने और इसके लिए आवश्यक कार्रवाई की पहल करने के लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ ।
लेकिन मैं बहुत ही अफ़सोस के साथ यह भी महसूस करता हूँ कि मामले को व्यापक रूप से समझने की बजाये आपने मामले को बहुत ही चलताऊ और एकांगी तरीके से निपटा दिया है, तथा सारा दोष एक ब्लॉग पर मढ़ दिया है । इंस्टीट्यूट के आयोजनों में माननीय प्रधानमंत्री जी और माननीय राष्ट्रपति जी क्या क्या कह गए हैं, यह आपको पता ही होगा । उन्होंने अपने अपने भाषणों में जो कहा है, वह यदि सच है तो इसका मतलब क्या यह नहीं है कि इंस्टीट्यूट के Torch Bearer पदाधिकारी और सदस्य अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में विफल रहे हैं - उनकी विफलता के लिए उक्त ब्लॉग कैसे जिम्मेदार हुआ ? इंस्टीट्यूट के Torch Bearer पदाधिकारियों और सदस्यों के खिलाफ आम और खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी अक्सर ही देखने/सुनने को मिल जाती है, क्या उसके लिए उक्त ब्लॉग जिम्मेदार है ? पिछले वर्ष सीए डे फंक्शन में जो तमाशा हुआ था, और जिसके लिए तमाम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने आपके एक  Torch Bearer सदस्य को जिम्मेदार ठहराया था - उसके लिए क्या उक्त ब्लॉग जिम्मेदार है ? NIRC में पिछले करीब ढाई वर्षों में जो कुछ होता रहा है, और सदस्य एक-दूसरे के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते रहे हैं और इंस्टीट्यूट में शिकायत करते रहे हैं - क्या उसके लिए उक्त ब्लॉग जिम्मेदार है ? NIRC की एक मीटिंग में नितिन कँवर ने काउंसिल की एक महिला सदस्य के साथ इस हद तक बदतमीजी की, कि उक्त महिला सदस्य को मीटिंग के बीच में ही पुलिस बुलाने की कार्रवाई करना पड़ी - इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी के हस्तक्षेप के बाद ही मामला संभला, इसके लिए क्या उक्त ब्लॉग जिम्मेदार है ? नितिन कँवर की ही बदतमीजियों की शिकायत करते हुए एक महिला स्टॉफ द्वारा पुलिस में रिपोर्ट करने के हालात बने, जिसे किसी तरह निपटाया गया - क्या इसके लिए उक्त ब्लॉग जिम्मेदार है ?      
टीम NIRC के साथियों, इंस्टीट्यूट और उसके Torch Bearer पदाधिकारियों और सदस्यों की तथा टीम NIRC की पब्लिक इमेज बिगड़ने के लिए किसी बाहरी संस्था या व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने से ज्यादा जरूरी क्या यह नहीं होना चाहिए कि पहले आप अपने गिरेबाँ में भी झाँके ?
हो सकता है कि इंस्टीट्यूट और NIRC में होने वाले मामलों को उक्त ब्लॉग बढ़ा-चढ़ा कर और नमक-मिर्च लगा कर प्रस्तुत करता हो; पर सवाल यह है कि उसे ऐसा करने का मौका कौन देता है और सच्चाई को सामने क्यों नहीं आना चाहिए  ? आप यह उम्मीद क्यों करते हैं कि आप खुद तो बहुत ही नीचता की, घटियापन की, टुच्चेपन की, बेईमानी की हरकतें करेंगे - और कोई पत्रकार और ब्लॉग आपकी हरकतों पर चुप रहे ? मुझे यह देख कर वास्तव में अफसोस हुआ कि इंस्टीट्यूट के Torch Bearer पदाधिकारियों और सदस्यों तथा टीम NIRC की पब्लिक इमेज की चिंता करते हुए आप 'अपनी' हरकतों पर तो एक शब्द भी नहीं कहते हैं, और सारा आरोप 'दूसरों' पर - बाहरी लोगों पर, एक ब्लॉग पर थोप देते हैं ।  
साथियों, आपने जिस ब्लॉग पर निशाना साधा है, उस ब्लॉग की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहुँच और विश्वसनीयता को लेकर मैं खुद हैरान होता रहा हूँ । मैं यह देख कर सचमुच चकित होता रहा हूँ कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स न सिर्फ उसकी रिपोर्ट्स को दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं और उस पर चर्चा करते हैं, बल्कि सोशल मीडिया में उन्हें शेयर भी करते हैं । उस ब्लॉग की रिपोर्ट्स मुझे हमेशा ही आश्चर्य में डालती रही हैं कि काउंसिल की जो जानकारियाँ हम वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भी नहीं होती हैं, वह उस तक कैसे पहुँच जाती हैं और कभी कभी तो 'इधर घटना घटी, और उधर सूचना पहुँची' वाला मामला होता है । यह बात मुझे आश्चर्य में इसलिए डालती है, क्योंकि मैं हमेशा ही काउंसिल पदाधिकारियों और सदस्यों को उस ब्लॉग के खिलाफ बात करते हुए ही पाता/सुनता हूँ ।  मैंने जब जब उस ब्लॉग की जोरदार सफलता के कारणों को समझने की कोशिश की है, तब तब मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि उस ब्लॉग ने चूँकि इंस्टीट्यूट और काउंसिल्स के बड़े नेताओं और पदाधिकारियों द्वारा आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से छिपा कर की जाने वाली बेईमानियों की पोल खोली है, तथा बड़े नेताओं और पदाधिकारियों द्वारा प्रताड़ित और अपमानित हुए लोगों का साथ दिया है, उनकी आवाज बना है - इसलिए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उसकी साख और विश्वसनीयता बनी है । बड़े नेताओं और पदाधिकारियों तथा उनके आसपास रहने वाले लोगों ने उस ब्लॉग की भले ही एक नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश की है, लेकिन काउंसिल्स में होने वाली बेईमानियों और अपमान व प्रताड़नापूर्ण व्यवहार का शिकार होने वाले लोगों को - चाहें वह काउंसिल्स केसदस्य हों, स्टाफ हों और या वेंडर्स हों - वह ब्लॉग, अनजान होते हुए भी, अपना विश्वसनीय साथी और अपना दुःख बाँटने वाला लगा है । 
NIRC की एक मीटिंग में नितिन कँवर को काउंसिल के ही एक वरिष्ठ सदस्य पर निहायत बदतमीजी और अशालीन तरीके से चिल्लाते हुए और उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए मैंने एक ऑडियो क्लिप में सुना है । अभी हाल ही में हुई एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा के बीच हुए झगड़े की कुछेक बातों की ऑडियो क्लिप भी मैंने सुनी है, जिसमें दोनों लोग एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं ।  इन क्लिप्स को जिस किसी ने भी सुना है, उसे यह जानकर अफसोस ही हुआ है कि NIRC में इस तरह के सड़क छाप लोग भी हैं । यहाँ दो बातें रेखांकित करने योग्य हैं : एक तो यही कि NIRC टीम के किसी सदस्य ने कभी भी नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा से यह कहा है क्या कि काउंसिल की मीटिंग में इन्हें अपनी बात शालीनता और मर्यादा के साथ कहना चाहिए; तथा दूसरी बात यह कि इन्होंने आपस में ही एक दूसरे पर जो आरोप लगाए हैं, उनकी सत्यता की जाँच करने की कोई कोशिश हुई है क्या ? 
टीम NIRC के साथियों, मामले को व्यापकता और गंभीरता के साथ आप समझ भी रहे हो न ! आपको क्या लगता है कि आप उक्त ब्लॉग के खिलाफ पुलिस में और कोर्ट में जाओगे, तो पुलिस और कोर्ट बिना जाँच-पड़ताल के उक्त ब्लॉग के खिलाफ कार्रवाई कर देगी - वह कोई जाँच-पड़ताल नहीं करेगी ? और यदि जाँच-पड़ताल करेगी तो आपके द्वारा की गई गड़बड़ियों पर ध्यान नहीं देगी ? जिन क्लिप्स की मैं बात कर रहा हूँ, वह यदि पब्लिक डोमेन में हैं तो क्या उक्त ब्लॉग के कर्ता-धर्ताओं के पास नहीं होंगी; और वह पुलिस और कोर्ट में उन्हें पेश नहीं करेंगे ? उन क्लिप्स को सुन कर तथा आपके कई कारनामों के रिकॉर्ड/सुबूत देख कर कोर्ट आप लोगों को क्या शाबाशी देगी, आपकी तारीफ करेगी ? आपने अभी हाल ही में अखबारों में पढ़ा होगा कि कोर्ट ने दिल्ली के एक सांसद तथा दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष मनोज तिवारी को फटकार लगाते हुए उनसे कहा कि सांसद हो तो क्या अपने आपको खुदा समझते हो कि नियम-कानूनों का पालन नहीं करोगे । टीम NIRC के साथियों, क्या आप लोग भी अपने आपको और अपने Torch Bearer को खुदा तो नहीं समझते हो ? आप लोग कहीं यह तो नहीं समझते हो कि आपको तो नियम-कानूनों का पालन करने की कोई जरूरत ही नहीं है, आप जो चाहें सो कर सकते हो और चाहें किसी भी भाषा और लहजे में काउंसिल की मीटिंग्स में अपने ही साथियों से बात कर सकते हो और उन पर कोई भी कैसा भी आरोप लगा सकते हो ? मुझे डर है कि कहीं जोश और गलतफहमी में आप अपने लिए और नई मुसीबतें न पैदा कर लें ?                  
टीम NIRC के साथियों, हालाँकि मैं आपकी इस चिंता से पूरा इत्तफाक रखता हूँ कि इंस्टीट्यूट और  काउंसिल्स के पदाधिकारियों और सदस्यों की पब्लिक इमेज को खराब करने का मौका किसी को भी - किसी भी ब्लॉग को न मिले । इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप लोग यदि अपने काम को ईमानदारी से करना शुरू कर दो, हर काम में वेंडर्स से कमीशन खाना बंद कर दो, काउंसिल के पैसों पर अपने चाय-नाश्ते और खाने-पीने के लिए निर्भर रहना बंद कर दो, अपने 'भाईयों' को फायदा पहुँचाने के लिए नियमों से खिलवाड़ करना बंद कर दो, नियम-कानूनों से और जिम्मेदारी से काम करना शुरू कर दो, काउंसिल में अपने ही साथियों पर हावी होने तथा उन पर रौब जमाने की कोशिश करने और उनके साथ अभद्र भाषा में बात करने से बचो, खासकर महिला सदस्यों और महिला स्टॉफ के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना सीख सको, आपसी मतभेदों को शालीनता व मर्यादा में रहते हुए हल करने की कोशिश करो - तो बाहर के लोगों को, उक्त ब्लॉग के दुष्ट कर्ता-धर्ताओं को बातें बनाने का मौका ही नहीं मिलेगा, और वह ब्लॉग अपने आप ही बंद हो जायेगा । आपको पुलिस और कोर्ट में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी । 
मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि वह आपको सद्बुद्धि दे, और आप सचमुच में अपनी पब्लिक इमेज को साफ-सुथरा रख सकें, न कि इमेज बचाने के चक्कर में अपनी और पोल खुलवा लो तथा अपनी इमेज का और कबाडा करवा लो ।
शुभकामनाओं के साथ,
- सीए सत्येंद्र कुमार गुप्ता 

Friday, September 21, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल द्वारा अपने ऑफिस में पड़े छापे की खबरों से होने वाली फजीहत से बचने के लिए रीजनल काउंसिल की बजाये एक्जीक्यूटिव कमेटी की बुलाई मीटिंग में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा के बीच हुई तू-तड़ाक ने काउंसिल में चलने वाली कमीशनखोरी की पोल खोली

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की एक्जीक्यूटिव कमेटी की आज हुई मीटिंग में वाइस चेयरमैन नितिन कँवर तथा ट्रेजरर राजिंदर अरोड़ा ने एक-दूसरे के साथ पहले गाली-गलौच और फिर हाथा-पाई करते हुए एक-दूसरे की बेईमानियों की जिस तरह पोल खोली, उससे एक बार फिर साबित हुआ कि इन दोनों की बदतमीजियों और बेईमानियों ने काउंसिल में किस तरह की गंदगी मचाई हुई है । मजे की बात यह है कि यह दोनों ही नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में तीनों ही वर्ष सत्ता खेमे में साथ-साथ रहे हैं, और दूसरों के साथ लगातार बदतमीजियाँ करते रहे हैं । इन पर बेईमानी करने और काउंसिल में लूट-खसोट मचाने के आरोप तो लगते ही रहे हैं, लेकिन आज की मीटिंग में पहली बार दोनों को एक-दूसरे पर कमीशनखोरी करने के आरोप लगाते सुना गया । एक दूसरे पर हिसाब-किताब में बेईमानी करने तथा वेंडर्स से कमीशन उगाहने के आरोप लगाते हुए शुरू में तो इन्होंने एक-दूसरे के साथ खुल कर गाली-गलौच की, और फिर मामला हाथा-पाई तक जा पहुँचा । काउंसिल के स्टॉफ के लोगों का कहना/बताना है कि चेयरमैन पंकज पेरिवाल तथा स्टॉफ के वरिष्ठ सदस्यों ने बीच-बचाव न किया होता तो दोनों के कपड़े फटने और शारीरिक चोट लगने की स्थिति बन रही थी । हाथापाई करते हुए दोनों ही बार-बार पुलिस में रिपोर्ट करने और पुलिस बुलाने की बात करते हुए भी सुने गए । किसी तरह मामला तो शांत हो गया, लेकिन यह पोल जरूर खुल गई कि पदाधिकारियों के रूप में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का कामकाज करने वाले वेंडर्स से कमीशन खाते हैं, और कमीशन की बंदरबाँट करने के लिए एक-दूसरे के सिर फोड़ने को भी तैयार हो सकते हैं ।
उल्लेखनीय है कि आज हुई एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग का मुख्य एजेंडा वेंडर्स के बकाये के भुगतान को लेकर ही था । दरअसल पिछले कई महीनों से वेंडर्स के भुगतान नहीं हो रहे हैं, जिसके चलते वेंडर्स ने सर्विस देना बंद करने की धमकी दी हुई थी । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेमीनार आयोजित करने वाले होटलों के प्रबंधकों ने धमकी दी हुई थी कि उनके भुगतान यदि जल्दी ही नहीं किए गए तो वह नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को ब्लैक-लिस्ट कर देंगे और तब काउंसिल को अपने कार्यक्रमों के लिए होटल्स में जगह नहीं मिल सकेगी । चर्चा रही कि काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल लुधियाना में अपने ऑफिस में पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे के कारण मुसीबत में फँसे होने के चलते चेयरमैन पद की जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए समय नहीं निकाल पाए और इसलिए वेंडर्स व होटलों के भुगतान अटके/फँसे । समस्या को हल करने के लिए काउंसिल की सेक्रेटरी पूजा बंसल ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए नोटिस निकाला, लेकिन चेयरमैन के रूप में पंकज पेरिवाल ने नियमों की दुहाई देते हुए उनके नोटिस को रद्द कर/करवा दिया । लोगों के बीच चर्चा रही कि पंकज पेरिवाल को डर रहा कि लुधियाना के अखबारों में प्रकाशित हुईं उनके ऑफिस पर पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे की खबरों को लेकर मीटिंग में किसी ने यदि सवाल पूछ लिया तो उन्हें जबाव देना पड़ जायेगा और तब उनके यहाँ पड़े छापे की बात काउंसिल के रिकॉर्ड पर आ जाएगी, इसलिए पंकज पेरिवाल ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग से बचने की हर संभव कोशिश की । वेंडर्स के भुगतान के मामले को हल करने का भी दबाव लेकिन बढ़ता जा रहा था, इसलिए पंकज पेरिवाल ने बीच का रास्ता निकालते हुए एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग बुला ली । एक्जीक्यूटिव कमेटी में सब 'अपने' ही लोग हैं, इसलिए पंकज पेरिवाल निश्चिंत रहे कि लुधियाना के अखबारों में छपी खबरों के हवाले से कोई उनके ऑफिस में पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे के बारे में सवाल नहीं पूछेगा ।
पंकज पेरिवाल ने रीजनल काउंसिल की बजाये एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग करके अपने आप को तो बचा लिया, लेकिन नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा के बीच हुई धींगामुश्ती के चलते प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट को कलंकित होने से वह नहीं बचा सके । दरअसल वेंडर्स और होटलों के भुगतान में होने वाली देरी पर बात शुरू हुई तो भेद खुला कि ट्रेजरर के रूप में राजिंदर अरोड़ा भुगतान में जानबूझ कर इसलिए देरी कर रहे थे, क्योंकि उन्हें वेंडर्स से कमीशन नहीं मिल रहा था । वेंडर्स की तरफ से कहा/सुना गया कि वह आखिर किस किस को कमीशन दें ? बात खुली कि पिछले वर्ष ट्रेजरर के रूप में नितिन कँवर वेंडर्स से कमीशन लेते रहे थे, और वह चाहते थे कि चूँकि वेंडर्स को उन्होंने काम दिलवाया है, इसलिए उन्हें इस वर्ष भी कमीशन मिलता रहे । इस कमीशन खोरी के मास्टरमाइंड के रूप में पिछले वर्ष के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को देखा/पहचाना गया । काउंसिल के स्टॉफ का कहना/बताना है कि काउंसिल में राकेश मक्कड़ अकेले ऐसे सदस्य हैं, जो सुबह प्रायः स्टॉफ के आने से भी पहले ऑफिस आ जाते हैं और देर शाम तक ऑफिस में रहते हैं और काउंसिल के पैसे से ही दिन भर चाय-नाश्ता और खाना-पीना करते हैं । इस वर्ष भी राकेश मक्कड़ अपने आपको 'चेयरमैन' ही मानते/समझते हैं । नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा को उनके दो नवरत्नों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । लगातार आरोप लगते रहे हैं कि इन तीनों ने काउंसिल को तरह तरह से जी भर कर लूटा है । लूट के माल पर बढ़े लालच के चलते वेंडर्स के भुगतान रुके तो समस्या खड़ी हुई, और समस्या को हल करने की कोशिश में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा की कारस्तानियों की पोल खुलना शुरू हुई तो फिर दूसरे की करतूत को अपनी करतूत से बड़ा साबित करने की कोशिश में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा एक दूसरे की कारस्तानियों का कच्चा-चिट्ठा खोलने लगे - और उनकी इस कोशिश में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग में सड़कछाप माहौल बन गया, जिसमें गाली-गलौच सुनी गईं और हाथा-पाई का नजारा देखा गया ।
मजे की बात यह है कि नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अपने अपने पुनर्निर्वाचन के लिए फिर से चुनावी मैदान में हैं, और इन्हें पूरा विश्वास है कि इनकी हरकतों और कारस्तानियों को जानने के बावजूद चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इन्हें वोट देंगे और यह फिर से रीजनल काउंसिल में सदस्य और पदाधिकारी बनेंगे ।

Saturday, July 14, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा जैसे शुभचिंतकों के होते हुए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के मामले में भी इंस्टीट्यूट प्रशासन क्या आरएस बंसल के मामले जैसी कार्रवाई कर सकेगा क्या ?

लुधियाना । पंकज पेरिवाल के ऑफिस में इनकम टैक्स विभाग के छापे के बाद आरएस बंसल से इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों में टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में 'पकड़े' जाने वाले 'अकेले' पदाधिकारी का तमगा छिन गया है । उल्लेखनीय है कि अभी तक आरएस बंसल ही इंस्टीट्यूट के अकेले पदाधिकारी थे, जो टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में पकड़े गए हैं । यूँ तो इंस्टीट्यूट के कई पदाधिकारियों, इंस्टीट्यूट की काउंसिल्स के बहुत से सदस्यों पर फर्जी एंट्री के धंधे में लिप्त रहने के आरोप चर्चा में रहे हैं; लेकिन जैसा कि माना/कहा जाता है कि चोर तो वह होता है - जो 'पकड़ा' जाता है, जो पकड़ा नहीं जाता वह तो 'प्रोफेशनल' होता है; इसलिए आरएस बंसल जब 'पकड़े' गए तब उन्हें इंस्टीट्यूट के पहले और अकेले पदाधिकारी होने का खिताब मिला, जो टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में धरे गए - और इसके चलते उन पर प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट की नाक कटवाने का दाग लगा और जिसके कारण उन्हें सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से दूर रहना पड़ रहा है । आरएस बंसल ने हालाँकि पहले उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बारे में यह सोच कर सोचा था कि इंस्टीट्यूट के चुनाव में बहुत से उम्मीदवार ऐसे हैं जो फर्जी एंट्री का काम करते हैं, इसलिए उन्हें ही क्यों चुनाव से दूर रहना चाहिए - लेकिन फिर जल्दी ही उन्हें 'पकड़े' जाने तथा 'न पकड़े' जाने का फर्क समझ में आ गया और उन्होंने अपने आपको चुनावी झमेले से दूर कर लिया । आरएस बंसल के साथ उनके एक नजदीकी रिश्तेदार अनिल अग्रवाल भी टैक्स की चोरी करने/करवाने के मामले में पकड़े गए थे, जो नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे; पकड़े जाने के बाद जिन्होंने लालू यादव वाला फार्मूला अपना कर अपनी पत्नी रोबिना अग्रवाल को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है ।
लगता है कि हम मूल बात से भटक गए हैं जो पंकज पेरिवाल के इनकम टैक्स विभाग की जाँच-पड़ताल की चपेट में आने और इस तरह आरएस बंसल से तमगा छिनने को लेकर थी; इसलिए मूल बात पर लौटते हैं : नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन होने के नाते आरएस बंसल जब टैक्स चोरी करने/करवाने के मामले में 'पकड़े' गए थे, तब वह इंस्टीट्यूट के पहले और अकेले पदाधिकारी 'बने' थे, जो टैक्स चोरी के मामले में पकड़े गए; लेकिन आज नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पड़े इनकम टैक्स विभाग के छापे के बाद पंकज पेरिवाल भी 'क्लब' में आरएस बंसल के साथी हो गए हैं । पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पड़े छापे का मुख्य कारण आधिकारिक रूप से तो अभी सामने नहीं आ पाया है, लेकिन लोगों के बीच चर्चा यही है कि उनके यहाँ पड़े छापे का संबंध काले को सफेद करने वाले मामले से ही है । आरएस बंसल एक टेलीविजन चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में काले को सफेद करने के काम में 'पकड़े' गए थे, तो पंकज पेरिवाल कुछेक और लोगों के पकड़े जाने के मामले में इनकम टैक्स विभाग द्वारा की गई जाँच-पड़ताल में विभाग के राडार पर आ गए हैं । दोनों के मामले में एक बड़ा फर्क यह भी है कि आरएस बंसल का मामला जब सामने आया था, तब हर कोई इंस्टीट्यूट से उन्हें सजा दिलवाने पर आमादा हो गया था, लेकिन पंकज पेरिवाल के मामले में कई लोग यह तर्क देते/बताते हुए उन्हें 'बचाने' की कोशिशों में लग गए हैं कि उनके यहाँ जो छापा पड़ा है वह विभाग की रूटीन कार्रवाई है और इसे इंस्टीट्यूट और या प्रोफेशन के लिए किसी नकारात्मक भाव से नहीं देखा जाना चाहिए ।
आरएस बंसल के मामले में इंस्टीट्यूट प्रशासन ने खुद ही संज्ञान ले कर उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था और उन्हें सजा दी थी, हालाँकि सजा इतनी मामूली सी थी कि लोगों ने उसे सजा की बजाये 'प्रोत्साहन' के रूप में ही देखा/पहचाना था । लेकिन पंकज पेरिवाल के मामले में उतना भी होता हुआ नहीं दिख रहा है । दरअसल इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पंकज पेरिवाल के कई समर्थक हैं; सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा तो लुधियाना में उनके समर्थन से वोट पाने की तैयारी में हैं, इसलिए पंकज पेरिवाल के और ज्यादा मुसीबत में पड़ने से उनकी तो सारी तैयारी धरी रह जायेगी - जिस कारण राजेश शर्मा किसी भी तरह से पंकज पेरिवाल को बचाने का प्रयास करेंगे । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता भी पंकज पेरिवाल के शुभचिंतक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, इसलिए इस बात की किसी को भी उम्मीद नहीं है कि आरएस बंसल के मामले की तरह उनके मामले में भी इंस्टीट्यूट प्रशासन खुद से संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करेगा । हालाँकि संभावना यह भी है कि इंस्टीट्यूट इस समय चूँकि चुनावी हवा में है, इसलिए कुछेक लोग पंकज पेरिवाल के मामले को ठंडे बस्ते में आसानी से नहीं जाने देंगे । चुनावी हवा पंकज पेरिवाल के मामले को कितना भड़कायेगी, यह देखने की बात होगी ।

Tuesday, June 5, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की दो कमेटियों की तरफ से लुधियाना में आयोजित हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस के सहारे समर्थन जुटाने की राजेश शर्मा की कोशिशें, विशाल गर्ग और उनके समर्थकों के आक्रामक रवैये को देखते हुए अभी तो सफल होती नहीं नजर आ रही हैं

लुधियाना । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कैपिटल मार्किट एंड इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन कमेटी द्वारा लुधियाना में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के दो संभावित उम्मीदवारों - राजेश शर्मा व विशाल गर्ग के बीच के चुनावी झगड़े में फँसती और विवादित होती नजर आ रही है । इंस्टीट्यूट की एक अन्य कमेटी - कैपेसिटी बिल्डिंग ऑफ मेंबर्स इन प्रैक्टिस के साथ मिलकर आयोजित की जा रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मुख्य आयोजक कमेटी के चेयरमैन चूँकि राजेश शर्मा हैं, इसलिए विशाल गर्ग और उनके समर्थकों का आरोप है कि लुधियाना में अपने लिए वोट जुटाने तथा विशाल गर्ग को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से राजेश शर्मा नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन लुधियाना में कर/करवा रहे हैं । दरअसल राजेश शर्मा के सामने इस बार के चुनाव में अपनी सीट बचाने की गंभीर चुनौती है । एक तरफ तो पिछले वर्ष हुए सीए डे के फंक्शन की बदइंतजामी को लेकर उनके माथे पर लगा कलंक हल्का पड़ने का नाम ही नहीं ले रहा है, और दूसरी तरफ चरनजोत सिंह नंदा की उम्मीदवारी ने उनके लिए मुसीबत खड़ी कर दी है । राजेश शर्मा सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचाने के लिए लुधियाना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं; उनके नजदीकियों का कहना है कि उन्हें लग रहा है कि पंकज पेरिवाल के सहयोग से वह विशाल गर्ग को पीछे धकेल देंगे और लुधियाना में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटा लेंगे । पिछली बार के चुनाव में हालाँकि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में राजेश शर्मा को विशाल गर्ग से कम वोट मिले थे । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में विशाल गर्ग 1412 वोटों के साथ छठे नंबर पर थे, जबकि 1361 वोटों के साथ राजेश शर्मा आठवें नंबर पर थे - दूसरी वरीयता के वोटों के सहारे राजेश शर्मा गिरते-पड़ते किसी तरह सातवें नंबर पर पहुँचने में हालाँकि सफल हो गए थे । पिछली बार जैसे-तैसे मिली सफलता को इस बार दोहरा पाना उनके लिए मुश्किल माना/समझा जा रहा है । पिछले वर्ष आयोजित हुए सीए डे से जुड़ी उनकी बदनामी के चलते पहली वरीयता के वोटों की गिनती में उनके पिछड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है ।
राजेश शर्मा ने पिछले कुछ दिनों में पिछले वर्ष के सीए डे से जुड़ी बदनामी के दागों को धोने की यह कहते/बताते हुए हालाँकि कोशिश तो बहुत की कि उन्होंने तो अपना काम बहुत जिम्मेदारी से किया था और बदइंतजामी के लिए उन्हें नाहक ही जिम्मेदार ठहराया गया - लेकिन उनकी यह कोशिश सफल होती दिख नहीं रही है । इसके लिए दरअसल राजेश शर्मा का व्यवहार भी जिम्मेदार है - चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने वह डींगें तो बहुत मारते/दिखाते हैं कि उनकी तमाम मंत्रियों और नेताओं के साथ निकटता है और सरकारी विभागों में अच्छी पैठ है, लेकिन लोगों के काम करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं; लोगों के अनुभव तो यहाँ तक हैं कि वह अक्सर फोन ही नहीं उठाते हैं, बाद में कभी मिलने या बात होने पर शिकायत करो तो उनसे रटा-रटाया यही जबाव सुनने को मिलता है कि अरे, उस समय मैं फलाँ मंत्री के साथ मीटिंग में था । इस तरह के रवैये से राजेश शर्मा ने लोगों को बुरी तरह से नाराज तो किया हुआ ही है, साथ ही पिछले वर्ष के सीए डे से जुड़ी बदनामी के दाग को भी और गहरा बनाया है । ऐसे में उनकी सारी उम्मीद लुधियाना पर टिकी हुई है । उन्हें उम्मीद है कि पंकज पेरिवाल को नॉर्दन इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनवाने का श्रेय लेकर वह लुधियाना में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटा सकते हैं । पंकज पेरिवाल के हालाँकि सेंट्रल काउंसिल के एक अन्य सदस्य विजय गुप्ता के साथ भी अच्छे और विश्वासपूर्ण संबंध हैं; और उनके नजदीकियों का मानना/कहना है कि पंकज पेरिवाल यदि राजेश शर्मा के ही भरोसे रहते तो राजेश शर्मा की बदनामी की चलते हरगिज चेयरमैन न बन पाते, वह तो विजय गुप्ता ने जुगाड़ बैठाये और तब पंकज पेरिवाल के लिए चेयरमैन बन पाना संभव हुआ । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों का भी कहना/बताना है कि पंकज पेरिवाल के चेयरमैन-काल में राजेश शर्मा की उतनी मनमानी नहीं चल पा रही है, जितनी मनमानी राकेश मक्कड़ के चेयरमैन-काल में उन्होंने चला ली थी । इसका कारण यह भी माना/समझा जाता है कि पिछले वर्ष रीजनल काउंसिल में चेयरमैन रहे राकेश मक्कड़ चूँकि एक नाकारा और हद दर्जे के लालची/बेईमान व्यक्ति हैं, इसलिए राजेश शर्मा ने उनका जैसा मनमाना इस्तेमाल कर लिया, वैसा इस्तेमाल वह पंकज पेरिवाल का नहीं कर पा रहे हैं ।
जहाँ तक राजेश शर्मा के चेयरमैन वाली कमेटी द्वारा लुधियाना में नेशनल कॉन्फ्रेंस करने वाली बात है, तो पंकज पेरिवाल के नजदीकियों के अनुसार इसमें चूँकि पंकज पेरिवाल को भी अपना 'फायदा' नजर आ रहा है - इसलिए इस कॉन्फ्रेंस के लिए वह भी सहज रूप से इसे लुधियाना में आयोजित करने के लिए तैयार हो गए । पंकज पेरिवाल का विशाल गर्ग के साथ विरोध का संबंध है, यह बात भी पूरी तरह सच है - और विरोध के इसी संबंध का फायदा उठाने के लिए ही राजेश शर्मा ने अपने चेयरमैन वाली कमेटी द्वारा नेशनल कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के लिए लुधियाना को चुना है । विशाल गर्ग और उनके समर्थक भी राजेश शर्मा के इस खेल को समझ रहे हैं और कॉन्फ्रेंस के दौरान जुटे लोगों को राजेश शर्मा की कारस्तानियों से अवगत कराने के तरीकों पर विचार कर रहे हैं । नेशनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र में राजेश शर्मा का उपस्थित चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को संबोधित करने का प्रोग्राम है; सुना जा रहा है कि इसी सत्र में जुटे लोगों को राजेश शर्मा की कारगुजारियों से अवगत करवाया जायेगा । विशाल गर्ग और उनके समर्थकों ने पंकज पेरिवाल को भी निशाने पर लिया हुआ है; उनका गंभीर आरोप है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने के लिए की गई सौदेबाजी में वह लुधियाना में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सदस्यों की एकजुटता को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं और बाहरी लोगों के प्यादे बने हुए हैं । विशाल गर्ग और उनके समर्थकों के आक्रामक रवैये को देखते हुए पंकज पेरिवाल के सहारे लुधियाना में समर्थन जुटाने की राजेश शर्मा की कोशिशें सफल होती हुई अभी तो नहीं नजर आ रही हैं ।

Saturday, May 26, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से आयोजित हो रहे जीएसटी कॉन्क्लेव में राजेंद्र अरोड़ा को कोई भूमिका न देकर अतुल गुप्ता और पंकज पेरिवाल ने उन्हें उनकी सही 'हैसियत' बताई/दिखाई

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की पब्लिक फाइनेंस एंड गवर्नमेंट अकाउंटिंग कमेटी की तरफ से जीएसटी पर हो रहे नेशनल कॉन्क्लेव में कोई भी भूमिका पाने में असफल रहे राजेंद्र अरोड़ा कमेटी के चेयरमैन अतुल गुप्ता तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल को कोसने में लगे हैं । राजेंद्र अरोड़ा के लिए फजीहत की बात यह हुई है कि एक तरफ तो वह अपनी पहचान जीएसटी के एक बड़े एक्सपर्ट के रूप में बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया में एक शेखचिल्लीपूर्ण हरकत यह तक की है कि अपना नाम ही 'जीएसटी सीए राजेंद्र अरोड़ा' कर लिया है - लेकिन दूसरी तरफ एक व दो जून को दिल्ली में हो रहे दो दिवसीय जीएसटी कॉन्क्लेव में उन्हें कोई भी भूमिका देने से इंकार कर दिया गया है । स्पीकर के रूप में तो उन्हें मौका नहीं ही मिला, पैनल डिस्कसन डिस्कशन तक में उन्हें शामिल करने से इंकार कर दिया गया । जिस बेचारे ने बाप/दादा की जगह जीएसटी का नाम तक अपने नाम में जोड़ लिया, उसकी इतनी बेइज्जती - और वह भी तब, जब राजेंद्र अरोड़ा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ट्रेजरर हैं और नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल उक्त कॉन्क्लेव की आयोजक की भूमिका में है । राजेंद्र अरोड़ा ने कॉन्क्लेव ऑर्गेनाइज्ड करने वाली कमेटी के चेयरमैन अतुल गुप्ता की भी बहुत खुशामद की कि वह उन्हें कॉन्क्लेव में कोई भूमिका दे दें, और उन्होंने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल से भी इसके लिए सिफारिश करवाने की कोशिश की, लेकिन उनकी न तो अतुल गुप्ता ने सुनी और न पंकज पेरिवाल ने ही उनकी मदद करने में कोई दिलचस्पी ली । ऐसे समय जब कि राजेंद्र अरोड़ा तरह तरह के करतबों के जरिये लोगों को यह दिखाने/जताने का प्रयास कर रहे हैं कि वह जीएसटी के मामले में बड़े एक्सपर्ट हैं, तब दिल्ली में आयोजित हो रहे जीएसटी कॉन्क्लेव में उन्हें पूछा तक नहीं जा रहा है - इससे उनकी सारी करतबबाजी भारी फजीहत का शिकार हो रही है ।
राजेंद्र अरोड़ा अपनी इस फजीहत के लिए अतुल गुप्ता और पंकज पेरिवाल को लगातार कोस रहे हैं । उनका कहना है कि लोगों के बीच बढ़ रही उनकी लोकप्रियता से यह दोनों लोग चिढ़ रहे हैं, और उनका आगे बढ़ना इन्हें पसंद नहीं आ रहा है - इसलिए यह दोनों उन्हें किसी प्रोग्राम में महत्त्व लेने देना नहीं चाहते हैं । पंकज पेरिवाल के प्रति राजेंद्र अरोड़ा की नाराजगी कुछ ज्यादा ही सुनी/देखी जा रही है । दरअसल अभी हाल ही में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा आयोजित एक सेमीनार में राजेंद्र अरोड़ा की स्पीकर बनने की हसरत पंकज पेरिवाल के विरोध के चलते फेल हो गई थी । जीएसटी में रिफंड प्रोसीजर्स जैसे विषय पर आयोजित सेमीनार में राजेंद्र अरोड़ा ने अपने आप को स्पीकर के रूप में घोषित कर दिया था । काउंसिल के चेयरमैन के रूप में पंकज पेरिवाल ने उनकी इस हरकत का विरोध किया । पंकज पेरिवाल ने उन्हें ध्यान दिलाया कि वह रीजनल काउंसिल में पदाधिकारी हैं, उन्हें काउंसिल के इस नियम के बारे में पता होना ही चाहिए और इसका पालन करना चाहिए कि काउंसिल का कोई पदाधिकारी सेमीनार में स्पीकर नहीं हो सकता है । राजेंद्र अरोड़ा लेकिन अपने आप को जीएसटी के एक्सपर्ट साबित करने की इतनी जल्दी में हैं कि किसी भी नियम-फियम को मानने तथा उसका पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं । पंकज पेरिवाल की सख्ती के सामने लेकिन उनकी एक नहीं चली और सेमीनार में स्पीकर के रूप में अपने आप को हटाने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा ।
राजेंद्र अरोड़ा ने पक्षपातपूर्ण मनमानी करने के घटियापने में तो लेकिन जैसे पीएचडी की हुई है; लिहाजा स्पीकर बनने का मौका उनसे छिना तो उन्होंने अपने आप को प्रोग्राम डायरेक्टर के रूप में निमंत्रण पत्र में दर्ज कर लिया । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा आयोजित किए जाने वाले सेमिनार्स के निमंत्रण पत्रों में इससे पहले कभी प्रोग्राम डायरेक्टर का नाम नहीं गया है । वास्तव में इस तरह का कोई पद और या व्यवस्था है ही नहीं । यह सीधे सीधे काउंसिल की गतिविधियों के नाम पर अपना नाम चमकाने की फूहड़ व बेशर्म कोशिश का एक नजारा भर है । सेमीनार में इसके लिए राजेंद्र अरोड़ा की जमकर थू थू और फजीहत भी हुई, लेकिन लगता नहीं है कि इससे उन्होंने कोई सबक सीखा होगा । राजेंद्र अरोड़ा ने भले ही सबक न सीखा हो, लेकिन दिल्ली में जीएसटी पर दो दिवसीय कॉन्क्लेव ऑर्गेनाइज और होस्ट करने जा रहे अतुल गुप्ता व पंकज पेरिवाल ने राजेंद्र अरोड़ा को उनकी सही जगह दिखाने/बताने का काम जरूर कर दिया है । इससे जाहिर हो गया है कि खुद को जीएसटी के एक्सपर्ट के रूप में स्थापित करने के लिए की जा रही राजेंद्र अरोड़ा की तरह तरह की नौटंकी उनके काम आ नहीं रही है ।

Wednesday, May 16, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ व दीपक गर्ग के पंकज पेरिवाल को घेरने व बदनाम करने की जुगत में होने के कारण उम्मीद की जा रही है कि इंटरनेशनल स्टडी टूर को लेकर उनकी कीचड़-उछाल कोशिशों का कीचड़ अभी और देखने/सुनने को मिलेगा

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पिछले दो वर्षों में चेयरमैन रहे दीपक गर्ग और राकेश मक्कड़ जिस तरह से इस वर्ष प्लान किए गए इंटरनेशनल स्टडी टूर को फेल करने की कोशिशों में जुटे सुने जा रहे हैं, उससे नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में एक नया घमासान शुरू होता दिख रहा है । दरअसल इस वर्ष प्लान किए गए इंटरनेशनल स्टडी टूर को लेकर दीपक गर्ग और राकेश मक्कड़ की खुन्नस इसलिए है, क्योंकि इससे चेयरमैन के रूप में उनका निकम्मापन एकदम से जाहिर हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि रीजन के आम और खास लोग आकलन करेंगे ही कि चेयरमैन के रूप में वह दोनों तो इस तरह का कार्यक्रम नहीं बना सके, और पंकज पेरिवाल ने चेयरमैन का पदभार संभालते ही इंटरनेशनल स्टडी टूर के बारे में सोच भी लिया और प्लान भी फाइनलाइज कर लिया । अब लोग तुलना तो करते ही हैं, और इस तुलना में पंकज पेरिवाल का पलड़ा उनसे पहले चेयरमैन रहे राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग से भारी पड़/दिख रहा है, तो यह बात राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग के लिए शर्म की तो है ही । उनके लिए ज्यादा शर्म की बात इसलिए भी है, क्योंकि पंकज पेरिवाल को चेयरमैन का पदभार सँभाले अभी तीन महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, और रीजन में लोग महसूस करने के साथ-साथ बातें भी करने लगे हैं कि उनसे पहले के दोनों चेयरमैन किस हद तक नाकारा और निकम्मे किस्म के थे । दीपक गर्ग के साथ तो मुसीबत की बात यह भी हुई कि उन्हें तो अपना कार्यकाल ही पूरा करने का मौका नहीं मिला; और करीब छह महीने में ही उन्हें पता चल गया था कि चेयरमैन का पद उन्होंने जुगाड़ तो लिया है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी निभाना उनके बस की बात नहीं है - लिहाजा उन्होंने इस्तीफा देकर किनारे हो लेने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । राकेश मक्कड़ ने चेयरमैन बनते ही लूट-खसोट पर ध्यान देना शुरू किया, जिसके चलते उनका चेयरमैन-काल आरोपों का ही शिकार रहा और वह पहले ऐसे चेयरमैन बने जिनकी हरकतों और कारस्तानियों के खिलाफ इंस्टीट्यूट की डिसिप्लिनरी कमेटी में शिकायत दर्ज हुई ।
 ऐसे में, राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग को जब चेयरमैन के रूप में पंकज पेरिवाल के कामकाज की तारीफ होती सुनाई पड़ी, तो उनका माथा और भन्नाया । इसलिए दोनों ने पंकज पेरिवाल के चेयरमैन-काल को फेल करने की तैयारी शुरू कर दी । इस तैयारी में उन्होंने पंकज पेरिवाल के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में देखे जा रहे इंटरनेशनल स्टडी टूर पर अपनी निगाह लगाई है । उन्हें लगता है कि वह यदि इस स्टडी टूर को किसी भी तरह से फेल कर दें, तो पंकज पेरिवाल की बड़ी बदनामी होगी - और पंकज पेरिवाल की इस बदनामी में उनकी बदनामी छिप जाएगी । राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग ने पहले तो इस टूर के महँगे होने का आरोप लगते हुए लोगों को भड़काने की कोशिश की । यह आरोप लेकिन ज्यादा चला नहीं; क्योंकि पता चला कि टूर ऑफर को लोगों ने आकर्षक माना और जल्दी ही काफी बुकिंग हो गई है । पंकज पेरिवाल के नजदीकियों का तो दावा है कि टूर के लिए जितनी सीटें तय की गईं थीं, वह सभी बुक हो चुकी हैं । इससे जाहिर है कि लोगों को टूर ऑफर महँगा नहीं लगा है, और उन्होंने इस ऑफर को हाथोंहाथ लिया । टूर ऑफर को महँगा बताने की कोशिश पर राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग को कुछेक लोगों से यह तक सुनना पड़ा है कि तुम्हारे बस की तो कुछ करना था नहीं, अब इस वर्ष कुछ हो रहा है तो उसमें कमी निकालने की कोशिश कर रहे हो । कुछेक लोगों ने उन्हें चेलैंज भी किया कि तुम्हारे बस की हो, तो इससे सस्ता टूर प्रोग्राम आयोजित करके दिखाओ न ! लोगों की इस प्रतिक्रिया से राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग को अपनी ही फजीहत होती दिखी, तो उन्होंने पैंतरा बदल कर आरोप लगाना शुरू किया है कि यह स्टडी टूर नहीं, बल्कि पिकनिक टूर है - क्योंकि इसमें परिवार के सदस्यों को भी साथ ले जाने की सुविधा दी गई है ।
राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग को इस आरोप पर कुछेक लोगों का समर्थन मिलता नजर आ रहा है । कुछेक लोगों ने माना/कहा है कि छह दिन के पेरिस और स्विट्जरलैंड के टूर में परिवार के साथ जाने वाला चार्टर्ड एकाउंटेंट स्टडी तो क्या ही करेगा ? स्टडी का रूप और तरीका और माध्यम क्या होगा, चूँकि इसका भी खुलासा नहीं किया गया है - इसलिए इस स्टडी टूर के वास्तव में पिकनिक टूर होने की बात ही लोगों के बीच स्वीकार्य हो रही है । लोगों का कहना/पूछना है कि वास्तव में यह यदि स्टडी टूर ही है, तो प्रोग्राम के साथ यह भी तो बताना चाहिए कि टूर में किस तरह की स्टडी होगी, स्टडी करवायेगा कौन तथा कहाँ और कैसे उसका मौका मिलेगा ? जाहिर तौर पर, स्टडी टूर के नाम पर पिकनिक करने के राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग के आरोप को कुछेक लोगों के बीच स्वीकार्यता तो मिल गई है, लेकिन यह देख कर इन दोनों को निराशा भी हुई है कि इस स्वीकार्यता के बावजूद लोगों का रवैया आक्रामक व आरोपपूर्ण नहीं है । दरअसल प्रोफेशन के लोगों ने यह मान लिया हुआ है कि इंस्टीट्यूट में स्टडी के नाम पर अधिकतर तफरीह, राजनीति और पिकनिक ही होती है - इसलिए यह बात प्रायः किसी आरोप की शक्ल में नहीं आती है । इस बात को इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन के लोगों के बीच एक आवश्यक और स्वीकार्य बुराई के रूप में अपना लिया गया है । इसी के चलते राकेश मक्कड़ और दीपक गर्ग की इंटरनेशनल स्टडी टूर को पिकनिक टूर बताने के जरिये बदनाम व आरोपित करने की कोशिश फेल हो गई है । इंटरनेशनल स्टडी टूर जाने में अभी चूँकि करीब ढाई महीने का समय है, और राकेश मक्कड़ व दीपक गर्ग इसके बहाने पंकज पेरिवाल को घेरने व बदनाम करने की जुगत में हैं - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि इंटरनेशनल स्टडी टूर को लेकर राकेश मक्कड़ व दीपक गर्ग की कीचड़-उछाल कोशिशों का कीचड़ अभी और देखने/सुनने को मिलेगा ।

Saturday, March 10, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विजय गुप्ता के हस्तक्षेप पर पंकज पेरिवाल ने कमेटियों को पुनर्गठित करने का फैसला करके नितिन कँवर को संकेत दे दिया कि इस वर्ष उनकी हरकतें नहीं चलेंगी

नई दिल्ली । विजय गुप्ता के दखल के चलते पंकज पेरिवाल ने कमेटियों के पुनर्गठन का आदेश देकर नितिन कँवर को झटका तो तगड़ा दिया है, लेकिन नितिन कँवर ने भी अपने लोगों के बीच स्पष्ट कर दिया है कि दोबारा उनका ऐसा अपमान हुआ तो वह बर्दाश्त नहीं करेंगे - और यदि जरूरत पड़ी तो वह वाइस चेयरमैन का पद छोड़ देंगे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की नई बनी टीम की पहली ही मीटिंग में नई बनी कमेटियों को लेकर खासा बबाल हो गय । नई बनी कमेटियों में हालाँकि विरोधी खेमे के सदस्यों को भी शामिल तो किया गया, और कुछेक कमेटियों में उन्हें प्रमुख पद भी दिए गए - लेकिन कमेटियों का गठन कुछ इस तरह से किया गया कि उन्हें सिर्फ सजावटी सदस्य/पदाधिकारी बन कर ही रहना पड़ता । यह देख/समझ कर विरोधी खेमे के सदस्य खासे भड़के हुए थे । उन्होंने चेयरमैन पंकज पेरिवाल को उलाहना भी दिया कि बातें तो सभी को साथ लेकर चलने की कर रहे हो, लेकिन रवैया पक्षपातपूर्ण है । पंकज पेरिवाल ने उन्हें समझाने की कोशिश भी की कि वह उनकी शिकायतों को सुनेंगे और आवश्यक कार्रवाई करेंगे, लेकिन चूँकि वह कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे थे - इसलिए विरोधी सदस्य भड़के ही रहे । विरोधी सदस्यों के भड़कने पर वाइस चेयरमैन नितिन कँवर ने पूर्व की भाँति अपना बदतमीजी भरा व्यवहार प्रदर्शित किया, तो मामला और ज्यादा गरमा गया । राजिंदर नारंग ने तो कमेटियों से इस्तीफा दे देने तक की घोषणा कर दी । मामले को बढ़ता और गंभीर रूप लेता देख मीटिंग में मौजूद सेंट्रल काउंसिल सदस्य विजय गुप्ता ने हस्तक्षेप किया और मोर्चा संभाला ।
विजय गुप्ता ने पहले तो नितिन कँवर को हड़काया । उन्होंने साफ कहा कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो होता रहा है, उससे काउंसिल और इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की बहुत बदनामी हुई है; इसलिए काउंसिल के पदाधिकारियों को अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए, और अपने पद की गरिमा के साथ-साथ इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की गरिमा को भी बनाए रखने पर गौर करना चाहिए । इसके बाद, विजय गुप्ता ने चेयरमैन पंकज पेरिवाल को सुझाव दिया कि काउंसिल के सदस्यों की यदि कोई शिकायत है, तो उन्हें उन शिकायतों को सुनना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए तुरंत ही कार्रवाई करना चाहिए । विजय गुप्ता ने जिस ढृढ़ता और स्पष्टता से अपनी बात कही, उसे सुन कर नितिन कँवर को मन मार कर चुप होना पड़ा और पंकज पेरिवाल ने भी तुरंत ही कमेटियों को पुनर्गठित करने का फैसला सुना दिया । नितिन कँवर के लिए यह बड़ी झटके वाली बात हुई । दरअसल कमेटियों में सदस्यों का नामांकन करने का काम उन्होंने ही किया था, और इस मनमानी के साथ किया था - जिससे कि उनकी चौधराहट तथा बदतमीजियाँ पिछले वर्ष की तरह बदस्तूर चलती रहें । नितिन कँवर को शिकायत रही है कि कुछेक बड़ी ब्रांचेज के पदाधिकारी उनकी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें कोई तवज्जो ही नहीं देते हैं, इस कारण से उन्होंने ऐसा जुगाड़ किया कि बड़ी ब्रांचेज में भी उन्हें मुँह दिखाने का मौका मिल जाए । नितिन कँवर के लिए लेकिन बदकिस्मती की बात यह रही कि रीजनल काउंसिल की इस वर्ष की पहली ही मीटिंग में उनके सारे जुगाड़ पर पानी फिर गया है ।
नितिन कँवर ने अपनी इस बदकिस्मती के लिए विजय गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया है । उल्लेखनीय है कि नितिन कँवर एक बार पहले भी विजय गुप्ता से सार्वजनिक रूप से लताड़ खा चुके हैं । कुछ ही दिन पहले दिल्ली में हुए इंस्टीट्यूट के कॉन्वोकेशन समारोह में नितिन कँवर की बदतमीजीपूर्ण हरकत पर विजय गुप्ता ने समारोह के बीच में ही उन्हें फटकारा था । पिछली बार फटकार खाकर नितिन कँवर हालाँकि चुप लगा गए थे; अबकी बार लेकिन वह गर्मी खाते नजर आ रहे हैं । विजय गुप्ता के सामने तो यद्यपि उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन अपने नजदीकियों के सामने उन्होंने विजय गुप्ता के प्रति भड़ास निकाली । नितिन कँवर के ही नजदीकियों का कहना है कि नितिन कँवर इस बात पर बुरी तरह निराश और फ्रस्ट्रेशन में हैं कि पंकज पेरिवाल ने भी विजय गुप्ता का साथ दिया और उनकी बात मान कर कमेटियों को पुनर्गठित करने का फैसला सुना दिया । दरअसल पिछले वर्ष के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने नितिन कँवर की बदतमीजीपूर्ण हरकतों को पूरा पूरा संरक्षण दिया हुआ था, लेकिन वैसा संरक्षण उन्हें पंकज पेरिवाल से मिलता नहीं दिख रहा है - उनके लिए फजीहत की बात यह और हुई कि विरोधी खेमे के सदस्यों की शिकायत को विजय गुप्ता ने तवज्जो देकर उनका हौंसला और बढ़ा दिया । इससे नितिन कँवर को लगने लगा है कि इस वर्ष उनके लिए अपनी हरकतों को जारी रख पाना मुश्किल ही होगा । नितिन कँवर इस स्थिति के लिए विजय गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । अपने नजदीकियों के सामने उन्होंने विजय गुप्ता के खिलाफ अपनी भड़ास तो निकाल ली, और यह घोषणा भी कर दी कि दोबारा ऐसा अपमान होने पर वह वाइस चेयरमैन पद छोड़ देंगे - लेकिन नितिन कँवर के लिए सचमुच ऐसा कर पाना संभव होगा क्या ?

Saturday, March 3, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में पूजा बंसल का वोट जुटाने में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की मिलीभगत की चर्चाओं ने नवीन गुप्ता के कार्यकाल को संदेहों के घेरे में ला दिया है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में पूजा बंसल से पाला बदलवाने में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के 'इस्तेमाल' होने की खबरों/चर्चाओं ने मामले को खासा दिलचस्प और गंभीर बना दिया है । दरअसल पूजा बंसल के पाला बदलने और उन लोगों के साथ जा मिलने ने, जिनकी बेईमानी व बदतमीजी भरी हरकतों के खिलाफ वह पिछले करीब एक वर्ष से सघन और निरंतर अभियान चलाये हुए थीं - हर किसी को हैरान किया है । पूजा बंसल की तरफ से उनके पति मोहित बंसल जिस तरह चुनाव के कुल तीन-चार घंटे पहले तक विरोधी खेमे के नेताओं के साथ रणनीति तय कर रहे थे, उससे किसी को संदेह तक नहीं हुआ कि पूजा बंसल सत्ता खेमे के साथ मिल जा सकती हैं । पूजा बंसल की तरफ से पाला बदलने के कारण के रूप में विवेक खुराना का विरोध करने की मजबूरी का जो तर्क दिया जा रहा है, वह किसी को भी हजम नहीं हो रहा है । दरअसल पूजा बंसल के विरोध को देखते हुए ही विरोधी खेमे ने विवेक खुराना की जगह राजिंदर नारंग को चेयरमैन पद का उम्मीदवार चुन लिया था, लेकिन फिर भी पूजा बंसल का वोट पंकज पेरिवाल को ही मिला ।
इससे तथा अन्य कुछेक प्रसंगों से लोगों को आभास हुआ है कि पूजा बंसल का सत्ता खेमे के साथ जाना पहले ही तय हो चुका था, विरोधी खेमे के साथ अंत समय तक 'दिखने' के पीछे वास्तव में सत्ता खेमे को संचालित करने वाले नेताओं की सोची-समझी रणनीति थी - ताकि विरोधी खेमे के लोगों को अंत समय तक भ्रम में रखा जा सके । पूजा बंसल के पाला बदल ने सभी को हैरान तो किया ही, लोगों के बीच इस सवाल को भी पैदा किया कि पूजा बंसल ने आखिर किस स्वार्थ में यह कदम उठाया ? कोई भी यह मानने को तो तैयार नहीं ही है कि पूजा बंसल ने सेक्रेटरी बनने के लिए पाला बदला है । हर कोई मान रहा है कि पूजा बंसल के पाला बदलने के पीछे कोई बड़ा खेल है । तरह-तरह के कयासों के बीच जिस एक बात पर सभी की सहमति-सी बनती नजर आ रही है, वह मोहित बंसल को एक मामले में इंस्टीट्यूट से 'रिहा' करवाने का है ।
इसी मामले ने नवीन गुप्ता की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बना दिया है । उल्लेखनीय है कि एक पुराने आपराधिक मुकदमे को लेकर मोहित बंसल की शिकायत इंस्टीट्यूट में की गई है, जिस पर इंस्टीट्यूट पदाधिकारियों को फैसला लेना है । चर्चा है कि मोहित बंसल के पक्ष में फैसला करवाने का आश्वासन देकर पूजा बंसल के वोट की व्यवस्था की गई । एक आम समझ यह है कि ऐसा आश्वासन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट की तरफ से ही दिया जा सकता है । हालाँकि यह तो कोई भी नहीं मानेगा कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के लिए इस तरह ही डील प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता खुद करेंगे; लेकिन उनके नजदीकी सेंट्रल काउंसिल सदस्य - विजय झालानी, राजेश शर्मा और विजय गुप्ता जिस तरह पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के अभियान में लगे हुए थे; उससे किसी के लिए यह समझना भी मुश्किल नहीं हो रहा है कि पूजा बंसल का वोट जुटाने की डील प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के स्तर पर ही हुई होगी । नवीन गुप्ता के बारे में वैसे भी मशहूर है कि वह कोई भी 'डील' खुद नहीं करते हैं, बल्कि अपने लोगों के जरिए करते हैं । मजे की बात है कि जिन कुछेक लोगों को पूजा बंसल का वोट जुगाड़ने के लिए नवीन गुप्ता की मिलीभगत की थ्योरी पर विश्वास नहीं भी हो रहा है, उनके लिए भी नवीन गुप्ता के बचाव में कोई तर्क दे पाना संभव नहीं हो रहा है । किसी के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल ही है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की मिलीभगत के बिना अन्य कोई भी इंस्टीट्यूट से मोहित बंसल को - या अन्य किसी को भी अनुकूल फैसला करवाने का वायदा कर सकता है ।
नवीन गुप्ता की मिलीभगत से, पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के लिए पूजा बंसल का वोट जुटाने की चर्चाओं ने मामले को रोचक मोड़ दे दिया है । लोगों का कहना है कि रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में नवीन गुप्ता की यदि कोई मिलीभगत नहीं भी है, तो भी यह कोई कम गंभीर बात नहीं है कि उनके नजदीकी - उनके साथ अपनी नजदीकियत का वास्ता देकर लोगों के साथ इंस्टीट्यूट में काम करवाने की 'सौदेबाजी' कर लें । लोगों का कहना है कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट यदि ऐसा व्यक्ति है, जिसे उसके नजदीकी जैसे जब चाहें - इस्तेमाल कर लेते हैं, तो यह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है । नवीन गुप्ता को एक शरीफ व्यक्ति के रूप में तो देखा/पहचाना जाता है, पर एक कुशल प्रशासक के रूप में लोगों को उनसे ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं - ऐसे में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में उनके इस्तेमाल हो जाने की चर्चाओं ने प्रेसीडेंट के रूप में उनके कार्यकाल को शुरुआत में ही संदेहों के घेरे में ला दिया है ।

Sunday, February 25, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में पंकज पेरिवाल के समर्थकों ने मनीलॉन्ड्रिंग के मामले में फँसे राजेश अग्रवाल को लेकर बहुमत वाले ग्रुप में फूट डालने की कोशिशें तेज कीं

नई दिल्ली । राजेश अग्रवाल को धमका/फुसला कर अपने समर्थन में लाने/करने में असफल रहने के बाद पंकज पेरिवाल को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनवाने में लगे सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने अब राजेश अग्रवाल को निशाने पर लेकर अपने 'लक्ष्य' को साधने की रणनीति बनाई है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के सदस्य राजेश अग्रवाल की गर्दन मनीलॉन्ड्रिंग के एक केस में फँसी हुई है, जिसके चलते वह जेल में भी रह चुके हैं, और फिलहाल जमानत पर हैं । रीजनल काउंसिल में अपने ग्रुप के अल्पमत स्टेटस को बहुमत में बदलने लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा कई बार उन्हें अपने ग्रुप में लाने की कोशिश कर चुके हैं । पिछले महीनों में जब जब राजेश शर्मा के ग्रुप को बहुमत की जरूरत पड़ी, तब तब राजेश शर्मा ने अपने भाजपाई कनेक्शन का वास्ता देकर उन्हें कभी 'बच नहीं पाओगे' की धमकी देकर तो कभी 'हम बचा सकते हैं' का लालच देकर अपनी तरफ करने की कोशिशें कीं, लेकिन असफल रहे । पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के लिए तो राजेश शर्मा ने राजेश अग्रवाल का समर्थन लेने का जोरदार प्रयास किया, और इसके बदले में उन्हें चेयरमैन के अलावा कोई भी पद लेने का ऑफर दिया । राजेश अग्रवाल लेकिन 'हार्ड बारगेनर' निकले । उन्होंने माँग की कि चेयरमैन पद के लिए उनके नाम की पर्ची डाली जाए । राजेश शर्मा इस माँग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए । उन्हें डर हुआ कि पर्ची कहीं राजेश अग्रवाल की निकल आई, तो उनकी तो सारी कारस्तानी पर पानी फिर जाएगा । इस तरह, पंकज पेरिवाल को चेयरमैन बनवाने के लिए राजेश अग्रवाल के साथ की जा रही सौदेबाजी असफल हो गईं ।
पंकज पेरिवाल के समर्थक नेताओं ने राजेश अग्रवाल का समर्थन न मिलने की स्थिति में पैंतरा बदल कर उनके विरोध का झंडा उठा लिया है । राजेश अग्रवाल को चेयरमैन के अलावा कोई भी पद देने के लिए तैयार रहने वाले नेताओं ने रंग बदलते हुए अब घोषणा की है कि राजेश अग्रवाल की काउंसिल के किसी भी पद के लिए उम्मीदवारी आई, तो सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की भी वोटिंग करवाई जायेगी - ताकि राजेश अग्रवाल जैसे 'आरोपी' को काउंसिल में कोई पद न मिले । तर्क दिया जा रहा है कि राजेश अग्रवाल चूँकि मनीलॉन्ड्रिंग के मामले में आरोपी हैं और जेल की हवा भी खा चुके हैं, इसलिए उनका काउंसिल में किसी भी पद पर होना इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बदनामीभरा मामला होगा । पंकज पेरिवाल के समर्थकों ने इस घोषणा के जरिए दरअसल बहुमत खेमे में एक तरफ तो फूट डालने की चाल चली है, और दूसरी तरफ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के रीजनल काउंसिल के चुनाव में शामिल होने की 'भूमिका' तैयार की है । पंकज पेरिवाल के समर्थकों को उम्मीद है कि राजेश अग्रवाल को लेकर वह जो पेंच फँसा रहे हैं, उससे काउंसिल के सात सदस्यीय बहुमत खेमे में फूट पड़ जाएगी, जो उनका काम बनाएगी; और यदि बहुमत खेमे के लोगों ने आपसी समझदारी का परिचय देते हुए अपनी एकता को बनाए रखा, तो पंकज पेरिवाल के समर्थक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को बहाना मिल जायेगा कि वह तो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख व प्रतिष्ठा बचाने के लिए चुनाव में कूदे हैं । पंकज पेरिवाल के समर्थकों को विश्वास है कि उनका यह गिरगिटी रंग बदलता रवैया - कि राजेश अग्रवाल यदि 'हमारे' साथ है तब तो ठीक है, लेकिन यदि किसी और के साथ है तो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो जाएगी; और तब इस बदनामी को रोकने के लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को चुनाव में आना ही पड़ेगा - उन्हें अवश्य ही सफलता दिलवायेगा ।
यह सचमुच दिलचस्प नजारा है कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को बदनामी को बचाने की जिम्मेदारी राजेश शर्मा जैसों के कंधे पर आ पड़ी है । यह तो बड़ा चुटकुला हो गया है । राजेश शर्मा की करतूतों ने इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की कितनी और कैसी बदनामी करवाई है, यह बात क्या किसी से छिपी है ? जिस राजेश शर्मा के लिए इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में 'राजेश शर्मा चोर है' 'राजेश शर्मा दलाल है' जैसे नारे गूँजे हों - वह राजेश शर्मा इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को बदनामी से बचाने की बात करते हैं, तो इसे एक अवसरवादी व्यवहार के रूप में ही देखा/पहचाना जायेगा । रही बात राजेश अग्रवाल की - तो उन पर जो आरोप है, वह जगजाहिर है; उसके बाद भी वह रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, तो जाहिर है कि न तो देश का कोई कानून और न इंस्टीट्यूट का कोई नियम/कानून उन्हें काउंसिल की गतिविधियों में शामिल होने से रोक सकता है । राजेश अग्रवाल को लेकर जो लोग बदनामी की बात कर रहे हैं, वह विभिन्न कार्यक्रमों में राजेश अग्रवाल के साथ खड़े होकर तस्वीरें खिंचवा चुके हैं । सेंट्रल काउंसिल के जो सदस्य राजेश अग्रवाल के रीजनल काउंसिल में पदाधिकारी बनने को इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बदनामीभरा मानते हैं, उन्होंने यह प्रयास आखिर कभी क्यों नहीं किया कि राजेश अग्रवाल को काउंसिल की गतिविधियों से अलग-थलग किया जाए - क्या इसलिए क्योंकि वह भी जानते हैं कि मनीलॉन्ड्रिंग के जैसे जो आरोप राजेश अग्रवाल पर हैं, वैसे काम-धंधे तो कई एक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के भी बताए जाते हैं; अभी फर्क सिर्फ इतना है कि राजेश अग्रवाल पकड़े जा चुके हैं, जबकि दूसरे लोग अभी पकड़ में नहीं आए हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सीए डे के फंक्शन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को खुली लताड़ लगाई ही थी, इसलिए मनीलॉन्ड्रिंग के आरोप में फँसे राजेश अग्रवाल को काउंसिल पदाधिकारी न बनने देने के नाम पर की जाने वाली राजनीति वास्तव में घड़ियाली आँसूं बहाने तथा नौ सौ चूहे खा चुकी बिल्ली के हज पर जाने की तैयारी करने जैसा मामला ही है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में यह नाटक भी देखने को मिलेगा, यह भला किसने सोचा था ?

Wednesday, February 14, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत का चेयरमैन बनवाने की राजेश शर्मा की हरकत को विजय गुप्ता का भी समर्थन सचमुच मिलेगा क्या ?

नई दिल्ली । विज्ञान भवन में आयोजित हुए इंस्टीट्यूट के 68वें वार्षिक समारोह के अवसर पर निवर्तमान प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को तीन केंद्रीय मंत्रियों के सामने पिछले 'सीए डे' फंक्शन की बदइंतजामी को लेकर जो लताड़ सुनने को मिली, उसने सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की करतूतों की याद एक बार फिर ताजा करा दी - और इस याद ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव को लेकर राजेश शर्मा द्वारा बनाए जा रहे समीकरण को गड़बड़ा देने की आशंका पैदा कर दी है । यह आशंका वास्तव में सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे सदस्य विजय गुप्ता को लेकर उठी है । लोगों को लग रहा है कि 'सीए डे' फंक्शन में की गईं राजेश शर्मा की करतूतों की यादें जिस तरह से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अभी भी पीड़ा पहुँचा रही हैं, उसे देखते हुए विजय गुप्ता अपना नाम किसी भी रूप में राजेश शर्मा के साथ जोड़ने को तैयार शायद न हों । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन को लेकर राजेश शर्मा लेकिन जो समीकरण बनाते सुने जा रहे हैं, उसमें उन्होंने विजय गुप्ता को शामिल किया हुआ है । हालाँकि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि राजेश शर्मा ने अपने समीकरण में शामिल करने के लिए विजय गुप्ता की सहमति ले ली है, या उन्हें फँसाने के लिए वह उनका नाम अपने मन से ले रहे हैं । राजेश शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि राजेश शर्मा यदि अपने किसी खेल में विजय गुप्ता के भी शामिल होने की बात कर रहे हैं, तो इसके लिए उन्होंने अवश्य ही विजय गुप्ता से सहमति ले ली होगी; लेकिन विजय गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि प्रोफेशन के लोगों के बीच राजेश शर्मा की भारी बदनामी को देखते हुए विजय गुप्ता चुनावी वर्ष में राजेश शर्मा के साथ किसी भी रूप में खड़े नहीं दिखना चाहेंगे - उनके किसी खेल में शामिल होना तो बहुत दूर की बात है । 
68वें वार्षिक समारोह में राजेश शर्मा की कारस्तानियों के कारण भरी सभा में नीलेश विकमसे की जो फजीहत हुई, उसने विजय गुप्ता को और भी सावधान कर दिया है । उनकी यह सावधानी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव को लेकर राजेश शर्मा द्वारा तैयार की गई रणनीति को गड़बड़ा रही है । राजेश शर्मा ने पंकज पेरिवाल को अल्पमत के बावजूद चेयरमैन बनवाने की जो रणनीति तैयार की है, उसमें विजय गुप्ता की अहम् भूमिका है । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 13 सदस्यों में राजेश शर्मा के उम्मीदवार के रूप में पंकज पेरिवाल को कुल 6 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है । तरह तरह की हरकतों व दबावों से राजेश शर्मा ने बाकी सदस्यों में से किसी एक का समर्थन जुटाने का प्रयास तो बहुत किया है, लेकिन उनकी बदनामी को देखते हुए उनका प्रयास सफल नहीं हो सका है । इस असफलता के चलते ही राजेश शर्मा ने दावा करना शुरू किया कि चेयरमैन तो पंकज पेरिवाल ही बनेगा, इसके लिए भले ही एक्स-ऑफिसो के रूप में उन्हें और विजय गुप्ता को अपना वोट क्यों न डालना पड़े । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल में एक्स-ऑफिसो के रूप में हालाँकि पाँच वोट और हैं, और उन पाँचों को पंकज पेरिवाल व राजेश शर्मा की जोड़ी के खिलाफ ही देखा/पहचाना जाता है - लेकिन राजेश शर्मा को उनकी परवाह नहीं है । राजेश शर्मा जानते हैं कि यह पाँचों 'शरीफ' लोग हैं और यह एक्स-ऑफिसो के रूप में अपना अपना वोट नहीं डालेंगे । दरअसल जैसा कि समाज में होता है - जहाँ बदमाशियाँ बदमाशों के प्रभाव के कारण नहीं होती/बढ़ती हैं, बल्कि शरीफों के चुप रहने के कारण बढ़ती हैं; ठीक उसी तर्ज पर इंस्टीट्यूट में राजेश शर्मा की हरकतों ने इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को अपने प्रभाव के कारण कलंकित नहीं किया हुआ है, बल्कि इसलिए कलंकित किया हुआ है क्योंकि दूसरे लोग चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं । राजेश शर्मा इसीलिए आश्वस्त हैं कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनवाने में उनकी मर्जी सफल हो जाएगी । विजय गुप्ता को वह 'अपने जैसा ही' मानते/समझते हैं ।
विजय गुप्ता को राजेश शर्मा अपने खेल में इसलिए भी शामिल समझते हैं, क्योंकि पंकज पेरिवाल के साथ विजय गुप्ता के यूँ भी अच्छे संबंध हैं । विजय गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी के लिए लुधियाना में पंकज पेरिवाल और उनके पिता से सहयोग व समर्थन मिलता रहा है । राजेश शर्मा को विश्वास है कि वही सहयोग व समर्थन पंकज पेरिवाल के पक्ष में वोट करने के लिए विजय गुप्ता की मजबूरी बनेगा । विजय गुप्ता के सामने दोहरी समस्या है - एक तो यह कि पंकज पेरिवाल के लिए वह वोट करने को यदि तैयार हो भी जाएँ, तो भी पंकज पेरिवाल की जीत वास्तव में राजेश शर्मा की ही जीत मानी/समझी जाएगी और उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा; दूसरी समस्या यह कि राजेश शर्मा की बदनामी का कीचड़ उनके साथ और चिपक जायेगा । विजय गुप्ता को यह भी लगता है कि पंकज पेरिवाल यदि अल्पमत में होने के बावजूद चेयरमैन बन भी जाते हैं, तो पूरे वर्ष बार बार मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ की तरह फजीहत के शिकार बनेंगे - और तब बार बार उनका नाम भी उछलेगा, और यह बात चुनावी वर्ष में उनके लिए खासी फजीहत भरी साबित हो सकती है । विजय गुप्ता को अगले वर्ष वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव भी लड़ना है । अल्पमत के चेयरमैन के रूप में पंकज पेरिवाल के झंझट तब तक चलते ही रहेंगे और यह बात विजय गुप्ता के लिए मुसीबत भरी साबित हो सकती है । इसलिए विजय गुप्ता के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि विजय गुप्ता को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अल्पमत का चेयरमैन बनवाने के राजेश शर्मा के खेल में नहीं पड़ना/फँसना चाहिए । विजय गुप्ता क्या करेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन यह जरूर पता चल रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद के चुनाव की चाबी विजय गुप्ता के पास ही है ।

Sunday, October 4, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हरियाणा-पंजाब के उम्मीदवारों के रूप में राजिंदर नारंग, आलोक कृष्ण व पंकज पेरिवाल के प्रवेश को रोकने की तैयारी की चर्चा से चुनावी परिदृश्य रोचक बना

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दिल्ली से बाहर के उम्मीदवारों का प्रवेश रोकने के लिए दिल्ली के चुनावी खिलाड़ियों ने हरियाणा-पंजाब के जीतते दिख रहे उम्मीदवारों को घेरने के लिए जो फील्डिंग लगाई/सजाई है, उससे नॉर्दर्न रीजन में चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 22वें सत्र में दिल्ली और बाहरी दिल्ली के सदस्यों की संख्या अनुपात में एक बड़ा बदलाव होता नजर आ रहा है । मौजूदा 21वें सत्र में हरियाणा-पंजाब से विशाल गर्ग और राजिंदर नारंग के रूप में दो सदस्य हैं, किंतु अगले सत्र में यह संख्या तीन होने की तो पक्की उम्मीद की जा रही है । दिल्ली वालों को एक तरफ तो अपनी एक सीट घटती हुई दिख रही है; और दूसरी तरफ उन्हें यह डर भी सता रहा है कि बढ़ती संख्या के साथ साथ हरियाणा-पंजाब के सदस्य आपस में अच्छा तालमेल बना कर काउंसिल में प्रमुख पद भी हथियाने लगे हैं । उनका यह डर दरअसल मौजूदा सत्र में विशाल गर्ग के चेयरमैन तथा राजिंदर नारंग के सेक्रेटरी बनने से बढ़ा है । फरीदाबाद-गुडगाँव के सदस्य यूँ तो दिल्ली के ही माने जाते हैं, किंतु इनकी गिनती भी यदि दिल्ली से बाहर के सदस्यों के रूप में की जाये, तो दिल्ली और दिल्ली से बाहर के सदस्य बराबर की टक्कर के बैठते हैं - और यह टक्कर दिल्ली के बर्चस्व को चुनौती देती है । इस लिहाज से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का अगला सत्र दिलचस्प नजारा पेश करने वाला माना जा रहा है । 
इस संभावित दिलचस्प नजारे के मुख्य किरदारों के रूप में राजिंदर नारंग, आलोक कृष्ण और पंकज पेरिवाल को देखा/पहचाना जा रहा है । राजिंदर नारंग तो मौजूद सत्र के सदस्य हैं ही; अगले सत्र में उनकी वापसी को सुनिश्चित मानते हुए आकलन किया जा रहा है कि अगले सत्र में उनके साथ आलोक कृष्ण और पंकज पेरिवाल भी काउंसिल में बैठेंगे । आलोक कृष्ण पिछली बार थोड़े से अंतर से काउंसिल में प्रवेश पाने से रह गए थे । पिछली बार चंडीगढ़ में उनका जैसा विरोध देखा जा रहा था, वैसे विरोध का सामना उन्हें इस बार नहीं करना पड़ रहा है । पिछली बार चंडीगढ़ में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से जुड़े जो कई नेता उनका खुला विरोध कर रहे थे और दिल्ली के उम्मीदवारों को बुला बुला कर उन्हें चंडीगढ़ में वोट दिलवाने के प्रयासों में लगे थे, उनमें से कुछेक इस बार उनका खुला समर्थन कर रहे हैं, और बाकी अधिकतर चुप बैठे हैं । पिछली बार चंडीगढ़ में भारी विरोध का सामना करने के बावजूद आलोक कृष्ण का प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं रहा था । इस नाते विश्वास किया जा रहा है कि इस बार जब आलोक कृष्ण को चंडीगढ़ में किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ रहा है, तो इस बार उनकी जीत पक्की ही है । पंकज पेरिवाल को भी जीतने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 
इनकी संभावित जीत में लेकिन दिल्ली वालों ने गोपाल बंसल, भरत कुमार, राघव गोयल रूपी काँटे बिछा दिए हैं । दरअसल ऐन मौके पर इनकी उम्मीदवारी जिस अप्रत्याशित तरीके से प्रकट हुई है, उससे लोगों के बीच शक पैदा हुआ है कि यह वास्तव में वोट कटवा उम्मीदवार हैं, जो जीतने के लिए नहीं बल्कि जीतते दिख रहे उम्मीदवारों को हरवाने के लिए उम्मीदवार बने हैं । चुनावी राजनीति में डमी उम्मीदवार और/या वोट कटवा उम्मीदवार एक जानी-पहचानी सच्चाई है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अपने बिजनेस नेटवर्किंग को बढ़ाने के लिए भी उम्मीदवार बन जाते हैं, और ऐसे उम्मीदवार डमी या वोट कटवा उम्मीदवार की तलाश में रहने वाले नेताओं के आसान शिकार भी हो जाते हैं । कुछेक लोगों ने बताया है कि असीम पाहवा तो कहने भी लगे हैं कि वह तो अपना बिजनेस नेटवर्क बढ़ाने के लिए उम्मीदवार बने हैं । असीम पाहवा की उम्मीदवारी के पीछे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य अतुल गुप्ता का हाथ होने की चर्चा भी बड़ी आम रही है । गोपाल बंसल, भरत कुमार और राघव गोयल जिस अचानक तरीके से उम्मीदवार के रूप में सामने आए हैं, उससे लोगों को लगा है कि यह उम्मीदवार बने नहीं हैं - बल्कि इन्हें उम्मीदवार बनाया गया है । लोगों के बीच की चुनावी चर्चा के अनुसार गोपाल बंसल के जरिए राजिंदर नारंग को; तथा भरत कुमार व राघव गोयल के जरिए आलोक कृष्ण व पंकज पेरिवाल को घेरने की तरकीब लगाई गई है । 
हरियाणा-पंजाब के नॉन-सीरियस उम्मीदवारों के पीछे दिल्ली के नेताओं का हाथ होने की जितनी व्यापक चर्चा हो रही है, उससे लग रहा है कि हरियाणा-पंजाब के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में भी जागरूकता बढ़ रही है - और वह दिल्ली के नेताओं की चालबाजियों को जानने/समझने लगे हैं । चंडीगढ़ में पिछली बार आलोक कृष्ण की उम्मीदवारी के खिलाफ सक्रिय लोगों को भी यह बात समझ में लगता है कि आई है कि उनके बीच के छोटे छोटे मतभेदों का दिल्ली वाले कैसे फायदा उठा लेते हैं; तथा दिल्ली से बाहर के लोगों को सिर्फ इस्तेमाल करना चाहते हैं । दिल्ली के नेताओं ने राजिंदर नारंग की जैसी घेराबंदी करने की तैयारी दिखाई है, उससे भी हरियाणा-पंजाब के लोगों को लगा है कि दिल्ली वाले कैसे उनकी सक्रियता व उपलब्धियों को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं । काउंसिल में राजिंदर नारंग का कार्यकाल खासा सक्रियता भरा रहा है, और कई मौकों पर उनकी भूमिका को निर्णायक माना/पाया गया । अपनी उम्मीदवारी के लिए चुनाव अभियान पर निकले राजिंदर नारंग से कई जगह कहा गया कि अगली बार उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनना होगा । भविष्य की राजनीति का संकेत देते राजिंदर नारंग के प्रति व्यक्त हो रहे इस समर्थन ने दिल्ली के चुनावी नेताओं के सामने दोहरा संकट खड़ा कर दिया है । इस संकट से निपटने के लिए दिल्ली के नेताओं को राजिंदर नारंग को अभी ही घेरना जरूरी लगा है । हरियाणा-पंजाब से जीतते दिख रहे तीन उम्मीदवारों में पंकज पेरिवाल को तो दोनों तरफ से घेरने के लिए जाल डाला गया है । दरअसल दिल्ली के नेताओं को लगता है कि राजिंदर नारंग व आलोक कृष्ण को जीतने से वह भले ही न रोक पाएँ, किंतु पंकज पेरिवाल को शायद रोक सकते हैं । दिल्ली के नेताओं की इस हरकत के खिलाफ हरियाणा-पंजाब में लेकिन बड़ी तीखी प्रतिक्रिया है, जो जीतते दिख रहे तीनों उम्मीदवारों को और बल दे रही है । इस घटना-चक्र ने नॉर्दर्न रीजन में रीजनल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य को खासा रोचक जरूर बना दिया है ।