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Tuesday, October 9, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में फरीदाबाद व गुड़गाँव के साथियों/समर्थकों के साथ छोड़ जाने के कारण नॉर्दर्न रीजन में वोटों की गिनती में सबसे आगे रहने की अतुल गुप्ता की कोशिश और तैयारी क्या फेल हो सकती है ?

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए तैयारी कर रहे अतुल गुप्ता को फरीदाबाद और गुड़गाँव के अपने कुछेक साथियों और समर्थकों के साथ छोड़ जाने से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए विशेष प्रयास करने पड़ रहे हैं । फरीदाबाद और गुड़गाँव के अपने समर्थकों के साथ छोड़ जाने से अतुल गुप्ता को हालाँकि कोई बड़ा नुकसान होने की संभावना या डर नहीं है; लेकिन अतुल गुप्ता को यह डर जरूर है कि इस कारण से कहीं सबसे ज्यादा वोट जुटाने का उनका लक्ष्य न असफल हो जाए । पिछली बार पहली वरीयता के वोटों की गिनती में अतुल गुप्ता को नवीन गुप्ता और संजीव चौधरी के बाद तीसरा नंबर मिला था । इस बार के चुनावी मुकाबले में उन दोनों के न होने की स्थिति में अतुल गुप्ता की कोशिश है कि वोटों की गिनती में वह पहले नंबर पर रहें । उनकी इस कोशिश को लेकिन फरीदाबाद और गुड़गाँव के उनके कुछेक साथियों/समर्थकों के साथ छोड़ जाने से धक्का लगा है । गुड़गाँव को अतुल गुप्ता के अच्छे समर्थक-आधार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है । गुड़गाँव ब्रांच के पूर्व चेयरमैन संजय कुमार अग्रवाल के उम्मीदवार हो जाने को तो अतुल गुप्ता ने अपने लिए किसी समस्या के रूप में नहीं लिया है, लेकिन साथी/समर्थक रहे लोगों के साथ छोड़ जाने से उन्हें अपनी उम्मीदवारी के लिए झटका महसूस हुआ है । पिछली बार फरीदाबाद और गुड़गाँव में अतुल गुप्ता, विजय कुमार गुप्ता और 'वॉयस ऑफ सीए' वाले संजय अग्रवाल को अच्छा समर्थन मिला था । 'वॉयस ऑफ सीए' वाले संजय अग्रवाल इस बार उम्मीदवार नहीं हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, अतुल गुप्ता का आकलन है कि गुड़गाँव वाले संजय अग्रवाल गुड़गाँव/फरीदाबाद में उतने वोट भी नहीं ले पायेंगे, जितने वोट यहाँ 'वॉयस ऑफ सीए' वाले संजय अग्रवाल को मिल गए थे - इसलिए नए संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी से उन्हें कोई नुकसान होता हुआ नहीं दिख रहा है; लेकिन पुराने साथियों/सहयोगियों और समर्थक रहे लोगों के साथ छोड़ जाने के कारण उनके जरिये उन्हें मिलने वाले वोटों का जो नुकसान होगा, उसकी कमी उनके लिए चिंता की बात है ।
फरीदाबाद में खासा मजेदार सीन बना है । फरीदाबाद में विजय कुमार गुप्ता के कट्टर वाले कुछेक विरोधी अतुल गुप्ता के साथी/समर्थक रहे हैं । अतुल गुप्ता ने लेकिन उनके साथ विरोधाभासी रवैया अपनाया - अतुल गुप्ता ने उनकी मदद तो ले ली, लेकिन खुद उनके कभी काम नहीं आए और उनके साथ उन्होंने हमेशा ही एक दूरी बना कर रखी । दरअसल अतुल गुप्ता ने पाया/जाना यह कि विजय कुमार गुप्ता के यह कट्टर विरोधी नकारात्मक सोच वाले घटिया लोग हैं; और विजय कुमार गुप्ता के प्रति निजी खुन्नस रखने के कारण ही यह उनके विरोधी हैं । विजय कुमार गुप्ता की कोई भी उपलब्धि सुन/देख कर इनकी हालत ऐसी हो जाती है जैसे इनके शरीर में चीटियाँ घुस गईं हैं और इनके शरीर को बुरी तरह काट रही हैं, जिससे इन्हें ऐसी 'खुजली' उठती है कि इनका दिन का चैन और रात की नींद हराम हो जाती है । खुजली मिटाने के लिए फिर यह ऐसी ऐसी हरकतें करते हैं, जिससे विजय गुप्ता का तो कुछ नहीं बिगड़ता - यही लोग एक्सपोज हो जाते हैं, और लोग इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं और इन्हें तवज्जो देना बंद कर देते हैं । यही कारण है कि जैसे जैसे विरोध के नाम पर इनकी हरकतें बढ़ीं हैं, विजय कुमार गुप्ता को मिलने वाले वोटों की संख्या भी बढ़ी है । लेकिन नॉनसेंस वैल्यू की भी कुछ 'वैल्यू' तो चूँकि होती ही है - उसी को पहचान कर अतुल गुप्ता ने उनका फायदा तो ले लिया; लेकिन अतुल गुप्ता चूँकि अपनी छवि के प्रति सावधान रहते हैं, इसलिए 'खुजलीबाज' लोगों से उन्होंने दूरी भी बना कर रखी ।अतुल गुप्ता ने इस बार तो पहले से ही सावधानी रखी कि फरीदाबाद में विजय कुमार गुप्ता के ऐसे विरोधियों से उन्होंने पूरी तरह दूरी बना ली - जो विजय कुमार गुप्ता का विरोध करने के नाम पर सिर्फ अपनी खुजली मिटाते हैं और छिछोरापन दिखाते हैं । अतुल गुप्ता द्वारा दुत्कारे जाने के बाद फरीदाबाद के उन लोगों ने संजय कुमार अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । अतुल गुप्ता को यह तो समझ में आ रहा है कि यह लोग संजय कुमार अग्रवाल को ज्यादा वोट नहीं दिलवा पायेंगे, लेकिन उनके लिए समस्या की बात यह है कि यह संजय कुमार अग्रवाल को फरीदाबाद में जो भी थोड़े/बहुत वोट दिलवा सकेंगे, उससे नुकसान तो अतुल गुप्ता के वोटों का ही होगा ।
अतुल गुप्ता के लिए गुड़गाँव में अलग तरह की समस्या पैदा हुई है । यहाँ उनके साथी और समर्थक लोग उन पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगा रहे हैं । साथी और समर्थक रहे लोगों का कहना/बताना है कि अतुल गुप्ता ने काम लेने के समय तो उनसे बड़े बड़े वायदे किए और उन्हें तरह तरह के सब्जबाग दिखाए, लेकिन काम निकल जाने के बाद उन्हें पहचानना तक बंद कर दिया । अतुल गुप्ता के इस अवसरवादी रवैये के शिकार अधिकतर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, जिन्होंने अतुल गुप्ता से मिले धोखे को जैसे दिल पर ले लिया है, और इस कारण से उन्हें जहाँ मौका मिलता है, वह अतुल गुप्ता के रवैये को लेकर शिकायत करने लगते हैं । अतुल गुप्ता के लिए राहत की बात यह है कि उनसे धोखा खाए लोग चूँकि किसी दूसरे उम्मीदवार के साथ नहीं लगे हैं, इसलिए उनसे धोखा खाए लोगों की नाराजगी अतुल गुप्ता को ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचाती है; लेकिन अतुल गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह बनी है कि उनसे धोखा खाए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स चूँकि घूमते/फिरते और मिलते/जुलते ज्यादा हैं, और हर जगह अतुल गुप्ता के रवैये का रोना रोते हैं - इसलिए अतुल गुप्ता की बदनामी फैलती है, और यह बदनामी वोटों का नुकसान भी करती है । फरीदाबाद और गुड़गाँव में हो रहे इस नुकसान से अतुल गुप्ता की उम्मीदवारी पर हालाँकि कोई खास असर पड़ता हुआ नहीं नजर आ रहा है, लेकिन इससे उन्हें कुल मिलाकर वोटों का नुकसान होता हुआ तो दिख ही रहा है । वोटों का यह नुकसान सेंट्रल काउंसिल में पुनर्प्रवेश से अतुल गुप्ता को बेशक न रोक सके, लेकिन वोटों की गिनती में सबसे आगे रहने की उनकी कोशिश तथा उनकी तैयारी को फेल जरूर कर सकती है । फरीदाबाद और गुड़गाँव में होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए अतुल गुप्ता प्रयास तो खूब कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयास सचमुच सफल होते हैं या नहीं - यह चुनावी नतीजा आने के बाद ही पता चलेगा ।

Monday, October 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को प्रस्तुत करने के बावजूद, लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनके साथियों को बुरी तरह से निराश किया है

नई दिल्ली । गुड़गाँव ब्राँच के पूर्व चेयरमैन संजय कुमार अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हुए अपना 'विजनरी' रूप तो बहुत ही जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया है, लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके 'विजन' से उनकी उम्मीदवारी के लिए अपील पैदा होती नहीं दिख रही है । संजय कुमार अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि लोग उनकी बातें सुनते/पढ़ते तो हैं, लेकिन 'रिएक्ट' नहीं करते हैं - उत्साहित नहीं होते हैं । नजदीकियों के अनुसार, संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को उम्मीद थी कि वह एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर लोगों के बीच जायेंगे - तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एक नई ऊर्जा से भर जायेंगे और देखेंगे/सोचेंगे कि उनके बीच प्रोफेशनली उनकी फिक्र करने वाला उम्मीदवार आया है; और यह देख/सोच कर उन्हें हाथों-हाथ लेंगे । लेकिन लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को बुरी तरह से निराश किया है । किसी ने मजाक में कहा कि संजय कुमार अग्रवाल ने जिस तरह की बातें की हैं, उनमें प्रोफेशन में 'अच्छे दिन' लाने का वायदा है; लोग लेकिन 'अच्छे दिन' के वायदे से डरे हुए हैं - 'अच्छे दिन' के वायदे में ठगे जाने का उनका अनुभव चूँकि ताजा ताजा है, इसलिए संजय कुमार अग्रवाल की बातों में दिलचस्पी लेने में किसी ने जरूरत नहीं समझी । प्रोफेशन से जुड़े वरिष्ठ लोगों का यह भी कहना है कि तकनीकी विकास के चलते कई क्षेत्रों में कामकाज में जो परिवर्तन आए हैं, उसे और उसके प्रभाव को गहराई से समझे बिना उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर संजय कुमार अग्रवाल जिस तरह चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन में भी उसी फार्मूले को इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं - उससे वह साबित कर रहे हैं कि उन्होंने न उस 'परिवर्तन' को गहराई से समझा है और न चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन को तथा उससे जुड़े लोगों की जरूरतों को ही जाना/समझा है । 
संजय कुमार अग्रवाल 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे कामों का उदाहरण देते हुए आह्वान कर रहे हैं कि चार्टर एकाउंटेंट्स भी 'रिकॉर्डिंग' 'रिपोर्टिंग' के भरोसे कब तक काम करते रहेंगे ? बिना कैश के खरीदारी करने की सुविधा को वह बड़ी उपलब्धि की तरह पेश कर रहे हैं । उनके उदाहरण और तर्क से पहली ही नजर में लग गया है कि उन्हें मामलों की गहरी जानकारी नहीं है, और वह सिर्फ ऊपर ऊपर की बातों को लेकर जुमलेबाजी कर रहे हैं । दरअसल नई आर्थिक नीतियों और तकनीकी विकास ने कामकाज और समाज पर व्यापक असर डाला है, और कई कामकाज के रूपों में भारी बदलाव हुए हैं । इन बदलावों के चलते कामकाज की शक्ल तो बदली है, लेकिन बुनियादी समस्याएँ जहाँ की तहाँ ही बनी रही हैं । जैसे 'बिना दुकान के सामान बेचने' की व्यवस्था में बदलाव सिर्फ यही तो हुआ है कि दुकान वाले स्टॉक रखने वाले बन गए और दुकान में काम करने वाले कूरियर ब्यॉय बन गए । 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' वाला इसीलिए तो सर्विस दे पा रहा है, क्योंकि अपने खून-पसीने की कमाई की बचत से गाड़ी खरीदने वाला और उसकी ड्राईवरी करने वाला मौजूद है । तकनीकी विकास ने चूँकि लोगों के बीच संपर्क और पहुँच को आसान बना दिया है, इसलिए उसका फायदा उठा कर कुछेक लोगों ने नेटवर्किंग का विस्तार करके कामकाज को एक नया रूप दिया है । किंतु यह नया रूप दिया तो उन लोगों के भरोसे ही है, जो पहले से ही काम कर रहे थे - और नया रूप देने का काम करने वाले भी कितने लोग हैं ? और इस नए रूप में जिन लोगों को फायदा भी हुआ है, उनकी संख्या भी कोई बहुत ज्यादा नहीं है - और उनका यह फायदा भी पहले के लोगों के नुकसान की कीमत पर ही हुआ है । इसे उपलब्धि भला कैसे माना जा सकता है ? कैश के बिना खरीदारी करने के दावे का भला क्या मतलब है ? यह ठीक है कि तकनीकी विकास के चलते कैश जेब में रखने की मजबूरी खत्म हो गई है, और कॉर्ड से खरीदारी करने की सुविधा है - लेकिन इस बात को 'बिना कैश के खरीदारी' करना कैसे कहा जा सकता है ? बिना कैश के खरीदारी करने का दूसरा तरीका - उधार लेना है । संजय कुमार अग्रवाल क्या इसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं ?
कामकाज के जो तौर-तरीके बदले हैं, उसका प्रभाव तो चार्टर्ड एकाउंटेंट के काम पर भी पड़ा है । संजय कुमार अग्रवाल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' के झंझट से मुक्ति दिलवाने का जो आह्वान कर रहे हैं, एंट्री का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तो उससे पहले से ही मुक्त हैं । सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए उम्मीदवार बने राजेश शर्मा के बारे में तो लोग कहते ही हैं कि वह 'रिकॉर्डिंग' और रिपोर्टिंग' करते हुए एक चार्टर्ड एकाउंटेंट की तरह काम कहाँ करते हैं ? लेकिन सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स राजेश शर्मा जैसे तो नहीं हो सकते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पिछले दिनों इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों के आ धमकने के बाद पता चला कि पंकज पेरिवाल ने अपने दो क्लाइंट्स को अपने ऑफिस का पता इस्तेमाल करने का अधिकार दिया हुआ था । यह मुफ्त में तो नहीं ही दिया गया होगा, और इसके लिए कोई अधिकृत 'रिपोर्टिंग' और 'रिकॉर्डिंग' भी नहीं की गई होगी । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' से मुक्त करने/करवाने की इच्छा रखने वाले संजय कुमार अग्रवाल कहीं पंकज पेरिवाल से भी तो प्रेरणा नहीं ले रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि कुछेक चार्टेड एकाउंटेंट्स जुगाड़ और तिकड़म से काम जुटा लेते हैं, और फिर उस काम को दूसरे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से करवाते हैं । निस्संदेह इससे काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम तो मिलता है, लेकिन इसे क्या आदर्श स्थिति कह सकते हैं ? संजय कुमार अग्रवाल जिस तकनीकी विकास पर 'उछल' रहे हैं, उसने देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई को चौड़ी करने का ही काम किया है । प्रोफेशन में भी यही हुआ है - फर्जी और जुगाड़ू का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'बड़े' बनते गए हैं, जबकि जेनुइन काम करने वाले लोगों की सिर्फ मुश्किलें ही बढ़ी हैं । संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन में 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे जो उदाहरण दे रहे हैं, उसमें क्या सभी के लिए फलने-फूलने के मौके हैं ? यदि होते तो छोटे और मंझले दुकानदारों को बड़े स्टोर्स के कारण और शहरों में टैक्सी चालकों को टैक्सी सर्विस प्रोवाईडरों के कारण कामधंधे में नुकसान क्यों उठाना पड़ता ? 
तो क्या संजय कुमार अग्रवाल के विजन में सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए फलने-फूलने के मौके नहीं हैं, और उनका विजन तकनीकी विकास का सहारा लेकर सिर्फ कुछेक लोगों के लिए ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है ? दरअसल इसीलिए संजय अग्रवाल का विजन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच कोई दिलचस्पी और उत्साह पैदा करता हुआ नजर नहीं आया है । संजय कुमार अग्रवाल के कुछेक शुभचिंतकों का हालाँकि कहना है कि यह संजय कुमार अग्रवाल के विजन की नहीं, बल्कि संजय कुमार अग्रवाल की विफलता है - और वह इसलिए क्योंकि संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन को लोगों के बीच प्रभावी व कन्विंसिंग तरीके से नहीं रख पा रहे हैं । कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि अपने विजन के प्रति अपील पैदा करने के लिए संजय कुमार अग्रवाल को प्रमुखता से जिन बातों को रखना चाहिए, उनका चयन करने में वह विफल रहे हैं - और इस कारण लोगों के बीच उन्हें लेकर कोई उत्सुकता या समर्थन का भाव पैदा नहीं हुआ है और उनकी सारी कवायद बेकार जाती नजर आ रही है ।

Friday, November 20, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में चरनजोत सिंह नंदा के रवैये से राजेश शर्मा अपने आप को ठगा हुआ पा रहे हैं

नई दिल्ली । राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा और उमेश वर्मा जिस तरह से एक-दूसरे को कोस रहे हैं और उनके बीच आरोपों-प्रत्यारोपों की बातें हो रही हैं, उससे चरनजोत सिंह नंदा की राजनीतिक विरासत तथा राजेश शर्मा व उमेश वर्मा की उम्मीदवारी एक साथ खतरे में पड़ी दिख रही है । मजे की बात यह है कि कहने को तो यह तीनों एक साथ हैं, लेकिन इनमें आपस का अविश्वास इतना मुखर हो गया है कि लोगों के बीच सवाल पैदा हो रहा है कि यह एक साथ होने का ढोंग आखिर क्यों कर रहे हैं ? राजेश शर्मा अपने खास समर्थकों व नजदीकियों के बीच यह शिकायत कर रहे हैं कि चरनजोत सिंह नंदा उनका समर्थन करने के नाम पर उनका उल्लू बना रहे हैं और उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं; राजेश शर्मा का गंभीर आरोप यह है कि चरनजोत सिंह नंदा बात तो उनके समर्थन की कर रहे हैं, लेकिन उनके तमाम समर्थक, खासकर पंजाब के उनके समर्थक संजय अग्रवाल और/या संजय वासुदेवा के साथ घूम रहे हैं; चरनजोत सिंह नंदा का रोना है कि राजेश शर्मा उनकी बात तो मानते नहीं हैं, सिर्फ शिकायत करते रहते हैं कि वह उनके लिए कुछ कर नहीं रहे हैं; उमेश वर्मा को अपनी फिक्र है और अपनी इस फिक्र में उनका जिक्र यह है कि राजेश शर्मा सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए उनका समर्थन तो ले रहे हैं, किंतु बदले में रीजनल काउंसिल की उनकी उम्मीदवारी को कोई मदद नहीं कर रहे हैं । 
दरअसल, जैसा कि राजेश शर्मा के नजदीकियों ने बताया कि इन तीनों के बीच अविश्वास व परस्पर आरोपों का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब चरनजोत सिंह नंदा ने राजेश शर्मा से उमेश वर्मा की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी में मदद करने का अनुरोध किया । राजेश शर्मा की खूबी यह है कि कि वह किसी का भी काम करें भले ही न, लेकिन इंकार किसी को नहीं करते हैं । सो उन्होंने उमेश वर्मा की उम्मीदवारी का सहयोग/समर्थन करने के लिए चरनजोत सिंह नंदा से हामी भर दी । अपने स्वभाव के अनुरूप इस संबंध में उन्होंने लेकिन किया कुछ भी नहीं । चरनजोत सिंह नंदा ने भी किंतु कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं - सो उन्होंने राजेश शर्मा द्वारा आयोजित की जाने वाली पार्टियों/मीटिंगों में उमेश वर्मा को भी आमंत्रित करना शुरू कर दिया । इन पार्टियों/मीटिंगों में उमेश वर्मा ने अपने साथियों व अपने कार्यकर्ताओं को बुलाना शुरू कर दिया । इस कारण से हुआ यह कि राजेश शर्मा द्वारा की जाने पार्टियाँ/मीटिंग उमेश वर्मा की पार्टियाँ/मीटिंग लगने लगीं - ऐसा लगने का कारण यह भी रहा क्योंकि चरनजोत सिंह नंदा इन पार्टियों/मीटिंगों में राजेश शर्मा की बजाए उमेश वर्मा की बात ज्यादा करते सुने जाते । यही सब देख कर राजेश शर्मा को लगा और उन्होंने कहना भी शुरू किया कि चरनजोत सिंह नंदा उनके पैसे पर उमेश वर्मा का प्रचार कर रहे हैं । राजेश शर्मा को सबसे बड़ा झटका तो पंजाब में लगा । उन्हें उम्मीद थी कि पंजाब में चरनजोत सिंह नंदा के समर्थक उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करेंगे; लेकिन वह यह देख कर हैरान/परेशान हो गए कि पंजाब में चरनजोत सिंह नंदा के समर्थक या तो संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा लेकर घूम रहे हैं, और या संजय वासुदेवा के साथ हैं । यह देख/जान कर राजेश शर्मा को पक्का यकीन हो गया है कि चरनजोत सिंह नंदा समर्थन के नाम पर उन्हें धोखा ही दे रहे हैं । 
राजेश शर्मा की यह शिकायतें चरनजोत सिंह नंदा तक पहुँची तो उन्होंने राजेश शर्मा की इन शिकायतों के लिए राजेश शर्मा को ही जिम्मेदार ठहरा दिया । उनका कहना है कि उन्होंने राजेश शर्मा से जो जो जैसे जैसे करने को कहा, राजेश शर्मा ने कुछ किया ही नहीं; वह अपनी ही मनमानी से काम कर रहे हैं - ऐसा लग रहा है जैसे कि उन्हें मेरी मदद की जरूरत ही नहीं है; ऐसे में वह यह शिकायत कैसे कर सकते हैं कि उन्हें मेरी मदद मिल नहीं रही है ? चरनजोत सिंह नंदा का कहना है कि राजेश शर्मा यदि मेरे समर्थकों का सहयोग/समर्थन चाहते हैं, तो पहले तो उन्हें यह जानना/समझना होगा कि मेरे किन समर्थकों को साथ लाने के लिए क्या करना होगा और कैसे करना होगा, फिर उसे 'करना' होगा । चरनजोत सिंह नंदा का आरोप है कि राजेश शर्मा यह सब तो करना नहीं चाहते; वह बस यह चाहते हैं कि मुझसे जुड़े रहे लोग उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में जुट जाएँ - वह यह नहीं समझ रहे हैं कि ऐसा होता नहीं है । चरनजोत सिंह नंदा का कहना है कि संजय अग्रवाल और संजय वासुदेवा ने ज्यादा होशियारी से काम किया और पहले से सक्रियता बना कर तमाम लोगों को अपने साथ जोड़ लिया । संजय वासुदेवा को अपने पिता के नाम का फायदा मिला है, और संजय अग्रवाल ने अपनी निरंतर सक्रियता तथा नेटवर्किंग से लोगों को अपने साथ जोड़ा है । चरनजोत सिंह नंदा को इस बात पर बड़ी आपत्ति है कि राजेश शर्मा अपनी कमजोरियों व कमियों के लिए उन्हें नाहक ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । 
चरनजोत सिंह नंदा के सुर में सुर मिलाकर उमेश वर्मा को भी राजेश शर्मा पर हमला बोलते हुए सुना गया है । उमेश वर्मा का आरोप है कि राजेश शर्मा अपनी उम्मीदवारी के लिए तो उनसे मदद की उम्मीद कर रहे हैं और ले रहे हैं - लेकिन बदले में वह उनकी कोई मदद नहीं कर रहे हैं । उमेश वर्मा के अनुसार, इस मामले में राजेश शर्मा का तर्क है कि वह यदि उनकी मदद करते हुए 'दिखेंगे', तो रीजनल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवार बिदकेंगे तथा उनके खिलाफ सक्रिय होंगे । राजेश शर्मा ने उमेश वर्मा को पाठ पढ़ाया है कि इसलिए वह उनकी खुलकर नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे से ही मदद करेंगे । राजेश शर्मा का यह तर्क उमेश वर्मा को भा नहीं रहा है; और वह इस तर्क को राजेश शर्मा की बहानेबाजी के रूप में ही देख रहे हैं और राजेश शर्मा के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं ।
इस सारे नजारे को देख कर राजेश शर्मा के नजदीकियों व समर्थकों को लग रहा है कि चरनजोत सिंह नंदा ने राजेश शर्मा को ऐसा फँसा दिया है कि राजेश शर्मा के लिए न आगे बढ़ पाना संभव रह गया है, और न पीछे हटना ही उनके लिए आसान है । मजे की बात यह है कि औरों को दिखाई तो यह दे रहा है कि चरनजोत सिंह नंदा पूरी तरह से राजेश शर्मा की उम्मीदवारी के साथ हैं; लेकिन राजेश शर्मा और उनके समर्थक जान/समझ रहे हैं तथा आपस की बातचीत में रोना भी रो रहे हैं कि चरनजोत सिंह नंदा उनकी उम्मीदवारी के लिए वास्तव में कुछ कर नहीं रहे हैं और इसलिए ही उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में वैसा माहौल नहीं बन पा रहा है, जैसे माहौल की उम्मीद की गई थी । राजेश शर्मा यह देख कर तो अपने आप को और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं कि चरनजोत सिंह नंदा उनके समर्थन के नाम पर उनसे अनाप-शनाप पैसे खर्च करवा रहे हैं और उनके पैसे पर उमेश वर्मा को चुनाव लड़वा रहे हैं । 

Tuesday, October 20, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में संजय अग्रवाल से आगे रहने की अतुल गुप्ता की कोशिशों में पंकज त्यागी ने फच्चर फँसाया

नई दिल्ली । पंकज त्यागी ने सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए फरीदाबाद में समर्थन जुटाने की प्रक्रिया में अतुल गुप्ता के कई समर्थकों को अपनी तरफ मिला कर अतुल गुप्ता को जो झटका दिया है - उसके चलते अतुल गुप्ता को सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने का अपना लक्ष्य खतरे में पड़ता दिख रहा है । पंकज त्यागी से फरीदाबाद में मिली चोट का दर्द अतुल गुप्ता ज्यादा महसूस नहीं भी करते, यदि दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब तथा हिंदी भवन में पिछले दिनों 'वॉयस ऑफ सीए' द्वारा आयोजित सेमिनारों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की उम्मीद से कहीं ज्यादा भीड़ न जुटी होती । 'वॉयस ऑफ सीए' चूँकि संजय अग्रवाल का उपक्रम है, इस नाते 'वॉयस ऑफ सीए' की उपलब्धियों को संजय अग्रवाल की उपलब्धियों के रूप में देखा/पहचाना जाना स्वाभाविक ही है । संजय अग्रवाल की उपलब्धियों में अतुल गुप्ता को खतरे की घंटियाँ इसलिए भी सुनाई देती हैं, क्योंकि नॉर्दर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में अतुल गुप्ता को संजय अग्रवाल से ही चुनौती मिलती दिख रही है । नॉर्दर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में पहले नवीन गुप्ता को भी देखा/पहचाना जा रहा था, किंतु उनके पापा एनडी गुप्ता की तमाम कोशिशों के बाद भी उनका समर्थन-आधार जिस तरह घटता गया है और वेद जैन जैसे लोग भी एनडी गुप्ता के झाँसे में आने से बच निकले हैं; उसे देखते/जानते हुए नवीन गुप्ता को उक्त दौड़ से बाहर हुआ मान लिया गया है । नॉर्दर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में अब सिर्फ अतुल गुप्ता और संजय अग्रवाल को ही देखा/पहचाना जा रहा है । 
इस होड़ में अभी तक अतुल गुप्ता का पलड़ा भारी पड़ता नजर आ रहा था - इसका कारण यह रहा कि सबसे ज्यादा वोट जुटाने की होड़ में अतुल गुप्ता हर दाँव आजमाने की तैयारी करते देखे/सुने जा रहे थे, जबकि संजय अग्रवाल खेमे की तरफ से कोई हलचल नहीं दिखाई/सुनाई दे रही थी । अतुल गुप्ता ने पिछले चुनाव में अपने चुनाव अभियान को चलाने के लिए अपनी टीम बनाई थी और टीम के सदस्यों के रूप में युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को नौकरी पर रखा था; इस बार उन्होंने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव लेकिन यह किया कि इस बार अपनी टीम बनाने की बजाये उन्होंने टीमों को आउट-सोर्स किया । इसका सबसे आसान फार्मूला उन्होंने यह निकाला कि रीजनल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवारों को उन्होंने 'गोद' ले लिया । असीम पाहवा, पंकज पेरिवाल, अविनाश गुप्ता, आलोक जैन, आरएस यादव आदि को अतुल गुप्ता के गोद लिए उम्मीदवारों के रूप में पहचाना गया । अतुल गुप्ता ने इन्हें गोद लेने के अलावा राजिंदर नारंग, योगिता आनंद, स्वेदश गुप्ता, नितिन कँवर आदि से भी तार जोड़े । अतुल गुप्ता का यह फार्मूला किंतु जल्दी ही पिट गया; क्योंकि रीजनल काउंसिल के इन उम्मीदवारों ने जल्दी ही इस बात को समझ लिया कि अतुल गुप्ता ने इन्हें इनके भले के लिए नहीं, बल्कि अपने फायदे के लिए गोद लिया है - और इनकी चिंता करने की बजाए सिर्फ अपनी फिक्र कर रहे हैं; और इन्हें सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं । यह समझते ही कुछेक लोग तो अतुल गुप्ता की गोद से उतर कर तथा तार तोड़ कर निकल भागे; और जो अभी भी अतुल गुप्ता को उनकी गोद में बने रहने और उनके साथ तार जोड़े रखने का भ्रम दे रहे हैं उन्होंने भी सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों से तार जोड़ लिए हैं । 
इस संदर्भ में आलोक जैन का मामला खासा दिलचस्प है । अतुल गुप्ता ने गुड़गाँव में अपने समर्थन-आधार को बढ़ाने के लिए आलोक जैन को गोद लिया; आलोक जैन भी यह सोच कर उनकी गोद में चढ़ बैठे कि इससे गुड़गाँव में उनका समर्थन-आधार भी बढ़ेगा - किंतु जल्दी ही उन्हें अतुल गुप्ता के गेम-प्लान की असलियत पता चली, तो उन्होंने अतुल गुप्ता का ही फार्मूला अतुल गुप्ता पर ही चला दिया । आलोक जैन ने गुड़गाँव में संजीव चौधरी के लोगों के साथ भी अपने तार जोड़ लिए हैं । लुधियाना में पंकज पेरिवाल ने भी यही फार्मूला अपना लिया है । अतुल गुप्ता के गेम-प्लान को इससे झटका तो लगा, लेकिन उन्होंने इस झटके की परवाह इसलिए नहीं की - क्योंकि सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में उन्हें जिन संजय अग्रवाल से चुनौती मिलने की उम्मीद की जा रही थी, वह संजय अग्रवाल ज्यादा कुछ करते हुए 'नजर' नहीं आ रहे थे । 
लेकिन संजय अग्रवाल के उपक्रम 'वॉयस ऑफ सीए' द्वारा ऐवान-ए-गालिब व हिंदी भवन में आयोजित किए गए सेमीनारों में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की जो भीड़ जुटी, उसने अतुल गुप्ता के लिए सारा नजारा ही बदल दिया । दरअसल इन दो सेमीनारों की सफलता से एक बड़ा भ्रम यह दूर हुआ कि संजय अग्रवाल ज्यादा कुछ कर नहीं रहे हैं । इन दो सेमीनारों की जोरदार सफलता से साबित हुआ कि संजय अग्रवाल बिना शोर मचाए चुपचाप तरीके से काम करते रहे हैं और मौका आने पर उन्हें उसका भरपूर फायदा मिला । उल्लेखनीय है कि हाल-फिलहाल के दिनों में जिन उम्मीदवारों ने तरह तरह की बहानेबाजियों से पार्टियाँ और/या सेमीनार आदि आयोजित किए, उन्हें लोगों को इकट्ठा करने में मुश्किलों का भारी सामना करना पड़ा । दूसरे आयोजनों में जहाँ उतने लोग भी नहीं पहुँचे, जितने लोगों के लिए इंतजाम किया गया था; वहाँ संजय अग्रवाल के आयोजन में उम्मीद से ज्यादा लोग इकट्ठा - और एक बार नहीं, बार-बार इकट्ठा हुए; उससे लोगों के बीच यही संदेश गया है कि संजय अग्रवाल ने अपने समर्थन-आधार का अच्छे से विस्तार किया है, और उसे पक्के तौर पर अपने साथ जोड़ा हुआ है । संजय अग्रवाल की इस तैयारी ने अतुल गुप्ता को चौकन्ना किया है । जो अतुल गुप्ता अभी कुछ समय पहले तक अच्छे-भले झटकों को भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, उन्हीं अतुल गुप्ता ने अब लेकिन छोटे-मोटे झटकों पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है ।
इसी पृष्ठभूमि में फरीदाबाद में पंकज त्यागी की तरफ से अतुल गुप्ता को जो झटका मिला है, उस पर अतुल गुप्ता ने तुरंत से ध्यान दिया है । मजे की बात यह है कि फरीदाबाद यूँ तो विजय गुप्ता का इलाका है, किंतु इस बार के चुनाव में यह कई एक अन्य उम्मीदवारों के लिए चुनावी-तीर्थ बना हुआ है । दरअसल विजय गुप्ता की हालत इस बार खासी पतली समझी जा रही है । फरीदाबाद में तो उनका बड़ा भारी विरोध है - इतना भारी विरोध कि विजय गुप्ता के लिए फरीदाबाद में अपनी उम्मीदवारी के लिए अभियान तक चलाना मुश्किल हो रहा है । ऐसे में, स्वाभाविक रूप से दूसरे उम्मीदवारों की बन आई है और उन्होंने फरीदाबाद में अपने अपने समर्थन के लिए हाथ-पैर मारे/चलाए - जिसका उन्हें भरपूर फायदा भी मिला । ज्यादा फायदा उठाने वालों में अतुल गुप्ता, संजय अग्रवाल व नवीन गुप्ता का ही नाम रहा । इनमें भी अतुल गुप्ता का नाम सबसे ऊपर रहा । फरीदाबाद में विजय गुप्ता को वोटों का जो नुकसान होता हुआ दिखा, उसका सबसे बड़ा हिस्सा अतुल गुप्ता के पास/साथ जाता हुआ नजर आया । किंतु अचानक से शुरू हुई पंकज त्यागी की सक्रियता ने अतुल गुप्ता की नींद हराम कर दी है । दरअसल फरीदाबाद में जो कई लोग अतुल गुप्ता के समर्थन में देखे जा रहे थे, उन्हें बाद में लेकिन जब पंकज त्यागी की उम्मीदवारी का झंडा उठाए देखा गया तो अतुल गुप्ता का चिंतित होना स्वाभाविक ही था । अतुल गुप्ता ने अपने 'भूतपूर्व समर्थकों' को समझाने की बहुत कोशिश की कि पंकज त्यागी चुनावी परिदृश्य में कहीं नहीं हैं, इसलिए उनके साथ क्यों अपना समय और एनर्जी खराब कर रहे हो, किंतु उनके भूतपूर्व समर्थकों पर उनकी समझाइस का कोई असर पड़ता हुआ नहीं दिखा है । 
ऐसा नहीं है कि पंकज त्यागी ने फरीदाबाद में अतुल गुप्ता के समर्थकों को तोड़ कर उन्हें कोई बहुत बड़ा झटका दिया है, लेकिन अतुल गुप्ता फिर भी उनसे मिले झटके से चिंतित हैं तो इसलिए क्योंकि अब उन्हें यह जरूर समझ में आ रहा है कि इस तरह के छोटे छोटे झटके उन्हें सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में संजय अग्रवाल से पीछे कर देंगे । इसी बात को ध्यान में रखते हुए अतुल गुप्ता ने कहीं कहीं पंकज त्यागी को संजय अग्रवाल के डमी उम्मीदवार के रूप में भी प्रचारित किया । असल में, वह संजय-ग्रंथि से इस कदर ग्रस्त हो गए हैं कि अपनी खिलाफत करता हर व्यक्ति उन्हें संजय अग्रवाल का 'आदमी' लगता है । नॉर्दर्न रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की होड़ में अतुल गुप्ता को संजय अग्रवाल से मिलती दिख रही चुनौती ने रीजन के चुनावी परिदृश्य को खासा रोमांचक बना दिया है ।

Saturday, July 19, 2014

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के संदर्भ में विजय कुमार गुप्ता से धोखा मिलने की संभावना के बीच मधु सुदन गोयल को अमरजीत चोपड़ा से समर्थन की हरी झंडी मिलने का इंतजार है

नई दिल्ली । अमरजीत चोपड़ा के ढुलमुल रवैये के कारण मधु सुदन गोयल इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि करीब सोलह महीने बाद होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनावों को लेकर संभावित उम्मीदवारों की सक्रियता में जो हलचल मचना शुरू हुई है, उसमें मधु सुदन गोयल के दोस्तों ने उनकी उम्मीदवारी की संभावना के बारे में पूछा तो उन्हें सुनने को मिला कि अमरजीत चोपड़ा अभी चूँकि पक्के तौर पर हरी झंडी नहीं दे रहे हैं, इसलिए मधु सुदन गोयल भी अपनी उम्मीदवारी को लेकर पक्के तौर पर हाँ नहीं कह रहे हैं । अमरजीत चोपड़ा चूँकि मधु सुदन गोयल की उम्मीदवारी का समर्थन करने से इंकार भी नहीं कर रहे हैं, इसलिए मधु सुदन गोयल अभी अपनी उम्मीदवारी की संभावना को ख़ारिज भी नहीं कर रहे हैं । इससे एक बात तो साफ दिख रही है कि मधु सुदन गोयल का तो मन है कि वह इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ें, लेकिन उनकी उम्मीदवारी अमरजीत चोपड़ा की हाँ/न पर निर्भर करेगी ।
अमरजीत चोपड़ा को अच्छे से जानने वालों का कहना लेकिन यह है कि अमरजीत चोपड़ा कभी भी स्पष्ट फैसला नहीं लेंगे - और इसलिए मधु सुदन गोयल की उम्मीदवारी को लटका हुआ ही समझिए, वह जमीन पर सचमुच कभी उतरेगी - इसकी उम्मीद न करें । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की राजनीति के संदर्भ में मधु सुदन गोयल एक अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनके उम्मीदवार होने की चर्चा बार-बार हर बार होती है, लेकिन जो बेचारे उम्मीदवार कभी नहीं हो पाए । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में मधु सुदन गोयल वर्ष 2003 में चेयरमैन बने थे - उसके बाद से ही उनके सेंट्रल काउंसिल के लिए आने की चर्चा शुरू हो गई थी । उनसे तुरंत पहले नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने चरनजोत सिंह नंदा को सेंट्रल काउंसिल में बारह वर्ष हो जायेंगे और उनके तुरंत बाद नॉदर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने संजय कुमार अग्रवाल को सेंट्रल काउंसिल में छह वर्ष हो जायेंगे - लेकिन मधु सुदन गोयल के लिए अभी तक उम्मीदवार बनना भी संभव नहीं हो सका है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में उनके चार वर्ष बाद चेयरमैन बने पंकज त्यागी भी सेंट्रल काउंसिल में तीन वर्ष रह चुके हैं । और बाद में चेयरमैन बने अतुल कुमार गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल में तीन वर्ष हो जायेंगे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन रहे सुधीर कुमार अग्रवाल, भगवान दास गुप्ता, दुर्गादास अग्रवाल भी उम्मीदवार बने, हालाँकि वह सफल नहीं हो सके । रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने बिना भी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वालों में एसएस शर्मा, एसपी बबूटा और बलदेव गर्ग रहे - हालाँकि वह भी सफल नहीं हो सके । चेयरमैन बने बिना सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का काम विजय कुमार गुप्ता ने भी किया जो पहले जीते, फिर हारे, फिर जीते । हाल-फ़िलहाल के वर्षों में और भी कई लोग रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने और या बिना चेयरमैन बने ही घर बैठ गए - लेकिन सेंट्रल काउंसिल के लिए उनके नाम की चर्चा नहीं हुई ।
इन सब लोगों के नाम लेने के पीछे उद्देश्य इस तथ्य को रेखांकित करने का है कि हाल-फ़िलहाल के वर्षों में दो तरह की कैटेगरी बनी हैं - एक में उन लोगों के नाम हैं जो सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने, फिर वह चाहें जीते या हारे; और दूसरी तरह की कैटेगरी में वह लोग हैं जो सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हो सकते थे लेकिन जो न तो हुए और न जिनके नाम की चर्चा ही चली । मधु सुदन गोयल इन दोनों में से किसी भी कैटेगरी में नहीं आते हैं - वह अपनी एक अलग कैटेगरी बनाते हैं जिसके सदस्य सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार तो वास्तव में कभी नहीं बनते, लेकिन जिनके उम्मीदवार बनने की चर्चा हमेशा रहती है । कहने/बताने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इस तीसरी कैटेगरी में मधु सुदन गोयल अकेले सदस्य हैं ।
मधु सुदन गोयल अपने आप को अमरजीत चोपड़ा के 'बड़े खास' के रूप में प्रोजेक्ट करते रहे हैं । इस कारण पहले तो अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से वह यह कह कर बचते रहे कि उनके उम्मीदवार बनने से कहीं अमरजीत चोपड़ा को जीतने में मुश्किल न हो जाए । कुछेक वर्ष तो मधु सुदन गोयल ने यह कह कर निकाल दिए कि जब अमरजीत चोपड़ा उम्मीदवार नहीं होंगे तब वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । पिछली बार लेकिन जब अमरजीत चोपड़ा की उम्मीदवारी नहीं आनी थी, तब भी मधु सुदन गोयल की उम्मीदवारी को लेकर हाँ/न की स्थिति बनी रही थी और फिर अंततः उनकी उम्मीदवारी नहीं ही आई । पिछली बार मधु सुदन गोयल ने लोगों को बताया था कि अमरजीत चोपड़ा ने 'इस बार' विजय कुमार गुप्ता को मौका देने की बात कही है और इसलिए 'इस बार' तो वह विजय कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे और अगली बार अपनी उम्मीदवारी अवश्य ही प्रस्तुत करेंगे ।
मधु सुदन गोयल ने पिछली बार तो यहाँ तक दावा किया था कि उनके और विजय कुमार गुप्ता के बीच यह समझौता हुआ है कि 'इस बार' विजय कुमार गुप्ता उम्मीदवार होंगे और अगली बार वह मधु सुदन गोयल की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । विजय कुमार गुप्ता लेकिन इस तरह का कोई समझौता होने की बात से इंकार करते हैं । विजय कुमार गुप्ता का साफ कहना है कि अगली बार अपनी उम्मीदवारी से उनके पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता है । मधु सुदन गोयल हालाँकि विजय कुमार गुप्ता के इस रवैये का तो जबाव देते हैं और कहते हैं कि बात विजय कुमार गुप्ता की नहीं है बल्कि अमरजीत चोपड़ा की है : अमरजीत चोपड़ा यदि मधु सुदन गोयल का समर्थन करेंगे तो वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । अमरजीत चोपड़ा को 'जानने' का दावा करने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि अमरजीत चोपड़ा कई उम्मीदवारों को समर्थन का झाँसा दिए रहने का काम करते हैं इसलिए वह एक अकेले मधु सुदन गोयल के साथ खड़े नहीं दिखेंगे और इस कारण से मधु सुदन गोयल उनसे हरी झंडी मिलने का इंतजार ही करते रह जायेंगे ।
मधु सुदन गोयल को लेकिन विजय कुमार गुप्ता के कई एक नजदीकियों से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर जरूर सलाह और उकसावा मिल रहा है । पिछली बार विजय कुमार गुप्ता का साथ देने वाले कई लोग उनसे नाराज दिख रहे हैं और उनका कहना है कि मधु सुदन गोयल यदि उम्मीदवार होते हैं तो वह कई ऐसे लोगों का समर्थन हासिल कर लेंगे जो पिछली बार विजय कुमार गुप्ता के साथ थे । इनका भी तथा कुछेक अन्य लोगों का भी मानना और कहना है कि मधु सुदन गोयल यदि उम्मीदवार बनते हैं और अपनी सक्रियता दिखाते हैं तो अभी ढुलमुल नजर आ रहे अमरजीत चोपड़ा भी उनकी मदद कर सकेंगे । 
मधु सुदन गोयल इस मामले में तो खुशकिस्मत हैं कि उनकी उम्मीदवारी को कई समर्थक मिल रहे हैं - समस्या लेकिन उनकी खुद की है । उन्हें नजदीक से जानने वालों का मानना और कहना है कि मधु सुदन गोयल अपनी उम्मीदवारी की चर्चा तो बनाये रखेंगे, किंतु उम्मीदवार बनने का साहस नहीं करेंगे । इस तरह की बातें विजय कुमार गुप्ता के कानों में शहद-सा घोलती हैं - क्योंकि विजय कुमार गुप्ता भी जानते/समझते हैं कि मधु सुदन गोयल यदि सचमुच उम्मीदवार बने, तो उन्हीं को नुकसान पहुँचायेंगे ।  

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।