Showing posts with label GURGAON BRANCH OF NIRC. Show all posts
Showing posts with label GURGAON BRANCH OF NIRC. Show all posts

Sunday, February 3, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य संजीव सिंघल ने अपनी, इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की गरिमा को ताक पर रख कर गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के चुनाव में अपनी जो भूमिका और संलग्नता 'दिखाई' है, उसने उनकी फजीहत के हालात पैदा किए

गुड़गाँव । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बने संजीव सिंघल ने गुड़गाँव ब्रांच के लिए होने वाले चुनाव में अतुल कंसल और मोहित सिंघल को चुनाव जितवाने की जिम्मेदारी ले कर और 'दिखा' कर गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव को दिलचस्प तो बना दिया है, लेकिन अपनी फजीहत करवा ली है । गुड़गाँव ही नहीं, नॉर्दर्न रीजन और दूसरे रीजन के भी जिन लोगों को संजीव सिंघल की इस हरकत का पता चला है, उनका यही कहना है कि इससे यही पता चला है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चुने जाने वाले संजीव सिंघल कितनी छोटी सोच के व्यक्ति हैं । ऐसे व्यक्ति का सेंट्रल काउंसिल के लिए चुना जाना इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है । प्रोफेशन के लोगों को संजीव सिंघल से उम्मीद होगी कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में वह इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन से जुड़े बड़े मसलों को हल करने/करवाने के प्रयासों में जुटें, लेकिन संजीव सिंघल छोटे छोटे चुनावों और मसलों में उलझे होंगे । कुछेक लोगों का यह भी कहना है कि संजीव सिंघल को गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव में यदि इतनी ही दिलचस्पी है, तो उन्हें गुड़गाँव ब्रांच का चुनाव लड़ना चाहिए था; उन्होंने सेंट्रल काउंसिल का चुनाव क्यों लड़ा ? मजे की बात यह हुई है कि संजीव सिंघल की हो रही फजीहत को देख/जान कर उनके समर्थित उम्मीदवारों - अतुल कंसल और मोहित सिंघल को खतरा/डर यह हो रहा है कि संजीव सिंघल की हो रही फजीहत कहीं उनके चुनाव पर उल्टा असर डाल कर उनकी उम्मीदवारी का कबाड़ा न कर दे ।  
उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के ब्रांच चुनाव में दिलचस्पी लेने की बात हालाँकि कोई अनोखी बात नहीं है । यह बड़ी स्वाभाविक सी स्थिति है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को अपनी राजनीति के लिए ब्रांचेज के लोगों के समर्थन की जरूरत पड़ती है, और ब्रांचेज के उन्हीं लोगों में से कुछेक जब ब्रांच के चुनाव में उम्मीदवार बनते हैं - तो बदले में वह सेंट्रल काउंसिल सदस्य की मदद चाहते हैं, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य उनकी मदद करते हैं । लेकिन यह सब बड़े दबे-छिपे तरीके से होता है । सेंट्रल काउंसिल सदस्य इंस्टीट्यूट की अपनी 'हैसियत' की गरिमा का ध्यान रखते हुए और उसको दागदार बनने से बचाते हुए यह सब करते हैं । संजीव सिंघल ने लेकिन यह सब बड़े ही फूहड़ और सड़क छाप तरीके से किया, इसलिए उनकी भूमिका और संलग्नता विवादग्रस्त हो गई और उन्हें फजीहत का शिकार बनना पड़ रहा है । गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव की ही बात करें तो यहाँ सेंट्रल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता की भी दिलचस्पी देखी/पहचानी जा रही है; और दो-तीन उम्मीदवार उनके समर्थन की छड़ी पकड़ कर चुनाव जीतने की कोशिश करते सुने जा रहे हैं । सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा के पास भी एक उम्मीदवार का झंडा होने की चर्चा है । लेकिन इनके खेल पर्दे के पीछे चल रहे हैं, और इन्हें अपने उम्मीदवारों के लिए कुछ करते हुए देखा/सुना नहीं गया है । लेकिन इनके विपरीत व्यवहार करते हुए संजीव सिंघल ने अपने दोनों उम्मीदवारों के चुनावी प्रबंध के लिए बाकायदा कोर टीम बनाई, उसकी मीटिंग के लिए गुड़गाँव आए, चुनावी दिशा-निर्देश तय किए । उनकी इस कार्रवाई का सोशल मीडिया पर प्रचार किया गया, ताकि सभी लोगों को पता चले कि संजीव सिंघल किन किन उम्मीदवारों को गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में देखना चाहते हैं ।
संजीव सिंघल की इस कार्रवाई से जुड़ी बातें और तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं तो बात फैली और जिसने भी यह सब देखा, उसे संजीव सिंघल की इस हरकत पर हैरानी हुई । हर किसी को यही लगा कि संजीव सिंघल इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बन रहे हैं, और इस रूप में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन में बड़ी जिम्मेदारी से जुड़ रहे हैं - ऐसे में उन्हें गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव में इस हद तक शामिल होने की भला क्या जरूरत है ? और यदि जरूरत है भी, तो अपनी संलग्नता को थोड़ा छिपा कर उन्हें उस जरूरत को पूरा करना चाहिए - ताकि उनकी भी और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की भी गरिमा बची रह सके । संजीव सिंघल को फजीहत का शिकार होता देख उनके कुछेक नजदीकियों ने ठीकरा अतुल कंसल और मोहित सिंघल के सिर फोड़ना शुरू किया है । उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से अपने जोश और अपनी बेवकूफी में इन्होंने मामले को ऐसा राजनीतिक रूप दे दिया, जिसने संजीव सिंघल के लिए फजीहत वाले हालात बना दिए हैं । संजीव सिंघल के नजदीकियों की तरफ से दी जा रही इस तरह की सफाई ने लेकिन मामले को शांत करने की बजाये भड़का और दिया है । लोगों का कहना है कि सारे मामले में दोष यदि सिर्फ अतुल कंसल और मोहित सिंघल का है, तो इन जैसे लोगों की उम्मीदवारी का समर्थन संजीव सिंघल क्यों कर रहे हैं ? इन जैसे लोगों को जब संजीव सिंघल की, इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की पहचान, प्रतिष्ठा, गरिमा की चिंता नहीं है; और पूरी तरह से खिलवाड़ करने में लगे हैं - तो संजीव सिंघल इन्हें गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में क्यों भेजना/देखना चाहते हैं ? अतुल कंसल और मोहित सिंघल की उम्मीदवारी के चक्कर में संजीव सिंघल ने अपनी जो फजीहत करवा ली है, उसने गुड़गाँव ब्रांच के चुनावी परिदृश्य को लेकिन खासा दिलचस्प बना दिया है । 

Monday, October 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को प्रस्तुत करने के बावजूद, लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनके साथियों को बुरी तरह से निराश किया है

नई दिल्ली । गुड़गाँव ब्राँच के पूर्व चेयरमैन संजय कुमार अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हुए अपना 'विजनरी' रूप तो बहुत ही जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया है, लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनके 'विजन' से उनकी उम्मीदवारी के लिए अपील पैदा होती नहीं दिख रही है । संजय कुमार अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि लोग उनकी बातें सुनते/पढ़ते तो हैं, लेकिन 'रिएक्ट' नहीं करते हैं - उत्साहित नहीं होते हैं । नजदीकियों के अनुसार, संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को उम्मीद थी कि वह एक अलग तरीके से, प्रोफेशन के प्रति अपनी सोच और अपने विचारों को लेकर लोगों के बीच जायेंगे - तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एक नई ऊर्जा से भर जायेंगे और देखेंगे/सोचेंगे कि उनके बीच प्रोफेशनली उनकी फिक्र करने वाला उम्मीदवार आया है; और यह देख/सोच कर उन्हें हाथों-हाथ लेंगे । लेकिन लोगों की तरफ से मिले ठंडे रिएक्शन ने संजय कुमार अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को बुरी तरह से निराश किया है । किसी ने मजाक में कहा कि संजय कुमार अग्रवाल ने जिस तरह की बातें की हैं, उनमें प्रोफेशन में 'अच्छे दिन' लाने का वायदा है; लोग लेकिन 'अच्छे दिन' के वायदे से डरे हुए हैं - 'अच्छे दिन' के वायदे में ठगे जाने का उनका अनुभव चूँकि ताजा ताजा है, इसलिए संजय कुमार अग्रवाल की बातों में दिलचस्पी लेने में किसी ने जरूरत नहीं समझी । प्रोफेशन से जुड़े वरिष्ठ लोगों का यह भी कहना है कि तकनीकी विकास के चलते कई क्षेत्रों में कामकाज में जो परिवर्तन आए हैं, उसे और उसके प्रभाव को गहराई से समझे बिना उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर संजय कुमार अग्रवाल जिस तरह चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन में भी उसी फार्मूले को इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं - उससे वह साबित कर रहे हैं कि उन्होंने न उस 'परिवर्तन' को गहराई से समझा है और न चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन को तथा उससे जुड़े लोगों की जरूरतों को ही जाना/समझा है । 
संजय कुमार अग्रवाल 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे कामों का उदाहरण देते हुए आह्वान कर रहे हैं कि चार्टर एकाउंटेंट्स भी 'रिकॉर्डिंग' 'रिपोर्टिंग' के भरोसे कब तक काम करते रहेंगे ? बिना कैश के खरीदारी करने की सुविधा को वह बड़ी उपलब्धि की तरह पेश कर रहे हैं । उनके उदाहरण और तर्क से पहली ही नजर में लग गया है कि उन्हें मामलों की गहरी जानकारी नहीं है, और वह सिर्फ ऊपर ऊपर की बातों को लेकर जुमलेबाजी कर रहे हैं । दरअसल नई आर्थिक नीतियों और तकनीकी विकास ने कामकाज और समाज पर व्यापक असर डाला है, और कई कामकाज के रूपों में भारी बदलाव हुए हैं । इन बदलावों के चलते कामकाज की शक्ल तो बदली है, लेकिन बुनियादी समस्याएँ जहाँ की तहाँ ही बनी रही हैं । जैसे 'बिना दुकान के सामान बेचने' की व्यवस्था में बदलाव सिर्फ यही तो हुआ है कि दुकान वाले स्टॉक रखने वाले बन गए और दुकान में काम करने वाले कूरियर ब्यॉय बन गए । 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' वाला इसीलिए तो सर्विस दे पा रहा है, क्योंकि अपने खून-पसीने की कमाई की बचत से गाड़ी खरीदने वाला और उसकी ड्राईवरी करने वाला मौजूद है । तकनीकी विकास ने चूँकि लोगों के बीच संपर्क और पहुँच को आसान बना दिया है, इसलिए उसका फायदा उठा कर कुछेक लोगों ने नेटवर्किंग का विस्तार करके कामकाज को एक नया रूप दिया है । किंतु यह नया रूप दिया तो उन लोगों के भरोसे ही है, जो पहले से ही काम कर रहे थे - और नया रूप देने का काम करने वाले भी कितने लोग हैं ? और इस नए रूप में जिन लोगों को फायदा भी हुआ है, उनकी संख्या भी कोई बहुत ज्यादा नहीं है - और उनका यह फायदा भी पहले के लोगों के नुकसान की कीमत पर ही हुआ है । इसे उपलब्धि भला कैसे माना जा सकता है ? कैश के बिना खरीदारी करने के दावे का भला क्या मतलब है ? यह ठीक है कि तकनीकी विकास के चलते कैश जेब में रखने की मजबूरी खत्म हो गई है, और कॉर्ड से खरीदारी करने की सुविधा है - लेकिन इस बात को 'बिना कैश के खरीदारी' करना कैसे कहा जा सकता है ? बिना कैश के खरीदारी करने का दूसरा तरीका - उधार लेना है । संजय कुमार अग्रवाल क्या इसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं ?
कामकाज के जो तौर-तरीके बदले हैं, उसका प्रभाव तो चार्टर्ड एकाउंटेंट के काम पर भी पड़ा है । संजय कुमार अग्रवाल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' के झंझट से मुक्ति दिलवाने का जो आह्वान कर रहे हैं, एंट्री का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तो उससे पहले से ही मुक्त हैं । सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए उम्मीदवार बने राजेश शर्मा के बारे में तो लोग कहते ही हैं कि वह 'रिकॉर्डिंग' और रिपोर्टिंग' करते हुए एक चार्टर्ड एकाउंटेंट की तरह काम कहाँ करते हैं ? लेकिन सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स राजेश शर्मा जैसे तो नहीं हो सकते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पंकज पेरिवाल के ऑफिस में पिछले दिनों इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों के आ धमकने के बाद पता चला कि पंकज पेरिवाल ने अपने दो क्लाइंट्स को अपने ऑफिस का पता इस्तेमाल करने का अधिकार दिया हुआ था । यह मुफ्त में तो नहीं ही दिया गया होगा, और इसके लिए कोई अधिकृत 'रिपोर्टिंग' और 'रिकॉर्डिंग' भी नहीं की गई होगी । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को 'रिकॉर्डिंग' और 'रिपोर्टिंग' से मुक्त करने/करवाने की इच्छा रखने वाले संजय कुमार अग्रवाल कहीं पंकज पेरिवाल से भी तो प्रेरणा नहीं ले रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि कुछेक चार्टेड एकाउंटेंट्स जुगाड़ और तिकड़म से काम जुटा लेते हैं, और फिर उस काम को दूसरे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से करवाते हैं । निस्संदेह इससे काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम तो मिलता है, लेकिन इसे क्या आदर्श स्थिति कह सकते हैं ? संजय कुमार अग्रवाल जिस तकनीकी विकास पर 'उछल' रहे हैं, उसने देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई को चौड़ी करने का ही काम किया है । प्रोफेशन में भी यही हुआ है - फर्जी और जुगाड़ू का काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स 'बड़े' बनते गए हैं, जबकि जेनुइन काम करने वाले लोगों की सिर्फ मुश्किलें ही बढ़ी हैं । संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन में 'बिना दुकान के सामान बेचने' और 'बिना कोई गाड़ी रखे टैक्सी की सर्विस देने' जैसे जो उदाहरण दे रहे हैं, उसमें क्या सभी के लिए फलने-फूलने के मौके हैं ? यदि होते तो छोटे और मंझले दुकानदारों को बड़े स्टोर्स के कारण और शहरों में टैक्सी चालकों को टैक्सी सर्विस प्रोवाईडरों के कारण कामधंधे में नुकसान क्यों उठाना पड़ता ? 
तो क्या संजय कुमार अग्रवाल के विजन में सभी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए फलने-फूलने के मौके नहीं हैं, और उनका विजन तकनीकी विकास का सहारा लेकर सिर्फ कुछेक लोगों के लिए ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है ? दरअसल इसीलिए संजय अग्रवाल का विजन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच कोई दिलचस्पी और उत्साह पैदा करता हुआ नजर नहीं आया है । संजय कुमार अग्रवाल के कुछेक शुभचिंतकों का हालाँकि कहना है कि यह संजय कुमार अग्रवाल के विजन की नहीं, बल्कि संजय कुमार अग्रवाल की विफलता है - और वह इसलिए क्योंकि संजय कुमार अग्रवाल अपने विजन को लोगों के बीच प्रभावी व कन्विंसिंग तरीके से नहीं रख पा रहे हैं । कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि अपने विजन के प्रति अपील पैदा करने के लिए संजय कुमार अग्रवाल को प्रमुखता से जिन बातों को रखना चाहिए, उनका चयन करने में वह विफल रहे हैं - और इस कारण लोगों के बीच उन्हें लेकर कोई उत्सुकता या समर्थन का भाव पैदा नहीं हुआ है और उनकी सारी कवायद बेकार जाती नजर आ रही है ।

Sunday, January 8, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग के धांधलीभरे कांडों की बदनामी से वाइस प्रेसीडेंट पद की अपनी उम्मीदवारी को बचाने की अतुल गुप्ता की कोशिश उल्टी और पड़ गई है तथा उनके लिए और ज्यादा मुसीबतभरी साबित होती नजर आ रही है

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे अतुल गुप्ता ने गंभीर आरोपों में फँसे गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग की मदद करने से साफ इंकार करके नवीन गर्ग को तो झटका दिया ही है, अपने लिए भी जैसे मुसीबत मोल ले ली है । वास्तव में, नवीन गर्ग का मामला अतुल गुप्ता के लिए बे-वक्त की मुसीबत बन कर टपका है । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल में अपनी मौजूदा टर्म में अतुल गुप्ता ने अपने आप को विवादों से बचाने और दूर रखने की बहुत कोशिश की हुई थी, और अपनी इस कोशिश में वह अभी तक सफल भी हो रहे थे - लेकिन नवीन गर्ग के मामले ने उनकी कोशिशों पर अंततः पानी फेर दिया है । मुसीबत नवीन गर्ग की आई, नवीन गर्ग ने अपनी मुसीबत के लपेटे में लेकिन अतुल गुप्ता को भी ले लिया है । अतुल गुप्ता के मदद करने से इंकार करने पर नवीन गर्ग और उनके साथी खासे भन्नाये हुए हैं, और वह अतुल गुप्ता पर 'मतलबी' और 'मौकापरस्त' होने के गंभीर आरोप लगा रहे हैं । ऐसे समय, जबकि अतुल गुप्ता इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों का समर्थन जुटाने के अभियान में लगे हुए हैं - इस तरह के आरोप स्वाभाविक रूप से उनकी मुसीबत बढ़ाने वाले ही साबित होंगे । अतुल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, विडंबना की बात यह हुई है कि अतुल गुप्ता ने नवीन गर्ग की मदद करने से साफ इंकार किया इसीलिए था ताकि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए समर्थन जुटाने के उनके अभियान पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े, किंतु उनके इंकार के बाद बनी परिस्थितियाँ उनके लिए और ज्यादा मुसीबत बढ़ाने वाली साबित हो रही हैं ।
नवीन गर्ग और उनके साथियों का कहना है कि दूसरे लोग उनसे जब कहते/बताते थे कि अतुल गुप्ता के साथ इतना मत जुड़ो, वह बेहद मतलबी व्यक्ति है; अपना काम तो निकाल लेगा लेकिन जब तुम्हें मदद की जरूरत पड़ेगी तो साफ़ इंकार करने से भी नहीं हिचकेगा - तब उन्होंने किसी की बात पर विश्वास नहीं किया था; अतुल गुप्ता ने लेकिन उन्हें अब अपना जो रूप दिखाया उससे साबित हुआ कि दूसरे लोगों की बात पर विश्वास न करके उन्होंने बड़ी गलती की थी । उल्लेखनीय है कि नवीन गर्ग की अतुल गुप्ता के साथ खासी नजदीकियत रही है, और नवीन गर्ग ने उनके चुनावों में खूब बढ़-चढ़ कर काम किया है । अतुल गुप्ता भी उन पर बहुत विश्वास करते रहे हैं, और गाहे-बगाहे नवीन गर्ग को आगे करने/रखने के मौके बनाते रहे हैं । अतुल गुप्ता के व्यवहार के कारण ही नवीन गर्ग ने अतुल गुप्ता के विरोधियों की बातों पर पहले कभी विश्वास नहीं किया । लेकिन अब उन्हें लगता है कि उन्होंने जैसे अतुल गुप्ता का असली रूप देख लिया है । नवीन गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि वह यह उम्मीद कर भी नहीं रहे थे कि अतुल गुप्ता उनके मामले में उनकी कोई खुली तरफदारी करेंगे; वह तो सिर्फ इतनी उम्मीद कर रहे थे कि अतुल गुप्ता उनके मामले को सहानुभूतिपूर्वक समझ कर अपने अनुभव के आधार पर उससे 'निकलने' के लिए जरूरी उपाय उन्हें सुझायेंगे । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अतुल गुप्ता पर तो इंस्टीट्यूट के पैसे से अपनी वैवाहिक वर्षगाँठ का जश्न मनाने तक का आरोप रहा है, पर उस आरोप में 'सजा' पाने से बच निकलने में वह कामयाब रहे थे । नवीन गर्ग के मामले में, पिछले अच्छे संबंधों को धता बताते हुए अतुल गुप्ता ने लेकिन उनसे बात तक करने से इंकार कर दिया और उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया । नवीन गर्ग के साथियों का कहना है कि अतुल गुप्ता का रवैया ऐसा रहा जैसे कि वह नवीन गर्ग को जानते ही नहीं हैं ।
नवीन गर्ग पर इंस्टीट्यूट की गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन के रूप में पैसों की धांधली करने से लेकर अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने के लिए इंस्टीट्यूट के पैसे का इस्तेमाल करने के साथ-साथ इंस्टीट्यूट के नियम-कायदों से खिलवाड़ करने तक के गंभीर आरोप हैं । ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी के ही सदस्य ललित अग्रवाल की लिखित शिकायत के अनुसार हाल ही में गुड़गाँव में आयोजित हुई सीए स्टूडेंट्स कन्वेंशन के कुछेक खर्चे नवीन गर्ग ने मनमाने तरीके से किए और इसके लिए इंस्टीट्यूट के मान्य प्रावधानों का जानबूझ कर उल्लंघन किया । इसके तहत उन्होंने अपने रिश्तेदारों की फर्म को लाखों रुपए का आर्डर दिया, और उक्त फर्म को लाभ पहुँचवाया । आरोप है कि इस तरह से नवीन गर्ग ने कन्वेंशन की आड़ में इंस्टीट्यूट को चूना लगाया और इंस्टीट्यूट की मोटी रकम अपनी और अपने रिश्तेदारों की जेब में की । नवीन गर्ग ने पहले तो इन आरोपों की अनदेखी की, लेकिन ब्रांच के एक्सऑफिसो व सेंट्रल काउंसिल के सदस्य संजीव चौधरी ने जब मामले में हस्तक्षेप किया - तब आरोपों ने गंभीर रूप ले लिया । आरोपों की जाँच के लिए ब्रांच के ही पाँच सदस्यों की जो कमेटी बनी है, नवीन गर्ग की तरफ से उसकी रिपोर्ट को अपने अनुकूल बनवाने के लिए प्रयास तो खूब किए जा रहे हैं - लेकिन मामला अब जितना आगे बढ़ गया है, उसे देख कर लगता नहीं है कि मामले में लीपापोती करना आसान होगा ।
नवीन गर्ग पर सिर्फ पैसों की धांधली करने का ही आरोप नहीं है - इसके साथ-साथ उन्होंने दो और कांड कर दिए हैं । उक्त सीए स्टूडेंट्स कन्वेंशन में मुख्य अतिथि के रूप में हरियाणा के मुख्यमंत्री को बुलाया गया था । नवीन गर्ग ने उनकी तस्वीर के साथ अपनी तस्वीर लगे तमाम होर्डिंग्स शहर के चौराहों व सड़कों पर लगवाएं - जिसका खर्चा तो जाहिर तौर पर इंस्टीट्यूट के एकाउंट से दिया ही गया; ऐसा करके नवीन गर्ग ने इंस्टीट्यूट के नियम का उल्लंघन भी किया । इंस्टीट्यूट के नियम-कानून किसी भी चार्टर्ड एकाउंटेंट को किसी भी बहाने से अपना प्रचार करने का अधिकार नहीं देता है । इससे भी और बड़ा कांड करने का नवीन गर्ग पर आरोप है कि अन्य अतिथियों को दिए गए मोमेंटोज पर तो गुड़गाँव ब्रांच का नाम था, लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री को दिए गए मोमेंटो पर नवीन गर्ग ने ब्रांच की बजाए अपना नाम लिखवाया । नवीन गर्ग की इन हरकतों ने पैसों की धांधली वाले लिखित आरोप को और गंभीर बना दिया है ।
पैसों की धांधली के आरोपों के रिकॉर्ड पर आ जाने तथा उन्हें लेकर जाँच कमेटी बैठ जाने से नवीन गर्ग को चिंता हुई है । उन्हें लग रहा है कि मामला अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए वह इसे अभी तो मैनेज कर सकते हैं - लेकिन यदि यह आगे बढ़ा तो उनके सामने गंभीर संकट खड़ा जायेगा । ब्रांच में उनके समर्थकों - खासकर उनके समर्थन से अगले वर्षों में ब्रांच के चेयरमैन बनने की तैयारी करने वाले सदस्यों को भी चिंता हुई है कि नवीन गर्ग की कारस्तानियाँ कहीं उनके लिए भी समस्या खड़ी न कर दें । इसलिए नवीन गर्ग और उनके संगी-साथी अपने ऐसे संपर्कों की तरफ देख रहे हैं, जो इस मुसीबत से बच निकलने में उनकी मदद करे । सेंट्रल काउंसिल के सदस्य अतुल गुप्ता को उन्होंने अपने ऐसे ही संपर्क के रूप में देखा/पहचाना और उनका दरवाजा जा खटखटाया । अतुल गुप्ता ने लेकिन उन्हें दरवाजे से ही वापस लौटा दिया । अतुल गुप्ता के इस रवैये से नवीन गर्ग और उनके साथियों को तगड़ा झटका लगा है; और पिछले संबंधों को याद करते हुए यह झटका उन्हें अतुल गुप्ता की 'मतलबी' और 'मौकापरस्ती' फितरत का सुबूत लगा है । उन्हें क्या लगा, अतुल गुप्ता को इसकी फ़िक्र तो नहीं है - लेकिन अपने पुराने साथियों से ही अपने लिए 'मतलबी' और 'मौकापरस्त' जैसी उपाधियाँ पाना अतुल गुप्ता के लिए बड़ी समस्या बन गया है । अतुल गुप्ता और उनके साथियों को लगता है कि अपने पुराने साथियों/सहयोगियों से मिलने वाली इस तरह की उपाधियाँ वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए समर्थन जुटाने के उनके अभियान को कमजोर करने का काम करेंगी । इस तरह, नवीन गर्ग की मुसीबत से वाइस प्रेसीडेंट पद की अपनी उम्मीदवारी को बचाने की अतुल गुप्ता की कोशिश उल्टी और पड़ गई है तथा उनके लिए और ज्यादा मुसीबतभरी साबित होती नजर आ रही है ।

Thursday, January 5, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के मौजूदा व भावी प्रेसीडेंट्स के साथ नजदीकी का वास्ता देकर गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग को आरोपों से बचाने के जरिए राजेश शर्मा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की चेयरमैनी राकेश मक्कड़ को दिलवा सकेंगे क्या ?

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग की मुसीबत इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा के लिए जैसे वरदान बन कर आई है - दरअसल नवीन गर्ग की मुसीबत के 'सहारे' राजेश शर्मा को रीजनल काउंसिल में अपने गिरोह को बहुमत में बनाए रखने की उम्मीद बनी है और उन्होंने इसके लिए प्रयास भी शुरू कर दिया है । अपने प्रयास में राजेश शर्मा ने रीजनल काउंसिल के सदस्य आलोक जैन पर डोरे डालते हुए उन्हें अपने खेमे में लाने का उपक्रम शुरू किया है । इस प्रयास के साथ राजेश शर्मा एक बार रीजनल काउंसिल की राजनीति में वापस लौट आए हैं । दीपक गर्ग के चेयरमैन पद से इस्तीफा देने के बाद रीजनल काउंसिल की व्यवस्था में जो नाटक-नौटंकी हुई, उसमें सबसे ज्यादा फजीहत राजेश शर्मा की ही हुई । असल में, सारे नाटक के सूत्रधार के रूप में राजेश शर्मा को ही देखा/पहचाना गया; राजेश शर्मा लेकिन अपने नाटक को संभाले नहीं रख सके और फिर वह नाटक - नौटंकी में बदल गया, तो सारा ठीकरा राजेश शर्मा के सिर पर ही फूटा । चौतरफा फजीहत के शिकार होने के कारण राजेश शर्मा को पर्दे के पीछे जाने के लिए मजबूर होना पड़ा । लेकिन अब जब रीजनल काउंसिल के अगले चेयरमैन का चुनाव करने का दिन नजदीक आता दिख रहा है, तो राजेश शर्मा एक बार फिर अपना नाटक जमाने के लिए मैदान में उतर आए हैं ।
बदली परिस्थितियों में राजेश शर्मा के सामने रीजनल काउंसिल में अपने गिरोह को एकजुट और बहुमत में रखने की गंभीर चुनौती है । गिरोह में अभी आठ सदस्य हैं । गिरोह के तमाम सदस्यों सहित राजेश शर्मा को भी लगता है कि कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में पूजा बंसल को जिस तरह से काम नहीं करने दिया गया है, और उन्हें लगातार उपेक्षा व अपमान का शिकार बनाया गया है - उसकी प्रतिक्रिया में पूजा बंसल तो गिरोह से अलग हो ही जायेंगी । तेरह सदस्यों वाली रीजनल काउंसिल में सात सदस्यों के साथ राजेश शर्मा का गिरोह हालाँकि तब भी बहुमत में रहेगा । समस्या लेकिन उसके बाद की है : सात सदस्यों में राकेश मक्कड़ और विवेक खुराना चेयरमैन पद के प्रत्याशी हैं; राकेश मक्कड़ लेकिन किसी भी कीमत पर खुद चेयरमैन बनना चाहते हैं । वह चुनाव के किसी भी फार्मूले पर तैयार नहीं हैं; वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते हैं जिससे कि चेयरमैन पद पर उनकी दावेदारी ख़त्म हो जाए और विवेक खुराना चेयरमैन बन जाएँ । गिरोह के सदस्यों सहित राजेश शर्मा को भी लग रहा है कि राकेश मक्कड़ की यह मनमानी विवेक खुराना स्वीकार नहीं करेंगे, और बहुत संभावना है कि विवेक खुराना गिरोह से अलग हो जाएँ । तब गिरोह में छह सदस्य रह जायेंगे, और गिरोह अल्पमत में आ जायेगा ।
इसी आशंका के चलते राजेश शर्मा को गिरोह के बाहर के सदस्यों में से किसी को गिरोह में शामिल करना जरूरी लग रहा है, और उनके नजदीकियों के अनुसार - उनकी निगाह आलोक जैन तथा राजेश अग्रवाल पर है । इनमें भी आलोक जैन को आसान शिकार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । आलोक जैन को अपनी तरफ करने के लिए राजेश शर्मा को गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग की मुसीबत काम आती दिख रही है । नवीन गर्ग ब्रांच के पैसों की लूट तथा इंस्टीट्यूट के नियमों की अवहेलना करने के गंभीर आरोपों में फँसे हैं । इंस्टीट्यूट में उनकी शिकायत हो चुकी है, और आरोपों के पुख्ता सुबूत हैं । नवीन गर्ग की आलोक जैन के साथ बड़ी गहरी दोस्ती है । रीजनल काउंसिल के चुनाव में नवीन गर्ग ने आलोक जैन की बहुत मदद की थी । राजेश शर्मा की तरफ से राकेश मक्कड़ ने नवीन गर्ग को संदेश दिया गया है कि अपनी दोस्ती के सहारे वह यदि आलोक जैन को उनके गिरोह में शामिल करवा दें, तो वह उनकी शिकायत पर हो सकने वाली कार्रवाई को रुकवा देंगे । राकेश मक्कड़ ने नवीन गर्ग को बताया/समझाया है कि वह जानते ही हैं कि राजेश शर्मा के इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी तथा अगले वर्ष के प्रेसीडेंट निलेश विकमसे से कितने नजदीक के संबंध हैं, और वह इन दोनों से कोई भी काम करवा सकते हैं । राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ को उम्मीद है कि चूँकि आलोक जैन को अगली बार भी चुनाव लड़ना है, और चुनाव में उन्हें नवीन गर्ग की मदद भी चाहिए ही होगी; और नवीन गर्ग को इंस्टीट्यूट की सजा से बचना है - इसलिए नवीन गर्ग की 'मदद' करने के लिए आलोक जैन उनके गिरोह में आने के लिए अंततः राजी हो जायेंगे - और इस तरह वह गिरोह को अल्पमत में आने से बचा सकेंगे, और राकेश मक्कड़ चेयरमैन बन सकेंगे ।
गिरोह को बहुमत में बनाए रखने तथा राकेश मक्कड़ को चेयरमैन बनाने के लिए गंभीर आरोपों का सामना कर रहे गुड़गाँव ब्रांच के चेयरमैन नवीन गर्ग की मदद लेने की राजेश शर्मा जो कोशिश कर रहे हैं, और इस कोशिश में उनके हवाले से जिस तरह से इंस्टीट्यूट के मौजूदा व भावी प्रेसीडेंट्स का नाम लिया जा रहा है - उससे नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अगले चेयरमैन की चुनावी लड़ाई खासी दिलचस्प हो उठी है ।