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Thursday, August 13, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में प्रतिनिधित्व को लेकर बिग फोर फर्म्स में चल रही उठापटक तथा गिरीश आहुजा को लेकर संजय अग्रवाल के साथ चल रही 'छीना-झपटी' के कारण संजीव सिंघल अपनी उम्मीदवारी को लेकर चौतरफा मुश्किलों में घिरे/फँसे

नई दिल्ली । अगले वर्ष होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में संजीव सिंघल को लगता है कि मुसीबतों ने जैसे चारों तरफ से घेर लिया है - एक तरफ तो उन्हें संजय अग्रवाल के साथ गिरीश आहुजा की 'छीना-झपटी' में उलझना पड़ रहा है, और दूसरी तरफ अपनी फर्म तथा बिग फोर समूह में अपनी उम्मीदवारी को लेकर पैदा होते दिख रहे संकट से निपटने की तरकीबों को आजमाना पड़ रहा है । तीन टर्म सेंट्रल काउंसिल में सदस्य रहे संजय अग्रवाल ने अचानक से उम्मीदवारी की घोषणा करके संजीव सिंघल के लिए सीधी चुनौती खड़ी कर दी है । संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी दरअसल वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट गिरीश आहुजा के कारण संजीव सिंघल के लिए सीधी चुनौती बनी है । उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में संजीव सिंघल को गिरीश आहुजा के सक्रिय समर्थन के कारण ही जीत मिली थी; गिरीश आहुजा को संजय अग्रवाल के 'गॉडफादर' के रूप में भी देखा/पहचाना जाता है - और माना/समझा जाता है कि गिरीश आहुजा की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद ही संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है, अन्यथा तो वह अपनी उम्मीदवारी की संभावना से लगातार इंकार ही कर रहे थे । हालाँकि संजीव सिंघल ने तरह तरह से रीजन के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि गिरीश आहुजा पिछले चुनाव की तरह अगले चुनाव में भी सक्रियता के साथ उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे, लेकिन हाल-फिलहाल के दिनों में गिरीश आहुजा का संजय अग्रवाल के साथ जिस तरह का 'गठबंधन' दिख रहा है - उसके चलते संजीव सिंघल के प्रयास फेल होते नजर आ रहे हैं ।
संजय अग्रवाल ने न सिर्फ 'अपने' आयोजनों में गिरीश आहुजा की उपस्थिति को संभव बनाया, बल्कि उनके नाम पर यू ट्यूब चैनल शुरू कर दिया और उनके साथ साप्ताहिक फीचर करने के कार्यक्रम की घोषणा कर दी । इन आयोजनों के जरिये संजय अग्रवाल लोगों को यह बताने तथा 'दिखाने' में सफल रहे हैं कि उनकी 'अनुपस्थिति' में गिरीश आहुजा भले ही किसी और के साथ चले गए हों - लेकिन वापसी करने की उनकी कोशिशों में गिरीश आहुजा उनके साथ ही हैं । संजीव सिंघल को गिरीश आहुजा के 'छिन जाने' के साथ-साथ बिग फोर समूह में तथा अपनी फर्म में भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है । सेंट्रल काउंसिल में बिग फोर का प्रतिनिधित्व कर चुके संजीव चौधरी के बिग फोर फर्म केपीएमजी ज्वाइन करने को संजीव सिंघल के लिए खतरे की घंटी के रूप में 'सुना' जा रहा है । चर्चा है कि बिग फोर फर्म्स संजीव सिंघल की परफॉर्मेंस से खुश नहीं हैं, और उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में दोबारा नहीं भेजना चाहती हैं - और इसी की तैयारी के तहत संजीव चौधरी को केपीएमजी में लिया गया है । 
संजीव सिंघल की फर्म ई एंड वाई भी वेस्टर्न रीजन में दीनल शाह की सेंट्रल काउंसिल में वापसी करवाने की तैयारी में सुनी जा रही है । दीनल शाह तीन टर्म सेंट्रल काउंसिल में रहे हैं, और प्रोफेशन के लोगों के बीच उनकी खासी प्रतिष्ठा है । वेस्टर्न रीजन में चर्चा है कि ई एंड वाई यदि दीनल शाह को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने के लिए राजी कर लेती है, तो नॉर्दर्न रीजन में संजीव सिंघल का पत्ता अपने आप कट जायेगा । वेस्टर्न रीजन में अभी एनसी हेगड़े बिग फोर फर्म्स का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उनका अगला चुनाव लड़ने को लेकर संदेह व्यक्त किया जा रहा है; ऐसे में, ई एंड वाई में दीनल शाह को लेकर बढ़ी सक्रियता चर्चा में आ गई है । वेस्टर्न रीजन में एनसी हेगड़े की उम्मीदवारी को लेकर संदेह, दीनल शाह की उम्मीदवारी की संभावना और नॉर्दर्न रीजन में संजीव चौधरी का बिग फोर फर्म ज्वाइन करना - जैसी बातों ने संजीव सिंघल की उम्मीदवारी पर सवालिया निशान लगा दिया है । इन स्थितियों/बातों के चलते नॉर्दर्न रीजन में लोगों को अब यह भी लगने लगा है कि गिरीश आहुजा ने कहीं भविष्य का संकेत पढ़ कर ही तो संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी को हरी झंडी नहीं दी/दिखाई है । तरह तरह की चर्चाओं में कौन सी बात सच होगी और कौन सिर्फ चर्चा तक ही सिमट कर रह जायेगी, यह तो बाद में स्पष्ट होगा - अभी लेकिन इन चर्चाओं ने संजीव सिंघल के लिए ऐसी मुसीबतें खड़ी कर दी हैं, जिनसे निपटना उनके लिए मुश्किल हो रहा है । 

Tuesday, June 2, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी से इंकार करते रहने के बाद, अचानक से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके संजय अग्रवाल ने संजीव सिंघल के लिए तो मुसीबत खड़ी कर ही दी है, लेकिन खुद उनके सामने भी सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने की चुनौती आसान नहीं है

नई दिल्ली । अगले वर्ष होने वाले इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करके संजय अग्रवाल ने लॉकडाउन के कारण ठंडी पड़ी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है, और सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्य संजीव सिंघल के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है । संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी संजीव सिंघल के लिए सीधा खतरा दरअसल वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट गिरीश आहुजा के कारण बनी है । संजीव सिंघल मौजूदा सेंट्रल काउंसिल में वास्तव में गिरीश आहुजा के सक्रिय समर्थन के कारण ही हैं; और इन्हीं गिरीश आहुजा के सक्रिय समर्थन के कारण संजय अग्रवाल लगातार तीन टर्म सेंट्रल काउंसिल में रहे हैं । अगले चुनाव में गिरीश आहुजा का समर्थन किसे मिलेगा, यह तो गिरीश आहुजा ही तय करेंगे और बतायेंगे/दिखाएंगे - लेकिन लोगों को यह जरूर लग रहा है कि संजय अग्रवाल के भी चुनावी मैदान में होने के कारण गिरीश आहुजा अगले चुनाव में संजीव सिंघल का वैसी सक्रियता से तो समर्थन नहीं ही कर सकेंगे, जैसी सक्रियता से उन्होंने पिछले चुनाव में किया था । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई लोगों को तो यह भी लगता है कि गिरीश आहुजा से हरी झंडी मिलने के बाद ही संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की होगी, और इसलिए संजीव सिंघल को अगली बार गिरीश आहुजा का समर्थन मिलना मुश्किल ही होगा - और इस कारण उनके लिए सेंट्रल काउंसिल में वापसी कर पाना खासा कठिन हो सकता है । 
इस आशंका को दरअसल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच संजीव सिंघल के प्रति बढ़ती नाराजगी और शिकायत के कारण भी बल और चर्चा मिल रही है । उल्लेखनीय है कि संजीव सिंघल के प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की आम शिकायत है कि उम्मीदवार के रूप में तो वह बड़ा भला सा व्यवहार करते थे और खुशामदी टोन में रहते थे, लेकिन चुनाव जीतते ही उनका रूप पूरी तरह बदल गया और उनका रवैया अहंकारी किस्म का हो गया - वह अपनी समस्याएँ लेकर आने वाले तथा उनकी मदद चाहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने और बात करने से बचने लगे; यहाँ तक कि वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के फोन भी नहीं उठाते, और कॉल बैक भी नहीं करते । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को तो छोड़िये, वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रति भी संजीव सिंघल ने यही रवैया दिखाया । वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने संजीव सिंघल के इस रवैये की शिकायत गिरीश आहुजा से भी की और उन्हें उलाहना दिया कि आपने कैसे व्यक्ति का वोट दिलवा दिए और सेंट्रल काउंसिल में पहुँचवा दिया है, जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समस्याओं व मुश्किलों को सुनने और हल करवाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं लेते हैं, और यहाँ तक कि फोन भी नहीं उठाते हैं । भुक्तभोगियों का कहना/बताना रहा है कि संजीव सिंघल के रवैये पर गिरीश आहुजा ने भी नाराजगी दिखाई, और माना कि संजीव सिंघल के इस रवैये के चलते उनकी साख व विश्वसनीयता को भी चोट पहुँची है । गिरीश आहुजा को यह देख/जान कर और झटका लगा कि उनके हस्तक्षेप के बाद संजीव सिंघल ने कुछेक वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को कॉल बैक तो की, लेकिन उनके रवैये में कोई सुधार होता हुआ नहीं हुआ । 
संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी की पृष्ठभूमि में संजीव सिंघल के इसी रवैये और उनके रवैये के प्रति गिरीश आहुजा की नाराजगी को समझा/पहचाना जा रहा है । दरअसल कोई भी यह मानने तैयार नहीं है कि गिरीश आहुजा से हरी झंडी मिले बिना संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी है । लोगों को लग रहा है कि पर्दे के पीछे जरूर ही कोई खिचड़ी पकी है । संजय अग्रवाल के व्यवहार से भी इस बात को बल मिला है । उल्लेखनीय है कि पिछला चुनाव होने के बाद से संजय अग्रवाल लगातार सक्रिय हैं और विभिन्न ब्रांचेज में आयोजित होने वाले सेमिनार्स में शामिल होते रहे हैं । उनकी सक्रियता देख/जान कर अगले चुनाव में उनके उम्मीदवार होने को लेकर सवाल उठने लगे थे - लेकिन संजय अग्रवाल लगातार अपनी उम्मीदवारी से इंकार कर रहे थे । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना/बताना था कि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर संजय अग्रवाल का मन भी है और उनकी तैयारी भी है, लेकिन अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा करने से पहले वह अपने कुछेक 'बड़े समर्थकों' से आश्वासन ले लेना चाहते हैं । इसी आधार पर माना/समझा जा रहा है कि 'बड़े समर्थकों' की तरफ से आश्वस्त हो लेने के बाद ही संजय अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की है । संजय अग्रवाल की उम्मीदवारी ने संजीव सिंघल के लिए भले ही मुसीबत खड़ी कर दी है, लेकिन इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के अनुसार - खुद संजय अग्रवाल के लिए भी सेंट्रल काउंसिल में वापसी करना आसान नहीं होगा । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए पहली जीत संजय अग्रवाल को बहुत मामूली अंतर से मिली थी, लेकिन दूसरी जीत उनके लिए बहुत शानदार रही थी - किंतु तीसरी जीत उन्हें बहुत झटके के साथ मिली थी; तीसरी जीत में उनकी पोजीशन जिस तरह से पिछड़ी थी, उससे वह खुद बहुत निराश हुए थे । ऐसे में, एक तरफ तो उन्हें यह जानना/समझना है कि सेंट्रल काउंसिल में होते हुए तथा प्रभावी तरीके से परफॉर्म करने के बावजूद उनके वोट ज्यादा बढ़े क्यों नहीं - और दूसरी तरफ नए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ कनेक्ट होने की चुनौती उनके सामने है । संजय अग्रवाल के नजदीकियों और समर्थकों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी की चुनौतियों का उन्हें आभास है, और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा पहले से कर दी है ।  

Friday, March 13, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ बढ़ती नाराजगी तथा अतुल गुप्ता की सीट के खाली होने के कारण अगले वर्ष होने वाले चुनाव में कुछेक बनिया उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी करता देख सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता को अभी से अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए सक्रिय होना जरूरी लगा है 

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का सदस्य बनने के एक वर्ष के अंदर ही संजीव सिंघल तथा प्रमोद जैन के प्रति चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की बढ़ती नाराजगी ने इनके नजदीकियों और समर्थकों को अगले चुनाव में इनकी जीत के प्रति सशंकित कर दिया है, और उन्हें लग रहा है कि इसी का फायदा उठाने के लिए सुधीर अग्रवाल व विजय गुप्ता ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है । संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ आम शिकायत है कि यह फोन ही नहीं उठाते हैं, और कॉल बैक भी नहीं करते हैं । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तो छोड़िये, वरिष्ठ व खास चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रति भी इनका यही रवैया है । संजीव सिंघल के मामले में तो उनके समर्थक रहे वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट गिरीश आहुजा तक को लोगों की शिकायतें सुनना पड़ रही हैं । भुक्तभोगियों का कहना/बताना है कि संजीव सिंघल के रवैये पर गिरीश आहुजा ने भी नाराजगी दिखाई/जताई है, और लोगों के बीच माना है कि संजीव सिंघल के इस रवैये के चलते उनकी साख व विश्वसनीयता को चोट पहुँची है । दरअसल कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने गिरीश आहुजा को उलाहना दिया कि 'हमने तो आपकी सिफारिश पर' संजीव सिंघल को वोट दिया था; हमें विश्वास था कि 'आप' जिसकी सिफारिश कर रहे हैं, चुनाव जीतने के बाद वह हमारी मुश्किलों व समस्याओं को हल करने/करवाने में दिलचस्पी लेंगे - लेकिन संजीव सिंघल तो फोन भी नहीं उठाते हैं । कुछेक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि उन्हें तो गिरीश आहुजा के हस्तक्षेप करने के बाद संजीव सिंघल की तरफ से कॉल आई । प्रमोद जैन के 'शिकार' लोगों की तो समस्या यह भी है कि वह शिकायत भी करें तो किस से करें ?
उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में संजीव सिंघल को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, और प्रमोद जैन विजेता 6 उम्मीदवारों में तीसरे नंबर पर रहे थे । इन्हें जो छप्परफाड़ जीत मिली थी, उसकी दूसरों को तो क्या - खुद इन्हें भी उम्मीद नहीं थी । ठीक इसी तरह से, दूसरों को तो क्या, खुद इन्हें भी उम्मीद नहीं रही होगी कि भारीभरकम जीत हासिल करने के एक वर्ष के भीतर ही इन्हें वोट देने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इनके खिलाफ शिकायतें करने लगेंगे । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की शिकायतों को सुनते/देखते हुए वह कहावत चरितार्थ होती हुई लग रही है कि 'जो जितनी तेजी से ऊपर चढ़ता है, वह उससे ज्यादा तेज गति से नीचे उतरता है ।' संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के प्रति मुखर होती शिकायतों ने सुधीर गुप्ता और विजय गुप्ता को अभी से चुनावी तैयारी शुरू करने के लिए प्रेरित किया है, और उनकी तरफ से अपने समर्थकों को सक्रिय करने तथा नए समर्थक खोजने/बनाने का काम शुरू होने की चर्चा है । पिछले चुनाव में सुधीर अग्रवाल करीब डेढ़ सौ वोटों की कमी के चलते सेंट्रल काउंसिल में आने से रह गए थे, और विजय गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट खोना पड़ी थी । इन दोनों को उम्मीद है कि संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के खिलाफ लोगों की नाराजगी जिस तरह से बन/बढ़ रही है, और खासी मुखर हो रही है, उसके कारण इन्हें वोटों का भारी नुकसान होगा; इन्हें होने वाले नुकसान का फायदा उठाने के लिए अगले वर्ष होने वाले सेंट्रल काउंसिल चुनाव के लिए सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता को अभी से सक्रिय होने की जरूरत लग रही है ।
दरअसल, संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के वोटों में कमी होने के आकलन तथा अतुल गुप्ता की सीट के खाली होने के कारण अगले वर्ष होने वाले चुनाव में कुछेक बनिया उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की संभावना व्यक्त की जा रही है । चुनावी अनुभव के कारण, सुधीर अग्रवाल और विजय गुप्ता का पलड़ा अगले चुनावों के संदर्भ में भारी तो दिखता है, लेकिन कोई नया उम्मीदवार आ कर इनका 'खेल' बिगाड़ न दे - संभवतः इसलिए ही इन्हें अभी से सक्रिय होना जरूरी लगा होगा । संजीव सिंघल और प्रमोद जैन के कुछेक समर्थकों को हालाँकि लगता है कि इनके रवैये से लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी के चलते, हो सकता है कि इन्हें मिलने वाले वोटों में कुछ कमी हो जाये - लेकिन अपनी सीट निकालना इनके लिए मुश्किल नहीं होगा । कुछेक समर्थकों का यह भरोसा, लेकिन पिछले चुनाव में विजय गुप्ता और संजय वासुदेवा के साथ घटी 'घटना' को याद करते हुए ज्यादा भरोसे का नहीं रह जाता है । पिछले चुनाव में, सेंट्रल काउंसिल में होने के बावजूद विजय गुप्ता और संजय वासुदेवा का अपनी अपनी सीटों को न बचा पाना इस बात का सुबूत है कि सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होना जीत की गारंटी नहीं है । और फिर, विजय गुप्ता व संजय वासुदेवा के खिलाफ तो वैसी मुखर नाराजगी भी नहीं दिखती थी, जैसी कि संजीव सिंघल व प्रमोद जैन के प्रति दिख रही है । देखना दिलचस्प होगा कि संजीव सिंघल और प्रमोद जैन अपने खिलाफ बढ़ती नाराजगी को सचमुच खतरे के रूप में देखेंगे और अपने व्यवहार में सुधार करेंगे - या छप्परफाड़ जीत के 'नशे' में आश्वस्त रहेंगे और लोगों की नाराजगी की परवाह नहीं करेंगे ?

Sunday, February 3, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य संजीव सिंघल ने अपनी, इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की गरिमा को ताक पर रख कर गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के चुनाव में अपनी जो भूमिका और संलग्नता 'दिखाई' है, उसने उनकी फजीहत के हालात पैदा किए

गुड़गाँव । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बने संजीव सिंघल ने गुड़गाँव ब्रांच के लिए होने वाले चुनाव में अतुल कंसल और मोहित सिंघल को चुनाव जितवाने की जिम्मेदारी ले कर और 'दिखा' कर गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव को दिलचस्प तो बना दिया है, लेकिन अपनी फजीहत करवा ली है । गुड़गाँव ही नहीं, नॉर्दर्न रीजन और दूसरे रीजन के भी जिन लोगों को संजीव सिंघल की इस हरकत का पता चला है, उनका यही कहना है कि इससे यही पता चला है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चुने जाने वाले संजीव सिंघल कितनी छोटी सोच के व्यक्ति हैं । ऐसे व्यक्ति का सेंट्रल काउंसिल के लिए चुना जाना इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है । प्रोफेशन के लोगों को संजीव सिंघल से उम्मीद होगी कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में वह इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन से जुड़े बड़े मसलों को हल करने/करवाने के प्रयासों में जुटें, लेकिन संजीव सिंघल छोटे छोटे चुनावों और मसलों में उलझे होंगे । कुछेक लोगों का यह भी कहना है कि संजीव सिंघल को गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव में यदि इतनी ही दिलचस्पी है, तो उन्हें गुड़गाँव ब्रांच का चुनाव लड़ना चाहिए था; उन्होंने सेंट्रल काउंसिल का चुनाव क्यों लड़ा ? मजे की बात यह हुई है कि संजीव सिंघल की हो रही फजीहत को देख/जान कर उनके समर्थित उम्मीदवारों - अतुल कंसल और मोहित सिंघल को खतरा/डर यह हो रहा है कि संजीव सिंघल की हो रही फजीहत कहीं उनके चुनाव पर उल्टा असर डाल कर उनकी उम्मीदवारी का कबाड़ा न कर दे ।  
उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के ब्रांच चुनाव में दिलचस्पी लेने की बात हालाँकि कोई अनोखी बात नहीं है । यह बड़ी स्वाभाविक सी स्थिति है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को अपनी राजनीति के लिए ब्रांचेज के लोगों के समर्थन की जरूरत पड़ती है, और ब्रांचेज के उन्हीं लोगों में से कुछेक जब ब्रांच के चुनाव में उम्मीदवार बनते हैं - तो बदले में वह सेंट्रल काउंसिल सदस्य की मदद चाहते हैं, और सेंट्रल काउंसिल सदस्य उनकी मदद करते हैं । लेकिन यह सब बड़े दबे-छिपे तरीके से होता है । सेंट्रल काउंसिल सदस्य इंस्टीट्यूट की अपनी 'हैसियत' की गरिमा का ध्यान रखते हुए और उसको दागदार बनने से बचाते हुए यह सब करते हैं । संजीव सिंघल ने लेकिन यह सब बड़े ही फूहड़ और सड़क छाप तरीके से किया, इसलिए उनकी भूमिका और संलग्नता विवादग्रस्त हो गई और उन्हें फजीहत का शिकार बनना पड़ रहा है । गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव की ही बात करें तो यहाँ सेंट्रल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता की भी दिलचस्पी देखी/पहचानी जा रही है; और दो-तीन उम्मीदवार उनके समर्थन की छड़ी पकड़ कर चुनाव जीतने की कोशिश करते सुने जा रहे हैं । सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा के पास भी एक उम्मीदवार का झंडा होने की चर्चा है । लेकिन इनके खेल पर्दे के पीछे चल रहे हैं, और इन्हें अपने उम्मीदवारों के लिए कुछ करते हुए देखा/सुना नहीं गया है । लेकिन इनके विपरीत व्यवहार करते हुए संजीव सिंघल ने अपने दोनों उम्मीदवारों के चुनावी प्रबंध के लिए बाकायदा कोर टीम बनाई, उसकी मीटिंग के लिए गुड़गाँव आए, चुनावी दिशा-निर्देश तय किए । उनकी इस कार्रवाई का सोशल मीडिया पर प्रचार किया गया, ताकि सभी लोगों को पता चले कि संजीव सिंघल किन किन उम्मीदवारों को गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में देखना चाहते हैं ।
संजीव सिंघल की इस कार्रवाई से जुड़ी बातें और तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं तो बात फैली और जिसने भी यह सब देखा, उसे संजीव सिंघल की इस हरकत पर हैरानी हुई । हर किसी को यही लगा कि संजीव सिंघल इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बन रहे हैं, और इस रूप में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन में बड़ी जिम्मेदारी से जुड़ रहे हैं - ऐसे में उन्हें गुड़गाँव ब्रांच के चुनाव में इस हद तक शामिल होने की भला क्या जरूरत है ? और यदि जरूरत है भी, तो अपनी संलग्नता को थोड़ा छिपा कर उन्हें उस जरूरत को पूरा करना चाहिए - ताकि उनकी भी और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की भी गरिमा बची रह सके । संजीव सिंघल को फजीहत का शिकार होता देख उनके कुछेक नजदीकियों ने ठीकरा अतुल कंसल और मोहित सिंघल के सिर फोड़ना शुरू किया है । उनका कहना है कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से अपने जोश और अपनी बेवकूफी में इन्होंने मामले को ऐसा राजनीतिक रूप दे दिया, जिसने संजीव सिंघल के लिए फजीहत वाले हालात बना दिए हैं । संजीव सिंघल के नजदीकियों की तरफ से दी जा रही इस तरह की सफाई ने लेकिन मामले को शांत करने की बजाये भड़का और दिया है । लोगों का कहना है कि सारे मामले में दोष यदि सिर्फ अतुल कंसल और मोहित सिंघल का है, तो इन जैसे लोगों की उम्मीदवारी का समर्थन संजीव सिंघल क्यों कर रहे हैं ? इन जैसे लोगों को जब संजीव सिंघल की, इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की पहचान, प्रतिष्ठा, गरिमा की चिंता नहीं है; और पूरी तरह से खिलवाड़ करने में लगे हैं - तो संजीव सिंघल इन्हें गुड़गाँव ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में क्यों भेजना/देखना चाहते हैं ? अतुल कंसल और मोहित सिंघल की उम्मीदवारी के चक्कर में संजीव सिंघल ने अपनी जो फजीहत करवा ली है, उसने गुड़गाँव ब्रांच के चुनावी परिदृश्य को लेकिन खासा दिलचस्प बना दिया है । 

Sunday, December 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं - और यही बात प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के लिए खतरे की घंटी बजाती है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चॉर्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए हुए चुनाव में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला फैसला संजय वासुदेवा की पराजय का रहा । हालाँकि सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह, वेस्टर्न रीजन में मंगेश किनरे, और नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के साथ-साथ विजय गुप्ता भी सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा पाने में नाकाम रहे हैं - लेकिन संजय वासुदेवा की पराजय ने हर किसी को आश्चर्य में डाला है । दरअसल नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के पिता एससी वासुदेवा का खासा नाम है । उनके पिता द्वारा स्थापित फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी को प्रोफेशन में बिग फोर फर्म्स जैसी 'हैसियत' प्राप्त है, और पूरे रीजन के हर प्रमुख शहर में उनके लाभार्थियों की अच्छी-खासी संख्या मौजूद है । एससी वासुदेवा चूँकि खुद भी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं, और सेंट्रल काउंसिल में सदस्य भी रहे हैं - इसलिए उनकी प्रोफेशनल हैसियत का एक राजनीतिक आयाम भी रहा है; जिसका फायदा संजय वासुदेवा को पिछले चुनाव में मिला था । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में संजय वासुदेवा का रिकॉर्ड कोई बहुत सक्रियता भरा तो नहीं रहा, लेकिन उनके खिलाफ कहीं कोई आवाज भी नहीं पैदा हुई - इसलिए माना/समझा जा रहा था कि वह अपनी सीट आसानी से बचा लेंगे । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खानदानी परंपरा का सम्मान करने का रिवाज चूँकि है, जिसके चलते नवीन गुप्ता और नीलेश विकमसे जैसे लोग भी चुनाव जीतते गए और प्रेसीडेंट तक बन गए; और जिस रिवाज के चलते अभी संपन्न हुए चुनाव में वेस्टर्न रीजन में अनिकेत तलति तक सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत गए - उसी रिवाज के भरोसे संजय वासुदेवा के भी जीतने का विश्वास सभी को था । संजय वासुदेवा की चुनावी स्थिति को फायदा पहुँचाने वाली एक बड़ी बात इसी वर्ष अप्रैल में यह हुई थी कि उनकी फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी तथा एक और बड़ी फर्म एसपी पुरी एंड कंपनी का विलय हुआ था, जिसके चलते माना/समझा जा रहा था कि संजय वासुदेवा की राजनीतिक ताकत और बढ़ी है । लेकिन फिर भी संजय वासुदेवा हार गए । वैसे संजय वासुदेवा यदि जीत जाते तो सेंट्रल काउंसिल में एक दिलचस्प नजारा यह बनता कि चरनजोत सिंह नंदा तथा अनुज गोयल को ऐसे सदस्यों के रूप में पहचान मिलती जिन्होंने पिता एससी वासुदेवा के साथ 19वीं काउंसिल में संगत की थी और अब 24वीं काउंसिल में पुत्र संजय वासुदेवा के साथ वह संगत करते ।
'जो जीता वह सिकंदर, बाकी सब बंदर' की तर्ज पर जीतने वालों को बड़ा जेनुइन व काबिल तथा हारने वालों को बेईमान व नाकारा मानने/बताने की सड़कछाप प्रवृत्ति की बजाये यदि गंभीरता के साथ चुनावी नतीजों का विश्लेषण करें, तो प्राप्त चुनावी नतीजे कोई 'पैटर्न' नहीं पेश करते हैं । चुनावी नतीजों में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं । सेंट्रल काउंसिल का यह परिदृश्य संसद के उस परिदृश्य की याद दिलवाता है, जिसमें अटलबिहारी वाजपेयी के साथ फूलन देवी भी होती है । संसदीय चुनावों के मतदाताओं के बारे में कहा/माना जाता है कि उनमें बहुत से लोग अनपढ़ व भावुक व लालची होते हैं, जिसका फायदा फूलन देवी जैसे लोग उठा लेते हैं; लेकिन इंस्टीट्यूट के चुनावों के मतदाता तो पढ़े-लिखे जागरुक लोग होते हैं तथा प्रोफेशन में होने वाली ऊँच/नीच और काउंसिल सदस्यों की क्षमताओं व उनकी कारस्तानियों को नजदीक से देखते/पहचानते रहते हैं - फिर भी वह फूलन देवी किस्म के उम्मीदवारों को क्यों चुन लेते हैं ? इस 'क्यों' का जबाव मिलना आसान नहीं है, लेकिन फिर भी यह 'क्यों' इंस्टीट्यूट के सदस्य चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समझ व जागरुकता तथा प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है । यह ठीक है कि किसी भी चुनाव में मतदाताओं को प्रायः 'बुरे' और 'कम बुरे' में से ही चुनने का विकल्प मिलता है; और 'कम बुरे' की तुलना में 'बुरे' उम्मीदवार मतदाताओं की आँखों में धूल झोंकने में ज्यादा होशियार साबित होते हैं - लेकिन ऐसी ही होशयारियों के बीच मतदाताओं के विवेक और उनकी समझदारी की परीक्षा होती है । ऐसे में, माना/कहा जा सकता है कि प्रोफेशन के लोग यदि संजय वासुदेवा की बजाये राजेश शर्मा व चरनजोत सिंह नंदा जैसे लोगों को तरजीह देते हैं, तो प्रोफेशन की विश्वसनीयता व प्रतिष्ठा को बनाये/बचाये रखने का काम ईश्वर भी नहीं कर सकेगा - क्योंकि माना/कहा जाता है कि ईश्वर भी उन्हीं को बचाने में मदद करता है, जो खुद को बचाने का प्रयास करते हैं ।
सेंट्रल काउंसिल के चुनावी नतीजे कुछ महत्त्वपूर्ण सबक भी देते हैं । संजय वासुदेवा की पराजय में उनके अति-आत्मविश्वास का भी योगदान है । चुनावी राजनीति में मतदाता के पास जाने के काम को एक बहुत जरूरी काम के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिस पर संजय वासुदेवा ने ध्यान नहीं दिया । दूसरों की तरह वह भी इस भरोसे रहे कि उनके पिता और उनकी फर्म का जो आभामंडल है, वही उन्हें चुनाव जितवा देगा - और धोखा खा बैठे । चुनाव को चुनौती की तरह लेने का काम सिर्फ दो लोगों ने किया - संजीव सिंघल और हंसराज चुग ने; और दोनों को अच्छे/खासे वोट मिले । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों को भी इतनी बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं थी - यदि होती तो उनके एक बड़े समर्थक के रूप में गिरीश आहुजा जैसे बड़े व्यक्ति को छोटी छोटी जगहों पर भी अपनी फजीहत नहीं कराना पड़ती । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जिस तरह से हर हथकंडा अपनाया, उसका उन्हें अच्छा सुफल भी मिला । हंसराज चुग के साथ कोई बड़ा नाम तो नहीं था, लेकिन छोटे छोटे ग्रुपों और नेताओं के बीच प्रभावी तालमेल बना कर उन्होंने अपने चुनाव अभियान को जिस तरह से संयोजित किया, उससे लगा कि उन्होंने हर चुनावी जरूरत का ध्यान रखा और खतरे वाली हर जगह पर ध्यान दिया और वहाँ हालात को साधने की कोशिश की - और अच्छा नतीजा पाया । संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता की सीट को भी कोई खतरा नहीं समझा/पहचाना जा रहा था, लेकिन संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता अति-आत्मविश्वास का शिकार नहीं हुए । अतुल गुप्ता को जो झटके लग रहे थे, वह उन्हें कोई बड़ा नुकसान पहुँचाते हुए नहीं दिख रहे थे, लेकिन फिर भी उन्होंने झटकों से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के पुरजोर इंतजाम किए और जिनके चलते वह अपनी सीट बचा सकने में सफल रहे । विजय गुप्ता ने संजय वासुदेवा जैसी लापरवाही तो नहीं दिखाई, किंतु अतुल गुप्ता जैसी होशियारी भी वह नहीं दिखा सके; उन्होंने बँधे/बँधाये फार्मूले पर काम किया, जिसके तहत वह चुनाव से कुछ पहले सक्रिय हुए और उसमें भी उन्होंने खतरे वाली जगहों को पहचानने की जरूरत नहीं समझी - हंसराज चुग, प्रमोद जैन, सुधीर अग्रवाल की तरफ से मिलने वाली चुनौती को समझने/पहचानने में वह चूक कर बैठे और अपनी सीट गँवा बैठे । चुनावी नतीजों ने यह बात भी स्पष्ट कर दी है कि सिर्फ ज्ञान बाँट कर और या सिर्फ पार्टियाँ आयोजित करके ही चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं, जो लोग इन दोनों चीजों में बेहतर तालमेल बनायेंगे - जीत उन्हीं को मिलेगी ।

Wednesday, November 21, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत हंसराज चुग की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए आज दोपहर करनाल में हुई मीटिंग में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के उत्साह की खबर से लग रहा है कि इंस्टीट्यूट के चुनाव में इस बार हरियाणा के छोटे शहर भी खास भूमिका निभाने जा रहे हैं

सिरसा । इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में सिरसा को - और सिरसा के बहाने हरियाणा के छोटे छोटे शहरों तक को इस बार जो राजनीतिक महत्ता मिल रही है, वह इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य के संगीन हो उठने के तथ्य का नजारा प्रस्तुत करता है, जिसमें एक एक वोट और दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट भी 'कीमती' हो गए हैं । इंस्टीट्यूट के चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि कई उम्मीदवारों को 'क्लोज-फाइट' में देखा/पहचाना जा रहा है । नॉर्दर्न रीजन में छह लोगों को सेंट्रल काउंसिल के लिए चुना जाना है, जिनमें संजय वासुदेवा, अतुल गुप्ता व विजय गुप्ता के चुने जाने को लेकर तो सभी आश्वस्त हैं; लेकिन बाकी तीन सीटों के लिए सात/आठ उम्मीदवारों का बड़ा समूह और चार/पाँच उम्मीदवारों का छोटा समूह मुकाबले में नजर आ रहा है । इनके बीच जो आपसी होड़ है, वह तो है ही - इनकी मुश्किलें बढ़ाने का काम लेकिन तीन/चार ऐसे उम्मीदवार भी कर रहे हैं, जिनकी सफलता को लेकर तो शक है लेकिन जिन्होंने वोट जुटाने के लिए जी-जान लगा रखा है । इस कारण से जो उम्मीदवार अपने आप को क्लोज-फाइट में पा रहे हैं, उन्होंने अपने अपने तरीके से एक एक वोट के लिए तथा दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों के लिए भी अपने आप को झोंका हुआ है । यही कारण है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अभी तक उपेक्षित रहे शहर भी इस बार महत्त्वपूर्ण हो उठे हैं, जिसके चलते हरियाणा के हिसार और पानीपत व सोनीपत व करनाल जैसे शहर भी उम्मीदवारों की भागदौड़ में शामिल हो गए हैं । आज दोपहर करनाल में हंसराज चुग की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए हुई मीटिंग में स्थानीय चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का जो उत्साह सुनने को मिला, उससे लग रहा है कि इंस्टीट्यूट के चुनाव में  इस बार हरियाणा के छोटे छोटे शहर भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहे हैं ।  
सिरसा की दूरी दिल्ली से करीब तीन सौ किलोमीटर पड़ती है, और यहाँ कुल सौ वोट पड़ने की संभावना है । यानि मेहनत/खर्चा ज्यादा, और प्राप्ति कम । इस कारण सिरसा उम्मीदवारों को कभी आकर्षित नहीं कर पाया । इस बार लेकिन नजारा बदला हुआ है । नजारे को बदलने की शुरुआत चरनजोत सिंह नंदा की तरफ से हुई । सेंट्रल काउंसिल में वापसी करने की मुश्किल चुनावी लड़ाई में एक एक वोट जुटाने की कोशिशों में फँसे चरनजोत सिंह नंदा ने सिरसा में इस उम्मीद में दस्तक दी, कि यहाँ से उन्हें जो थोड़े बहुत वोट मिल जायेंगे शायद वही उनके लिए लाभदायक साबित हों । चरनजोत सिंह नंदा की बदकिस्मती लेकिन यह रही कि उनके द्वारा सिरसा में हुई मीटिंग के बाद तो सिरसा में जैसे उम्मीदवारों की दौड़ शुरू हो गई, और खुद को सेंट्रल काउंसिल में जाने योग्य समझने वाला शायद ही कोई उम्मीदवार होगा जिसने सिरसा में अपने कदम न डाले हों । राजेश शर्मा को मीटिंग करवाने के लिए यहाँ सहयोगी नहीं मिले, तो उन्होंने एक चार्टर्ड एकाउंटेंट के ऑफिस में ही कुछेक लोगों को जुटा कर उनकी पार्टी कर दी । सिरसा में उम्मीदवारों की भागदौड़ का शोर मचा तो अतुल गुप्ता व विजय गुप्ता ने भी सिरसा को अपने अपने तरीके से खटखटाया । हंसराज चुग को सिरसा में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन दिखाने/जुटाने के अभियान में जो कामयाबी मिली, उससे उत्साहित होकर उन्होंने हरियाणा के दूसरे शहरों से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनाई और उस पर अमल किया ।
सिरसा में कई उम्मीदवारों ने अपने अपने तरीकों से सक्रियता तो दिखाई, लेकिन अधिकतर उम्मीदवारों की सक्रियता रस्मअदायगी की तरह ही नजर आई ।  इसका नतीजा यह रहा कि किसी भी उम्मीदवार को अपनी उम्मीदवारी के लिए सिरसा में कोई फायदा होता हुआ नजर नहीं आया, और फिर उन्हें सिरसा व हरियाणा में समय लगाना समय बर्बाद करने जैसा लगा । फरीदाबाद व गुड़गाँव को छोड़ कर दिल्ली व पंजाब के बीच पड़ने वाले हरियाणा के शहर भौगोलिक कारणों से बिखरे हुए से हैं, और यहाँ कोई ज्यादा वोट भी नहीं हैं - इस क्षेत्र में कुल करीब पाँच हजार वोट हैं, जिनमें से करीब तीन हजार के पड़ने की उम्मीद की जा रही है । इसलिए अधिकतर उम्मीदवारों की हरियाणा के शहरों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं बनी । संजीव सिंघल ने दो एक शहरों में पार्टी की भी, लेकिन उनके यहाँ लोगों की उपस्थिति इतनी कम रही कि फिर उनका - और उनका हश्र देख कर दूसरों का हरियाणा में कुछ करने के लिए हौंसला ही नहीं बचा । हरियाणा में अधिकतर उम्मीदवारों की 'आए, और चले गए' जैसी सक्रियता रहने के कारण राजनीतिक शून्य जैसी स्थिति बनी, जिसमें हंसराज चुग ने अपने लिए मौका देखा/पाया । यह बात तो हंसराज चुग और उनके साथी/समर्थक जानते होंगे कि 'टाइमिंग' के लिहाज से हरियाणा में उनकी सक्रियता उचित समय पर संयोगवश हुई दिखी है या उनकी सोची/विचारी योजना के अनुरूप हुई है; दरअसल संजीव सिंघल व दूसरे उम्मीदवारों ने हरियाणा में जब अपनी सक्रियता दिखाई और मीटिंग्स कीं, तब चुनावी माहौल में गर्मी नहीं आई थी और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कामकाज में व्यस्त थे, जिसके चलते उन्हें अच्छे से रिस्पॉन्स नहीं मिला - जबकि हंसराज चुग ने अभी हाल ही के दिनों में सिरसा, सोनीपत, पानीपत व करनाल में जब अपने आयोजन किए हैं, तब तक माहौल में चुनावी गर्मी भी आ चुकी है और आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी चुनावी रंग में रंगना शुरू हो गए हैं । इस कारण उनके आयोजनों को यहाँ अच्छा रिस्पॉन्स मिला है । हंसराज चुग के लिए होने वाले आयोजनों को मिले अच्छे रिस्पॉन्स ने दूसरे उम्मीदवारों के बीच हलचल तो पैदा की है, लेकिन वह अभी असमंजस में हैं कि हरियाणा के शहरों में एक बार अपना समय बर्बाद कर चुकने के बाद दोबारा यहाँ समय लगाएँ - या छोड़ें ?

Thursday, November 15, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में बिग फोर फर्म्स का समर्थन प्राप्त करने के लिए संजीव सिंघल ने पैंतरा बदल कर संजीव चौधरी से सीधे भिड़ने की तैयारी की

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में संजीव चौधरी की जगह लेने के प्रयास में जुटे संजीव सिंघल ने अपनी चुनावी मुश्किलों के लिए संजीव चौधरी को जिम्मेदार ठहराने/बताने की बातें शुरू करके उन चर्चाओं को सार्वजनिक कर दिया है, जो अभी तक पर्दे के पीछे फुसफुसाहटों के रूप में चल रही थीं । संजीव सिंघल इस बात से काफी निराश रहे हैं कि बिग फोर की तरफ से उन्हें वैसा एकजुट समर्थन नहीं मिल पा रहा है, जैसा कि बिग फोर के उम्मीदवार के रूप में उन्हें मिलना ही चाहिए । बिग फोर की तरफ से मिले झटके से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए उन्हें आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच स्टडी सर्किल्स तथा ब्रांचेज में भटकना पड़ा । संजीव सिंघल के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि उनकी उम्मीदवारी को गिरीश आहुजा तथा अमरजीत चोपड़ा जैसे प्रोफेशन के बड़े लोगों का खुल्ला समर्थन मिला । इनके समर्थन के बावजूद हालाँकि संजीव सिंघल को अपनी उम्मीदवारी की नाव किनारे पहुँचती नहीं दिखी, तो उन्हें बिग फोर के समर्थन की तरफ लौटने की जरूरत महसूस हुई । दरअसल गिरीश आहुजा और अमरजीत चोपड़ा के सक्रिय समर्थन के बावजूद, माथे पर लगी बिग फोर के उम्मीदवार की पट्टी के कारण संजीव सिंघल आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपने लिए स्वीकार्यता नहीं बना सके हैं । इसलिए उन्हें लगा कि उन्हें वापस अपने 'घर/परिवार' में ही लौट चलना चाहिए और घर/परिवार के सदस्यों के बीच ही अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाना चाहिए । संजीव सिंघल ने अपने घर/परिवार में समर्थन जुटाने के लिए की गई इस नई और दूसरी कोशिश में संजीव चौधरी को निशाने पर लेने की रणनीति अपनाई ।
संजीव सिंघल के नजदीकियों के अनुसार, बिग फोर में संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के खिलाफ माहौल बनाने का काम वास्तव में संजीव चौधरी ने ही किया हुआ था । संजीव चौधरी ने अपनी उम्मीदवारी का भ्रम बनाए रखते हुए पहले तो संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के पक्ष में बिग फोर फर्म्स को एकजुट नहीं होने दिया, और फिर तरह तरह से यह दिखाने/जताने का प्रयास किया कि संजीव सिंघल को गंभीर उम्मीदवार के रूप में नहीं देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करके बिग फोर अपने लिए ही फजीहत व मुसीबत पैदा करेंगे । संजीव सिंघल के रवैये ने संजीव चौधरी के 'अभियान' को और आसान कर दिया । दरअसल संजीव सिंघल यह समझने में असफल रहे कि संजीव चौधरी के अभियान से वह कैसे निपटें ? संजीव चौधरी के अभियान से निपटने में समय/समझ/एनर्जी लगाने की बजाये संजीव सिंघल ने सेंट्रल काउंसिल में पहुँचने के लिए दूसरे वैकल्पिक रास्तों की तलाश की । दरअसल संजीव चौधरी से सीधे भिड़ने से बचने के लिए संजीव सिंघल ने यह उपाय सोचा और अपनाया । उन्हें लगा कि स्टडी सर्किल्स व ब्रांचेज के पदाधिकारियों को 'पटा' कर उनके सेमिनार्स में वक्ता बन कर वह आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तक सीधी पहुँच बना लेंगे - और संजीव चौधरी के 'अभियान' को फेल कर देंगे । लेकिन कई सेमिनार्स में वक्ता बनने के बावजूद, आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटा पाने में उन्हें सफलता मिलती नहीं दिखी । संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के चक्कर में गिरीश आहुजा और अमरजीत चोपड़ा को आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच जिस तरह से फजीहत झेलना पड़ी, उसे देख कर संजीव सिंघल तथा उनके समर्थकों को समझ में आ गया कि आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन प्राप्त कर पाना उनके लिए मुश्किल ही नहीं - बल्कि असंभव ही होगा । 
इस नजारे को देख कर संजीव सिंघल को समझ में आ गया कि उन्हें आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की बजाये बिग फोर के लोगों पर ही भरोसा करना होगा, और उनके बीच ही अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन तलाश करना व बनाना होगा । संजीव सिंघल के नजदीकियों के अनुसार, इसके साथ ही संजीव सिंघल को यह भी समझ में आ गया कि इसके लिए उन्हें संजीव चौधरी से सीधे सीधे भिड़ना ही पड़ेगा - जिससे कि वह अभी तक बचने की कोशिश कर रहे थे । संजीव सिंघल के नजदीकियों से बातचीत में इन पँक्तियों के लेखक को पता चला है कि पिछले एक सप्ताह में संजीव सिंघल ने बिग फोर की अलग अलग फर्म्स के लोगों से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन को लेकर बात की है, और संजीव चौधरी के रवैये की शिकायत करते हुए उनके व्यवहार का रोना रोया है । नजदीकियों के अनुसार, संजीव सिंघल ने पूछने वाले अंदाज में कहा/बताया है कि संजीव चौधरी पता नहीं क्यों उनके साथ निजी खुन्नस रखते हैं व दिखा रहे हैं; और आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी नकारात्मक छवि/पहचान बनाते रहे हैं । संजीव सिंघल लोगों को बता रहे हैं कि संजीव चौधरी अभी तक भी लोगों के बीच यह प्रचार कर रहे हैं कि बिग फोर ने उम्मीदवार चुनने में गलती कर दी है, और एक कमजोर व्यक्तित्व को उम्मीदवार बना दिया है । संजीव सिंघल यह तर्क देते हुए बिग फोर फर्म्स के लोगों को अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में सक्रिय करने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी उम्मीदवारी बिग फोर फर्म्स का प्रतिनिधित्व कर रही है, और उनकी हार सिर्फ उनकी हार नहीं होगी - बल्कि बिग फोर फर्म्स की हार होगी; इसलिए बिग फोर के लोगों को उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेना चाहिए तथा संजीव चौधरी के दुष्प्रचार में नहीं फँसना चाहिए । अभी तक संजीव चौधरी से सीधे भिड़ने से बचने की कोशिश करते रहे संजीव सिंघल के इस पैंतरे ने बिग फोर के लोगों के बीच कुछ हलचल तो मचाई है, लेकिन यह अभी देखने/समझने की बात होगी कि इस पैंतरे से संजीव सिंघल को वास्तव में कोई फायदा होगा या नहीं ?

Sunday, November 4, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अमरजीत चोपड़ा से मिले धोखे से झटका खाए हंसराज चुग और उनके समर्थकों ने अमरजीत चोपड़ा के खिलाफ मोर्चा खोला

नई दिल्ली । हंसराज चुग और उनके नजदीकी इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा के 'दलबदलू' व्यवहार से इस कदर खफा हैं कि उनकी तरफ से अमरजीत चोपड़ा की पोल खोलने का अभियान ही शुरू हो गया है । हंसराज चुग की तरफ से अभी हाल ही में जालंधर व लुधियाना में सेमीनार के नाम पर जो पार्टियाँ हुईं, उनमें जुटे लोगों के बीच होने वाली अनौपचारिक बातचीत में हंसराज चुग तथा उनके नजदीकियों ने अमरजीत चोपड़ा को जमकर निशाना बनाया और कोसा । हंसराज चुग और उनके नजदीकी अमरजीत चोपड़ा से दरअसल इसलिए खफा हैं, क्योंकि अमरजीत चोपड़ा ने सेंट्रल काउंसिल चुनाव में मदद करने का उनसे वायदा तो किया था, लेकिन जब मदद करने की बारी आई तो अमरजीत चोपड़ा ने दलबदल कर उनकी बजाये संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया - और हंसराज चुग ठगे से खड़े देखते रह गए । हालाँकि ऐसा नहीं है कि अमरजीत चोपड़ा ने हंसराज चुग की कोई मदद ही नहीं की; उन्होंने हंसराज चुग की उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए 'अपने' कुछेक लोगों से कहा है - लेकिन हंसराज चुग और उनके नजदीकियों के अनुसार, उनका यह कहना महज खानापूर्ति की तरह ही रहा और इससे हंसराज चुग की उम्मीदवारी को सचमुच में कोई फायदा नहीं मिला । हंसराज चुग के लिए झटके की बात यह रही कि जालंधर और लुधियाना में अमरजीत चोपड़ा के नजदीकी समझे जाने वाले लोगों ने हंसराज चुग की पार्टियों से पूरी तरह दूरी बना कर रखी, जिसके चलते हंसराज चुग की पार्टियाँ चुनावी नजरिये से फ्लॉप रहीं । हंसराज चुग और उनके नजदीकी पंजाब की ब्रांचेज में अपने चुनाव अभियान के कमजोर पड़ने के लिए अमरजीत चोपड़ा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । उनकी तरफ से साफ आरोप सुना जा रहा है कि अमरजीत चोपड़ा ने उन्हें धोखा दिया है ।
अमरजीत चोपड़ा की तरफ से मिले धोखे ने हंसराज चुग के सारे चुनावी समीकरणों को चूँकि खासा गड़बड़ा दिया है, इसलिए उससे पैदा हुई निराशा में हंसराज चुग व उनके नजदीकियों का गुस्सा अमरजीत चोपड़ा पर फूट फूट रहा है । उनके बीच होने वाली अनौपचारिक चर्चाओं में कहा/बताया जा रहा है कि बिग फोर एकाउंटिंग फर्म ईवाई में प्रोफेशनल लाभ उठाने के लालच में अमरजीत चोपड़ा ने यह दलबदल किया है और हंसराज चुग के साथ वायदाखिलाफी की है । हंसराज चुग और उनके नजदीकियों के लिए ही नहीं, बल्कि अमरजीत चोपड़ा को जानने वाले अन्य लोगों के लिए भी ईवाई के प्रतिनिधि के रूप में संजीव सिंघल की उम्मीदवारी को अमरजीत चोपड़ा का समर्थन मिलना हैरानी की बात बना हुआ है । अमरजीत चोपड़ा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में भी और उसके बाद भी बिग फोर फर्म्स के खिलाफ रहे हैं, और उन्हें भारतीय फर्म्स तथा भारतीय चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हितों के खिलाफ कहते/बताते रहे हैं । वास्तव में, बिग फोर फर्म्स के तौर-तरीकों के खिलाफ निरंतर सक्रियता बनाये रखने के चलते ही अमरजीत चोपड़ा को आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अच्छी पहचान और प्रभावी समर्थन मिला है । वास्तव में इसी कारण से इंस्टीट्यूट से जुड़े हर किसी व्यक्ति को हैरानी है कि अमरजीत चोपड़ा का अचानक से यह हृदय परिवर्तन कैसे और क्यों हो गया है और अभी कल तक बिग फोर फर्म्स के खिलाफ बातें करते रहने वाले अमरजीत चोपड़ा ने बिग फोर फर्म के प्रतिनिधि को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में भेजने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर आखिर क्यों उठा ली है ?
अमरजीत चोपड़ा के चुनावी रवैये में आए बदलाव के चलते धोखा खाए हंसराज चुग और उनके साथियों के बीच होने वाली चर्चाओं में सुनने को यही मिल रहा है कि अमरजीत चोपड़ा ने अपने निजी स्वार्थ में राजनीतिक पाला बदला है और हंसराज चुग को धोखा दिया है । चर्चाओं में कहा/सुना जा रहा है कि अमरजीत चोपड़ा ने लगता है कि ईवाई फर्म से कुछ बड़ा काम लेने और या फर्म में बड़ी पोजीशन लेने का जुगाड़ बैठा लिया है, और उसके ऐवज में उन्होंने फर्म के उम्मीदवार संजीव सिंघल को सेंट्रल काउंसिल चुनाव जितवाने का 'ठेका' ले लिया है । सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे लोगों का कहना/बताना है कि अमरजीत चोपड़ा हालाँकि पिछले चुनाव में बिग फोर फर्म के उम्मीदवार संजीव चौधरी के लिए भी वोट जुटाने का काम कर चुके हैं, लेकिन तब यह काम उन्होंने बहुत छोटे स्तर पर तथा दबे-छिपे रूप में ही किया था । संजीव चौधरी की मदद के पीछे उनकी 'दोस्ती' को कारण के रूप में देखा/पहचाना गया था, इसलिए तब बिग फोर फर्म के उम्मीदवार को उनकी मदद पर कोई बबाल नहीं हुआ था । इस बार लेकिन अमरजीत चोपड़ा ने बिग फोर फर्म के उम्मीदवार के रूप में संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा जिस 'मजबूती' के साथ उठाया है, और इसके चलते वह हंसराज चुग से किए गए वायदे को भी भूल गए हैं - उसके कारण वह लोगों के निशाने पर आ गए हैं । अमरजीत चोपड़ा के निजी स्वार्थ में बदले रवैये ने चूँकि सेंट्रल काउंसिल चुनाव में हंसराज चुग की उम्मीदवारी के अभियान को तगड़ा झटका दिया है, इसलिए अमरजीत चोपड़ा उनके निशाने पर ज्यादा हैं ।

Monday, October 22, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट के रूप में, संजीव सिंघल की फर्म के खिलाफ कार्रवाई कर चुके अमरजीत चोपड़ा द्वारा संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने से आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को इंस्टीट्यूट प्रशासन व बिग फोर फर्म्स की मिलीभगत का जीवंत और पुख्ता उदाहरण मिला

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पाने के लिए संजीव सिंघल की बिग फोर से जुड़ी पहचान को छिपाने तथा 'देशी अवतार' में आने की कोशिशों ने चुनावी परिदृश्य में मजेदार चर्चाओं को जन्म दिया है, और इस चर्चा में इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा को भी घसीट लिया गया है । दरअसल उम्मीदवारों की फाइनल सूची में संजीव सिंघल के नाम के साथ उनका घर का पता देख कर लोगों को बातें बनाने का मौका मिला कि संजीव सिंघल आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट पाने के लिए बिग फोर से जुड़ी अपनी पहचान को छिपाना चाहते हैं, और इसीलिए उन्होंने अपने ऑफिस की बजाए अपने घर का पता दिया है - ताकि जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स राजनीतिक रूप से ज्यादा सक्रिय नहीं रहते हैं और ज्यादा जानते/बूझते नहीं हैं, उन्हें बरगलाया जा सके । उल्लेखनीय है कि आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बिग फोर फर्मों को लेकर विरोध का भाव/तेवर रहता है; आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स मानते/समझते हैं कि बिग फोर फर्म्स तरह तरह के फर्जी तरीकों से बड़े काम हथिया लेती हैं, और फिर उनके लिए काम की खुरचन ही बची रह पाती है । बिग फोर फर्म्स को आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के 'दुश्मन' के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है । नफरा (एनएफआरए - नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी) जैसी मुसीबत के लिए बिग फोर फर्म्स को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । चर्चा में कहा/बताया जाता है कि बेईमानियाँ बिग फोर फर्म्स करती हैं, जिनसे निपटने के लिए सरकार ने नफरा का गठन कर दिया है - लेकिन जो आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए मुसीबत बन गया है । मजे की बात यह है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन कई बार बिग फोर के खिलाफ कार्रवाई करने का नाटक करता हुआ तो दिखता है, पर वह एक नूरा-कुश्ती से ज्यादा नहीं होता है - और इस तरह आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स दोनों तरफ से ठगे जाते हैं, बिग फोर की तरफ से भी और इंस्टीट्यूट प्रशासन व उसके पदाधिकारियों की तरफ से भी । 
आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स दोनों तरफ से कैसे ठगे जाते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा के व्यवहार में देखा जा सकता है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 में अमरजीत चोपड़ा जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे, तब बिग फोर फर्म्स के काम करने के तौर-तरीकों के खिलाफ उन्होंने कार्रवाई की थी और उनके तौर तरीकों को लेकर जोरदार तरीके से विरोधी बयानबाजी भी की थी; लेकिन वही अमरजीत चोपड़ा अब उसी बिग फोर फर्म के पार्टनर संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के प्रस्तावक बने हैं । वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट और अभी हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पार्ट-टाइम डायरेक्टर बने एस गुरुमूर्ति के एक ट्वीट से भी समझा जा सकता है कि कैसे इंस्टीट्यूट प्रशासन वास्तव में बिग फोर के हितों की ही रखवाली करता है, और आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को धोखा देता है । सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में संजीव सिंघल ने कई मौकों पर आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बिग फोर के प्रति उनकी नाराजगी तथा उनके विरोध के चलते मुसीबत का सामना किया । संजीव सिंघल ने लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने तथा अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से गिरीश आहुजा की भी मदद ली, लेकिन संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए गिरीश आहुजा तक को लोगों से खरीखोटी सुननी पड़ी । यह बड़ा गजब 'सीन' रहा । गिरीश आहुजा का आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बड़ा सम्मान है; कोई सोच भी नहीं सकता कि आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उनके प्रति असम्मान भी दिखा और व्यक्त कर सकते हैं । इसे बिग फोर के प्रति आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के विरोध के सुबूत के रूप में ही देखा/पहचाना गया कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के चक्कर में गिरीश आहुजा तक को लोगों के बीच फजीहत का शिकार होना पड़ा ।
ऐसे में, इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट के रूप में संजीव सिंघल की फर्म को 'बेईमानीपूर्ण' तरीकों से कामकाज करने का आरोपी ठहरा चुके अमरजीत चोपड़ा ने संजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठाया । समझा जाता है कि अमरजीत चोपड़ा सिर्फ संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के प्रस्तावक ही नहीं हैं, बल्कि उनकी उम्मीदवारी के मुख्य रणनीतिकार भी हैं । अमरजीत चोपड़ा को चुनावी राजनीति का खासा लंबा अनुभव है । प्रेसीडेंट हो चुकने के बाद अधिकतर लोग जहाँ इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से किनारा कर लेते हैं, या वही लोग सक्रिय रहते हैं जिन्हें अपने बेटों को इंस्टीट्यूट की राजनीति में स्थापित करना होता है - वहाँ अमरजीत चोपड़ा अभी भी सक्रिय हैं और कई एक उम्मीदवारों की मदद करते देखे/सुने जा सकते हैं । इस कारण से माना/समझा जाता है कि अमरजीत चोपड़ा ने ही संजीव सिंघल को गुरूमंत्र दिया होगा कि उम्मीदवार के रूप में आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट यदि प्राप्त करने हैं, तो बिग फोर के उम्मीदवार की छवि से आजाद होना होगा - और लोगों के बीच एक आम प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में प्रस्तुत होना होगा । संजीव सिंघल ने पिछले दिनों अपनी पहचान को देशी रूप देने की बड़ी कोशिश की है, जिसके तहत वह हिंदी में भी मैसेज लिखने/भेजने लगे हैं, अचानक से वह कंपनी की बजाए आम लोगों की तरह बनी ईमेल आईडी इस्तेमाल करने लगे है, और अपने ऑफिशियल ठिकाने के रूप में उन्होंने ऑफिस की बजाए घर का पता दे दिया है । समझा जाता है कि यह आईडिया उन्हें अमरजीत चोपड़ा ने ही दिया होगा । आखिर यह करतब अमरजीत चोपड़ा ही कर और दिखा सकते हैं कि प्रेसीडेंट के रूप में जिस फर्म के खिलाफ उन्होंने कार्रवाई की वकालत की थी, उसी फर्म के पार्टनर के रूप में संजीव सिंघल को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश दिलवाने के लिए उन्होंने कमर कस ली है ।  
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इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रूप में अमरजीत चोपड़ा ने बिग फोर फर्म्स, और खासकर संजीव सिंघल की पार्टनरशिप फर्म के खिलाफ क्या कार्रवाई की थी और क्या कहा था, इसे लेकर एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के एक अंश का तथा एस गुरुमूर्ति के ट्विट का स्क्रीन शॉट :



Saturday, September 8, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में संजीव चौधरी की उम्मीदवारी की संभावना बनने के बावजूद संजीव सिंघल के नजदीकियों और समर्थकों का दावा है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी नहीं आ रही है, और यह बात जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगी

नई दिल्ली । संजीव चौधरी के सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की संभावना के फिर से बलबती होने के संकेतों ने संजीव सिंघल के लिए मुसीबत बढ़ा देने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी को लेकर अभी तक भी हाँ/न की स्थिति बनी हुई है । उनके नजदीकियों के लिए भी दावे के साथ यह बता पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही है कि वह सचमुच उम्मीदवार बनेंगे या नहीं; उनके नजदीकियों का कहना है कि संजीव चौधरी बड़े 'टफ' व्यक्ति हैं, और उनके मन की थाह लेना बड़ा मुश्किल काम है; उनके नजदीकियों को ही लगता है कि उनके दाएँ हाथ के लिए भी यह समझ पाना मुश्किल होता होगा कि उनका बायाँ हाथ क्या कर रहा है ? संजीव चौधरी के इसी रवैये के कारण सेंट्रल काउंसिल के लिए उनकी उम्मीदवारी एक पहेली बनी हुई है । चूँकि वह एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में अभी तक 'हाँ' की बजाये 'न' का पलड़ा भारी दिख रहा था; लेकिन अभी जिस तरह से इंस्टीट्यूट की बेवसाईट से उनकी तस्वीर छिपा दी गई है, उससे उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में 'हाँ' का पलड़ा अचानक से भारी हो उठा है । उल्लेखनीय है कि चुनावी आचार-संहिता का पालन करने के लिए इंस्टीट्यूट की बेवसाईट में पुनर्निर्वाचन के लिए चुनाव में जाने/उतरने वाले काउंसिल सदस्यों की तस्वीर को छिपा देने का चलन या नियम है । इसी के चलते इंस्टीट्यूट की बेवसाईट में उन काउंसिल सदस्यों की तस्वीरों को छिपा दिया गया है, जो सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए 'तैयारी' कर रहे हैं । छिपाई गई तस्वीरों में चूँकि संजीव चौधरी की भी तस्वीर है, इसलिए लोगों को विश्वास हो चला है कि संजीव चौधरी सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए उम्मीदवार हो रहे हैं ।
संजीव चौधरी के उम्मीदवार हो सकने की संभावना के जोर पकड़ने से संजीव सिंघल की हालत पतली होती दिख रही है । दरअसल दोनों संजीव बिग फोर के प्रतिनिधि के रूप में चुनावी परिदृश्य में हैं, लेकिन चुनावी परिदृश्य में माना/समझा जाता है कि बिग फोर के 'स्टाफ' में जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, वह सिर्फ एक को ही चुनाव जितवा सकते हैं । प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बिग फोर की पहचान एक 'दुश्मन' प्रतिद्धंद्धी जैसी है । इसीलिए बिग फोर के उम्मीदवार प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ज्यादा मुँह नहीं लगते हैं, और वह अपने 'स्टाफ' चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ही भरोसे रहते हैं । संजीव सिंघल बिग फोर के पहले ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्होंने प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए काफी सक्रियता दिखाई है । संजीव सिंघल को यह सब करने की जरूरत दरअसल इसीलिए पड़ी, क्योंकि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी के रहते/होते हुए सिर्फ बिग फोर के स्टाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के भरोसे तो उनका जीत पाना असंभव ही है । बिग फोर के स्टाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी संजीव चौधरी का ज्यादा प्रभाव माना/पहचाना जाता है । इसलिए बिग फोर के उम्मीदवार होने के बावजूद संजीव सिंघल ने प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहचान और प्रभाव बनाने का जोरदार प्रयास किया । संजीव सिंघल ने इसके लिए हर हथकंडा आजमाया । गिरीश आहुजा और इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा के साथ नजदीकी बनाने और उसे 'दिखा' कर भी संजीव सिंघल ने लोगों को भरमाने का प्रयास किया है - लेकिन उनके नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि इस तरह की तरकीबों से उन्हें कोई चुनावी फायदा होता हुआ अभी तक तो नहीं नजर आ रहा है ।
संजीव सिंघल तमाम प्रयास कर लेने के बावजूद प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं । असल में, अपने कई कार्यक्रमों में संजीव सिंघल को प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से बिग फोर की भूमिका को लेकर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा है - जिसके चलते किसी भी रूप में संजीव सिंघल के पक्ष में माहौल बनता हुआ नहीं दिख रहा है । ऐसे में उनके लिए एक अकेली उम्मीद यही है कि संजीव चौधरी उम्मीदवार न बनें - तो उनकी दाल गले । संजीव चौधरी लेकिन अपनी उम्मीदवारी को लेकर सस्पेंस बनाये हुए हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में बिग फोर की दिलचस्पी का अध्ययन करने वाले लोगों का मानना/कहना है कि संजीव चौधरी जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी पर सस्पेंस बना कर संजीव सिंघल को छका रहे हैं, उसके पीछे बिग फोर कंपनियों की आपसी उठा-पटक भी कारण हो सकती है । संजीव चौधरी का रवैया और संजीव सिंघल की प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहचान बनाने तथा समर्थन जुटाने की कोशिशों से लगता है कि बिग फोर में संजीव सिंघल के लिए हालात अनुकूल नहीं हैं । संजीव सिंघल के नजदीकियों और समर्थकों का भी मानना और कहना/बताना है कि संजीव चौधरी अपनी उम्मीदवारी को लेकर सस्पेंस सिर्फ इसलिए बनाये हुए हैं, ताकि वह संजीव सिंघल को अपनी 'पकड़' में लाने में कामयाब हो जाएँ; अन्यथा यह तय है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं हो रही है; नजदीकियों और समर्थकों का दावा है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी नहीं आ रही है, यह बात जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगी - और तब संजीव सिंघल के लिए अभी प्रतिकूल दिख रहे हालात अनुकूल हो जायेंगे ।

Sunday, July 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले संजीव सिंघल के 'चीयर लीडर' के रूप में दिख कर गिरीश आहुजा ने अपने प्रशंसकों को परेशान, निराश और नाराज किया हुआ है

नई दिल्ली । संजीव सिंघल के चक्कर में गिरीश आहुजा को हाल-फिलहाल के दिनों में नॉर्दर्न रीजन की कुछेक ब्रांचेज में जिस तरह से फजीहत का शिकार होना पड़ा है, उसके चलते उन्हें चाहने वालों को डर हो गया है कि अपनी चुनावी राजनीति के लिए संजीव सिंघल जिस तरह से गिरीश आहुजा को इस्तेमाल कर रहे हैं - उसके नतीजे के रूप में गिरीश आहुजा कहीं लोगों के बीच बने अपने मान-सम्मान से हाथ न धो बैठें । उल्लेखनीय है कि प्रोफेशन के लोगों के बीच गिरीश आहुजा का अच्छा प्रभाव है और लोग उन्हें बहुत आदर के साथ देखते/सुनते हैं । किसी सेमीनार में स्पीकर के रूप में उनकी उपस्थिति को सेमीनार की सफलता की गारंटी के रूप में देखा जाता है । किसी का सेमीनार कराने को 'धंधा' पिट रहा होता है या नहीं चल रहा होता है तो वह गिरीश आहुजा को स्पीकर के रूप में आमंत्रित कर लेता है और उसका धंधा चमक उठता है । गिरीश आहुजा की इस 'पहचान' का फायदा इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी समय समय पर उठाते रहते हैं; जिसके तहत वह प्रयास करते हैं कि सेमीनार की आड़ में होने वाली अपनी चुनावी सभा में वह गिरीश आहुजा को भी आमंत्रित कर लेते हैं । गिरीश आहुजा के नाम पर भीड़ जुट जाती है, और उनकी राजनीति हो जाती है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हुए संजीव सिंघल ने गिरीश आहुजा के 'महत्त्व' को समझा और पहले से ही उन्हें सेमीनार की आड़ में होने वाली अपनी चुनावी सभाओं के लिए 'बुक' कर लिया । इंस्टीट्यूट के चुनावी मौसम में प्रोफेशन के लोग गिरीश आहुजा को सक्रिय देखने के आदी भी हैं, इसलिए संजीव सिंघल के साथ उन्हें देख कर किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ । लेकिन संजीव सिंघल के मामले में गिरीश आहुजा के बदले बदले से रवैये ने लोगों को जरूर परेशान, निराश और नाराज किया है ।
गिरीश आहुजा दरअसल अभी तक सेमिनार के रूप में होने वाली चुनावी सभाओं में अपनी तरफ से यह गरिमा बना कर रखते थे कि वह किसी उम्मीदवार के लिए समर्थन नहीं माँगते थे । सेमीनार के नाम पर होने वाली चुनावी सभा में वह अप्रत्यक्ष रूप से 'भीड़ खेचूँ' का काम तो कर देते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी उम्मीदवार को वोट देने की या उम्मीदवार का ध्यान रखने की अपील लोगों से नहीं की । इस तरह गिरीश आहुजा ने हमेशा ही अपनी गरिमा बना कर रखी और लोगों से मिलने वाले सम्मान के प्रति सम्मान प्रकट किया । गिरीश आहुजा ने हमेशा ही इस बात को समझा और उसका सम्मान किया कि लोग उन्हें अपने विषय के एक एक्सपर्ट के रूप में सुनने के लिए आते हैं, किसी उम्मीदवार के 'चीयर लीडर' के रूप में उन्हें सुनने नहीं आते हैं । गिरीश आहुजा लेकिन संजीव सिंघल के मामले में अपनी गरिमा को छोड़ते हुए नजर आए हैं, और कुछेक जगह उन्होंने संजीव सिंघल के 'चीयर लीडर' की भूमिका निभाने का काम भी किया । गिरीश आहुजा के लिए बदकिस्मती की बात रही कि ऐसा करते हुए उन्हें प्रायः हर जगह विरोध और फजीहत का सामना करना पड़ा । एक ब्रांच के कार्यक्रम में गिरीश आहुजा ने जब संजीव सिंघल को वोट देने की अपील की, तो लोग भड़क उठे और उन्होंने यह कहते हुए गिरीश आहुजा को लताड़ने की कोशिश की कि आपकी बगल में हमारा भी एक (रीजनल काउंसिल का) उम्मीदवार बैठा है, और आप उसकी कोई बात नहीं कर रहे हैं, सिर्फ संजीव सिंघल की बात कर रहे हैं । लोगों के तीखे विरोध को देखते हुए गिरीश आहुजा को यह कहते हुए लोगों से माफी माँगनी पड़ी कि चूँकि मैं इन्हें जानता नहीं हूँ, इसलिए इनके बारे में मैंने कुछ नहीं कहा ।
गिरीश आहुजा ने जहाँ कहीं भी संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिशें कीं, प्रायः हर जगह कहीं गर्म रूप में तो कहीं नर्म रूप में उन्हें विरोध और फजीहत का ही सामना करना पड़ा है । प्रोफेशन के लोगों को दरअसल संजीव सिंघल के लिए गिरीश आहुजा का 'चीयर लीडर' बनना हजम नहीं हो रहा है । लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि संजीव सिंघल से गिरीश आहुजा को आखिर ऐसा कौन सा लाभ मिल रहा है या मिल सकेगा - जो उनके लिए वह 'चीयर लीडर' बनने को तैयार हो गए हैं, और प्रोफेशन के लोगों के बीच बने अपने सम्मान को भी दाँव पर लगाने के लिए तैयार हो गए हैं । मजे की बात है कि अभी तक इस बात को कोई ठोस आधार नहीं मिला है कि गिरीश आहुजा के साथ सेमीनार में हिस्सेदारी कर लेने से उम्मीदवार को वास्तव में कितना/क्या फायदा होता है; फायदे की बात अभी तक भी सिर्फ परसेप्शन पर ही आधारित है; क्योंकि इस बात के भी उदाहरण हैं कि गिरीश आहुजा के साथ सेमीनार में हिस्सेदारी करके गिरीश आहुजा को अपने समर्थन में 'दिखाने' वाले उम्मीदवार भी बस जैसे-तैसे करके ही चुनाव जीते हैं । लगता है कि संजीव सिंघल इसीलिए गिरीश आहुजा को सेमीनार में अपने साथ 'दिखाने' भर से ही संतुष्ट नहीं हैं और वह चाहते हैं तथा अपनी इसी चाहत में उन्होंने गिरीश आहुजा से 'चीयर लीडर' का काम भी करवा लिया है । संजीव सिंघल का 'स्वार्थ' तो हर किसी को समझ में आ रहा है, लेकिन हर किसी के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि गिरीश आहुजा के सामने आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ पड़ी है कि अपनी गरिमा और प्रोफेशन के लोगों के बीच अपने सम्मान की परवाह न करते हुए उन्होंने संजीव सिंघल के लिए 'चीयर लीडर' बनना स्वीकार कर लिया है ?

Wednesday, May 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के द्वारका स्टडी सर्किल में स्पीकर का पद 'बेचने' के आरोप के चलते स्टडी सर्किल, ब्रांचेज और रीजनल काउंसिल के सेमिनार्स में उम्मीदवारों को स्पीकर बनाने का 'धंधा' एक बार फिर प्रोफेशन के लोगों के बीच चर्चा में

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के द्वारका स्टडी सर्किल में पैसे लेकर संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को स्पीकर बनाए जाने के आरोप की इंस्टीट्यूट में शिकायत हो जाने से रीजनल काउंसिल, ब्रांचेज व स्टडी सर्किल द्वारा आयोजित कराये जाने वाले सेमिनार्स में पैसे लेकर उम्मीदवारों को स्पीकर बनाए जाने का आरोप एक बार फिर गर्माता हुआ दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के प्रत्येक चुनाव में यह आरोप जोरशोर से उठता है, और इसके चलते हर बार यह माँग उठती है कि चुनावी वर्ष में होने वाले सेमिनार्स में उन लोगों को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किए जाने पर रोक लगनी चाहिए, जिन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी हो । चुनाव के बाद लेकिन हर कोई इस माँग को भूल जाता है, और फिर मामला जहाँ का तहाँ ही बना रहता है । कई बार रीजनल काउंसिल, ब्रांचेज व स्टडी सर्किल के सदस्य सेमिनार्स में उम्मीदवारों को स्पीकर के रूप में बुलाये जाने का विरोध करते हैं, लेकिन सेमिनार्स के आयोजक उनकी सुनते ही नहीं हैं । लोगों का आरोप है कि उम्मीदवार आयोजकों पर तरह तरह से दबाव बना कर सेमिनार्स में अपने आपको आमंत्रित करने/करवाने के लिए 'मजबूर' कर ही लेते हैं । दरअसल उम्मीदवारों को लगता है कि सेमिनार्स में स्पीकर के रूप में शामिल होने से उन्हें लोगों तक पहुँचने का एक आसान और प्रभावी मौका मिल जाता है । वह अपनी उम्मीदवारी के प्रमोशन के लिए अपनी तरफ से मीटिंग या कार्यक्रम आयोजित करने के झँझट में पड़े, इसकी तुलना में सेमिनार्स में स्पीकर बन जाना उन्हें बढ़िया और 'सस्ता' सौदा लगता है । आरोप सुने जाते रहे हैं कि इसके लिए उम्मीदवार सेमिनार्स के आयोजकों की जेबें भी भरते हैं ।
अभी हाल ही में हुए सेमीनार में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किए जाने को लेकर द्वारका स्टडी सर्किल ऐसे ही आरोप के घेरे में आ फँसा है । इंस्टीट्यूट को लिखे/भेजे एक शिकायती पत्र में कहा/बताया गया है कि द्वारका स्टडी सर्किल के ही कुछेक लोगों ने संयोजक रतन सिंह यादव को समझाया था कि वह सेमीनार में स्पीकर के रूप में संजीव सिंघल और प्रमोद जैन को आमंत्रित न करें, क्योंकि उससे नाहक ही स्टडी सर्किल की बदनामी होगी । उन लोगों का कहना था कि बेशक संजीव सिंघल और प्रमोद जैन अपने अपने विषय के एक्सपर्ट हैं, लेकिन चूँकि उन्होंने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी घोषित की हुई है - इसलिए सेमीनार में स्पीकर के रूप में उन्हें बुलाने से विवाद होगा और इस विवाद से बचने के लिए स्पीकर के रूपमें ऐसे लोग आमंत्रित किये जाएँ जो इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सीधे सीधे हिस्सेदार नहीं हैं । शिकायती पत्र के अनुसार, लेकिन रतन सिंह यादव ने किसी की नहीं सुनी और मनमाने तरीके से संजीव सिंघल व प्रमोद जैन को स्पीकर के रूप में आमंत्रित करने के अपने फैसले पर वह अड़े रहे । मजे की बात यह रही कि सेमीनार में शामिल होने आये लोगों ने भी रतन सिंह यादव से कहा कि स्पीकर बनाये जाने के ऐवज में तुमने जब संजीव सिंघल और प्रमोद जैन से पैसे लिए ही हैं, तो सेमीनार फीस के रूप में प्रत्येक से छह सौ रुपए क्यों ले रहे हो ? कार्यक्रम के दौरान होने वाली इस तरह की चर्चाओं को रतन सिंह यादव ने अनसुना करने में ही भलाई देखी और कार्यक्रम के दौरान इस मामले में वह लगातार चुप ही बने रहे ।
कार्यक्रम के दौरान होने वाली चर्चाओं को तो रतन सिंह यादव ने अनसुना कर दिया, लेकिन इस संबंध में इंस्टीट्यूट में की गई शिकायत से मामला गर्म हो गया है । शिकायत में माँग की गई है कि द्वारका स्टडी सर्किल की जिम्मेदारी रतन सिंह यादव से वापस ली जाए और यह सुनिश्चित किया जाये कि आगे किसी सेमीनार में किसी उम्मीदवार को स्पीकर के रूप में नहीं बुलाया जायेगा । रतन सिंह यादव के प्रति-आरोपों ने भी मामले को गर्माने में मदद की । उनकी तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी घोषित करने वाले कुछेक उम्मीदवार उनके पीछे पड़े हुए थे कि वह उन्हें स्पीकर बनाएँ, और चूँकि उन्हें स्पीकर बनने का मौका नहीं मिला - इसलिए वही लोग अब इस तरह के आरोप लगा कर उन्हें बदनाम करने का काम कर रहे हैं । उनकी इस सफाई से लोगों के बीच यह चर्चा और छिड़ गई है कि रतन सिंह यादव ने स्पीकर बनने के लिए उनके पीछे पड़े उम्मीदवारों को स्पीकर न बना कर संजीव सिंघल व प्रमोद जैन को ही स्पीकर आखिर क्यों बनाया ? लोग यह भी माँग कर रहे हैं कि रतन सिंह यादव को उन उम्मीदवारों के नाम भी बताना चाहिए, जो सेमीनार में स्पीकर बनने के लिए उनके पीछे पड़े थे । द्वारका स्टडी सर्किल के सेमीनार को लेकर छिड़े विवाद के संदर्भ में कई लोगों का यह भी मानना/कहना है कि यह सिर्फ इसी स्टडी सर्किल की बात नहीं है, कई स्टडी सर्किल और ब्रांचेज के पदाधिकारी तथा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी तक उम्मीदवारों को स्पीकर बनाने के 'धंधे' में लगे हुए हैं, और इंस्टीट्यूट को इस धंधे को रोकने के लिए जल्दी ही कुछ नियम बनाने चाहिएँ ।

Tuesday, April 17, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए ब्रांचेज के पदाधिकारियों व सदस्यों को काम दिलवाने का ऑफर देकर अपना समर्थक बनाने की संजीव सिंघल की कोशिशों ने आरोपों का रूप लिया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की कुछेक ब्रांचेज के पदाधिकारियों के संजीव सिंघल पर काम दिलवाने का आश्वासन देकर सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश करने के आरोप ने इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को मुश्किल में डाल दिया है । दरअसल उनके लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि एक संभावित उम्मीदवार के खिलाफ लगने वाले इस आरोप पर वह क्या और कैसे कार्रवाई करें ? हालाँकि आरोप की जो प्रकृति है, उसमें कोई नई बात नहीं है । इंस्टीट्यूट के चुनाव में कुछेक उम्मीदवार अपने लिए समर्थन जुटाने हेतु चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम देते/दिलवाते रहे हैं । फिर भी संजीव सिंघल पर लगे इस तरह के आरोप ने खासी खलबली मचाई हुई है और इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों तक को माथापच्ची करना पड़ रही है, तो इसका कारण शायद यही है कि संजीव सिंघल ने इस खेल को बड़े स्तर पर अंजाम देने की कोशिश की है और उनकी इस कोशिश से अन्य कुछेक उम्मीदवारों को अपने लिए खतरा महसूस होने लगा है । संजीव सिंघल बहुराष्ट्रीय फर्म ईवाय ग्लोबल की भारतीय सदस्य एसआर बाटलीबोई एंड कंपनी में पार्टनर हैं, जिस नाते चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को काम दिलवाने के मामले में वह बेहतर स्थिति में हैं । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए संजीव सिंघल ने तैयारी भी बड़े जोरशोर से शुरू की है, और इसीलिए एक उम्मीदवार के रूप में उनकी चुनावी सक्रियता पर हर किसी की सतर्क नजर है । 
संजीव सिंघल के लिए उम्मीदवार के रूप में समस्या और चुनौती की बात यह है कि बिग फोर के नाम पर संजीव चौधरी पहले से ही सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में चुनावी मैदान में हैं । संजीव चौधरी की सीट को अधिकतर लोग सुरक्षित ही मानते/समझते हैं; और साथ ही यह भी मानते/कहते हैं कि बिग फोर से एक ही उम्मीदवार सेंट्रल काउंसिल में आ सकेगा । बिग फोर के उम्मीदवारों के साथ मुसीबत की बात यह होती है कि उन्हें आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोट नहीं मिल पाते हैं, और उन्हें पूरी तरह फर्म के वोटों पर ही निर्भर होना/रहना पड़ता है । फर्म के वोटों पर संजीव चौधरी की दावेदारी ज्यादा मजबूत देखी जा रही है । यूँ भी नॉर्दर्न रीजन ईवाय के उम्मीदवारों के लिए मुफीद नहीं रहा है । ऐसे में संजीव सिंघल को कई प्रतिकूल अवधारणाओं का भी मुकाबला करना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि चुनावी राजनीति में हकीकतों/तथ्यों का उतना प्रभाव नहीं पड़ता है, जितना अवधारणा (परसेप्शन) का पड़ता है । बिग फोर के उम्मीदवारों को लेकर लोगों के बीच जो और जैसी भी अवधारणाएँ हैं, वह सब संजीव सिंघल के खिलाफ माहौल बनाती हैं । इसलिए ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर संजीव सिंघल के लिए एक आक्रामक चुनावी रणनीति और 'सीन' बनाने की जरूरत थी भी, और जिसे उन्होंने बनाया भी ।
आक्रामक चुनावी रणनीति के तहत ही संजीव सिंघल ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की ब्रांचेज के पदाधिकारियों पर डोरे डालने शुरू किए, जिसका फायदा उन्हें कुछेक ब्रांचेज में सेमीनार आदि में स्पीकर के निमंत्रण के रूप में मिला भी है । इसे उनकी आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पैठ बनाने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना गया । उनकी इसी कोशिश में यह सुनने को मिला कि उन्होंने ब्रांचेज के पदाधिकारियों को कुछ काम/वाम दिलवाने के ऑफर दिए हैं । इस पर लोगों के कान खड़े हुए तो आरोप सामने आए कि ब्रांचेज के पदाधिकारियों तथा अन्य सदस्यों को काम दिलवाने का लालच देकर संजीव सिंघल उन्हें अपने समर्थक बनाने का प्रयास कर रहे हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने दूसरे लोगों को अपने समर्थक जब संजीव सिंघल के नजदीक जाते दिखे, तो उनका माथा गर्म हुआ और उन्होंने संजीव सिंघल पर लगने वाले आरोपों को हवा देने का काम शुरू किया और आरोपों को इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों तक पहुँचाया । जैसा कि शुरू में ही कहा गया है कि इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों के लिए समझना मुश्किल हो रहा है कि इन आरोपों पर वह कैसी और क्या कार्रवाई करें ? इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों की यह असमंजसता संजीव सिंघल के लिए राहत की बात तो है, लेकिन उन पर लगे आरोपों के चलते उनकी चुनावी रणनीति की जो पोल खुली है - वह उनकी मुसीबत बढ़ाने वाली भी है ।