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Sunday, December 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं - और यही बात प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के लिए खतरे की घंटी बजाती है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चॉर्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए हुए चुनाव में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला फैसला संजय वासुदेवा की पराजय का रहा । हालाँकि सेंट्रल रीजन में मुकेश कुशवाह, वेस्टर्न रीजन में मंगेश किनरे, और नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के साथ-साथ विजय गुप्ता भी सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा पाने में नाकाम रहे हैं - लेकिन संजय वासुदेवा की पराजय ने हर किसी को आश्चर्य में डाला है । दरअसल नॉर्दर्न रीजन में संजय वासुदेवा के पिता एससी वासुदेवा का खासा नाम है । उनके पिता द्वारा स्थापित फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी को प्रोफेशन में बिग फोर फर्म्स जैसी 'हैसियत' प्राप्त है, और पूरे रीजन के हर प्रमुख शहर में उनके लाभार्थियों की अच्छी-खासी संख्या मौजूद है । एससी वासुदेवा चूँकि खुद भी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं, और सेंट्रल काउंसिल में सदस्य भी रहे हैं - इसलिए उनकी प्रोफेशनल हैसियत का एक राजनीतिक आयाम भी रहा है; जिसका फायदा संजय वासुदेवा को पिछले चुनाव में मिला था । सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में संजय वासुदेवा का रिकॉर्ड कोई बहुत सक्रियता भरा तो नहीं रहा, लेकिन उनके खिलाफ कहीं कोई आवाज भी नहीं पैदा हुई - इसलिए माना/समझा जा रहा था कि वह अपनी सीट आसानी से बचा लेंगे । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खानदानी परंपरा का सम्मान करने का रिवाज चूँकि है, जिसके चलते नवीन गुप्ता और नीलेश विकमसे जैसे लोग भी चुनाव जीतते गए और प्रेसीडेंट तक बन गए; और जिस रिवाज के चलते अभी संपन्न हुए चुनाव में वेस्टर्न रीजन में अनिकेत तलति तक सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीत गए - उसी रिवाज के भरोसे संजय वासुदेवा के भी जीतने का विश्वास सभी को था । संजय वासुदेवा की चुनावी स्थिति को फायदा पहुँचाने वाली एक बड़ी बात इसी वर्ष अप्रैल में यह हुई थी कि उनकी फर्म एससी वासुदेवा एंड कंपनी तथा एक और बड़ी फर्म एसपी पुरी एंड कंपनी का विलय हुआ था, जिसके चलते माना/समझा जा रहा था कि संजय वासुदेवा की राजनीतिक ताकत और बढ़ी है । लेकिन फिर भी संजय वासुदेवा हार गए । वैसे संजय वासुदेवा यदि जीत जाते तो सेंट्रल काउंसिल में एक दिलचस्प नजारा यह बनता कि चरनजोत सिंह नंदा तथा अनुज गोयल को ऐसे सदस्यों के रूप में पहचान मिलती जिन्होंने पिता एससी वासुदेवा के साथ 19वीं काउंसिल में संगत की थी और अब 24वीं काउंसिल में पुत्र संजय वासुदेवा के साथ वह संगत करते ।
'जो जीता वह सिकंदर, बाकी सब बंदर' की तर्ज पर जीतने वालों को बड़ा जेनुइन व काबिल तथा हारने वालों को बेईमान व नाकारा मानने/बताने की सड़कछाप प्रवृत्ति की बजाये यदि गंभीरता के साथ चुनावी नतीजों का विश्लेषण करें, तो प्राप्त चुनावी नतीजे कोई 'पैटर्न' नहीं पेश करते हैं । चुनावी नतीजों में एक तरफ यदि हंसराज चुग, प्रमोद जैन, प्रमोद बूब, श्रीनिवास जोशी जैसे जेनुइन किस्म के लोगों को जीत प्राप्त हुई है; तो दूसरी तरफ राजेश शर्मा, चरनजोत सिंह नंदा, अनुज गोयल, धीरज खंडेलवाल जैसे प्रोफेशन के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग भी जीत गए हैं । सेंट्रल काउंसिल का यह परिदृश्य संसद के उस परिदृश्य की याद दिलवाता है, जिसमें अटलबिहारी वाजपेयी के साथ फूलन देवी भी होती है । संसदीय चुनावों के मतदाताओं के बारे में कहा/माना जाता है कि उनमें बहुत से लोग अनपढ़ व भावुक व लालची होते हैं, जिसका फायदा फूलन देवी जैसे लोग उठा लेते हैं; लेकिन इंस्टीट्यूट के चुनावों के मतदाता तो पढ़े-लिखे जागरुक लोग होते हैं तथा प्रोफेशन में होने वाली ऊँच/नीच और काउंसिल सदस्यों की क्षमताओं व उनकी कारस्तानियों को नजदीक से देखते/पहचानते रहते हैं - फिर भी वह फूलन देवी किस्म के उम्मीदवारों को क्यों चुन लेते हैं ? इस 'क्यों' का जबाव मिलना आसान नहीं है, लेकिन फिर भी यह 'क्यों' इंस्टीट्यूट के सदस्य चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की समझ व जागरुकता तथा प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है । यह ठीक है कि किसी भी चुनाव में मतदाताओं को प्रायः 'बुरे' और 'कम बुरे' में से ही चुनने का विकल्प मिलता है; और 'कम बुरे' की तुलना में 'बुरे' उम्मीदवार मतदाताओं की आँखों में धूल झोंकने में ज्यादा होशियार साबित होते हैं - लेकिन ऐसी ही होशयारियों के बीच मतदाताओं के विवेक और उनकी समझदारी की परीक्षा होती है । ऐसे में, माना/कहा जा सकता है कि प्रोफेशन के लोग यदि संजय वासुदेवा की बजाये राजेश शर्मा व चरनजोत सिंह नंदा जैसे लोगों को तरजीह देते हैं, तो प्रोफेशन की विश्वसनीयता व प्रतिष्ठा को बनाये/बचाये रखने का काम ईश्वर भी नहीं कर सकेगा - क्योंकि माना/कहा जाता है कि ईश्वर भी उन्हीं को बचाने में मदद करता है, जो खुद को बचाने का प्रयास करते हैं ।
सेंट्रल काउंसिल के चुनावी नतीजे कुछ महत्त्वपूर्ण सबक भी देते हैं । संजय वासुदेवा की पराजय में उनके अति-आत्मविश्वास का भी योगदान है । चुनावी राजनीति में मतदाता के पास जाने के काम को एक बहुत जरूरी काम के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जिस पर संजय वासुदेवा ने ध्यान नहीं दिया । दूसरों की तरह वह भी इस भरोसे रहे कि उनके पिता और उनकी फर्म का जो आभामंडल है, वही उन्हें चुनाव जितवा देगा - और धोखा खा बैठे । चुनाव को चुनौती की तरह लेने का काम सिर्फ दो लोगों ने किया - संजीव सिंघल और हंसराज चुग ने; और दोनों को अच्छे/खासे वोट मिले । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों को भी इतनी बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं थी - यदि होती तो उनके एक बड़े समर्थक के रूप में गिरीश आहुजा जैसे बड़े व्यक्ति को छोटी छोटी जगहों पर भी अपनी फजीहत नहीं कराना पड़ती । संजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जिस तरह से हर हथकंडा अपनाया, उसका उन्हें अच्छा सुफल भी मिला । हंसराज चुग के साथ कोई बड़ा नाम तो नहीं था, लेकिन छोटे छोटे ग्रुपों और नेताओं के बीच प्रभावी तालमेल बना कर उन्होंने अपने चुनाव अभियान को जिस तरह से संयोजित किया, उससे लगा कि उन्होंने हर चुनावी जरूरत का ध्यान रखा और खतरे वाली हर जगह पर ध्यान दिया और वहाँ हालात को साधने की कोशिश की - और अच्छा नतीजा पाया । संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता की सीट को भी कोई खतरा नहीं समझा/पहचाना जा रहा था, लेकिन संजय वासुदेवा की तरह अतुल गुप्ता अति-आत्मविश्वास का शिकार नहीं हुए । अतुल गुप्ता को जो झटके लग रहे थे, वह उन्हें कोई बड़ा नुकसान पहुँचाते हुए नहीं दिख रहे थे, लेकिन फिर भी उन्होंने झटकों से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के पुरजोर इंतजाम किए और जिनके चलते वह अपनी सीट बचा सकने में सफल रहे । विजय गुप्ता ने संजय वासुदेवा जैसी लापरवाही तो नहीं दिखाई, किंतु अतुल गुप्ता जैसी होशियारी भी वह नहीं दिखा सके; उन्होंने बँधे/बँधाये फार्मूले पर काम किया, जिसके तहत वह चुनाव से कुछ पहले सक्रिय हुए और उसमें भी उन्होंने खतरे वाली जगहों को पहचानने की जरूरत नहीं समझी - हंसराज चुग, प्रमोद जैन, सुधीर अग्रवाल की तरफ से मिलने वाली चुनौती को समझने/पहचानने में वह चूक कर बैठे और अपनी सीट गँवा बैठे । चुनावी नतीजों ने यह बात भी स्पष्ट कर दी है कि सिर्फ ज्ञान बाँट कर और या सिर्फ पार्टियाँ आयोजित करके ही चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं, जो लोग इन दोनों चीजों में बेहतर तालमेल बनायेंगे - जीत उन्हीं को मिलेगी ।

Thursday, October 4, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के कारण वेस्टर्न रीजन में सुनील तलति के प्रभाव और उनकी अपील के कमजोर पड़ने का नुकसान अहमदाबाद में पुरुषोत्तम खंडेलवाल से आगे रहने की अनिकेत तलति की कोशिशों को सचमुच फेल करेगा क्या ?

अहमदाबाद । पराग रावल के ऐन मौके पर सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी से पीछे हटने ने अहमदाबाद में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में भारी उलटफेर कर दिया है, और बाकी दोनों उम्मीदवारों - पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति तथा उनके समर्थकों के लिए यह समझना मुश्किल कर दिया है कि इससे उन्हें फायदा हुआ है या नुकसान ! मजे की बात यह है कि इस मामले में परस्पर विरोधी बातें देखने/सुनने  में आ रही हैं - कुछ लोगों को लगता है कि पराग रावल के उम्मीदवार न रहने से उन्हें मिलने वाले वोट अब पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति में बटेंगे और इस तरह दोनों के लिए फायदे की स्थिति बनी है; लेकिन अन्य कई लोगों का मानना/कहना है कि पराग रावल की उम्मीदवारी के न रहने से अहमदाबाद और आसपास के शहरों में चुनावी गर्मी कम रहेगी, जिस कारण वोट कम पड़ेंगे और यह अहमदाबाद के दोनों उम्मीदवारों के लिए चिंता की बात होगी । अहमदाबाद - और अहमदाबाद क्या गैर-मुंबई के उम्मीदवारों के लिए दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाना मुश्किल होता है, जिसका नतीजा पिछली बार यह देखने को मिला था कि पहली वरीयता में 2322 वोट के साथ 6ठे नंबर पर रहने के बावजूद पराग रावल ग्यारह विजेताओं की सूची में नहीं आ सके थे । इस बार उम्मीदवार भी कम हैं, जिसके चलते मुकाबला - खासकर गैर-मुंबई उम्मीदवारों के लिए और मुश्किल होगा । पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अनिकेत तलति के बीच आगे रहने की होड़ भी चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बनायेगी । माना/समझा जा रहा है कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में इनमें से जो पीछे रह जायेगा, उसके लिए फिर मुकाबले में बचे/बने रहना मुश्किल ही नहीं - बल्कि असंभव ही होगा ।
इसी आकलन के चलते अनिकेत तलति के लिए चुनाव को मुश्किल और चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है । उनकी तरफ से हालाँकि उनके पिता, इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति ने चुनावी मोर्चा संभाला हुआ है, लेकिन अभी तक के अनुभव के आधार पर सुनील तलति की सक्रियता को भी अनिकेत तलति के लिए बहुत आश्वस्तकारी नहीं माना जा रहा है । दरअसल अभी तक के चुनावों में, चाहें अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव रहे हों और या वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का पिछली बार का चुनाव रहा हो, अनिकेत तलति को हर चुनाव में अपने पिता सुनील तलति का सक्रिय समर्थन मिला है - लेकिन फिर भी हर चुनाव में उन्हें पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे ही रहना पड़ा है । पिछली बार रीजनल काउंसिल की अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की नाव को किनारे लगाने के लिए सुनील तलति ने खुद तो पूरा दमखम लगाया हुआ ही था, साथ ही उनके द्वारा सेंट्रल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवार अनिल भंडारी के साथ ऐसा चुनावी समझौता करने की चर्चा भी थी - जिसके तहत अनिल भंडारी ने रीजनल काउंसिल के लिए अनिकेत तलति को वोट दिलवाए थे, और तलति पिता-पुत्र ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अनिल भंडारी को वोट दिलवाए थे । इतनी सब जुगाड़बाजी के बावजूद अनिकेत तलति को पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे रहना पड़ा था । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में पुरुषोत्तम खंडेलवाल 1728 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे, जबकि अनिकेत तलति को 1469 वोटों के साथ छठा नंबर मिला था । अहमदाबाद ब्रांच से लेकर रीजनल काउंसिल के चुनाव तक चूँकि पुरुषोत्तम खंडेलवाल हमेशा ही अनिकेत तलति से आगे रहे हैं, इसलिए अनिकेत तलति के समर्थकों व शुभचिंतकों को डर है कि पीछे रहने का यह रिकॉर्ड अनिकेत तलति ने यदि आगामी दिसंबर में हो रहे सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी 'बनाया' - तो फिर उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को सफल बनाने की बात को भूल ही जाना चाहिए ।
पुरुषोत्तम खंडेलवाल के लिए भी चुनौतियाँ और मुश्किलें हालाँकि कम नहीं हैं । दरअसल सेंट्रल काउंसिल के चुनाव की एक अलग ही केमिस्ट्री और गणित होता है । पुरुषोत्तम खंडेलवाल अहमदाबाद में सुनील तलति विरोधी खेमे के भरोसे हैं, जिनका प्रतिनिधित्व अभी दीनल शाह कर रहे हैं । दीनल शाह लेकिन सेंट्रल काउंसिल के लिए मुंबई की उम्मीदवार श्रुति शाह का समर्थन करते सुने जा रहे हैं । दीनल शाह की नजदीकी रिश्तेदार श्रुति शाह की लेकिन चूँकि अहमदाबाद में ज्यादा सक्रियता नहीं है, इसलिए दीनल शाह के सक्रिय समर्थन के बावजूद श्रुति शाह को यहाँ खास समर्थन मिलने की उम्मीद तो नहीं है - लेकिन उन्हें जो भी समर्थन मिलेगा, वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल के वोटों को ही घटाने का काम करेगा । पुरुषोत्तम खंडेलवाल के साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि उनके साथ किसी बड़े नेता का नाम नहीं जुड़ा है - यानि उनका कोई गॉडफादर नहीं है । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में गॉडफादर कोई व्यावहारिक फायदा तो नहीं दिलवाता है, लेकिन लोगों के बीच मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने और माहौल बनाने का काम जरूर करता है । ऐसे में, पुरुषोत्तम खंडेलवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को इस आधार पर ही उम्मीद दिखाई दे रही है कि अनिकेत तलति के फादर भले ही उनके चुनावी गॉडफादर भी बने हुए हैं - लेकिन चूँकि अभी तक वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे ही रहते आए हैं, तो इस बार भी उनसे कोई बड़े चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती है । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी से भी पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मनोवैज्ञनिक फायदा मिलता नजर आ रहा है । दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी पूर्व प्रेसीडेंट के रूप में सुनील तलति के ऑरा और प्रभाव को कम करने का काम करती है । प्रफुल्ल छाजेड़ यदि वाइस प्रेसीडेंट नहीं होते, तो उनके मुकाबले सुनील तलति का पलड़ा भारी रहता । लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बनने जा रहे प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार होते हुए कोई भी पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति की अपील को भला क्यों तवज्जो देगा ? प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के कारण सुनील तलति के प्रभाव और उनकी अपील के कमजोर पड़ने का सीधा फायदा पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है ।
चुनावी लड़ाई में यह सब बातें तो किताबी बातें हैं, जो महौल को बनाने/बिगाड़ने का काम जरूर करती हैं - लेकिन चुनावी लड़ाई का नतीजा वास्तव में इस बात पर निर्भर करता है कि इन किताबी बातों को कौन कितने प्रभावी तरीके से इस्तेमाल कर पाता है - या नहीं कर पाता है । इसलिए अहमदाबाद में पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अनिकेत तलति के बीच इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाले मुकाबले का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन अपने चुनाव अभियान को कैसे संयोजित करता है और चुनाव के दिन तक उसे कैसे आगे बढ़ाता है ।

Friday, May 25, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति द्वारा कमान संभाल लेने के बाद भी उनके बेटे अनिकेत तलति के लिए वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल तथा पुरुषोत्तम खंडेलवाल से आगे हो पाना संभव होगा क्या ?

अहमदाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कमान उनके पिता और इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति द्वारा संभाल लिए जाने से अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । अहमदाबाद में सेंट्रल काउंसिल के लिए पराग रावल तथा पुरुषोत्तम खंडेलवाल की भी उम्मीदवारी की चर्चा है । पराग रावल ने पिछली बार भी सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा था और पहली वरीयता में 2322 वोट के साथ 6ठे नंबर पर रहने के बावजूद वह ग्यारह विजेताओं की सूची में नहीं आ सके थे । पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था, जिसमें पहली वरीयता में 1728 वोटों के साथ वह तीसरे नंबर पर रहे थे । पिछली बार अनिकेत तलति ने भी रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 1469 वोटों के साथ वह छठे नंबर पर रहे थे । उससे पहले, अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव में भी अनिकेत तलति की स्थिति पुरुषोत्तम खंडेलवाल की तुलना में बहुत ही पतली थी । इन तथ्यों की रोशनी में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे तीनों उम्मीदवारों में अनिकेत तलति को तीसरे नंबर पर देखा/पहचाना जा रहा है । अनिकेत तलति के लिए यह बड़ी खतरनाक और चुनौतीपूर्ण स्थिति है । दरअसल आकलन यह किया जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए वह उम्मीदवार कामयाब होगा, जो अपने आप को पहले 'बाहर होने' से बचा ले सकेगा । अहमदाबाद के उम्मीदवारों को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट भी अहमदाबाद में ही मिलने की उम्मीद है, इसलिए अहमदाबाद के तीनों उम्मीदवारों में जो पिछड़ा हुआ रहेगा - उसके लिए मुकाबले में बने रह पाना मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । सुनील तलति को अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की कमान अभी से संभालने की जरूरत दरअसल इसीलिए पड़ी है, ताकि अहमदाबाद के तीन उम्मीदवारों में तीसरी समझी/पहचानी जा रही अनिकेत तलति की स्थिति को वह सुधार कर बेहतर बना सकें ।
उल्लेखनीय है कि पिछली बार, रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को भी कमजोर देखा/समझा जा रहा था - लेकिन सुनील तलति जब उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले, तो अनिकेत तलति की चुनावी नैय्या पार लग ही गई । पिताजी की मदद से अनिकेत तलति ने चुनाव तो जीत लिया, लेकिन अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव में पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पिछड़ने की जो स्थिति बनी हुई थी - वह रीजनल काउंसिल के चुनाव में भी बनी रही । एक और तथ्य पर गौर करना प्रासंगिक होगा । पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में, इंस्टीट्यूट के तीन पूर्व प्रेसीडेंट्स के बेटा/बेटी उम्मीदवार थे - सुश्रुत चिताले, दृष्टि देसाई और अनिकेत तलति; इनमें अनिकेत तलति ही सबसे पीछे रहे । इसका एक बड़ा और प्रमुख कारण हालाँकि उनका अहमदाबाद - या मुंबई से बाहर का होना भी है । इंस्टीट्यूट के चुनाव में मुंबई के उम्मीदवारों की तुलना में मुंबई से बाहर के उम्मीदवारों के लिए मुसीबत या चुनौती अपेक्षाकृत बड़ी होती है । हालाँकि इसके बावजूद, पहले पराग रावल ने और फिर पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने रीजनल काउंसिल में अनिकेत तलति और मुंबई के अधिकतर उम्मीदवारों की तुलना में बेहतर परफॉर्म किया ही है । पिछली से भी पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल सबसे ज्यादा वोट पाकर पहले नंबर पर रहे थे । इसलिए अनिकेत तलति अहमदाबाद - या मुंबई के बाहर के होने का एक्सक्यूज नहीं ले सकते हैं । जाहिर है कि अनिकेत तलति पर दोहरा दबाव है । इस दोहरे दबाव से ही उन्हें मुक्त कराने के लिए उनके पिताजी ने अब मोर्चा संभाल लिया है ।
सुनील तलति के मोर्चा संभालने पर अनिकेत तलति की बनने वाली स्थिति को लेकर लोगों की राय लेकिन बँटी हुई है । कुछ लोगों को लगता है कि सुनील तलति के मोर्चा संभालने से अनिकेत तलति की स्थिति में सुधार होगा, लेकिन कई लोगों को लगता है कि अहमदाबाद ब्रांच तथा रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनिकेत तलति को अपने पिता की सक्रियता से भले ही लाभ हुआ हो, लेकिन सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में चूँकि एक अलग ही केमिस्ट्री चलती है - इसलिए पिता की सक्रियता यहाँ उनके काम नहीं आने वाली है । सुनील तलति के बेटे होने की पहचान रखने तथा उनके सक्रिय समर्थन के चलते अनिकेत तलति ब्रांच और रीजनल काउंसिल के चुनाव जीतने में कामयाब भले ही हुए हों, लेकिन वह कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सके हैं । उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि अहमदाबाद में ही उन्हें जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, उनसे निपट पाना ही उनके लिए मुश्किल बना रहा है । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में उनके लिए यह चुनौती और भी बड़ी है । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में वह यदि अब की बार भी पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे रह गए, तो फिर उनका जीत पाना मुश्किल क्या असंभव ही होगा । इस खतरे को जानते/पहचानते हुए ही सुनील तलति ने अनिकेत तलति के चुनाव की बागडोर अभी से संभाल ली है । सुनील तलति के सक्रिय होने से अनिकेत तलति को फायदा होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन यह जरूर हुआ है कि अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट का चुनावी परिदृश्य रोचक हो उठा है ।