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Monday, January 6, 2020

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी के अभियान को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अश्वनी काम्बोज से मिले झटके से नाराज हुए पंकज बिजल्वान के नजदीकियों ने अश्वनी काम्बोज को क्लब से निकालने की माँग करके डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक परिदृश्य में गर्मी पैदा की तथा उसे और दिलचस्प बनाया  

देहरादून । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने और 'दिखाने' के उद्देश्य से पंकज बिजल्वान द्वारा मेरठ में आयोजित की गई मीटिंग में न पहुँच कर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अश्वनी काम्बोज ने एक बार फिर पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी के प्रचार अभियान को झटका दे दिया है । पंकज बिजल्वान के नजदीकियों व समर्थकों के बीच अश्वनी काम्बोज के इस रवैये को लेकर गहरी नाराजगी पैदा हुई है और उन्होंने अश्वनी काम्बोज को क्लब से निकालने की माँग करना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि दोनों एक ही क्लब के सदस्य हैं; पंकज बिजल्वान के नजदीकियों व समर्थकों का कहना है कि अश्वनी काम्बोज यदि अपने ही क्लब के उम्मीदवार के समर्थन में खड़े नहीं हो सकते हैं तो उन्हें क्लब में रहने/रखने का अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत क्लब से निकाल देना चाहिए । दरअसल मेरठ में हुई मीटिंग में अश्वनी काम्बोज की उपस्थिति को लेकर पंकज बिजल्वान तथा उनके समर्थकों को खासी उम्मीद थी; उन्हें इसकी जरूरत भी थी । पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी का अभियान जिस तरह की ढीलमढाल, अराजकता और असफलता का शिकार हुआ पड़ा है, उसमें अश्वनी काम्बोज के सहारे जान फूँकने की कोशिश की गई थी । पंकज बिजल्वान तथा उनके समर्थकों को विश्वास रहा कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अश्वनी काम्बोज उनकी मीटिंग में उपस्थित 'दिखेंगे', तो उनकी उम्मीदवारी के अभियान में कुछ जान पड़ेगी - लेकिन अश्वनी काम्बोज ने उनके विश्वास को धूल चटा दी ।
अश्वनी काम्बोज के नजदीकियों का कहना लेकिन यह है कि अश्वनी काम्बोज को अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डिस्ट्रिक्ट के सभी आम और खास लायन सदस्यों का सहयोग चाहिए होगा, इसलिए वह इस बार के चुनाव में तटस्थ रहना और 'दिखना' चाहते हैं - ताकि चुनावी चक्कर में वह एक पक्ष के आम व खास लोगों का सहयोग/समर्थन खो न दें । अश्वनी काम्बोज के इन्हीं नजदीकियों का कहना/बताना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अश्वनी काम्बोज ने कुछ बड़ा व महत्त्वपूर्ण काम करने का निश्चय किया हुआ है और अपने गवर्नर-वर्ष में वह कुछेक बड़े प्रोजेक्ट करना चाहते हैं; स्वाभाविक रूप से इसके लिए उन्हें सभी का सहयोग/समर्थन चाहिए होगा; उन्हें लेकिन डर यह है कि वह यदि चुनावी चक्कर में पड़े तो अपने गवर्नर-वर्ष की योजनाओं को पूरा करने का मौका खो देंगे - और इसीलिए उन्होंने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से अपने आप को दूर रखने का फैसला किया हुआ है और यही कारण है कि वह मेरठ में हुई पंकज बिजल्वान की मीटिंग में नहीं पहुँचे । कई लोगों को लेकिन यह भी लगता है कि अश्वनी काम्बोज को चूँकि समझ में आ गया है कि पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी के सफल होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने आप को पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी के अभियान से दूर कर लिया है । अश्वनी काम्बोज नहीं चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में लोगों को कहने का मौका मिले कि अश्वनी काम्बोज के समर्थन के बावजूद पंकज बिजल्वान चुनाव हार गए - अश्वनी काम्बोज को लगता है कि इससे उनकी फजीहत ही होगी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं लेगा तथा उनसे सहयोग नहीं करेगा । इसलिए उन्होंने पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी के प्रचार अभियान से दूरी बना लेने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी है ।
मेरठ मीटिंग को लेकर पंकज बिजल्वान के लिए मुसीबत तथा फजीहत की बात यह भी रही कि उनके समर्थकों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे देहरादून के पूर्व गवर्नर्स सुनील जैन तथा अनीता गुप्ता भी मीटिंग में नहीं पहुँचे । पिछले दिनों अचानक से प्रस्तुत हुई मुकुल अग्रवाल की उम्मीदवारी का सुनील जैन ने जिस तत्परता से समर्थन करने की घोषणा की थी, उससे ही लग गया था कि पंकज बिजल्वान का समर्थन वह मजबूरी में ही कर रहे थे । पंकज बिजल्वान के समर्थकों का हालाँकि कहना है कि अब जब मुकुल अग्रवाल की उम्मीदवारी सोडावाटर का उफान साबित हो कर चुपचाप बैठ गई है, तो सुनील जैन फिर से पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए मजबूर होंगे । पंकज बिजल्वान तथा उनके समर्थकों के विश्वास के अनुरूप सुनील जैन पंकज बिजल्वान की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए दोबारा से मजबूर होंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन पंकज बिजल्वान के नजदीकियों ने अश्वनी काम्बोज को क्लब से निकालने की जो माँग करना शुरू की है, उसने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है ।

Thursday, October 4, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के कारण वेस्टर्न रीजन में सुनील तलति के प्रभाव और उनकी अपील के कमजोर पड़ने का नुकसान अहमदाबाद में पुरुषोत्तम खंडेलवाल से आगे रहने की अनिकेत तलति की कोशिशों को सचमुच फेल करेगा क्या ?

अहमदाबाद । पराग रावल के ऐन मौके पर सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी से पीछे हटने ने अहमदाबाद में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति के समीकरणों में भारी उलटफेर कर दिया है, और बाकी दोनों उम्मीदवारों - पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति तथा उनके समर्थकों के लिए यह समझना मुश्किल कर दिया है कि इससे उन्हें फायदा हुआ है या नुकसान ! मजे की बात यह है कि इस मामले में परस्पर विरोधी बातें देखने/सुनने  में आ रही हैं - कुछ लोगों को लगता है कि पराग रावल के उम्मीदवार न रहने से उन्हें मिलने वाले वोट अब पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति में बटेंगे और इस तरह दोनों के लिए फायदे की स्थिति बनी है; लेकिन अन्य कई लोगों का मानना/कहना है कि पराग रावल की उम्मीदवारी के न रहने से अहमदाबाद और आसपास के शहरों में चुनावी गर्मी कम रहेगी, जिस कारण वोट कम पड़ेंगे और यह अहमदाबाद के दोनों उम्मीदवारों के लिए चिंता की बात होगी । अहमदाबाद - और अहमदाबाद क्या गैर-मुंबई के उम्मीदवारों के लिए दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाना मुश्किल होता है, जिसका नतीजा पिछली बार यह देखने को मिला था कि पहली वरीयता में 2322 वोट के साथ 6ठे नंबर पर रहने के बावजूद पराग रावल ग्यारह विजेताओं की सूची में नहीं आ सके थे । इस बार उम्मीदवार भी कम हैं, जिसके चलते मुकाबला - खासकर गैर-मुंबई उम्मीदवारों के लिए और मुश्किल होगा । पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अनिकेत तलति के बीच आगे रहने की होड़ भी चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बनायेगी । माना/समझा जा रहा है कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में इनमें से जो पीछे रह जायेगा, उसके लिए फिर मुकाबले में बचे/बने रहना मुश्किल ही नहीं - बल्कि असंभव ही होगा ।
इसी आकलन के चलते अनिकेत तलति के लिए चुनाव को मुश्किल और चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है । उनकी तरफ से हालाँकि उनके पिता, इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति ने चुनावी मोर्चा संभाला हुआ है, लेकिन अभी तक के अनुभव के आधार पर सुनील तलति की सक्रियता को भी अनिकेत तलति के लिए बहुत आश्वस्तकारी नहीं माना जा रहा है । दरअसल अभी तक के चुनावों में, चाहें अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव रहे हों और या वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का पिछली बार का चुनाव रहा हो, अनिकेत तलति को हर चुनाव में अपने पिता सुनील तलति का सक्रिय समर्थन मिला है - लेकिन फिर भी हर चुनाव में उन्हें पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे ही रहना पड़ा है । पिछली बार रीजनल काउंसिल की अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की नाव को किनारे लगाने के लिए सुनील तलति ने खुद तो पूरा दमखम लगाया हुआ ही था, साथ ही उनके द्वारा सेंट्रल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवार अनिल भंडारी के साथ ऐसा चुनावी समझौता करने की चर्चा भी थी - जिसके तहत अनिल भंडारी ने रीजनल काउंसिल के लिए अनिकेत तलति को वोट दिलवाए थे, और तलति पिता-पुत्र ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अनिल भंडारी को वोट दिलवाए थे । इतनी सब जुगाड़बाजी के बावजूद अनिकेत तलति को पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे रहना पड़ा था । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में पुरुषोत्तम खंडेलवाल 1728 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे, जबकि अनिकेत तलति को 1469 वोटों के साथ छठा नंबर मिला था । अहमदाबाद ब्रांच से लेकर रीजनल काउंसिल के चुनाव तक चूँकि पुरुषोत्तम खंडेलवाल हमेशा ही अनिकेत तलति से आगे रहे हैं, इसलिए अनिकेत तलति के समर्थकों व शुभचिंतकों को डर है कि पीछे रहने का यह रिकॉर्ड अनिकेत तलति ने यदि आगामी दिसंबर में हो रहे सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी 'बनाया' - तो फिर उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को सफल बनाने की बात को भूल ही जाना चाहिए ।
पुरुषोत्तम खंडेलवाल के लिए भी चुनौतियाँ और मुश्किलें हालाँकि कम नहीं हैं । दरअसल सेंट्रल काउंसिल के चुनाव की एक अलग ही केमिस्ट्री और गणित होता है । पुरुषोत्तम खंडेलवाल अहमदाबाद में सुनील तलति विरोधी खेमे के भरोसे हैं, जिनका प्रतिनिधित्व अभी दीनल शाह कर रहे हैं । दीनल शाह लेकिन सेंट्रल काउंसिल के लिए मुंबई की उम्मीदवार श्रुति शाह का समर्थन करते सुने जा रहे हैं । दीनल शाह की नजदीकी रिश्तेदार श्रुति शाह की लेकिन चूँकि अहमदाबाद में ज्यादा सक्रियता नहीं है, इसलिए दीनल शाह के सक्रिय समर्थन के बावजूद श्रुति शाह को यहाँ खास समर्थन मिलने की उम्मीद तो नहीं है - लेकिन उन्हें जो भी समर्थन मिलेगा, वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल के वोटों को ही घटाने का काम करेगा । पुरुषोत्तम खंडेलवाल के साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि उनके साथ किसी बड़े नेता का नाम नहीं जुड़ा है - यानि उनका कोई गॉडफादर नहीं है । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में गॉडफादर कोई व्यावहारिक फायदा तो नहीं दिलवाता है, लेकिन लोगों के बीच मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने और माहौल बनाने का काम जरूर करता है । ऐसे में, पुरुषोत्तम खंडेलवाल के समर्थकों व शुभचिंतकों को इस आधार पर ही उम्मीद दिखाई दे रही है कि अनिकेत तलति के फादर भले ही उनके चुनावी गॉडफादर भी बने हुए हैं - लेकिन चूँकि अभी तक वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे ही रहते आए हैं, तो इस बार भी उनसे कोई बड़े चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती है । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी से भी पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मनोवैज्ञनिक फायदा मिलता नजर आ रहा है । दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी पूर्व प्रेसीडेंट के रूप में सुनील तलति के ऑरा और प्रभाव को कम करने का काम करती है । प्रफुल्ल छाजेड़ यदि वाइस प्रेसीडेंट नहीं होते, तो उनके मुकाबले सुनील तलति का पलड़ा भारी रहता । लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बनने जा रहे प्रफुल्ल छाजेड़ के उम्मीदवार होते हुए कोई भी पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति की अपील को भला क्यों तवज्जो देगा ? प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के कारण सुनील तलति के प्रभाव और उनकी अपील के कमजोर पड़ने का सीधा फायदा पुरुषोत्तम खंडेलवाल को मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है ।
चुनावी लड़ाई में यह सब बातें तो किताबी बातें हैं, जो महौल को बनाने/बिगाड़ने का काम जरूर करती हैं - लेकिन चुनावी लड़ाई का नतीजा वास्तव में इस बात पर निर्भर करता है कि इन किताबी बातों को कौन कितने प्रभावी तरीके से इस्तेमाल कर पाता है - या नहीं कर पाता है । इसलिए अहमदाबाद में पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अनिकेत तलति के बीच इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाले मुकाबले का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन अपने चुनाव अभियान को कैसे संयोजित करता है और चुनाव के दिन तक उसे कैसे आगे बढ़ाता है ।

Friday, May 25, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति द्वारा कमान संभाल लेने के बाद भी उनके बेटे अनिकेत तलति के लिए वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल तथा पुरुषोत्तम खंडेलवाल से आगे हो पाना संभव होगा क्या ?

अहमदाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कमान उनके पिता और इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति द्वारा संभाल लिए जाने से अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । अहमदाबाद में सेंट्रल काउंसिल के लिए पराग रावल तथा पुरुषोत्तम खंडेलवाल की भी उम्मीदवारी की चर्चा है । पराग रावल ने पिछली बार भी सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा था और पहली वरीयता में 2322 वोट के साथ 6ठे नंबर पर रहने के बावजूद वह ग्यारह विजेताओं की सूची में नहीं आ सके थे । पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था, जिसमें पहली वरीयता में 1728 वोटों के साथ वह तीसरे नंबर पर रहे थे । पिछली बार अनिकेत तलति ने भी रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था, और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 1469 वोटों के साथ वह छठे नंबर पर रहे थे । उससे पहले, अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव में भी अनिकेत तलति की स्थिति पुरुषोत्तम खंडेलवाल की तुलना में बहुत ही पतली थी । इन तथ्यों की रोशनी में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे तीनों उम्मीदवारों में अनिकेत तलति को तीसरे नंबर पर देखा/पहचाना जा रहा है । अनिकेत तलति के लिए यह बड़ी खतरनाक और चुनौतीपूर्ण स्थिति है । दरअसल आकलन यह किया जा रहा है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए वह उम्मीदवार कामयाब होगा, जो अपने आप को पहले 'बाहर होने' से बचा ले सकेगा । अहमदाबाद के उम्मीदवारों को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट भी अहमदाबाद में ही मिलने की उम्मीद है, इसलिए अहमदाबाद के तीनों उम्मीदवारों में जो पिछड़ा हुआ रहेगा - उसके लिए मुकाबले में बने रह पाना मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । सुनील तलति को अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की कमान अभी से संभालने की जरूरत दरअसल इसीलिए पड़ी है, ताकि अहमदाबाद के तीन उम्मीदवारों में तीसरी समझी/पहचानी जा रही अनिकेत तलति की स्थिति को वह सुधार कर बेहतर बना सकें ।
उल्लेखनीय है कि पिछली बार, रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को भी कमजोर देखा/समझा जा रहा था - लेकिन सुनील तलति जब उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले, तो अनिकेत तलति की चुनावी नैय्या पार लग ही गई । पिताजी की मदद से अनिकेत तलति ने चुनाव तो जीत लिया, लेकिन अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव में पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पिछड़ने की जो स्थिति बनी हुई थी - वह रीजनल काउंसिल के चुनाव में भी बनी रही । एक और तथ्य पर गौर करना प्रासंगिक होगा । पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में, इंस्टीट्यूट के तीन पूर्व प्रेसीडेंट्स के बेटा/बेटी उम्मीदवार थे - सुश्रुत चिताले, दृष्टि देसाई और अनिकेत तलति; इनमें अनिकेत तलति ही सबसे पीछे रहे । इसका एक बड़ा और प्रमुख कारण हालाँकि उनका अहमदाबाद - या मुंबई से बाहर का होना भी है । इंस्टीट्यूट के चुनाव में मुंबई के उम्मीदवारों की तुलना में मुंबई से बाहर के उम्मीदवारों के लिए मुसीबत या चुनौती अपेक्षाकृत बड़ी होती है । हालाँकि इसके बावजूद, पहले पराग रावल ने और फिर पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने रीजनल काउंसिल में अनिकेत तलति और मुंबई के अधिकतर उम्मीदवारों की तुलना में बेहतर परफॉर्म किया ही है । पिछली से भी पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल सबसे ज्यादा वोट पाकर पहले नंबर पर रहे थे । इसलिए अनिकेत तलति अहमदाबाद - या मुंबई के बाहर के होने का एक्सक्यूज नहीं ले सकते हैं । जाहिर है कि अनिकेत तलति पर दोहरा दबाव है । इस दोहरे दबाव से ही उन्हें मुक्त कराने के लिए उनके पिताजी ने अब मोर्चा संभाल लिया है ।
सुनील तलति के मोर्चा संभालने पर अनिकेत तलति की बनने वाली स्थिति को लेकर लोगों की राय लेकिन बँटी हुई है । कुछ लोगों को लगता है कि सुनील तलति के मोर्चा संभालने से अनिकेत तलति की स्थिति में सुधार होगा, लेकिन कई लोगों को लगता है कि अहमदाबाद ब्रांच तथा रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनिकेत तलति को अपने पिता की सक्रियता से भले ही लाभ हुआ हो, लेकिन सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में चूँकि एक अलग ही केमिस्ट्री चलती है - इसलिए पिता की सक्रियता यहाँ उनके काम नहीं आने वाली है । सुनील तलति के बेटे होने की पहचान रखने तथा उनके सक्रिय समर्थन के चलते अनिकेत तलति ब्रांच और रीजनल काउंसिल के चुनाव जीतने में कामयाब भले ही हुए हों, लेकिन वह कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सके हैं । उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि अहमदाबाद में ही उन्हें जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, उनसे निपट पाना ही उनके लिए मुश्किल बना रहा है । सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में उनके लिए यह चुनौती और भी बड़ी है । पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में वह यदि अब की बार भी पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल से पीछे रह गए, तो फिर उनका जीत पाना मुश्किल क्या असंभव ही होगा । इस खतरे को जानते/पहचानते हुए ही सुनील तलति ने अनिकेत तलति के चुनाव की बागडोर अभी से संभाल ली है । सुनील तलति के सक्रिय होने से अनिकेत तलति को फायदा होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन यह जरूर हुआ है कि अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट का चुनावी परिदृश्य रोचक हो उठा है ।

Wednesday, December 23, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल की पराजय का ठीकरा पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनील तलति के सिर फोड़ना शुरू किया

अहमदाबाद । पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराजय मिलने की ख़बर आने के बाद से पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनील तलति पर अपना गुस्सा निकालना शुरू किया है । पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने पराग रावल की पराजय के लिए सुनील तलति को जिम्मेदार ठहराया है - जिम्मेदार ही नहीं ठहराया है, बल्कि आरोप लगाया है कि सुनील तलति ने पराग रावल के साथ धोखा किया है । चुनाव के दौरान जो बातें दबे-छिपे तरीके से कही जा रही थीं, उन्हें अब खुल कर कहा/सुना जा रहा है - कि सुनील तलति अगले चुनाव में अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनायेंगे, और उसमें सफलता के लिए पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल से बाहर रखने का प्रयास करेंगे । पराग रावल यदि सेंट्रल काउंसिल में होंगे, तो अगले चुनाव में अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतना मुश्किल होगा । अनिकेत तलति की भावी मुश्किल को आसान करने का सुनील तलति को एक ही फार्मूला समझ में आया, और वह यह कि पराग रावल को इस बार वह सेंट्रल काउंसिल के लिए कामयाब न होने दें । मजे की बात यह है कि चुनाव के दिनों में हो रही इन बातों पर पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने तब जरा भी विश्वास नहीं किया था, और तब वह इन बातों को बकवास बता रहे थे । चुनाव के दिनों में पराग रावल, अनिकेत तलति को अपने साथ लेकर घूम रहे थे और रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने का काम कर रहे थे । पराग रावल उम्मीद - और विश्वास कर रहे थे कि इससे सुनील तलति खुश होंगे तथा इसके बदले में उन्हें समर्थन दिलवाने में मदद करेंगे । चुनाव के अंतिम दौर में इन बातों ने खासा जोर पकड़ लिया था कि सुनील तलति ने कई जगह पराग रावल की खिलाफत की है, किंतु पराग रावल और उनके समर्थकों ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया । अब लेकिन जब पराग रावल की पराजय की खबर मिली, तो पराग रावल के समर्थक व शुभचिंतक सुनील तलति को कोसने में लग गए हैं । 
चुनावी नतीजा पराग रावल तथा उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए है भी सदमे वाला ! पहली वरीयता के वोटों की गिनती में पराग रावल 2322 वोटों के साथ छठे नंबर पर होते हैं, लेकिन गिनती पूरी होते होते वह ग्यारहवें नंबर पर भी नहीं टिक पाते हैं । वोटों की गिनती जैसे जैसे आगे बढ़ी, उसमें कुछ समय तक तो पराग रावल अपनी छठे नंबर की पोजीशन को बचाए/बनाए रखने में सफल रहते हैं, लेकिन फिर पीछे खिसकने लगते हैं - हालाँकि अंत तक उम्मीद बनी रहती है कि पराग रावल इंस्टीट्यूट की 23वीं सेंट्रल काउंसिल में अवश्य ही जगह पा लेंगे; किंतु वोटों की गिनती पूरी होते होते यह उम्मीद धूल में मिल जाती है ।  उल्लेखनीय है कि पराग रावल के बारे में शुरू से ही यह आशंका थी कि जीत की प्रबल संभावनाओं के बावजूद दूसरी और अन्य वरीयता के वोटों के कारण उनकी जीत का गणित बिगड़ सकता है; इस बारे में इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए पराग रावल ने बताया था कि इस आशंका को उन्होंने हमेशा अपनी चिंता में रखा है और व्यवस्था की है कि यह सच साबित न होने पाए । इसके बावजूद दूसरी और अन्य वरीयताओं के वोटों की कमी ही उनकी जीत में बाधा बन गई । 
उनके जैसी ही हालत जुल्फेश शाह की भी हुई, जो 2144 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में सातवें नंबर पर रहने के बावजूद सेंट्रल काउंसिल से बाहर रह गए । किंतु उनके मामले में लोगों को हैरानी इसलिए नहीं हुई है, क्योंकि उनके जीतने को लेकर कम ही लोगों को उम्मीद थी । दरअसल नागपुर में ही जुल्फेश शाह को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था, और नागपुर व विदर्भ क्षेत्र में कई प्रमुख लोग उनकी खुली खिलाफत कर रहे थे । इस सीन के बावजूद जुल्फेश शाह ने जो वोट पाए, उसे उनकी मेहनत के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जुल्फेश शाह का प्रदर्शन लोगों की उम्मीद से तो बेहतर रहा, किंतु यह प्रदर्शन उनके लिए खुशखबरी नहीं बन सका । जुल्फेश शाह की पराजय पर लोगों को हैरानी लेकिन इसलिए नहीं हुई, क्योंकि उनके जीतने को लेकर लोगों के बीच बहुत उम्मीद थी भी नहीं । 
पराग रावल के लिए लेकिन लोगों के बीच बहुत अफसोस है और इस अफसोस में गुस्सा भी है - और इस गुस्से का निशाना अभी तो सुनील तलति को बनना पड़ रहा है । चुनावी राजनीति में इस तरह की बातों का हालाँकि कोई महत्व नहीं होता है; यहाँ कोई किसी की बजह से नहीं हारता/जीतता है - जो भी जीतता/हारता है, अपनी खुद की बजह से जीतता/हारता है । बाकी तो सब बहानेबाजी होती है । सुनील तलति यदि वास्तव में अगले चुनाव को ध्यान में रखकर पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल से बाहर देखना चाहते थे, तो पराग रावल और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को इसे पहचानना/समझना चाहिए था और अपनी जीत को सुनिश्चित करने/बनाने के उपाय करना चाहिए थे - जो उन्होंने यदि नहीं किए तो यह उनकी गलती है; इसके लिए सुनील तलति को कोसने का क्या फायदा ? पराग रावल की पराजय, और इस पराजय के लिए पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों का सुनील तलति को जिम्मेदार ठहराने से अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासा घमासान मचने का माहौल बन रहा है । दीनल शाह का सेंट्रल काउंसिल में आखिरी टर्म होगा; सेंट्रल काउंसिल के लिए उनके खेमे से अगली बार प्रियम शाह के उम्मीदवार होने की चर्चा है । प्रियम शाह का दीनल शाह जैसा जलवा होने/रहने की उम्मीद नहीं है; इसलिए अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को लेकर अब जो बिसात बिछेगी, वह उलटफेर वाली होगी - और जाहिर है कि खासी दिलचस्प होगी । 

Wednesday, October 21, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अहमदाबाद में पराग रावल, पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति के बीच बने गठजोड़ में सुबोध केडिया के लिए उम्मीद पुरुषोत्तम खंडेलवाल के अपने निजी 'एजेंडे' में छिपी है क्या ?

अहमदाबाद । पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए अनिकेत तलति को चुनाव जितवाने का जो बीड़ा उठाया हुआ है, उसके कारण सुबोध केडिया की रीजनल काउंसिल की सीट खतरे में पड़ती दिख रही है । मजे की बात यह है कि अहमदाबाद में खेमेबाजी की छतरी के लिहाज से देखें तो सुबोध केडिया भी उसी छतरी में आते हैं, जिसमें पराग रावल के साथ पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति हैं; लेकिन इन तीनों ने सुबोध गुप्ता को फिलहाल छतरी से बाहर कर दिया है । इन तीनों के नजदीकियों का कहना है कि इनका सुबोध केडिया से कोई विरोध नहीं हो गया है, लेकिन चूँकि छतरी में ज्यादा जगह ही नहीं है - इसलिए इन्हें सुबोध केडिया को छतरी से बाहर करना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार पराग रावल के अतिरिक्त वोटों की बदौलत ही सुबोध केडिया रीजनल काउंसिल में अपनी जगह बना पाए थे । पिछली बार पहली वरीयता के उन्हें कुल 686 वोट ही मिले थे, जिनके आधार पर उन्हें रीजनल काउंसिल से बाहर ही रहना था - लेकिन पराग रावल के अतिरिक्त वोटों में से 272 वोट जब उनके खाते में जुड़े तब वह मुकाबले में जा पहुँचे थे । पराग रावल के अतिरिक्त वोटों में सबसे ज्यादा वोट सुबोध केडिया को ही मिले थे । उनके बाद, 180 वोट प्रियम शाह के खाते में जुड़े थे । पराग रावल के अतिरिक्त वोटों की बदौलत ही सुबोध केडिया अंतिम गणना में प्रियम शाह से आगे निकल पाए थे; अन्यथा पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह प्रियम शाह से बहुत पीछे थे । प्रियम शाह को पहली वरीयता के 805 वोट प्राप्त हुए थे । 
जाहिर है कि पिछली बार तो पराग रावल के अतिरिक्त वोटों ने सुबोध केडिया की चुनावी नैय्या पार लगा दी थी, लेकिन इस बार पराग रावल जब पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति के लिए प्रचार कर रहे हैं, तो सुबोध केडिया का क्या होगा ? यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पराग रावल इस बार खुद सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हैं, और इसके बावजूद वह खुलकर रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति की उम्मीदवारी के लिए प्रचार कर रहे हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इस तरह का नजारा शायद पहली बार ही देखा जा रहा है । सेंट्रल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवारों के किसी किसी रीजनल काउंसिल उम्मीदवार के साथ तार जुड़े ही होते हैं; इस बार ही सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के पार्टनर रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने हुए हैं - जाहिर है कि वह उनके लिए समर्थन जुटाने का काम कर ही रहे होंगे; अहमदाबाद में ही प्रियम शाह को दीनल शाह के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन किसी को भी खुलेआम एकसाथ प्रचार पर निकलते नहीं देखा गया है । पराग रावल ने लेकिन इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य में एक नई प्रथा शुरू की है । पराग रावल की इस नई प्रथा को हालाँकि प्रशंसक व आलोचक दोनों मिले हैं - लेकिन प्रशंसक व आलोचक दोनों इस बात पर एकमत हैं कि उनकी इस नई प्रथा ने सुबोध केडिया के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है । प्रियम शाह पर चूँकि दीनल शाह का हाथ है, इसलिए उनकी सीट तो पक्की ही समझी जा रही है । पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति ने जिस तरह का गठजोड़ बना लिया है, उससे पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति का पलड़ा भारी हो गया है । समस्या सिर्फ सुबोध केडिया के लिए ही बची रह गई है । 
सुबोध केडिया के समर्थक लेकिन सुबोध केडिया की जीत को लेकर चिंतित नहीं हैं । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में रहते हुए सुबोध केडिया ने अपने समर्थन-आधार का विस्तार किया है, जिसके चलते इस बार उनकी स्थिति पिछली बार जितनी बुरी नहीं रह गई है । उन्हें उम्मीद है कि पिछली बार जो वोट उन्हें वाया पराग रावल मिले थे, इस बार वह उन्हें सीधे मिलेंगे और इसलिए उनके सामने अपनी सीट को बरकरार रखने में कोई समस्या नहीं आएगी । सुबोध केडिया के समर्थक मानते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी मानें कि समस्या अनिकेत तलति के सामने है । ब्रांच का चुनाव ही उन्होंने मुश्किल से जीता था, और तब जीता था जब उनके पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति ने उन्हें समर्थन दिलाने के लिए दिन-रात एक किया हुआ था । पिता की पहचान और उनकी मेहनत के बूते अनिकेत तलति ब्रांच का चुनाव तो जैसे तैसे जीत गए थे; रीजनल काउंसिल का चुनाव जीतना उनके लिए लेकिन मुश्किल ही होगा । सुबोध केडिया के समर्थक ही नहीं, अन्य कई लोग भी अनिकेत तलति को जितवाने को लेकर पराग रावल व पुरुषोत्तम खंडेलवाल द्वारा अपनाए गए 'तरीके' की सफलता को लेकर संदेहग्रस्त हैं । यह संदेह इसलिए भी है क्योंकि एक उम्मीदवार के रूप में पुरुषोत्तम खंडेलवाल का अपना एजेंडा भी है - और वह यह कि वह पराग रावल की तरह सबसे ज्यादा वोट पाकर जीतना चाहते हैं । पिछली बार ब्रांच का चुनाव भी उन्होंने सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करते हुए ही जीता था । इसी तरह का रिकॉर्ड वह रीजनल काउंसिल में बनाना चाहेंगे । ऐसे में, वह किसी से भी यह भला क्यों कहेंगे कि मैं तो आराम से जीत ही रहा हूँ, इसलिए अपना वोट आप अनिकेत तलति को देना । 
पुरुषोत्तम खंडेलवाल के नजदीकियों का कहना भी है कि अनिकेत तलति के साथ उनके संबंध प्रतिस्पर्द्धा वाले ही रहे हैं, और अनिकेत तलति तथा उनके लोग कभी इस बात को हजम नहीं कर पाए कि ब्रांच के चुनाव में पुरुषोत्तम खंडेलवाल को सबसे ज्यादा वोट मिले थे; और इस नाते जहाँ जब कभी मौका मिलता वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहे हैं । दोनों के बीच खुले विरोध को प्रदर्शित करने की नौबत तो हालाँकि नहीं आई, किंतु दोनों के बीच शीत-युद्ध की सी स्थिति हमेशा बनी रही है । यह पराग रावल के प्रयास हैं कि आज दोनों साथ-साथ मिलकर अपना चुनाव अभियान चला रहे हैं । पराग रावल को भी अनिकेत तलति की तुलना में पुरुषोत्तम खंडेलवाल के ज्यादा नजदीक पहचाना/समझा जाता है । समझा जाता है कि अनिकेत तलति को पुरुषोत्तम खंडेलवाल के साथ अपनी छतरी के नीचे लाने का काम पराग रावल ने यह सोच कर किया है, कि इससे उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में मदद मिलेगी । अनिकेत तलति भी उनकी छतरी के नीचे आने के लिए इसीलिए तैयार हो गए, क्योंकि उन्हें भी अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक छतरी की जरूरत तो है ही । ब्रांच के चुनाव में अनिकेत तलति को यह सबक मिल ही गया था कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सिर्फ अपने पिता के भरोसे वह ज्यादा लंबी यात्रा नहीं कर सकेंगे । लोगों को लगता है कि पराग रावल और अनिकेत तलति अपने अपने मतलब से एक साथ आए हैं, और पुरुषोत्तम खंडेलवाल खेमेबाजी व दोस्ती के दबाव में - और शायद 'मजबूरी' में उनके साथ बने हैं; और यही चीज इन तीनों के साथ साथ वाले अभियान की सफलता को संदेहजनक बनाती है । इसी संदेह में सुबोध केडिया को अपने लिए उम्मीद नजर आती है । अनिकेत तलति व सुबोध केडिया के बीच चलने वाली लुकाछिपी ने अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है । 

Tuesday, September 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने से पराग रावल का रास्ता और आसान हुआ लगता है

अहमदाबाद । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत न होने से इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होने की पराग रावल की कोशिशों को जहाँ बल मिला है, वहाँ जुल्फेश शाह के गुजरात में वोट जुटाने के लिए दिलचस्पी लेने की खबरों ने पराग रावल के लिए चुनौती भी पैदा कर दी है । इस तरह पराग रावल के लिए हाल-फिलहाल के दिन मिलीजुली प्रतिक्रिया वाले रहे - एक तरफ उनके लिए अच्छी खबर रही, तो दूसरी तरफ उन्हें सावधानी बरतने वाला संदेश मिला । पराग रावल के समर्थकों तथा उनकी उम्मीदवारी में सकारात्मक संभावना देखने वाले लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने की जो अच्छी खबर है, उसका फायदा ज्यादा बड़ा है, और जुल्फेश शाह की सक्रियता के संदर्भ में सावधानी बरतने वाला संदेश - ठीक है कि एक संदेश है, लेकिन जो कोई नुकसान पहुँचाता हुआ नहीं दिख रहा है । इसलिए इंस्टीट्यूट के चुनाव के संदर्भ में उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद पराग रावल की उम्मीदवारी के समर्थक बम बम हैं । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए वेस्टर्न रीजन में होने वाले चुनाव में तमाम लोगों की निगाह पराग रावल पर टिकी हुई हैं । पिछले रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें कई सेंटर पर जिस तरह भर भर कर वोट मिले थे, उसे देखते और याद करते हुए कई लोगों को लग रहा है कि सेंट्रल काउंसिल में उनकी सीट तो पक्की है ही । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले रीजनल काउंसिल चुनाव में पहली वरीयता के 2068 वोट पाकर पराग रावल सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार तो बने ही थे, दूसरे नंबर पर रहे सुश्रुत चितले से वह बह्हह्हहुत आगे थे । वोट प्राप्त करने वालों की सूची में पराग रावल के बाद, दूसरे नंबर पर रहे सुश्रुत चितले को पहली वरीयता के 1555 वोट मिले थे । सबसे ज्यादा वोट पाने और दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार से पाँच सौ से अधिक वोटों से आगे रहने के तथ्य को देखते हुए ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत पराग रावल की उम्मीदवारी को सकारात्मक संभावना के साथ देखा जा रहा है । 
किंतु कई लोग पराग रावल की कामयाबी की संभावना को लेकर संशयग्रस्त भी हैं । उनका तर्क है कि सेंट्रल काउंसिल चुनाव का गणित रीजनल काउंसिल चुनाव के गणित से बिलकुल अलग होता है; तथा उसमें अलग तरह के ही फार्मूले काम करते हैं । माना जा रहा है कि इस बार जो कोटा बनेगा, उसे छू पाना हर किसी उम्मीदवार के लिए मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । इस कारण से प्रत्येक उम्मीदवार को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का सहारा लेना पड़ेगा । पराग रावल के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि उन्हें दूसरी/तीसरी वरीयता के ऐसे वोट आखिर कहाँ से मिलेंगे, तो सचमुच में उनके काम आ सकें ? मुंबई के बाहर के उम्मीदवारों के सामने दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाने की समस्या आती ही है । मजे की बात यह देखने में आती है कि मुंबई के उम्मीदवारों को तो मुंबई में भी तथा दूर-दराज की ब्रांचेज में भी दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट मिल जाते हैं; किंतु ब्रांचेज के उम्मीदवारों को मुंबई तो छोड़िये, दूसरी ब्रांचेज में भी दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाने के लाले पड़ जाते हैं । सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव के आँकड़े इस समस्या की व्यापकता को बहुत स्पष्टता के साथ सामने रखते हैं । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में प्रफुल्ल छाजेड़ से आगे रहने वाले दुर्गेश बुच और राजेश लोया तो देखते ही रह जाते हैं, जबकि दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों के सहारे प्रफुल्ल छाजेड़ का बेड़ा पार हो जाता है । पिछली बार जो समस्या दुर्गेश बुच के सामने थी, ठीक वही समस्या इस बार पराग रावल के सामने है । धिनल शाह तथा जय छैरा को पहली वरीयता के जो वोट मिले, उनमें से बहुतों के दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट निस्संदेह दुर्गेश बुच को मिले होंगे, किंतु वह वोट उनके काम तो नहीं आ सके । इस बार भी गुजरात क्षेत्र के वोट धिनल शाह, जय छैरा और पराग रावल के बीच ही बँटने का अनुमान है - इन तीनों में पराग रावल के तीसरे नंबर पर रहने का अनुमान है; ऐसे में पराग रावल को गुजरात क्षेत्र में मिलने वाले दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का कोई फायदा न मिलना निश्चित है । तब फिर, लाख टके का सवाल यह है कि पराग रावल को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट आखिर कहाँ से मिलेंगे ?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि पहली वरीयता के वोटों में मुंबई के उम्मीदवार यदि पराग रावल के आसपास ही रहते हैं तो दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों को पाकर वह आगे निकल सकते हैं । पराग रावल के नजदीकियों तथा उनके समर्थकों का कहना लेकिन यह है कि इस समस्या से वह अच्छी तरह वाकिफ हैं, और इससे निपटने के लिए पराग रावल ने पूरी तैयारी की हुई है । पराग रावल के एक नजदीकी ने बताया कि एक अच्छी बात यह है कि इस बार की सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी का फैसला पराग रावल ने पिछले चुनाव के समय ही कर लिया था; और पिछले चुनाव में राजेश लोया तथा दुर्गेश बुच के साथ जो हुआ, उसका 'कारण' तभी पहचान/समझ लिया था । इसलिए पराग रावल ने पिछले ढाई वर्ष दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों की व्यवस्था करने का ही काम किया है । इसके लिए उन्होंने मुंबई में भी, तथा महाराष्ट्र की ब्रांचेज में भी अपना समर्थन आधार बनाया/बढ़ाया है । पराग रावल के नजदीकियों का कहना है कि पराग रावल ने अपनी उम्मीदवारी की सफलता की निर्भरता गुजरात तक ही सीमित नहीं रखी है, बल्कि महाराष्ट्र तक में प्रभावी अभियान चलाया है और अपनी पॉकेट्स बनाई हैं । ऐसा उन्होंने इसलिए भी किया, क्योंकि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को देखते हुए वह पहले से ही अपने चुनाव को काफी चुनौतीपूर्ण मान रहे थे । मनीष बक्षी को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, जिसके कारण मुसीबत पराग रावल के हिस्से ही आनी थी । इस मुसीबत से बचने के लिए ही पराग रावल ने गुजरात के बाहर भी अपने लिए समर्थन जुटाने के जुगाड़ किए हैं । ऐसे में अब जब मनीष बक्षी की उम्मीदवारी की संभावना ही खत्म हो गयी है, तो यह पराग रावल के लिए तो बड़े वरदान की बात हो गई है । 
इस वरदान के साथ लेकिन जुल्फेश शाह रूपी समस्या भी पराग रावल के सामने आ खड़ी हुई है । जुल्फेश शाह को दरअसल जबसे 'अपने घर' विदर्भ में झटके लगना शुरू हुए हैं, तब से समर्थन जुटाने के लिए उन्होंने इधर-उधर हाथ-पैर मारना शुरू किया है । इसके लिए उन्होंने गुजरात को अपने लिए एक आसान 'चारागाह' के रूप में पहचाना है । जुल्फेश शाह के नजदीकियों के अनुसार, गुजराती होने के कारण जुल्फेश शाह को लगता है कि वह गुजरात में यदि समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे, तो यहाँ अवश्य ही काफी समर्थन जुटा लेंगे । समझा जाता है कि जुल्फेश शाह को गुजरात में जो भी समर्थन मिलेगा, वह पराग रावल के समर्थन की कीमत पर ही मिलेगा । पराग रावल के समर्थक ही नहीं, कुछेक अन्य लोग भी लेकिन इस बात से सहमत नहीं दिख रहे हैं । उनका कहना है कि जुल्फेश शाह यदि पहले से गुजरात में कुछ काम करते, तो यहाँ समर्थन जुटा भी सकते थे; लेकिन गुजराती होने का फायदा उठाने के बारे में उन्होंने बहुत देर से सोचा, और तब तक यहाँ की सारी जगह दूसरों ने कब्जा ली है । जुल्फेश शाह के लिए समस्या की बात यहाँ यह है कि यहाँ उनकी वकालत करने के लिए प्रमुख नाम नहीं हैं । अहमदाबाद का ही उदाहरण देते हुए कहा/बताया जा रहा है कि बाहर के उम्मीदवारों में यहाँ उनसे ज्यादा वोट तो बीएम अग्रवाल को ही मिल जायेंगे, जिनकी वकालत यहाँ राजू शाह कर रहे हैं । चुनावी खिलाड़ियों का आकलन है कि गुजरात में इस बार नौ हजार के करीब वोट पड़ेंगे, जिनमें से डेढ़ हजार के करीब वोट बाहर के उम्मीदवारों में बँटेंगे - निश्चित ही इनमें से कुछ जुल्फेश शाह को भी मिलेंगे; लेकिन इससे पराग रावल के लिए कोई खतरा पैदा होने की उम्मीद नहीं है । पराग रावल की उम्मीदवारी को कामयाब होता देख रहे लोगों में भले ही कुछ अगर-मगर चल रहे हों, लेकिन पराग रावल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच उनकी सफलता को लेकर पूरी आश्वस्ति है । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने से तो वह और भी उत्साहित हो उठे हैं । 

Wednesday, January 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल के लिए वेस्टर्न रीजन से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वास्ते यदि दुर्गेश बुच को राजी नहीं किया जा सका; और या पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने की और कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी तो फिर सुनील तलति अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवार बनायेंगे

अहमदाबाद । सुनील तलति वडोदरा में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने की संभावना में रुकावट डालने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसे लेकर वडोदरा के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खासी नाराजगी है । उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2015 में होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के लिए वडोदरा में मनीष बक्षी को उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा है । इंस्टीट्यूट के चुनाव के संदर्भ में वडोदरा में यह दिलचस्प प्रथा है कि यहाँ उम्मीदवार का फैसला ब्रांच में आपसी विचार-विमर्श से होता है । इसी प्रथा के चलते सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी के नाम की चर्चा है । मनीष बक्षी वडोदरा में सुनील तलति की फर्म तलति एण्ड तलति के पार्टनर हैं । इस नाते सुनील तलति को खुश होना चाहिए था कि उनके पार्टनर को इस लायक समझा जा रहा है और उनकी उम्मीदवारी को एक तरफा समर्थन मिल रहा है । सुनील तलति लेकिन खुश नहीं हैं । ऊपर से तो वह हालाँकि कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन अंदरखाने उन्हें यह प्रयास करते हुए 'पाया' गया है कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को वडोदरा में स्वीकृति न मिले । वडोदरा में जो कुछ लोग मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के खिलाफ हैं, समझा जाता है कि सुनील तलति उन्हें हवा दे रहे हैं ताकि सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने में फच्चर फँसे ।
सुनील तलति दरअसल अपने बेटे अनिकेत तलति को अगले चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाना चाहते हैं । समस्या यह है कि उनकी फर्म के पार्टनर मनीष बक्षी यदि उम्मीदवार बनते हैं, तब फिर उनके बेटे के लिए उम्मीदवार बन सकने का रास्ता बंद हो जायेगा । एक ही फर्म से दो उम्मीदवार तो नहीं आयेंगे न ! अपने बेटे के लिए उम्मीदवार बन सकने का रास्ता खुला रखने के लिए ही सुनील तलति को मनीष बक्षी के उम्मीदवार बनने के रास्ते को बंद करने की जरूरत आ पड़ी है । वडोदरा में वास्तव में इसलिए ही सुनील तलति द्धारा पर्दे के पीछे से किए जा रहे हस्तक्षेप को लेकर नाराजगी है । लोगों को इस बात पर खासा ऐतराज है कि पुत्र-मोह में सुनील तलति इतने स्वार्थी कैसे हो सकते हैं कि एक शहर/एक ब्रांच की अच्छी-भली प्रथा को डिस्टर्ब करने का काम करने लगें । लोगों का कहना है कि सुनील तलति अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के बारे में चिंता करें और अपने बेटे का भविष्य बनाने का प्रयास करें, इसमें कुछ भी गलत या अस्वाभाविक नहीं है; लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें अपने पार्टनर की भावनाओं के तथा एक शहर/एक ब्रांच की प्रथा के खिलाफ कोई षड्यंत्र नहीं करना चाहिए । लोगों का कहना है कि सुनील तलति इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं, इस नाते से उनसे बड़ी सोच रखने की और बड़प्पन दिखाने की उम्मीद की जाती है ।
सुनील तलति की अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाने की कोशिशों को लेकर अहमदाबाद में भी असंतोष सा है । अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सुनील तलति का जो खेमा माना/पहचाना जाता है, उस खेमे से सेंट्रल काउंसिल के लिए पराग रावल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की तैयारी है । दूसरे खेमे के उम्मीदवार के रूप में दीनल शाह तीसरी बार उम्मीदवार बनेंगे ही । पराग रावल पिछले दो टर्म से रीजनल काउंसिल में हैं, और उनकी सक्रियता व लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि अबकी बार सेंट्रल काउंसिल में अहमदाबाद के दो लोग जा सकते हैं । लेकिन अनिकेत तलति के उम्मीदवार होने की स्थिति में खेमे में फूट पड़ेगी और उससे पराग रावल की जीतने की संभावना पर प्रतिकूल असर पड़ेगा । अनिकेत तलति अभी अहमदाबाद ब्रांच के चेयरमैन पद पर हैं । उनके ही कई एक नजदीकियों का मानना और कहना है कि उन्हें पहले रीजनल काउंसिल में आना चाहिए और अपने अनुभवों का विस्तार करना चाहिए और फिर सेंट्रल काउंसिल में आने के बारे में सोचना चाहिए । उनके कुछेक नजदीकियों का कहना है कि लेकिन सुनील तलति अपने बेटे को जल्दी से जल्दी सेंट्रल काउंसिल में देखना चाहते हैं । नजदीकियों के अनुसार, सुनील तलति चाहते हैं कि उनका बेटा जल्दी से सेंट्रल काउंसिल में आए, ताकि जल्दी से प्रेसीडेंट बने और फिर इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से फारिग होकर अपने काम-धंधे में लगे ।
सुनील तलति भी समझ रहे हैं कि पराग रावल के साथ साथ उनके बेटे अनिकेत तलति की भी उम्मीदवारी यदि आती है, तो बहुत संभव है कि दोनों में से कोई भी न जीते । इसके बावजूद वह अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं । दरअसल उन्हें डर है कि पराग रावल यदि जीत गए, तब फिर अनिकेत तलति को नौ वर्ष इंतजार करना पड़ेगा । अब नौ वर्ष बाद क्या स्थिति होगी, यह आज/अभी कौन जानता है ? अहमदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा यही है कि इस बार हार जाने की सुनिश्चितता के बावजूद सुनील तलति अपने बेटे को उम्मीदवार बनाना चाहते हैं तो इसके पीछे उनकी सोच यही है कि इस बार हार जाने के बाद पराग रावल अगली बार तो उम्मीदवार बनेंगे नहीं; दूसरे खेमे से भी कोई नया उम्मीदवार आयेगा और तब उनके बेटे अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पाने के लिए अच्छा मौका होगा । इस 'सोच' को फलीभूत करवाने के लिए सुनील तलति के नजदीकियों ने हालाँकि उन्हें एक और फार्मूला सुझाया है और वह यह कि अनिकेत तलति को अबकी बार रीजनल का चुनाव लड़वाओ और पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाओ; उसके बाद अगली बार अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश का मौका बनाओ । पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने के लिए दुर्गेश बुच को उम्मीदवार बनाओ/बनवाओ ।
दुर्गेश बुच पीछे दो बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बन चुके हैं, और दोनों ही बार असफल रहे । दुर्गेश बुच ऐलान कर चुके हैं कि अब आगे वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । सुनील तलति को फार्मूला सुझाने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि दुर्गेश बुच ने ऐलान भले ही कर दिया हो, किंतु उन्हें यदि थोड़ा उकसाया जायेगा तो फिर वह अपनी उम्मीदवारी के लिए तैयार हो जायेंगे । इनका तर्क है कि 2012 के लिए भी पहले वह अपनी उम्मीदवारी की संभावना से इंकार करते थे, किंतु फिर बाद में उम्मीदवार बने न ! लोगों का कहना है कि सुनील तलति इस फार्मूले पर सहमत तो हैं, लेकिन वह आश्वस्त हो लेना चाहते हैं कि दुर्गेश बुच की उम्मीदवारी सचमुच आयेगी भी । इसीलिए तलति पिता-पुत्र की तरफ से यह अभी तक तय नहीं हो रहा है कि अनिकेत तलति की उम्मीदवारी रीजनल काउंसिल के लिए आएगी और या सेंट्रल काउंसिल के लिए । यह हालाँकि तय माना जा रहा है कि दुर्गेश बुच को यदि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी नहीं किया जा सका; और या पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने की और कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी तो फिर अनिकेत तलति खुद मोर्चा संभालेंगे और सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे ।
इसके लिए लेकिन मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को संभव होने से रोकना जरूरी है । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की स्थिति में सुनील तलति की अपने बेटे को लेकर बनाई जा रही सारी योजना पर पानी ही फिर जायेगा । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की स्थिति में अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की तो फिर बात ही खत्म हो जाएगी । एक समस्या और है - सुनील तलति को जो डर पराग रावल की जीत से है, वही डर मनीष बक्षी की जीत से भी है । मनीष बक्षी यदि जीत गए तब भी तो अनिकेत तलति के लिए नौ वर्ष के लिए मौका गया । सुनील तलति इसीलिए वडोदरा में चक्कर चला रहे हैं कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को वहाँ हरी झंडी मिले ही न । सुनील तलति के इस चक्कर ने लेकिन वडोदरा के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को नाराज कर दिया है । सुनील तलति की मजबूरी है कि अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के लिए उन्हें यह सब करना ही होगा, उससे कोई नाराज होता हो तो होता रहे !