Showing posts with label CA SUNIL TALATI. Show all posts
Showing posts with label CA SUNIL TALATI. Show all posts

Wednesday, December 23, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराग रावल की पराजय का ठीकरा पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनील तलति के सिर फोड़ना शुरू किया

अहमदाबाद । पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में पराजय मिलने की ख़बर आने के बाद से पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने सुनील तलति पर अपना गुस्सा निकालना शुरू किया है । पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने पराग रावल की पराजय के लिए सुनील तलति को जिम्मेदार ठहराया है - जिम्मेदार ही नहीं ठहराया है, बल्कि आरोप लगाया है कि सुनील तलति ने पराग रावल के साथ धोखा किया है । चुनाव के दौरान जो बातें दबे-छिपे तरीके से कही जा रही थीं, उन्हें अब खुल कर कहा/सुना जा रहा है - कि सुनील तलति अगले चुनाव में अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनायेंगे, और उसमें सफलता के लिए पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल से बाहर रखने का प्रयास करेंगे । पराग रावल यदि सेंट्रल काउंसिल में होंगे, तो अगले चुनाव में अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतना मुश्किल होगा । अनिकेत तलति की भावी मुश्किल को आसान करने का सुनील तलति को एक ही फार्मूला समझ में आया, और वह यह कि पराग रावल को इस बार वह सेंट्रल काउंसिल के लिए कामयाब न होने दें । मजे की बात यह है कि चुनाव के दिनों में हो रही इन बातों पर पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों ने तब जरा भी विश्वास नहीं किया था, और तब वह इन बातों को बकवास बता रहे थे । चुनाव के दिनों में पराग रावल, अनिकेत तलति को अपने साथ लेकर घूम रहे थे और रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने का काम कर रहे थे । पराग रावल उम्मीद - और विश्वास कर रहे थे कि इससे सुनील तलति खुश होंगे तथा इसके बदले में उन्हें समर्थन दिलवाने में मदद करेंगे । चुनाव के अंतिम दौर में इन बातों ने खासा जोर पकड़ लिया था कि सुनील तलति ने कई जगह पराग रावल की खिलाफत की है, किंतु पराग रावल और उनके समर्थकों ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया । अब लेकिन जब पराग रावल की पराजय की खबर मिली, तो पराग रावल के समर्थक व शुभचिंतक सुनील तलति को कोसने में लग गए हैं । 
चुनावी नतीजा पराग रावल तथा उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए है भी सदमे वाला ! पहली वरीयता के वोटों की गिनती में पराग रावल 2322 वोटों के साथ छठे नंबर पर होते हैं, लेकिन गिनती पूरी होते होते वह ग्यारहवें नंबर पर भी नहीं टिक पाते हैं । वोटों की गिनती जैसे जैसे आगे बढ़ी, उसमें कुछ समय तक तो पराग रावल अपनी छठे नंबर की पोजीशन को बचाए/बनाए रखने में सफल रहते हैं, लेकिन फिर पीछे खिसकने लगते हैं - हालाँकि अंत तक उम्मीद बनी रहती है कि पराग रावल इंस्टीट्यूट की 23वीं सेंट्रल काउंसिल में अवश्य ही जगह पा लेंगे; किंतु वोटों की गिनती पूरी होते होते यह उम्मीद धूल में मिल जाती है ।  उल्लेखनीय है कि पराग रावल के बारे में शुरू से ही यह आशंका थी कि जीत की प्रबल संभावनाओं के बावजूद दूसरी और अन्य वरीयता के वोटों के कारण उनकी जीत का गणित बिगड़ सकता है; इस बारे में इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए पराग रावल ने बताया था कि इस आशंका को उन्होंने हमेशा अपनी चिंता में रखा है और व्यवस्था की है कि यह सच साबित न होने पाए । इसके बावजूद दूसरी और अन्य वरीयताओं के वोटों की कमी ही उनकी जीत में बाधा बन गई । 
उनके जैसी ही हालत जुल्फेश शाह की भी हुई, जो 2144 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में सातवें नंबर पर रहने के बावजूद सेंट्रल काउंसिल से बाहर रह गए । किंतु उनके मामले में लोगों को हैरानी इसलिए नहीं हुई है, क्योंकि उनके जीतने को लेकर कम ही लोगों को उम्मीद थी । दरअसल नागपुर में ही जुल्फेश शाह को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था, और नागपुर व विदर्भ क्षेत्र में कई प्रमुख लोग उनकी खुली खिलाफत कर रहे थे । इस सीन के बावजूद जुल्फेश शाह ने जो वोट पाए, उसे उनकी मेहनत के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । जुल्फेश शाह का प्रदर्शन लोगों की उम्मीद से तो बेहतर रहा, किंतु यह प्रदर्शन उनके लिए खुशखबरी नहीं बन सका । जुल्फेश शाह की पराजय पर लोगों को हैरानी लेकिन इसलिए नहीं हुई, क्योंकि उनके जीतने को लेकर लोगों के बीच बहुत उम्मीद थी भी नहीं । 
पराग रावल के लिए लेकिन लोगों के बीच बहुत अफसोस है और इस अफसोस में गुस्सा भी है - और इस गुस्से का निशाना अभी तो सुनील तलति को बनना पड़ रहा है । चुनावी राजनीति में इस तरह की बातों का हालाँकि कोई महत्व नहीं होता है; यहाँ कोई किसी की बजह से नहीं हारता/जीतता है - जो भी जीतता/हारता है, अपनी खुद की बजह से जीतता/हारता है । बाकी तो सब बहानेबाजी होती है । सुनील तलति यदि वास्तव में अगले चुनाव को ध्यान में रखकर पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल से बाहर देखना चाहते थे, तो पराग रावल और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को इसे पहचानना/समझना चाहिए था और अपनी जीत को सुनिश्चित करने/बनाने के उपाय करना चाहिए थे - जो उन्होंने यदि नहीं किए तो यह उनकी गलती है; इसके लिए सुनील तलति को कोसने का क्या फायदा ? पराग रावल की पराजय, और इस पराजय के लिए पराग रावल के समर्थकों व शुभचिंतकों का सुनील तलति को जिम्मेदार ठहराने से अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में खासा घमासान मचने का माहौल बन रहा है । दीनल शाह का सेंट्रल काउंसिल में आखिरी टर्म होगा; सेंट्रल काउंसिल के लिए उनके खेमे से अगली बार प्रियम शाह के उम्मीदवार होने की चर्चा है । प्रियम शाह का दीनल शाह जैसा जलवा होने/रहने की उम्मीद नहीं है; इसलिए अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति को लेकर अब जो बिसात बिछेगी, वह उलटफेर वाली होगी - और जाहिर है कि खासी दिलचस्प होगी । 

Wednesday, October 21, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति में अहमदाबाद में पराग रावल, पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति के बीच बने गठजोड़ में सुबोध केडिया के लिए उम्मीद पुरुषोत्तम खंडेलवाल के अपने निजी 'एजेंडे' में छिपी है क्या ?

अहमदाबाद । पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए अनिकेत तलति को चुनाव जितवाने का जो बीड़ा उठाया हुआ है, उसके कारण सुबोध केडिया की रीजनल काउंसिल की सीट खतरे में पड़ती दिख रही है । मजे की बात यह है कि अहमदाबाद में खेमेबाजी की छतरी के लिहाज से देखें तो सुबोध केडिया भी उसी छतरी में आते हैं, जिसमें पराग रावल के साथ पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति हैं; लेकिन इन तीनों ने सुबोध गुप्ता को फिलहाल छतरी से बाहर कर दिया है । इन तीनों के नजदीकियों का कहना है कि इनका सुबोध केडिया से कोई विरोध नहीं हो गया है, लेकिन चूँकि छतरी में ज्यादा जगह ही नहीं है - इसलिए इन्हें सुबोध केडिया को छतरी से बाहर करना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार पराग रावल के अतिरिक्त वोटों की बदौलत ही सुबोध केडिया रीजनल काउंसिल में अपनी जगह बना पाए थे । पिछली बार पहली वरीयता के उन्हें कुल 686 वोट ही मिले थे, जिनके आधार पर उन्हें रीजनल काउंसिल से बाहर ही रहना था - लेकिन पराग रावल के अतिरिक्त वोटों में से 272 वोट जब उनके खाते में जुड़े तब वह मुकाबले में जा पहुँचे थे । पराग रावल के अतिरिक्त वोटों में सबसे ज्यादा वोट सुबोध केडिया को ही मिले थे । उनके बाद, 180 वोट प्रियम शाह के खाते में जुड़े थे । पराग रावल के अतिरिक्त वोटों की बदौलत ही सुबोध केडिया अंतिम गणना में प्रियम शाह से आगे निकल पाए थे; अन्यथा पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह प्रियम शाह से बहुत पीछे थे । प्रियम शाह को पहली वरीयता के 805 वोट प्राप्त हुए थे । 
जाहिर है कि पिछली बार तो पराग रावल के अतिरिक्त वोटों ने सुबोध केडिया की चुनावी नैय्या पार लगा दी थी, लेकिन इस बार पराग रावल जब पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति के लिए प्रचार कर रहे हैं, तो सुबोध केडिया का क्या होगा ? यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पराग रावल इस बार खुद सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हैं, और इसके बावजूद वह खुलकर रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति की उम्मीदवारी के लिए प्रचार कर रहे हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इस तरह का नजारा शायद पहली बार ही देखा जा रहा है । सेंट्रल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवारों के किसी किसी रीजनल काउंसिल उम्मीदवार के साथ तार जुड़े ही होते हैं; इस बार ही सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के पार्टनर रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने हुए हैं - जाहिर है कि वह उनके लिए समर्थन जुटाने का काम कर ही रहे होंगे; अहमदाबाद में ही प्रियम शाह को दीनल शाह के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन किसी को भी खुलेआम एकसाथ प्रचार पर निकलते नहीं देखा गया है । पराग रावल ने लेकिन इंस्टीट्यूट के चुनावी परिदृश्य में एक नई प्रथा शुरू की है । पराग रावल की इस नई प्रथा को हालाँकि प्रशंसक व आलोचक दोनों मिले हैं - लेकिन प्रशंसक व आलोचक दोनों इस बात पर एकमत हैं कि उनकी इस नई प्रथा ने सुबोध केडिया के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है । प्रियम शाह पर चूँकि दीनल शाह का हाथ है, इसलिए उनकी सीट तो पक्की ही समझी जा रही है । पराग रावल और पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति ने जिस तरह का गठजोड़ बना लिया है, उससे पुरुषोत्तम खंडेलवाल व अनिकेत तलति का पलड़ा भारी हो गया है । समस्या सिर्फ सुबोध केडिया के लिए ही बची रह गई है । 
सुबोध केडिया के समर्थक लेकिन सुबोध केडिया की जीत को लेकर चिंतित नहीं हैं । उनका तर्क है कि रीजनल काउंसिल में रहते हुए सुबोध केडिया ने अपने समर्थन-आधार का विस्तार किया है, जिसके चलते इस बार उनकी स्थिति पिछली बार जितनी बुरी नहीं रह गई है । उन्हें उम्मीद है कि पिछली बार जो वोट उन्हें वाया पराग रावल मिले थे, इस बार वह उन्हें सीधे मिलेंगे और इसलिए उनके सामने अपनी सीट को बरकरार रखने में कोई समस्या नहीं आएगी । सुबोध केडिया के समर्थक मानते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी मानें कि समस्या अनिकेत तलति के सामने है । ब्रांच का चुनाव ही उन्होंने मुश्किल से जीता था, और तब जीता था जब उनके पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति ने उन्हें समर्थन दिलाने के लिए दिन-रात एक किया हुआ था । पिता की पहचान और उनकी मेहनत के बूते अनिकेत तलति ब्रांच का चुनाव तो जैसे तैसे जीत गए थे; रीजनल काउंसिल का चुनाव जीतना उनके लिए लेकिन मुश्किल ही होगा । सुबोध केडिया के समर्थक ही नहीं, अन्य कई लोग भी अनिकेत तलति को जितवाने को लेकर पराग रावल व पुरुषोत्तम खंडेलवाल द्वारा अपनाए गए 'तरीके' की सफलता को लेकर संदेहग्रस्त हैं । यह संदेह इसलिए भी है क्योंकि एक उम्मीदवार के रूप में पुरुषोत्तम खंडेलवाल का अपना एजेंडा भी है - और वह यह कि वह पराग रावल की तरह सबसे ज्यादा वोट पाकर जीतना चाहते हैं । पिछली बार ब्रांच का चुनाव भी उन्होंने सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करते हुए ही जीता था । इसी तरह का रिकॉर्ड वह रीजनल काउंसिल में बनाना चाहेंगे । ऐसे में, वह किसी से भी यह भला क्यों कहेंगे कि मैं तो आराम से जीत ही रहा हूँ, इसलिए अपना वोट आप अनिकेत तलति को देना । 
पुरुषोत्तम खंडेलवाल के नजदीकियों का कहना भी है कि अनिकेत तलति के साथ उनके संबंध प्रतिस्पर्द्धा वाले ही रहे हैं, और अनिकेत तलति तथा उनके लोग कभी इस बात को हजम नहीं कर पाए कि ब्रांच के चुनाव में पुरुषोत्तम खंडेलवाल को सबसे ज्यादा वोट मिले थे; और इस नाते जहाँ जब कभी मौका मिलता वह पुरुषोत्तम खंडेलवाल को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहे हैं । दोनों के बीच खुले विरोध को प्रदर्शित करने की नौबत तो हालाँकि नहीं आई, किंतु दोनों के बीच शीत-युद्ध की सी स्थिति हमेशा बनी रही है । यह पराग रावल के प्रयास हैं कि आज दोनों साथ-साथ मिलकर अपना चुनाव अभियान चला रहे हैं । पराग रावल को भी अनिकेत तलति की तुलना में पुरुषोत्तम खंडेलवाल के ज्यादा नजदीक पहचाना/समझा जाता है । समझा जाता है कि अनिकेत तलति को पुरुषोत्तम खंडेलवाल के साथ अपनी छतरी के नीचे लाने का काम पराग रावल ने यह सोच कर किया है, कि इससे उन्हें सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में मदद मिलेगी । अनिकेत तलति भी उनकी छतरी के नीचे आने के लिए इसीलिए तैयार हो गए, क्योंकि उन्हें भी अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक छतरी की जरूरत तो है ही । ब्रांच के चुनाव में अनिकेत तलति को यह सबक मिल ही गया था कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सिर्फ अपने पिता के भरोसे वह ज्यादा लंबी यात्रा नहीं कर सकेंगे । लोगों को लगता है कि पराग रावल और अनिकेत तलति अपने अपने मतलब से एक साथ आए हैं, और पुरुषोत्तम खंडेलवाल खेमेबाजी व दोस्ती के दबाव में - और शायद 'मजबूरी' में उनके साथ बने हैं; और यही चीज इन तीनों के साथ साथ वाले अभियान की सफलता को संदेहजनक बनाती है । इसी संदेह में सुबोध केडिया को अपने लिए उम्मीद नजर आती है । अनिकेत तलति व सुबोध केडिया के बीच चलने वाली लुकाछिपी ने अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है । 

Tuesday, September 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने से पराग रावल का रास्ता और आसान हुआ लगता है

अहमदाबाद । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत न होने से इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होने की पराग रावल की कोशिशों को जहाँ बल मिला है, वहाँ जुल्फेश शाह के गुजरात में वोट जुटाने के लिए दिलचस्पी लेने की खबरों ने पराग रावल के लिए चुनौती भी पैदा कर दी है । इस तरह पराग रावल के लिए हाल-फिलहाल के दिन मिलीजुली प्रतिक्रिया वाले रहे - एक तरफ उनके लिए अच्छी खबर रही, तो दूसरी तरफ उन्हें सावधानी बरतने वाला संदेश मिला । पराग रावल के समर्थकों तथा उनकी उम्मीदवारी में सकारात्मक संभावना देखने वाले लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने की जो अच्छी खबर है, उसका फायदा ज्यादा बड़ा है, और जुल्फेश शाह की सक्रियता के संदर्भ में सावधानी बरतने वाला संदेश - ठीक है कि एक संदेश है, लेकिन जो कोई नुकसान पहुँचाता हुआ नहीं दिख रहा है । इसलिए इंस्टीट्यूट के चुनाव के संदर्भ में उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद पराग रावल की उम्मीदवारी के समर्थक बम बम हैं । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए वेस्टर्न रीजन में होने वाले चुनाव में तमाम लोगों की निगाह पराग रावल पर टिकी हुई हैं । पिछले रीजनल काउंसिल के चुनाव में उन्हें कई सेंटर पर जिस तरह भर भर कर वोट मिले थे, उसे देखते और याद करते हुए कई लोगों को लग रहा है कि सेंट्रल काउंसिल में उनकी सीट तो पक्की है ही । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले रीजनल काउंसिल चुनाव में पहली वरीयता के 2068 वोट पाकर पराग रावल सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार तो बने ही थे, दूसरे नंबर पर रहे सुश्रुत चितले से वह बह्हह्हहुत आगे थे । वोट प्राप्त करने वालों की सूची में पराग रावल के बाद, दूसरे नंबर पर रहे सुश्रुत चितले को पहली वरीयता के 1555 वोट मिले थे । सबसे ज्यादा वोट पाने और दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार से पाँच सौ से अधिक वोटों से आगे रहने के तथ्य को देखते हुए ही सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत पराग रावल की उम्मीदवारी को सकारात्मक संभावना के साथ देखा जा रहा है । 
किंतु कई लोग पराग रावल की कामयाबी की संभावना को लेकर संशयग्रस्त भी हैं । उनका तर्क है कि सेंट्रल काउंसिल चुनाव का गणित रीजनल काउंसिल चुनाव के गणित से बिलकुल अलग होता है; तथा उसमें अलग तरह के ही फार्मूले काम करते हैं । माना जा रहा है कि इस बार जो कोटा बनेगा, उसे छू पाना हर किसी उम्मीदवार के लिए मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही होगा । इस कारण से प्रत्येक उम्मीदवार को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का सहारा लेना पड़ेगा । पराग रावल के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि उन्हें दूसरी/तीसरी वरीयता के ऐसे वोट आखिर कहाँ से मिलेंगे, तो सचमुच में उनके काम आ सकें ? मुंबई के बाहर के उम्मीदवारों के सामने दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाने की समस्या आती ही है । मजे की बात यह देखने में आती है कि मुंबई के उम्मीदवारों को तो मुंबई में भी तथा दूर-दराज की ब्रांचेज में भी दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट मिल जाते हैं; किंतु ब्रांचेज के उम्मीदवारों को मुंबई तो छोड़िये, दूसरी ब्रांचेज में भी दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट जुटाने के लाले पड़ जाते हैं । सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव के आँकड़े इस समस्या की व्यापकता को बहुत स्पष्टता के साथ सामने रखते हैं । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में प्रफुल्ल छाजेड़ से आगे रहने वाले दुर्गेश बुच और राजेश लोया तो देखते ही रह जाते हैं, जबकि दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों के सहारे प्रफुल्ल छाजेड़ का बेड़ा पार हो जाता है । पिछली बार जो समस्या दुर्गेश बुच के सामने थी, ठीक वही समस्या इस बार पराग रावल के सामने है । धिनल शाह तथा जय छैरा को पहली वरीयता के जो वोट मिले, उनमें से बहुतों के दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट निस्संदेह दुर्गेश बुच को मिले होंगे, किंतु वह वोट उनके काम तो नहीं आ सके । इस बार भी गुजरात क्षेत्र के वोट धिनल शाह, जय छैरा और पराग रावल के बीच ही बँटने का अनुमान है - इन तीनों में पराग रावल के तीसरे नंबर पर रहने का अनुमान है; ऐसे में पराग रावल को गुजरात क्षेत्र में मिलने वाले दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का कोई फायदा न मिलना निश्चित है । तब फिर, लाख टके का सवाल यह है कि पराग रावल को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोट आखिर कहाँ से मिलेंगे ?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि पहली वरीयता के वोटों में मुंबई के उम्मीदवार यदि पराग रावल के आसपास ही रहते हैं तो दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों को पाकर वह आगे निकल सकते हैं । पराग रावल के नजदीकियों तथा उनके समर्थकों का कहना लेकिन यह है कि इस समस्या से वह अच्छी तरह वाकिफ हैं, और इससे निपटने के लिए पराग रावल ने पूरी तैयारी की हुई है । पराग रावल के एक नजदीकी ने बताया कि एक अच्छी बात यह है कि इस बार की सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी का फैसला पराग रावल ने पिछले चुनाव के समय ही कर लिया था; और पिछले चुनाव में राजेश लोया तथा दुर्गेश बुच के साथ जो हुआ, उसका 'कारण' तभी पहचान/समझ लिया था । इसलिए पराग रावल ने पिछले ढाई वर्ष दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों की व्यवस्था करने का ही काम किया है । इसके लिए उन्होंने मुंबई में भी, तथा महाराष्ट्र की ब्रांचेज में भी अपना समर्थन आधार बनाया/बढ़ाया है । पराग रावल के नजदीकियों का कहना है कि पराग रावल ने अपनी उम्मीदवारी की सफलता की निर्भरता गुजरात तक ही सीमित नहीं रखी है, बल्कि महाराष्ट्र तक में प्रभावी अभियान चलाया है और अपनी पॉकेट्स बनाई हैं । ऐसा उन्होंने इसलिए भी किया, क्योंकि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को देखते हुए वह पहले से ही अपने चुनाव को काफी चुनौतीपूर्ण मान रहे थे । मनीष बक्षी को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, जिसके कारण मुसीबत पराग रावल के हिस्से ही आनी थी । इस मुसीबत से बचने के लिए ही पराग रावल ने गुजरात के बाहर भी अपने लिए समर्थन जुटाने के जुगाड़ किए हैं । ऐसे में अब जब मनीष बक्षी की उम्मीदवारी की संभावना ही खत्म हो गयी है, तो यह पराग रावल के लिए तो बड़े वरदान की बात हो गई है । 
इस वरदान के साथ लेकिन जुल्फेश शाह रूपी समस्या भी पराग रावल के सामने आ खड़ी हुई है । जुल्फेश शाह को दरअसल जबसे 'अपने घर' विदर्भ में झटके लगना शुरू हुए हैं, तब से समर्थन जुटाने के लिए उन्होंने इधर-उधर हाथ-पैर मारना शुरू किया है । इसके लिए उन्होंने गुजरात को अपने लिए एक आसान 'चारागाह' के रूप में पहचाना है । जुल्फेश शाह के नजदीकियों के अनुसार, गुजराती होने के कारण जुल्फेश शाह को लगता है कि वह गुजरात में यदि समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे, तो यहाँ अवश्य ही काफी समर्थन जुटा लेंगे । समझा जाता है कि जुल्फेश शाह को गुजरात में जो भी समर्थन मिलेगा, वह पराग रावल के समर्थन की कीमत पर ही मिलेगा । पराग रावल के समर्थक ही नहीं, कुछेक अन्य लोग भी लेकिन इस बात से सहमत नहीं दिख रहे हैं । उनका कहना है कि जुल्फेश शाह यदि पहले से गुजरात में कुछ काम करते, तो यहाँ समर्थन जुटा भी सकते थे; लेकिन गुजराती होने का फायदा उठाने के बारे में उन्होंने बहुत देर से सोचा, और तब तक यहाँ की सारी जगह दूसरों ने कब्जा ली है । जुल्फेश शाह के लिए समस्या की बात यहाँ यह है कि यहाँ उनकी वकालत करने के लिए प्रमुख नाम नहीं हैं । अहमदाबाद का ही उदाहरण देते हुए कहा/बताया जा रहा है कि बाहर के उम्मीदवारों में यहाँ उनसे ज्यादा वोट तो बीएम अग्रवाल को ही मिल जायेंगे, जिनकी वकालत यहाँ राजू शाह कर रहे हैं । चुनावी खिलाड़ियों का आकलन है कि गुजरात में इस बार नौ हजार के करीब वोट पड़ेंगे, जिनमें से डेढ़ हजार के करीब वोट बाहर के उम्मीदवारों में बँटेंगे - निश्चित ही इनमें से कुछ जुल्फेश शाह को भी मिलेंगे; लेकिन इससे पराग रावल के लिए कोई खतरा पैदा होने की उम्मीद नहीं है । पराग रावल की उम्मीदवारी को कामयाब होता देख रहे लोगों में भले ही कुछ अगर-मगर चल रहे हों, लेकिन पराग रावल की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच उनकी सफलता को लेकर पूरी आश्वस्ति है । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी न आने से तो वह और भी उत्साहित हो उठे हैं । 

Tuesday, September 8, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट बंसीधर मेहता की बेटी दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है और उनकी किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं

मुंबई । दृष्टि देसाई ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके वेस्टर्न रीजन में ही नहीं, बल्कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में हलचल मचा दी है । दृष्टि देसाई बंसीधर मेहता की बेटी हैं । बंसीधर मेहता का परिचय सिर्फ यही नहीं है कि वह करीब तीन दशक पूर्व, वर्ष 1981-82 में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे; उनका परिचय इससे कहीं बड़ा है - और वह यह कि वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आज भी एक 'सुपर स्टार' की हैसियत रखते हैं; मुंबई जैसे शहर के किसी सेमिनार में वह स्पीकर होते हैं तो तीन-चार हजार चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तुरंत से उपस्थित हो जाते हैं; और इन उपस्थित होने वालों में भी अधिकतर नामी और व्यस्त रहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स होते हैं । उनकी प्रोफेशनल एक्सपर्टीज की स्थिति यह है कि देश के बड़े कॉर्पोरेट्स घरानों की कंपनियाँ उनकी क्लाइंट हैं, और उनकी फर्म के ऑर्टिकल्स बड़ी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स फर्मों में - यहाँ तक की बिग फोर फर्मों में पार्टनर हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उनकी 'उपस्थिति' की स्थिति यह है कि उनके बाद सेंट्रल काउंसिल में गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन, प्रफुल्ल छाजेड़ उनके नाम को बनाए हुए हैं । ऐसे में दृष्टि देसाई के इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में पड़े कदम को इंस्टीट्यूट की राजनीति के संदर्भ में एक बड़ी घटना के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और लोग चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट की अगले वर्षों की चुनावी राजनीति को दृष्टि देसाई के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखने/पहचानने लगे हैं ।
देखने/पहचानने की इसी प्रक्रिया में लोगों को हालाँकि आश्चर्य इस बात पर है कि दृष्टि देसाई ने रीजनल काउंसिल की बजाए सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत क्यों नहीं की ? सभी मानते और कहते हैं कि दृष्टि देसाई यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करतीं, तो शर्तिया जीततीं । वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में उन्हें सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस नाते दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी को प्रीति सावला और श्रुति शाह के लिए खासी बड़ी चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । प्रीति सावला तो पिछली बार वोट पाने वालों में पहली वरीयता के 1514 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रही थीं, इसलिए बहुत संभव है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी से उन्हें वोटों का झटका भले ही लगे, लेकिन रीजनल काउंसिल में उनकी सीट बची रह जाए; किंतु पहली वरीयता के 516 वोटों के साथ 28वें नंबर पर रहने वाली श्रुति शाह के लिए हालात सचमुच मुश्किल हो गए हैं । मामूली अंतर से पिछड़ जाने वाली वंदना डोढिया के लिए, दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी के चलते इस बार संभावना और कमजोर पड़ गई दिख रही है । दरअसल इसीलिए दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है । माना जा रहा है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी - और उनकी निश्चित जीत की उम्मीद ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों की किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं । रीजनल काउंसिल के मुंबई के बाहर के उम्मीदवारों को लग रहा है कि दृष्टि देसाई मुंबई के उम्मीदवारों को वोटों का जो नुकसान पहुँचाएंगी, उसके कारण उनकी 'लॉटरी' निकल सकती है । 
रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के बीच हो रहे नफे-नुकसान के इस आकलन के बीच कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी मानना और कहना है कि दृष्टि देसाई की सफलता एक उम्मीदवार के रूप में उनकी चुनावी व्यूह-रचना और उनकी सक्रियता पर निर्भर करेगी । यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके पिता बंसीधर मेहता उनकी उम्मीदवारी के लिए वैसी सक्रियता बिलकुल भी नहीं दिखाएंगे, जैसी सक्रियता अहमदाबाद से रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले अनिकेत तलति के लिए उनके पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति दिखा रहे हैं । बंसीधर मेहता को बहुत ही सिद्धांत-प्रिय और तड़क-भड़क तथा महत्वाकांक्षाओं से दूर रहने वाले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसीलिए विश्वास किया जाता है कि दृष्टि देसाई को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी । बंसीधर मेहता के ऑरा का, लोगों के बीच उनके प्रभाव का, लोगों की उनके प्रति 'भक्ति' का फायदा दृष्टि देसाई को अवश्य ही मिल सकेगा - लेकिन यह तब मिल सकेगा, जब दृष्टि देसाई इस फायदे को जुटाने के लिए 'व्यवस्था' करेंगी । इस बात को स्वीकार करते हुए दूसरे लोगों का कहना है कि दृष्टि देसाई अब जब चुनावी मैदान में कूद पड़ी हैं, तो इतना तो वह समझ ही रही होंगी कि यहाँ एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें अपनी सक्रियता तो दिखानी ही होगी और चुनाव को 'मैनेज' करने में उन्हें जुटना ही होगा । उन्होंने देखा ही है, और अवश्य ही इसे नोट भी किया होगा कि बंसीधर मेहता के 'नाम' के बावजूद गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन और प्रफुल्ल छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपने अपने पापड़ स्वयं ही बेले हैं ।   
दृष्टि देसाई एक प्रोफेशनल होने के साथ साथ सामाजिक भूमिका निभाने में दिलचस्पी लेती रही हैं, और सेमीनारों में वक्ता के रूप में वह अपनी रुचि से भाग लेती रही हैं । वह जिन कुछेक कमेटियों में सदस्य और या पदाधिकारी रही हैं, वहाँ भी उन्होंने अपनी संलग्नता प्रदर्शित की है । इन तथ्यों को रेखांकित करते हुए उन्हें जानने वाले लोगों का कहना है कि 'चुनावी जरूरतों' का उन्हें निश्चित ही अहसास और आभास होगा, तथा उन्हें पूरा करने में वह कोई कमी भी नहीं रहने देंगी । उन्हें निश्चित ही इस बात का भी अहसास और आभास होगा कि उनकी चुनावी सक्रियता और उपलब्धियाँ प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट में 'लेजेंड' के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले उनके पिता बंसीधर मेहता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ी है - और इसलिए वह एक उम्मीदवार के रूप में अपनी सक्रियता को गंभीरता से ही लेंगी । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दृष्टि देसाई ने अपनी उपस्थिति को यदि सचमुच गंभीरता से लिया - तो लोगों का मानना और विश्वासपूर्वक कहना है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह एक नया अध्याय लिखेंगी ।

Sunday, August 9, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति ने अपने पार्टनर मनीष बक्षी को 'निपटा' देने के साथ-साथ अपने बेटे अनिकेत तलति को दोतरफा रूप से 'सुरक्षित' कर लेने के लिए चाल तो बड़ी ऊँची चली है, लेकिन अनिकेत तलति को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाने का पेंच उनके सामने अभी फँसा भी हुआ है

अहमदाबाद । सुनील तलति ने सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करवा कर अपने बेटे अनिकेत तलति के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने/रखने का प्रयास तो अच्छा किया है, लेकिन फिलहाल उनके लिए अनिकेत तलति को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है । उल्लेखनीय है कि पहले अनिकेत तलति के सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की चर्चा थी, किंतु अंततः सुनील तलति के बेटे की बजाए सुनील तलति के पार्टनर मनीष बक्षी की उम्मीदवारी प्रस्तुत हुई है । पिछले दो चुनावों में भी मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा थी, पर वह हो नहीं सकी थी । समझा जाता है कि सुनील तलति ने इस बार मनीष बक्षी को उम्मीदवार बनवा कर उनकी उम्मीदवारी का 'किस्सा'
हमेशा के लिए खत्म कर देने की चाल चली है, जिससे कि वह आगे अनिकेत तलति के लिए समस्या न पैदा कर सकें । समझा जाता है कि सुनील तलति ने यह बड़ी ऊँची चाल चली है - जिसमें उन्होंने मनीष बक्षी को 'निपटा' देने के साथ-साथ अनिकेत तलति को दोतरफा रूप से 'सुरक्षित' कर लिया है । सुनील तलति ने दरसअल जान/समझ लिया कि धीनल शाह और पराग रावल की उम्मीदवारी के रहते हुए सेंट्रल काउंसिल में अनिकेत तलति का इस बार जीतना मुश्किल क्या, असंभव ही है; जीतना मनीष बक्षी को भी नहीं है - और इस तरह सुनील तलति ने सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी से अनिकेत तलति को पीछे खींच कर एक तरफ तो उन्हें हार के दाग से बचा लिया, और दूसरी तरफ मनीष बक्षी की 'बलि' लेकर अनिकेत तलति के लिए आगे का रास्ता भी साफ कर लिया है । 
सुनील तलति की यह चाल है तो बड़ी ऊँची, लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच अनिकेत तलति को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाने को लेकर फँसा है । इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति के लिए अपने बेटे को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाना यूँ तो कोई मुश्किल नहीं होना चाहिए, किंतु अहमदाबाद में रीजनल काउंसिल के लिए चार उम्मीदवार हो जाने से मामला जरा टेढ़ा सा हो गया है । बात चार उम्मीदवारों की भी नहीं है - असल बात यह है कि चार उम्मीदवारों में सबसे कमजोर स्थिति अनिकेत तलति की ही है, और उन्हीं पर चौथी सीट निकालने की जिम्मेदारी भी है । वेस्टर्न रीजनल काउंसिल के 22 सदस्यों में अहमदाबाद से अभी तीन सदस्य हैं, जिनमें से एक पराग रावल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हो गए हैं; तथा बाकी दो सुबोध केडिया व प्रियम शाह रीजनल काउंसिल की सदस्यता को बनाये रखने के लिए चुनावी मैदान में होंगे । रीजनल काउंसिल के लिए नए उम्मीदवारों के रूप में अनिकेत तलति और पुरुषोत्तम खण्डेलवाल का नाम आया है । इन दोनों में पुरुषोत्तम खण्डेलवाल की उम्मीदवारी को अनिकेत तलति की उम्मीदवारी के मुकाबले भारी देखा/पहचाना जा रहा है - इस नाते से सुबोध केडिया, प्रियम शाह व पुरुषोत्तम शाह की जीत को सुनिश्चित माना जा रहा है; किंतु अनिकेत तलति तक आते आते मामला फँसता नजर आ रहा है । 
इसका कारण यह है कि पिछली बार अहमदाबाद ब्रांच के चुनाव में अनिकेत तलति की स्थिति पुरुषोत्तम खण्डेलवाल के मुकाबले बहुत पीछे थी । पुरुषोत्तम खण्डेलवाल को पहली वरीयता के जहाँ 638 वोट मिले थे, वहाँ अनिकेत तलति को मात्र 196 वोट ही मिले थे । चुनाव में कुल पड़े वोटों का 27 प्रतिशत हिस्सा अकेले पुरुषोत्तम खण्डेलवाल को मिला था, और इस तरह से उन्होंने एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया था । ब्रांच में काम करते हुए उन्होंने लोगों के बीच अपनी स्थिति को और सुदृढ़ ही बनाया है । ब्रांच में यूँ तो अनिकेत तलति की परफॉर्मेंस भी अच्छी ही रही है, किंतु वह इतनी अच्छी नहीं रही है कि पुरुषोत्तम खण्डेलवाल के साथ उनका जो अंतर रहा था - उसे खत्म या कम कर सके । सुनील तलति के बेटे होने के बावजूद अनिकेत को ब्रांच के चुनाव में जिस तरह से पिछड़ना पड़ा था और अच्छी स्थिति प्राप्त कर पाने में वह विफल रहे थे - उसे देखते हुए ही रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी के सफल होने को लेकर संदेह बना हुआ है ।
हालाँकि रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों में पराग रावल के न होने को अनिकेत तलति के लिए एक मौके के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के पिछले चुनाव में पराग रावल को पहली वरीयता के 2068 वोट मिले थे, जिस कारण से सुबोध केडिया और प्रियम शाह मुश्किल से अपनी सीट निकाल पाए थे । माना जा रहा है कि पराग रावल ने रीजनल काउंसिल छोड़ कर सेंट्रल काउंसिल का रुख करके रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों को राहत की बड़ी साँस दी है - और पिछली बार पराग रावल ने जो तमाम सारे वोट खुद झटक लिए थे, वह अब की बार सभी उम्मीदवारों में बटेंगे, और सभी की नैय्या पार हो जाएगी । कुछेक लोगों को लेकिन पराग रावल की जगह पुरुषोत्तम खण्डेलवाल लेते हुए नजर आ रहे हैं; और उन्हें लग रहा है कि पुरुषोत्तम खण्डेलवाल हो सकता है कि पराग रावल जितने वोट न भी ले पाएँ, तो भी सुबोध केडिया और प्रियम शाह के वोटों में जो सुधार होगा - वह अनिकेत तलति का रास्ता रोकने का काम करेगा । पिछले चुनाव में पहली वरीयता के वोटों की गिनती में प्रियम शाह 805 वोटों के साथ 14वें नंबर पर तथा सुबोध केडिया 686 वोटों के साथ 17वें नंबर पर थे; जो फाइनल नतीजे में क्रमशः 1103 वोटों के साथ 20वें और 1131 वोटों के साथ 19वें स्थान पर रहे थे । इस नतीजे के संदर्भ में देखें तो अहमदाबाद के चौथे उम्मीदवार के लिए रीजनल काउंसिल में जगह बनाना मुश्किल नजर आता है । अनिकेत तलति के लिए चुनौती की बात यह है कि चौथे उम्मीदवार के रूप में उन्हें ही देखा/पहचाना जा रहा है ।     
अनिकेत तलति के लिए यह चुनौती इसलिए और बड़ी है क्योंकि इस बार की उनकी उम्मीदवारी को अगली बार, यानि वर्ष 2018 में सेंट्रल काउंसिल के लिए उनकी संभावित उम्मीदवारी के लिए आधार भूमि तैयार करने के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । वर्ष 2018 में धीनल शाह द्वारा खाली की गई सीट पर अनिकेत तलति को फिट करने की अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए ही सुनील तलति ने इस बार मनीष बक्षी को बलि का बकरा बना दिया है । सुनील/अनिकेत तलति के कुछेक समर्थकों की सलाह थी भी कि अनिकेत को रीजनल काउंसिल के चुनाव के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि यदि वह चुनाव नहीं जीत सके तो फिर अगली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उनका दावा कमजोर हो जायेगा । सुनील तलति ने किंतु अपने अनुभव से जाना/सीखा है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में जानबूझ कर गैप करना नुकसान ही पहुँचाता है । इस तरह अनिकेत तलति के लिए एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है; इस स्थिति में उनकी उम्मीदवारी रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत तो हो गई है - किंतु इस प्रस्तुत हो गई उम्मीदवारी को कामयाब बनाने की चुनौती उनके सामने अभी मुँह बाये खड़ी है । 

Wednesday, January 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल के लिए वेस्टर्न रीजन से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वास्ते यदि दुर्गेश बुच को राजी नहीं किया जा सका; और या पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने की और कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी तो फिर सुनील तलति अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए ही उम्मीदवार बनायेंगे

अहमदाबाद । सुनील तलति वडोदरा में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने की संभावना में रुकावट डालने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसे लेकर वडोदरा के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच खासी नाराजगी है । उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2015 में होने वाले सेंट्रल काउंसिल के चुनाव के लिए वडोदरा में मनीष बक्षी को उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा है । इंस्टीट्यूट के चुनाव के संदर्भ में वडोदरा में यह दिलचस्प प्रथा है कि यहाँ उम्मीदवार का फैसला ब्रांच में आपसी विचार-विमर्श से होता है । इसी प्रथा के चलते सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी के नाम की चर्चा है । मनीष बक्षी वडोदरा में सुनील तलति की फर्म तलति एण्ड तलति के पार्टनर हैं । इस नाते सुनील तलति को खुश होना चाहिए था कि उनके पार्टनर को इस लायक समझा जा रहा है और उनकी उम्मीदवारी को एक तरफा समर्थन मिल रहा है । सुनील तलति लेकिन खुश नहीं हैं । ऊपर से तो वह हालाँकि कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन अंदरखाने उन्हें यह प्रयास करते हुए 'पाया' गया है कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को वडोदरा में स्वीकृति न मिले । वडोदरा में जो कुछ लोग मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के खिलाफ हैं, समझा जाता है कि सुनील तलति उन्हें हवा दे रहे हैं ताकि सेंट्रल काउंसिल के लिए मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने में फच्चर फँसे ।
सुनील तलति दरअसल अपने बेटे अनिकेत तलति को अगले चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाना चाहते हैं । समस्या यह है कि उनकी फर्म के पार्टनर मनीष बक्षी यदि उम्मीदवार बनते हैं, तब फिर उनके बेटे के लिए उम्मीदवार बन सकने का रास्ता बंद हो जायेगा । एक ही फर्म से दो उम्मीदवार तो नहीं आयेंगे न ! अपने बेटे के लिए उम्मीदवार बन सकने का रास्ता खुला रखने के लिए ही सुनील तलति को मनीष बक्षी के उम्मीदवार बनने के रास्ते को बंद करने की जरूरत आ पड़ी है । वडोदरा में वास्तव में इसलिए ही सुनील तलति द्धारा पर्दे के पीछे से किए जा रहे हस्तक्षेप को लेकर नाराजगी है । लोगों को इस बात पर खासा ऐतराज है कि पुत्र-मोह में सुनील तलति इतने स्वार्थी कैसे हो सकते हैं कि एक शहर/एक ब्रांच की अच्छी-भली प्रथा को डिस्टर्ब करने का काम करने लगें । लोगों का कहना है कि सुनील तलति अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के बारे में चिंता करें और अपने बेटे का भविष्य बनाने का प्रयास करें, इसमें कुछ भी गलत या अस्वाभाविक नहीं है; लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें अपने पार्टनर की भावनाओं के तथा एक शहर/एक ब्रांच की प्रथा के खिलाफ कोई षड्यंत्र नहीं करना चाहिए । लोगों का कहना है कि सुनील तलति इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट रह चुके हैं, इस नाते से उनसे बड़ी सोच रखने की और बड़प्पन दिखाने की उम्मीद की जाती है ।
सुनील तलति की अपने बेटे अनिकेत तलति को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाने की कोशिशों को लेकर अहमदाबाद में भी असंतोष सा है । अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में सुनील तलति का जो खेमा माना/पहचाना जाता है, उस खेमे से सेंट्रल काउंसिल के लिए पराग रावल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की तैयारी है । दूसरे खेमे के उम्मीदवार के रूप में दीनल शाह तीसरी बार उम्मीदवार बनेंगे ही । पराग रावल पिछले दो टर्म से रीजनल काउंसिल में हैं, और उनकी सक्रियता व लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि अबकी बार सेंट्रल काउंसिल में अहमदाबाद के दो लोग जा सकते हैं । लेकिन अनिकेत तलति के उम्मीदवार होने की स्थिति में खेमे में फूट पड़ेगी और उससे पराग रावल की जीतने की संभावना पर प्रतिकूल असर पड़ेगा । अनिकेत तलति अभी अहमदाबाद ब्रांच के चेयरमैन पद पर हैं । उनके ही कई एक नजदीकियों का मानना और कहना है कि उन्हें पहले रीजनल काउंसिल में आना चाहिए और अपने अनुभवों का विस्तार करना चाहिए और फिर सेंट्रल काउंसिल में आने के बारे में सोचना चाहिए । उनके कुछेक नजदीकियों का कहना है कि लेकिन सुनील तलति अपने बेटे को जल्दी से जल्दी सेंट्रल काउंसिल में देखना चाहते हैं । नजदीकियों के अनुसार, सुनील तलति चाहते हैं कि उनका बेटा जल्दी से सेंट्रल काउंसिल में आए, ताकि जल्दी से प्रेसीडेंट बने और फिर इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से फारिग होकर अपने काम-धंधे में लगे ।
सुनील तलति भी समझ रहे हैं कि पराग रावल के साथ साथ उनके बेटे अनिकेत तलति की भी उम्मीदवारी यदि आती है, तो बहुत संभव है कि दोनों में से कोई भी न जीते । इसके बावजूद वह अनिकेत तलति की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं । दरअसल उन्हें डर है कि पराग रावल यदि जीत गए, तब फिर अनिकेत तलति को नौ वर्ष इंतजार करना पड़ेगा । अब नौ वर्ष बाद क्या स्थिति होगी, यह आज/अभी कौन जानता है ? अहमदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच चर्चा यही है कि इस बार हार जाने की सुनिश्चितता के बावजूद सुनील तलति अपने बेटे को उम्मीदवार बनाना चाहते हैं तो इसके पीछे उनकी सोच यही है कि इस बार हार जाने के बाद पराग रावल अगली बार तो उम्मीदवार बनेंगे नहीं; दूसरे खेमे से भी कोई नया उम्मीदवार आयेगा और तब उनके बेटे अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पाने के लिए अच्छा मौका होगा । इस 'सोच' को फलीभूत करवाने के लिए सुनील तलति के नजदीकियों ने हालाँकि उन्हें एक और फार्मूला सुझाया है और वह यह कि अनिकेत तलति को अबकी बार रीजनल का चुनाव लड़वाओ और पराग रावल को सेंट्रल काउंसिल का चुनाव हरवाओ; उसके बाद अगली बार अनिकेत तलति के लिए सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश का मौका बनाओ । पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने के लिए दुर्गेश बुच को उम्मीदवार बनाओ/बनवाओ ।
दुर्गेश बुच पीछे दो बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बन चुके हैं, और दोनों ही बार असफल रहे । दुर्गेश बुच ऐलान कर चुके हैं कि अब आगे वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे । सुनील तलति को फार्मूला सुझाने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि दुर्गेश बुच ने ऐलान भले ही कर दिया हो, किंतु उन्हें यदि थोड़ा उकसाया जायेगा तो फिर वह अपनी उम्मीदवारी के लिए तैयार हो जायेंगे । इनका तर्क है कि 2012 के लिए भी पहले वह अपनी उम्मीदवारी की संभावना से इंकार करते थे, किंतु फिर बाद में उम्मीदवार बने न ! लोगों का कहना है कि सुनील तलति इस फार्मूले पर सहमत तो हैं, लेकिन वह आश्वस्त हो लेना चाहते हैं कि दुर्गेश बुच की उम्मीदवारी सचमुच आयेगी भी । इसीलिए तलति पिता-पुत्र की तरफ से यह अभी तक तय नहीं हो रहा है कि अनिकेत तलति की उम्मीदवारी रीजनल काउंसिल के लिए आएगी और या सेंट्रल काउंसिल के लिए । यह हालाँकि तय माना जा रहा है कि दुर्गेश बुच को यदि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए राजी नहीं किया जा सका; और या पराग रावल की हार को सुनिश्चित करने की और कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी तो फिर अनिकेत तलति खुद मोर्चा संभालेंगे और सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे ।
इसके लिए लेकिन मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को संभव होने से रोकना जरूरी है । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की स्थिति में सुनील तलति की अपने बेटे को लेकर बनाई जा रही सारी योजना पर पानी ही फिर जायेगा । मनीष बक्षी की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की स्थिति में अनिकेत तलति की उम्मीदवारी की तो फिर बात ही खत्म हो जाएगी । एक समस्या और है - सुनील तलति को जो डर पराग रावल की जीत से है, वही डर मनीष बक्षी की जीत से भी है । मनीष बक्षी यदि जीत गए तब भी तो अनिकेत तलति के लिए नौ वर्ष के लिए मौका गया । सुनील तलति इसीलिए वडोदरा में चक्कर चला रहे हैं कि मनीष बक्षी की उम्मीदवारी को वहाँ हरी झंडी मिले ही न । सुनील तलति के इस चक्कर ने लेकिन वडोदरा के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को नाराज कर दिया है । सुनील तलति की मजबूरी है कि अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के लिए उन्हें यह सब करना ही होगा, उससे कोई नाराज होता हो तो होता रहे !