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Tuesday, September 8, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट बंसीधर मेहता की बेटी दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है और उनकी किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं

मुंबई । दृष्टि देसाई ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके वेस्टर्न रीजन में ही नहीं, बल्कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में हलचल मचा दी है । दृष्टि देसाई बंसीधर मेहता की बेटी हैं । बंसीधर मेहता का परिचय सिर्फ यही नहीं है कि वह करीब तीन दशक पूर्व, वर्ष 1981-82 में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे; उनका परिचय इससे कहीं बड़ा है - और वह यह कि वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आज भी एक 'सुपर स्टार' की हैसियत रखते हैं; मुंबई जैसे शहर के किसी सेमिनार में वह स्पीकर होते हैं तो तीन-चार हजार चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तुरंत से उपस्थित हो जाते हैं; और इन उपस्थित होने वालों में भी अधिकतर नामी और व्यस्त रहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स होते हैं । उनकी प्रोफेशनल एक्सपर्टीज की स्थिति यह है कि देश के बड़े कॉर्पोरेट्स घरानों की कंपनियाँ उनकी क्लाइंट हैं, और उनकी फर्म के ऑर्टिकल्स बड़ी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स फर्मों में - यहाँ तक की बिग फोर फर्मों में पार्टनर हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उनकी 'उपस्थिति' की स्थिति यह है कि उनके बाद सेंट्रल काउंसिल में गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन, प्रफुल्ल छाजेड़ उनके नाम को बनाए हुए हैं । ऐसे में दृष्टि देसाई के इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में पड़े कदम को इंस्टीट्यूट की राजनीति के संदर्भ में एक बड़ी घटना के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और लोग चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट की अगले वर्षों की चुनावी राजनीति को दृष्टि देसाई के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखने/पहचानने लगे हैं ।
देखने/पहचानने की इसी प्रक्रिया में लोगों को हालाँकि आश्चर्य इस बात पर है कि दृष्टि देसाई ने रीजनल काउंसिल की बजाए सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत क्यों नहीं की ? सभी मानते और कहते हैं कि दृष्टि देसाई यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करतीं, तो शर्तिया जीततीं । वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में उन्हें सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस नाते दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी को प्रीति सावला और श्रुति शाह के लिए खासी बड़ी चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । प्रीति सावला तो पिछली बार वोट पाने वालों में पहली वरीयता के 1514 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रही थीं, इसलिए बहुत संभव है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी से उन्हें वोटों का झटका भले ही लगे, लेकिन रीजनल काउंसिल में उनकी सीट बची रह जाए; किंतु पहली वरीयता के 516 वोटों के साथ 28वें नंबर पर रहने वाली श्रुति शाह के लिए हालात सचमुच मुश्किल हो गए हैं । मामूली अंतर से पिछड़ जाने वाली वंदना डोढिया के लिए, दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी के चलते इस बार संभावना और कमजोर पड़ गई दिख रही है । दरअसल इसीलिए दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है । माना जा रहा है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी - और उनकी निश्चित जीत की उम्मीद ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों की किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं । रीजनल काउंसिल के मुंबई के बाहर के उम्मीदवारों को लग रहा है कि दृष्टि देसाई मुंबई के उम्मीदवारों को वोटों का जो नुकसान पहुँचाएंगी, उसके कारण उनकी 'लॉटरी' निकल सकती है । 
रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के बीच हो रहे नफे-नुकसान के इस आकलन के बीच कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी मानना और कहना है कि दृष्टि देसाई की सफलता एक उम्मीदवार के रूप में उनकी चुनावी व्यूह-रचना और उनकी सक्रियता पर निर्भर करेगी । यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके पिता बंसीधर मेहता उनकी उम्मीदवारी के लिए वैसी सक्रियता बिलकुल भी नहीं दिखाएंगे, जैसी सक्रियता अहमदाबाद से रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले अनिकेत तलति के लिए उनके पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति दिखा रहे हैं । बंसीधर मेहता को बहुत ही सिद्धांत-प्रिय और तड़क-भड़क तथा महत्वाकांक्षाओं से दूर रहने वाले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसीलिए विश्वास किया जाता है कि दृष्टि देसाई को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी । बंसीधर मेहता के ऑरा का, लोगों के बीच उनके प्रभाव का, लोगों की उनके प्रति 'भक्ति' का फायदा दृष्टि देसाई को अवश्य ही मिल सकेगा - लेकिन यह तब मिल सकेगा, जब दृष्टि देसाई इस फायदे को जुटाने के लिए 'व्यवस्था' करेंगी । इस बात को स्वीकार करते हुए दूसरे लोगों का कहना है कि दृष्टि देसाई अब जब चुनावी मैदान में कूद पड़ी हैं, तो इतना तो वह समझ ही रही होंगी कि यहाँ एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें अपनी सक्रियता तो दिखानी ही होगी और चुनाव को 'मैनेज' करने में उन्हें जुटना ही होगा । उन्होंने देखा ही है, और अवश्य ही इसे नोट भी किया होगा कि बंसीधर मेहता के 'नाम' के बावजूद गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन और प्रफुल्ल छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपने अपने पापड़ स्वयं ही बेले हैं ।   
दृष्टि देसाई एक प्रोफेशनल होने के साथ साथ सामाजिक भूमिका निभाने में दिलचस्पी लेती रही हैं, और सेमीनारों में वक्ता के रूप में वह अपनी रुचि से भाग लेती रही हैं । वह जिन कुछेक कमेटियों में सदस्य और या पदाधिकारी रही हैं, वहाँ भी उन्होंने अपनी संलग्नता प्रदर्शित की है । इन तथ्यों को रेखांकित करते हुए उन्हें जानने वाले लोगों का कहना है कि 'चुनावी जरूरतों' का उन्हें निश्चित ही अहसास और आभास होगा, तथा उन्हें पूरा करने में वह कोई कमी भी नहीं रहने देंगी । उन्हें निश्चित ही इस बात का भी अहसास और आभास होगा कि उनकी चुनावी सक्रियता और उपलब्धियाँ प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट में 'लेजेंड' के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले उनके पिता बंसीधर मेहता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ी है - और इसलिए वह एक उम्मीदवार के रूप में अपनी सक्रियता को गंभीरता से ही लेंगी । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दृष्टि देसाई ने अपनी उपस्थिति को यदि सचमुच गंभीरता से लिया - तो लोगों का मानना और विश्वासपूर्वक कहना है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह एक नया अध्याय लिखेंगी ।

Thursday, November 22, 2012

निहार जम्बूसारिया को रिलायंस कनेक्शन के जाल में घेरने और फँसाने की तरूण घिया की रणनीति ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है

मुंबई। तरूण घिया ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को जीत में बदलने के लिए कंपनी प्रतिनिधियों के खिलाफ जो अभियान छेड़ा/छिड़वाया हुआ है, उसने निहार जम्बुसारिया की उम्मीदवारी के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी है। उल्लेखनीय है कि तरूण घिया और उनके समर्थक अलग.अलग तरीकों से लोगों को आगाह कर रहे हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उन्हें ऐसे उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करना चाहिए जो किन्हीं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका तर्क है कि कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार सेंट्रल काउंसिल में पहुंच जाते हैं तो वहाँ वह इंस्टीट्यूट के और या प्रोफेशन के हितों का ध्यान नहीं रखते हैं, बल्कि अपनी कंपनी के हितों के अनुसार काम करते हैं। तरूण घिया के इस अभियान के निशाने पर निहार जम्बुसारिया को देखा/पहचाना जा रहा है। तरूण घिया और निहार जम्बुसारिया के बीच कुछ पुरानी खुन्नस की लोगों के बीच पहले से भी चर्चा है। रीजनल काउंसिल में निहार जम्बुसारिया तो चेयरपरसन बनने में कामयाब हो गये थे, लेकिन अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तरूण घिया वहां चेयरपरसन नहीं बन सके - इस तथ्य ने इन दोनों के बीच की कड़बाहटभरी दूरी को और बढ़ाने का ही काम किया। यह तथ्य दोनों के बीच कड़बाहट का कारण इसलिए बना क्योंकि दोनों का समर्थन आधार एक ही है। सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव में बहुत ही मामूली अंतर से आगे पीछे रहते हुए दोनों ही चुने जाने से रह गये थे; और अपनी अपनी हार के लिए दोनों ने एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराया था। इस बार भी, दोनों के ही सिर पर यह डर सवार है कि दूसरा उसके समर्थक तो नहीं तोड़ रहा है क्या ?
पिछले चुनाव के बाद, निहार जम्बुसारिया ने रिलायंस समूह ज्वाइन किया है - जिसके चलते इस बार उनकी उम्मीदवारी को पिछली बार की तुलना में ज्यादा मजबूत माना/समझा जा रहा है। ऐसे में, तरूण घिया के लिए डर यह पैदा हुआ है कि रिलायंस समूह के वोटों के कारण निहार जम्बुसारिया को जो फायदा होगा, उसके मनोवैज्ञानिक असर के चलते तरूण घिया के वोट भी निहार जम्बुसारिया की तरफ आकर्षित होंगे और तब तरूण घिया के सामने अपने वोटों को अपने साथ बनाये रखना भी मुश्किल होगा। समर्थन आधार एक होने के कारण तरूण घिया को यह डर सता रहा है कि रीजनल काउंसिल में उन्हें जिस तरह निहार जम्बुसारिया से पिछड़ना पड़ा - उसी तरह कहीं उन्हें सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी निहार जम्बुसारिया से मात न खानी पड़े। तरूण घिया पिछले चुनाव में जीत नहीं पाये थे, लेकिन उन्हें इस बात का  संतोष रहा कि उन्हें निहार जम्बुसारिया से ज्यादा वोट मिले - भले ही यह ज्यादा कोई ‘बहुत ज्यादा’ नहीं थे। पिछली बार का यह ‘संतोष’ कहीं इस बार उनसे न छिन जाये - इसलिए तरूण घिया ने कंपनी का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार की आड़ में निहार जम्बुसारिया के खिलाफ खुला अभियान छेड़ दिया है। निहार जम्बुसारिया इस अभियान के चलते भारी दबाव में हैं। रिलायंस कनेक्शन के भरोसे उन्हें अपनी जो लड़ाई आसान दिख रही थी, तरूण घिया के अभियान के चलते वह मुश्किल में फंस गई दिख रही है। रिलायंस कनेक्शन के कारण निहार जम्बुसारिया को फायदा होने के दावे को लेकर कई लोगों को हालांकि शक भी था। ऐसे लोगों का कहना रहा है कि जिस रिलायंस कनेक्शन के कारण भावना दोषी को इंस्टीट्यूट के चुनाव से बाहर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा है, वही रिलायंस कनेक्शन निहार जम्बुसारिया के लिए फायदेमंद कैसे हो सकता है ?
उल्लेखनीय है कि भावना दोषी को अपने पति गौतम दोषी के रिलायंस की ‘सेवा’ करने के चक्कर में जेल जाने के कारण मिली बदनामी के चलते ही सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति से बाहर होने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि गौतम दोषी खुद भी सेंट्रल काउंसिल में दो टर्म सदस्य रह चुके हैं। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भावना दोषी ने सफलता की जो सीढि़यां तेजी से चढ़ीं हैं, वह हालांकि उनके व्यक्तित्व की अपनी काबिलियत और उनकी अपनी क्षमताओं भरी सक्रियता का ही नतीजा है, लेकिन गौतम दोषी की पहले से ही बनी प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का भी फायदा भावना दोषी को मिला ही है। भावना दोषी को गौतम दोषी की प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का यदि फायदा मिला, तो गौतम दोषी के जेल जाने से मिली बदनामी का नुकसान भी उठाना पड़ा। भावना दोषी के साथ जो हुआ, वह तो गौतम दोषी की कारस्तानी के चलते हुआ; लेकिन गौतम दोषी के साथ जो हुआ, वह इस बात का सुबूत है कि ‘व्यवस्था’ कैसे किसी अच्छे भले व्यक्ति को इस्तेमाल करती है। गौतम दोषी एक निहायत भले और सरल व्यक्ति के रूप में लोगों के बीच पहचाने जाते थे। गौतम दोषी से एक बार मिल लेने वाला व्यक्ति भी उनकी सरलता और सज्जनता का कायल हो जाता था; उनकी विद्धता से तो वह लोग भी परिचित हैं जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते हैं। चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन से संबद्ध शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जिस पर गौतम दोषी की एक्सपर्टीज न हो। कंपनियों के विलय और अधिग्रहण जैसे मामलों में तो गौतम दोषी की जो एक्सपर्टीज रही है, उसके चलते वह देश के नामी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में गिने और पहचाने जाने लगे थे। गौतम दोषी को जानने वाले लोग जानते हैं कि गौतम दोषी ने अपनी काबिलियत से नाम और दाम दोनों कमाये हैं, और इतने कमाये हैं कि उसके बाद उनके मन में कोई लालच या कोई स्वार्थ बचा नहीं हो सकता। प्रोफेशन में गौतम दोषी की जो धाक और पहचान थी, उनकी जो संलग्नता थी, प्रोफेशन के प्रति उनका जो कमिटमेंट ‘दिखता’ था, उसे जानने/पहचानने वाले लोगों को हैरानी थी कि रिलायंस से उन्हें आखिर ऐसा क्या मिला कि वह प्रोफेशन से ही ‘किनारा’ कर बैठे।
उस समय तो किसी को भी यह पहेली समझ नहीं आई थी - जिन्होंने समझने का दावा भी किया था, उनका भी सिर्फ यही कहना था कि गौतम दोषी पैसा और पोजीशन के चक्कर में ही अनिल अंबानी ग्रुप में गये थे; लेकिन जो लोग उन्हें जानते थे, वह इस बात पर इसलिए विश्वास नहीं करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि पैसा और पोजीशन का संकट तो गौतम दोषी के साथ था ही नहीं - संकट इसलिए भी नहीं था क्योंकि गौतम दोषी असंतोषी, लालची और स्वार्थी किस्म के व्यक्ति के रूप में ‘दिखते’ ही नहीं थे। जो व्यक्ति असंतोषी नहीं हैं, लालची नहीं है, स्वार्थी नहीं है, अपने प्रोफेशन के प्रति पूरी तरह समर्पित है, प्रोफेशन को दशा और दिशा देने वाली संस्था (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स) और संस्था की कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करने वाली टीम (सेंट्रल काउंसिल) के साथ गहरे से जुड़ा है - वह एक दिन अचानक प्रोफेशन को छोड़ कर एक ऐसे कार्पोरेट समूह का हिस्सा बन जाता है जिसकी छवि बहुत पाक.साफ नहीं है: अनिल अंबानी ग्रुप को ज्वाइन करने के गौतम दोषी के फैसले पर - उन्हें जानने वालों के लिए हैरान होने के पूरे कारण मौजूद थे। हैरान होने का कारण यह भी था कि अनिल अंबानी ग्रुप ने गौतम दोषी को आखिर क्या ‘देख’ कर अपने यहां एक बड़ा ओहदा दिया। गौतम दोषी को जानने वाले लोगों को यही लगता था कि अनिल अंबानी ग्रुप में ओहदे पर बैठे लोगों से जिस तरह की ‘सेवाओं’ की उम्मीद की जायेगी, उस तरह की ‘सेवा’ तो गौतम दोषी नहीं दे पायेंगे। उन्हीं जानने वाले लोगों में से बहुतों को अब यह लग रहा है कि वह गौतम दोषी को वास्तव में कितना कम जानते थे, और अनिल अंबानी ने गौतम दोषी को कितना सही पहचाना था।
अनिल अंबानी ग्रुप में गौतम दोषी ‘जो’ करने के लिए गए, ‘जो’ करने के लिए अनिल अंबानी ने उन्हें चुना - और ‘जिसे’ करने के चक्कर में वह जेल के सींखचों के पीछे जा पहुंचे - उसने उनकी साख व प्रतिष्ठा को तो धूल में मिला ही दिया; उनकी पत्नी भावना दोषी की सेंट्रल काउंसिल की राजनीति को भी ग्रहण लगा दिया। भावना दोषी इंस्टीट्यूट की अध्यक्ष पद की प्रबल दावेदार के रूप में देखी जाने लगीं थीं और अगले टर्म में उनके अध्यक्ष चुने जाने की उम्मीदें की जा रही थीं। रिलायंस कनेक्शन ने लेकिन सब चैपट कर दिया। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का यह एक ट्रेजिडीभरा पक्ष ही कहा जायेगा कि जिस रिलायंस कनेक्शन ने भावना दोषी की चुनावी राजनीति का बेड़ा गर्क किया, उसी रिलायंस कनेक्शन के भरोसे निहार जम्बुसारिया ने सेंट्रल काउंसिल में अपने प्रवेश करने की उम्मीद पैदा की। निहार जम्बुसारिया जिस रिलायंस कनेक्शन के भरोसे सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पा लेने की उम्मीद लगाये हुए हैं, उसी रिलायंस कनेक्शन को तरूण घिया ने निहार जम्बुसारिया के खिलाफ अपना हथियार बना लिया है। गौतम दोषी और भावना दोषी के साथ जो हुआ, उसने तरूण घिया के हथियार को धारदार बना दिया है। रिलायंस कनेक्शन के जाल में निहार जम्बूसारिया को घेरने और फँसाने की तरूण घिया ने जो रणनीति बनाई है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी लड़ाई को खासा दिलचस्प बना दिया है ।