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Sunday, July 19, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की वर्चुअल सीपीई मीटिंग में पंकज गुप्ता की भागीदारी देख कर लोगों को विश्वास हो चला है कि शशांक अग्रवाल ने आखिरकार पंकज गुप्ता को 'मैनेज' कर लिया है, और अब सभी वेंडर्स व फैकल्टीज के भुगतान हो जायेंगे

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन शशांक अग्रवाल को अंततः ट्रेजरर पंकज गुप्ता के सामने समर्पण करने के लिए मजबूर होना ही पड़ा, और कल शाम आयोजित हुई एक वर्चुअल सीपीई मीटिंग के निमंत्रण पत्र पर उनकी तस्वीर छाप कर शशांक अग्रवाल ने पंकज गुप्ता की नाराजगी को खत्म करने की कोशिश की । शशांक अग्रवाल हालाँकि कोशिश तो कर रहे थे कि पंकज गुप्ता उनके सामने समर्पण करेंगे, लेकिन उनकी कोशिशें सफल नहीं हो सकीं - और उन्हें ही पंकज गुप्ता के सामने झुकना पड़ा । पंकज गुप्ता को खुश करने व रखने के लिए शशांक अग्रवाल ने पंकज गुप्ता के नजदीकी विजय गुप्ता को भी, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए अमेरिका में अवसर तलाशने के मुद्दे पर हुई वर्चुअल सीपीई मीटिंग में शामिल किया और उनकी भी तस्वीर निमंत्रण पत्र में प्रकाशित की । उम्मीद की जा रही है कि पंकज गुप्ता के सामने समर्पण करके तथा उन्हें खुश करने की कोशिशो से शशांक अग्रवाल ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता से वेंडर्स व जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज को दिए जाने वाले चेक्स पर हस्ताक्षर करवा लेंगे, तथा भुगतान न हो पाने के आरोपों से छुटकारा पा लेंगे । उल्लेखनीय है कि पिछले महीने आयोजित हुई रीजनल काउंसिल की एक ऑनलाइन मीटिंग में रीजनल काउंसिल को विभिन्न सर्विसेज उपलब्ध करवाने वाले वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज को महीनों से भुगतान न होने का मुद्दा उठाया गया था, जिसका ठीकरा शशांक अग्रवाल ने ट्रेजरर पंकज गुप्ता के सिर पर यह कहते/बताते हुए फोड़ दिया था कि उन्होंने तो सब हिसाब बना/बनवा लिए हैं - लेकिन चेक्स पर ट्रेजरर पंकज गुप्ता द्वारा हस्ताक्षर न किए जाने के कारण भुगतान नहीं हो पाए हैं । मीटिंग के बाद शशांक अग्रवाल ने हालाँकि लोगों को आश्वस्त किया था कि वह पंकज गुप्ता को 'मैनेज' कर लेंगे ।
कल शाम हुई मीटिंग के निमंत्रण पत्र को देखने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को आभास हो चला है कि पंकज गुप्ता 'मैनेज' हो गए हैं । पंकज गुप्ता के नजदीकियों का कहना/बताना है कि पंकज गुप्ता ज्यादा 'डिमांडिंग' नहीं हैं, उन्हें इस बात से ज्यादा मतलब नहीं है कि चेयरमैन के रूप में शशांक अग्रवाल कहाँ कैसे क्या कर रहे हैं - वह तो सिर्फ इतना चाहते हैं कि ट्रेजरर के रूप में उनसे जिन चेक्स पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाए, उसका पूरा विवरण उन्हें दिया जाए । नजदीकियों के अनुसार, शशांक अग्रवाल ने जिन मामलों में विवरण दिए, पंकज गुप्ता ने उनके भुगतान को तुरंत हरी झंडी दे दी । शशांक अग्रवाल के नजदीकियों का कहना लेकिन यह रहा है कि पंकज गुप्ता रीजनल काउंसिल के हर कार्यक्रम में विशेष तवज्जो पाने की उम्मीद करते हैं, और सिर्फ अपने लिए ही नहीं - बल्कि अपने साथियों को भी तवज्जो देने की माँग करते रहे हैं, और 'माँग पूरी न होने पर' ही उन्होंने भुगतान रोक कर शशांक अग्रवाल के लिए परेशानी पैदा करना शुरू किया । पंकज गुप्ता को ऐसा करने का मौका उन आरोपों से मिला, जिनमें शशांक अग्रवाल पर अपने नजदीकियों को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से मनमाने तरीके से वेंडर्स व फैकल्टीज नियुक्त करने तथा उन्हें अनाप-शनाप तरीके से भुगतान करने की कोशिश करने की बातें कहीं गईं । इस तरह के आरोप चूँकि काउंसिल सदस्यों ने ही लगाए, और शशांक अग्रवाल काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर जिस तरह से चुप्पी साधते व छिपते/बचते नजर आए - उससे शशांक अग्रवाल आरोपों के घेरे में और फँसते गए । ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता ने शशांक अग्रवाल द्वारा बनाये/बनवाये गए हिसाब पर आँखमूंद कर हस्ताक्षर करने से इंकार करके उस घेरे को और कसने का काम किया ।
शशांक अग्रवाल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि हिसाब के विवरण की बात तो एक बहाना है, असल समस्या रीजनल काउंसिल के कार्यक्रमों में तवज्जो पाना है - इसलिए अब जब रीजनल काउंसिल की वर्चुअल सीपीई मीटिंग में पंकज गुप्ता तथा उनके साथी विजय गुप्ता को शामिल कर लिया गया है, और उनकी तस्वीरें भी निमंत्रण पत्र में प्रमुखता से छापी हैं; तो अब देखियेगा कि सभी चेक्स धड़ाधड़ हस्ताक्षरित हो जायेंगे और सभी वेंडर्स व फैकल्टीज के भुगतान हो जायेंगे । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों के बीच कार्यक्रमों में मंच पर बैठने तथा निमंत्रण पत्र व बैकड्रॉप में नाम/तस्वीर होने को लेकर 'झगड़े' हालाँकि हमेशा होते रहे हैं - लेकिन मौजूदा टर्म में यह झगड़े बहुत ही निचले स्तर पर पहुँचे हुए नजर आ रहे हैं । इसी चक्कर में रीजनल काउंसिल के मौजूदा टर्म का पहला और पिछ्ला वर्ष बर्बाद हुआ; दूसरे व मौजूदा वर्ष में लॉकडाउन के कारण हालाँकि ज्यादा मौके नहीं बने - लेकिन फिर भी पदाधिकरियों ने झगड़ने के मौके बना लिए, जिसके चलते भुगतान अटके और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । कल शाम हुई वर्चुअल सीपीई मीटिंग में पंकज गुप्ता को विजय गुप्ता के साथ तवज्जो मिली देख लोगों को उम्मीद बनी है कि इससे शशांक अग्रवाल व पंकज गुप्ता के बीच झगड़ा खत्म होगा, और रीजनल काउंसिल का काम पटरी पर लौटेगा । 

Friday, June 26, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति तथा उनके भुगतान में घपलेबाजी के काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर, चुप्पी साध कर बचने की चेयरमैन शशांक अग्रवाल की कोशिश ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से मुश्किल में पड़ी; लेकिन शशांक अग्रवाल को भरोसा है कि वह पंकज गुप्ता को 'मैनेज' कर लेंगे   

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पहले अविनाश गुप्ता और गौरव गर्ग ने आरोप लगाए कि चेयरमैन शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव नहीं देते है, और अब चेयरमैन शशांक अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि ट्रेजरर पंकज गुप्ता चेक साइन नहीं कर रहे हैं - जिसके चलते वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान नहीं हो पा रहे हैं । आज आयोजित हुई एक ऑनलाइन मीटिंग में शशांक अग्रवाल ने पहले तो नितिन कँवर, गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता को मीटिंग में शामिल होने से रोका; लेकिन सुमित गर्ग ने उनसे जब इन तीनों को भी मीटिंग में शामिल करने का अनुरोध किया - तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि यह तीनों यदि मीटिंग में शामिल हुए, तो वह मीटिंग से निकल जायेंगे । पंकज गुप्ता मीटिंग में शामिल ही नहीं हुए । इन आरोपों और बातों से जाहिर है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूरी तरह से अराजकता का माहौल है, और शशांक अग्रवाल पिछले चेयरमैन हरीश जैन के ही नक्शेकदम पर हैं - जिनसे इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कार्यभार छीन लिया था, और वह बस नाम के ही चेयरमैन रह गए थे । हरीश जैन की जो गत बनी, और जिसके चलते रीजनल काउंसिल महीनों तक सस्पेंड रही - उसके चलते उम्मीद की गई थी कि शशांक अग्रवाल सबक लेंगे और अपने साथी पदाधिकारियों तथा सदस्यों के साथ तालमेल बना कर काम करेंगे । लेकिन लग ऐसा रहा है कि जैसे शशांक अग्रवाल खुद को हरीश जैन से भी 'बुरा' साबित करने की 'कोशिशों' में जुट गए हैं । शशांक अग्रवाल हालाँकि खुशकिस्मत रहे कि कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण बने हालात की वजह से उनकी कारगुजारियाँ अभी तक ढकी/छिपी रही थीं, लेकिन जो अब धीरे-धीरे खुल रही हैं, और सामने आ रही हैं ।
रीजनल काउंसिल को विभिन्न सर्विस मुहैया करवाने वाले वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान को लेकर शशांक अग्रवाल की स्थिति पिछले चेयरमैन हरीश जैन जैसी ही है । इन्हें होने वाले भुगतान करीब तीन महीनों से रुके पड़े हैं । उल्लेखनीय है कि हरीश जैन के चेयरमैन रहते हुए भी यही हाल था; और मजे की बात यह है कि हरीश जैन की तरह शशांक अग्रवाल भी इसके लिए ट्रेजरर को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । आज हुई एक मीटिंग में यह सवाल उठा तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि उन्होंने तो सब हिसाब बना दिए हैं, लेकिन चेक्स पर ट्रेजरर पंकज गुप्ता के साइन न हो पाने के कारण भुगतान नहीं हो सके हैं । मीटिंग में चूँकि पंकज गुप्ता उपस्थित नहीं थे, इसलिए उनका पक्ष सामने नहीं आ सका है; लेकिन मीटिंग में मौजूद उनके नजदीकी शशांक अग्रवाल के इस जबाव पर चुप रहे - जिससे शशांक अग्रवाल की बात को बल मिला । मीटिंग के बाद हुई अनौपचारिक चर्चाओं में बात सामने आई कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को शशांक अग्रवाल के बनाए/दिए हिसाब में कई विवरण आपत्तिजनक लगे, जिन पर उन्होंने स्पष्टीकरण माँगे - लेकिन जो उन्हें नहीं मिले, इसलिए भुगतान अटक गए । हरीश जैन की ही तरह, शशांक अग्रवाल पर भी मनमाने तरीके से वेंडर्स व फैकल्टीज नियुक्त करने तथा उन्हें अनाप-शनाप तरीके से भुगतान करने की कोशिश करने के आरोप हैं । काउंसिल सदस्यों के ही आरोप हैं कि शशांक अग्रवाल ने अपने जानने वालों तथा अपने नजदीकियों को फायदा पहुँचाने का काम किया है । समझा जाता है कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को भी चूँकि इस तरह के आरोपों में सच्चाई नजर आई, और इसीलिए उन्होंने आँख मूँद कर चेक्स पर साइन करने से इंकार कर दिया; शशांक अग्रवाल ने मीटिंग में यह तो बता दिया कि ट्रेजरर द्वारा चेक्स साइन नहीं करने के कारण भुगतान नहीं हो पा रहे हैं - किंतु इस बात को वह छिपा गए कि ट्रेजरर साइन कर क्यों नहीं रहे हैं ?
शशांक अग्रवाल को डर हुआ कि जिस सच्चाई को वह छिपा रहे हैं, उस सच्चाई को कहीं नितिन कँवर, गौरव गर्ग व अविनाश गुप्ता न जाहिर कर दें - इसीलिए उन्होंने इन तीनों को मीटिंग में शामिल करने से इंकार कर दिया; और इन्हें मीटिंग में शामिल करने के सुमित गर्ग के अनुरोध को भी नहीं माना - उलटे धमकी और दी कि मीटिंग में यदि यह तीनों शामिल हुए, तो वह मीटिंग में मौजूद नहीं रहेंगे । गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए हैं कि शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव तक नहीं देते हैं । समझा जाता है कि गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति में होने वाली मनमानी तथा उन्हें होने वाले भुगतान की घपलेबाजी को लेकर सवाल पूछे हैं, इसलिए शशांक अग्रवाल ने जबाव देने की बजाये - चुप रहने का रास्ता अपनाया है । चेयरमैन के रूप में शशांक अग्रवाल को लग रहा है कि काउंसिल के ही सदस्यों के सवालों को अनसुना करके और सवाल उठाने वाले सदस्यों को मीटिंग में शामिल नहीं होने देकर वह आरोपों से बच जायेंगे, लेकिन ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से लगता है कि उनकी मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं । शशांक अग्रवाल ने हालाँकि अपने नजदीकियों को आश्वस्त किया है कि पंकज गुप्ता को वह 'मैनेज' कर लेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि पंकज गुप्ता चेक्स पर साइन करने के संबंध में अपनी जाँच-पड़ताल व आपत्तियों पर टिके रहेंगे, या फिर शशांक अग्रवाल के सामने अंततः समर्पण कर देंगे ?

Thursday, March 19, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रशासन द्वारा करनाल ब्रांच के मामले में की गई कार्रवाई को प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता की बिल्डिंग के निर्माण-कार्य पर अपनी पकड़ बनाये रखने की कोशिश तथा पंकज गुप्ता के पलटी मारने को अतुल गुप्ता के 'खेल' के हिस्से के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है

करनाल । इंस्टीट्यूट की करनाल ब्रांच के पदाधिकारियों के बीच इंस्टीट्यूट प्रशासन द्वारा मनमाने तरीके से दिनेश ग्रोवर की जगह स्वाति मित्तल को ट्रेजरर 'बनाये' जाने के फैसले के खिलाफ नाराजगी है, और इसे लेकर वह इंस्टीट्यूट प्रशासन के साथ भिड़ने के मूड में दिख रहे हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि उनके पास हालाँकि सीमित विकल्प ही हैं । मामले से जुड़े 'दूसरे' पक्ष के लोगों का दावा लेकिन यह है कि पदाधिकारियों का 'नाटक' कुछ ही दिनों का है और उनका 'मूड' जल्दी ही ठीक हो जायेगा और वह इंस्टीट्यूट के फैसले को स्वीकार कर लेंगे । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन की तरफ से करनाल ब्रांच के चेयरमैन दीपक कपूर को यह जानकारी देते हुए पत्र मिला है कि इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी की सलाहानुसार, ब्रांच के ट्रेजरर पद पर हुए दिनेश ग्रोवर के चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए स्वाति मित्तल को ट्रेजरर नियुक्त किया जाता है । करनाल ब्रांच के पदाधिकारी यह पत्र मिलने के बाद से खासे नाराज और गुस्से में हैं और आगे की कार्रवाई को लेकर विचार-विमर्श कर रहे हैं । इस विचार-विमर्श में उन्हें जो एक जोरदार विकल्प नजर आ रहा है, वह अपने अपने पदों से इस्तीफा देने का है । यह कदम उठाने से पहले वह लेकिन इसके नफे/नुकसान का आकलन कर लेना चाहते हैं । करनाल ब्रांच के पदाधिकारी इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के साथ-साथ नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ट्रेजरर पंकज गुप्ता से बुरी तरह खफा हैं । उनका आरोप है कि करनाल ब्रांच के एक्स-ऑफिसो होने के नाते पंकज गुप्ता ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया और अपने स्वार्थ में वह तमाशबीन बने रहे, जिसके चलते इंस्टीट्यूट प्रशासन को करनाल ब्रांच के मामले में मनमानी करने का मौका मिला ।
करनाल ब्रांच के पदाधिकारियों का कहना है कि जिस 'आधार' पर करनाल ब्रांच के मामले में कार्रवाई की गई है; ठीक वैसे ही 'आधार' यमुना नगर, अमृतसर तथा भिवानी ब्रांच में हैं - लेकिन वहाँ कोई कार्रवाई नहीं की गई है । उनका आरोप है कि इसी से जाहिर है कि करनाल ब्रांच के मामले में की गई कार्रवाई मनमानी तथा पक्षपातपूर्ण है, और यह करनाल ब्रांच की बनने वाली बिल्डिंग में पैसे 'बनाने' की कोशिशों से जुड़ी हुई है । करनाल ब्रांच के पदाधिकारियों को दरअसल इसीलिए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये पर हैरानी है । उल्लेखनीय है कि करनाल ब्रांच के मामले में शिकायत मिलने पर एक्स-ऑफिसो सदस्य होने के नाते पंकज गुप्ता को मामले में संज्ञान लेने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिस पर पंकज गुप्ता ने बहुत ही चलताऊ तरीके से रिएक्ट किया था । उनके रवैये से पहले ऐसा लगा था, जैसे कि मामले में वह ब्रांच के पदाधिकारियों के साथ हैं - लेकिन फिर पंकज गुप्ता ने ऐसी पलटी मारी कि वह सीन से गायब ही हो गए और इंस्टीट्यूट प्रशासन ने मनमाना, एकतरफा और पक्षपातपूर्ण फैसला ब्रांच पर थोप दिया । कई लोगों का मानना और कहना है कि करनाल ब्रांच के मामले में जो कार्रवाई हुई है, वैसी ही कार्रवाई यदि यमुना नगर, अमृतसर तथा भिवानी ब्रांच के मामलों में भी हुई होती, तब फिर उक्त कार्रवाई उचित और न्यायपूर्ण 'दिखती' - लेकिन जिस तरह से इंस्टीट्यूट प्रशासन ने सिर्फ करनाल ब्रांच के मामले में कार्रवाई की है, उसके कारण यह कार्रवाई तथा इसके पीछे अतुल गुप्ता व पंकज गुप्ता की भूमिका संदेहास्पद हो गई है । 
करनाल ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव/चयन का जो झमेला है, और जिसमें इंस्टीट्यूट प्रशासन की कार्रवाई को मनमानी तथा पक्षपातपूर्ण माना/बताया जा रहा है - उसके पीछे करनाल ब्रांच की बनने वाली बिल्डिंग की 'कमान' हाथ में रखने की करनाल से लेकर दिल्ली तक के लोगों की कोशिशों को देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि करीब ढाई वर्ष पहले बिल्डिंग के लिए जमीन मिल चुकी है, और जल्दी ही उस पर निर्माण कार्य शुरू होना है । मजेदार तथ्य यह भी है कि उक्त बिल्डिंग के लिए बनी कमेटी के चेयरमैन पद को लेकर इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के पिछले टर्म में अतुल गुप्ता और विजय गुप्ता के बीच खासी 'जंग' रही थी, जिसमें विजय गुप्ता विजयी रहे थे । मौजूदा टर्म में विजय गुप्ता चूँकि अपनी जगह सुरक्षित नहीं रख सके, इसलिए बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन पद पर अतुल गुप्ता ने फिर से नजरें टिकाईं, लेकिन वह वाइस प्रेसीडेंट बन गए । करनाल ब्रांच की बिल्डिंग से जुड़ी 'राजनीति' से परिचित लोगों का कहना/बताना है कि प्रेसीडेंट बन जाने के बावजूद अतुल गुप्ता करनाल ब्रांच की बिल्डिंग के मामले में विजय गुप्ता से मिली पराजय की टीस को भूले नहीं हैं, और करनाल ब्रांच में 'अपने' सदस्यों के जरिये वह बिल्डिंग के मामले में अपनी 'पकड़' बनाये रखना चाहते हैं । इंस्टीट्यूट प्रशासन ने नियम-कानूनों का वास्ता देकर मनमाने व पक्षपातपूर्ण तरीके से करनाल ब्रांच के मामले में जो कार्रवाई की है, उसे अतुल गुप्ता की 'पकड़' बनाये रखने की कोशिश के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । मामले में पंकज गुप्ता के पलटी मारने को अतुल गुप्ता के 'खेल' के हिस्से के रूप में ही जाना/देखा गया है । इंस्टीट्यूट प्रशासन के फैसले पर करनाल ब्रांच के पदाधिकारियों की नाराजगी से लेकिन लग रहा है कि यह मामला अभी जल्दी शांत होने वाला नहीं है । 

Monday, March 2, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नियम-कानूनों की ऐसीतैसी करते हुए तथा इस तरह सीधे-सीधे इंस्टीट्यूट की प्रभुसत्ता को चुनौती देते हुए कुछेक ब्रांचेज के नए पदाधिकारियों ने जिस तरह से अपने आप को 'चुनवा' लिया है, उसने प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है

नई दिल्ली । अतुल गुप्ता के प्रेसीडेंट बनने के बाद नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की ब्रांचेज में पदाधिकारियों के चयन/चुनाव में मनमानियों का खुल्ला खेल शुरू हो गया है, अतुल गुप्ता लेकिन उसे नियंत्रित करने की बजाये न जाने किन दूसरे कामों में व्यस्त/मस्त हैं । करनाल, यमुना नगर तथा अमृतसर ब्रांच में पिछले वर्ष के चेयरमैन इंस्टीट्यूट की गाइडलाइंस का उल्लंघन करते हुए इस वर्ष ट्रेजरर बन बैठे हैं; जबकि भिवानी ब्रांच में पिछले वर्ष के पदाधिकारियों ने और भी कमाल किया और वह यह कि सभी ने अपने अपने पद छोड़ने से इंकार कर दिया तथा इस वर्ष भी उन्होंने अपने आप को पिछले वर्ष वाले पदों पर ही 'चुनवा' लिया है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, ब्रांच में चेयरमैन के पद पर रह चुका मैनेजिंग कमेटी का सदस्य बाद के वर्षों में और कोई पद लेने का अधिकारी नहीं रहेगा; किंतु करनाल, यमुनानगर, अमृतसर व भिवानी ब्रांच में इस नियम का खुल्लमखुल्ला मजाक बना दिया गया है । मजे की बात यह है कि यह मनमानी तथाकथित चुनावी बहुमत के नाम पर की गई है । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह है कि इन ब्रांचेज में यह मजाक इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के नाम पर किया गया है । मनमानी करते हुए इंस्टीट्यूट के नियम-कानून का मजाक बनाने वाले ब्रांचेज के 'नए' पदाधिकारी अतुल गुप्ता के साथ अपनी नजदीकियों का वास्ता देते हुए निश्चिंत हैं और दिखा/जता रहे हैं कि 'सैंयाँ जब कोतवाल हो गए हैं', तब उन्हें तो जैसे कुछ भी करने का अधिकार मिल गया है । 
इस नजारे का दिलचस्प पहलू यह भी है कि उक्त ब्रांचेज में घटी नियमविरुद्ध घटनाओं का जो लोग विरोध कर रहे हैं, और इन घटनाओं से दुखी हैं - वह भी अतुल गुप्ता पर ही भरोसा कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि अतुल गुप्ता इन घटनाओं को बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे और इंस्टीट्यूट के नियमों के साथ खिलवाड़ करने वाले ब्रांच के पदाधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करेंगे । लेकिन अतुल गुप्ता को फिलहाल इस तरह मामलों में ध्यान देने की फुरसत नहीं है, वह जगह जगह प्रेसीडेंट के रूप में अपना स्वागत/सम्मान करवाने की मस्ती में व्यस्त हैं । करनाल ब्रांच के मामले में कुछ ज्यादा शिकायतें/सिफारिशें आईं तो अतुल गुप्ता ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ट्रेजरर पंकज गुप्ता को मामले का संज्ञान लेने का ऑर्डर कर दिया । पंकज गुप्ता को इसलिए क्योंकि वह करनाल ब्रांच के एक्स-ऑफिसो सदस्य हैं । पंकज गुप्ता ने और कमाल किया; उनके नजदीकियों के अनुसार, उन्होंने मामले को नजर भर देखा और पाया कि चूँकि 'पीड़ित' पक्ष ने कोई शिकायत नहीं की है, शिकायत एक 'बाहरी' व्यक्ति ने की है, इसलिए मामले का संज्ञान लेने की जरूरत ही नहीं है । लाख लाख शुक्र है कि पंकज गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट हुए, और दरोगा नहीं बने - वहाँ तो वह उपद्रव की सूचना मिलने पर उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई करने तब तक निकलते ही नहीं, जब तक उपद्रव के पीड़ित शिकायत लेकर उनके पास न आते । 
करनाल, यमुना नगर, अमृतसर, भिवानी आदि में जो हुआ, उसे देख/जान कर निराश होने तथा शर्म महसूस करने वाले लोगों का कहना है कि यहाँ जो हुआ, उसमें 'पीड़ित' तो वास्तव में इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन है । इन ब्रांचेज में जिन पदाधिकारियों ने पद हथियाये हैं, और जिन्होंने पद हथियाने की कार्रवाई का समर्थन किया है - उन्होंने सिर्फ दूसरे सदस्यों के 'अधिकार' ही नहीं छीने हैं, बल्कि इंस्टीट्यूट के नियम-कानून की भी ऐसीतैसी की है और इस तरह सीधे-सीधे इंस्टीट्यूट की प्रभुसत्ता को चुनौती दी है । ऐसे में, इंस्टीट्यूट में विभिन्न पदों पर बैठे पदाधिकारियों से यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वह खुद से संज्ञान लेकर इंस्टीट्यूट की प्रभुसत्ता को बचाने का प्रयास करेंगे । लेकिन संदर्भित ब्रांचेज में किसी भी एक्स-ऑफिसो सदस्य ने खुद से तो संज्ञान नहीं ही लिया; करनाल ब्रांच के मामले में पंकज गुप्ता ने निर्देशित होने के बावजूद मामले की गंभीरता को नहीं समझा । इस मामले में लेकिन अकेले पंकज गुप्ता को ही क्यों दोष देना । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के दो दो बार चेयरमैन बनने से वंचित रह गए काउंसिल के सबसे वरिष्ठ सदस्य रतन सिंह यादव ने तो इन सभी ब्रांचेज के पदाधिकारियों को बाकायदा बधाई दी है । टीम भिवानी के पदाधिकारी तो और भी ज्यादा 'सौभाग्यशाली' हैं, उन्हें तो इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की भी बधाई मिली है । ऐसे में, सहज ही समझा जा सकता है कि पदों को प्राप्त करने तथा पदों पर बने/टिके रहने की होड़ में इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों का मजाक बना देने के हौंसले बुलंद आखिर क्यों न हों ?  

Thursday, February 27, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में 'किंग मेकर' के रूप में देखे/पहचाने जा रहे शशांक अग्रवाल तो 'किंग' बन गए और चेयरमैन पद के अलावा और कोई पद न लेने की घोषणा करने वाले रतन सिंह यादव को निकासा चेयरमैन पद से ही संतोष करना पड़ा  

नई दिल्ली । रोटी को बराबर बराबर बाँटने को लेकर हुई दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर द्वारा दोनों को ही ठग लेने की मशहूर कहानी को दोहराते हुए शशांक अग्रवाल ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन हथिया लिया है । मजे की बात यह हुई है कि चेयरमैन पद के लिए शशांक अग्रवाल का नाम दूर दूर तक चर्चा में नहीं था । पिछले तीन/चार दिनों में शशांक अग्रवाल को छोड़ कर बाकी सदस्यों में छह छह सदस्यों के दो खेमे तो बन गए थे - और दोनों खेमे के लोग अपनी अपनी तरह से शशांक अग्रवाल को अपनी अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रहे थे; जिसके चलते यह संभावना तो बन रही थी कि शशांक अग्रवाल को अबकी बार कोई न कोई पद तो मिल ही जायेगा, लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा था कि शशांक अग्रवाल इतने बड़े 'हार्ड बारगेनर' निकलेंगे कि चेयरमैन का पद जुगाड़ लेंगे । चेयरमैन पद के लिए ताल ठोक रहे दूसरे उम्मीदवार बेचारे ताकते रह गए और चेयरमैन पद का ताज शशांक अग्रवाल के माथे पर जैसे अपने आप आ सजा । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने की राजनीति में रतन सिंह यादव को किस्मत ने लगातार दूसरी बार धोखा दिया और बैठते बैठते चेयरमैन पद की कुर्सी एक बार फिर उनके नीचे से निकल गई ।  
रतन सिंह यादव ने इस बार चेयरमैन पद के लिए पक्की फील्डिंग सजाई थी, और पिछली बार जैसे धोखे का शिकार होने से बचने की पूरी व्यवस्था की थी । वह छह सदस्य थे और सातवें के लिए शशांक अग्रवाल से बात कर रहे थे । शशांक अग्रवाल के दोनों हाथों में लड्डू थे । दरअसल दूसरा खेमा भी उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था । शशांक अग्रवाल ने मौका ताड़ा और चेयरमैन पद की माँग कर दी । रतन सिंह यादव पर उनके 'साथियों' का दबाव पड़ा कि सत्ता में आना है, तो शशांक अग्रवाल की माँग मान लेना चाहिए । रतन सिंह यादव ने चेयरमैन पद की कुर्सी पर बैठने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन एक बार फिर उनकी तैयारी धरी रह गई और जिन शशांक अग्रवाल को 'किंग मेकर' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था, वह 'किंग' बन गए । रतन सिंह यादव को निकासा चेयरमैन पद से ही संतोष करना पड़ा ।
श्वेता पाठक, पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता की तिकड़ी ने पॉवर ग्रुप में तो लगातार दूसरी बार अपनी जगह बना ली है, लेकिन पद उन्हें एक ही मिला । पिछले वर्ष इन तीनों सदस्यों के पास पद थे, लेकिन इस वर्ष सिर्फ पंकज गुप्ता को ही पद मिल सका है और वह ट्रेजरर पद पर जीते हैं । देखा जाये तो नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इस बार जो सत्ता परिवर्तन हुआ है, वह इस तिकड़ी के कारण ही हुआ है - पिछले वर्ष नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो झगड़ा/झंझट रहा, उसमें यह तिकड़ी एक पक्ष थी; और इसी तिकड़ी की एकजुटता ने इस वर्ष सत्ता परिवर्तन के लिए आधार तैयार किया । इस नाते से उम्मीद की जा रही थी कि इस तिकड़ी के तीनों नहीं, तो दो सदस्यों को तो पद जरूर ही मिल जायेंगे । रतन सिंह यादव के जब तक चेयरमैन बनने की बात थी, तब तक अजय सिंघल को कोई पद मिलने की बात नहीं थी; किंतु जब चेयरमैन पद शशांक अग्रवाल को मिलना तय हुआ, तब माना गया कि रतन सिंह यादव कोई पद नहीं लेंगे और अजय सिंघल को पद मिलेगा । ट्रेजरर पद के साथ, निकासा चेयरमैन का पद तिकड़ी खेमे को मिलने की संभावना थी, लेकिन जिसे रतन सिंह यादव ने हथिया लिया । रतन सिंह यादव ने घोषणा की हुई थी कि वह तो चेयरमैन ही बनेंगे, कोई और पद उनके 'कद' के अनुरूप नहीं है । लेकिन निकासा चेयरमैन का पद उन्होंने जिस तरह से ले लिया है, उसे देख कर लोगों ने तिकड़ी को ठगी का शिकार होता हुआ पाया है ।

Sunday, February 16, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के नए पॉवर ग्रुप में सेक्रेटरी 'बनने' के जोश में की गई हरकत से गौरव गर्ग ने ग्रुप बनने की संभावनाओं को झटका देने के साथ अपने सेक्रेटरी पद को भी असुरक्षित कर लिया है 

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अगले वर्ष के पॉवर ग्रुप में सेक्रेटरी 'बनने' की खुशी के जोश में गौरव गर्ग ने सत्ता पार्टी के दूसरे सदस्यों को नाराज कर दिया है, और उन्हें लग रहा है कि गौरव गर्ग का जोश पॉवर ग्रुप को बनने से पहले ही कहीं बिखेर न दे । गौरव गर्ग ने दरअसल पॉवर ग्रुप के सातवें सदस्य को जुटाने के लिए रीजनल काउंसिल के कुछेक सदस्यों का दरवाजा खटखटाया, जिससे पता चला कि छह सदस्यों का तो ग्रुप बन गया - सातवाँ और मिल जाए, तो नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का पॉवर ग्रुप बन जायेगा । गौरव गर्ग की सूचना के अनुसार, उनके अलावा नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा, सुमित गर्ग, हरीश जैन और अविनाश गुप्ता ने आपस में गठजोड़ कर लिया है । इनके बीच सहमति बन गई है कि सचिव गौरव गर्ग होंगे तथा चेयरमैन का चुनाव नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा व अविनाश गुप्ता के नाम की पर्ची डाल कर होगा । बाकी पदों का फैसला सातवाँ सदस्य मिल जाने पर होगा । सातवें सदस्य के लिए रतन सिंह यादव, पंकज गुप्ता, विजय गुप्ता, शशांक अग्रवाल का दरवाजा खटखटाया गया है । इस छह सदस्यों के बीच तय यह हुआ था कि सातवें सदस्य की तलाश में चेयरमैन व सेक्रेटरी पद को लेकर हुए फैसले के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया जायेगा और कोशिश की जायेगी कि सातवाँ सदस्य बिना शर्त के इनके साथ जुड़े । गौरव गर्ग ने लेकिन कुछ भी छिपा नहीं रहने दिया ।
गौरव गर्ग ने सातवें सदस्य की तलाश में जहाँ जहाँ भी 'छापा मारा', वहाँ वहाँ साफ साफ बता दिया कि सेक्रेटरी तो मैं हूँ, इसलिए सेक्रेटरी बनने की उम्मीद तो रखना मत । यह बताया, तो फिर चेयरमैन वाली रणनीति का भी उन्होंने खुलासा कर दिया । इससे मामला बिगड़ गया । सभी से अमूमन यही जबाव मिला कि महत्त्वपूर्ण पद आप लोगों ने जब बाँट ही लिए हैं, तो हम क्या करेंगे/पायेंगे ? गौरव गर्ग ने ही लोगों को बताया है कि रतन सिंह यादव ने तो यह कहते हुए उनसे सौदेबाजी भी शुरू कर दी कि मुझे या अजय सिंघल को चेयरमैन बनाओ, तो हम दोनों का समर्थन ले लो । गौरव गर्ग ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनके नाम की भी पर्ची डाल लेंगे । रतन सिंह यादव लेकिन इसके लिए तैयार नहीं हुए । उनका कहना रहा कि पर्ची से फैसला पिछली बार भी हुआ था, उस फैसले को लेकिन माना कहाँ गया । रतन सिंह यादव ने गौरव गर्ग से बता दिया कि उन्हें हरीश जैन तथा अविनाश गुप्ता पर भरोसा नहीं है, इसलिए वह उनके साथ पर्ची वाले खेल में शामिल नहीं होंगे । दूसरे लोगों ने भी अपने अपने तर्क देकर साफ साफ कुछ कहने से बचने की ही कोशिश की है । दरअसल पॉवर ग्रुप में शामिल हो सकने वाले सभी लोग अभी 'देखो और इंतजार करो' का फार्मूला अपनाए हुए हैं ।
नितिन कँवर को लेकिन लग रहा है कि गौरव गर्ग ने खुद के सेक्रेटरी बनने की बात का खुलासा करके खेल बिगाड़ दिया है, और छह सदस्यों को जोड़ कर जो पहल की गई थी - उसका शुरू में ही दम तोड़ दिया है । चेयरमैन के पद के लिए पर्ची डालने वाली बात तो फिर भी समझ में आती है; स्वाभाविक ही है कि बनने वाले पॉवर ग्रुप में चेयरमैन पद के लिए यदि एक से अधिक उम्मीदवार हैं, तब फैसला पर्ची डाल कर ही करना पड़ेगा । लेकिन सेक्रेटरी पद सुनिश्चित हो जाने से पॉवर ग्रुप में शामिल हो सकने वाले सदस्यों के कदम रुक जा सकते हैं । नितिन कँवर को लग रहा है कि गौरव गर्ग की हरकत नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का कामकाज पटरी पर लाने की उनकी कोशिशों को फेल कर सकती है । ऐसे में नितिन कँवर और उनके साथियों के बीच चर्चा भी चली है कि पॉवर ग्रुप के लिए यदि दो सदस्यों का जुगाड़ हो जाए, तो फिर वह गौरव गर्ग को छोड़ भी सकते हैं । इस तरह की बातों से जाहिर है कि गौरव गर्ग ने सेक्रेटरी 'बनने' के जोश में जो कांड कर दिया है, उसने नया पॉवर ग्रुप बनने की संभावनाओं को तो झटका दिया ही है, साथ ही अपने सेक्रेटरी पद को भी असुरक्षित कर लिया है ।

Wednesday, August 21, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के अधिकार निरस्त करने के फैसले के कारण होने वाली अपनी फजीहत से बचने के लिए वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता ने फैसले को रोकने की कोशिश तो खूब की थी, लेकिन प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के सख्त रवैये के सामने अंततः उन्हें भी फैसले को स्वीकार करना पड़ा

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के अधिकार निरस्त कर देने तथा जरूरी काम इंस्टीट्यूट की विभिन्न कमेटियों को सौंप देने के फैसले का इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता ने काफी विरोध किया था, लेकिन प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के सख्ती दिखाने पर फिर अतुल गुप्ता को उनके सामने समर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा । प्रफुल्ल छाजेड़ का कहना था कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो कुछ हो रहा है, उससे प्रोफेशन तथा इंस्टीट्यूट की बदनामी हो रही है, और इसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता है । इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, प्रफुल्ल छाजेड़ तो उसी समय कठोर फैसला करना चाहते थे जब नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक ने काउंसिल के कुछेक पदाधिकारियों व सदस्यों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट की थी । अतुल गुप्ता ने लेकिन उस समय प्रफुल्ल छाजेड़ को कदम आगे बढ़ाने से रोक लिया था । प्रफुल्ल छाजेड़ की पहल से इंस्टीट्यूट के कार्यकारी सचिव राकेश सहगल ने उस समय मामले को निपटाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी कोशिशें शुरू होते ही अफवाह फैल गई - या फैला दी गई - की श्वेता पाठक ने इंस्टीट्यूट के सचिव के रवैये से नाराज होकर उनके खिलाफ भी पुलिस में रिपोर्ट कर दी है । इस अफवाह ने राकेश सहगल को आगे कोशिश करने से रोक दिया । इससे पहले सेंट्रल काउंसिल के कुछेक सदस्यों - विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग, प्रमोद जैन आदि ने भी रीजनल काउंसिल के सदस्यों के साथ अनौपचारिक मीटिंग करके हालात को ठीक करने का प्रयास किया था, लेकिन उनके प्रयासों का भी कोई नतीजा नहीं निकला था । रीजनल काउंसिल के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मेघराज के निधन ने लेकिन हालात ऐसे बना दिए कि उसी दिन शुरू हुई सेंट्रल काउंसिल की दो दिवसीय मीटिंग में प्रफुल्ल छाजेड़ ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के अधिकार निरस्त कर देने तथा कामकाज इंस्टीट्यूट की कमेटियों को सौंप देने का फैसला 'करवा' दिया । प्रफुल्ल छाजेड़ ने मीटिंग में इस मुद्दे को इस तरह 'उठवाया' कि अतुल गुप्ता के सामने समर्पण करने के आलावा कोई चारा नहीं रहा ।
अतुल गुप्ता दरअसल इसलिए इस तरह के कठोर फैसले के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि इससे उनकी फजीहत होनी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के इतिहास में यह पहला मौका है, जबकि किसी रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के अधिकार निरस्त किए गए हों । अतुल गुप्ता सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करते हैं, और वह इस वर्ष वाइस प्रेसीडेंट हैं । इसलिए इस मामले को अतुल गुप्ता की लीडरशिप की असफलता के रूप में ही देखा/पहचाना जायेगा; और यही कहा/माना जायेगा कि जो अतुल गुप्ता अपने रीजन की काउंसिल में हालात को नियंत्रित नहीं कर पाए - वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी कैसे निभा सकेंगे ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में समस्याएँ थीं - समस्याएँ लेकिन कहाँ नहीं होती हैं ? अतुल गुप्ता को लगता था कि जो समस्याएँ हैं, वह अंततः खुद-ब-खुद हल हो जायेंगी - लेकिन इंस्टीट्यूट ने यदि कोई बड़ा फैसला लिया, तो मामला रिकॉर्ड पर आ जायेगा; और यह बात नॉर्दर्न रीजन से होने तथा वाइस प्रेसीडेंट होने के नाते उनके लिए फजीहत भरी होगी । मामला रिकॉर्ड पर न आए, इसके लिए अतुल गुप्ता जैसा जो हो रहा है वैसा होने देने के पक्ष में थे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अधिकतर समस्याएँ तरह तरह के भुगतान न होने के कारण हो रही थीं, जिनके लिए अतुल गुप्ता ने यह 'फार्मूला' भी सुझाया था कि उक्त भुगतान इंस्टीट्यूट की तरफ से कर दिए जाएँ । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मामले में एक बार पहले भी ऐसा हो चुका है । अतुल गुप्ता का कहना था कि इससे रीजनल काउंसिल में झगड़ रहे पदाधिकारी अपने आप 'रास्ते' पर आ जायेंगे और उनके बीच का झगड़ा खत्म हो जायेगा । प्रफुल्ल छाजेड़ लेकिन इसके लिए तैयार नहीं हुए । दरअसल भुगतान के मामले जिन आधारों पर अटके थे - या अटकाए गए थे, उनके 'बने' रहते हुए मामले में इंस्टीट्यूट के भी फँसने के मौके बनते; जिससे बचने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ ने अतुल गुप्ता के 'फार्मूले' को हरी झंडी नहीं दी ।
प्रफुल्ल छाजेड़ को अतुल गुप्ता के रवैये पर इसलिए भी भरोसा नहीं हो रहा था, क्योंकि उन्हें 'बताया' जा रहा था कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो चल रहा है, उसके वास्तविक सूत्रधार अतुल गुप्ता ही हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की गतिविधियों से परिचित रहने वाले लोगों का मानना/कहना रहा कि यहाँ बबाल के बीज तो अतुल गुप्ता ने ही बोए, लेकिन बाद में फिर हालात उनकी पकड़ से छूट गए - और वह भी असहाय से हो गए; और वाइस प्रेसीडेंट के रूप में अपनी ईज्जत बचाने में लग गए । मजे की बात यह रही कि उनकी 'गुडबुक' में आने के लिए रतन सिंह यादव, अजय सिंघल, पंकज गुप्ता, गौरव गर्ग ने अपने अपने तरीके से हथकंडे अपनाना शुरू किए - इनमें भी गौरव गर्ग ने 'ऐतिहासिक' कदम उठाते हुए धरने की घोषणा कर डाली, जिसके लिए उन्होंने कुछेक काउंसिल सदस्यों का समर्थन भी जुटा लिया । रतन सिंह यादव व अजय सिंघल ने लेकिन चालाकी दिखाते हुए उनके धरने की हवा निकाल दी - उन्होंने हवा तो निकाल दी, लेकिन गौरव गर्ग को राजनीति के मार्ग से वह डिगा नहीं पाए । हद की बात तो यह हुई कि अपने पिता के निधन से उपजे निजी शोक के बीच भी गौरव गर्ग राजनीति करने से बाज नहीं आए; और जब उनके घर पर शोक/शुद्धि का कामकाज भी पूरा नहीं हुआ था, तब भी गौरव गर्ग वाट्स-ऐप संदेशों के जरिये राजनीतिक दाँव-पेंच चलने में मशगूल थे । पंकज गुप्ता प्रोफेशन के एक बड़े ग्रुप से जुड़े होने का फायदा उठाते हुए श्वेता पाठक व विजय गुप्ता की मदद से अपनी चाल आगे बढ़ा रहे थे । इस तरह की बातों से लगने लगा था कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हालात जल्दी सुधरने वाले नहीं हैं । अतुल गुप्ता लेकिन तब भी किसी तरह के कठोर फैसले के पक्ष में नहीं थे । लेकिन मेघराज के असामयिक निधन ने स्थिति को एकदम से पलट दिया । मेघराज के निधन के लिए रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के बीच चलने वाले झगड़े के कारण पगार का भुगतान न होने को जिम्मेदार माना गया और इस आरोप ने प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ को यह विचार करने पर मजबूर किया कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मामले को अब वह और अतुल गुप्ता की मर्जी पर नहीं छोड़ सकते हैं । संयोग से उसी दिन सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग शुरू हुई; प्रफुल्ल छाजेड़ ने मीटिंग में ऐसी फील्डिंग सजाई कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के अधिकार छीन लेने का फैसला अंततः हो गया, और अतुल गुप्ता के सामने भी इस फैसले का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा । 

Sunday, August 18, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कर्मचारी मेघराज के असामयिक निधन से गुस्साए कर्मचारी इसके लिए काउंसिल के चारों पदाधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और माँग कर रहे हैं कि इनके खिलाफ मेघराज की 'हत्या' का मामला चले

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के नाकारापन तथा अपने अपने अहंकारीपूर्ण रवैये के कारण चलने वाली उनकी आपसी लड़ाई ने काउंसिल के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मेघराज की जान ले ली है । 25/26 वर्ष का मेघराज अपने घर गया हुआ था, और वहाँ ह्रदयाघात के कारण उसकी इहलीला समाप्त हो गई । मेघराज की मृत्यु की खबर से गुस्साए कर्मचारियों का कहना है कि जिस तनाव के चलते उसे हृदयाघात हुआ, उसके लिए रीजनल काउंसिल के चारों प्रमुख पदाधिकारी जिम्मेदार हैं, और इसके लिए इन पर मेघराज की 'हत्या' का मुकदमा चलना चाहिए । उसके साथियों का कहना है कि पिछले माह मिलने वाली पगार के अभी तक न मिलने के कारण मेघराज बहुत ही परेशान था, और इसी परेशानी में उसकी जान चली गई । घर जा रहा मेघराज अपने परिवार के सदस्यों के लिए कुछ सामान ले जाना चाहता था, लेकिन पगार न मिलने के कारण वह अपने रोजमर्रा के खर्चे ही मुश्किल से चला पा रहा था - परिवार के सदस्यों के लिए सामान कहाँ से ले जाता ? घर जाने से पहले उसने अपनी पगार पाने के लिए प्रायः हर पदाधिकारी से गुहार लगाई, लेकिन वह सब हिंदी फिल्म 'दीवार' में बोले गए अमिताभ बच्चन के मशहूर डॉयलॉग को सुनाते मिले कि 'जाओ, पहले उसके साइन लेकर आओ' - और इस तरह उसे पगार नहीं मिली । उसके साथियों का कहना है कि वह बड़ा कलपता हुआ घर गया था, और घर पर भी वह इस बात को लेकर बहुत परेशान था कि उसके पास पैसे नहीं हैं और उसे अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए भी परिवार के दूसरे सदस्यों का मुँह देखना पड़ रहा है । इस स्थिति ने मेघराज को अपने परिवार के सदस्यों के बीच शर्मिंदगी तथा बेहद तनाव में ला दिया था, और इसी तनाव ने अंततः युवावस्था में ही उसकी जान ले ली । 
मेघराज के अलावा, रीजनल काउंसिल के बाकी कर्मचारी भी पगार न मिलने के कारण बुरी तरह परेशान हैं । कर्मचारियों का कहना है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की आपसी लड़ाई ने कर्मचारियों की जान को जोखिम में डाल दिया है । जरूरी खर्चे पूरे न होने के कारण कई कर्मचारी बुरी तरह तनाव में हैं, लेकिन रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी इस सारे बबाल के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते में लगे हुए हैं और मस्त हैं । उनकी अहंकारभरी आपसी लड़ाई के चलते भुगतान नहीं हो पा रहे हैं और इस वजह से काउंसिल की तरफ से प्रत्येक सप्ताह होने वाला सेमीनार कई सप्ताह से नहीं हो पा रहा है, जीएमसीएस के नए बैच नहीं बन पाने के कारण चार्टर्ड अकाउंटेंट छात्रों को भटकना पड़ रहा है, कर्मचारियों को पगार नहीं मिल पा रही है - जिसके चलते उनका जीवन तबाह हुआ पड़ा है । मसला क्या है ? मसला यह है कि सेक्रेटरी पंकज गुप्ता और ट्रेजरर विजय गुप्ता का कहना है कि रीजनल काउंसिल में जो भी काम हो रहे हैं, विभिन्न कामों के लिए जो भी वेंडर्स हैं, उनके साथ एग्रीमेंट होना चाहिए । उनका आरोप है कि चेयरमैन हरीश चौधरी जैन अपने साथियों के दबाव में एग्रीमेंट करने को लेकर तैयार नहीं हैं । लेकिन हरीश चौधरी जैन की तरफ से कहा जाता है कि यह लोग एग्रीमेंट की बात तो करते हैं, लेकिन एग्रीमेंट करने की तैयारी करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं । हरीश चौधरी जैन का कहना है कि इन दोनों ने एग्रीमेंट न होने को एक बहाना व एक हथियार बनाया हुआ है, जिसका इस्तेमाल करते हुए इन्होंने रीजनल काउंसिल के कामकाज को बाधित किया हुआ है और पूरी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया हुआ है । दूसरे लोगों को भी लगता है कि बात यदि सिर्फ एग्रीमेंट न होने की ही है, तो चारों पदाधिकारी मिलकर एग्रीमेंट कर क्यों नहीं लेते ? यहाँ लेकिन काउंसिल के चारों पदाधिकारियों का अपना अपना उनका अहंकार आड़े/आगे आ जाता है और इसके चलते कोई पहल नहीं हो पाती है ।
पिछले दिनों, भुगतान की समस्या को लेकर पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता की तरफ से एक सुझाव यह भी आया था कि जिन खर्चों को लेकर एग्रीमेंट नहीं है, उन खर्चों के बारे में फैसला रीजनल काउंसिल की मीटिंग और या एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग में हो । यह काम भी लेकिन नहीं हो पाया । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा हाल को - अभी तक के घोषित अंतिम सेमीनार, जो फिर नहीं हो सका था, से जुड़ा प्रसंग - बयान करता है । उक्त सेमीनार के रद्द होने की जो सूचना लोगों को मिली थी, उसमें वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार बताया गया था; श्वेता पाठक ने इस पर जब बबाल मचाया और इसे मुद्दा बना कर जब पुलिस में रिपोर्ट कर दी, तब उक्त सूचना पर खेद व्यक्त करते हुए उसे वापस लेने वाला संदेश लोगों को भेजा । मजे की स्थिति यह है कि एक सेमीनार घोषित हुआ, और फिर वह रद्द हुआ - लेकिन रीजनल काउंसिल में कोई आधिकारिक रूप से यह बताने वाला नहीं है कि उक्त सेमीनार रद्द करने की नौबत आखिर क्यों आई और कौन उसके लिए जिम्मेदार है ? पदाधिकारियों के नाकारापन का यह एक बड़ा उदाहरण है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के हालात इसलिए और भी खराब हैं क्योंकि यहाँ पदाधिकारियों के साथ-साथ दूसरे सदस्य भी अपनी अपनी राजनीति करने के मौके बनाते रहते हैं । पदाधिकारियों की मनमानियों पर लगाम लगाने तथा उनके फैसलों की जानकारी काउंसिल के सभी सदस्यों को करवाने की माँग के साथ गौरव गर्ग ने काउंसिल कार्यालय में धरना देने की घोषणा की, उन्हें काउंसिल के अन्य कुछेक सदस्यों का समर्थन भी मिल गया - लेकिन ऐन मौके पर रतन सिंह यादव ने उनके कार्यक्रम को पंक्चर कर दिया । दरअसल रतन सिंह यादव अगले वर्षों में चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसी चाहना में उन्हें डर हुआ कि अपने कार्यक्रम के जरिये कहीं गौरव गर्ग काउंसिल के सदस्यों के बीच पैठ न बना लें, इसलिए उन्होंने अपनी चालबाजी से गौरव गर्ग के कार्यक्रम में ही पंक्चर कर दिया । रतन सिंह यादव की चालबाजी सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इससे आगे भी गई । वह काउंसिल की बातों की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं करते हैं, लेकिन इस मामले की चर्चा उन्होंने खूब जमकर की । यह प्रसंग जिस समय का है, तब की तुलना में काउंसिल में हालात और बदतर ही हुए हैं - एक मामले में शिकायत पुलिस तक पहुँची है, और एक अन्य मामले में एक कर्मचारी को अपनी जान गँवाना पड़ी है, लेकिन पीछे तमाम नाटकबाजी करने वाले गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को काउंसिल के मामलों से जैसे अब कोई मतलब नहीं रह गया है । 
मेघराज के निधन ने लेकिन काउंसिल के कर्मचारियों को खासा उत्तेजित किया हुआ है, उनका कहना है कि काउंसिल के कुछेक सदस्यों के रवैये व व्यवहार से तंग आकर चेयरपरसन श्वेता पाठक जब पुलिस में शिकायत कर सकती हैं, तो मेघराज को जिन हालात में अपनी जान गँवाना पड़ी है उसकी जाँच के लिए भी पुलिस में मामला दर्ज करवाया जाना चाहिए । कर्मचारी मेघराज के असामयिक निधन के लिए रीजनल काउंसिल के चारों पदाधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और माँग कर रहे हैं कि इनके खिलाफ मेघराज की 'हत्या' का मामला चले । 

Friday, August 16, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जीएमसीएस बैच न बन पाने के लिए नितिन कँवर के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि वह जितना ही पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता को जिम्मेदार ठहराने/बताने की कोशिश कर रहे हैं, उतने ही और ज्यादा खुद बेनकाब होते जा रहे हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन के रूप में नितिन कँवर की बेईमानीपूर्ण मनमानी के चलते जीएमसीएस के नए बैच नहीं बन पा रहे हैं और इस कारण चार्टर्ड एकाउंटेंट छात्रों को गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गॉंव की तरफ भागना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि रिजल्ट आते ही छात्रों के बीच जीएमसीएस के बैच में शामिल होने की होड़ मचती है । दिल्ली में करीब छह बैच बनते हैं, छात्रों की संख्या बढ़ने से अक्सर ही उनकी गिनती आठ/नौ तक हो जाती है । दो दिन पहले रिजल्ट आने के बाद, अभी तक नए बैच बन जाने चाहिए थे, लेकिन उनके बनने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है । रीजनल काउंसिल के कार्यालय की तरफ से छात्रों को बताया जा रहा है कि वेंडर्स तथा फैकल्टीज को भुगतान न हो पाने के कारण उन्होंने आगे काम करने से इंकार कर दिया है, जिसके चलते नई क्लासेस शुरू होने के हालात नहीं बनते दिख रहे हैं । इस स्थिति में दिल्ली के छात्रों के बीच अफरातफरी का माहौल बन गया है और उन्होंने गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गाँव में जीएमसीएस के बैच में शामिल होने के लिए जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के इतिहास में यह नजारा पहली बार दिखाई दे रहा है, और इसके लिए जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन नितिन कँवर को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । आरोप सुने जा रहे हैं कि कमीशनबाजी के चक्कर में जीएमसीएस कमेटी के चेयरमैन के रूप में नितिन कँवर जिस तरह की बेईमानियाँ कर रहे हैं, उसके नतीजे में ही यह हालात बने हैं और चार्टर्ड एकाउंटेंट छात्रों को नाहक ही परेशान होना पड़ रहा है ।
नितिन कँवर हालाँकि इस स्थिति के लिए रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी पंकज गुप्ता तथा ट्रेजरर विजय गुप्ता को जिम्मेदार ठहराया रहे हैं । उनका कहना है कि इन दोनों के द्वारा अकाउंट पास न करने तथा भुगतान में अड़ंगा डालने के कारण वेंडर्स तथा फैकल्टीज को भुगतान नहीं हो पा रहा है और उन्होंने आगे काम करने से मना कर दिया है । नितिन कँवर की तरफ से गंभीर आरोप यह सुनने को मिल रहा है कि पंकज गुप्ता वेंडर्स व फैकल्टीज से कमीशन माँग रहे हैं तथा अपनी पसंद की फैकल्टीज लगाना चाहते हैं, और इन मामलों में दाल न गलने के कारण भुगतान रोके हुए हैं । पंकज गुप्ता तथा विजय गुप्ता का कहना लेकिन यह है कि जीएमसीएस क्लासेस के लिए वेंडर्स व फैकल्टीज तय करने में नितिन कँवर ने काउंसिल के सदस्यों व पदाधिकारियों को विश्वास में नहीं लिया है और मनमाने तरीके से उन्हें नियुक्त किया है, जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है । पंकज गुप्ता व विजय गुप्ता का कहना है कि जीएमसीएस के चेयरमैन के रूप में नितिन कँवर की जिम्मेदारी व्यवस्था देखने की है, खर्चे वाले काम अकेले और मनमाने तरीके से करने का अधिकार उन्हें नहीं है । इनका कहना है कि पंकज गुप्ता पर लगाए जाने वाले अपने आरोपों को लेकर नितिन कँवर यदि सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें तुरंत इस मामले को रीजनल काउंसिल और या रीजनल काउंसिल की एक्जीक्यूटिव कमेटी में रखना चाहिए । नितिन कँवर लेकिन ऐसा करने को तैयार नहीं हो रहे हैं, इससे ही जाहिर है कि वेंडर्स तथा फैकल्टीज से कमीशन वास्तव में वह खा रहे हैं, और अपनी तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए वह पंकज गुप्ता को निशाना बना रहे हैं । 
इस मामले में दूसरे कई लोग भी नितिन कँवर को ही दोषी ठहरा रहे हैं । माना/समझा जा रहा है कि नितिन कँवर को चूँकि सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ना है इसलिए वह अपने समर्थकों को फैकल्टीज के रूप में रख/रखवा कर अपना समर्थन-आधार मजबूत कर रहे हैं; साथ ही कमीशन बाजी से पैसे भी बना रहे हैं । मजे की बात यह देखने/सुनने को मिल रही है कि नितिन कँवर के नजदीकी व शुभचिंतकों के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले लोग भी नितिन कँवर की बेईमानीपूर्ण हरकतों को उनके लिए घातक मान रहे हैं । उनका कहना है कि नितिन कँवर सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी को लेकर यदि सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें इस तरह की हरकतों से बचना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि किसी को भी उन पर चोरी-चकारी का आरोप लगाने का 'मौका' न मिले तथा उनके फैसलों से प्रोफेशन के लोगों को परेशान न होना पड़े । जीएमसीएस क्लासेस के वेंडर्स व फैकल्टीज के चयन/चुनाव के मामले में वह यदि रीजनल काउंसिल के सभी पदाधिकरियों व सदस्यों को विश्वास में लेकर काम करें, तो न तो किसी को उन पर आरोप लगाने का मौका मिलेगा और न ही क्लासेस के सस्पेंड होने के कारण चार्टर्ड एकाउंटेंट छात्रों के परेशान होने की नौबत आएगी । नितिन कँवर के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि जीएमसीएस बैच न बन पाने के लिए वह जितना ही पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता को जिम्मेदार ठहराने/बताने की कोशिश कर रहे हैं, उतने ही और ज्यादा खुद बेनकाब होते जा रहे हैं । उनके ही नजदीकियों व समर्थकों का कहना है कि नितिन कँवर ने यदि जल्दी ही अपना रवैया नहीं सुधारा, तो उनके लिए मुसीबतें और बढ़ेंगी ही । 

Wednesday, June 19, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता की मदद से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने की तैयारी में अपने आप को विवादों से बचाने के लिए तैयार की गई पंकज गुप्ता की रणनीति ही उनके लिए मुसीबत बनी

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी पंकज गुप्ता ने इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता की मदद से अगले वर्ष चेयरमैन बनने के लिए अपने आप को विवादों से बचाने का जो उपक्रम किया था, उसने उल्टा ही असर करते हुए उन्हें मुसीबत में और फँसा दिया है । पंकज गुप्ता की हाल-फिलहाल में इस बात के लिए काफी आलोचना हुई है कि सेक्रेटरी होने के बावजूद वह काउंसिल के कामकाज में समय नहीं देते हैं, और काउंसिल के कार्यालय में कभी-कभार ही आते हैं और वह भी बहुत कम समय के लिए । उनकी तरफ से इसका हमेशा ही यही जबाव मिला कि वह काम से काम रखने वाले व्यक्ति हैं, और फालतू में काउंसिल कार्यालय में बैठ कर अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते हैं । पंकज गुप्ता की तरफ से इस बारे में और जो कुछ भी कहा गया, उससे लोगों को 'साउंड' हुआ जैसे वह कहना चाह रहे हैं कि वह बहुत व्यस्त व्यक्ति हैं, और उनके पास काउंसिल कार्यालय में आने का समय नहीं है और वह फोन पर ही सेक्रेटरी पद की जिम्मेदारी संभाल/निभा लेंगे । इस तरह की बातों और उनके रवैये की हालाँकि आलोचना भी हुई, लेकिन उन्होंने उन पर ध्यान नहीं दिया । पंकज गुप्ता खुशकिस्मत रहे कि काउंसिल के दूसरे पदाधकारियों और सदस्यों के बीच ऐसे झगड़े रहे कि उन झगड़ों के शोर में उनका 'मामला' दबा रहा । लेकिन पिछले दिनों कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ हुई रीजनल काउंसिल सदस्यों की अनौपचारिक मीटिंग में उनके 'रवैये' का खास नोटिस लिया गया, और उन्हें कुछ नसीहतें मिलीं । उसके बाद हुई चर्चाओं में जिक्र रहा कि पंकज गुप्ता दरअसल जानबूझ कर काउंसिल कार्यालय नहीं आते थे । वह अपने आप को झगड़ों से दूर दिखाना चाहते थे, ताकि किसी विवाद में उनका नाम न आ सके । अपनी इस रणनीति में वह सफल भी थे, लेकिन 6 जून की रीजनल काउंसिल की अनौपचारिक मीटिंग के बाद पंकज गुप्ता के लिए हालात बदल गए हैं ।
लोगों के बीच जिक्र है कि पंकज गुप्ता अपने आप को विवादों से इसलिए दूर रखना चाहते थे, ताकि अगले चेयरमैन के चुनाव/चयन के समय उनकी दाल गल सके । माना/समझा जा रहा है कि अगले वर्ष इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट होने के नाते अतुल गुप्ता नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में ऐसा चेयरमैन 'चाहेंगे', जिसके साथ कोई विवाद न जुड़ा हो; चेयरमैन पद के लिए जो लोग अत्यंत 'सक्रिय' नजर आते हैं या समझे जाते हैं, वह सब किसी न किसी विवाद में फँसे हुए हैं । ऐसे में पंकज गुप्ता को लगता है कि वह अतुल गुप्ता की पसंद हो सकते हैं । अतुल गुप्ता के समर्थन के सहारे/भरोसे रतन सिंह यादव भी हालाँकि चेयरमैन बनने के चक्कर में थे, और इस चक्कर में वह जब तब काउंसिल सदस्यों के 'पितामह' बनने की कोशिश करते रहते थे - लेकिन अपने स्टडी सर्किल में नितिन कँवर को स्पीकर के रूप में बुलाकर उन्होंने अतुल गुप्ता को नाराज कर लिया है और अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है । रतन सिंह यादव को जिस दिन से यह पता चला है कि नितिन कँवर को अपने स्टडी सर्किल में बुलाने के कारण अतुल गुप्ता उनसे नाराज हो गए हैं, उन्होंने अगले वर्ष के चेयरमैन पद की दौड़ से अपने को अलग करने की घोषणा कर दी है । हालांकि काउंसिल के सदस्यों को उनकी बात पर भरोसा नहीं है; सदस्यों का मानना और कहना है कि रतन सिंह यादव अभी भले ही कह रहे हों कि वह अगले वर्ष चेयरमैन बनने की होड़ से दूर रहेंगे - लेकिन उनकी बात का कोई भरोसा नहीं है, वह अपनी ही बात से पलट कर कभी भी होड़ में शामिल हो जायेंगे । अतुल गुप्ता के रतन सिंह यादव से नाराज हो जाने की चर्चा ने लेकिन पंकज गुप्ता को अतुल गुप्ता के समर्थन के प्रति और आश्वस्त किया ।
पंकज गुप्ता के पास/साथ लेकिन यह आश्वस्ति अभी आई ही थी कि उनकी रणनीति के फेल होने के हालात बन गए और अपने आप को विवादों से दूर रखने की उनकी कोशिश उलटे उनके गले पड़ गई है । हालाँकि अभी भी हालात पूरी तरह से उनके हाथ से निकले नहीं हैं, लेकिन यह जरूर तय हो गया है कि विवादों से बचने का उनका पुराना तरीका उनके काम अब नहीं आयेगा । काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच अभी तो झगड़ा शांत है, लेकिन यह कब तक शांत रह पायेगा - यह दावे से कोई नहीं कह पा रहा है । पंकज गुप्ता अभी तक तो कार्यालय से दूर रह कर झगड़े के दागों से अपने आप को बचाये हुए थे, लेकिन आगे वह कैसे बचेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Friday, June 7, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग तो रद्द हो गई; लेकिन अनौपचारिक मीटिंग में बने माहौल ने झगड़े-झंझट का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को भड़काया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई रीजनल काउंसिल की मीटिंग, इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी के हस्तक्षेप के बाद, रद्द हो गई । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी पंकज गुप्ता ने हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई मीटिंग को इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों से खिलवाड़ बताया था और इंस्टीट्यूट में इसकी शिकायत करते हुए इसे रद्द करने की माँग की थी । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी ने पंकज गुप्ता की आपत्ति को स्वीकार करते हुए चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को ऐन मौके पर मीटिंग रद्द कर देने के लिए कहा । मीटिंग रद्द होने से बौखलाए हरीश चौधरी जैन तथा गौरव गर्ग ने इसका ठीकरा इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी के सिर फोड़ा है । इनका आरोप है कि विजय झालानी ने इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी पर दबाव बना कर मीटिंग रद्द करने/करवाने का फैसला करवाया है । हरीश चौधरी जैन तो इसलिए बौखलाए हैं क्योंकि मीटिंग रद्द होने से उनकी भारी फजीहत हुई है; गौरव गर्ग इसलिए बौखलाए हैं क्योंकि पिछले कुछेक दिनों से वह हरीश चौधरी जैन के नजदीक होने की कोशिश कर रहे हैं और संदर्भित मीटिंग के सबसे बड़े समर्थक व 'वकील' बने हुए थे; मीटिंग के जरिये उन्होंने पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता को 'फँसाने' के मंसूबे बनाए हुए थे - मीटिंग रद्द हो जाने से लेकिन उनके मंसूबे धरे रह गए । 'कोढ़ में खाज' वाली बात यह हुई कि हरीश चौधरी जैन द्वारा बुलाई गई और गौरव गर्ग द्वारा जोरशोर से समर्थित मीटिंग तो रद्द हो गई; लेकिन रीजनल काउंसिल सदस्यों व कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच रीजनल काउंसिल में चल रहे झगड़े-झंझट को लेकर अनौपचारिक मीटिंग हुई, जिसमें जो माहौल बना और बातें हुईं - वह हरीश चौधरी जैन तथा रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के बीच चल रहे झगड़े-झंझट में अपना फायदा देख रहे गौरव गर्ग, नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग और रतन सिंह यादव की 'उम्मीदों' पर पानी फेरने वाला साबित हुआ । 
अनौपचारिक मीटिंग में मौजूद सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों को यह बात साफ साफ बता दी कि जैसा चल रहा है, यदि ऐसा ही चलता रहा तो रीजनल काउंसिल पदाधिकारियों के अधिकार 'छीन' लिए जायेंगे और रीजनल काउंसिल का काम इंस्टीट्यूट के अधिकारी करेंगे । यह सुन कर चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के तेवर ढीले पड़े । हरीश चौधरी जैन को यह सुन/जान कर और झटका लगा कि वह कोई भी काम और कोई भी फैसला सेक्रेटरी को विश्वास में लिए बिना नहीं कर सकते हैं । इस पर नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, गौरव गर्ग ने आपत्ति की, तो सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने बड़े 'प्यार' से उन्हें समझा दिया कि चेयरमैन के लिए ऐसा करना नियमानुसार जरूरी है; यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो फिर इंस्टीट्यूट कार्रवाई कर सकता है - सेक्रेटरी को विश्वास में लिए बिना बुलाई गई मीटिंग को रद्द करके इंस्टीट्यूट प्रशासन ने इसका संकेत दे दिया है; अब यह चेयरमैन पर निर्भर करता है कि वह इस संकेत को समझे या न समझे । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को भी नसीहत दी कि उन्हें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के पालन पर भी ध्यान देना चाहिए; उन्हें यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उन्हें शामिल किए बिना कोई फैसला नहीं होने के नियम के चलते उन्हें मनमानी करने की छूट मिल जाएगी । दरअसल चेयरमैन हरीश चौधरी जैन का आरोप रहा कि सेक्रेटरी के रूप में पंकज गुप्ता काउंसिल के ऑफिस में तो कई कई दिनों तक आते नहीं हैं, और चाहते यह हैं कि काउंसिल में 'कोई वॉशरूम भी जाए तो उनसे पूछ कर जाए ।' सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने हरीश चौधरी जैन की इस शिकायत को गंभीरता से लिया, और पंकज गुप्ता को ऊपर वर्णित नसीहत दी । 
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने कुछ नियमों का हवाला देकर, कुछ इंस्टीट्यूट प्रशासन की कार्रवाई का डर दिखा कर और कुछ 'बड़े भाई' जैसी भूमिका निभाते हुए प्यार से समझा कर रीजनल काउंसिल सदस्यों - खासकर पदाधिकारियों को यह संदेश देने में फिलहाल तो कामयाबी प्राप्त कर ली है कि उन्हें मिलजुल कर काम करना है । इससे उम्मीद बनी है कि रीजनल काउंसिल में पिछले काफी समय से चला आ रहा गतिरोध खत्म होगा और अराजकता की जो स्थिति बनी थी, उससे छुटकारा मिलेगा । अधिकतर लोग इस 'नतीजे' से संतुष्ट हैं; लेकिन इस नतीजे से गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को चूँकि अपनी 'राजनीति' पिटती हुई दिख रही है, इसलिए वह इस नतीजे पर तरह तरह के 'किंतु' 'परंतु' लगा रहे हैं । मीटिंग में गौरव गर्ग ने तो सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ कुछेक मौकों पर बदतमीजीपूर्ण व्यवहार करने की कोशिश भी की । गौरव गर्ग ने एक मौके पर, जरूरत पड़ने पर दोबारा धरने पर बैठने की बात भी कही । पिछले दिनों धरने की नाटकबाजी के बाद कुछेक लोगों ने गौरव गर्ग को 'मिस्टर धरना गर्ग' कहना शुरू कर दिया है, इसलिए कल की मीटिंग में उन्होंने जब दोबारा धरने पर बैठने की बात कही, तो मीटिंग में मौजूद सभी लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई थी । रतन सिंह यादव ने मीटिंग में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मीटिंग के बाद कुछेक लोगों के बीच सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की यह कहते हुए आलोचना की कि वह रीजनल काउंसिल के कामकाज में नाहक ही हस्तक्षेप कर रहे हैं । असल में, रीजनल काउंसिल में जो झगड़ा चल रहा था, उसका सबसे ज्यादा फायदा गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव ही उठा रहे थे । बिल्लियों के झगड़े में बंदर के फायदा उठाने वाले किस्से को चरितार्थ करते हुए गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव झगड़ते सदस्यों के साथ दोस्ती गाँठने की कोशिश करते हुए नए नए समीकरण बनाने का प्रयास कर रहे थे, ताकि अगले चेयरमैन के चुनाव में वह अपना दावा ठोक सकें । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल सदस्यों से बात करके रीजनल काउंसिल में माहौल सामान्य बनाने का जो प्रयास किया है, उसमें गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को अपनी अपनी योजना फेल होती हुई दिख रही है, इसलिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की भूमिका से वह भड़के हुए हैं । 

Tuesday, May 28, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी पंकज गुप्ता द्वारा गैरकानूनी बताई जा रही 6 जून की रीजनल काउंसिल की मीटिंग को करने की जिद पर अड़े चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के रवैये से काउंसिल में हालात जल्दी सुधरते हुए नजर नहीं आ रहे हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन द्वारा 6 जून को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाये जाने को लेकर विवाद हो गया है । सेक्रेटरी पंकज गुप्ता ने हरीश चौधरी जैन के इस कदम को इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों से खिलवाड़ करने के नए उदाहरण के रूप में बताया है । पंकज गुप्ता का कहना है कि इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों के अनुसार, चेयरमैन को मीटिंग बुलाने का अधिकार ही नहीं है; नियम-कानूनों केअनुसार, चेयरमैन मीटिंग बुलाने के लिए सेक्रेटरी से कहेगा और सेक्रेटरी मीटिंग बुलायेगा । हरीश चौधरी जैन ने लेकिन सेक्रेटरी को 'कष्ट' देने की जरूरत ही नहीं समझी और खुद से ही 6 जून को मीटिंग बुला ली है । पंकज गुप्ता ने नियम-कानूनों का हवाला देते हुए इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों से हरीश चौधरी जैन की इस कार्रवाई की शिकायत की है और 6 जून को बुलाई गई मीटिंग को रद्द करने/करवाने की माँग की है । पंकज गुप्ता का कहना है कि हरीश चौधरी जैन नियमानुसार मीटिंग बुलाने की प्रक्रिया अपनाये; सेक्रेटरी के रूप में वह मीटिंग का नोटिस निकालेंगे - वह तो खुद चाहते हैं कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग हो ताकि यहाँ जो तमाशे हो रहे हैं, उनके कारणों की पहचान हो और सभी को सच्चाई का पता चले । इस तरह देखने को तमाशे की बात यह मिल रही है कि चेयरमैन और सेक्रेटरी रीजनल काउंसिल की मीटिंग होने/बुलाने के पक्ष में तो हैं - लेकिन चेयरमैन इसके लिए नियमों का पालन नहीं करना चाहता है, और सेक्रेटरी नियमों का पालन न होने का वास्ता देकर मीटिंग का विरोध कर रहा है ।
इस तमाशे के पीछे असली कारण दरअसल मीटिंग का एजेंडा है । हरीश चौधरी जैन ने मनमाने तरीके से नियम-कानूनों को धता बता कर जिस मीटिंग का नोटिस निकाला है, उसके एजेंडे पर पंकज गुप्ता को ऐतराज है । उल्लेखनीय है कि 6 जून की प्रस्तावित मीटिंग के एजेंडे में ट्रेजरर विजय गुप्ता को निशाना बनाने की तैयारी है । सेक्रेटरी पंकज गुप्ता का कहना है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग अवश्य ही होना चाहिए और उसमें सभी मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए और इसके लिए विस्तृत एजेंडा बनना चाहिए । हरीश चौधरी जैन की तरफ से हालाँकि दावा किया जा रहा है कि 6 जून की प्रस्तावित मीटिंग का एजेंडा इसी आधार पर तैयार किया गया है, जिससे कि रीजनल काउंसिल के कामकाज में पैदा हुए मौजूदा गतिरोध को खत्म किया जा सके । हरीश चौधरी जैन की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि रीजनल काउंसिल में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है; हद की बात यहाँ तक हुई कि स्टॉफ की तनख्वाह समय से नहीं दी जा सकी, जिस कारण स्टॉफ को हड़ताल पर जाना पड़ा और काउंसिल को कई सेमिनार्स तक रद्द करने पड़े हैं, जिसके नतीजे में सदस्यों के बीच नाराजगी व असंतोष पैदा हुआ है । इस स्थिति के लिए हर कोई दूसरों को जिम्मेदार ठहरा रहा है, जिस कारण न तो यह साफ हो पा रहा है कि काउंसिल में ऐसे हालात आखिर बने क्यों और न यह तय हो पा रहा है कि इस हालात से निकले कैसे ? हरीश चौधरी जैन की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि उन्होंने मीटिंग का एजेंडा इसी तरह से बनाया है ताकि आरोपों/प्रत्यारोपों का खेल रुके और साफ साफ पता चले कि गड़बड़ी आखिर है क्या और कहाँ ? मीटिंग बुलाने की प्रक्रिया को भी हरीश चौधरी जैन ने नियमानुरूप बताया है; उनका कहना है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन जब भी उनसे पूछेगा, वह यह साबित  कर देंगे कि मीटिंग बुलाने का काम उन्होंने नियमानुरूप ही किया है ।
इस बीच मजे की बात यह हुई है कि हरीश चौधरी जैन और उनके साथियों ने ट्रेजरर विजय गुप्ता के साथ-साथ सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को भी आरोपों के घेरे में लेना शुरू कर दिया है, और इसके लिए पिछले दिनों अमृतसर में हुए ओरिएंटेशन कार्यक्रम में बाँटे गए बैजेज के भुगतान को मुद्दा बनाया है । उनकी तरफ से बताया जा रहा है कि कार्यक्रम में 'हीरोपंती' दिखाते हुए पंकज गुप्ता ने घोषणा की थी कि यह बैजेज उनकी तरफ से लोगों को दिए जा रहे हैं, लेकिन अब पता चला है कि उक्त बैजेज का भुगतान काउंसिल के अकाउंट्स से किया गया है, जबकि इसके लिए पर्चेज कमेटी की स्वीकृति भी नहीं ली गई है । पंकज गुप्ता की तरफ से इस मामले में सफाई आई है कि उक्त बैजेज उनकी तरफ से दिए जरूर गए थे, लेकिन उन्होंने यह कभी कहीं नहीं कहा था कि इसका पैसा वह देंगे; और फिर इसका जो भुगतान हुआ है, उस पर चेयरमैन के भी हस्ताक्षर हैं । पंकज गुप्ता की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि चेयरमैन हरीश चौधरी जैन यही गंदी राजनीति खेल रहे हैं - एक तरफ तो वह भुगतान स्वीकृत कर रहे हैं और दूसरी तरफ भुगतान पर सवाल उठा रहे हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में कामकाज का इस समय जो बुरा हाल है, और उसे लेकर परस्पर आरोपों/प्रत्यारोपों का जो शोर है - उससे निजात पाने का एक ही तरीका है कि रीजनल काउंसिल सदस्यों की मीटिंग हो और उसमें आमने-सामने सारी बातें हों, ताकि सच्चाई अपने वास्तविक रूप में सामने आ सके । लेकिन यहाँ तो मीटिंग को लेकर ही झगड़ा पैदा हो गया है । झगड़ा भी खासा पेचीदा है - क्योंकि दोनों ही पक्ष चाहते हैं कि मीटिंग हो; झगड़ा लेकिन इस बात को लेकर है कि कैसे हो । इस झगड़े को देखते हुए लगता नहीं है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हालात जल्दी सुधरेंगे !

Wednesday, May 1, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ओरिएंटेशन कार्यक्रम का बिना बैकड्रॉप के होना बदइंतजामी का एक प्रमुख उदाहरण बना, जो वास्तव में हरीश चौधरी जैन तथा पंकज गुप्ता के नाकारापन का भी सुबूत है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का अमृतसर में आयोजित हुआ ओरिएंटेशन कार्यक्रम अपनी बदइंतजामी के लिए चौतरफा आलोचना का शिकार हो रहा है । मजे की बात यह है कि चेयरमैन हरीश चौधरी जैन इस बदइंतजामी के लिए सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो पंकज गुप्ता बदइंतजामी का ठीकरा हरीश चौधरी जैन के सिर फोड़ रहे हैं । हरीश चौधरी जैन का गंभीर आरोप यह है कि पंकज गुप्ता ने पहले तो वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक व ट्रेजरर विजय गुप्ता के साथ मिल कर ओरिएंटेशन कार्यक्रम की व्यवस्था हथिया ली और फिर व्यवस्था की जिम्मेदारियों का निर्वाह भी ठीक से नहीं किया, जिस कारण हर मौके पर अव्यवस्था का आलम रहा और हर किसी को परेशान होना पड़ा । पंकज गुप्ता की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि उन्होंने ओरिएंटेशन कार्यक्रम अमृतसर में न करने के बहुत सुझाव दिए थे, लेकिन चेयरमैन के रूप में हरीश चौधरी जैन ने पहले तो उनके सुझाव की अनसुनी की, और फिर कार्यक्रम की तैयारी में कोई सहयोग भी नहीं किया - अधिकतर मौकों पर तरह तरह से बाधा खड़ी करने और कार्यक्रम की तैयारियों में अड़चन ही डालने का काम किया, जिसके परिणामस्वरूप कार्यक्रम में बदइंतजामी होना ही थी । बदइंतजामी का आलम यह रहा कि इंस्टीट्यूट के इतिहास में शायद यह पहला मौका रहा जबकि कार्यक्रम में बैकड्रॉप ही नहीं लग पाया । कार्यक्रम शुरू होने से पहले बैकड्रॉप हालाँकि लगा था, लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से ठीक पहले उसे हटा दिया गया और दूसरे दिन तक भी नया बैकड्रॉप तैयार नहीं करवाया जा सका । 
ओरिएंटेशन प्रोग्राम की तैयारी से जुड़े लोगों का कहना/बताना है कि कार्यक्रम शुरू होने से ठीक पहले रतन सिंह यादव ने बैकड्रॉप पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ का नाम न होने को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया और बैकड्रॉप को हटवा ही दम लिया । काउंसिल के दूसरे सदस्यों को हैरानी भी हुई कि इससे पहले भी कुछेक कार्यक्रमों में, जिनमें प्रेसीडेंट की कोई भूमिका नहीं थी, और उसके चलते उनका नाम बैकड्रॉप पर नहीं था - रतन सिंह यादव को प्रेसीडेंट का नाम याद नहीं आया; लेकिन यहाँ उन्होंने खासा हंगामा खड़ा कर दिया । कुछेक लोगों का कहना/बताना है कि रतन सिंह यादव का माथा तो दरअसल अविनाश गुप्ता का नाम प्रमुखता से छपा देख कर गरमाया था; प्रेसीडेंट का नाम न होने का तो उन्होंने वास्तव में बहाना बनाया । लोगों के अनुसार, इसकी जड़ में बात असल में यह है कि रतन सिंह यादव को लगता है कि अविनाश गुप्ता के कारण ही उनसे चेयरमैन की कुर्सी छिनी है, इसलिए वह अविनाश गुप्ता का नाम कहीं भी प्रमुखता से लगा/छपा देखते हैं तो उनके तन-बदन में आग सी लग जाती है । बैकड्रॉप में अविनाश गुप्ता का नाम प्रमुखता से छपा देख कर रतन सिंह यादव ने अमृतसर ब्रांच के चेयरमैन इकबाल सिंह ग्रोवर के साथ खासी बदतमीजी की । इकबाल सिंह ग्रोवर बेचारे सफाई देते रहे कि अविनाश गुप्ता चूँकि अमृतसर ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में एक्स-ऑफिसो हैं, इसलिए प्रोटोकॉल के हिसाब से उनका नाम प्रमुखता से देना/छापना ही था; लेकिन रतन सिंह यादव ने उनकी एक न सुनी और बैकड्रॉप हटवा कर ही माने । इस मामले में इससे भी ज्यादा रोचक बात यह है कि इकबाल सिंह ग्रोवर ने चार दिन पहले ही बैकड्रॉप की तस्वीर चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को भेज दी थी, और दोनों में से किसी ने भी बैकड्रॉप को लेकर कोई आपत्ति नहीं की थी, लेकिन रतन सिंह यादव बैकड्रॉप को लेकर जब बदतमीजी कर रहे थे, तब किसी ने भी मामले में हस्तक्षेप नहीं किया और बैकड्रॉप को हट जाने दिया और इंस्टीट्यूट के इतिहास में पहली बार बिना बैकड्रॉप के ही कार्यक्रम होने दिया ।
इस प्रसंग से साबित है कि अमृतसर में आयोजित हुए ओरिएंटेशन कार्यक्रम का कोई 'माईबाप' नहीं था, और जिसकी जैसी मर्जी हो रही थी, वह कार्यक्रम में हस्तक्षेप कर रहा था । कार्यक्रम में बदइंतजामी का तथा हरीश चौधरी जैन और पंकज गुप्ता की लापरवाही का हाल देख कर लोगों को लग रहा था कि इन दोनों कोजब अपनी अपनी जिम्मेदारियों को निभाना ही नहीं है, तो इन्हें काउंसिल में पद लेने की जरूरत क्या पड़ी थी ? हरीश चौधरी जैन और पंकज गुप्ता के नाकारापन को देखते हुए लोगों को लग रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इस वर्ष के कामकाज का तो बस भगवान ही मालिक है ।