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Saturday, December 28, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के साथ नजदीकी बना और 'दिखा' कर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सत्ता पाने के खेल में श्वेता पाठक का पलड़ा भारी 'दिखने' से काउंसिल के बाकी सदस्यों के बीच हलचल मची

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता के साथ हाल ही के दिनों में कुछेक आयोजनों में श्वेता पाठक की भागीदारी होने और 'दिखने' के कारण इस चर्चा को हवा मिली है कि अतुल गुप्ता की तरफ से श्वेता पाठक को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का अगला चेयरपरसन बनाने की संभावनाएँ देखी/पहचानी जा रही हैं । मजे की बात यह है कि कई लोगों का यह भी कहना है कि इस चर्चा को खुद श्वेता पाठक तथा उनके नजदीकियों की तरफ से हवा दी जा रही है और इस तरीके से वह अतुल गुप्ता के नाम पर अगले वर्ष की टीम में अपनी जगह बनाने के जुगाड़ खोज रहे हैं । मजे की बात यह भी है कि अगले वर्ष के लिए बनने वाले पॉवर ग्रुप में जगह पाने के जुगाड़ में लगे कुछेक दूसरे काउंसिल सदस्य भी तरह तरह से अतुल गुप्ता के नजदीक होने तथा 'दिखने' के प्रयासों में लगे हैं । अगले वर्ष अतुल गुप्ता चूँकि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट होंगे, इसलिए माना/समझा जा रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वह ऐसी टीम चाहेंगे जो बिना किसी झगड़े-झंझट के अपना काम करे और प्रेसीडेंट के रूप में अतुल गुप्ता का नाम खराब न करे । यह मानने/समझने के चलते कयास यह लगाया जा रहा है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों का चयन अतुल गुप्ता अपनी पसंद से करेंगे; और इसी कयास के कारण रीजनल काउंसिल के कई सदस्य अतुल गुप्ता की गुडबुक में आने/रहने की कोशिशों में जुटे हैं । अतुल गुप्ता के समर्थन के सहारे श्वेता पाठक के चेयरपरसन बनने की चर्चा, इसे चाहें दूसरों ने छेड़ा हो और या इसे श्वेता पाठक की तरफ से हवा मिली हो, को लोगों के बीच ऐसी ही कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
गौर करने की बात लेकिन यह भी है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच बनी खेमेबाजी को देखते हुए कई लोगों को लगता है कि अगले वर्ष के लिए पॉवर ग्रुप के सदस्यों को राजी करना मेंढकों को तराजु में तौलने जैसा काम होगा । यह इसलिए भी होगा क्योंकि जो छोटी छोटी खेमेबाजियाँ बनी हुई हैं, उनके बीच आपस में बैर के संबंध ज्यादा हैं । 'ए' को 'बी' के साथ नहीं बैठना है, वह 'सी' के साथ मिलकर 'डी' को जोड़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन 'डी' को 'सी' फूटी आँख नहीं भाता है और वह 'बी' के साथ मिलकर 'ए' को पटाने में लगा है - ऐसे में कोई किसी से पटता दिख नहीं रहा है । रतन सिंह यादव काफी समय से दावा कर रहे हैं कि वह काउंसिल सदस्यों से बात कर रहे हैं और कामकाज को पटरी पर लाने की कोशिश में जुटे हैं । उनके इस दावे की लेकिन एक मौके पर काउंसिल सदस्य अविनाश गुप्ता ने यह कहते/बताते हुए पोल खोल दी कि उन्होंने उनसे तो कभी बात नहीं की; तब रतन सिंह यादव को सफाई देनी पड़ी कि अभी वह (निलंबित) पदाधिकारियों से बात कर रहे हैं, बाकी सदस्यों से बाद में बात करेंगे । खासी मशक्कत के बाद मीटिंग तय भी हुई, लेकिन (निलंबित) पदाधिकारियों ने मीटिंग में साथ बैठने से ही इंकार कर दिया - और मामला जहाँ का तहाँ ही बना रह गया ।
गौरव गर्ग एक अलग ही राग छेड़ चुके हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा शर्मनाक दशा के लिए वह चारों (निलंबित) पदाधिकारियों की हरकतों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । इस पर लोगों का पूछना है कि चारों पदाधिकारी जब हरकतें कर रहे थे, तब गौरव गर्ग के मुँह में छाले हो रखे थे क्या - जो उस समय वह कुछ न बोल पाए । गौरव गर्ग ने एक मौके पर हालाँकि धरने की घोषणा की थे, लेकिन उनकी वह घोषणा तमाशे से ज्यादा कुछ न हुई । गौरव गर्ग एक मौके पर श्वेता पाठक के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करके भी विवाद खड़ा कर चुके हैं । इसी के चलते रतन सिंह यादव कई मौकों पर गौरव गर्ग को सलाह दे चुके हैं कि तुम यदि अपना मुँह बंद रखोगे तो काउंसिल में हालात सामान्य बनाने में बड़ा योगदान दोगे । मजे की बात यह है कि इसी तरह की सलाह कई लोग रतन सिंह यादव को देते रहते हैं । रतन सिंह यादव औरों की नहीं सुनते, गौरव गर्ग उनकी नहीं सुनते । लोगों का कहना है कि अपने को सक्रिय दिखा कर यह दोनों दरसअल अगले वर्ष के पॉवर ग्रुप में अपनी जगह बनाने की जुगाड़ में हैं । इस समय लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सत्ता-संघर्ष में अतुल गुप्ता के भाव ऊँचे हैं; सत्ता के आकाँक्षी किसी न किसी बहाने और तरीके से अतुल गुप्ता के साथ नजदीकी बनाने और 'दिखाने' में लगे हैं । अतुल गुप्ता के साथ नजदीकी बनाने और 'दिखाने' के खेल में इस समय श्वेता पाठक का पलड़ा भारी लग रहा है; कुछेक लोगों के अनुसार, उसे भारी 'दिखाया' जा रहा है - अब सच चाहें जो हो, 'दिखते' हुए परिदृश्य ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों और उनकी राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच हलचल तो मचा ही दी है ।

Friday, November 15, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के गतिरोध को दूर करने के उद्देश्य से हुई 14 नवंबर की मीटिंग रीजनल काउंसिल के सदस्य गौरव गर्ग की अकेले श्रेय लेने की अवसरवादी, स्वार्थी तथा बेवकूफीपूर्ण हरकतों से फेल हुई; तथा मामला और बिगड़ता हुआ दिख रहा है 

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने के लिए रीजनल काउंसिल सदस्यों की कल हुई मीटिंग 'ढाक के तीन पात' साबित हुई और मामला सिर्फ जहाँ का तहाँ ही फँसा नहीं रह गया है - बल्कि उलझ और गया दिख रहा है । मजे की बात यह है कि कुछेक काउंसिल सदस्यों का ही मानना/कहना है कि 14 नवंबर की मीटिंग के फेल होने की नींव काउंसिल सदस्य गौरव गर्ग ने एक दिन पहले, 13 नवंबर को ही रख दी थी - जब अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर उन्होंने भड़काने वाली बातें लिखीं । गौरव गर्ग ने रीजन के सदस्यों को उकसाते/भड़काते हुए कहा कि उन्हें चुने हुए सदस्यों से कहना चाहिए कि वह काम करने के लिए चुने गए हैं, न कि अपनी पर्सनल ईगो को संतुष्ट करने के लिए । गौरव गर्ग की इस बात से समझ लिया गया कि जब काउंसिल का एक सदस्य सरेआम कह रहा है कि काउंसिल के दूसरे सदस्य काम करने की बजाये अपनी पर्सनल ईगो को संतुष्ट करने में ही लगे रहते हैं, तो फिर सदस्यों के बीच क्या तो बातचीत होगी और क्या उसका नतीजा निकलेगा ? काउंसिल सदस्यों का ही कहना है कि गौरव गर्ग को इस तरह की बात सार्वजनिक रूप से और सोशल मीडिया में कहने की जरूरत नहीं थी, और नाहक ही कही गई उनकी इस बात ने मीटिंग से एक दिन पहले ही गतिरोध को दूर करने के उद्देश्य से होने वाली मीटिंग के 'माहौल' को खराब करने का काम कर दिया ।
गौरव गर्ग ने अपनी इस फेसबुक पोस्ट में एक और हरकत की - 14 नवंबर की मीटिंग के लिए उन्होंने अजय सिंघल, रतन सिंह यादव, अविनाश गुप्ता, राजेंद्र अरोड़ा, नितिन कँवर तथा अपने खुद के प्रयासों का हवाला दिया । यह देख कर पाँचों लोग भड़क गए और उन्होंने गौरव गर्ग की इस हरकत को काउंसिल सदस्यों के बीच फूट डालने तथा झगड़े पैदा करने की कोशिश के रूप में देखा । एक एक करके सभी ने गौरव गर्ग को हड़काया और उन पर दबाव बनाया कि वह अपनी पोस्ट से उनका नाम हटाएँ । जब सभी ने गौरव गर्ग के कान उमेंठे, तब करीब साढ़े तीन घंटे के अंदर गौरव गर्ग अपनी पोस्ट  संपादित करके पाँचों नाम हटाने के लिए मजबूर हुए । (गौरव गर्ग की मूल पोस्ट का स्क्रीन शॉट इस रिपोर्ट के साथ प्रकाशित तस्वीर में देखा जा सकता है ।) लोगों के बीच सवाल यही है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने की कोशिश जब सभी सदस्यों को मिलजुल कर करना है, तब फिर गौरव गर्ग अकेले ही सक्रिय 'दिखने' का प्रयास क्यों कर रहे हैं ? लोगों को लग रहा है कि गौरव गर्ग प्रयासों का श्रेय अकेले ही लेना चाहते हैं और रीजन  सदस्यों को 'दिखाना' चाहते हैं कि वह तो हालात सुधारने के लिए काम कर रहे हैं, जबकि अन्य दूसरे सदस्य कुछ नहीं कर रहे हैं । गौरव गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि गौरव गर्ग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के हालात को सुधारना तो चाहते हैं, लेकिन अपनी बेवकूफीपूर्ण हरकतों से वह बनते काम को बिगाड़ देने का हुनर रखते हैं - और यही उन्होंने 14 नवंबर की मीटिंग को लेकर किया ।
14 नवंबर की मीटिंग को मजाक बनाने में चेयरमैन हरीश जैन तथा निकासा चेयरमैन राजेंद्र अरोड़ा का भी पूरा पूरा 'सहयोग' रहा । यह दोनों मीटिंग स्थल के आसपास ही बैठे रहे, लेकिन मीटिंग में नहीं पहुँचे । इनका कहना रहा कि श्वेता पाठक जब तक पुलिस में की गई अपनी शिकायत वापस नहीं लेंगी, तब तक वह उनके साथ किसी मीटिंग में नहीं शामिल होंगे । श्वेता पाठक यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि पुलिस में दर्ज की गई उनकी शिकायत उनका पर्सनल मैटर है, जिस पर काउंसिल की मीटिंग में बात नहीं हो सकती है । हरीश जैन और राजेंद्र अरोड़ा मीटिंग में तभी शामिल हुए, जब श्वेता पाठक व विजय गुप्ता मीटिंग छोड़ कर चले गए थे । ऐसे में मीटिंग में गतिरोध को दूर करने के लिए क्या तो बात होती और क्या सहमति बनती ? लोगों का मानना और कहना है कि दोनों पक्षों के तर्क अपनी अपनी जगह हैं, और उनके सही या गलत होने की बहस में न पड़ें तो भी यह तो तय ही है कि गतिरोध को दूर करने के लिए शुरू होने वाली बातचीत में यदि शर्तों को थोपा जायेगा, तो फिर बात कैसे होगी और कैसे आगे बढ़ेगी ? इस मामले को मीटिंग से पहले ही हल कर लेना चाहिए था, लेकिन लगता है कि जिस पर ध्यान ही नहीं दिया गया । आधी-अधूरी तैयारियों के साथ, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के गतिरोध को दूर करने के प्रयासों को गौरव गर्ग की अकेले श्रेय लेने की अवसरवादी, स्वार्थी तथा बेवकूफीपूर्ण हरकतों से दोहरी चोट पहुँची है; तथा मामला और बिगड़ता दिख रहा है । 

Sunday, August 18, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कर्मचारी मेघराज के असामयिक निधन से गुस्साए कर्मचारी इसके लिए काउंसिल के चारों पदाधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और माँग कर रहे हैं कि इनके खिलाफ मेघराज की 'हत्या' का मामला चले

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के नाकारापन तथा अपने अपने अहंकारीपूर्ण रवैये के कारण चलने वाली उनकी आपसी लड़ाई ने काउंसिल के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मेघराज की जान ले ली है । 25/26 वर्ष का मेघराज अपने घर गया हुआ था, और वहाँ ह्रदयाघात के कारण उसकी इहलीला समाप्त हो गई । मेघराज की मृत्यु की खबर से गुस्साए कर्मचारियों का कहना है कि जिस तनाव के चलते उसे हृदयाघात हुआ, उसके लिए रीजनल काउंसिल के चारों प्रमुख पदाधिकारी जिम्मेदार हैं, और इसके लिए इन पर मेघराज की 'हत्या' का मुकदमा चलना चाहिए । उसके साथियों का कहना है कि पिछले माह मिलने वाली पगार के अभी तक न मिलने के कारण मेघराज बहुत ही परेशान था, और इसी परेशानी में उसकी जान चली गई । घर जा रहा मेघराज अपने परिवार के सदस्यों के लिए कुछ सामान ले जाना चाहता था, लेकिन पगार न मिलने के कारण वह अपने रोजमर्रा के खर्चे ही मुश्किल से चला पा रहा था - परिवार के सदस्यों के लिए सामान कहाँ से ले जाता ? घर जाने से पहले उसने अपनी पगार पाने के लिए प्रायः हर पदाधिकारी से गुहार लगाई, लेकिन वह सब हिंदी फिल्म 'दीवार' में बोले गए अमिताभ बच्चन के मशहूर डॉयलॉग को सुनाते मिले कि 'जाओ, पहले उसके साइन लेकर आओ' - और इस तरह उसे पगार नहीं मिली । उसके साथियों का कहना है कि वह बड़ा कलपता हुआ घर गया था, और घर पर भी वह इस बात को लेकर बहुत परेशान था कि उसके पास पैसे नहीं हैं और उसे अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए भी परिवार के दूसरे सदस्यों का मुँह देखना पड़ रहा है । इस स्थिति ने मेघराज को अपने परिवार के सदस्यों के बीच शर्मिंदगी तथा बेहद तनाव में ला दिया था, और इसी तनाव ने अंततः युवावस्था में ही उसकी जान ले ली । 
मेघराज के अलावा, रीजनल काउंसिल के बाकी कर्मचारी भी पगार न मिलने के कारण बुरी तरह परेशान हैं । कर्मचारियों का कहना है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की आपसी लड़ाई ने कर्मचारियों की जान को जोखिम में डाल दिया है । जरूरी खर्चे पूरे न होने के कारण कई कर्मचारी बुरी तरह तनाव में हैं, लेकिन रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी इस सारे बबाल के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते में लगे हुए हैं और मस्त हैं । उनकी अहंकारभरी आपसी लड़ाई के चलते भुगतान नहीं हो पा रहे हैं और इस वजह से काउंसिल की तरफ से प्रत्येक सप्ताह होने वाला सेमीनार कई सप्ताह से नहीं हो पा रहा है, जीएमसीएस के नए बैच नहीं बन पाने के कारण चार्टर्ड अकाउंटेंट छात्रों को भटकना पड़ रहा है, कर्मचारियों को पगार नहीं मिल पा रही है - जिसके चलते उनका जीवन तबाह हुआ पड़ा है । मसला क्या है ? मसला यह है कि सेक्रेटरी पंकज गुप्ता और ट्रेजरर विजय गुप्ता का कहना है कि रीजनल काउंसिल में जो भी काम हो रहे हैं, विभिन्न कामों के लिए जो भी वेंडर्स हैं, उनके साथ एग्रीमेंट होना चाहिए । उनका आरोप है कि चेयरमैन हरीश चौधरी जैन अपने साथियों के दबाव में एग्रीमेंट करने को लेकर तैयार नहीं हैं । लेकिन हरीश चौधरी जैन की तरफ से कहा जाता है कि यह लोग एग्रीमेंट की बात तो करते हैं, लेकिन एग्रीमेंट करने की तैयारी करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं । हरीश चौधरी जैन का कहना है कि इन दोनों ने एग्रीमेंट न होने को एक बहाना व एक हथियार बनाया हुआ है, जिसका इस्तेमाल करते हुए इन्होंने रीजनल काउंसिल के कामकाज को बाधित किया हुआ है और पूरी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया हुआ है । दूसरे लोगों को भी लगता है कि बात यदि सिर्फ एग्रीमेंट न होने की ही है, तो चारों पदाधिकारी मिलकर एग्रीमेंट कर क्यों नहीं लेते ? यहाँ लेकिन काउंसिल के चारों पदाधिकारियों का अपना अपना उनका अहंकार आड़े/आगे आ जाता है और इसके चलते कोई पहल नहीं हो पाती है ।
पिछले दिनों, भुगतान की समस्या को लेकर पंकज गुप्ता और विजय गुप्ता की तरफ से एक सुझाव यह भी आया था कि जिन खर्चों को लेकर एग्रीमेंट नहीं है, उन खर्चों के बारे में फैसला रीजनल काउंसिल की मीटिंग और या एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग में हो । यह काम भी लेकिन नहीं हो पाया । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा हाल को - अभी तक के घोषित अंतिम सेमीनार, जो फिर नहीं हो सका था, से जुड़ा प्रसंग - बयान करता है । उक्त सेमीनार के रद्द होने की जो सूचना लोगों को मिली थी, उसमें वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार बताया गया था; श्वेता पाठक ने इस पर जब बबाल मचाया और इसे मुद्दा बना कर जब पुलिस में रिपोर्ट कर दी, तब उक्त सूचना पर खेद व्यक्त करते हुए उसे वापस लेने वाला संदेश लोगों को भेजा । मजे की स्थिति यह है कि एक सेमीनार घोषित हुआ, और फिर वह रद्द हुआ - लेकिन रीजनल काउंसिल में कोई आधिकारिक रूप से यह बताने वाला नहीं है कि उक्त सेमीनार रद्द करने की नौबत आखिर क्यों आई और कौन उसके लिए जिम्मेदार है ? पदाधिकारियों के नाकारापन का यह एक बड़ा उदाहरण है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के हालात इसलिए और भी खराब हैं क्योंकि यहाँ पदाधिकारियों के साथ-साथ दूसरे सदस्य भी अपनी अपनी राजनीति करने के मौके बनाते रहते हैं । पदाधिकारियों की मनमानियों पर लगाम लगाने तथा उनके फैसलों की जानकारी काउंसिल के सभी सदस्यों को करवाने की माँग के साथ गौरव गर्ग ने काउंसिल कार्यालय में धरना देने की घोषणा की, उन्हें काउंसिल के अन्य कुछेक सदस्यों का समर्थन भी मिल गया - लेकिन ऐन मौके पर रतन सिंह यादव ने उनके कार्यक्रम को पंक्चर कर दिया । दरअसल रतन सिंह यादव अगले वर्षों में चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसी चाहना में उन्हें डर हुआ कि अपने कार्यक्रम के जरिये कहीं गौरव गर्ग काउंसिल के सदस्यों के बीच पैठ न बना लें, इसलिए उन्होंने अपनी चालबाजी से गौरव गर्ग के कार्यक्रम में ही पंक्चर कर दिया । रतन सिंह यादव की चालबाजी सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इससे आगे भी गई । वह काउंसिल की बातों की चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं करते हैं, लेकिन इस मामले की चर्चा उन्होंने खूब जमकर की । यह प्रसंग जिस समय का है, तब की तुलना में काउंसिल में हालात और बदतर ही हुए हैं - एक मामले में शिकायत पुलिस तक पहुँची है, और एक अन्य मामले में एक कर्मचारी को अपनी जान गँवाना पड़ी है, लेकिन पीछे तमाम नाटकबाजी करने वाले गौरव गर्ग और रतन सिंह यादव को काउंसिल के मामलों से जैसे अब कोई मतलब नहीं रह गया है । 
मेघराज के निधन ने लेकिन काउंसिल के कर्मचारियों को खासा उत्तेजित किया हुआ है, उनका कहना है कि काउंसिल के कुछेक सदस्यों के रवैये व व्यवहार से तंग आकर चेयरपरसन श्वेता पाठक जब पुलिस में शिकायत कर सकती हैं, तो मेघराज को जिन हालात में अपनी जान गँवाना पड़ी है उसकी जाँच के लिए भी पुलिस में मामला दर्ज करवाया जाना चाहिए । कर्मचारी मेघराज के असामयिक निधन के लिए रीजनल काउंसिल के चारों पदाधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और माँग कर रहे हैं कि इनके खिलाफ मेघराज की 'हत्या' का मामला चले । 

Thursday, July 25, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक द्वारा पुलिस में की गई शिकायत पर हो सकने वाली कार्रवाई से बचने की चेयरमैन हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों की कोशिश को गौरव गर्ग ने अपनी घटिया सोच के चलते मुश्किल में डाला

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पदाधिकारियों के झगड़े के पुलिस में पहुँचने से बनी स्थिति को सँभालने के लिए हो रहे प्रयासों में काउंसिल के सदस्य गौरव गर्ग ने आग में घी डालने वाला जो काम किया है, उससे सुलझता दिख रहा मामला भड़क और गया है । उल्लेखनीय है कि 20 जुलाई के सेमीनार के रद्द होने की सूचना देने वाले संदेश में जिस तरह से वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार ठहराया गया था, उससे भड़क कर श्वेता पाठक ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी । श्वेता पाठक का आरोप रहा कि रीजनल काउंसिल के कुछेक सदस्य उन्हें तरह तरह से अपमानित व प्रताड़ित करते रहते हैं, और उक्त संदेश इसका नया उदाहरण व सुबूत है । श्वेता पाठक की तरफ से कहा/बताया गया कि उक्त झूठा संदेश काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से तो भेजा ही गया; हरीश चौधरी जैन, नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, अविनाश गुप्ता ने अपने अपने अकाउंट से भी कुछेक लोगों को भेजा है - जो यह साबित करता है कि उक्त संदेश को काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से भेजे जाने में इन्हीं लोगों की मिलीभगत है और इस तरह से उन्हें अपमानित व प्रताड़ित करने में इन्हीं लोगों की भूमिका है । पुलिस ने श्वेता पाठक की शिकायती रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से तो दर्ज नहीं किया, लेकिन अपने तरीके से मामले में पूछताछ शुरू की । पुलिस की पूछताछ से परेशान हुए आरोपी सदस्यों की तरफ से समझौते की कोशिशें शुरू हुईं, जिसके नतीजे के रूप में काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से एक और संदेश भेजा गया, जिसमें पिछले संदेश पर खेद व्यक्त किया गया । इससे लगा कि मामला सँभलने और हल होने की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन लगभग इसी समय गौरव गर्ग के आए एक संदेश ने मामले को बिगाड़ने का काम कर दिया है । 
गौरव गर्ग ने दरअसल प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक छात्र की शिकायत को मुद्दा बनाया है, और सीधे तौर पर उनके द्वारा उठाया गया मुद्दा काउंसिल के पदाधिकारियों/सदस्यों के बीच चल रहे झगड़े से संबंध रखता नहीं 'दिखता' है; लेकिन 'टाइमिंग' और 'तरीके' के आधार पर काउंसिल सदस्यों ने गौरव गर्ग के संदेश को श्वेता पाठक पर कटाक्ष करने के रूप में देखा/पहचाना और व्याख्यायित किया - और यही व्याख्या मामले को भड़काने का काम कर गई है । प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक छात्र को एक स्टाफ का व्यवहार अनुचित लगा, जिसकी उसने शिकायत की । यह शिकायत मान्य प्रक्रिया के द्वारा सुनी जानी थी, और यदि नहीं सुनी जाती तो उसके सुने जाने के लिए दबाव बनाया जा सकता था । गौरव गर्ग ने लेकिन इस मामले को 13 काउंसिल सदस्यों के छोटे से वाट्स-ऐप ग्रुप में उठाया और सनसनीखेज बनाते हुए उठाया; उन्होंने लिखा कि प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक 'मेल' स्टाफ ने एक 'फीमेल' छात्र को परेशान किया । काउंसिल की लाइब्रेरीज में छात्रों को तरह तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और वह अक्सर शिकायतें करते रहते हैं; उन शिकायतों को 'मेल' फीमेल' के झगड़े का रूप शायद ही कभी दिया गया हो । संदर्भित मामला यदि 'मेल' 'फीमेल' की प्रकृति का था भी, तो गौरव गर्ग को पूरी बात स्पष्ट करना चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं की । दूसरी बात यह प्रसंग 13 काउंसिल सदस्यों के छोटे से वाट्स-ऐप ग्रुप में रखने का कोई मतलब नहीं था । गौरव गर्ग को शिकायत करने वाली छात्रा को यदि सचमुच न्याय दिलवाना था, तो उन्हें काउंसिल के उचित मंच पर इसे उठाना/रखना था । उन्होंने लेकिन उस छात्रा की शिकायत को 'इस्तेमाल' किया । इसी से कुछेक काउंसिल सदस्यों को गौरव गर्ग की बदनीयती का शक हुआ, और माना/समझा गया कि उक्त मामले के जरिए गौरव गर्ग ने दरअसल हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों की तरफ से श्वेता पाठक को निशाना बनाया है और उन पर कटाक्ष किया है । 
यह मानने/समझने का कारण यह भी रहा कि गौरव गर्ग पिछले कुछ समय से चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों के रूप में पहचाने जाने वाले नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, अविनाश गुप्ता के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं । समझा जा रहा है कि गौरव गर्ग ने अपने इस 'खेल' के जरिए वास्तव में हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों की तरफ से 'बैटिंग' की है; उनकी इस बैटिंग ने लेकिन श्वेता पाठक और उनके समर्थकों को भड़का दिया है । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों की तरफ से श्वेता पाठक के पुलिस में शिकायत करने को गलत परंपरा स्थापित करना बताया जा रहा है; इनका कहना है कि काउंसिल के प्रशासनिक विवाद को यदि पुलिस में ले जाने की परंपरा बनी, तो यह बहुत ही खतरनाक बात होगी । इन्हीं लोगों का यह भी कहना है कि काउंसिल में इस समय जो भी विवाद हैं, वह प्रशासनिक फैसलों से जुड़े विवाद हैं, न की 'मेल' 'फीमेल' के झगड़े हैं - जैसा कि श्वेता पाठक बनाने/बताने का कर रही हैं । श्वेता पाठक से हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि प्रशासनिक विवादों को हल करने के लिए जब चीखना-चिल्लाना, अपशब्दों व अशालीन व गाली-गलौच पूर्ण शब्दों का प्रयोग होने लगे तो फिर वह सिर्फ प्रशासनिक विवाद नहीं रह जाता और पुलिस में शिकायत का कारण बन जाता है । प्रशासनिक विवाद में कल यदि कोई किसी का सिर फोड़ दे और कहे कि यह पुलिस का मामला नहीं है, सिर्फ प्रशासनिक विवाद है - तो यह मान्य नहीं होगा । कई लोगों का कहना है कि प्रशासनिक विवाद के नाम पर काउंसिल के कुछेक सदस्य श्वेता पाठक के साथ जिस बदतमीजी से पेश आते हैं, वह सिर्फ एक प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक स्त्री के सम्मान को भी चोट पहुँचाने का मामला है; और श्वेता पाठक को हक है कि अपने सम्मान को बनाए रखने तथा न्याय पाने के लिए वह किसी की भी मदद लें । उल्लेखनीय है कि काउंसिल के पिछले टर्म में भी कई एक बार नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के बदतमीजीभरे रवैये से परेशान होकर पुलिस में शिकायत करने की नौबत आई थी । इस बार अभी जो नौबत आई है, उससे निपटने की कोशिशों को गौरव गर्ग की हरकत से झटका लगता देखा जा रहा है । लोगों को हैरानी यह देख कर भी है कि अभी तीन दिन पहले ही गौरव गर्ग के पिता का निधन हुआ है; जिस समय उन्होंने प्रशांत विहार लाइब्रेरी की एक शिकायत की आड़ में श्वेता पाठक पर कटाक्ष करने का काम किया है, उस समय तक शायद उनके पिता की अस्थियाँ भी विसर्जित नहीं हुई होंगी - ऐसे मुश्किल निजी समय में भी वह काउंसिल की राजनीति में अपना गंदा खेल खेलने से नहीं चूके; यह उनकी घटिया सोच और व्यवहार को ही सामने लाता है । 

Saturday, July 20, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हरीश चौधरी के नाकारापन के चलते कार्यक्रमों तक को लेकर श्वेता पाठक व अविनाश गुप्ता के बीच बनी संवादहीनता ने न सिर्फ सेमीनार को रद्द करवाया, बल्कि काउंसिल के माहौल को और खराब किया

नई दिल्ली । अविनाश गुप्ता के को-ऑर्डिनेशन में आज होने वाले सेमीनार के स्थगित होने से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच चल रहा झगड़ा एक बार फिर मुखर हो उठा है । पिछले कुछेक दिनों से रीजनल काउंसिल में शांति बनी हुई थी, जिसके चलते लोगों को लग रहा था कि काउंसिल सदस्यों ने झगड़े से तौबा कर ली है और अब काउंसिल का कामकाज बिना किसी बाधा के आगे बढ़ेगा; लेकिन यह उम्मीद झूठी साबित हुई है और पता चला कि जिसे शांति-काल समझा जा रहा था - वह दरअसल तूफान से पहले की तैयारी के लिए लिया गया 'ब्रेक' था । मजे की बात यह है कि 20 जुलाई के सेमीनार के को-ऑर्डिनेटर के रूप में जब अविनाश गुप्ता का नाम सामने आया, तो कई लोगों ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि इस कार्यक्रम को लेकर अवश्य ही बबाल होगा और बहुत संभव है कि यह सेमीनार हो ही न सके । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह है कि सेमीनार के रद्द होने की घोषणा वाले जिस संदेश में वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार ठहराया गया है, उसे तैयार करने तथा भेजने की अनुमति/स्वीकृति देने की जिम्मेदारी से काउंसिल के सभी सदस्य बच रहे हैं । यह किस्सा दरअसल इस बात का एक उदाहरण भी है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में कामकाज आखिर हो कैसे रहा है - जब काउंसिल के किसी भी पदाधिकारी और या सदस्य ने उक्त संदेश तैयार करने व भेजने की अनुमति/स्वीकृति देने का काम नहीं किया है, तो उक्त संदेश काउंसिल की तरफ से लोगों को चला कैसे गया; और काउंसिल सदस्य इसकी जाँच-पड़ताल करने/करवाने को लेकर भी दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं । वास्तव में सिर्फ यह किस्सा ही नहीं, बल्कि पूरा वाकया ही काउंसिल में फैली अराजकता और सदस्यों व पदाधिकारियों की मनमानियों का नजारा व सुबूत पेश करता है ।
वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक इस बात पर भड़की हुई हैं कि काउंसिल की तरफ से भेजे गए संदेश में पर्चेज ऑर्डर पर उनके द्वारा साइन न करने को सेमीनार के रद्द होने का कारण बताते हुए उन्हें लोगों के बीच बदनाम करने की कोशिश की गई है । उनकी तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि सेमीनार करने की तैयारी को लेकर उनसे जब कभी कोई बात ही नहीं की गई, उनसे न कुछ पूछा गया और न उन्हें कुछ बताया गया - तो उन्हें भला कौन से पर्चेज ऑर्डर पर साइन करने थे; क्या उनसे यह उम्मीद की जा रही है कि कोई भी मनमाने तरीके से पर्चेज ऑर्डर बना ले और वह आँख बंद करके उस पर साइन कर दें ? दूसरी तरफ अविनाश गुप्ता से हमदर्दी रखने वाले लोगों का यह भी मानना/कहना है कि प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर के रूप में अविनाश गुप्ता यदि श्वेता पाठक से कार्यक्रम की तैयारी के संबंध में बात करते भी तो भी श्वेता पाठक कोई न कोई मीन-मेख निकाल कर बखेड़ा खड़ा करती हीं और फिर मामला खराब ही होता । इस आशंका को यदि सच मान भी लिया जाए तो भी यह सवाल तो बना ही रहता है कि एक प्रोग्राम का को-ऑर्डिनेटर यदि पर्चेज कमेटी के मुखिया को प्रोग्राम की तैयारी तथा उसकी जरूरतों से अवगत नहीं करवाता है, तो पर्चेज कमेटी का मुखिया आखिर किस बिना पर पर्चेज ऑर्डर पर साइन कर दे ? दरअसल काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच संवाद हीनता की स्थिति ने ही ऐसे हालात बनाए हुए हैं और काउंसिल के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया हुआ है । काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों के बीच संवाद या तो है ही नहीं, और जो है उसमें प्रायः तेज चीखने-चिल्लाने व गाली-गलौच भरे शब्द हैं । 'रचनात्मक संकल्प' को चार से पाँच मिनट का एक ऐसा ऑडियो मिला है, जिसमें चेयरमैन हरीश मल्होत्रा के साथ रीजनल काउंसिल के ही कुछेक सदस्य खासी आक्रामक, अशालीन व गाली-गलौच भरी भाषा में बात कर रहे हैं; बात क्या कर रहे हैं, उन्हें हड़का रहे हैं । काउंसिल सदस्यों तथा स्टॉफ के सदस्यों का कहना/बताना है कि काउंसिल के पदाधिकारी और सदस्य एक-दूसरे से प्रायः सड़कछाप तरीके से ही पेश आते हैं और एक दूसरे के साथ चीखते-चिल्लाते हुए व गाली-गलौच करते हुए ही बात करते हैं ।
इस सारी स्थिति के लिए हर कोई चेयरमैन हरीश चौधरी को ही जिम्मेदार ठहराता है । काउंसिल के हालचाल से परिचित लोगों का कहना है कि चेयरमैन के रूप में हरीश चौधरी में न तो कोई अपनी अक्ल/समझ है, और न ही वह नियम-कानून का पालन करने में दिलचस्पी लेते हैं - और इसीलिए लगातार वह खुद भी फजीहत का शिकार बनते हैं और काउंसिल का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है । पिछले दिनों एक अनौपचारिक मीटिंग में वरिष्ठ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने उन्हें स्पष्ट रूप से समझाया/बताया था कि नियमानुसार काउंसिल में वह कोई भी काम सेक्रेटरी की सहमति/स्वीकृति के बिना नहीं कर सकते हैं । कई वरिष्ठ व अनुभवी लोगों का मानना और कहना है कि हरीश चौधरी यदि फैसलों की प्रक्रिया में सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को शामिल रखें तो बहुत ही समस्याएँ पैदा ही नहीं होंगी । माना जा रहा है कि कई मुसीबतों को हरीश चौधरी ने स्वयं ही पैदा किया हुआ है - जिस धोखाधड़ी से वह चेयरमैन बने, उसके चलते रतन सिंह यादव व अजय सिंघल उनसे खफा हैं और वह तरह तरह से उनके सामने मुश्किलें खड़ी करते रहते हैं; उन मुश्किलों से बचाने के लिए नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता उनकी मदद करते हैं तो श्वेता पाठक, पंकज गुप्ता, विजय गुप्ता जैसे पदाधिकारियों की उपेक्षा होती है और तब वह अपने दाँव चलते हैं; उनके दाँव से बचने के लिए हरीश चौधरी उनकी सुनते हैं तो नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता उनकी ऐसीतैसी करने में जुट जाते हैं । इन सब से वह किसी तरह बचते हैं तो 'न तीन में न तेरह में' वाले गौरव गर्ग धरने जैसी नौटंकी करने लगते हैं । इस सब नौटंकी से परिचित लोगों का कहना है कि वास्तव में चेयरमैन के रूप में हरीश चौधरी के नाकारापन तथा ढुलमुल रवैये के कारण ही काउंसिल में अराजकता का माहौल बना है और कामकाज का मजाक बना हुआ है । 'सर्वे, सर्च एंड सीज़र' जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर आज होने वाला सेमीनार जिस तरीके से रद्द हुआ है, उससे आभास मिल रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हालात जल्दी नहीं सुधरने वाले हैं ।

Thursday, April 25, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को चेतावनी मिली कि वह अविनाश गुप्ता को पदाधिकारियों व महिलाओं के साथ सही व्यवहार करना सिखाएँ और अविनाश गुप्ता व नितिन कँवर को रीजनल काउंसिल 'ठेके' पर देने की कोशिश न करें


नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में लगातार दूसरे टर्म सरकार द्वारा नोमीनेट किए गए सदस्य विजय झालानी का यह चार लाइनों का संदेश नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सूरते-हाल और उसके चेयरमैन की दशा को खुद-ब-खुद बयाँ कर देता है । जिस किसी को इस मेल-संदेश की जानकारी है, उसका यही कहना है कि हरीश चौधरी जैन में यदि जरा सा भी आत्मसम्मान है, तो उन्हें तुरंत चेयरमैन पद से इस्तीफा दे देना चाहिए । विजय झालानी का यह मेल-संदेश इस बात का पुख्ता सुबूत है कि हरीश चौधरी जैन रीजनल काउंसिल के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी निभाने में तो विफल हो ही रहे हैं, चेयरमैन पद की गरिमा को भी बनाये/बचाये रखने में फेल साबित हुए हैं । रीजनल काउंसिल के कामकाज को उन्होंने जिस तरह से अविनाश गुप्ता और नितिन कँवर को 'ठेके' पर देने की कोशिश की है, जिसके कारण विजय झालानी ने डीसी में उनकी शिकायत करने की बात की है - इंस्टीट्यूट और रीजनल काउंसिल के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल ने यूँ तो एक से बढ़ एक घटिया सोच व व्यवहार के नाकारा चेयरमैन देखे/झेले हैं, लेकिन हरीश चौधरी जैन तो उन सब के गुरु साबित हो रहे हैं । पिछले टर्म में भी खूब खूब घटियापन हुआ था, और चेयरमैन्स की भूमिकाएँ आरोपों के घेरे में रही थीं, लेकिन किसी भी चेयरमैन ने अपने 'अधिकार' हरीश चौधरी जैन की तरह किसी और को दे दिए हों - यह देखने को नहीं मिला था । लोगों को हैरानी इस बात पर है कि हरीश चौधरी जैन को चेयरमैन के अधिकार जब दूसरों को ही देने थे और खुद कठपुतली बन कर ही रहना था, तो चेयरमैन बनने के लिए धोखाधड़ीभरी तिकड़म करने की उन्हें क्या जरूरत थी ?
इसे हरीश चौधरी जैन के नाकारापन के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है कि रीजनल काउंसिल में किसी भी पद पर न होते हुए भी अविनाश गुप्ता वाइस चेयरपरसन से बदतमीजी करते रहते हैं, और अभद्र व अशालीन भाषा में उन्हें लिखित में जबाव देते हैं । अविनाश गुप्ता इस बात का भी ख्याल नहीं रखते हैं कि वाइस चेयरपरसन के पद पर एक महिला है, और कम से कम एक महिला के साथ संवाद करते हुए तो उन्हें शालीन शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए । समझा जा सकता है कि अविनाश गुप्ता जब लिखित में अभद्र व अशालीन शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकते हैं, तो बोलचाल में तो और भी गंदे शब्दों का इस्तेमाल करते होंगे । इसके साथ ही, अविनाश गुप्ता जब रीजनल काउंसिल की चेयरपरसन के साथ अभद्र व अशालीन भाषा में बात कर सकते हैं, तो फिर स्टाफ की महिलाओं तथा काउंसिल में अपने अपने काम से आने वाली छात्राओं को भी कहाँ बख्शते होंगे ? रीजनल काउंसिल के पिछले टर्म में नितिन कँवर पर बदतमीजी करने के आरोप लगते थे, जिसके कारण दो-तीन बार तो पुलिस बुलाने की नौबत आ गई थी; इस टर्म में नितिन कँवर और अविनाश गुप्ता मिलकर दो नहीं, बल्कि 'ग्यारह' हो रहे हैं - और खास बात यह कि दोनों ही चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के बड़े प्यारे हैं और हरीश चौधरी जैन रीजनल काउंसिल को इन्हें ही 'ठेके' पर सौंपने को तैयार हैं । यही कारण है कि वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक ने अविनाश गुप्ता के अभद्र व अशालीन व्यवहार की शिकायत पहले चेयरमैन से ही की थी, लेकिन जब उन्हें चेयरमैन सुनवाई करते हुए नहीं दिखे तब वह अपनी शिकायत ऊपर तक ले गईं और तब विजय झालानी को चेयरमैन हरीश चौधरी जैन को लिखना पड़ा कि वह अविनाश गुप्ता को पदाधिकारियों व महिलाओं के साथ सही व्यवहार करना सिखाएँ और अविनाश गुप्ता व नितिन कँवर को रीजनल काउंसिल 'ठेके' पर देने की कोशिश न करें ।
देखना दिलचस्प होगा कि विजय झालानी की इस चेतावनी का हरीश चौधरी जैन, अविनाश गुप्ता और नितिन कँवर के व्यवहार तथा रवैये पर कैसा क्या असर पड़ता है ? उनमें सचमुच कोई सुधार होता है, या वह अपने नाकारा व बदतमीजीभरे रवैये को ही बनाये रखते हैं ।