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Friday, June 26, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति तथा उनके भुगतान में घपलेबाजी के काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर, चुप्पी साध कर बचने की चेयरमैन शशांक अग्रवाल की कोशिश ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से मुश्किल में पड़ी; लेकिन शशांक अग्रवाल को भरोसा है कि वह पंकज गुप्ता को 'मैनेज' कर लेंगे   

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पहले अविनाश गुप्ता और गौरव गर्ग ने आरोप लगाए कि चेयरमैन शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव नहीं देते है, और अब चेयरमैन शशांक अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि ट्रेजरर पंकज गुप्ता चेक साइन नहीं कर रहे हैं - जिसके चलते वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान नहीं हो पा रहे हैं । आज आयोजित हुई एक ऑनलाइन मीटिंग में शशांक अग्रवाल ने पहले तो नितिन कँवर, गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता को मीटिंग में शामिल होने से रोका; लेकिन सुमित गर्ग ने उनसे जब इन तीनों को भी मीटिंग में शामिल करने का अनुरोध किया - तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि यह तीनों यदि मीटिंग में शामिल हुए, तो वह मीटिंग से निकल जायेंगे । पंकज गुप्ता मीटिंग में शामिल ही नहीं हुए । इन आरोपों और बातों से जाहिर है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूरी तरह से अराजकता का माहौल है, और शशांक अग्रवाल पिछले चेयरमैन हरीश जैन के ही नक्शेकदम पर हैं - जिनसे इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कार्यभार छीन लिया था, और वह बस नाम के ही चेयरमैन रह गए थे । हरीश जैन की जो गत बनी, और जिसके चलते रीजनल काउंसिल महीनों तक सस्पेंड रही - उसके चलते उम्मीद की गई थी कि शशांक अग्रवाल सबक लेंगे और अपने साथी पदाधिकारियों तथा सदस्यों के साथ तालमेल बना कर काम करेंगे । लेकिन लग ऐसा रहा है कि जैसे शशांक अग्रवाल खुद को हरीश जैन से भी 'बुरा' साबित करने की 'कोशिशों' में जुट गए हैं । शशांक अग्रवाल हालाँकि खुशकिस्मत रहे कि कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण बने हालात की वजह से उनकी कारगुजारियाँ अभी तक ढकी/छिपी रही थीं, लेकिन जो अब धीरे-धीरे खुल रही हैं, और सामने आ रही हैं ।
रीजनल काउंसिल को विभिन्न सर्विस मुहैया करवाने वाले वेंडर्स तथा जीएमसीएस कोर्स की फैकल्टीज के भुगतान को लेकर शशांक अग्रवाल की स्थिति पिछले चेयरमैन हरीश जैन जैसी ही है । इन्हें होने वाले भुगतान करीब तीन महीनों से रुके पड़े हैं । उल्लेखनीय है कि हरीश जैन के चेयरमैन रहते हुए भी यही हाल था; और मजे की बात यह है कि हरीश जैन की तरह शशांक अग्रवाल भी इसके लिए ट्रेजरर को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । आज हुई एक मीटिंग में यह सवाल उठा तो शशांक अग्रवाल ने साफ कहा कि उन्होंने तो सब हिसाब बना दिए हैं, लेकिन चेक्स पर ट्रेजरर पंकज गुप्ता के साइन न हो पाने के कारण भुगतान नहीं हो सके हैं । मीटिंग में चूँकि पंकज गुप्ता उपस्थित नहीं थे, इसलिए उनका पक्ष सामने नहीं आ सका है; लेकिन मीटिंग में मौजूद उनके नजदीकी शशांक अग्रवाल के इस जबाव पर चुप रहे - जिससे शशांक अग्रवाल की बात को बल मिला । मीटिंग के बाद हुई अनौपचारिक चर्चाओं में बात सामने आई कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को शशांक अग्रवाल के बनाए/दिए हिसाब में कई विवरण आपत्तिजनक लगे, जिन पर उन्होंने स्पष्टीकरण माँगे - लेकिन जो उन्हें नहीं मिले, इसलिए भुगतान अटक गए । हरीश जैन की ही तरह, शशांक अग्रवाल पर भी मनमाने तरीके से वेंडर्स व फैकल्टीज नियुक्त करने तथा उन्हें अनाप-शनाप तरीके से भुगतान करने की कोशिश करने के आरोप हैं । काउंसिल सदस्यों के ही आरोप हैं कि शशांक अग्रवाल ने अपने जानने वालों तथा अपने नजदीकियों को फायदा पहुँचाने का काम किया है । समझा जाता है कि ट्रेजरर के रूप में पंकज गुप्ता को भी चूँकि इस तरह के आरोपों में सच्चाई नजर आई, और इसीलिए उन्होंने आँख मूँद कर चेक्स पर साइन करने से इंकार कर दिया; शशांक अग्रवाल ने मीटिंग में यह तो बता दिया कि ट्रेजरर द्वारा चेक्स साइन नहीं करने के कारण भुगतान नहीं हो पा रहे हैं - किंतु इस बात को वह छिपा गए कि ट्रेजरर साइन कर क्यों नहीं रहे हैं ?
शशांक अग्रवाल को डर हुआ कि जिस सच्चाई को वह छिपा रहे हैं, उस सच्चाई को कहीं नितिन कँवर, गौरव गर्ग व अविनाश गुप्ता न जाहिर कर दें - इसीलिए उन्होंने इन तीनों को मीटिंग में शामिल करने से इंकार कर दिया; और इन्हें मीटिंग में शामिल करने के सुमित गर्ग के अनुरोध को भी नहीं माना - उलटे धमकी और दी कि मीटिंग में यदि यह तीनों शामिल हुए, तो वह मीटिंग में मौजूद नहीं रहेंगे । गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए हैं कि शशांक अग्रवाल उनकी ईमेल्स के जबाव तक नहीं देते हैं । समझा जाता है कि गौरव गर्ग और अविनाश गुप्ता ने वेंडर्स व फैकल्टीज की नियुक्ति में होने वाली मनमानी तथा उन्हें होने वाले भुगतान की घपलेबाजी को लेकर सवाल पूछे हैं, इसलिए शशांक अग्रवाल ने जबाव देने की बजाये - चुप रहने का रास्ता अपनाया है । चेयरमैन के रूप में शशांक अग्रवाल को लग रहा है कि काउंसिल के ही सदस्यों के सवालों को अनसुना करके और सवाल उठाने वाले सदस्यों को मीटिंग में शामिल नहीं होने देकर वह आरोपों से बच जायेंगे, लेकिन ट्रेजरर पंकज गुप्ता के रवैये से लगता है कि उनकी मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं । शशांक अग्रवाल ने हालाँकि अपने नजदीकियों को आश्वस्त किया है कि पंकज गुप्ता को वह 'मैनेज' कर लेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि पंकज गुप्ता चेक्स पर साइन करने के संबंध में अपनी जाँच-पड़ताल व आपत्तियों पर टिके रहेंगे, या फिर शशांक अग्रवाल के सामने अंततः समर्पण कर देंगे ?

Wednesday, February 12, 2020

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनावी नतीजे को लेकर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य सुमित गर्ग की झूठ फैलाने की हरकत वास्तव में काउंसिल्स के कई सदस्यों की गैरजिम्मेदार व बेवकूफीपूर्ण सोच तथा व्यवहार का सुबूत पेश करती है

नई दिल्ली । सुमित गर्ग बुके खरीद कर चले तो थे प्रकाश शर्मा को बधाई देने, लेकिन फिर उन्हें वह बुके निहार जंबुसारिया को देने के लिए मजबूर होना पड़ा । दरअसल सुमित गर्ग को पहले सूचना मिली कि इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए सेंट्रल रीजन के प्रकाश शर्मा की जीत हुई है; सो आनन-फानन में सोशल मीडिया में प्रकाश शर्मा को विजयी बताते हुए और उन्हें बधाई देते हुए, सुमित गर्ग तेजी से प्रकाश शर्मा को खोजते हुए उन्हें बुके सौंपने को दौड़े - वह प्रकाश शर्मा को सबसे पहले बुके सौंप कर उनकी निगाह में आना चाहते थे । प्रकाश शर्मा को खोजते सुमित गर्ग रास्ते में लेकिन यह देख कर ठिठके कि लोग वेस्टर्न रीजन के निहार जंबुसारिया को घेरे खड़े हैं और उन्हें बधाई दे रहे हैं और उनके साथ फोटो खिंचवा रहे हैं । उन्होंने माजरा समझने की कोशिश की तो उन्हें पता चला कि जो बुके वह प्रकाश शर्मा के लिए ले जा रहे हैं, उस पर निहार जंबुसारिया का हक़ है और उन्हें अपना बुके निहार जंबुसारिया को दे देना चाहिए । सो, उन्होंने अपने दौड़ते कदमों की दिशा बदली और वह निहार जंबुसारिया की तरफ मुड़े । सुमित गर्ग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं; वह दूसरी बार सदस्य बने हैं, वह तरह तरह से लोगों को जताते/दिखाते रहते हैं कि वह बहुत ज्ञानी किस्म के व्यक्ति हैं - लेकिन इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव नतीजे के मामले में उनके ज्ञान ने लोगों को भ्रमित करने का काम किया और उनकी खुद की फजीहत करवाई ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में होने वाली हरकतों में सुमित गर्ग के साथ रहने वाले सदस्य नितिन कँवर ने भी सुमित गर्ग की सूचना पर सोशल मीडिया में प्रकाश शर्मा को वाइस प्रेसीडेंट बनने की बधाई दे डाली थी, लेकिन जल्दी ही उन्हें इस सूचना के गलत होने की जानकारी मिली, तो सोशल मीडिया में अपनी पोस्ट उन्होंने तुरंत से डिलीट कर दी । सुमित गर्ग ने अपनी पोस्ट को डिलीट करने पर ध्यान नहीं दिया, और वह गलत सूचना देते हुए 'पकड़े' गए । हालाँकि अपने आप में यह बात कोई बड़ा 'अपराध' नहीं है; अपने निजी जीवन में और अपने कामधाम में इस तरह की चूक प्रायः सभी करते हैं - और फिर 'सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते हैं' वाला तर्क भी सर्वमान्य है ही । लेकिन फिर भी यह प्रसंग इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रोफेशन व प्रोफेशन की राजनीति से जुड़े जाने/अनजाने तथ्यों से अवगत करवाता है । सुमित गर्ग वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, यह प्रोफेशन की जरूरत है कि वह तथ्यों को ज्यादा संजीदगी से देखें; फिर वह अभी रीजनल काउंसिल में हैं और आगे सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होने की हसरत रखते हैं - काउंसिल सदस्य के रूप में उनसे उम्मीद की जायेगी कि वह तथ्यों को सही रूप में जानेंगे, तभी तो उचित फैसले ले पायेंगे; तथ्यों के प्रति वह यदि लापरवाही दिखायेंगे तो प्रोफेशनली तथा प्रशासनिक रूप में सही निर्णय कैसे करेंगे ? यह सच है कि तथ्यों के प्रति गैर जिम्मेदारी दिखाने के मामले में अभी सुमित गर्ग 'पकड़े' जरूर गए हैं, लेकिन दूसरे काउंसिल सदस्यों का मामला भी कोई बहुत अलग नहीं है ।
वाइस प्रेसीडेंट के चुनावी नतीजे के मामले में सुमित गर्ग द्वारा की गई गलतबयानी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में बढ़ती अनिश्चितता की तरफ भी ध्यान खींचती है । निहार जंबुसारिया की जीत पर हर किसी को हैरानी है । हालाँकि यह चर्चा खासी जोरों पर थी कि निहार जंबुसारिया अपने रिलायंस संबंधों का फायदा उठाते और दिलवाने का वास्ता देकर अपने लिए समर्थन जुटाने का जुगाड़ कर रहे हैं; दावे किए जा रहे थे कि पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा ने रिलायंस में कोई बड़ी 'जिम्मेदारी' लेने के चक्कर में निहार जंबुसारिया को जितवाने का 'ठेका' ले लिया है - लेकिन फिर भी निहार जंबुसारिया की उम्मीदवारी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था । दरअसल रिलायंस कनेक्शन के भरोसे निहार जंबुसारिया पहले भी वाइस प्रेसीडेंट बनने के प्रयास कर चुके हैं और असफल रह चुके हैं । अमरजीत चोपड़ा को भी प्रफुल्ल छाजेड़, अतुल गुप्ता व उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवारों के बीच 'झूलते' हुए देखा/पहचाना जा रहा था । ऐसे में, माना जा रहा था कि निहार जंबुसारिया को कोई राजनीतिक गणित नहीं, बल्कि सिर्फ किस्मत ही वाइस प्रेसीडेंट चुनवा सकती है । और यही हुआ भी । वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव कितना अनिश्चितताभरा होता है यह इससे भी जाहिर है कि जो प्रकाश शर्मा दूर दूर तक दौड़ में नहीं थे, सुमित गर्ग व नितिन कँवर को उनके जीतने की फर्जी सूचना पर विश्वास हो गया और उन्होंने प्रकाश शर्मा को बधाई देते हुए उक्त सूचना को फ्लैश भी कर दिया ।
सुमित गर्ग और नितिन कँवर की उतावलीपूर्ण इस हरकत से यह भी समझा जा सकता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की हालत इतनी खराब क्यों है - कि वहाँ पदाधिकारियों के अधिकार निलंबित हैं, और अगले वर्ष के पदाधिकारियों का चयन भी आसान नहीं दिख रहा है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की दुर्दशा के लिए सिर्फ सुमित गर्ग व नितिन कँवर को जिम्मेदार मानना/ठहराना इनके साथ ज्यादती भी होगा, क्योंकि अन्य कुछेक सदस्य भी इनके जैसे ही हैं - और कुछेक तो इनसे भी ज्यादा बड़बोले और बेवकूफ किस्म के हैं । वाइस प्रेसीडेंट के चुनावी नतीजे को फ्लैश करने के मामले में सुमित गर्ग की हरकत दरअसल काउंसिल्स के सदस्यों की गैरजिम्मेदार व बेवकूफीपूर्ण सोच तथा व्यवहार का एक सुबूत पेश करती है ।

Saturday, August 31, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रशासन द्वारा नाकारापन व लड़ाई/झगड़ों के कारण निष्प्रभावी की गई नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के एक सदस्य, सुमित गर्ग की 'जेबी' संस्था के कार्यक्रम में शामिल होने के फैसले के चलते इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता फजीहत का शिकार हो रहे हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य सुमित गर्ग 6 सितंबर को आयोजित किए जा रहे अपने कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता का नाम सबसे आखिर में रखने के कारण खासे विवाद में फँस गए हैं । अतुल गुप्ता के नजदीकी और समर्थक ही नहीं, बल्कि दूसरे लोग भी इस बात को प्रोटोकॉल का उल्लंघन मानते हुए इसे अतुल गुप्ता के अपमान के रूप में देख रहे हैं, और अपनी अपनी तरफ से सुझाव दे रहे हैं कि अपने मान-सम्मान का ख्याल रखते हुए अतुल गुप्ता को इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होना चाहिए । लोगों का कहना है कि सुमित गर्ग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य हैं, और उन्हें इंस्टीट्यूट के तमाम कार्यक्रमों में विभिन्न रूपों में शामिल होने का अनुभव है, इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि उन्हें इतनी समझ तो होगी ही कि उनके कार्यक्रम में जो चार लोग आ रहे हैं, प्रोटोकॉल के लिहाज से उनमें अतुल गुप्ता का नाम सबसे ऊपर होना चाहिए - लेकिन उनका नाम सबसे नीचे कर दिया गया है । कुछेक लोगों को लगता है कि सुमित गर्ग ने यह जानबूझ कर किया है और इस तरीके से वह अतुल गुप्ता को नीचा दिखाना चाहते हैं, लेकिन अन्य कई लोगों का मानना/कहना है कि यह सुमित गर्ग की अति-आत्मविश्वासी सोच व उसके चलते पैदा होने वाली 'बेवकूफी' का नतीजा है । उल्लेखनीय है कि सुमित गर्ग अपनी तरफ से बहुत कोशिश करते हैं कि उनकी छवि एक शांत, मैच्योर, गंभीर व्यक्ति की बने; लेकिन कई बार वह ऐसी हरकतें कर जाते हैं जिसके चलते वह फजीहत का शिकार बनते हैं ।
सुमित गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि 6 सितंबर के कार्यक्रम के निमंत्रण को लेकर जो विवाद हुआ, उसे खत्म करने के लिए उनकी तरफ से दिए जबाव ने मामले को और भड़का दिया है ।उनकी तरफ से सफाई दी गई कि कार्यक्रम के आमंत्रितों के नाम इस क्रम से दिए गए हैं, जिस क्रम से उनके भाषण होने हैं; और चूँकि अतुल गुप्ता का भाषण सबसे अंत में होना है, इसलिए उनका नाम सबसे अंत में दिया गया है । उनके इस जबाव ने लेकिन मामले को शांत करने की बजाए और भड़का दिया है । लोगों का कहना/पूछना है कि किसी भी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का भाषण सबसे अंत में ही होता है, लेकिन निमंत्रण पत्र में उसका नाम सबसे पहले और प्रमुखता से छपता है । सुमित गर्ग 6 सितंबर को अपनी जेबी संस्था की वार्षिक कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं; उस कॉन्फ्रेंस में कोई मुख्य अतिथि होगा; जिन चार लोगों के नाम हैं, उनमें अतुल गुप्ता के पास ही सबसे 'भारी' पद है, इसलिए लोगों का अनुमान है कि अतुल गुप्ता ही मुख्य अतिथि होंगे - और यदि वह मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित नहीं किए गए हैं, तो क्या इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट को एक सामान्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है ? सुमित गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि यह झमेला दरअसल कार्यक्रम के निमत्रण पत्र के डिजाईन के कारण पैदा हुआ है; निमंत्रण पत्र का डिजाईन खासे अधकचरे तरीके व बेवकूफी से तैयार किया गया है और उसे रिलीज भी कर दिया गया - जिससे नाहक ही विवाद पैदा हो गया है; और विवाद की चपेट में इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट अतुल गुप्ता आ गए हैं ।
अतुल गुप्ता को सुमित गर्ग के संदर्भित कार्यक्रम का निमंत्रण स्वीकार करने के लिए इसलिए भी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है, क्योंकि सुमित गर्ग उस नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य हैं, जिसके अधिकारों को इंस्टीट्यूट ने अभी हाल ही रद्द कर दिया है और रीजनल काउंसिल को कागजी बना दिया है । लोगों का कहना/पूछना है कि पदाधिकारियों व सदस्यों के नाकारापन व आपस में लड़ने/झगड़ने के कारण जिस रीजनल काउंसिल को निष्प्रभावी कर दिया गया है, उसके एक सदस्य के कार्यक्रम में पहुँच कर अतुल गुप्ता प्रोफेशन के लोगों को आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं ? अतुल गुप्ता इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट न होते, तो चाहें जहाँ जाते और चाहें जो करते; लेकिन वाइस प्रेसीडेंट होने के नाते लोग उनसे उम्मीद करते हैं कि वह इंस्टीट्यूट की छवि व प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उन लोगों के साथ खड़े नहीं दिखेंगे, जिन्हें अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से न निभाने के लिए इंस्टीट्यूट ने ही सजा दी हुई है । सुमित गर्ग की जेबी संस्था के कार्यक्रम में इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के रूप में अतुल गुप्ता के शामिल होने से लोगों को कहने का मौका मिला है कि कार्यक्रमों में शामिल होने तथा मालाएँ पहनने की अतुल गुप्ता की 'भूख' लगता है कि अभी भी मिटी नहीं है; लोगों को हैरानी लेकिन इस बात की है कि अभी वाइस प्रेसीडेंट के रूप में तथा अगले वर्ष प्रेसीडेंट के रूप में अतुल गुप्ता को बहुत से कार्यक्रमों में जाने तथा मालाएँ पहनने का मौका मिलेगा - आखिर फिर क्यों उन्होंने इंस्टीट्यूट प्रशासन द्वारा निष्प्रभावी की गई नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्य की जेबी संस्था के कार्यक्रम में शामिल होने का फैसला किया ? उनका यह फैसला कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में प्रोटोकॉल के लिहाज से उनका अपमान होने के कारण और फजीहत का शिकार हो बैठा है ।  

Monday, July 29, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग तथा विजय झालानी पर हालात को बिगाड़ने का आरोप लगा कर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों ने रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास किया

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा काउंसिल में उनके नजदीकी सदस्यों ने काउंसिल में फैली/पसरी अराजकता के लिए इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल सदस्य चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग और सरकार द्वारा नामित सदस्य विजय झालानी को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकी सदस्य लोगों के साथ की जाने वाली बातचीतों में लगातार आरोप लगाने लगे हैं कि अपने अपने स्वार्थ में यह तीनों रीजनल काउंसिल के दूसरे सदस्यों को भड़काए रखते हैं, और तरह तरह से उन्हें समर्थन देते रहते हैं - जिसके चलते काउंसिल के कुछेक पदाधिकारी तथा सदस्य किसी न किसी बहानेबाजी से कामकाज में बाधा डालते हुए झगड़े बनाए/बढ़ाए रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों का मानना/कहना है कि विजय झालानी ने अविनाश गुप्ता व श्वेता पाठक के बीच हुए मामले में श्वेता पाठक का पक्ष लेते हुए 10 अप्रैल को चैयरमैन हरीश चौधरी जैन को फटकार लगाने वाला ईमेल संदेश न लिखा होता, तो मामला इतना न बिगड़ता । उनका कहना है कि सरकार ने विजय झालानी को इंस्टीट्यूट में इसलिए नामित नहीं किया है कि वह रीजनल काउंसिल के मामलों में अपनी टाँग अड़ाते फिरे और वहाँ झगड़े बढ़ाएँ । उसके बाद, 6 जून को बुलाई गई रीजनल काउंसिल की अधिकृत मीटिंग के रद्द हो जाने के बाद हुई अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने नियम-कानूनों का वास्ता देकर मेलमिलाप कराने के जो प्रयास किए, वह वास्तव में हरीश चौधरी और उनके नजदीकियों को हतोत्साहित करने वाले थे । उक्त अनौपचारिक मीटिंग में चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग ने साफ साफ कहा कि यह नियम भी है और भलाई भी इसी में है कि चेयरमैन और सेक्रेटरी मिलजुल कर फैसले लें और हर फैसले में दोनों की भागीदारी सुनिश्चित हो । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि उक्त मीटिंग के बाद से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में झगड़े और बढ़े हैं तथा हालात और ज्यादा बिगड़े हैं । 
हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों का कहना है कि विजय झालानी को चूँकि सेंट्रल काउंसिल में कोई खास तवज्जो नहीं मिल रही है, इसलिए अपने आप को व्यस्त रखने के लिए वह रीजनल काउंसिल के मामले में दिलचस्पी लेते हैं और यहाँ अपनी अहमियत दिखाने का प्रयास करते रहते हैं; चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को चिंता है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर के सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने से उनके लिए मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो जायेगा - इसलिए वह अभी से ही उन दोनों के पर कतर कर रखना चाहते हैं । उनकी खुशकिस्मती है कि राजेंद्र अरोड़ा व नितिन कँवर ने अपनी अपनी हरकतों से उन्हें मौका भी दे दिया है । हंसराज चुग को सुमित गर्ग व अविनाश गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी से भी चुनौती मिल सकने का डर है ।कई लोगों को लगता है कि यह दोनों भी सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकते हैं, और इन्होंने यदि सचमुच उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तो यह हंसराज चुग के लिए मुसीबत बनेंगे । मजेदार संयोग यह है कि राजेंद्र अरोड़ा, नितिन कँवर, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता को ही चेयरमैन हरीश चौधरी जैन के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । गंभीर आरोप यही है कि इन्हीं चारों के दबाव में हरीश चौधरी जैन फैसले करते हैं और काउंसिल के वाइस चेयरपरसन, सेक्रेटरी व ट्रेजरर को अलग थलग रखते हैं । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों के लिए मुसीबत की बात यह है कि उन्हें 'बाहर' से कहीं किसी का समर्थन प्राप्त नहीं है; उनकी कार्रवाईयों को उचित ठहराने वाला कोई नहीं है । विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा, हंसराज चुग को लेकर उनके आरोप यदि सच भी हैं, तो भी कोई भी यह कहने/मानने वाला नहीं है कि उन्होंने कोई अनुचित बात की है, या अनामंत्रित रूप से घुसपैठ करने की कोशिश की है; वह तो मामले में तभी पड़े हैं, जब उनसे शिकायत की गई और उन्हें हालात को निपटाने में भूमिका निभाने के लिए आमंत्रित किया गया । यह अलग बात है कि उन्हें मौका मिला और उन्होंने अपनी अपनी 'जरूरतों' के हिसाब से मौके का फायदा उठाया ।
हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों ने विजय झालानी, चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को जिस तरह से निशाना बनाना शुरू किया है - उससे रीजनल काउंसिल में हालात सुधरेंगे, इसकी तो किसी को उम्मीद नहीं है; उससे लेकिन रीजन की चुनावी राजनीति में नए बबाल जरूर पैदा होंगे । समझा जाता है कि विजय झालानी के साथ-साथ चरनजोत सिंह नंदा व हंसराज चुग को निशाने पर लेकर हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने दो उद्देश्य एक साथ साधने का प्रयास किया है - एक तरफ तो वह इन्हें दबाव में लेना/रखना चाहते हैं ताकि यह रीजनल काउंसिल के मामलों से दूर रहें, और दूसरी तरफ सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में यह अपनी अहमियत दिखाना चाहते हैं; लोगों के बीच यह अभी से इस बात को पहुँचाना चाहते हैं कि इनकी उम्मीदवारी की संभावना मात्र से सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों को अगले चुनाव में अपने पुनर्निर्वाचन को लेकर डर पैदा हो गया है । हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों को एक तीसरा फायदा यह होता दिख रहा है कि उनके आरोपों से लोगों का ध्यान चुनावी राजनीति के समीकरणों पर जायेगा और रीजनल काउंसिल में फैली अराजकता की तरफ से हटेगा । हालाँकि कई लोगों को लगता है कि हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों ने यह जो राजनीति खेली है, इससे उन्हें तात्कालिक रूप से भले ही कोई फायदा होता हुआ दिखे, लेकिन कुल मिलाकर यह राजनीति उनकी मुसीबतों को बढ़ाने वाली ही साबित होगी । उनकी राजनीति क्या करेगी और उसका क्या नतीजा होगा, यह तो आगे पता चलेगा - अभी लेकिन उनके दाँव ने नॉर्दर्न रीजन के राजनीतिक खिलाड़ियों को चर्चा/कुचर्चा का अच्छा मौका जरूर दे दिया है ।

Friday, November 23, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वापसी की कोशिश कर रहे नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा, सुमित गर्ग काउंसिल सदस्य के रूप में किए गए अपने ही कार्य/व्यवहार के कारण लोगों की नाराजगी का शिकार बन रहे हैं, और फरीदाबाद में प्रदीप कौशिक मुसीबत में फँसे हैं

नई दिल्ली । रीजनल काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी के रूप में की गईं नितिन कँवर, राजिंदर अरोड़ा और सुमित गर्ग की कार्रवाईयों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अपनी अपनी सीट बचाने की खुद उनके सामने कड़ी चुनौती प्रस्तुत की हुई है । रीजनल काउंसिल के चुनावी परिदृश्य पर नजर रखने वाले कई लोगों का तो मानना और कहना है ही, साथ ही इनके नजदीकियों व समर्थकों तक को भी आशंका है कि कहीं इनका हाल वैसा ही न हो, जैसा पिछली बार के चुनाव में हरित अग्रवाल का हुआ था । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल में होने के बावजूद पिछली बार चुनाव हार गए थे । पिछली बार हरित अग्रवाल के साथ जो हुआ, वह इस बात का सुबूत है कि रीजनल काउंसिल का सदस्य होना चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है । काउंसिल सदस्य के सामने बड़ी समस्या यह होती है कि काउंसिल सदस्य के रूप में लोग उसके कार्य/व्यवहार को भी देखते/परखते हैं । कार्य/व्यवहार के मामले में नितिन कँवर और राजिंदर अरोड़ा का काउंसिल में रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है । नितिन कँवर के बदतमीजीपूर्ण व्यवहार ने काउंसिल की कई मीटिंग्स में बहुत ही शर्मशार करने वाली स्थितियाँ पैदा कीं । उनके गालीगलौच भरे उपद्रवी व्यवहार को लेकर काउंसिल के ही दूसरे सदस्यों ने कई बार इंस्टीट्यूट प्रशासन तक से शिकायत की और कुछेक बार तो पुलिस तक बुलाने के हालात बने । नितिन कँवर के बदतमीजीपूर्ण व्यवहार की कुख्याति आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तक है, और अधिकतर लोग काउंसिल में उनकी उपस्थिति को एक कलंक की तरह देखते/समझते हैं । इस देखने/समझने के कारण नितिन कँवर को अपने चुनाव अभियान में कई मौकों पर अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है और अपमानित होना पड़ रहा है । उनके नजदीकियों के बीच ही चर्चा है कि ऐसा कई जगह हुआ कि नितिन कँवर जिनसे मिलने गए, उन्होंने व्यस्तता का बहाना बना कर उनसे मिलने से इंकार कर दिया । नितिन कँवर ने जिन लोगों से सिफारिशें करवाईं, उनमें से कुछेक ने बताया कि उन्हें सुनने को मिला कि किस बदतमीज व्यक्ति की सिफारिश कर रहे हो । ऐसे चुनावी माहौल में नितिन कँवर के लिए नॉर्दन इंडिया रीजनल काउंसिल की अपनी सीट बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है ।
राजिंदर अरोड़ा का बदतमीजी के मामले में ग्राफ नितिन कँवर जितना ऊँचा तो नहीं है, लेकिन कई मौकों पर उन्हें नितिन कँवर के सहयोगी के रूप में जिस तरह से देखा गया है - उसके चलते कई लोगों का मानना/कहना है कि नितिन कँवर के साथ-साथ राजिंदर अरोड़ा ने भी काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व प्रतिष्ठा पर कालिख पोतने का काम किया है, और इनका काउंसिल में होना काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है । राजिंदर अरोड़ा के लिए इसके अलावा मुसीबत की बात जगजीत सिंह की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे गुरद्वारा प्रबंधक कमेटियों से जुड़े लोगों के समर्थन की भी है । पिछली बार राजिंदर अरोड़ा की जीत में उक्त लोगों के समर्थन की बड़ी भूमिका थी । राजिंदर अरोड़ा के नजदीकियों का ही बताना/कहना है कि दिल्ली के साथ-साथ पंजाब तक के शहरों में जिस तरह से गुरद्वारा प्रबंधक कमेटियों से जुड़े लोग जगजीत सिंह की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, उसके कारण राजिंदर अरोड़ा की सीट खतरे में नजर आ रही है । सुमित गर्ग तीनों वर्ष नितिन कँवर व राजिंदर अरोड़ा के 'सहयोगी' बन कर तो रहे, लेकिन खुद उन पर बदतमीजी करने के आरोप नहीं लगे । उनकी सीट एक दूसरे कारण से मुश्किल में दिख रही है । पिछली बार सुमित गर्ग की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक रीजनल काउंसिल के एक पूर्व चेयरमैन दुर्गादास अग्रवाल थे, किंतु जिन्होंने इस बार अपने बेटे शशांक अग्रवाल को उम्मीदवार बना दिया है । सुमित गर्ग के लिए समस्या की बात यह है कि काउंसिल में करीब ढाई वर्ष की अभी तक की अवधि में वह अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बना सके हैं, और उन्हें राकेश मक्कड़-नितिन कँवर-राजिंदर अरोड़ा की बदनाम तिकड़ी के 'पिट्ठू' के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है । इस कारण से वह अपने समर्थकों व शुभचिंतकों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं कर सके हैं; और ऐसे में दुर्गादास अग्रवाल की तरफ से मिलने वाला झटका उनके लिए कुछ ज्यादा जोर का झटका ही है । यदि बात सिर्फ इतनी ही होती कि पिछली बार की तरह दुर्गादास अग्रवाल का समर्थन उन्हें इस बार न मिल रहा होता, तो बात ज्यादा गंभीर नहीं होती - लेकिन पिछली बार उनके पक्के वाले समर्थक रहे दुर्गादास अग्रवाल इस बार अपने बेटे को उम्मीदवार के रूप में ले आये हैं - यह सुमित गर्ग के लिए खतरे की ऊँची आवाज वाली घंटी बजने जैसी बात है ।
मौजूदा काउंसिल के सदस्य दीपक गर्ग की बदनामी उनके प्रोफेशनल पार्टनर प्रदीप कौशिक की उम्मीदवारी के लिए संकट बनी हुई है । दीपक गर्ग मौजूदा काउंसिल में पहले वर्ष चेयरमैन बने थे, और छह महीने में इस्तीफा दे चुके थे ।दीपक गर्ग इस मायने में खुशकिस्मत रहे कि जब तक राकेश मक्कड़-नितिन कँवर-राजिंदर अरोड़ा की तिकड़ी की कारस्तानियाँ जगजाहिर होतीं और लोगों के बीच बदनामी कमातीं, तब तक दीपक गर्ग चेयरमैनी करके और इस्तीफा देकर सत्ता की सीधी राजनीति से अलग हो चुके थे, जिस कारण सत्ता खेमे पर लगी बदनामी की कालिख से काफी हद तक वह बचे रह सके । लेकिन चेयरमैनी से छह महीने में इस्तीफा देने की उनकी कार्रवाई ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बुरी तरह निराश व नाराज किया - और उन्हें 'भगौड़े' की संज्ञा दी । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की निराशा व नाराजगी का कारण यह रहा कि रीजनल काउंसिल के अभी तक के इतिहास में फरीदाबाद को पहली बार चेयरमैन का पद मिला, लेकिन दीपक गर्ग ने पता नहीं किसकी और किस राजनीति की 'गुलामी' करते हुए छह महीने में उसे छोड़ दिया - और इस तरह फरीदाबाद की इच्छाओं व उम्मीदों के साथ-साथ उसकी पहचान के साथ भी विश्वासघात किया । अपने विश्वासघात की सजा पाने से दीपक गर्ग तो बच गए हैं, लेकिन उनके प्रोफेशनल पार्टनर प्रदीप कौशिक उनके किए-धरे की सजा भुगतने के लिए शिकार बन रहे हैं । फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच यह चर्चा आम है कि जिस तरह से दीपक गर्ग ने फरीदाबाद की इच्छाओं व उम्मीदों के साथ-साथ उसकी पहचान के विश्वासघात किया है, वैसा ही विश्वासघात प्रदीप कौशिक नहीं करेंगे  - और इसलिए उन्हें वोट क्यों दें ? काउंसिल सदस्यों की कारस्तानियाँ और उनके छूटते समर्थन ने जिस तरह उनकी (या उनके पार्टनर की) काउंसिल में पुनर्वापसी की राह को मुश्किल बना दिया है, उसके चलते नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है ।

Monday, March 27, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप के सदस्यों की टीए/डीए के नाम पर मनमानीभरी लूट के तथ्य चिंदीचोरों को भी मात करने वाले हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल सदस्यों के टीए/डीए बिल के लेजर अकाउंट के जो दस्तावेज 'रचनात्मक संकल्प' को मिले हैं, वह काउंसिल के सत्ता खेमे के कुछेक सदस्यों की लूट-खसोट का बड़ा दिलचस्प ब्यौरा देते हैं - और बताते हैं कि टीए/डीए के नाम पर पैसों की लूट के मामले में इन्होंने तो चिंदी चोरों को भी मात कर रखा है । उल्लेखनीय है कि मौजूदा रीजनल काउंसिल में तीन सदस्य दीपक गर्ग, राजिंदर नारंग और पंकज पेरिवाल दिल्ली के बाहर के हैं - इस नाते रीजनल काउंसिल की मीटिंग में शामिल होने के लिए इनका टीए/डीए बसूलना तो एक बार के लिए फिर भी समझ में आता है; लेकिन काउंसिल मुख्यालय से कुछ कदमों की दूरी पर स्थित - लक्ष्मी नगर, शकरपुर, निर्माण विहार, दिलशाद गार्डन आदि कालोनियों में रहने तथा ऑफिस रखने वाले राकेश मक्कड़, सुमित गर्ग, नितिन कँवर आदि का मीटिंग में शामिल होने के लिए टीए/डीए बसूलना किसी की भी समझ से परे ही है । पिछले वर्ष के पहले छह महीने के जो लेजर अकाउंट 'रचनात्मक संकल्प' को मिले हैं, उनके अनुसार राकेश मक्कड़ ने टीए/डीए के नाम पर आठ हजार रुपए तथा दैनिक भत्ते के नाम पर 23 हजार रुपए के बिल दिए । इनका घर और ऑफिस निर्माण विहार में है । लक्ष्मी नगर में रहने और शकरपुर में ऑफिस रखने वाले सुमित गर्ग ने उक्त समयावधि में टीए/डीए के नाम पर 9 हजार रुपए बसूले । टीए/डीए बसूलने के मामले में सबसे लंबा हाथ नितिन कँवर ने मारा है : उक्त समयावधि के लिए उन्होंने टीए/डीए के नाम पर 14,400 तो बसूल लिए और 38,200 रुपए का और बिल दिया । नितिन कँवर दिलशाद गार्डन में रहते हैं, और शकरपुर में ऑफिस रखते हैं । टीए/डीए बसूलने में लंबा हाथ मारने में उनकी मदद उनके दूसरे ऑफिस ने की, जो गुड़गाँव में है ।
नितिन कँवर वैसे तो अपने गुड़गाँव ऑफिस में कम ही आते/जाते हैं, लेकिन रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उन्हें जब भी आना होता है - वह गुड़गाँव से ही 'आते' हैं, और वापस भी गुड़गाँव ही जाते हैं । इसीलिए उनका टीए/डीए बिल अपने 'साथियों' से ज्यादा बना । राजेंद्र अरोड़ा ने उक्त समयावधि में 9 हजार और 2 हजार के टीए/डीए बिल बसूल किए । शुक्र है कि इनके घर और ऑफिस काउंसिल के ऑफिस के पास ही हैं, कहीं यदि ज्यादा दूर होते तो काउंसिल का सारा बजट तो इनके टीए/डीए में ही खर्च हो जाना था । रीजनल काउंसिल की मीटिंग के अलावा भी, टीए/डीए के नाम पर उलटे/सीधे बिल बनाने और बसूलने के लिए इन लोगों ने बड़ा आसान सा तरीका यह बनाया हुआ है कि स्टडी सर्किल से लेकर ब्रांचेज तक में तथा अन्य सेमिनार्स में यह अपने आप को स्पीकर के रूप में आमंत्रित करवाते हैं । इन तथ्यों को देखते हुए रीजनल काउंसिल के ही सदस्यों के उक्त आरोपों में सच्चाई नजर आने लगती है, जिनमें बताया जाता है कि विभिन्न क्लासेज के लिए फैकल्टी तय करने में पैसे खाए जाते हैं, और सेमिनार्स आदि में खाने-पीने की व्यवस्था करने वाले वेंडर्स तक से रिश्वत ली जाती है । आरोपों के अनुसार, छोटे-मोटे काम करने वालों तक से हजार/पाँच सौ रुपए झटकने में भी यह लोग शर्म महसूस नहीं करते हैं ।
रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप के चौगुटे की हरकतों के चलते हो रही बदनामी से परेशान दूसरे सदस्य जब मीटिंग में हिसाब-किताब रखने/देने की बात करते/उठाते हैं, तो यह झगड़ा करने पर उतारू हो जाते हैं । काउंसिल के बाकी सदस्यों तथा स्टॉफ हावी होने के लिए इन्होंने फार्मूला यह निकाला हुआ है कि सामने वाला इन्हें जब भी सवाल करता/उठाता दिखता है, यह तुरंत आक्रामक हो जाते हैं और गाली-गलौच करने लगते हैं । माँ/बहनों से जुड़ी अश्लील व अशालीन किस्म की गालियाँ तो इनकी जुबाँ पर हमेशा चढ़ी रहती हैं । एक महिला स्टॉफ से की गई बदतमीजी का मामला तो इतना बढ़ गया था कि पुलिस तक में रिपोर्ट हो गई थी । तब माफी-वाफी मांग कर इन्होंने मामले को खत्म करवाया था । अपने इस व्यवहार से यह काउंसिल के दूसरे सदस्यों तथा स्टॉफ के लोगों के साथ-साथ वेंडर्स लोगों पर हावी हो जाते हैं, जिससे कि इनकी मनमानियों पर सवाल करने/उठाने वाले लोग फिर चुप लगा जाते हैं - और इन्हें बेरोकटोक रूप से अपनी मनमानियाँ और लूट करते रहने का मौका मिलता रहता है ।

Saturday, December 3, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पटनीटॉप में हो रही सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस में कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल का नाम न देना नियम व परंपरा का मजाक बनाने तथा काउंसिल की पहचान और प्रतिष्ठा को सवालों के घेरे में खड़ा करना नहीं है क्या ?

नई दिल्ली । जम्मू एंड कश्मीर राज्य के लिए होने वाली सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल को जिस तरह से किनारे करने/बैठाने की तैयारी की गई है, उससे इस बात का पुख्ता सुबूत लोगों के सामने आया है कि रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप के लोगों के बीच अपने द्धारा ही लिए गए फैसले के प्रति सम्मान नहीं है - और कि पूजा बंसल को उन्होंने मजबूरी में कार्यकारी चेयरपरसन चुन तो लिया है, किंतु वह पूजा बंसल को उनका उचित हक़ और सम्मान देने को तैयार नहीं हैं । दरअसल पटनीटॉप में होने जा रही सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस का निमंत्रण जब लोगों को मिला, तो उसमें पूजा बंसल की जगह सुमित गर्ग का नाम देख कर लोगों को हैरानी हुई । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की तरफ से अभी तक जितनी भी सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस हुई हैं, सभी के निमंत्रण पत्र में रीजनल काउंसिल के चेयरमैन तथा मेज़बान ब्रांच के चेयरमैन का ही नाम आता रहा है । जाहिर है कि यही नियम और व्यवस्था है । दीपक गर्ग के इस्तीफे के बाद नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अधिकृत मीटिंग में वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को चेयरपरसन पद का भी कामकाज देखने के लिए अधिकृत करने का फैसला लिया जाता है । इस फैसले के अनुसार, कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल हुईं । सभी जानते हैं कि इस तरह की परिस्थिति में 'कार्यकारी' को पूर्णकालिक वाले सभी अधिकार नहीं मिलते हैं, लेकिन फिर भी संस्था का मुखिया तो 'कार्यकारी' होने के बावजूद वही होता है । नियमानुसार 'कार्यकारी' को सारे अधिकार तो नहीं ही मिलेंगे - उसे मुखिया का अधिकार और सम्मान भी नहीं मिलेगा, तो फिर उसके 'कार्यकारी' होने का मतलब क्या है ? स्पष्ट है कि नियम और व्यवस्था के अनुसार, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की कार्यकारी चेयरपरसन होने के नाते सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस के निमंत्रण पत्र में पूजा बंसल का नाम होना चाहिए था ।
किंतु नियम और व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस के निमंत्रण पत्र में पूजा बंसल की बजाए रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी सुमित गर्ग का नाम दिया गया है । और इस तरह, रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप के लोगों ने न सिर्फ अपने खुद के फैसले को ही मानने/अपनाने से इंकार किया है, बल्कि अपने ही एक सहयोगी/साथी को अपमानित करने का रवैया प्रदर्शित किया है । उल्लेखनीय है कि पूजा बंसल खुद भी रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप की प्रमुख सदस्य हैं, और इसी प्रमुखता के चलते उन्हें वाइस चेयरपरसन का पद मिला । दीपक गर्ग के चेयरपरसन पद से इस्तीफ़े से शुरू नाटक के 'हाथ से निकल जाने' के बाद चेयरपरसन पद पर निगाह लगाए 'गिद्धों' का खेल जो बिगड़ा, तो फिर नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अराजकता का राज हो गया । राकेश मक्कड़ ने मनमाने तरीके से अपने आप को एनआईआरसी टीम को-कॉर्डीनेटर के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया । काउंसिल के कार्यालय में वह चेयरपरसन की कुर्सी पर बैठने और स्टॉफ को वह खुद को चेयरपरसन जताते हुए आदेश देने लगे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़, विवेक खुराना, नितिन तँवर, सुमित गर्ग का एक गिरोह बन गया - जो फैसलों और कार्रवाइयों में अपनी मनमानी तो करता ही है, दूसरों के साथ गाली-गलौच और हाथापाई तक करने से नहीं चूकता है । काउंसिल की मीटिंग्स तक में एक दूसरे पर चीखने-चिल्लाने, गालियां निकालने, एक-दूसरे के कॉलर पकड़ लेने और कुर्सियाँ पलटने तक की नौबतें आईं । गिरोह के सदस्यों की बदतमीजीपूर्ण हरकतों से स्टॉफ तक के लिए आफत है । एक महिला स्टॉफ के लिए तो बंद ऑफिस में अपने साथ हुई हरकत के लिए पुलिस में शिकायत तक करने की नौबत आई; जिसके बाद गिरोह के सदस्यों को माफी माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
इन बातों और चर्चाओं के कारण नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की बदनामी हो रही है, लेकिन गिरोह के सदस्यों को तथा उनका साथ दे रहे सदस्यों को इससे जैसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है । काउंसिल की बदनामी को तो छोड़िए, हैरत की बात यह है कि गिरोह के सदस्यों को अपनी बदनामी की चिंता नहीं है । गिरोह के सदस्यों में राकेश मक्कड़ और विवेक खुराना चेयरपरसन पद के प्रबल दावेदार हैं - पॉवर ग्रुप में राकेश मक्कड़ को अगले वर्ष तथा विवेक खुराना को उसके बाद वाले वर्ष में चेयरपरसन बनाए जाने को लेकर सहमति की बात सुनी/बताई जाती है । लेकिन पहले ही वर्ष में पॉवर ग्रुप के सदस्यों के बीच बनी 'सहमति' की जैसी जो फजीहत हुई है, उसे देख कर इन्हें आगे के लिए भी 'डर' बना है । उल्लेखनीय है कि पहले वर्ष में दीपक गर्ग के इस्तीफ़े का जो नाटक रचा गया, वह सहमति के आधार पर लिखी गई पटकथा का ही हिस्सा था - लेकिन हालात ने जिस तरह से पलटा खाया, उसके कारण सहमति के आधार पर लिखी गई पटकथा के परखच्चे उड़ गए । बाकी दो वर्षों के लिए लिखी गई पटकथा को बचाने के लिए राकेश मक्कड़ और विवेक खुराना को आगे आना पड़ा है और कमान अपने हाथ में लेना पड़ी है । पहले वर्ष में हालात जिस तरह से बेकाबू हुए और जो जो लोग छह महीने के लिए ही चेयरपरसन पद की शपथ लेने के लिए तैयार हो रहे थे, वह तो टापते रह गए - और लॉटरी निकल आई पूजा बंसल की; उसे देख राकेश मक्कड़ और विवेक खुराना को अगले वर्षों की अपनी 'योजना' और 'तैयारी' पिटती हुई दिखी है । 
राकेश मक्कड़ और विवेक खुराना को बदले हालात में सबसे ज्यादा खतरा वास्तव में पूजा बंसल से ही लगा है । दरअसल उन्हें डर हुआ है कि कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में पूजा बंसल ने यदि अच्छे से काम कर लिया, तो कहीं अगले वर्ष वह पूर्णकालिक चेयरपरसन न बन जाएँ । इन्होंने इसीलिए पूजा बंसल को कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में काम करने का मौका न देने का निश्चय किया । इनके इस निश्चय से भले ही इनके द्धारा ही लिए गए फैसले की अवमानना होती हो - वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को चेयरपरसन पद का भी कामकाज देखने के लिए अधिकृत करने का जो फैसला लिया गया, उसमें यह लोग भी तो शामिल थे ही न ! नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के आयोजनों में चेयरपरसन - कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल को प्रमुखता देने की बजाए तरह तरह की बहानेबाजी से अपने आपको ही प्रमुख बनाए रखने की गिरोह के लोगों की चालबाजियों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल तथा उसके आयोजनों की गरिमा को ही नष्ट कर दिया है । पटनीटॉप में हो रही सब-रीजनल कॉन्फ्रेंस में कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल की बजाए सेक्रेटरी सुमित गर्ग का नाम देना नियम व परंपरा का तो मजाक बनाना है ही, साथ ही गिरोह के सदस्यों का अपनी चालबाजियों को व्यापक रूप देने का प्रयास भी है - जिसके कारण नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पहचान और प्रतिष्ठा आज सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है ।

Thursday, July 28, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर काबिज दीपक गर्ग के नेतृत्व वाली चौकड़ी के सदस्यों की करतूतों के कारण हो रही बदनामी से सत्ता खेमे के ही दूसरे सदस्यों के बीच बेचैनी

नई दिल्ली । चेयरमैन दीपक गर्ग, सेक्रेटरी सुमित गर्ग, ट्रेजरार नितिन कँवर और निकासा चेयरमैन राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी को अपनी अकर्मण्यता, मूर्खता और टुच्ची नेतागिरी से रीजनल काउंसिल के कामकाज और उसकी पहचान व प्रतिष्ठा को धूल में मिला देने के जिस तरह के गंभीर आरोपों का सामना कर पड़ रहा है - उसके चलते रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे में फूट पड़ने के संकेत मिलने लगे हैं । सत्ता खेमे के बाकी चार सदस्य - विवेक खुराना, राकेश मक्कड़, पूजा बंसल और पंकज पेरिवाल अपने आपको न सिर्फ ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, बल्कि चौकड़ी की कारस्तानियों के चलते मिलने वाली बदनामी को ढोने की बेचैनी भी महसूस कर रहे हैं । इन चारों की तरफ से अलग अलग मौकों पर सुनने को मिल रहा है कि चौकड़ी के लोगों ने इनका समर्थन लेकर कुर्सियाँ तो प्राप्त कर लीं, लेकिन कामकाज में और फैसलों में उन्हें किसी भी स्तर पर शामिल नहीं किया जाता है । सत्ता में होने का जो 'सुख' उन्हें भी मिलना चाहिए था, वह तो उन्हें नहीं ही मिल पा रहा है; यह देख कर उन्हें और चोट पहुँची है कि उनके हिस्से का सुख चौकड़ी के लोगों ने ही छीना हुआ है । राकेश मक्कड़ के साथ तो बहुत ही बुरी बीत रही है - सत्ता खेमे के लोगों को जोड़ने का काम उन्होंने ही किया था; यानि उनकी बदौलत ही चौकड़ी के लोग कुर्सियों पर बैठे होने का सुख भोग रहे हैं, किंतु उन्हें ही दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका गया है । उनकी और उनके बाकी तीन साथियों की समस्या यह भी है कि चौकड़ी के लोगों की करतूतों से लोगों के बीच जो नाराजगी व बदनामी हो रही है, उसके लिए उन्हें भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और बदनामी के कीचड़ से बच पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है । पूजा बंसल ने हाल ही के दिनों में कई बार इस बात का प्रयास किया कि रीजनल काउंसिल में जो गड़बड़ियाँ हो रही हैं, और जिनके कारण सत्ता खेमे के लोगों की बदनामी हो रही है - उन पर सत्ता खेमे के सभी आठों सदस्यों के बीच चर्चा हो और हालात को सँभालने को लेकर आपस में विचार विमर्श किया जाए । पूजा बंसल काउंसिल में वाइस चेयरपरसन के पद पर हैं, किंतु फिर भी चौकड़ी के सदस्य उनके प्रयासों को कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं । चौकड़ी के सदस्यों का यह रवैया सत्ता खेमे में कभी भी बड़ा बबाल पैदा कर/करवा सकता है ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर कब्ज़ा जमाए चौकड़ी के काम करने के तरीके का हाल देखने का मौका इसी महीने आयोजित हुई सीए छात्रों की दो दिवसीय नेशनल कन्वेंशन में देखने को मिला । हर वर्ष होने वाली इस कन्वेंशन में 1500 के करीब छात्र शामिल होते हैं - लेकिन इस वर्ष की कन्वेंशन में पहले दिन मुश्किल से 500 छात्र और दूसरे दिन करीब 150 छात्र ही शामिल हुए । आयोजकों ने 1200 छात्रों के लिए खाने की व्यवस्था की थी । यह कन्वेंशन काउंसिल पर काबिज चौकड़ी के नाकारापन का जीता-जागता सुबूत बन गई है, जिसके चलते इंस्टीट्यूट को करीब बीस लाख रुपए का नुकसान हुआ है । इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को भी हैरानी है कि पिछले दिनों लुधियाना में इसी तरह की कन्वेंशन हुई तो उसमें एक हजार से अधिक छात्र जुटे, और दिल्ली में कन्वेंशन के आयोजक इतने गए-गुजरे हैं कि उनके लिए दो सौ छात्रों को जुटाना मुश्किल हो गया । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इससे भी बड़े नाकारापन का उदाहरण यह है कि दिल्ली में लक्ष्मीनगर स्थित इंस्टीट्यूट की लाइब्रेरी का बिजली बिल पिछले तीन-चार महीनों से नहीं दिया जा रहा था, जिसके नतीजे के रूप में लाइब्रेरी की बिजली कट गई और जिसके चलते छात्रों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा । यह पढ़ते/जानते हुए कृपया यह बिलकुल मत सोचियेगा कि दीपक गर्ग, सुमित गर्ग, नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी कुछ करती ही नहीं है : 30 जून को 'सीए उत्सव' के नाम पर इन्होंने नाच-गाने का जैसा जो धूम-धड़ाका करवाया, उसमें इनकी आयोजन-प्रतिभा का सुबूत देखा/पाया जा सकता है । इस पर किसी ने चुटकी भी ली कि यह लोग नाच-गाना करवाने वाली भांड पार्टी के पदाधिकारी होने की काबिलियत रखते हैं, काउंसिल में बेचारे पता नहीं क्यों और कैसे आ गए ?
दीपक गर्ग, सुमित गर्ग, नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी पर आरोप सिर्फ यही नहीं है कि यह काउंसिल/इंस्टीट्यूट के कामकाज की जिम्मेदारी ठीक तरीके से निभा नहीं पा रहे हैं; इससे भी ज्यादा गंभीर आरोप इन पर यह है कि इंस्टीट्यूट के जो काम ठीक तरीके से हो रहे हैं - यह लोग उन्हें डिस्टर्ब व खराब करने की कोशिश करने तक की हरकत करते हैं । इस हरकत के लिए इन्हें इंस्टीट्यूट की इंटरनेशनल टैक्सेशन कमेटी के वाइस चेयरमैन संजीव चौधरी से लताड़ तक खाना पड़ी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट इंटरनेशनल टैक्सेशन पर क्लासेस चलाता है, जिसके लिए मोटी फीस ली जाती है । क्लासेस करने वाले लोगों ने इंटरनेशनल टैक्सेशन कमेटी के वाइस चेयरमैन संजीव चौधरी से इन चारों की शिकायत की कि यह लोग बीच क्लासेस में आकर भाषणबाजी करते हैं, और इस तरह क्लास डिस्टर्ब करते हैं । शिकायत करने वाले लोगों का कहना रहा कि वह क्लासेस के लिए अपना कीमती समय और मोटी फीस इनकी बकवासबाजी सुनने के लिए थोड़े ही देते हैं । संजीव चौधरी ने पहले तो इन्हें इशारे से समझाने की कोशिश की कि यह लोग इस तरह की हरकतें न किया करें; किंतु उन्होंने जब देखा कि इशारे से समझाने की उनकी कोशिशों को यह लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, तो संजीव चौधरी ने इन्हें कस कर लताड़ा । संजीव चौधरी की लताड़ से अपमान और दुख फील करते हुए दीपक गर्ग ने प्रेसीडेंट को मेल लिख कर पूछा कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी के रूप में वह इंटरनेशनल टैक्सेशन की क्लासेस करने वाले लोगों से कैसे बात कर सकते हैं ? प्रेसीडेंट की तरफ से दीपक गर्ग को उनकी मेल का कोई औपचारिक जबाव मिला है या नहीं, इसका तो नहीं पता; किंतु कई वरिष्ठ लोगों की तरफ से उन्हें इस बारे में खरी-खोटी सुनने को जरूर मिली है कि तुम लोगों को इतनी सी अक्ल सचमुच नहीं है क्या कि क्लास को डिस्टर्ब किए बिना क्लास के लोगों से कब और कैसे बात कर सकते हो ?
चौकड़ी के सदस्यों, खासकर चेयरमैन दीपक गर्ग और ट्रेजरार नितिन कँवर पर गंभीर आरोप यह भी लगा है कि जीएमसीएस की फैकल्टी में इन्होंने मनमाने तरीके से अपने अपने नाकाबिल किस्म के लोगों को घुसा दिया है, और इस तरह से जीएमसीएस की पढ़ाई व्यवस्था को खासी चोट पहुँचाई है । इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ सदस्य अविनाश गुप्ता के खिलाफ की गई हरकत को लेकर दीपक गर्ग और नितिन कँवर पहले से ही आरोपों व विवादों के घेरे में हैं । चर्चा है कि उस मामले में माफी माँग कर यह लोग मामले को ख़त्म करवाने के प्रयासों में हैं । उनके प्रयास सफल होंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन यह हो रहा है कि दीपक गर्ग के नेतृत्व में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर कब्ज़ा जमाए बैठी चौकड़ी की कारस्तानियों को लेकर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी को कई कई शिकायतें मिली हैं - उन्होंने जिनकी जाँच-पड़ताल करने/करवाने को लेकर दिलचस्पी दिखाई है । चौकड़ी के सदस्यों की करतूतों से हो रही बदनामी ने सबसे ज्यादा चौकड़ी के समर्थक सदस्यों को ही परेशान किया हुआ है । उनकी समस्या का कारण यह भी है कि रीजनल काउंसिल में जो कुछ भी मनमानियाँ और बेवकूफियाँ हो रही हैं, उनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है - किंतु सत्ता खेमे का सदस्य होने के नाते उनकी जिम्मेदारी उनके सिर पर भी पड़ रही है । सबसे ज्यादा मुसीबत पूजा बंसल की है । वाइस चेयरपरसन होने के नाते वह यदि यह कहते हुए बचने की कोशिश करती हैं कि उनकी सुनी ही नहीं जा रही है, तो लोगों को पूछना होता है कि इतने बड़े पद पर होने के बावजूद वह यदि कोई हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं - तो क्या यह उनकी प्रशासनिक अक्षमता नहीं है ? इस तरह की बातों/स्थितियों ने सत्ता खेमे के लोगों को प्रेरित किया है कि वह चौकड़ी की हरकतों पर लगाम लगाएँ । यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी लगाम लगाने की कोशिशों का चौकड़ी पर कोई असर होता भी है, या चौकड़ी की हरकतें बदस्तूर जारी रहती हैं ?

Monday, June 6, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ट्रेजरार नितिन कँवर की ईगो व निजी खुन्नसबाजी के चलते अविनाश गुप्ता के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई की आँच इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी तक पहुँचने से मामला खासा गंभीर हुआ

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी अपनी कारस्तानियों में अब इस हद तक दुस्साहसी हो गए हैं कि वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी तक को 'ऊल्लू' बनाने के काम में लग गए हैं । चर्चा है कि एम देवराज रेड्डी ने इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ सदस्य अविनाश गुप्ता के खिलाफ की जा रही रीजनल काउंसिल पदाधिकारियों की कार्रवाई का संज्ञान लिया है, जिसके बाद रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी मामले की लीपापोती में जुट गए हैं । उल्लेखनीय है कि अविनाश गुप्ता ने लिखित में की गई अपनी शिकायत में कहा/बताया है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी सुमित गर्ग ने उनसे टेलीफोन पर बात करते हुए स्वीकार किया व बताया कि चेयरमैन दीपक गर्ग के नेतृत्व में रीजनल काउंसिल के 'पॉवर ग्रुप' ने तय किया हुआ है कि अविनाश गुप्ता को नॉर्दर्न रीजन के किसी भी कार्यक्रम में 'दिखने' नहीं दिया जायेगा । अविनाश गुप्ता इंटरनेशनल टैक्सेशन में एक्सपर्ट वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, टैक्स रिसर्च फाउंडेशन के प्रेसीडेंट हैं । उन्होंने ऑस्ट्रिया की विएना यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल टैक्सेशन की पढ़ाई की है । वह एक प्रभावी वक्ता हैं और अपनी बात को कहने की कला के चलते प्रोफेशन के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं । अपनी लोकप्रियता के कारण ही वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की ब्रांचेज में स्पीकर के रूप में आमंत्रित किए जाते हैं । अब इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के ऐसे व्यक्ति के खिलाफ नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी गोलबंद हो जाएँ और तय करें कि नॉदर्न रीजन के किसी भी कार्यक्रम में वह इन्हें 'दिखने' नहीं देंगे - तो इंस्टीट्यूट के मुखिया के रूप में एम देवराज रेड्डी का मामले में दिलचस्पी लेना स्वाभाविक ही है । गौर करने की बात यह है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों पर जो आरोप है, वह सिर्फ आरोप या कयास भर नहीं है, बल्कि रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी सुमित गर्ग का कथन है । दरअसल सुमित गर्ग के कथन ने ही मामले को खासा गंभीर बना दिया है ।
इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी के दिलचस्पी लेने के कारण नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी मुश्किल में फँसे, तो उनकी मदद के लिए सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता आगे आए । पिछली 27 मई की अपनी रिपोर्ट में 'रचनात्मक संकल्प' विस्तार से बता चुका है कि कैसे विजय गुप्ता ही इस पूरे मामले के लिए 'जिम्मेदार' हैं । वह जिम्मेदार हैं, तो मददगार की भूमिका निभाने के लिए भी उन्हें ही आगे आना पड़ा । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अभी पिछले दिनों ही में हुई मीटिंग में विजय गुप्ता को उक्त मामले को संभालने के लिए ही आना पड़ा । विजय गुप्ता की उपस्थिति में रीजनल काउंसिल के 'आरोपी' पदाधिकारियों ने मजेदार किस्म का नाटक किया : उन्होंने अविनाश गुप्ता के आरोप को सिरे से नकार दिया; सेक्रेटरी सुमित गर्ग ने इस बात से इंकार किया कि उन्होंने अविनाश गुप्ता से वैसा कुछ कहा है, जैसा कहने का दावा अविनाश गुप्ता ने किया है । यह प्रसंग नाटक में लेकिन तब तब्दील हुआ, जब रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने इन बातों को रिकॉर्ड करने से इंकार किया । मीटिंग में मौजूद कुछेक लोगों का सुझाव था कि अविनाश गुप्ता ने सुमित गर्ग से हुई बातचीत का हवाला देते हुए जिन जिन लोगों को ईमेल लिखी है, उन उन लोगों को सुमित गर्ग उस तरह की बातचीत न होने की तथा अविनाश गुप्ता के आरोप को झूठा ठहराते हुए ईमेल लिखें/भेजें । सुमित गर्ग ने, रीजनल काउंसिल के दूसरे 'आरोपी' पदाधिकारियों ने - और यहाँ तक कि विजय गुप्ता ने भी इस सुझाव पर कोई ध्यान नहीं दिया । उनकी कोशिश रही कि बातों को रिकॉर्ड पर लाए बिना मामले को खत्म कर लिया जाए - तथा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी को बता दिया जाए कि मामला कुछ है ही नहीं ।
ऐसे में किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल है कि अविनाश गुप्ता के आरोप जब रिकॉर्ड पर हैं, तो उनके आरोप के जबाव को रिकॉर्ड पर लाने में 'आरोपी' पदाधिकारी डर क्यों रहे हैं ? उल्लेखनीय है कि अविनाश गुप्ता ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग को पत्र लिखकर आरोप लगाए हैं, लेकिन दीपक गर्ग की तरफ से उन्हें लिखित में जबाव नहीं मिला है । दीपक गर्ग लिख कर यह कहने का भी साहस नहीं कर पा रहे हैं कि उनके आरोप गलत हैं और झूठे हैं । हाल ही में हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में, सेंट्रल काउंसिल सदस्य विजय गुप्ता की उपस्थिति में रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने यही नाटक किया - जिसके तहत उन्होंने बार-बार दोहराया कि अविनाश गुप्ता के आरोप गलत हैं और झूठे हैं, लेकिन अपने इस दावे को रिकॉर्ड पर न आने देने के लिए भी उन्होंने पूरा जोर लगाया । दरअसल उन्हें भी पता है कि अविनाश गुप्ता के आरोप पूरी तरह सच हैं, और अपने आरोपों के बाबत अविनाश गुप्ता के पास पुख्ता सुबूत भी हैं - उन्हें डर है कि वह यदि रिकॉर्ड पर अविनाश गुप्ता के आरोप को झूठा कहेंगे, तो खुद ही झूठे साबित हो जायेंगे । इसलिए रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी इस चालाकी से 'काम' कर रहे हैं कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी तक वह विजय गुप्ता के जरिए यह संदेश भी भिजवा दें कि उन पर लगाए जा रहे आरोप झूठे हैं, और यह बात रिकॉर्ड पर भी न आए । इस सारी कवायद के पीछे रीजनल काउंसिल के 'पॉवर ग्रुप' का वास्तविक उद्देश्य इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी को 'ऊल्लू' बनाने का है - इस कवायद का दिलचस्प पहलू यह है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को इसमें सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता का पूरा पूरा सहयोग व समर्थन मिल रहा है ।
इसमें मजे की बात यह है कि इतना सब नाटक रीजनल काउंसिल के ट्रेजरार नितिन कँवर की निजी खुन्नसबाजी को निकालने के लिए किया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि असल झगड़ा अविनाश गुप्ता और नितिन कँवर के बीच है, जिसमें रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग व सेक्रेटरी सुमित गर्ग तथा सेंट्रल काउंसिल सदस्य विजय गुप्ता ने अपने आप को इस हद तक फँसा लिया है कि उनके लिए अपनी इज्जत तक बचाना मुश्किल हो रहा है - और उन्हें इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक के साथ चालबाजी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है । और सच पूछा जाए तो यह अविनाश गुप्ता व नितिन कँवर के बीच का कोई झगड़ा भी नहीं है - यह सिर्फ नितिन कँवर की ईगो है और निजी खुन्नसबाजी है, जिसके वशीभूत होकर उन्होंने अविनाश गुप्ता से पंगा ले लिया और फिर ऐसी आग भड़क उठी कि उसकी आँच इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक जा पहुँची है । मामला सिर्फ यह है कि अविनाश गुप्ता की तरह नितिन कँवर भी इंटरनेशनल टैक्सेशन में काम करते हैं, और अविनाश गुप्ता से सीनियर हैं । अविनाश गुप्ता चूँकि विदेश से पढ़ाई करके आए हैं, और अपने विषय को अच्छे से जानते/समझते हैं, अच्छा बोल लेते हैं - तो उन्होंने नितिन कँवर के बाद प्रोफेशन में आने के बावजूद उनकी तुलना में लोगों के बीच अच्छी पहचान बना ली । नितिन कँवर स्पीकर के रूप में लोगों को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते हैं और सेमीनार आदि में होने वाले सवालों का संतोषप्रद तरीके से जबाव नहीं दे पाते हैं, तो सेमीनार आदि में नितिन कँवर की बजाए अविनाश गुप्ता को ज्यादा बुलाया जाता है । किसी भी प्रोफेशन में ऐसा होता ही है : नितिन कँवर और अविनाश गुप्ता भी प्रोफेशन में बहुतों से आगे हैं, तो बहुतों से पीछे भी हैं; नितिन कँवर को लेकिन और किसी से पीछे रह जाने का मलाल नहीं हुआ, किंतु अविनाश गुप्ता से पीछे रह जाने को वह बर्दाश्त नहीं कर पाए और 'पदीय-बदमाशी' से अविनाश गुप्ता को पीछे खींचने में जुट गए ।
दरअसल दोनों चूँकि राजनीति में भी हैं, इसलिए नितिन कँवर को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि राजनीतिक सर्किल में लोग उनकी बजाए अविनाश गुप्ता को ज्यादा तवज्जो दें । नितिन कँवर की चुनावी सफलता ने भी उनकी 'सार्वजनिक पहचान' में कोई सुधार नहीं किया । चुनावी सफलता के मायने तो होते हैं, लेकिन सार्वजनिक पहचान के संदर्भ में वह काम नहीं आती है । चुनावी जीत की बात करें तो फूलन देवी भी सांसद का चुनाव जीती ही थीं, लेकिन उनकी जीत उनकी सार्वजनिक पहचान बदलने में कोई भूमिका नहीं निभा पाई थी । प्रोफेशन में ही देखें तो बिना चुनाव लड़े और जीते गिरीश आहुजा की जो पहचान है, उसका मुकाबला सेंट्रल काउंसिल का कोई सदस्य या इंस्टीट्यूट का कोई प्रेसीडेंट नहीं कर सकता । 'फूलनदेवी' टाइप कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स रीजनल काउंसिल के और सेंट्रल काउंसिल के चुनाव तो जीत जाते हैं; चेयरमैन और प्रेसीडेंट भी बन जाते हैं - लेकिन अपनी 'सार्वजनिक पहचान' में कोई सुधार नहीं कर पाते हैं । नितिन कँवर को जब लगा कि रीजनल काउंसिल का चुनाव वह जीते हैं, रीजनल काउंसिल में 'पॉवर ग्रुप' का सदस्य वह हैं, रीजनल काउंसिल में ट्रेजरार वह हैं - फिर भी सेमीनार आदि में उनकी बजाए अविनाश गुप्ता को ज्यादा बुलाया जा रहा है, और इंटरनेशनल टैक्सेशन विषय के स्पीकर के रूप में उनकी बजाए अविनाश गुप्ता की वाहवाही लगातार होती ही जा रही है - तो नितिन कँवर को लगा कि अविनाश गुप्ता से निपटने के लिए उन्हें ऊँगली टेढ़ी करना ही पड़ेगी । अविनाश गुप्ता से निपटने के लिए नितिन कँवर ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों का सहयोग लिया और अविनाश गुप्ता को स्पीकर के रूप में आमंत्रित करने वाले आयोजनों को रद्द करवाने तथा उनमें अड़चनें पैदा करने के अभियान में जुट गए । रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी सुमित गर्ग ने अविनाश गुप्ता को बता भी दिया कि 'हम' अब तुम्हें नहीं छोड़ेंगे । इस कार्रवाई को अंजाम देते हुए नितिन कँवर उस मशहूर कहावत को भूल गए, जो एक हिंदी फिल्म में एक डायलॉग के रूप में भी इस्तेमाल हुई - कि 'जो लोग खुद शीशे के घरों में रहते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिएँ ।' नितिन कँवर ने शायद इस बात पर भी गौर नहीं किया कि अविनाश गुप्ता चुनावी राजनीति में भले ही सफल न हो पाएँ हों, लेकिन उनके द्वारा की जा रही कार्रवाई का जबाव देने लायक राजनीति जानते ही होंगे । अविनाश गुप्ता ने नितिन कँवर की टुच्ची हरकत का जो जबाव दिया - उससे नितिन कँवर ही नहीं, उनका साथ देने वाले रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी भी संकट में फँस गए हैं । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी ने इस मामले में जो दिलचस्पी ली है, उससे नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की कारस्तानी का मामला गंभीर रूप लेता हुआ नजर आ रहा है ।