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Monday, April 13, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी ब्लड बैंक के अकाउंट से जुड़े झमेले की आँच पर सुधीर मंगला सीओएल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी का पुलॉव पकने की जो उम्मीद कर रहे हैं, उससे लेकिन उनके नजदीकी ही उत्साहित नहीं हैं

नई दिल्ली । रोटरी ब्लड बैंक को लेकर डिस्ट्रिक्ट के नेताओं का जो तमाशा चल रहा है और अभी हाल ही में उसकी जमापूँजी में से बड़े हिस्से को दान करने के मामले में जो रिजल्ट निकला, सीओएल के चुनावी समीकरणों के संदर्भ में सुधीर मंगला उससे गदगद हैं और उसे अपनी उम्मीदवारी के हित में मान/देख रहे हैं । उनके नजदीकियों का कहना/बताना है कि ब्लड बैंक को लेकर पिछले छह/आठ महीनों से जो तमाशा चल रहा है, उसमें सीओएल के चुनावी समीकरणों के संदर्भ में पहले संजय खन्ना फायदे में लग रहे थे - लेकिन ब्लड बैंक की जमापूँजी हल्की करने के मामले में जो बबाल हुआ, उससे स्थितियाँ बदली हैं, और फायदे का संकेत देने वाली सुई संजय खन्ना से हट कर सुधीर मंगला पर आ टिकी है । दरअसल ब्लड बैंक को लेकर पिछले छह/आठ महीनों से जो नाटक चल रहा था, उसने संजय खन्ना को 'हीरो' बनाया हुआ था । लोगों के बीच चर्चा थी कि ब्लड बैंक के ट्रेजरर के रूप में संजय खन्ना ने ही ब्लड बैंक में गुपचुप रूप से होने वाले मनमाने खर्चों का मामला उठाया था, जिसके चलते बात खुली कि ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी के सदस्य और पदाधिकारी कार्यकाल पूरा होने के बाद भी, बिना चुनाव करवाए अपने अपने पदों पर जमे हुए हैं और कामकाज में मनमानियाँ हो रही हैं । इसके बाद ही, ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी के सदस्यों और पदाधिकारियों के चुनाव करने/करवाने की बात शुरू हुई और यह प्रमुख फैसला हुआ कि मौजूदा गवर्निंग बॉडी तथा पदाधिकारी बड़े खर्चों वाले किसी काम के बारे में फैसला नहीं करेंगे । ब्लड बैंक में हुए इस डेवलपमेंट को लोगों ने अच्छी भावना से लिया, और इसका श्रेय संजय खन्ना को दिया ।
डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव होने के बाद रोटेरियंस नेता लोग प्रायः 'खाली' हो जाते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3011 में सीओएल के चुनाव के साथ-साथ ब्लड बैंक के झमेले ने उन्हें सक्रिय बनाये रखा । वैसे तो सीओएल के चुनावी समीकरणों और ब्लड बैंक के झमेले का कोई संबंध नहीं बनता है, लेकिन चूँकि ब्लड बैंक के झमेले के बढ़ने के साथ-साथ सीओएल के चुनाव के दिन नजदीक आते गए - और दोनों जगह संजय खन्ना 'मौजूद' दिखे, तो लोगों के बीच बनने वाली बातों में ब्लड बैंक के झमेले तथा सीओएल के चुनावी समीकरणों में संबंध स्वतः जुड़ गया । इस जुड़े संबंध ने संजय खन्ना की सीओएल की उम्मीदवारी के लिए माहौल अनुकूल बनाया । लेकिन ब्लड बैंक के अकाउंट को हल्का करने के फैसले में शामिल होकर संजय खन्ना ने अपने लिए मुसीबत थोड़ा बढ़ा ली है । उनके नजदीकियों का कहना है कि संजय खन्ना उक्त मामले में दरअसल हालात को भाँप नहीं पाए; उन्हें लगा कि अधिकतर लोग उक्त फैसले के पक्ष में हैं, और फैसला हो ही जायेगा । ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में सुरेश जैन के स्टैंड के जाहिर होने के बाद हालाँकि संजय खन्ना भी अकाउंट को हल्का करने के फैसले के खिलाफ हो गए, लेकिन माना यही गया कि उन्होंने मजबूरी में पलटी मारी । ब्लड बैंक के अकाउंट को हल्का करने के मामले में मंजीत साहनी ने जिस तरह से काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की भूमिका को शामिल किया, उसमें सुधीर मंगला ने 'बहती गंगा में हाथ धोने' का काम कर लिया । इसी आधार पर सुधीर मंगला को लगता है कि सीओएल के उम्मीदवारों में एक अकेले वही हैं, जिन्होंने ब्लड बैंक के अकाउंट को हल्का करने के प्रयास का विरोध किया - और इसलिए उक्त प्रयास का जिन भी लोगों ने विरोध किया है, उनका समर्थन उन्हें ही मिलेगा ।
सुधीर मंगला यह देख/जान/सुन कर और गदगद हैं कि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई ब्लड बैंक के अकाउंट को हल्का करने के प्रयास के विफल हो जाने से खुश हैं । डिस्ट्रिक्ट के लोगों की इस खुशी में उन्हें सीओएल के लिए अपनी उम्मीदवारी की नाव इस बार पार होती दिख रही है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार सीओएल के चुनाव में वह हार गए थे । मजे की बात लेकिन यह है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर जैसा भरोसा सुधीर मंगला को है, वैसा भरोसा उनके नजदीकियों को नहीं है - और यही कारण है कि खुद सुधीर मंगला को ही यह शिकायत करते हुए सुना जा रहा है कि उन्हें जिन लोगों से मदद की उम्मीद है, वह उनकी मदद कर नहीं रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लग रहा है कि ब्लड बैंक के अकाउंट से जुड़े ताजा मामले में सही फैसला कर पाने में संजय खन्ना चूक भले ही गए हों, लेकिन उससे सीओएल के चुनाव पर उनकी पकड़ ढीली नहीं पड़ी है । ब्लड बैंक के अकाउंट से जुड़े मामले के कारण काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों में जो 'गर्मी' पैदा हुई है, वह यदि कोई नया समीकरण बनाती भी है तो उसका फायदा अमित जैन को मिल सकता है । अमित जैन सीओएल के लिए अपनी उम्मीदवारी का अभियान बड़े चुपचाप तरीके से चलाते 'सुने' जा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट में चलते रहने वाले तमाम झमेलों और विवादों से अमित जैन जिस तरह अपने आप को बचाये रखे हुए हैं, उसे उनकी 'कूल' और कुशल प्रबंधन नीति के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जाता है । चुनावी उठापटक में अमित जैन की इस नीति को कुछेक लोग उनकी कमजोरी के रूप में देखते हैं, तो अन्य कई लोग इसे उनकी ताकत के रूप में पहचानते हैं । सीओएल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि ब्लड बैंक के अकाउंट से जुड़े जिस झमेले पर सुधीर मंगला उत्साहित हो रहे हैं, उस पर जल्दी ही धूल पड़ जाएगी और तब उम्मीदवारों की वास्तविक पहचान तथा लोगों के बीच उनकी छवि ही निर्णायक भूमिका निभायेगी ।

Thursday, April 9, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर मंजीत साहनी ने रोटरी ब्लड बैंक के अकाउंट से बड़ी रकम दान करने के जरिये शेखर मेहता को खुश करके अपनी राजनीति संभालने की विनोद बंसल की कोशिश को बाहर से जो झटका दिया, उसे गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में सुरेश जैन ने अंजाम तक पहुँचाया और विनोद बंसल की योजना पर पानी फेर दिया 

नई दिल्ली । विनोद बंसल ने रोटरी ब्लड बैंक के अकाउंट से मोटी रकम दान में देने के अपने मनमाने फैसले को तथाकथित गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में मंजूर करवाने के लिए फील्डिंग तो बेहद कसी हुई सजाई थी, लेकिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी की एक 'आउट स्विंग' ने उनकी फील्डिंग को ऐसा ऐसा तहसनहस किया कि फिर उनका फैसला तो मंजूर नहीं ही हुआ - उन्हें फजीहत का सामना और करना पड़ा । इस मामले में और भी बुरी बात यह हुई कि विनोद बंसल के चक्कर में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के लिए भी दुविधा के हालात बने । मामले से परिचित हर व्यक्ति को हैरानी हुई कि शेखर मेहता आखिर विनोद बंसल के चक्कर में फँस कैसे गए ? हालाँकि मीटिंग से पहले तक जो 'स्थिति' थी, उसमें कोई भी विनोद बंसल के चक्कर में फँस सकता था । अपने फैसले को मंजूर करवाने के लिए विनोद बंसल ने बड़ी चाक-चौबंद व्यवस्था की थी; उनकी 'व्यवस्था' में कोई सेंध न लगा सके, इसके लिए उन्होंने शेखर मेहता का और उनके नाम का भरपूर इस्तेमाल किया । मीटिंग में उन्हें, जिन सदस्यों की तरफ से विरोध की आशंका थी, उनके मुँह बंद रखवाने के लिए उन्होंने शेखर मेहता रूपी टेप का पक्का इस्तेमाल किया हुआ था । विनोद बंसल ने ब्लड बैंक के सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल और ट्रेजरर संजय खन्ना को अपने फैसले के पक्ष में करके हालात को पूरी तरह साध लिया था; यह दोनों सिर्फ विनोद बंसल के फैसले के साथ ही नहीं थे, बल्कि फैसले के विरोध में दिख रहे गवर्निंग बॉडी के सदस्यों को भी मनाने के काम में लगे हुए थे । ऐसे में, यही माना/समझा जा रहा था कि रोटरी ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की जूम मीटिंग में 'अपने' फैसले को मंजूर करवाने में विनोद बंसल को कोई दिक्कत नहीं होगी ।
लेकिन मंजीत साहनी ने विनोद बंसल की सारी तैयारी पर पानी फेर दिया ।
मीटिंग शुरू होने से कुछेक घंटे पहले, मंजीत साहनी ने सोशल मीडिया में एक संदेश दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि रोटरी में बने ट्रस्ट के असली 'मालिक' डिस्ट्रिक्ट के सदस्य होते हैं, और काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की सहमति के बाद ही वह बनते हैं - इसलिए उसकी संपत्ति व जमापूँजी के बारे में फैसला करने का अधिकार ट्रस्ट की गवर्निंग बॉडी को नहीं है । मंजीत साहनी के इस संदेश ने दरअसल 'बिल्ली के गले में घंटी बाँधने' का काम किया । असल में, मंजीत साहनी के मामले में कूदने से पहले हर कोई शेखर मेहता की संलग्नता के कारण चुप बना हुआ था । विनोद बंसल इसी चुप्पी में अपना काम निकालने की तैयारी में थे । मंजीत साहनी के संदेश ने लेकिन उक्त चुप्पी को भंग कर दिया । सोशल मीडिया में फिर कई पूर्व गवर्नर्स ने विनोद बंसल की ब्लड बैंक का अकाउंट खाली करने की मनमानी कार्रवाई के प्रति अपनी नाराजगी दिखाई । यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि विनोद बंसल का 'रायता' फैलने लगा है । यह फैलता 'रायता' गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में लेथन/गंदगी न करे, इसके लिए विनोद बंसल ने अभूतपूर्व तरीका अपनाया - और वह यह कि गवर्निंग बॉडी की मीटिंग की शुरुआत उन्होंने शेखर मेहता से करवाई । दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक से शेखर मेहता का कोई मतलब नहीं है; एक बड़े पदाधिकारी होने के नाते ब्लड बैंक के किसी समारोह में शेखर मेहता उपस्थित हों - तो बात समझ में आती है; लेकिन ब्लड बैंक की गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में उनकी मौजूदगी एक अभूतपूर्व बात बनी । समझा जाता है कि विनोद बंसल ने शेखर मेहता से मीटिंग की शुरुआत मीटिंग में मौजूद सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए करवाई । लेकिन उनकी  तरकीब बुरी तरह फेल हो गई ।
मंजीत साहनी ने जो काम 'बाहर' किया था, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग में वही काम वरिष्ठ पूर्व गवर्नर सुरेश जैन ने किया । मीटिंग में, शेखर मेहता के तुरंत बाद सुरेश जैन ने बोला और उन्होंने पूरी स्पष्टता व दृढ़ता के साथ ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने की विनोद बंसल की कोशिश का दो-टूक विरोध किया । सुरेश जैन की बातों ने शेखर मेहता की मौजूदगी तथा उनकी अपील से बने प्रभाव को पूरी तरह धो-पोंछ दिया । सुरेश जैन की बातों ने एक तरह से मीटिंग की दशा-दिशा तय कर दी । रही-सही कसर रूपक जैन ने पूरी कर दी । इसके बाद तो हर कोई जैसे विनोद बंसल से बदला लेने पर उतारू दिखा । माहौल देख कर रमेश अग्रवाल और संजय खन्ना ने भी पाला बदल लिया, और वह भी विनोद बंसल के फैसले की खिलाफत करते नजर आए । रमेश अग्रवाल ने तो जोश जोश में यह पोल भी खोल दी कि विनोद बंसल तो यह मीटिंग ही नहीं करना चाहते थे, वह तो इस कोशिश में थे कि तीन-चार पदाधिकारी मिल कर ही ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने का फैसला कर लें । यह पोल खुलने के बाद माहौल और गर्मा गया, तथा अनूप मित्तल बुरी तरह भड़के । इसके बाद तो मीटिंग में विनोद बंसल पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए और किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया । ऐसे में, विनोद बंसल ब्लड बैंक के अकाउंट को खाली करने का अपना फैसला मंजूर भला कैसे करवाते ? मीटिंग  में जो हुआ, उसमें विनोद बंसल को सिर्फ अपना फैसला मंजूर करवाने में ही हार का मुँह नहीं देखना पड़ा, बल्कि यह सच्चाई भी लोगों के सामने आई कि अपने ही डिस्ट्रिक्ट में वह पूरी तरह अलग-थलग हैं । इस बात ने राजनीतिक रूप से विनोद बंसल को तगड़ा झटका दिया है ।

Monday, November 11, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में शेखर मेहता के सम्मान समारोह को फेल करने की विनोद बंसल की कोशिशों के बावजूद, समारोह को मिली कामयाबी का डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर भी असर पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है

नई दिल्ली । शुरू से ही मुसीबतों का शिकार बना रहा इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता का सम्मान समारोह अंततः जिस जोरदार सफलता के साथ संपन्न हुआ, उसने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति को एक नया आयाम दिया है और वह हर किसी के लिए एक 'सबक' भी बना है । मजे की बात यह रही कि समारोह की तैयारी कमेटी के चेयरमैन विनोद बंसल ही समारोह को विफल करने/करवाने के प्रयासों में जुटे थे । समारोह से करीब दस दिन पहले हुई तैयारी कमेटी की मीटिंग का उन्होंने यह कहते हुए बायकाट किया कि 'आय एम् नॉट इंटरेस्टिंग' । विनोद बंसल के अधिकतर नजदीकी लगातार समारोह के खिलाफ माहौल बनाते रहे और रजिस्ट्रेशन के लिए लोगों को हतोत्साहित करते रहे और खुद भी समारोह से दूर रहे । इसके बावजूद समारोह में 400 से ज्यादा लोग जुटे । इससे पहले इस तरह के आयोजनों में मुश्किल से 200/250 लोग जुटते रहे हैं; और इतने भी तब, जब दो डिस्ट्रिक्ट्स मिल कर आयोजन करते थे । मंच सज्जा की भी खासी प्रशंसा हुई और शेखर मेहता के लिए दक्षिण भारत में प्रचलित फूलों की मोटी माला की व्यवस्था की गई, जो दिल्ली में देखने को नहीं मिलती है । समारोह की भव्यता और व्यवस्था ने सभी को आकर्षित व प्रभावित किया । समारोह में रोटेरियंस की जैसी उपस्थिति रही, समारोह स्थल की जो साज-सज्जा रही और जिस व्यवस्थित तरीके से समारोह संपन्न हुआ - उसने समारोह से जुड़ी सारी आशंकाओं को फिजूल साबित किया और दिखाया/बताया कि संगठन से बड़ा कोई नहीं है; किसी को कितनी ही गलतफहमी हो कि वह किसी भी कार्यक्रम को बना/बिगाड़ सकता है - लेकिन संगठन के सामने अंततः वह बौना ही साबित होता है और जीत संगठन की ही होती है ।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि शेखर मेहता के सम्मान में डिस्ट्रिक्ट 3011 में होने वाला समारोह नेताओं की आपसी खींचतान का माध्यम बन गया । यूँ तो (किसी भी) डिस्ट्रिक्ट का हर समारोह अपने समानांतर डिस्ट्रिक्ट की राजनीति की दशा/दिशा को भी बनाता/बिगाड़ता चलता है, और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट 3011 में शेखर मेहता का सम्मान समारोह भी डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच उठापटक का जरिया बना । दरअसल समारोह की कमान पर कब्जा करने को लेकर विनोद बंसल और रंजन ढींगरा के बीच शुरू से ही तलवारें खिंच गईं थीं । शुरुआत विनोद बंसल ने की । समारोह करने को लेकर जैसे ही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के बीच बातचीत हुई, वैसे ही विनोद बंसल ने अपने ऑफिस में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव राय मेहरा तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल के साथ समारोह की तैयारी को लेकर मीटिंग की, और खुद चेयरमैन बन बैठे । विनोद बंसल को विश्वास रहा कि रंजन ढींगरा चूँकि आक्रामक राजनीति नहीं करते हैं और जितना/जो मिल जाता है, उससे खुश रहते हैं; इसलिए वह उन्हें बड़े आराम से किनारे लगा देंगे । चेयरमैन बन कर विनोद बंसल ने सचमुच उन्हें किनारे लगा ही दिया । लेकिन विनोद बंसल की बदकिस्मती यह रही कि उनकी यह कार्रवाई कई पूर्व गवर्नर्स को पसंद नहीं आई । उन्होंने रंजन ढींगरा को आगे करके विनोद बंसल की चालबाजियों से लड़ने की तैयारी की । काउंसिल ने विनोद बंसल को चेयरमैन के रूप में तो बरकरार रखा, लेकिन रंजन ढींगरा को कन्वेनर तथा सुरेश जैन व मंजीत साहनी को एडवाइजर बना कर विनोद बंसल की भूमिका को सीमित कर दिया । विनोद बंसल को तगड़ा झटका तब लगा, जब रमेश चंद्र को को-चेयर तथा अनूप मित्तल को को-कन्वेनर बना दिया गया ।
विनोद बंसल बहुत भड़के/तमतमाए; वह विनय भाटिया को कमेटी में लेना/रखवाना चाहते थे; अनूप मित्तल को कमेटी से बाहर करवाने के लिए उन्होंने तर्क भी दिया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी होने के नाते अनूप मित्तल तो किसी प्रोटोकॉल में ही नहीं आते हैं । काउंसिल ने लेकिन विनोद बंसल की एक न सुनी और काउंसिल में विनोद बंसल पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए । 'आय एम् नॉट इंटरेस्टिंग' कहते हुए विनोद बंसल तैयारी कमेटी की मीटिंग बीच में छोड़ कर जो चले गए थे, वह वास्तव में काउंसिल में अलग-थलग पड़ जाने से पैदा हुई बौखलाहट का ही नतीजा था । काउंसिल के सदस्यों ने विनोद बंसल को भड़का तो दिया था, लेकिन समारोह को प्रभावी रूप से संपन्न करने की चुनौती उनके सामने थी - यह चुनौती इसलिए और बड़ी हो गई थी, क्योंकि विनोद बंसल अपने साथियों के साथ समारोह को फेल करने की मुहिम में जुट गए थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल ने काउंसिल के सदस्यों को आश्वस्त तो किया हुआ था कि वह समारोह की तैयारी को प्रभावी रूप से संभव कर/करवा लेंगे; लेकिन आशंकाएँ लगातार बनी हुई थीं । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स ने समारोह की आड़ में होने वाली राजनीति को संभाला, तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल ने समारोह की तैयारियों का मोर्चा देखा; इन्होंने डिस्ट्रिक्ट के सक्रिय लोगों को प्रेरित/प्रोत्साहित किया तो तुरंत से तीस/चालीस लोगों की एक टीम बन गई जिसने समारोह की तैयारी को लेकर फिर न रात देखी और न दिन देखा । समारोह को खासी भव्यता, व्यवस्था व रौनक के साथ होता देख शेखर मेहता भी गदगद नजर आए और शायद इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने समारोह में ऐसा भाषण दिया कि सभी ने उनके भाषण की भूरि भूरि प्रशंसा की । समारोह की कामयाबी ने समारोह से जुड़े काउंसिल के सदस्यों को जहाँ एक नया जोश दिया है, वहीं विनोद बंसल को अपने रवैये पर पुनर्विचार करने की चेतावनी भी दी है । शेखर मेहता के सम्मान समारोह के समानांतर जो राजनीति हुई है, उसका डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर भी असर पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है । 

Tuesday, December 25, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 से 'मिशन ताईपाई 2021' के लॉन्चिंग समारोह में शामिल होने के जरिये महेश त्रिखा ने अपनी सक्रियता की एक लंबी छलाँग लगा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की होड़ को रोमांचपूर्ण बना दिया है

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में देखे/पहचाने जा रहे 'मिशन ताईपाई 2021' के वृन्दावन में हुए लॉन्चिंग समारोह में महेश त्रिखा की उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अचानक से गर्मी पैदा कर दी है । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथईस्ट के वरिष्ठ सदस्य महेश त्रिखा अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार बनने की तैयारी में सुने/देखे जा रहे हैं । उनके अलावा अशोक कंतूर, अजीत जालान और रवि गुगनानी को भी संभावित उम्मीदवारों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अभी तक सभी संभावित उम्मीदवार काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के बीच अपने अपने लिए समर्थन जुटाने का ही प्रयास करते हुए देखे/सुने गए हैं; और किसी ने भी अभी लोगों के बीच अपनी सक्रियता प्रदर्शित नहीं की है । ऐसे में, महेश त्रिखा के पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के संरक्षण तथा कई डिस्ट्रिक्ट्स के प्रमुख पदाधिकारियों व रोटरी के बड़े नेताओं की मौजूदगी में आयोजित हुए 'मिशन ताईपाई 2021' के लॉन्चिंग समारोह में वृन्दावन पहुँचने के बड़े राजनीतिक अर्थ निकाले/लगाये जा रहे हैं । दरअसल 'मिशन ताईपाई 2021' को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के महत्वाकाँक्षी प्रोजेक्ट के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, जिसका लक्ष्य मार्च 2021 से पहले देश के दस हजार गाँव के लोगों को अँधत्व से मुक्ति दिलवाना है । सुशील गुप्ता का प्रोजेक्ट होने और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी का इसका चेयरमैन तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अनूप मित्तल  का इसका सेक्रेटरी जनरल होने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3011 के लोगों के लिए इसका खास महत्त्व है । लेकिन फिर भी डिस्ट्रिक्ट 3011 के गिनती के लोग ही उक्त समारोह में नजर आए । ऐसे में, 'मिशन ताईपाई 2021' के लॉन्चिंग समारोह में महेश त्रिखा की उपस्थिति का डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच खास नोटिस लिया गया ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के संभावित अन्य उम्मीदवारों में से भी कोईं चूँकि उक्त समारोह में शामिल नहीं हुआ, इसलिए महेश त्रिखा की उपस्थिति का राजनीतिक पक्ष भी बना । यह सच है कि उक्त समारोह डिस्ट्रिक्ट 3011 का आयोजन नहीं था - वास्तव में यह किसी भी डिस्ट्रिक्ट का आयोजन नहीं था, यह रोटरी का आयोजन था - और इसके लिए किसी को निमंत्रण भी नहीं था; लेकिन सुशील गुप्ता, मंजीत साहनी, अनूप मित्तल जैसे डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों की संलग्नता वाले आयोजन के प्रति डिस्ट्रिक्ट 3011 के 'लीडर' बनने की इच्छा रखने वाले रोटेरियंस की इसमें भागीदारी करने/दिखाने की उम्मीद तो की ही जाती थी । उक्त समारोह वास्तव में 'लीडरशिप क्वालिटी' दिखाने का एक अवसर था - जिसमें महेश त्रिखा के अलावा बाकी संभावित उम्मीदवार फेल हो गए । महेश त्रिखा भी इस आयोजन में शामिल न हुए होते, तो लीडरशिप क्वालिटी की बात न उठती/होती - लेकिन महेश त्रिखा ने समारोह में अपनी उपस्थिति दिखा कर लीडरशिप क्वालिटी के मामले में अपनी बढ़त तो बना ही ली, दूसरे संभावित उम्मीदवारों को असमंजस में भी डाल दिया है । दरअसल 'मिशन ताईपाई 2021' के लॉन्चिंग समारोह में अपनी उपस्थिति दिखा कर महेश त्रिखा लोगों के बीच यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि रोटरी के प्रति वह विशेष जिम्मेदारी समझते हैं और रोटरी के किसी भी महत्त्वपूर्ण आयोजन में उपस्थित होना वह अपना कर्तव्य मानते हैं । वृन्दावन में हुए समारोह में महेश त्रिखा की उपस्थिति को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जो चर्चा मिली है, उसे देख/सुन कर दूसरे उम्मीदवारों को अब लग रहा है कि उन्हें भी वृन्दावन में हुए समारोह में जाना चाहिए था । 
मजे की बात यह है कि चारों संभावित उम्मीदवारों में अभी तक महेश त्रिखा को ही कमजोर 'पिच' पर देखा/माना जा रहा था । दरअसल, यूँ तो महेश त्रिखा का क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली साऊथईस्ट - डिस्ट्रिक्ट का एक प्रमुख क्लब है, जिसमें सुरेश जैन तथा संजय खन्ना जैसे प्रमुख पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सदस्य हैं; लेकिन इस क्लब से आई अमरजीत सिंह की उम्मीदवारी का जो हाल हुआ, और राजीव सागर की उम्मीदवारी आते आते जिस तरह से पीछे हट गई - उसके कारण महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को लेकर खासा संशय बना हुआ था । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को शक रहा कि कहीं उनकी उम्मीदवारी भी अमरजीत सिंह तथा राजीव सागर की उम्मीदवारी जैसी गति को प्राप्त न हो । महेश त्रिखा हालाँकि पिछले तीन-चार वर्षों से डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में लगातार शामिल होते रहे हैं और लोगों से मेल-मिलाप करते रहे हैं और उन्हें लेकर लोगों के बीच अच्छी व सकारात्मक राय ही बनी है, लेकिन अमरजीत सिंह व राजीव सागर के साथ जो हुआ, उसके कारण उन्हें भी संदेह के साथ देखा जा रहा है । इसके अलावा, महेश त्रिखा के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि डिस्ट्रिक्ट के जिन प्रमुख लोगों के समर्थन की उम्मीद उन्हें है - उन्हीं लोगों के समर्थन के भरोसे रोटरी क्लब रोहतक के वरिष्ठ सदस्य रवि गुगनानी भी उम्मीदवार होने/बनने की तैयारी करते सुने/देखे जा रहे हैं । संजय खन्ना के गवर्नर-वर्ष में रवि गुगनानी अपने क्लब के प्रेसीडेंट थे, और बेस्ट प्रेसीडेंट चुने गए थे । रवि गुगनानी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच ज्यादा सक्रिय नहीं रहे हैं, और इस नाते डिस्ट्रिक्ट के लोग उन्हें ज्यादा जानते/पहचानते नहीं हैं; लेकिन उनके समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि अपनी सक्रियता से वह जल्दी ही इस कमी को दूर कर लेंगे । रवि गुगनानी अपनी कमी को दूर करें, उससे पहले ही महेश त्रिखा ने अपनी सक्रियता की एक लंबी छलाँग लगा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की होड़ को रोमांचपूर्ण तो बना ही दिया है ।

Thursday, March 15, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केके गुप्ता का अपने गवर्नर-वर्ष की सिल्वर जुबली मनाने का 'यूनीक आईडिया' रोटरी के बड़े पदाधिकारियों की प्रशंसा पाने के साथ-साथ कई पूर्व गवर्नर्स के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना है

नई दिल्ली । पच्चीस वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहे केके गुप्ता के पद्चिन्हों पर चलने की कोशिश करते हुए विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कुछेक पूर्व गवर्नर्स को अपने अपने गवर्नर-काल की सिल्वर जुबली मनाने की तैयारियाँ करते हुए सुना जा रहा है । इस तरह पच्चीस वर्ष पहले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट रहे क्लिफ डॉचटर्मन का केके गुप्ता के गवर्नर-काल के सिल्वर जुबली कार्यक्रम को 'यूनीक आईडिया' कहना/बताना सच साबित हो रहा है । उल्लेखनीय है कि अपने प्रेसीडेंट-काल के एक गवर्नर के रूप में केके गुप्ता से गवर्नरी के सिल्वर जुबली कार्यक्रम का निमंत्रण पाकर क्लिफ डॉचटर्मन ने पहली प्रतिक्रिया में यही कहा था कि रोटरी में उन्होंने इस तरह के आयोजन की बात नहीं सुनी है, और यह बहुत ही यूनीक आईडिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में केके गुप्ता का रोटरी-जीवन बहुत ही सक्रियता भरा तो रहा ही है, साथ ही इस बात के लिए भी उल्लेखनीय रहा है कि उन्होंने हमेशा ही कुछ नया करने और नए मापदंड स्थापित करने का प्रयास किया है । रूटीन के कामों को भी उन्होंने जिस तरह नए अंदाज और नए तरीके से करने के प्रयास किए हैं, उसके कारण ही उनके द्वारा किए गए रूटीन के काम भी उल्लेखनीय बन गए हैं । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का आयोजन तालकटोरा गार्डंस में करना और पहले रोटरी इंडिया अवॉर्ड फंक्शन की मेजबानी के लिए तैयार होना - जिसमें प्रख्यात समाजसेविका मदर टेरेसा को पॉल हैरिस फेलो के रूप में सम्मानित किया गया था, और मेरठ में आयोजित किए गए रायला कार्यक्रम में टीएन शेषन जैसी शख्सियत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना - ऐसे उदाहरण बने, जो उनकी अलग, बड़ी व उदार सोच के संकेत और सुबूत बने । अपने अलग, बड़े व उदार नजरिये के कारण ही केके गुप्ता अपने गवर्नर-काल की सिल्वर जुबली बनाने के लिए प्रेरित हुए और दूसरे पूर्व गवर्नर्स के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हैं ।
केके गुप्ता के 'यूनीक आईडिया' को रोटरी इंटरनेशनल के मौजूदा व पूर्व पदाधिकारियों से जिस तरह का समर्थन और सराहना मिली, उससे ही जाहिर है कि अपने गवर्नर-काल की सिल्वर जुबली मनाने की उनकी योजना सिर्फ पच्चीस वर्ष पहले उनके प्रेसीडेंट रहे क्लिफ डॉचटर्मन को ही यूनीक नहीं लगी - बल्कि अन्य कई प्रमुख लोगों को भी भायी । मौजूदा इंटरनेशनल प्रेसीडेंट ईआन रिसेले, रोटरी फाउंडेशन के चेयरमैन पॉल नेत्ज़ेल, इंटरनेशनल जनरल सेक्रेटरी जॉन हेब्को, रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुशील गुप्ता तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम सहित पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी व केआर रवींद्रन तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर पांडुरंगा सेट्टी व अन्य कई प्रमुख पदाधिकारियों ने केके गुप्ता के आयोजन की भूरि भूरि प्रशंसा की तथा केके गुप्ता व आयोजन के लिए शुभकामनाएँ भेजीं । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू तो केके गुप्ता के इस आयोजन को लेकर इतने उत्साहित थे कि उन्होंने वीडियो क्लिप के जरिये अपनी बधाई और शुभकामनाएँ भेजीं । अपने संदेश में राजा साबू ने कहा भी कि वह आयोजन में शामिल होना चाहते थे, लेकिन पूर्वनियोजित व्यस्तता के कारण उनके लिए यह संभव नहीं हो पा रहा है और इसका उन्हें बेहद अफसोस है । इनरव्हील क्लब की पहली इंटरनेशनल प्रेसीडेंट मिन्ना कपूर की उपस्थिति ने रोटरी परिवार की पुरानी स्मृतियों को ताजा करने का काम किया । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुभाष जैन की मौजूदगी ने केके गुप्ता के गवर्नर वर्ष की गतिविधियों से जुड़ी यादों को सजीव बनाया । यह दोनों केके गुप्ता के गवर्नर वर्ष में अपने अपने क्लब के प्रेसीडेंट थे । सिल्वर जुबली आयोजन में 42 प्रेसीडेंट्स तथा 64 टीम मेंबर्स का शामिल होना भी कार्यक्रम की एक बड़ी उपलब्धि कही/मानी जाएगी । 10 पूर्व गवर्नर्स की मौजूदगी ने भी सिल्वर जुबली कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई ।
केके गुप्ता ने अपने संबोधन में अपने गवर्नर वर्ष की गतिविधियों और उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन गतिविधियों व उपलब्धियों में सहभागी बने रोटेरियंस की भूमिकाओं को रेखांकित किया और उनके प्रति अपना आभार व्यक्त किया । केके गुप्ता ने 1978 में उन्हें रोटरी से परिचित करवाने के लिए राजेंद्र प्रसाद का आभार व्यक्त किया । उन्होंने कैंसर हॉस्पिटल आइआरसीएच को 26.5 लाख रुपए का सहयोग देने के लिए प्रेसीडेंट सुरेश माथुर का धन्यवाद किया । सुभाष जैन के ऑर्च क्लम्फ सोसायटी का सदस्य बनने का केके गुप्ता ने अपने संबोधन में खास जिक्र किया और सुभाष जैन को बधाई दी । केके गुप्ता ने अपने उन सहयोगियों को भी याद किया, जो अब उनके साथ और या उनके संपर्क में नहीं हैं - लेकिन जिन्होंने 'दूसरों की सहायता करने में ही वास्तविक खुशी है' तथा 'गरिमा के साथ रोटरी करने' के उनके उद्देश्यों को पूरा करने में अपना अमूल्य सहयोग दिया । केके गुप्ता ने याद किया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी गतिविधियों व उपलब्धियों से प्रभावित होकर ही पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर ओपी वैश्य ने वर्ष 1999-2000 में आगरा में आयोजित हुए रोटरी जोन इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी । उनकी गतिविधियों और उपलब्धियों के कारण ही उन्हें 'सर्विस अबव सेल्फ' तथा 'डिस्टिंगुइश्ड सर्विस अवॉर्ड' जैसे रोटरी के प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित होने का गौरव मिला । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में केके गुप्ता की गतिविधियाँ और उपलब्धियाँ तो उल्लेखनीय रही हीं, सिल्वर जुबली आयोजन के जरिये उन गतिविधियों व उपलब्धियों को याद करने व सेलीब्रेट करने की योजना उससे भी ज्यादा उल्लेखनीय बन गई - इसीलिए रोटरी के 113वें स्थापना दिवस पर आयोजित हुआ सिल्वर जुबली आयोजन गरिमा व भव्यता से न सिर्फ संपन्न हुआ - बल्कि यह आयोजन कई पूर्व गवर्नर्स के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना है ।
केके गुप्ता के गवर्नर-वर्ष के सिल्वर जुबली आयोजन की 
कुछेक झलकियाँ इन तस्वीरों में देखी/पहचानी जा सकती हैं :





Wednesday, October 25, 2017

रोटरी इंटरनेशनल के उच्च पदाधिकारियों के बीच प्रशंसा और सम्मान पाती रहीं डिस्ट्रिक्ट 3011 की अत्यंत सक्रिय रोटेरियन आभा झा चौधरी को 'वर्ल्ड पोलियो डे' के आयोजन के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर रवि चौधरी की बदतमीजी का शिकार होना पड़ा

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने 'वर्ल्ड पोलियो डे' पर कार्यक्रम करने के लिए डिस्ट्रिक्ट पोलियोप्लस कमेटी की चेयरपरसन आभा झा चौधरी के साथ जिस तरह की बदतमीजी की और कार्यक्रम को खराब करने का प्रयास किया, उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों को एक बार फिर इस बात का सुबूत मिला है कि रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट ही नहीं बल्कि रोटरी पर एक कलंक की तरह हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया कार्यक्रम में रवि चौधरी की हरकतों पर जिस तरह से मजे लेते दिखे, उससे लोगों को यह भी लग रहा है कि घटियापन करने/दिखाने के मामले में विनय भाटिया भी रवि चौधरी से कम साबित नहीं होंगे । आभा
झा चौधरी के क्लब के वरिष्ठ सदस्य और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार संजीव राय मेहरा ने बाद में जिस तरह आभा झा चौधरी पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वह रवि चौधरी की हरकत को नजरअंदाज कर दें और डिस्ट्रिक्ट में लोगों से इस बारे में बात न करें, क्योंकि उसके उनकी उम्मीदवारी को रवि चौधरी की मदद नहीं मिल पायेगी - उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 की किस्मत में घटिया सोच और व्यवहार के लोग ही गवर्नर बनने बदे हैं । संजीव राय मेहरा डिस्ट्रिक्ट के एक पुराने रोटेरियन हैं और उन्हें एक भले और जेनुइन व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है । लेकिन उन्हें रवि चौधरी के 'एजेंट' के रूप में काम करता देख लोगों को झटका लगा है - संजीव राय मेहरा ने पहले तो आभा झा चौधरी के साथ की जा रही रवि चौधरी की बदतमीजी को चुपचाप तमाशे की तरह देखा, और एक बार भी रवि चौधरी को रोकने की कोशिश नहीं की; और फिर आभा झा चौधरी पर ही इस बात के लिए दबाव बनाने का प्रयास किया कि वह रवि चौधरी की हरकत का किसी से जिक्र न करें और जो हुआ उसे भूल जाएँ ।
आभा झा चौधरी क्या, अन्य किसी ने भी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 'वर्ल्ड पोलियो डे' पर अपनी पहल और अपनी अकेले की सक्रियता के दम पर कार्यक्रम करने के बावजूद उन्हें रवि चौधरी की बदतमीजी का शिकार होना पड़ेगा । उल्लेखनीय है कि आभा झा चौधरी को रवि चौधरी ने ही अपनी टीम में डिस्ट्रिक्ट पोलियोप्लस कमेटी की दिल्ली की चेयरपरसन का पद दिया हुआ है । 'वर्ल्ड पोलियो डे' को नजदीक आता देख आभा झा चौधरी को जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऑफिस से कुछ कार्यक्रम करने का निर्देश या सुझाव मिलता हुआ नहीं दिखा, तो उन्होंने स्वयं ही पहल करते हुए रवि चौधरी से कुछ कार्यक्रम करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए बात की । रवि चौधरी ने उनकी बात से सहमति व्यक्त की और उनसे कह दिया कि आप जैसा उचित समझें और अपने स्तर पर आप जो कर सकती हों, वह कर लें । रवि चौधरी ने उचित समय पर कार्यक्रम में पहुँचने के लिए वायदा भी कर लिया । हालाँकि इसके साथ ही रवि चौधरी ने उनसे यह भी साफ साफ कह दिया कि उक्त कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय कोई मदद नहीं कर पायेगा । आभा झा चौधरी पिछले तीन चार वर्षों से 'वर्ल्ड पोलियो डे' पर अपनी पहल और अपनी अकेले की मेहनत से कार्यक्रम करती रही हैं तथा रोटरी इंटरनेशनल के पोलियो मुक्ति अभियान के लिए फंड इकट्ठा करती रहीं हैं - और इसके लिए देश में ही नहीं, बल्कि इंटरनेशनल तक में प्रशंसा और पुरस्कार प्राप्त करती रहीं हैं । उनकी सक्रियता और संलग्नता से प्रभावित होकर ही रोटरी इंटरनेशनल ने पोलियो खत्म करने के अभियान को चलाने के लिए फंड्स इकट्टा करने के उद्देश्य से शुरू की गई 'वर्ल्ड ग्रेटेस्ट मील' परियोजना में आभा झा चौधरी को भारत का 'कंट्री-कोऑर्डीनेटर' का पद सौंपा है ।
रोटरी तथा रोटरी के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में पोलियो मुक्ति अभियान के लिए गहरी संलग्नता के साथ काम करने के चलते देश/विदेश के डिस्ट्रिक्ट्स में प्रशंसा और सम्मान पा रहीं आभा झा चौधरी को लेकिन अपने ही डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर रवि चौधरी की बदतमीजी का शिकार होना पड़ा । कार्यक्रम में पहुँचते ही रवि चौधरी ने आभा झा चौधरी को यह कहते हुए निशाना बनाया कि यह कार्यक्रम तो आपका है । आभा झा चौधरी ने यह कहते हुए उन्हें जबाव दिया कि यह कार्यक्रम मेरा नहीं, बल्कि रोटरी का, रोटरी के एक प्रमुख उद्देश्य का और डिस्ट्रिक्ट का कार्यक्रम है; डिस्ट्रिक्ट पोलियोप्लस कमेटी की चेयरपरसन होने के नाते मैं तो इसमें सिर्फ आयोजक की भूमिका निभा रही हूँ । यह सुन कर रवि चौधरी बुरी तरह भड़क गए और मौके पर उपस्थित लोगों के सामने ही निहायत बदतमीजी से कहने लगे कि आपने प्रेसीडेंट्स को कैसे इसमें आमंत्रित कर लिया तथा वॉट्सऐप पर आप इस बारे में मैसेज कैसे कर रही हैं और आप पोलियो के लिए फंड जुटाने का काम कैसे कर रही हैं ? रवि चौधरी के बदतमीजीपूर्ण व्यवहार के बावजूद अपने को संयत बनाये रखते हुए आभा झा चौधरी ने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने ही कल ही उन्हें अनुमति दी थी कि वह जैसा उचित समझें, वैसे कार्यक्रम को करें । आभा झा चौधरी ने उन्हें याद दिलाया कि पिछले तीन-चार वर्षों से वह इसी तरह से कार्यक्रम करती आ रही हैं, और पिछले सभी गवर्नर्स ने उनके काम की प्रशंसा की है; आभा झा चौधरी ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि पिछले वर्ष के कार्यक्रम में तो वह स्वयं भी उपस्थित थे और उन्होंने भी कार्यक्रम की तथा उनके प्रयासों की जमकर तारीफ भी की थी । इन बातों से रवि चौधरी ने अपनी बेवकूफी से बुने जाल में खुद को ही फँसे पाया, तो वह और बिफर गए । पता नहीं कि वह घर से या कहीं और से दुत्कार खा कर आये थे कि वहाँ का सारा फ्रस्टेशन और गुस्सा वह आभा झा चौधरी पर निकालने में लग गए । उन्होंने आभा झा चौधरी को इस बात पर घेरने की कोशिश की, कि यहाँ जो फंड इकट्ठा किया जा रहा है - वह कहाँ जायेगा ? आभा झा चौधरी ने उनकी इस बात का भी शालीनता से तर्कपूर्ण जबाव दिया कि आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, आपको यह पूछने की बजाये यह देखना/समझना चाहिए कि यहाँ इकट्ठा हुआ फंड जा कहाँ रहा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होने के बावजूद रवि चौधरी को लेकिन देखना/समझना तो कुछ था नहीं, उन्हें तो सिर्फ बदतमीजी करनी थी - जो उन्होंने जमकर की ।
आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करते हुए रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी और मर्यादा तक भूल बैठे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गर्मी दिखाते हुए रवि चौधरी ने मौके पर मौजूद लोगों के बीच यहाँ तक कह दिया कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं और उनकी मर्जी है कि वह 'वर्ल्ड पोलियो डे' मनाये या न मनाये । आभा झा चौधरी ने उन्हें इसका भी सटीक जबाव दिया कि बेशक उन्हें यह अधिकार है, इस अधिकार का उपयोग करते हुए वह कल उन्हें इस कार्यक्रम को करने से इंकार कर सकते थे; और पोलियो पर उन्हें यदि कुछ करना ही नहीं है तो अपनी टीम में उन्होंने पोलियो कमेटी के नाम पर दस दस पदाधिकारी क्यों बनाये हुए हैं ? रवि चौधरी की हर बात मौके पर मौजूद लोगों के बीच बेवकूफीभरी साबित होती जा रही थी, इससे वह और तिलमिलाते जा रहे थे । तिलमिलाहटभरी अपनी बदतमीजी को लेकिन उन्हें तब कंट्रोल करना पड़ा, जब वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी और दीपक कपूर कार्यक्रम में पहुँचे । रवि चौधरी के लिए उस समय बड़ी शर्मिंदगी की स्थिति पैदा हो गई जब पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तथा इंडिया पोलियोप्लस कमेटी के चेयरमैन दीपक कपूर ने आभा झा चौधरी के प्रयत्नों की जोरदार शब्दों में तारीफ की और उन्हें 'रोटरी का गौरव' बताया, और मंजीत साहनी ने आभा झा चौधरी की सक्रियता व संलग्नता को प्रेरणास्पद बताते हुए फंड जुटाने के अभियान में अपनी तरफ से चेक दिया ।
कई मौकों पर लताड़ खाने तथा दुत्कारे जाने के बावजूद रवि चौधरी ने लेकिन शर्मिंदा होना नहीं सीखा है । 'वर्ल्ड पोलियो डे' के कार्यक्रम में तमाशा और बदतमीजी करने को लेकर फजीहत का शिकार होने के बाद भी वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया के साथ आभा झा चौधरी को लेकर बकवासबाजी करते रहे, और विनय भाटिया उनकी बातों में रस लेते रहे । दोनों में से किसी को भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि वह जो हरकत कर रहे हैं - वह न सिर्फ रोटरी के उद्देश्यों/लक्ष्यों तथा रोटरी की भावना के खिलाफ है, बल्कि रोटरी के एक बड़े अभियान और डिस्ट्रिक्ट और अपनी ही टीम के एक बड़े पदाधिकारी; तथा इससे भी बढ़कर एक महिला की मेहनत और गरिमा के खिलाफ है । लोगों ने बार बार ऐसा महसूस किया है कि जैसे रवि चौधरी और विनय भाटिया जैसे लोगों ने रोटरी को लफंगई का एक अड्डा समझा हुआ है, जिसे 'वर्ल्ड पोलियो डे' के कार्यक्रम में उन्होंने एक बार फिर जाहिर किया । संजीव राय मेहरा जैसे वरिष्ठ और सुलझे हुए समझे जाने वाले रोटेरियन के रवैये ने लोगों को लेकिन और ज्यादा चौंकाया है । अपने ही क्लब की अत्यंत सक्रिय रोटेरियन आभा झा चौधरी का साथ देने की बजाये संजीव राय मेहरा जिस तरह से रवि चौधरी की करतूत को छिपाने के लिए आभा झा चौधरी पर दबाव बना रहे हैं, वह डिस्ट्रिक्ट 3011 के भावी माहौल के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं हैं ।

Sunday, January 25, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के विभाजित डिस्ट्रिक्ट्स में डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ साथ सरोज जोशी की जीत में चूँकि मंजीत साहनी-आशीष घोष-अमित जैन की जीत का संदेश मुखर होकर सामने आया है, इसलिए शरत जैन की जीत से मिलने वाला अरनेजा गिरोह का मजा किरकिरा हुआ

नई दिल्ली । रवि चौधरी की पराजय ने अरनेजा गिरोह के लिए शरत जैन की जीत के रंग को फीका कर दिया है । प्रसून चौधरी को जितवाने की अरनेजा गिरोह की कोशिशों को जो झटका लगा है, वह सुरेश भसीन के ऐन मौके पर अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के फैसले से भी बड़ा झटका साबित हुआ । उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के चुनाव में अरनेजा गिरोह इस ऐलान के साथ चुनावी मैदान में उतरा था कि वह दोनों डिस्ट्रिक्ट में अपनी सत्ता स्थापित करेगा । इस ऐलान को साधने के लिए उसने पहले शरत जैन, डॉक्टर सुब्रमणियन, सतीश सिंघल और रवि चौधरी को अपने उम्मीदवार के रूप में घोषित किया । अरनेजा गिरोह को पहला झटका तब लगा जब डॉक्टर सुब्रमणियन उनकी छाया से बाहर निकल गए । अरनेजा गिरोह को तब सुरेश भसीन की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा । डॉक्टर सुब्रमणियन ने अरनेजा गिरोह को छोड़ा, तो अरनेजा गिरोह ने सतीश सिंघल से पीछा छुड़ाया । सतीश सिंघल दरअसल कभी भी एक उम्मीदवार के रूप में व्यवहार करते हुए दिखे ही नहीं और 'हर तरह से' वह दूसरों के भरोसे ही थे । अरनेजा गिरोह ने भाँप लिया कि सतीश सिंघल के मुकाबले प्रसून चौधरी का पलड़ा भारी है, सो उसने प्रसून चौधरी की उम्मीदवारी की कमान सँभाल ली ।
'अपने' उम्मीदवारों की इस अदला-बदली के बाद भी अरनेजा गिरोह के नेताओं का ज्यादा ध्यान शरत जैन और रवि चौधरी की उम्मीदवारी पर था । सुरेश भसीन की उम्मीदवारी से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए सुरेश भसीन को उन्होंने बेसहारा ही छोड़ दिया । प्रसून चौधरी और सतीश सिंघल वाले चुनाव में उन्होंने मान लिया कि प्रसून चौधरी को उनकी मदद की ज्यादा जरूरत नहीं हैं और वह खुद ही सतीश सिंघल से निपट लेंगे । इसलिए अपनी दूसरी पंक्ति के नेताओं को प्रसून चौधरी के साथ लगा कर वह निश्चिंत हो गए । अरनेजा गिरोह ने अपना सारा दाँव शरत जैन और रवि चौधरी पर लगाया । इसमें भी शरत जैन उनकी प्राथमिकता में रहे । दरअसल शरत जैन को किसी भी तरह से चुनाव जितवाना उनकी व्यावहारिक राजनीतिक मजबूरी भी थी । रवि चौधरी की जीत से तो उनका सिर्फ राजनीतिक ऑरा (आभामंडल) ही बढ़ता, लेकिन शरत जैन की जीत से तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट पर राज करने का मौका मिलेगा । शरत जैन से ही उन्हें व्यावहारिक रूप में सत्ता का सुख मिलेगा, क्योंकि जेके गौड़ की तरह वह शरत जैन को ही कठपुतली बना कर रख सकेंगे ।
शरत जैन को चुनाव जितवाने की अरनेजा गिरोह की शुरू से ही जोरदार तैयारी थी, जो ऐन वोटिंग के मौके तक जारी रही । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना के ढीले-ढाले रवैये के चलते उनके लिए 'चुनावी बेईमानी' करना आसान हुआ और जोन बनाने के मामले में तथा नोमीनेटिंग कमेटी के लिए चयन करने की टाइमिंग व प्रक्रिया में मनमानी करते हुए उन्होंने शरत जैन की जीत के लिए माहौल तैयार किया और शरत जैन को जितवा लिया । सतीश सिंघल और प्रसून चौधरी के चुनाव में उनका आकलन और उनकी तैयारी हालाँकि फेल हो गई । अरनेजा गिरोह के साथ साथ दूसरे कई अन्य लोगों को भी सतीश सिंघल की जीतने की उम्मीद नहीं थी । चुनाव - प्रत्येक चुनाव दरअसल मैनेजमेंट के साथ साथ एक जुआँ भी होता है और किस्मत की बात भी होती है । मैनेजमेंट प्रसून चौधरी का अच्छा था, सतीश सिंघल तो चुनाव को जुएँ की तरह ले रहे थे । सतीश सिंघल की उम्मीदवारी और उसके नतीजे की तुलना फूलन देवी के चुनाव से ही की जा सकती है । फूलन देवी जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनी थीं, तो लोगों के बीच बनी उनकी नकारात्मक छवि के चलते किसी को भी उनके जीतने की उम्मीद नहीं थी । किंतु चूँकि किस्मत उनके साथ थी, इसलिए वह चुनाव जीत गईं । सतीश सिंघल के साथ भी ऐसा ही हुआ - लोगों के बीच, उनके अपने नजदीकियों तक के बीच उनकी नकारात्मक छवि होने के कारण किसी को उनके जीतने की उम्मीद नहीं थी; लेकिन जैसे किस्मत के भरोसे फूलन देवी उम्मीद न होने के बावजूद चुनाव में विजयी रही थीं, उसी तरह सतीश सिंघल भी उम्मीद न होने के बावजूद किस्मत के भरोसे चुनाव जीत गए ।
अरनेजा गिरोह को लेकिन रवि चौधरी की हार से ज्यादा बड़ा झटका लगा है । रवि चौधरी को चुनाव जितवा कर अरनेजा गिरोह डिस्ट्रिक्ट 3010 के विभाजन के बाद बने दोनों डिस्ट्रिक्ट में अपनी चौधराहट को साबित करने के जिस इंतजाम में लगा था, रवि चौधरी के मुकाबले सरोज जोशी को मिली जीत से दरअसल उसे झटका लगा है । रवि चौधरी को चुनाव जितवाने के लिए मुकेश अरनेजा के साथ साथ दीपक तलवार और डॉक्टर सुशील खुराना जोरशोर से लगे हुए थे; पर्दे के पीछे से विनोद बंसल भी मदद कर रहे थे - लेकिन फिर भी रवि चौधरी को नहीं जितवाया जा सका । अरनेजा गिरोह के लिए ज्यादा झटके की बात वास्तव में यह रही कि मंजीत साहनी के सहयोग से आशीष घोष और अमित जैन की जोड़ी से उन्हें हारना पड़ा । इस हार ने सीओएल के चुनाव में आशीष घोष के हाथों रमेश अग्रवाल को मिली हार के घाव को फिर से हरा कर दिया - वास्तव में इसलिए रवि चौधरी की हार ने अरनेजा गिरोह को ज्यादा दर्द दिया है । अरनेजा गिरोह के नेता लोग चूँकि चुनावी राजनीति के संदर्भ में मंजीत साहनी, आशीष घोष, अमित जैन की भूमिका को तवज्जो नहीं देते हैं, इसलिए बार बार उनसे हारने से उन्हें अपनी तौहीन होती हुई महसूस हो रही है । रवि चौधरी की हार और सरोज जोशी की जीत में चूँकि मंजीत साहनी-आशीष घोष-अमित जैन की जीत का संदेश मुखर होकर सामने आया है, इसलिए शरत जैन की जीत से मिलने वाला अरनेजा गिरोह का मजा किरकिरा हो गया है ।

Saturday, July 27, 2013

'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद 'बेचने' में लगे रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर पूछ रहे हैं कि रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ?

नई दिल्ली । दिल्ली में 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' का आयोजन करने का प्रस्ताव देने वाले रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को जब यह बताया गया कि डिस्ट्रिक्ट 3010 की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने उक्त इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और/या अशोक घोष का नाम प्रस्तावित किया है, तो पीटी प्रभाकर बुरी तरह बिफर गए और पूछने लगे कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात क्या है ? मंजीत साहनी ने जब यह सुना तो किंचित आश्चर्य के साथ उन्होंने कहा कि प्रभाकर को मेरी औकात तो पता है - तभी तो वह डायरेक्टर चुने जाने से पहले फोन पर मुझसे दिन में दो दो बार बात करता था, सलाह लेता था, मदद माँगता था, कभी 'इससे' तो कभी 'उससे' सिफारिश करवाता था; उसे मेरी औकात का पता है, तभी तो वह यह सब करता था । मंजीत साहनी को हैरानी इस बात पर हुई कि प्रभाकर यह सब इतनी जल्दी भूल गया और पूछ रहा है कि उनकी औकात क्या है ? रोटरी में हालाँकि यह आम चलन है - चुनाव जीतने के लिए तो हर किसी की बड़ी खुशामद की जाती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद हर किसी के प्रति नजरिया यह होता है कि तुम हो कौन ? इसलिए यदि पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी के प्रति यह रवैया प्रदर्शित किया है तो इसमें हैरान होने वाली भी कोई बात नहीं है । लेकिन यहाँ मामला अवसरवादी व्यवहार का नहीं है, बल्कि उससे भी ज्यादा गंभीर है ।
पीटी प्रभाकर की बातों से और उनके 'व्यवहार' से डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को 'बाद में' यह 'पता' चला की 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन का पद पीटी प्रभाकर बेचने की फ़िराक में हैं और शायद उन्हें ग्राहक मिल भी गया है । दरअसल इसीलिए पीटी प्रभाकर को जब डिस्ट्रिक्ट 3010 में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में इंस्टीट्यूट के चेयरमैन के रूप में मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम प्रस्तावित होने की सूचना मिली तो वह बुरी तरह उखड़ गए । उखड़ कर फिर उन्होंने अपना जो असली वाला रंग दिखाया तो उसमें निशाना भले ही उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व गवर्नर्स को, और खास कर मंजीत साहनी व अशोक घोष को बनाया लेकिन फजीहत अपनी ही कराई और रोटरी को बदनाम किया । उन्होंने जो कुछ भी कहा उसका लब्बोलुबाब यह है कि वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को बेचेंगे और जो उन्हें इसकी कीमत देगा उसे चेयरमैन बनायेंगे । उन्होंने दावा किया कि उन्हें ऐसा करने से कोई भी नहीं रोक सकता । इसी संदर्भ में उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष चेयरमैन पद की कीमत देने को तैयार हैं क्या ? पीटी प्रभाकर फिर औकात पता करने पर आ गए; उन्होंने पूछा कि मंजीत साहनी और अशोक घोष की कीमत देने की औकात है क्या ? इंटरनेशनल डायरेक्टर के पद पर बैठे व्यक्ति के मुँह से इस तरह की बातें जिसने भी सुनी वह हतप्रभ रह गया । मंजीत साहनी और अशोक घोष ने तुरंत ही यह स्पष्ट कर दिया कि रोटरी में उन्होंने कभी भी पद खरीदने की न तो कोई कोशिश की और न इस तरह की कोई बात उनके मन में कभी भी आई; उन्हें यहाँ जो कोई भी पद मिले हैं, उनकी काबिलियत के आधार पर ही मिले हैं । इन्होंने साफ कहा है कि पीटी प्रभाकर रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन का पद बेचना चाहते हैं, तो बेच लें - उनकी इसे खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है ।
उल्लेखनीय है कि पीटी प्रभाकर ने जो कुछ भी कहा है, उसके पीछे जो 'सोच' है उसे रोटरी में स्वीकार्यता प्राप्त है । उन्होंने कोई अनोखा काम करने की कोशिश नहीं की है । उनसे पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर रहे शेखर मेहता ने जब दो बार - पहली बार 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2011' में और दूसरी बार अभी हाल ही में हैदराबाद में आयोजित हुए 'रोटरी साउथ एशिया समिट 2013' में - चेयरमैन कमल सांघवी को बनाया था, तो उन्होंने वास्तव में चेयरमैन का पद 'बेचा' ही था । इसे लेकर शेखर मेहता को अपने डिस्ट्रिक्ट में और कमल सांघवी को अपने डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि विरोध भी झेलना पड़ा था - लेकिन शेखर मेहता और कमल सांघवी चूँकि होशियार लोग हैं इसलिए उन्होंने ज्यादा हील-हुज्जत में फंसे बिना डील कर ली थी । पीटी प्रभाकर ने अपनी मूरखता से सब गुड़-गोबर कर लिया । जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि पीटी प्रभाकर ने जो 'सोचा' और जो करने की कोशिश की, उसमें कुछ भी गलत नहीं है । क्लब्स में, डिस्ट्रिक्ट्स में और उसके ऊपर भी 'ऐसे' ही काम होते हैं - यह कहना ज्यादा सही होगा कि काम 'ऐसे' ही हो सकते हैं । पीटी प्रभाकर इसे ठीक तरह से अंजाम नहीं दे पाए और बुरी तरह एक्सपोज हो गए । इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए पीटी प्रभाकर की पसंद बने विनोद बंसल भी इस बात को या तो पहचान नहीं पाए और या पीटी प्रभाकर को कम्युनिकेट नहीं कर पाए कि उनके चेयरमैन बनने के मुद्दे पर उनके डिस्ट्रिक्ट में बबाल हो जायेगा - इसलिए अच्छा होगा कि इंस्टीट्यूट की मोटी-मोटी बातें तय होने से पहले डिस्ट्रिक्ट 3010 के लोगों को किसी भी स्तर पर शामिल ही न किया जाये ।
पीटी प्रभाकर और विनोद बंसल यह जानने/समझने में भी चूक कर बैठे कि जो खिचड़ी वह गुपचुप गुपचुप पका रहे हैं उसकी खुशबु लोगों तक जा पहुँची है और इस खिचड़ी को बिखेरने के लिए वह बस मौके का इंतजार कर रहे हैं । और यह मौका पीटी प्रभाकर ने खुद दे दिया । यह इससे साबित है कि पीटी प्रभाकर ने इंस्टीट्यूट के चेयरमैन को लेकर तो कोई बात ही नहीं की थी, उन्होंने तो दिल्ली के लोगों से दिल्ली में इंस्टीट्यूट करने को लेकर बात शुरू की थी - मौके का इंतजार कर रहे दिल्ली के भाई लोगों ने चेयरमैन का चुनाव ही कर डाला । विनोद बंसल के लिए इसे दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना के अलावा और क्या कहा जायेगा कि पर्दे के पीछे तो वह रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे थे, और पर्दे के सामने वह उस मीटिंग के हिस्सा थे जो मंजीत साहनी और या अशोक घोष को चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव पास कर रही थी । विनोद बंसल के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' को लेकर महत्वपूर्ण फैसले करने से पहले पीटी प्रभाकर को डिस्ट्रिक्ट 3010 में आना ही नहीं चाहिए था । यह सच है कि विनोद बंसल चेयरमैन हो जाते और फिर डिस्ट्रिक्ट 3010 में बात आती तो बबाल तब भी होता, लेकिन तब वह जल्दी शांत भी हो जाता । अब लेकिन मामला गंभीर हो गया है - पीटी प्रभाकर ने मंजीत साहनी और अशोक घोष की औकात की बात करके तथा चेयरमैन पद को बेचने की घोषणा करके मामले को कुछ ज्यादा पेजीदा बना दिया है ।
बहरहाल, चूँकि पीटी प्रभाकर ने यह दावा कर दिया है कि 'रोटरी इंस्टीट्यूट 2014' के चेयरमैन पद को बेचने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता - इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उक्त पद को कौन खरीदता है ? 

Friday, July 26, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने मंजीत साहनी को आगे करके विनोद बंसल की रोटरी इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनने की तैयारी में अड़चन पैदा की

नई  दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3010 में इन दिनों उस मशहूर हिंदी कहावत को चरितार्थ होते देखा जा सकता है जिसमें 'गाँव के बसने से पहले ही लुटेरों के सक्रिय होने' की बात कही गई है । हुआ यह है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर ने वर्ष 2014 में होने वाले रोटरी इंस्टीट्यूट को दिल्ली में आयोजित करने का प्रस्ताव रखा तो डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच उस इंस्टीट्यूट का चेयरमैन बनने को लेकर भयानक मारकाट मच गई । यह मारकाट इतने गंभीर रूप में चल रही है कि इसके चलते इंस्टीट्यूट के दिल्ली में होने का प्रस्ताव रद्द होने का खतरा तक पैदा हो गया है । उल्लेखनीय है कि क्लब्स के लोग इन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपने प्रोजेक्ट्स संबंधी कार्यक्रम में आमंत्रित करें, तो यह व्यस्तता का तर्क देकर बच निकलते हैं । डिस्ट्रिक्ट के इंटरसिटी सेमीनारों में न आने का इनके पास बड़ा ठोस बहाना होता है कि गवर्नर ने इन्हें तरीके से निमंत्रित ही नहीं किया, बस एक इमेल भेज दिया है । लेकिन प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बनने को लेकर छिड़ी लड़ाई में अपनी अपनी पोजीशन लेने की तैयारी को लेकर होने वाली मीटिंग्स के लिए इन्हें न तो किसी निमंत्रण के 'तरीके से' मिलने की जरूरत है और न इनके पास समय की कोई कमी है । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह हुई है कि प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर छिड़ी लड़ाई में अभी कुछ दिन पहले तक एक-दूसरे को अश्लील और अशालीन तरीके से निशाना बना रहे कुछेक पूर्व गवर्नर्स अब एक दूसरे से गलबहियाँ करते देखे जा हैं ।
इस संबंध में मुकेश अरनेजा, आशीष घोष और अमित जैन के बीच बनी निकटता ने लोगों का ध्यान खास तौर से खींचा है । उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा पिछले काफी समय से आशीष घोष और अमित जैन को तरह-तरह से निशाना बनाते हुए अपमानित करते रहे हैं । आशीष घोष को लेकर मुकेश अरनेजा ने जिस तरह की अश्लील और अशालीन किस्म की बातें की हैं, किसी सामान्य भले व्यक्ति के लिए तो उन बातों को कहना/सुनना भी मुश्किल होगा । अमित जैन के साथ तो मुकेश अरनेजा का ऐसा टकराव रहा कि अमित जैन के लिए मुकेश अरनेजा को अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाने की मजबूरी पैदा हो गई थी जिसके बदले में मुकेश अरनेजा ने अमित जैन के गवर्नर-काल को खराब करने का बीड़ा उठा लिया था । लेकिन अब, प्रस्तावित इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर छिड़ी लड़ाई में मुकेश अरनेजा की 'बातों' में आशीष घोष और अमित जैन को मजे लेते हुए देखा गया है । दरअसल, मुकेश अरनेजा की अश्लील और अशालीन किस्म की बातों में निशाने पर अब विनोद बंसल हैं - इसलिए इन्हें मजा आ रहा है । इन्हें मजा इसलिए भी आ रहा है क्योंकि अभी तक मुकेश अरनेजा की  बातों में निशाने पर जब ये होते थे तो विनोद बंसल मजा लेते थे । विनोद बंसल ने यह समझने की दरअसल कोई कोशिश ही नहीं की कि जो मुकेश अरनेजा अभी आशीष घोष और अमित जैन को निशाना बना रहे हैं, कल वही मुकेश अरनेजा उन्हें निशाना बनाने से नहीं चूकेंगे ।
मुकेश अरनेजा ने विनोद बंसल को आजकल इसलिए निशाने पर लिया हुआ है, क्योंकि दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए पीटी प्रभाकर की पसंद के रूप में उन्हें विनोद बंसल का नाम सुनाई दिया । मुकेश अरनेजा ने यह भाँपने में कोई देर नहीं की कि पूर्व गवर्नर्स के बीच राजनीति करने का उन्हें यह सुनहरा मौका मिला है । उन्होंने समझ लिया कि अलग-अलग तरीके से वह लोगों को उकसायेंगे तो विनोद बंसल को चेयरमैन बनाने का विरोध करने के लिए हर कोई तैयार हो जायेगा । मुकेश अरनेजा ने गणित यह लगाया कि पिछले छह-आठ वर्ष में बने गवर्नर निजी खुन्नस, ईर्ष्या और या निजी महत्वाकांक्षा के चलते विनोद बंसल के खिलाफ किये जा सकते हैं और पुराने गवर्नर्स को वरिष्ठता का नारा देकर विनोद बंसल के खिलाफ किया जा सकता है । दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद के लिए मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम उछाल कर मुकेश अरनेजा ने पहले तो काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में स्थितियों को विनोद बंसल के लिए प्रतिकूल बना दिया और फिर अपनी आदत के अनुसार चटखारेदार बातों के जरिये विनोद बंसल को निशाने पर ले कर मजाक का विषय बना दिया । इस तरह, आशीष घोष और अमित जैन को भी मुकेश अरनेजा की बातों में मजे लेने का मौका बहुत समय बाद मिला ।
मुकेश अरनेजा लोगों को रस ले ले कर बता रहे हैं कि दिल्ली में प्रस्तावित रोटरी इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद की लड़ाई में किस तरह सुशील गुप्ता भी विनोद बंसल के काम नहीं आ पाये । लोगों को यह बात बताना मुकेश अरनेजा को इसलिए जरूरी लगा क्योंकि मुकेश अरनेजा को इस बात से भी बड़ी चिढ़ रही कि विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुशील गुप्ता को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दे रहे हैं । मुकेश अरनेजा ने लोगों को जो बताया उसके अनुसार, काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में सुशील गुप्ता ने एक बार यह तर्क जरूर दिया कि इंस्टीट्यूट के चेयरमैन को चुनने का अधिकार तो इंटरनेशनल डायरेक्टर को मिलना ही चाहिए । लेकिन बाकी लोगों ने जब यह तर्क दिया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर को यह अधिकार मिलना तो जरूर चाहिए, लेकिन इंस्टीट्यूट की व्यवस्था अच्छे से हो सके इसके लिए क्या यह उचित नहीं होगा कि वह चेयरमैन का चुनाव दूसरों से सलाह करके करे - तो सुशील गुप्ता को चुप रह जाना पड़ा । दिल्ली में अगले रोटरी वर्ष में, यानि संजय खन्ना के गवर्नर-काल में रोटरी इंस्टीट्यूट की बात अभी सिर्फ प्रस्ताव के स्तर पर है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3010 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इंस्टीट्यूट के चेयरमैन पद को लेकर आपस में भिड़ गए हैं । इंस्टीट्यूट के प्रभारी के रूप में पीटी प्रभाकर ने विनोद बंसल को चेयरमैन बनाने की तैयारी की, तो डिस्ट्रिक्ट के सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनके खिलाफ लामबंद हो गए; मंजीत साहनी और अशोक घोष का नाम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में आया जरूर, लेकिन किसी एक नाम पर सहमति नहीं हो पाई - सहमति बनाने की कोशिश भी दरअसल नहीं हुई और इसलिए नहीं हुई क्योंकि इनके नाम ऐसे लोगों ने दिए जो इनके घोर विरोधी के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं । समझा जाता है कि इनके नाम तो विनोद बंसल के खिलाफ माहौल बनाने के उद्देश्य से लिया गया है - चेयरमैन चुनने का जब सचमुच का वक्त आयेगा तो कुछेक लोग अपना नाम आगे कर सकते हैं । चेयरमैन पद को लेकर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग होने के बाद भी जिस तरह की हलचल है और छोटे-छोटे समूहों में गुपचुप गुपचुप बातचीतें हो रही हैं उससे यही आभास मिल रहा है कि इंस्टीट्यूट - जिसके दिल्ली में होने का सिर्फ प्रस्ताव भर है, अभी यह तय नहीं हुआ है कि वह दिल्ली में होगा भी या नहीं - के चेयरमैन पद को लेकर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तलवारें लिए घूम रहे हैं, इस बात की परवाह किये बिना कि उनकी यह तलवारें इंस्टीट्यूट के दिल्ली में होने की संभावना को ही काटने का काम करेंगी ।

Thursday, December 27, 2012

विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा के जरिये मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से 'बाहर' करने की रणनीति बनाई

नई दिल्ली । मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से बाहर रखने के लिए रंजन ढींगरा को आगे करने की जो चाल विनोद बंसल ने चली है, उसके कारण उक्त नोमीनेटिंग कमेटी का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में मंजीत साहनी को पहले कोई रूचि नहीं थी, लेकिन फिर अचानक से उन्हें इस चुनाव की होड़ में शामिल देखा जाने लगा । माना/समझा गया कि उन्हें ऊपर के नेताओं से इसके लिए इशारा और समर्थन का भरोसा मिला होगा । यही मानने/समझने के चलते नोमीनेटिंग कमेटी के लिए मंजीत साहनी की उम्मीदवारी को गंभीरता के साथ देखा/पहचाना जाने लगा । चुनावी राजनीति के समीकरणों को समझने/पहचानने वाले लोगों ने भी मान लिया कि मंजीत साहनी उम्मीदवार हुए तो चुनावबाज मुकेश अरनेजा भी उम्मीदवार बने रहने का दम नहीं बनाये रख पायेंगे और मंजीत साहनी निर्विरोध ही चुन लिए जायेंगे । लेकिन विनोद बंसल के एक 'राजनीतिक' स्ट्रोक ने इस संभावना के घुर्रे उड़ा दिए हैं ।
मंजीत साहनी के निर्विरोध चुने जाने की संभावना में रूकावट पैदा करने के उद्देश्य से विनोद बंसल ने बड़ी होशियारी से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए रंजन ढींगरा की वकालत शुरू कर दी । विनोद बंसल की होशियारी यह रही कि उन्होंने भाँप लिया कि वह यदि मंजीत साहनी की उम्मीदवारी का सिर्फ विरोध करेंगे तो उनकी बात कोई नहीं सुनेगा और वह सफल नहीं होंगे, और कि वह रंजन ढींगरा को आगे करके ही मंजीत साहनी का 'शिकार' कर सकते हैं । इसी समझ के साथ, विनोद बंसल ने काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों में मंजीत साहनी के विरोधियों की पहचान करते हुए चर्चा चलाई कि मंजीत साहनी का समर्थन करने को लेकर कुछेक लोगों को ऐतराज है, इसलिए उनके नाम पर सहमति बनना मुश्किल है; लेकिन रंजन ढींगरा के नाम पर सहमति बनाई जा सकती है । विनोद बंसल ने तर्क दिया कि रंजन ढींगरा चूँकि पिछली बार नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बार उन्हें चुन लिए जाने पर सहमति बनाई जा सकती है । मजे की बात यहाँ यह है कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के प्रति सहमति बनाये जाने की कोई वकालत या कोशिश विनोद बंसल ने उस समय तक बिलकुल भी नहीं की थी, जब तक कि मंजीत साहनी ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की थी । उस समय तो वह रंजन ढींगरा के लिए समर्थन जुटने/जुटाने की मुश्किलों का ही विवरण दिया करते थे । लेकिन अब वह रंजन ढींगरा के बड़े समर्थक बन गए हैं ।
रंजन ढींगरा को आगे करके मंजीत साहनी को 'बाहर' करने की विनोद बंसल की तरकीब के पीछे कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की मदद करने की रणनीति भी दिख रही है । मुकेश अरनेजा के प्रति विनोद बंसल का समर्थन-भाव राजेश बत्रा के कारण मुसीबत में है । राजेश बत्रा को मुकेश अरनेजा फूटी आँख भी नहीं भाते हैं । मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल के संबधों को लेकर राजेश बत्रा विभिन्न तरीकों से अपनी नाराजगी जता चुके हैं । राजेश बत्रा के रवैये को देख कर विनोद बंसल ने मुकेश अरनेजा को लेकर थोड़ा सावधानी रखना तो शुरू किया है, लेकिन रंजन ढींगरा का नाम लेकर उन्होंने जो राजनीति शुरू की है - उसके पीछे उनकी राजेश बत्रा को धोखे में रख कर मुकेश अरनेजा का काम आसान करने की तरकीब को देखा/पहचाना जा रहा है । तरकीब यह कि मंजीत साहनी और रंजन ढींगरा मुकाबले में रहेंगे तो मुकेश अरनेजा के विरोधियों में फूट पड़ेगी और उसका फायदा स्वाभाविक रूप से मुकेश अरनेजा को मिलेगा ।
विनोद बंसल की इस राजनीति की बात लोगों को चूंकि अशोक अग्रवाल के मुँह से सुनने को मिल रही है, इसलिए भी विनोद बंसल की इस राजनीति के पीछे मुकेश अरनेजा की मदद को देखा/पहचाना जा रहा है । जेके गौड़ को प्राप्त हुई चुनावी जीत के बाद से अशोक अग्रवाल को 'सुपर गवर्नर' के अवतार में देखा जा रहा है और वह लगातार मंजीत साहनी तथा अमित जैन को निशाना बना रहे हैं और उनके बारे में गाली-गलौजपूर्ण अपशब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हुए लोगों को बता रहे हैं कि मंजीत साहनी का ईलाज तो विनोद बंसल करेंगे । अशोक अग्रवाल के अनुसार ही विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा रूपी इंजेक्शन से मंजीत साहनी का ईलाज शुरू भी कर दिया है । मंजीत साहनी से अशोक अग्रवाल की नाराजगी इस बात को लेकर है क्योंकि मंजीत साहनी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव में जेके गौड़ की बजाये सुधीर मंगला का साथ दिया । मंजीत साहनी के रवैये का हो सकता है कि जेके गौड़ को भी बुरा लगा हो, लेकिन जेके गौड़ अपनी बड़ी हो गई जिम्मेदारी को समझते हुए अब सभी का साथ लेने की जरूरत को समझते हुए चुप हैं; लेकिन अशोक अग्रवाल आपे से बाहर दिख रहे हैं । विनोद बंसल की भी मंजीत साहनी से कुछ पुरानी खटपट है - लिहाजा उन्होंने रंजन ढींगरा के कंधे का सहारा लेकर मंजीत साहनी को निशाने पर लिया तो अशोक अग्रवाल को भी मंजीत साहनी के खिलाफ भड़ास निकालने का मौका मिल गया है । अशोक अग्रवाल की भड़ास ने लेकिन विनोद बंसल की राजनीति को सबके सामने ला दिया है ।

Tuesday, December 18, 2012

सुरेश जैन के यह स्वीकार करने के साथ ही कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है, जेके गौड़ की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की चुनावी जीत का रास्ता साफ हुआ

नई दिल्ली । सुरेश जैन के सुधीर मंगला को मिले समर्थन की सच्चाई को जान/समझ लेने के साथ ही वह हुआ जिसकी तथ्यपूर्ण ठोस संभावना 'रचनात्मक संकल्प' में लगातार व्यक्त की जाती रही थी । उल्लेखनीय है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश जैन को सुधीर मंगला के समर्थन में उस समय से बताया/देखा/पहचाना जा रहा था जिस समय में, बाद में सुधीर मंगला के समर्थन में आये नेता लोग सुधीर मंगला को चुनावी दौड़ में कहीं भी नहीं देख/पहचान रहे थे । सुधीर मंगला जब चुनावी दौड़ में शामिल होते हुए-से दिखे तब तीन सदस्यीय चुनावी कमेटी के एक सदस्य होने के नाते से सुरेश जैन की सुधीर मंगला के प्रति समर्थन की बात खासी महत्वपूर्ण हो उठी । सुरेश जैन की भूमिका तब और महत्वपूर्ण हो गई जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद का चुनाव डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स के दो खेमों के झगड़े में बदलता हुआ दिखा । गौर करने की बात है कि पिछले कुछ दिनों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव के बहाने से पूर्व गवर्नर नेताओं ने अपनी-अपनी पोजीशन ले ली थी - रंग बदलने में गिरगिट को भी मात देने वाले मुकेश अरनेजा और मुहावरे की भाषा में 'थूक कर चाटने वाले' रमेश अग्रवाल ने जैसे ही जेके गौड़ की चुनावी स्थिति को मजबूत पाया, जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा लपक लिया । डिस्ट्रिक्ट में बनी मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की बदनामी का फायदा उठाने के उद्देश्य से मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का झंडा थाम लिया । मुकेश अरनेजा और मंजीत साहनी की इस पोजीशनिंग ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव की रिहर्सल में बदल दिया । मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास की एंट्री ने इस रिहर्सल को और व्यापक बना दिया । यश पाल दास की एंट्री के बाद, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के दूसरे खिलाड़ियों के लिए डिस्ट्रिक्ट 3010 की चुनावी राजनीति से दूर 'दिखना' मुश्किल हो गया और फिर वह भी इस लड़ाई में कूद पड़े ।
पिछले दो-तीन दिनों में तेजी से घटे घटना चक्र में पहले तो यह माहौल बनता हुआ नजर आया कि यश पाल दास डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव के झगड़े को सुलटायेंगे, लेकिन फिर जल्दी ही दूसरे इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता का नजरिया सुनने को मिला कि रोटरी के बड़े नेताओं को इस तरह के झगड़ों में पार्टी नहीं बनना चाहिए । शेखर मेहता के इस नजरिये के साथ पार्टी बनने की खबर मिलते ही यश पाल दास ने अपने बढ़े हुए क़दमों को पीछे खींच लिया । शेखर मेहता के इस नजरिये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव को झगड़े में फँसाने की कोशिश करने वाले लोगों को तगड़ा झटका दिया और वह एकदम से शांत हो गए । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की आड़ में राजनीति करने का जुगाड़ देखने वाले नेताओं के लिए सच्चाई को अनदेखा करना संभव नहीं रह गया । रिकॉर्ड पर जो चीजें थीं उन्हें देख/जान कर सुधीर मंगला के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले सुरेश जैन ने भी समझ लिया कि सुधीर मंगला उतना समर्थन सचमुच नहीं जुटा सके हैं, जितने समर्थन की जरूरत थी - और तब उन्होंने भी जेके गौड़ की चुनावी जीत की घोषणा पर मुहर लगाने में देर नहीं की ।
'रचनात्मक संकल्प' में लगातार कहा जाता रहा है कि सुधीर मंगला को अपने तथाकथित समर्थक नेताओं का ही समर्थन नहीं मिला । मंजीत साहनी का ही उदहारण लें - तो हर कोई मानता और जानता है कि मंजीत साहनी यदि सचमुच सुधीर मंगला की मदद करना चाहते तो वह पाँच-छह क्लब्स का समर्थन तो आराम से दिलवा सकते थे, लेकिन उन्होंने अंतिम समय तक जिस तरह से असमंजस बनाये रखा - उससे साफ हुआ कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का झंडा थामने के बावजूद उनका उद्देश्य सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के लिए कुछ करना नहीं था; वह तो बस अपने आप को एक खेमे का नेता दिखाना चाहते थे । समर्थन और सहयोग जेके गौड़ को भी अपने तथाकथित समर्थक नेताओं से नहीं मिला । जेके गौड़ की चुनावी जीत का श्रेय लेने की होड़ में आगे दिखने की कोशिश करने वाले मुकेश अरनेजा के बारे में कौन नहीं जानता कि जेके गौड़ की उम्मीदवारी को रोकने के लिए मुकेश अरनेजा ने ही आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करवाया था और जेके गौड़ को हतोत्साहित करने के उद्देश्य  से आलोक गुप्ता के गले में बाहें डाल कर लोगों के सामने घूमा करते थे । सिर्फ इतना ही नहीं, नोमीनेटिंग कमेटी का फैसला होने से ठीक एक दिन पहले ही मुकेश अरनेजा ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हरीश मल्होत्रा से डॉक्टर सुब्रा के समर्थन में फैसला करवाने को लेकर बात की थी । लेकिन जब नोमीनेटिंग कमेटी में जेके गौड़ का पलड़ा भारी दिखा तो मुकेश अरनेजा ने यह सूँघने में देर नहीं की कि जेके गौड़ के साथ होने में ही फायदा है ।
इस बार के चुनाव से एक बार फिर साबित हुआ है कि चुनाव में नेता लोग काम नहीं आते - जितना आते भी हैं मजबूरी में ही आते हैं; काम अपनी ही सक्रियता और अपना ही व्यवहार आता है । जेके गौड़ की चुनावी जीत उनकी अपनी सक्रियता, उनके अपने व्यवहार और चुनावी समीकरणों को अपने अनुकूल करने की उनकी अपनी तत्परतापूर्ण पहल का ही नतीजा है । जेके गौड़ की उम्मीदवारी को लेकर हर छोटा-बड़ा नेता जिस तरह की बातें करता रहा है, उन्हें याद करते और ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि जेके गौड़ की चुनावी जीत ने बड़बौले नेताओं को बौना साबित किया है ।

Monday, December 10, 2012

मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला के रवैये पर हैरानी व्यक्त की और साफ कहा कि सुधीर मंगला को अपनी 'राजनीति' में उनका नाम बदनाम नहीं करना चाहिए

नई दिल्ली । मंजीत साहनी को लेकर सुधीर मंगला ने जो 'राजनीति' की वह मंजीत साहनी के स्पष्टीकरण के कारण सुधीर मंगला को उल्टी पड़ गई है । उल्लेखनीय है कि मंजीत साहनी के लिए तब बड़ी अजीब स्थिति पैदा हो गई जब उन्हें दूसरों से सुनने को मिला कि सुधीर मंगला प्रचारित कर रहे हैं कि उन्होंने अपने क्लब का समर्थन सुधीर मंगला को दिलवा दिया है । मंजीत साहनी को कई लोगों के फोन आये कि सुधीर मंगला का यह दावा क्या सच है ? मंजीत साहनी ने हर किसी से यही कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि सुधीर मंगला इस तरह का दावा कर रहे हैं । दूसरों के साथ-साथ मंजीत साहनी के लिए भी हैरानी की बात यह थी कि सुधीर मंगला अपनी राजनीती में उनका नाम क्यों बदनाम कर रहे हैं ? आश्चर्य और हैरानी के बीच मंजीत साहनी ने जो कहा उससे स्पष्ट हुआ कि मंजीत साहनी द्धारा अपने क्लब का समर्थन सुधीर मंगला को दिलवाने की बात सफ़ेद झूठ है । मंजीत साहनी ने बताया कि वह चूंकि लगातार बाहर रहे हैं, इसलिए अपने क्लब की गतिविधियों से ज्यादा परिचित नहीं हैं; लेकिन उन्हें इतना अवश्य पता है कि क्लब के बोर्ड ने चुनाव को लेकर फैसला करने का अधिकार क्लब के अध्यक्ष को दे दिया है और ऐन मौके पर अध्यक्ष जो ठीक समझेंगे, वह फैसला करेंगे ।
मंजीत साहनी ने हालाँकि यह बताने/जताने में कोई परहेज नहीं किया कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति उनकी शुरू से ही सहानुभूति थी और इस बात को उन्होंने हमेशा ही स्पष्ट रूप से लोगों से कहा/बताया है । उन्होंने यहाँ तक कहा/बताया कि सुधीर मंगला के साथ उनके वर्षों पुराने संबंध हैं और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में भी उन्हें सुधीर मंगला का सहयोग और समर्थन मिलता रहा है - इसलिए उनकी सहानुभूति सुधीर मंगला के प्रति होना स्वाभाविक ही है । लेकिन इसके साथ ही मंजीत साहनी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि चूंकि उनके क्लब की यह परंपरा रही है कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने का समर्थन वह नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि इस वर्ष के क्लब के पदाधिकारी भी इस परंपरा का पालन करेंगे । मंजीत साहनी जानते हैं कि उनके क्लब का फैसला रोटरी में उनकी अपनी साख और प्रतिष्ठा पर भी असर डालेगा तथा उनकी 'राजनीति' पर भी - इसलिए वह संभल कर ही फैसला करना चाहते हैं । संभल कर फैसला करने का एक पेंच यह भी है कि उनके क्लब में जिस तरह फैसला करने का अधिकार अध्यक्ष को दे दिया गया है, और अध्यक्ष मनमाने तरीके से फैसला करे - जिसे तकनीकी आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निरस्त कर दे, तब क्लब की तो चलिए जाने दीजिये - मंजीत साहनी की साख और प्रतिष्ठा के लिए तो यह एक बड़ा आघात होगा ।
मंजीत साहनी के क्लब के ही कई लोगों का कहना है कि मंजीत साहनी अपने लिए - या क्लब उनकी साख का ध्यान रखते हुए यह 'खतरा' क्यों उठाये ? क्या मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को अपने तईं कोई मुद्दा बनाया हुआ है ? यह सच है कि वर्षों के संबंधों के चलते मंजीत साहनी के मन में सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रहा है - कुछ लोग उनके इस 'भाव' को हालाँकि विनोद बंसल के प्रति उनकी नाराजगी 'दिखाने' के रूप में भी देखते/पहचानते हैं । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल द्धारा की जा रही अपनी उपेक्षा से मंजीत साहनी काफी आहत हैं; और चूँकि वह जानते हैं कि विनोद बंसल का विरोध सुधीर मंगला की उम्मीदवारी से है; इसलिए विनोद बंसल के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट करने के लिए ही उन्होंने अपने आप को सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के साथ खड़ा दिखाना शुरू किया । यहाँ इस बात पर गौर करना महत्वपूर्ण है कि मंजीत साहनी ने चाहे किसी भी कारण से सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की हो - लेकिन वह सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय कभी भी नहीं नज़र आये हैं । जेके गौड़ की उम्मीदवारी के खिलाफ खड़े दिखने से बचने की भी उन्होंने हर संभव कोशिश की है ।
जेके गौड़ ने दरअसल उनके साथ रोटरी का काफी काम किया है, जिसके लिए मंजीत साहनी कई कई बार सार्वजानिक रूप से जेके गौड़ की प्रशंसा करते रहे हैं । सुधीर मंगला उनके साथ रोटरी का कोई काम करते हुए तो कभी दिखाई नहीं दिए हैं । ऐसे में मंजीत साहनी के लिए यह फैसला करना सचमुच चुनौतीपूर्ण बना कि वह रोटरी के काम में मिले सहयोग को तरजीह दें या व्यक्तिगत संबधों को ? मंजीत साहनी ने - अभी तक तो - दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने का अद्भुत कौशल दिखाया है : सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाने में उन्होंने कोई परहेज नहीं किया, लेकिन साथ ही जेके गौड़ की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम भी उन्होंने नहीं किया है । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव होने के बावजूद उन्होंने सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने की उन्होंने कहीं कोई कोशिश नहीं की है ।
इसीलिये मंजीत साहनी ने जब सुना कि सुधीर मंगला लोगों के बीच दावा कर रहे हैं कि मंजीत साहनी ने अपने क्लब का समर्थन उन्हें दिलवा दिया है, तब मंजीत साहनी ने सुधीर मंगला के रवैये पर आश्चर्य और हैरानी व्यक्त की और साफ कहा कि सुधीर मंगला को अपनी 'राजनीति' में उनका नाम बदनाम नहीं करना चाहिए । लोगों को दिए मंजीत साहनी के इस जबाव ने सुधीर मंगला की तिकड़मों को तगड़ा झटका दिया है । सुधीर मंगला ने सोचा तो यह होगा कि वह मंजीत साहनी का नाम लेकर इस तरह की बात कहेंगे तो उन्हें दूसरे क्लब्स का समर्थन जुटाने में आसानी होगी - लेकिन मंजीत साहनी के दो-टूक जबाव ने सब गड़बड़ कर दिया; और सुधीर मंगला की राजनीतिक चाल को न सिर्फ फेल कर दिया बल्कि सुधीर मंगला का ही नुकसान करवा दिया । इस तरह सुधीर मंगला को अपनी ही होशियारी भारी पड़ी है ।