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Friday, September 25, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट अशोक अग्रवाल के दाँव-पेचों ने मुकेश अरनेजा व जेके गौड़ के बीच जो लड़ाई छिड़वाई है, उसमें अशोक अग्रवाल का खुद का गवर्नर-वर्ष ही फजीहत का शिकार बनता नजर आ रहा है

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा और जेके गौड़ की तू तू मैं मैं ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट अशोक अग्रवाल की मुसीबतों को खासा बढ़ा दिया है । विडंबना और मजे की बात यह है कि मुसीबतों को बढ़ाने का काम खुद अशोक अग्रवाल ने ही किया है; इसी बिना पर उनके नजदीकियों को भी लग रहा है कि अशोक अग्रवाल ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । दरअसल जेके गौड़ के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए जमा हुई रकम में हेराफेरी के आरोपों की जाँच के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता द्वारा गठित की गई स्टुअर्डशिप कमेटी को भंग करने की माँग करते हुए जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को जिस तरह से निशाना बनाया है, उसके पीछे अशोक अग्रवाल का ही 'दिमाग' देखा/बताया जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि जेके गौड़ ने जो मेल 'भेजी' है, उसे 'लिखा' पूर्व गवर्नर शरत जैन ने है - और शरत जैन से लिखवाने का आईडिया अशोक अग्रवाल का था । असल में, अशोक अग्रवाल की मुकेश अरनेजा के साथ ज्यादा खुन्नस है । अशोक अग्रवाल को उम्मीद थी कि शरत जैन विस्तार से मुकेश अरनेजा की पोल खोलेंगे, तो मुकेश अरनेजा दबाव में आयेंगे और चुप बैठेंगे । अशोक अग्रवाल लेकिन सामाजिक व्यवहार का वह सिद्धांत पूरी तरह भुला बैठे कि 'जो लोग खुद शीशे के घरों में रहते हैं, उन्हें दूसरों के ऊपर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए ।' मुकेश अरनेजा के जबावी हमले ने लेकिन मामले का रुख ही बदल दिया है, और जेके गौड़ को कई तरह से बेईमानियों के आरोपों के साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है ।
मुकेश अरनेजा ने जबावी हमले में भले ही जेके गौड़ को घेरा है, लेकिन उनके निशाने पर अशोक अग्रवाल भी रहे । उल्लेखनीय है कि रोटरी वरदान ब्लड बैंक के प्रोजेक्ट में 45 लाख रूपये डकारने की कोशिश करने का जो आरोप मुकेश अरनेजा ने लगाया है, उसमें जेके गौड़ के 'पार्टनर इन क्राइम' अशोक अग्रवाल ही थे । इस तरह, उस मामले को एकबार फिर हवा देकर मुकेश अरनेजा ने अशोक अग्रवाल को लेकर लोगों के बीच संशय पैदा कर दिया है । अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष के क्लब्स-प्रेसीडेंट रोटरी वरदान ब्लड बैंक में 45 लाख रुपयों की घपलेबाजी की कोशिशों और उसमें जेके गौड़ तथा अशोक अग्रवाल की मिलीभगत की बात को जानते भी नहीं होंगे, लेकिन मुकेश अरनेजा ने उन्हें उक्त मामले से परिचित करवाने का काम कर दिया - और इस तरह अशोक अग्रवाल गवर्नर बनने से दस महीने पहले ही 'अपने' प्रेसीडेंट्स के बीच 'बेईमान' होने की पहचान पा बैठे हैं । ऐसे में, अशोक अग्रवाल के सामने यह तय करने की चुनौती पैदा हो गई है कि उनके प्रयासों से मुकेश अरनेजा व जेके गौड़ के बीच 'छिड़ी' लड़ाई को वह और भड़काने का काम करें, या उसे ठंडा करने के लिए प्रयास करें ? इनके बीच की लड़ाई असल में सिर्फ इन दोनों के बीच की ही लड़ाई नहीं है, बल्कि इसमें कई लड़ाईयाँ गुँथी हुई हैं - इसलिए इस लड़ाई का निपटारा होना आसान भी नहीं है । निपटारा न होने की स्थिति में और लोग तो अपनी अपनी खुन्नस निकालेंगे और मजे लेंगे, लेकिन नुकसान अशोक अग्रवाल को उठाना पड़ेगा ।

डिस्ट्रिक्ट ग्रांट अकाउंट को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता के पास जाने से रोकने के लिए डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) के रूप में जेके गौड़ ने हस्ताक्षर करने से इंकार करने का जो रवैया अपनाया हुआ है, उसे दीपक गुप्ता व शरत जैन व ललित खन्ना के साथ-साथ अशोक अग्रवाल ने भी समर्थन भले ही दिया हुआ हो - लेकिन हर कोई समझ रहा है कि यह रवैया यदि जारी रहा तो यह आलोक गुप्ता के साथ-साथ अशोक अग्रवाल को भी अपनी चपेट में लेगा - और यह अनोखा मामला होगा, जिसमें अशोक अग्रवाल अपने आपको मुसीबत में फँसाते हुए देखे जा रहे होंगे । जेके गौड़, शरत जैन, अशोक अग्रवाल, ललित खन्ना की चौकड़ी अपने रवैये से डीडीएफ के मामले में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को पहले ही तगड़ा नुकसान पहुँचा चुकी है; इनका रवैया अब अशोक अग्रवाल को मुसीबत में फँसाता नजर आ रहा है । आरोप है कि जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की जोड़ी ने दीपक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में अपने क्लब के प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट के रूप में मोटी रकम ऐंठने के लिए दीपक गुप्ता को डीडीएफ का पैसा अपने निजी अकाउंट से देने के लिए राजी किया, और फिर दीपक गुप्ता की मदद करने के नाम पर मामले को वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ दीपक गुप्ता की मोटी रकम फँसती दिख रही है । इससे जाहिर है कि जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल के दाँवपेंचों ने अभी तक उन्हें ही फजीहत का शिकार बनाया है, और इसीलिए लग रहा है कि उनकी हरकतें कहीं अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष को भी चपेट में न ले लें । मुकेश अरनेजा और जेके गौड़ के बीच शुरू हुई तू तू मैं मैं में यह खतरा नजर भी आ रहा है । 

Saturday, September 19, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ पर लगे बेईमानी के आरोपों के चलते शुरू हुई तू तू मैं मैं में जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा को गवर्नर्स को बेफालतू की मुसीबतों में फँसाने का 'आदी' बताया, तो मुकेश अरनेजा ने जेके गौड़ के निजी जीवन के 'रसीले' किस्सों को सामने लाने की धमकी दी है

गाजियाबाद । पूर्व गवर्नर जेके गौड़ के कार्यकाल में रोटरी फाउंडेशन के लिए जमा हुई रकम में हेराफेरी के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा के आरोपों की जाँच के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता द्वारा गठित की गई स्टुअर्डशिप कमेटी को भंग करने की माँग करते हुए जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा के खिलाफ जो जहर उगला है, उसने पूर्व गवर्नर्स के बीच खासी हलचल मचा दी है । जबाव में मुकेश अरनेजा ने भी जेके गौड़ के चरित्र को लांछित करने के जो तेवर अपनाए हैं, उससे लगता है कि इन दोनों के बीच शुरू हुई यह तू तू मैं मैं अभी और घटिया दृश्य दिखायेगी । मुकेश अरनेजा के आरोपों से बौखला कर जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा पर आरोप लगाया है कि वह झूठे और ओछे आरोप लगा कर गवर्नर्स को परेशान करने के 'आदी' रहे हैं । जेके गौड़ के इस आरोप पर मुकेश अरनेजा ने उन्हें 'हद में रहने' की नसीहत देते हुए चेताया है कि उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके निजी जीवन के 'रसीले' किस्सों पर किताब लिखी जा सकती है । मुकेश अरनेजा की इस धमकी ने मामले को संगीन तो बना ही दिया है, साथ ही जेके गौड़ को वह महान सुझाव भी याद दिला दिया होगा जिसमें कहा गया है कि 'दोस्तों के साथ झगड़ा नहीं करना चाहिए । यदि हो भी जाये, तो उसे खत्म करने की कोशिश करना चाहिए, न कि उसे बढ़ाना चाहिए । यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि कमीनों को तुम्हारे सारे राज पता होते हैं ।' 
मुकेश अरनेजा का आरोप है कि जेके गौड़ ने अपने गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए उनके तथा अन्य कई रोटेरियंस द्वारा दी गई रकम के बदले में उन्हें प्वाइंट्स देने/दिलवाने की बजाये, अपने नजदीकियों को प्वाइंट्स दिलवा कर फर्जी तरीके से मेजर डोनर बनाया/बनवाया है । जेके गौड़ के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए जमा हुई रकम में गड़बड़घोटाले के आरोपों की जाँच के लिए मुकेश अरनेजा ने रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी गुलाम वाहनवती को ईमेल-पत्र लिखा था, जिसका जबाव देते हुए गुलाम वाहनवती ने उक्त आरोपों की जाँच डिस्ट्रिक्ट की स्टुअर्डशिप कमेटी से कराने के लिए कहा । गुलाम वाहनवती के सुझाव पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आलोक गुप्ता ने उक्त आरोपों की जाँच के लिए स्टुअर्डशिप कमेटी का गठन कर दिया । आलोक गुप्ता के इस फैसले का विरोध करते हुए जेके गौड़ ने तर्क दिया कि उनके कार्यकाल के अकाउंट्स पास हो चुके हैं, इसलिए स्टुअर्डशिप कमेटी को उनके कार्यकाल के हिसाब-किताब की जाँच करने का कोई अधिकार नहीं है । जेके गौड़ अपने ऊपर लगे घपलेबाजी के आरोपों की जाँच के लिए स्टुअर्डशिप कमेटी के गठन की कार्रवाई से इस कदर बौखला उठे कि उन्होंने मुकेश अरनेजा पर आरोपों की झड़ी लगा दी, और जिसके बाद मामला जेके गौड़ तथा मुकेश अरनेजा के बीच गंभीर किस्म के आरोपों तथा तू तू मैं मैं में बदल गया है ।

जेके गौड़ की बौखलाहट ने जेके गौड़ की स्थिति को संदेहास्पद बना दिया है, और उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है । जिन लोगों को उनसे हमदर्दी है भी, उनका भी कहना है कि वह मुकेश अरनेजा के बारे में जो कहना चाहते हैं, वह सच है - लेकिन कहने के तरीके की उनकी फूहड़ता ने मुकेश अरनेजा को उन पर हमलावर होने का मौका दे दिया है । इस मामले में मजे की बात यह है कि गुलाम वाहनवती को ईमेल-पत्र लिखने से पहले मुकेश अरनेजा व अन्य कुछेक लोगों ने जेके गौड़ से रोटरी फाउंडेशन में दी गई रकम के बदले में प्वाइंट्स न मिलने की शिकायत की थी, और उनसे सच्चाई बताने का अनुरोध किया था । जेके गौड़ ने उनके अनुरोध पर लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया, और 'अपनी तड़ी' में उन्हें जबाव दिया कि अभी वह एमएलसी के चुनाव में व्यस्त हैं और इसलिए अभी उनके पास सच्चाई देखने/बताने का समय नहीं है । जेके गौड़ के इस जबाव पर कुछेक लोगों ने चुटकी भी ली कि एमएलसी के चुनाव के चक्कर में उनके पास यदि रोटरी तथा रोटेरियंस के काम के लिए समय नहीं है, तो उन्होंने डीआरएफसी (डिस्ट्रिक्ट रोटरी फाउंडेशन चेयरमैन) तथा अशोक अग्रवाल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर जैसे जिम्मेदार पद अपने पास क्यों रखे हुए हैं, और वह इन पदों को छोड़ क्यों नहीं देते हैं ? दरअसल इसी तरह के प्रसंगों ने जेके गौड़ को पद-लोलुप तथा बेईमान होने के आरोपों के घेरे में ला दिया है । मुकेश अरनेजा ने उनके जीवन के 'रसीले' किस्सों की किताब लिखने/छापने की बात करके उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है ।

Tuesday, September 8, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा के बीच के 'झगड़े' में होने वाले नुकसान से बचने के लिए ललित खन्ना ने दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के वायदे से पीछे हटने की तैयारी शुरू कर दी है क्या ?

गाजियाबाद । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी ललित खन्ना के गवर्नर वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की तैयारी खटाई में पड़ती नजर आ रही है । ऐसा उन्हें ललित खन्ना के बदले बदले से तेवरों को देख/सुन के लग रहा है । ललित खन्ना दरअसल हाल के दिनों में दीपक गुप्ता और उनके नजदीकियों को बता चुके हैं कि पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा उन्हें इशारों इशारों में दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाये जाने के प्रति आगाह कर चुके हैं । उल्लेखनीय है कि ललित खन्ना की मुकेश अरनेजा के साथ लंबी दोस्ती रही है, जिसमें वह उनके 'पार्टनर इन क्राइम' रहे थे - और फिर दुश्मनी भी रही; इसलिए ललित खन्ना उनके खुन्नसी व्यवहार और बदला लेने की प्रवृत्ति से परिचित, सहयोगी व शिकार रहे हैं । ललित खन्ना जानते हैं कि मुकेश अरनेजा के नए/ताजे शिकार दीपक गुप्ता हैं । ललित खन्ना विभिन्न मौकों पर कुछेक लोगों के बीच कहते/बताते सुने गए हैं कि डीडीएफ अकाउंट मामले में दीपक गुप्ता को जो फजीहत झेलना पड़ रही है, उसके वास्तविक रचयिता और सूत्रधार मुकेश अरनेजा हैं ।
मुकेश अरनेजा की दीपक गुप्ता से नाराजगी इस बात को लेकर है कि दीपक गुप्ता को जब तक उनकी मदद की जरूरत रही, तब तक तो वह हँस हँस कर उनके गले लगते रहे, लेकिन काम निकल जाने के बाद वह उन्हें तरह तरह से अपमानित करने लगे; दीपक गुप्ता ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर तो बना दिया - लेकिन उन्हें तवज्जो जरा भी नहीं दी, और अलग/थलग रखा । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में मुकेश अरनेजा इस आशंका को लेकर हमेशा डरे डरे रहे कि दीपक गुप्ता कहीं उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटा न दें । सीओएल का चुनाव हारने के बाद से तो मुकेश अरनेजा की दीपक गुप्ता के प्रति नाराजगी और बढ़ गई है ।दीपक गुप्ता के प्रति मुकेश अरनेजा की नाराजगी को देखते/समझते/पहचानते हुए ही ललित खन्ना को डर हो चला है कि उन्होंने यदि दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया, तो दीपक गुप्ता को मुसीबत में डालने/फँसाने के लिए मुकेश अरनेजा उनके गवर्नर-वर्ष को निशाना बना सकते हैं, और तब उनका गवर्नर-वर्ष नाहक ही परेशानी में फँसेगा । दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा के 'झगड़े' में होने वाले नुकसान से बचने के लिए ललित खन्ना को एक ही रास्ता दिख रहा है, और वह यह कि मुकेश अरनेजा की 'इच्छा' का सम्मान करते हुए वह दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर न बनाएँ ।

दीपक गुप्ता तथा उनके नजदीकियों को हालाँकि यह भी लगता है कि मुकेश अरनेजा का नाम ले कर दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर न बनाना ललित खन्ना की अपनी चालाकी भी हो सकती है । दरअसल इस बीच यह पोल पूरी तरह खुल चुकी है कि दीपक गुप्ता को रोटरी के बारे में न तो कुछ अतापता है, और न वह ढंग/तरीके से कोई काम कर सकते हैं । दीपक गुप्ता बस एक ही काम में माहिर हैं, और वह है - ज्यादा बोलना, बढ़चढ़ कर बोलना और बोलने के नाम पर बकवास करना । इसलिए ललित खन्ना को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में दीपक गुप्ता उन पर बोझ ही साबित होंगे । इस तरह की बातें ललित खन्ना ने कुछेक लोगों के बीच कही भी हैं, जो दीपक गुप्ता तक भी पहुँची हैं । असल में, इसीलिए दीपक गुप्ता को लग रहा है कि ललित खन्ना खुद ही उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना नहीं चाहते हैं, और इसके लिए मुकेश अरनेजा के खुन्नसी व्यवहार तथा बदला लेने की प्रवृत्ति को बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के मामले में दीपक गुप्ता से पीछा छुड़ाने की ललित खन्ना की कोशिशों का कारण चाहें जो हो; लोगों को लेकिन लग रहा है कि दीपक गुप्ता यदि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने में सफल हो गए, तो ललित खन्ना के गवर्नर-वर्ष में खूब पटाखे फूटेंगे - कुछ दीपक गुप्ता के व्यवहार और रवैये के कारण, तो कुछ मुकेश अरनेजा की बदला लेने की प्रवृत्ति के कारण । 

Sunday, May 17, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक अग्रवाल व ललित खन्ना ने सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में मुकेश अरनेजा से अपना अपना बदला लिया; और डिस्ट्रिक्ट में मुकेश अरनेजा की बदनामी का फायदा उठा कर उन्हें चुनाव हरवाया

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा सीओएल प्रतिनिधि का चुनाव तीन वोटों से हार गए । मुकेश अरनेजा की इस हार ने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधित्व के लिए होने वाले चुनाव के नजारे को दिलचस्प बना दिया है । मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में झटके हालाँकि पहले भी खाए हैं, लेकिन इस हार का झटका उनके लिए खास इस मायने में हैं कि यह हार उन्हें अपने पुराने साथियों/सहयोगियों के मार्फत मिली है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिगनेटेड ललित खन्ना एक समय मुकेश अरनेजा के बड़े लाड़ले हुआ करते थे; और मुकेश अरनेजा की तमाम हरकतों में यह दोनों 'पार्टनर इन क्राइम' रहे हैं; मुकेश अरनेजा लेकिन उन लोगों में हैं जो 'क्राइम' करने के मामले में अपने पार्टनर्स को भी नहीं छोड़ते हैं - और इसी के चलते उन्होंने इन दोनों को भी नहीं बख्शा । इसीलिए इन दोनों ने सीओएल के चुनाव में मुकेश अरनेजा को ढेर करने का बीड़ा उठाया हुआ था । वास्तव में बीड़ा उठाया तो अशोक अग्रवाल ने था, ललित खन्ना तो मुकेश अरनेजा से अपनी खुन्नस निकालने के लिए अशोक अग्रवाल के साथ हो लिए । सीओएल के लिए मुकेश अरनेजा का चुनाव हुआ तो शरत जैन से - लेकिन बेचारे शरत जैन तो वास्तव में शिकार फाँसने के लिए बाँधी जाने वाली बकरी के रूप में थे । शरत जैन भले व्यक्ति हैं, और उनकी डिस्ट्रिक्ट में कोई राजनीतिक पहचान नहीं है । उन पर अंग्रेजी का वह मुहावरा फिट बैठता है, जिसमें कहा गया है - 'गुड फॉर नथिंग', यानि अच्छा तो है, पर किसी काम का नहीं है । इसीलिए माना/समझा जा रहा था कि मुकेश अरनेजा का चुनाव शरत जैन से नहीं है; उन्हें तो अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना से निपटना है । अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना को भी सीओएल के चुनाव के बहाने से मुकेश अरनेजा से अपना अपना हिसाब चुकता करने और बदला लेने का मौका मिल गया ।
अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना की जोड़ी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता की भी मदद मिली - मुकेश अरनेजा जिनके गवर्नर वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं । इससे समझा जा सकता है कि मुकेश अरनेजा ने किस हद तक अपने नजदीकियों को अपना दुश्मन बनाया हुआ है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट आलोक गुप्ता ने सीओएल के चुनाव में यह तर्क देते हुए तटस्थ भूमिका निभाई कि उन्हें डेढ़/दो महीने बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी संभालनी है, और सभी को साथ लेकर डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के लिए काम करना है, इसलिए किसी एक उम्मीदवार के साथ जुड़ कर उन्हें डिस्ट्रिक्ट व रोटरी में पक्षपातपूर्ण माहौल नहीं बनाना चाहिए । मुकेश अरनेजा को एक अकेले निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन का समर्थन था । चुनावी नतीजे का आकलन करने वाले लोगों का कहना/मानना है कि सुभाष जैन का समर्थन न होता, तो मुकेश अरनेजा की हालत और भी बुरी होती । पिछले रोटरी वर्ष में अशोक अग्रवाल और अमित गुप्ता के बीच हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने अमित गुप्ता का समर्थन किया था, जिसके बावजूद अमित गुप्ता को 50 से भी कम वोट मिले थे । इसी से माना/समझा जा रहा है कि मुकेश अरनेजा के पास डिस्ट्रिक्ट में मुश्किल से दस से पंद्रह वोट ही हैं । ऐसे में, अकेले सुभाष जैन का समर्थन भी उनकी आखिर कितनी मदद करता ? सीओएल के चुनाव में सुभाष जैन की मदद ने मुकेश अरनेजा को बड़ी हार से जरूर बचा लिया और उनकी हार को मामूली अंतर से हुई 'सम्मानजनक हार' में शिफ्ट करके मुकेश अरनेजा को एक बड़ी फजीहत का शिकार होने से रोक लिया है । 
मुकेश अरनेजा की हार को लेकर कई लोगों को हालाँकि यह भी लगता है कि मुकेश अरनेजा और सुभाष जैन की जोड़ी अति-आत्मविश्वास के कारण भी सीओएल का चुनाव हार गई है । कई लोगों का कहना/बताना है कि इन दोनों ने अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना की सक्रियता को कम करके आँका और जीता-जिताया चुनाव गवाँ बैठे । अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना ने इस चुनाव को किसी भी तरह से जीतने का जिम्मा लिया हुआ था, और हर तरह के हथकंडे अपनाए हुए थे; मुकेश अरनेजा और सुभाष जैन तथा उनके अन्य साथी लेकिन यही मानते/समझते रहे कि वह जीतने लायक वोट नहीं जुटा पायेंगे - किंतु अब जब नतीजा आया तो पता चला कि कुल दो वोटों की कमी से सीओएल का चुनाव उनके हाथ से निकल गया है । सीओएल के चुनावी नतीजे ने अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधित्व के लिए होने वाले चुनाव के नजारे को खासा दिलचस्प बना दिया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में प्रियतोष गुप्ता की तथा नोमीनेटिंग कमेटी में प्रतिनिधित्व के लिए सुभाष जैन की उम्मीदवारी के सामने अभी कोई संकट नहीं देखा/पहचाना जा रहा है और माना/समझा जा रहा है कि इन दोनों के लिए सफलता पाना कोई मुश्किल नहीं होगा । किंतु सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में मिले चुनावी नतीजे से यह आशंका बढ़ गई है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में कुछ नए प्रयोग हो सकते हैं, जो चुनावी परिदृश्य को रोमांचक बनाए । देखना दिलचस्प होगा कि सीओएल प्रतिनिधि के चुनाव में मिले नतीजे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति पर सचमुच किस तरह से क्या प्रभाव डालेंगे ?

Friday, April 24, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा और सुभाष जैन से एक साथ बदला लेने के उद्देश्य से, सीओएल के चुनाव में अशोक अग्रवाल द्वारा दिखाई जा रही अति-सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट में 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' जैसा माहौल बना दिया है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल ने सीओएल के चुनाव में शरत जैन को जीत दिलवाने के लिए जिस तरह की सक्रियता दिखाई हुई है, उसने लोगों को 'मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त' वाला मुहावरा याद दिलवा दिया है । लोगों का कहना है कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर खुद शरत जैन उतने सक्रिय नहीं हैं, जितने उनकी उम्मीदवारी को लेकर अशोक अग्रवाल जुटे हुए हैं । कहीं कहीं अशोक अग्रवाल ने कहा भी है कि सीओएल के चुनाव में मुकेश अरनेजा के खिलाफ शरत जैन नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वह लड़ रहे हैं । अशोक अग्रवाल तरह तरह से यह जताने/दिखाने/बताने का प्रयास कर रहे हैं कि वह वास्तव में शरत जैन को जितवाने के लिए नहीं, बल्कि मुकेश अरनेजा को हराने के लिए सीओएल के चुनाव में कूदे हुए हैं । मुकेश अरनेजा ने पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध किया था - अशोक अग्रवाल इस बात को लेकर मुकेश अरनेजा से बुरी तरह खफा हैं, और सीओएल के चुनाव में इसका बदला लेने की तैयारी में हैं । मजे की बात लेकिन यह है कि अशोक अग्रवाल सीओएल के चुनाव के जरिये सुभाष जैन को भी सबक सिखाना चाहते हैं, जबकि पिछले वर्ष अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का सुभाष जैन ने खुल कर सहयोग और समर्थन किया था - और पिछले वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव का आकलन करने वाले लोगों ने माना था कि अशोक अग्रवाल की चुनावी जीत के लिए सुभाष जैन के समर्थन की ही निर्णायक भूमिका थी । मुकेश अरनेजा के प्रति अशोक अग्रवाल की नाराजगी तो लोगों को समझ में आती है, लेकिन लोगों के बीच हैरानी इस बात को लेकर है कि सुभाष जैन को सबक सिखाने की बातें वह क्यों करते रहते हैं - जबकि वह आज यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी हैं, तो सुभाष जैन के समर्थन के कारण ही हैं ।
अशोक अग्रवाल  के नजदीकियों के अनुसार, दरअसल इस 'कारण' के कारण ही वह सुभाष जैन को सबक सिखाना चाहते हैं । नजदीकियों के अनुसार, अशोक अग्रवाल को यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं है कि उनके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने का श्रेय किसी भी तरह से सुभाष जैन को दिया जाए - या मिले । वास्तव में, अशोक अग्रवाल किसी को भी श्रेय नहीं देना चाहते हैं; उनका मानना और कहना है कि वह अपने दम पर अपना चुनाव जीते हैं, और उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले लोगों ने तो उन्हें जीतता हुआ देख/समझ कर ही उनका समर्थन किया था । अशोक अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि वह तो चाहते हैं और तरह तरह से कोशिश करते रहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का 'एकछत्र नेता' उन्हें माना/समझा जाए - लेकिन हालात उन्हें अलग-थलग धकेल देते हैं । इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक अग्रवाल ने बहुत कोशिश की कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का झंडा उनके हाथ में रहे, लेकिन ललित खन्ना ने उनका समर्थन तो ले लिया पर उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया । अशोक अग्रवाल के लिए झटके की बात यह रही कि वह तो बिना झंडे के रह गए, और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का झंडा सुभाष जैन को मिल गया । अनोखी बात यह रही कि सुनील मल्होत्रा यद्यपि चुनाव हार गए, लेकिन उन्हें मिले वोटों की संख्या के आधार पर डिस्ट्रिक्ट के नेता का खिताब सुभाष जैन को मिल गया । ललित खन्ना की जीत के लिए उनका चौथी/पाँचवीं बार उम्मीदवार बनना, सुनील मल्होत्रा की अनुभवहीनता तथा जल्दी चुनाव होने को कारण के रूप में देखा/पहचाना गया; इसके बावजूद, सुनील मल्होत्रा से ललित खन्ना को जो टक्कर मिली और वह उम्मीद के विपरीत कम अंतर से ही जीत पाए - उसके लिए सुभाष जैन के 'वोट बैंक' की ताकत को देखा/पहचाना गया । यह सुभाष जैन के लिए हार के बावजूद 'जीतने' वाला मामला रहा ।
यही कारण रहा कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी तैयारी में और सीओएल के चुनाव में सुभाष जैन की पक्षधरता तथा संलग्नता महत्त्वपूर्ण हो उठी; जबकि अशोक अग्रवाल को अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी तैयारी में एक बार फिर जोर का झटका लगा । शुरू में बड़े जोरशोर से चर्चा सुनी गई थी कि अशोक अग्रवाल अगले वर्ष  के चुनाव के लिए उम्मीदवार मैदान में उतार रहे हैं, लेकिन फिर वह चर्चा जल्दी ही बंद हो गई । अशोक अग्रवाल के नजदीकियों का कहना/बताना है कि अशोक अग्रवाल ने दो/एक लोगों को उम्मीदवार बनने के लिए राजी कर लिया था, लेकिन राजी हुए लोगों को जल्दी ही समझ में आ गया कि अशोक अग्रवाल अपनी राजनीति जमाने/दिखाने के लिए उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं, सो वह पीछे हट गए और अशोक अग्रवाल एक बार फिर अलग-थलग पड़ गए । ऐसे में, सीओएल का चुनाव अशोक अग्रवाल को संजीवनी बूटी की तरह मिल गया । सीओएल के चुनाव में सुभाष जैन चूँकि मुकेश अरनेजा की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं, इसलिए अशोक अग्रवाल को लगता है कि मुकेश अरनेजा को हरा/हरवा कर वह दोनों से एकसाथ बदला ले लेंगे और अपने आप को डिस्ट्रिक्ट की राजनीति का 'एकछत्र नेता' साबित कर देंगे । दिलचस्प नजारा यह है कि शरत जैन ने सीओएल के लिए होने वाले चुनाव के नतीजे को भाँप लिया है, और इसलिए वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ज्यादा उत्साहित और सक्रिय नहीं हैं - लेकिन अशोक अग्रवाल ने उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने को लेकर कमर कसी हुई है । उन्हें लगता है कि समय समय पर की गई मुकेश अरनेजा की हरकतों को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी रही है, उसे वह इस समय भुना सकते हैं तथा मुकेश अरनेजा के खिलाफ माहौल बना कर सीओएल के चुनाव में उन्हें हरा/हरवा सकते हैं । अशोक अग्रवाल की सक्रियता का सचमुच क्या नतीजा निकलेगा, यह तो नतीजा आने पर ही पता चलेगा - लेकिन सीओएल के चुनाव में अशोक अग्रवाल की अति-सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट में 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' जैसा माहौल जरूर बना दिया है ।

Wednesday, March 18, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल की बदनामी के कारण सीओएल के चुनाव में शरत जैन को अपने समर्थकों की मदद का ही टोटा पड़ता नजर आ रहा है, जिसके चलते मुकेश अरनेजा के मुकाबले उनकी स्थिति पतली ही दिख रही है  

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल के कहने/उकसाने पर शरत जैन सीओएल के लिए उम्मीदवार तो बन गए हैं, लेकिन मुकाबले पर मुकेश अरनेजा को देख कर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने जैसे मुसीबत आमंत्रित कर ली है । दरअसल रमेश अग्रवाल की हालत ही कुछ ऐसी बन गई है कि वह जिसे उम्मीदवार बनाते हैं, मुसीबतें उसे शुरू से ही दबोच लेती हैं । मौजूदा रोटरी वर्ष में रमेश अग्रवाल ने अशोक जैन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया, लेकिन अशोक जैन को जल्दी ही समझ में आ गया कि रमेश अग्रवाल की 'साढ़े साती' के कारण उनके लिए उम्मीदवारी का अभियान चला पाना मुश्किल ही होगा - सो, वह जिस पतली गली से उम्मीदवार बनने के लिए आगे बढ़े थे, उसी पतली गली से वापस लौट गए; और सुखी रहे । अब शरत जैन की भी हालत अशोक जैन जैसी ही है । मुकेश अरनेजा को मुकाबले में देख कर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी ने यह तर्क देते हुए दाँव तो अच्छा चला था कि मुकेश अरनेजा एक बार सीओएल में रह चुके हैं, इसलिए अब उन्हें दूसरों के लिए मौका छोड़ देना चाहिए - लेकिन उनकी बदकिस्मती रही कि उनका यह दाँव चलते ही फुस्स हो गया । दरअसल किसी की भी समझ में नहीं आया कि रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानून यदि मुकेश अरनेजा को दोबारा सीओएल का सदस्य बनने का अधिकार देते हैं, तब फिर रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी मनमाने तरीके से उनसे यह अधिकार छीनने का प्रयास क्यों कर रही है ? और फिर, यदि इस तर्क को व्यवहार में लाना ही था, तो इसके लिए काउंसिल और गवर्नर्स की मीटिंग में बात होना चाहिए थी । यह दोनों डिस्ट्रिक्ट काउंसलर हैं, इन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को कह कर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलवाना चाहिए थी, और उसमें यह मुद्दा रखना चाहिए था । मजे की बात लेकिन यह है कि इसके लिए न तो इन दोनों ने कोई प्रयास किए और न दीपक गुप्ता ने ही कोशिश की ।
डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों और जानकारों का मानना और कहना है कि हो सकता है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी मुकेश अरनेजा को उम्मीदवार बनने से न रोक पाती; तब भी लेकिन लोगों को यह तो 'दिखता' कि वह प्रॉपर तरीके से अपनी बात कह रहे हैं - और उससे उन्हें लोगों के बीच सहानुभूति और समर्थन भी मिल सकता था । यह मौका लेकिन रमेश अग्रवाल और शरत जैन की जोड़ी ने खो दिया । इससे जाहिर है कि सीओएल का पद पाने के लिए शरत जैन को और उन्हें पद दिलवाने के लिए रमेश अग्रवाल को कायदे/कानून से कुछ करना नहीं है; और इसीलिए उनके संभावित सहयोगी/समर्थक भी उनके लिए कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । शरत जैन को उम्मीद रही है कि दीपक गुप्ता, अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करेंगे; लेकिन वह यह देख/जान कर निराश हैं कि यह तीनों ही कुछ करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं । दीपक गुप्ता तो अपने स्वार्थ और अपनी बेवकूफी में कुछ नहीं कर रहे हैं; दीपक गुप्ता दरअसल उम्मीद कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना उनकी मदद पाने के लिए जिस तरह उनके आगे-पीछे रहते थे, और उनकी हर 'डिमांड' पूरी करते थे, शरत जैन भी वैसे ही करें - शरत जैन चूँकि वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं, इसलिए दीपक गुप्ता भी उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं । 
अशोक अग्रवाल लगता है कि रमेश अग्रवाल के साथ हुए पुराने झगड़े को अभी नहीं भूले हैं, और शरत जैन को वह चूँकि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं - इसलिए वह शरत जैन के लिए कुछ करने को प्रेरित नहीं हो पा रहे हैं । ललित खन्ना की समस्या बिलकुल अलग तरह की है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव वह खुद बड़ी मुश्किलों से - चौथी बार में जीते हैं; ऐसे में, उन्हें डर है कि वह शरत जैन के लिए वोट जुटाने की कोशिश में कहीं खुद का मजाक न बनवा बैठें, लिहाजा वह चुप ही बने हुए हैं । ललित खन्ना की इस चुप्पी ने सीओएल के चुनाव से अलग मामले में शरत जैन की दुविधा को बढ़ाने का काम किया है । शरत जैन को ललित खन्ना की तरफ से संकेत मिला है कि वह उन्हें अपने गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे; शरत जैन की आशंका है कि कहीं उस मामले में भी तो ललित खन्ना उन्हें झाँसा नहीं दे देंगे ? अशोक अग्रवाल और ललित खन्ना के सामने एक और मुसीबत है - उन्हें आने वाले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ सँभालनी हैं, और इसके लिए उन्हें डिस्ट्रिक्ट में सभी का सहयोग/समर्थन चाहिए होगा - सीओएल के चुनाव के चक्कर में वह उस संभावित सहयोग/समर्थन को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे । यह मुसीबत वास्तव में इसलिए भी है, क्योंकि किसी को भी सीओएल के चुनाव में शरत जैन के जीतने की संभावना नहीं दिख रही है - इसलिए उनके सहयोगी/समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले नेता लोग भी उनके समर्थन में 'दिख' कर अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते हैं, और उनकी उम्मीदवारी से दूर ही रहना चाहते हैं । शरत जैन और मुकेश अरनेजा के बीच होते दिख रहे सीओएल के चुनाव को एक बेमेल चुनाव के रूप में देखा जा रहा है; मुकेश अरनेजा को चुनावी राजनीति का धुरंधर समझा जाता है, जबकि शरत जैन चुनावी राजनीति के बड़े कच्चे खिलाड़ी के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं । रही सही कसर रमेश अग्रवाल की बदनामी पूरी कर देती है । लोगों का मानना/कहना है कि रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार होने के कारण शरत जैन की भी स्थिति वैसी ही होगी, जैसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद चुनाव के मामले में अशोक जैन की हुई थी । अशोक जैन तो हालात को समझ/पहचान कर जल्दी ही 'कट' लिए थे, देखना दिलचस्प होगा कि शरत जैन क्या करते हैं ? 

Tuesday, March 10, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए दीपक गुप्ता को सोनीपत से लेकर बाकी क्षेत्रों तक में समर्थन का जो टोटा पड़ रहा है, उसके चलते प्रियतोष गुप्ता के खिलाफ उम्मीदवार की तलाश में भटक रहे नेताओं/गवर्नर्स को भी दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठाने में कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है

सोनीपत । दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान में तेजी लाने के लिए होली के मौके का फायदा तो खूब उठाया, लेकिन उन्हें इसका लाभ मिलता हुआ दिखा नहीं है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई है कि जिन नेताओं और गवर्नर्स के साथ उनकी नजदीकी रही है, और जिनके लिए उन्होंने बहुत काम किए हैं - वह भी उनकी उम्मीदवारी के समर्थन से उन्हें पीछे हटते हुए 'दिखाई' दिए हैं । सबसे तगड़ा झटका उन्हें अपने हमनाम मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से लगा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के लिए सोनीपत वाले दीपक गुप्ता ने इस वर्ष भी बहुत काम किया, और उनके चुनाव में भी दिन-रात एक किया था - इस नाते उन्हें विश्वास था कि अब जब वह उम्मीदवार बन रहे हैं, तब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता उनकी मदद करेंगे । लेकिन सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को यह देख/जान कर तगड़ा झटका लगा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की बजाये किसी दूसरे (तीसरे) उम्मीदवार को तलाशने में लगे हुए हैं । सिर्फ इतना ही नहीं, सोनीपत में उन्हें लोगों से यह भी सुनने को मिला है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उन्हें उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ भड़का रहे हैं । यह बात सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को इसलिए और हैरान करने वाली लगी है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता उनसे कहते/बताते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को जब सोनीपत में ही उचित समर्थन नहीं है, तो वह नाहक ही उम्मीदवारी के पचड़े में क्यों पड़ रहे हैं ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के इस दोहरे और अहसानफरामोशी वाले रवैये से सोनीपत वाले दीपक गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी का सारा ताना-बाना बुरी तरह बिखरता दिख रहा है ।
इसके अलावा, दीपक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा और शरत जैन का समर्थन जुटाने में भी असफल रहे हैं । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में दीपक गुप्ता की कुल पहचान 'मुकेश अरनेजा के आदमी' के रूप में है; इसके बावजूद दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से सबसे पहले मुकेश अरनेजा ने दूरी बनाई । शरत जैन के गवर्नर-वर्ष में दीपक गुप्ता ने बहुत काम किया था; दीपक गुप्ता को विश्वास था कि शरत जैन ज्यादा उठा-पटक करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, इसलिए वह उनके द्वारा किए गए कामों को अवश्य ही याद रखेंगे - लेकिन शरत जैन भी उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में दिलचस्पी लेते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । दीपक गुप्ता के लिए हैरानी और मुसीबत की बात यह हुई है कि जो नेता/गवर्नर्स प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में नहीं भी हैं, वह भी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हैं । दरअसल ऐसे नेताओं/गवर्नर्स को लग रहा है कि एक उम्मीदवार के रूप में प्रियतोष गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह का आधार बना लिया है, और उनकी उम्मीदवारी को लोगों के बीच जिस तरह का समर्थन मिलता दिख रहा है - उसका मुकाबला कर पाना दीपक गुप्ता के बस की बात नहीं है, इसलिए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ जुड़ना अपनी नाक कटवाना होगा । दीपक गुप्ता हालाँकि उन्हें समझा रहे हैं कि वह जब इस बात को जान/समझ रहे हैं कि एक उम्मीदवार के रूप में प्रियतोष गुप्ता ने लोगों के बीच अच्छा आधार बना लिया है और उन्हें उचित समर्थन मिल रहा है, तब फिर एक नया उम्मीदवार तो प्रियतोष गुप्ता के सामने और भी कमजोर साबित होगा - ऐसे में, नए उम्मीदवार के मुकाबले वह ही प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी को टक्कर देने वाले साबित होंगे; और इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत हुई प्रियतोष गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध करने वाले नेताओं/गवर्नर्स को उनकी उम्मीदवारी का ही झंडा उठा लेना चाहिए ।
दीपक गुप्ता ने होली के मौके पर मिलने-जुलने के दौरान इस तर्क के सहारे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास तो खूब किया, लेकिन उनका काम बनता हुआ नजर नहीं आ रहा है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने तथा भूमिका निभाने वाले अधिकतर नेता और गवर्नर्स दीपक गुप्ता को उस तरह का ही उम्मीदवार मान/समझ रहे हैं, पिछले चुनाव में जिसे एक भी वोट नहीं मिला था । इसीलिए प्रियतोष गुप्ता के खिलाफ उम्मीदवार की तलाश में भटक रहे नेताओं/गवर्नर्स को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठाने में कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है । असल में, एक उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता की सोनीपत में ही बुरी स्थिति है । दीपक गुप्ता तो हालाँकि दावा कर रहे हैं कि सोनीपत के सभी क्लब्स उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में हैं, लेकिन सोनीपत के क्लब्स के प्रमुख लोगों के संपर्क में रहने वाले लोगों का कहना/बताना है कि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है; और सोनीपत में अलग अलग कारणों से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति विरोध का ही भाव और स्वर है । प्रियतोष गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन बनाने/जुटाने के उद्देश्य से जितनी बार भी सोनीपत पहुँचे हैं, सोनीपत के लोगों ने उतनी ही बार बढ़चढ़ कर उनके प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है । वास्तव में, यही सब देख/जान कर कोई भी नेता/गवर्नर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में दिलचस्पी दिखाता नजर नहीं आ रहा है । इसके चलते दीपक गुप्ता के लिए अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अभियान चलाना तक मुश्किल हो रहा है । होली के मौके पर लोगों से मिलने/जुलने के बहाने दीपक गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने की जो कोशिश की, उसमें भी उनके हाथ असफलता ही लगने की बातें सुनी/सुनाई जा रही हैं । 

Friday, February 7, 2020

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल के गवर्नर-वर्ष का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए अन्य किसी के तैयार न होने की स्थिति में, मजबूरी में जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाए जाने से एमएलसी स्नातक बनने की जेके गौड़ की तैयारी को झटका लगा है क्या ?

गाजियाबाद । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को अपने गवर्नर-वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर चुन कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी अशोक अग्रवाल ने एमएलसी स्नातक सीट पाने के चुनाव में सक्रिय जेके गौड़ की चुनाव जीतने की संभावना पर मिट्टी डालने का काम किया है क्या ? उल्लेखनीय है कि अशोक अग्रवाल लगातार यह कहते/बताते रहे हैं कि वह वैसे तो जेके गौड़ को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाते, लेकिन एमएलसी स्नातक बन जाने के कारण चूँकि जेके गौड़ को रोटरी के लिए ज्यादा समय निकाल पाना मुश्किल होगा - इसलिए मजबूरी में उन्हें किसी और को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना पड़ेगा । लेकिन अब जब अशोक अग्रवाल ने जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना और घोषित कर दिया है, तो लोगों को लग रहा है कि जैसे उन्होंने संकेत दिया है कि जेके गौड़ को रोटरी के कामों के लिए समय की कोई समस्या नहीं होगी - तो इस तरह क्या अशोक अग्रवाल ने मान/समझ लिया है कि जेके गौड़ एमएलसी स्नातक नहीं बन रहे हैं, और उनके गवर्नर वर्ष में जेके गौड़ के पास समय ही समय होगा । जेके गौड़ हालाँकि एमएलसी स्नातक चुनाव जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं; उनके बहुत नजदीक होने के नाते विश्वास किया जाता है कि अशोक अग्रवाल उनकी मेहनत से परिचित होंगे ही और यह इच्छा भी रखते ही होंगे कि जेके गौड़ को अपनी मेहनत का सुफल मिले - लेकिन जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना और घोषित करके अशोक अग्रवाल ने उनकी मेहनत तथा उस मेहनत के भरोसे मिलने वाले सुफल पर सवाल खड़ा कर दिया है, और एमएलसी स्नातक सीट पाने के लिए चलाए जा रहे जेके गौड़ के चुनावी अभियान को मनोवैज्ञानिक झटका दिया है ।
अशोक अग्रवाल और जेके गौड़ के नजदीकियों का हालाँकि कहना यह है कि अशोक अग्रवाल ने जेके गौड़ को बहुत ही मजबूरी में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है । उन्होंने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए किसी और को राजी करने के लिए कोशिशें तो खूब की थीं, लेकिन अन्य कोई उनके गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए तैयार ही नहीं हुआ । अशोक अग्रवाल के पास हालाँकि विकल्प भी बहुत सीमित थे । सीमित विकल्पों के बीच, अशोक अग्रवाल उन मुकेश अरनेजा को भी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के लिए तैयार हो गए थे - जिन्होंने उनके चुनाव में उनकी उम्मीदवारी का जमकर विरोध किया था, और हर संभव तरीके से उन्हें हरवाने का प्रयास किया था । अशोक अग्रवाल की बदकिस्मती ही रही कि डिस्ट्रिक्ट के 'परमानेंट डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर' का ख़िताब पा चुके मुकेश अरनेजा ने भी उनके गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने से इंकार कर दिया । हर तरफ से निराश होकर अशोक अग्रवाल ने फिर जेके गौड़ को ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद थमा दिया । लोगों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद स्वीकार करके जेके गौड़ की तरफ से भी लोगों को संदेश मिला है कि जैसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि एमएलसी स्नातक सीट पर तो चुनाव जीतना उनके लिए मुश्किल ही होगा, और इसलिए उन्होंने रोटरी में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद अपने लिए सुरक्षित कर लिया है । 
इस बात पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन हैरानी है कि अशोक अग्रवाल के गवर्नर वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए और कोई - यहाँ तक कि मुकेश अरनेजा भी - राजी क्यों नहीं हुआ ? अशोक अग्रवाल के नजदीकियों के अनुसार, इसका कारण उनका पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल के साथ किया गया व्यवहार जिम्मेदार है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल को जेके गौड़ के गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया गया था; लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जेके गौड़ और उनके सहयोगी के रूप में अशोक अग्रवाल ने रमेश अग्रवाल की जमकर लानत-मलामत की । जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की इस हरकत को अहसानफरामोशी के रूप में देखा/पहचाना गया और माना/कहा गया कि अपना काम निकालने के लिए तो यह किसी को भी भाई-बाप बना लेते हैं, और काम निकलने के बाद उसे धिक्कारने लगते हैं । रमेश अग्रवाल के साथ इन्होंने यही किया । हालाँकि इनका कहना था कि रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी करते हुए इन्हें तरह तरह से परेशान और अपमानित किया और लगातार इनके साथ बदतमीजी करते रहे - और इसीलिए रमेश अग्रवाल के खिलाफ इनका गुस्सा फूटा । लोगों का कहना लेकिन यह रहा कि रमेश अग्रवाल 'ऐसे' ही हैं, क्या यह बात इन्हें पहले से पता नहीं थी, और या क्या इन्होंने यह सोचा था कि हर किसी से बदतमीजी करने वाले आदतन बद्तमीज रमेश अग्रवाल इन्हें बख़्श देंगे और इनके साथ बदतमीजी नहीं करेंगे । रमेश अग्रवाल ने तो वही किया, जिसके लिए वह (कु)ख्यात हैं । इन्होंने क्या किया - इन्हें जब लगा कि रमेश अग्रवाल इन्हें परेशान और अपमानित कर रहे हैं, तब इन्होंने रमेश अग्रवाल का साथ क्यों नहीं छोड़ दिया था ? इन्हें पता ही था कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में मुकेश अरनेजा ने जब अमित जैन को परेशान करना शुरू किया था, तब अमित जैन ने मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा दिया था । यह भी रमेश अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा कर उनकी बदतमीजियों का शिकार होने से बच सकते थे । जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल की जोड़ी ने ऐसा नहीं किया; इन्होंने किया यह कि पहले तो अपना काम निकाला/बनाया और फिर तुरंत ही रमेश अग्रवाल को धिक्कारने लगे । उसी प्रसंग को ध्यान में रखते हुए चूँकि अन्य कोई पूर्व गवर्नर अशोक अग्रवाल का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने को तैयार नहीं हुआ, और इंकार करते करते जेके गौड़ ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना दिए गए हैं । इससे लेकिन एमएलसी स्नातक बनने की जेके गौड़ की तैयारी को झटका लगा है ।

Monday, November 25, 2019

रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में अनिरुद्ध राय चौधरी को ज्वाइंट चेयरमैन तथा मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन बना कर शेखर मेहता व कमल सांघवी ने विनोद बंसल को 'कट डाउन टू साइज' करने का काम किया है क्या ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा को फरवरी में होने जा रहे रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी में वाइस चेयरमैन का पद देकर कन्वेनर कमल सांघवी ने कमेटी के चेयरमैन विनोद बंसल के 'पर कतरने' की व्यवस्था की है क्या ? उल्लेखनीय है कि कमेटी में कई वाइस चेयरमैन पहले से ही नियुक्त हैं; लोगों के बीच चर्चा यह है कि कमल सांघवी यदि सचमुच मुकेश अरनेजा की क्षमताओं से परिचित और प्रभावित हैं, तो उन्हें सबसे पहले मुकेश अरनेजा को ही वाइस चेयरमैन बनाना चाहिए था - लेकिन कमेटी का काम काफी आगे बढ़ जाने के बाद उन्हें जिस तरह 'अचानक' से मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन बनाने का ख्याल आया है, उससे लगता है कि मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन बनाने के पीछे उनका उद्देश्य 'कुछ और' है । इस 'कुछ और' में विनोद बंसल के पर कतरने को देखा/पहचाना जा रहा है । यह इसलिए भी देखा/पहचाना जा रहा है, क्योंकि मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन पद पर नियुक्ति का पत्र रिलीज करने से पहले कोलकाता में हुई कमेटी की मीटिंग में विनोद बंसल ने जब कुछ ज्यादा 'चेयरमैनी' दिखाने की कोशिश की थी, तब कमल सांघवी ने उन्हें हड़काया था और उनके व्यवहार पर आपत्ति की थी । उसी मीटिंग में, रजिस्ट्रेशन बढ़वाने के विनोद बंसल के प्रयासों को भी कमल सांघवी ने सफल नहीं होने दिया था । यहाँ यह ध्यान रखना भी प्रासंगिक होगा कि विनोद बंसल और मुकेश अरनेजा के बीच राजनीतिक बैर की बात रोटेरियंस पदाधिकारियों व नेताओं के लिए कोई दबी-छिपी बात नहीं है ।
दरअसल विनोद बंसल की स्थिति उस दूल्हे की तरह की हो गई है, जिसे सजा-धजा कर और मुकुट पहना कर बग्घी पर तो बैठा दिया जाता है, लेकिन बारात में उसकी परवाह कोई नहीं करता और वह बेचारा सबसे पीछे अकेला बारात के आगे बढ़ने का इंतजार करता रहता है । अभी हाल ही में, उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के हुए स्वागत-सम्मान समारोह की ऑगेनाइजिंग कमेटी के वह चेयरमैन तो बना दिए गए थे, लेकिन समारोह की तैयारी से तथा उसके आयोजन से उन्हें अलग-थलग ही रखा गया था - जिस पर उन्होंने खुलकर अपनी नाराजगी भी व्यक्त की थी । फरवरी में कोलकाता में होने जा रहे रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट की तैयारी में भी उनके साथ वैसा ही मजाक हो रहा है । समिट की ऑगेनाइजिंग कमेटी के वह चेयरमैन तो बना दिए गए हैं, लेकिन नियुक्तियों से लेकर समिट की व्यवस्था के सभी फैसले कमल सांघवी ही कर रहे हैं, और इसलिए ऑर्गेनाइजिंग कमेटी के बाकी पदाधिकारी भी उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं । विनोद बंसल को जोर का झटका यह भी लगा है कि डिस्ट्रिक्ट 3291 के पूर्व गवर्नर अनिरुद्ध राय चौधरी को कोलकाता में होने जा रहे रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट की तैयारी में पहले को-चेयरमैन बनाया गया था, लेकिन उन्हें प्रोमोट करके अब ज्वाइंट चेयरमैन बना दिया गया है और इस तरह उन्हें अब विनोद बंसल के 'नीचे' नहीं, बल्कि 'बराबर' में बैठा दिया गया है ।
रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के चेयरमैन के रूप में विनोद बंसल के साथ यह जो 'खेल' हो रहा है, उसे उनकी फजीहत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; और इसे देख/पहचान कर उनके शुभचिंतकों को लग रहा है कि इस तरह से फजीहत करवाने से अच्छा है कि विनोद बंसल चेयरमैन से इस्तीफा दे दें । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल और उनके शुभचिंतकों ने सोचा तो यह था कि सेन्टेंनियल समिट के चेयरमैन के रूप में उन्हें अपने आपको शेखर मेहता का सबसे करीबी दिखाने का मौका मिलेगा, लेकिन हो उल्टा रहा है और दिख यह रहा है कि जैसे शेखर मेहता ने कमल सांघवी को हरी झंडी दे दी है कि वह जैसे चाहें वैसे विनोद बंसल का तमाशा बनाएँ । उल्लेखनीय है कि सेन्टेंनियल समिट का कार्यक्रम शेखर मेहता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पिछले वर्ष तब बना था, जब सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी थे । स्थिति वही होती, तो इस आयोजन का ज्यादा जलवा नहीं होता और यह एक सामान्य कार्यक्रम ही होता । इसीलिए इस कार्यक्रम में तब किसी की दिलचस्पी नहीं थी । सुशील गुप्ता ने तब विनोद बंसल को जबर्दस्ती इसका चेयरमैन बना दिया था । विनोद बंसल ने भी बेमन से इसे स्वीकार कर लिया था । लेकिन स्थिति बदली तो कार्यक्रम का महत्त्व भी बढ़ गया और विनोद बंसल भी चेयरमैन के रूप में बम बम करने लगे । लोगों को लग रहा है कि यह देख कर शेखर मेहता व कमल सांघवी को विनोद बंसल को 'कट डाउन टू साइज' करना जरूरी लगा है, और तरह तरह से उन्हें नीचा दिखाने और उनकी फजीहत करने का खेल शुरू हो गया ।
यह खेल मुकेश अरनेजा को अचानक से वाइस चेयरमैन बनाने की कार्रवाई से और गंभीर हो गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकी ही लोगों को बता रहे हैं कि चेयरमैन के रूप में विनोद बंसल ने जिस गुपचुप तरीके से अपने डिस्ट्रिक्ट के अपने नजदीकी पूर्व गवर्नर विनय भाटिया को ट्रेजरर बना लिया है, उससे उनकी भूमिका संदेहास्पद हो गई है और उनकी भूमिका पर निगाह रखने के लिए ही मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन बनाया गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकी लोगों को ध्यान दिला रहे हैं कि विनय भाटिया पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में हिसाब-किताब में गड़बड़ी करने के आरोप रहे हैं, जिन पर डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के बावजूद विनोद बंसल चुप बने रहे थे; इसके अलावा, विनोद बंसल पर रवि चौधरी के गवर्नर वर्ष के हिसाब-किताब की गड़बड़ियों पर भी पर्दा डालने के आरोप रहे हैं । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का कहना है कि उन्हीं आरोपों को देखते हुए विनोद बंसल व विनय भाटिया की जोड़ी को मनमानी न करने देने के उद्देश्य से मुकेश अरनेजा को वाइस चेयरमैन बनाया गया है । मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का ऐसा कहना यदि सच है तो माना जा रहा है कि रोटरी इंडिया सेन्टेंनियल समिट के मामले में अभी और दिलचस्प नज़ारे देखने को मिलेंगे ।

Wednesday, October 30, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में होने वाले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के नाम पर रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की 'राजनीति' करने का मौका देने तथा खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता मुसीबत में फँसे   

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला कार्यक्रम क्लब्स से 50/50 हजार रुपए माँगने के कारण विवाद में फँस गया है । लोगों के बीच चर्चा सुनी जा रही है कि उक्त कार्यक्रम को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की राजनीति का जरिया बना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता क्लब्स पर नाहक ही बोझ डाल रहे हैं और इस तरह रमेश अग्रवाल को क्लब्स के पैसों पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव लड़वाने की तैयारी कर रहे हैं । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि रमेश अग्रवाल ने अपने राजनीतिक स्वार्थ में दीपक गुप्ता को फँसा दिया है, और दीपक गुप्ता ने क्लब्स को फँसा दिया है । उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने पर सुशील गुप्ता का दिल्ली में जो स्वागत/सम्मान समारोह हुआ था, उसे डिस्ट्रिक्ट 3012 और डिस्ट्रिक्ट 3011 ने मिल कर किया था । उसी तर्ज पर दीपक गुप्ता के सामने इस वर्ष शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह को आयोजित करने का ऑफर था । दीपक गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, दीपक गुप्ता इसके लिए राजी भी थे; लेकिन रमेश अग्रवाल ने दीपक गुप्ता को समझा लिया कि उक्त समारोह अकेले करना ही उचित होगा । समझा जाता है कि रमेश अग्रवाल चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार होने की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए उन्हें लगा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के जरिये वह अपनी डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के लिए 'माहौल' बना सकेंगे ।   
रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से किए जा रहे शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के लिए दीपक गुप्ता ने क्लब्स से 50 हजार रुपए देने की माँग की है, जिसके बदले में क्लब को पाँच युगल्स के लिए समारोह में शामिल होने का अवसर देने की बात की गई है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में इस तरह के आयोजनों के लिए पैसे जुटाने का काम व्यक्तिगत रजिस्ट्रेशन के जरिये किया जाता है; और या कुछेक सक्रिय रोटेरियंस से स्पॉन्सरशिप ली जाती है । पिछले रोटरी वर्ष में हुए समारोह में कुछेक लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया था, तथा कई लोगों को तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन द्वारा ली गई स्पॉन्सरशिप के बदले में प्रवेश मिला था । लोगों का कहना है कि सुभाष जैन की ही तरह दीपक गुप्ता को और रमेश अग्रवाल को समारोह का खर्च जुटाने के लिए स्पॉन्सरशिप लेना चाहिए; दीपक गुप्ता ने लेकिन क्लब्स पर बोझ डाल कर नाहक ही विवाद पैदा कर दिया है । इस 'व्यवस्था' के चलते समारोह में हिस्सा लेने के लिए क्लब के पाँच युगल्स का चयन करने को लेकर क्लब्स में झगड़े होने की आशंका व्यक्त की जा रही है । लोगों का कहना है कि शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह के खर्च के लिए दीपक गुप्ता को पिछले वर्ष जैसी ही व्यवस्था अपनाना चाहिए थी - जिससे न कोई झंझट पैदा होता, न किसी झगड़े की आशंका होती और न क्लब पर कोई बोझ पड़ता ।
शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान समारोह का मुखिया रमेश अग्रवाल को बनाने के दीपक गुप्ता के फैसले पर पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा भी नाराज बताये/सुने जा रहे हैं । मुकेश अरनेजा चूँकि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं, इसलिए वह उम्मीद कर रहे थे कि दीपक गुप्ता उक्त समारोह के आयोजन की जिम्मेदारी उन्हें देंगे । मुकेश अरनेजा को यह उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि पिछले रोटरी वर्ष में सुशील गुप्ता के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में हुए स्वागत/सम्मान समारोह की जिम्मेदारी सुभाष जैन ने तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर शरत जैन को दी थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता ने लेकिन उक्त समारोह की जिम्मेदारी के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने की बजाये रमेश अग्रवाल को चुना और मुकेश अरनेजा को निराश किया और झटका दिया । रमेश अग्रवाल को समारोह की जिम्मेदारी मिलने से शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान में होने वाला समारोह रमेश अग्रवाल का राजनीतिक तमाशा बन गया है, जिसके खर्च का बोझ क्लब्स पर डालने के कारण वह विवादपूर्ण भी बन गया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता के पिछले कार्यक्रम, खासतौर से डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों का अधिष्ठापन कार्यक्रम और फिर दीवाली मेला - लोगों से सहयोग न मिलने के कारण बुरी तरह से 'पिटे' और फ्लॉप रहे हैं; शेखर मेहता के स्वागत/सम्मान के कार्यक्रम को लेकर दीपक गुप्ता की तैयारी जिस विवाद में फँस/पड़ गई है, उसके कारण डर पैदा हुआ है कि कहीं इस समारोह का हश्र भी उनके पिछले कार्यक्रमों जैसा तो नहीं होगा ? 

Monday, October 14, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ललित खन्ना की चुनावी जीत का गणित डिस्ट्रिक्ट के लोगों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता की 'हार' तथा निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन की 'जीत' के रूप में क्यों दिख रहा है ? 

नई दिल्ली । 'रचनात्मक संकल्प' ने पाँच अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी नतीजे के ललित खन्ना के पक्ष में रहने की जो संभावना व्यक्त की थी, वह अंततः सच साबित हुई और ललित खन्ना की जीत के साथ रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ ने डिस्ट्रिक्ट को तीसरा गवर्नर दिया । उल्लेखनीय है कि वरिष्ठ पूर्व गवर्नर एमएल अग्रवाल तथा केके गुप्ता इसी क्लब के सदस्य हैं । पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा भी हालाँकि इसी क्लब के सदस्य रहते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने थे, लेकिन अपनी हरकतों के चलते उनके लिए क्लब में बने रहना असंभव हो गया था और उन्हें क्लब से निकाला जाता, उससे पहले उन्होंने खुद ही क्लब से निकल कर दूसरा क्लब बना लिया । इसी खुन्नस में मुकेश अरनेजा ने हमेशा ही ललित खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध किया; मुकेश अरनेजा हमेशा ही ऐसा आभास करवाते रहे हैं कि जैसे उन्होंने कसम खा ली है कि वह ललित खन्ना को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नहीं बनने देंगे । लेकिन तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी) चुने जाने का ललित खन्ना का सपना आखिरकार साकार हुआ । ललित खन्ना और सुनील मल्होत्रा के बीच हुए चुनाव में खासे उतार-चढ़ाव रहे - शुरू में इस चुनाव को ललित खन्ना के पक्ष में एकतरफा माना/देखा जा रहा था, लेकिन चुनाव का दिन आते आते सुनील मल्होत्रा उन्हें तगड़ी टक्कर देते हुए नजर आने लगे; और ललित खन्ना के सामने गंभीर चुनौती आ खड़ी हुई ।
ललित खन्ना के सामने यह चुनौती खड़ी करने के लिए निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (आईपीडीजी) सुभाष जैन को जिम्मेदार माना/ठहराया जा रहा है । दरअसल सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को सुभाष जैन का ही समर्थन था । मजे की बात यह रही कि अन्य कुछेक गवर्नर्स ललित खन्ना को पसंद तो नहीं करते थे, लेकिन चूँकि उन्हें सुनील मल्होत्रा के चुनाव जीतने की उम्मीद नहीं लग रही थी - इसलिए वह सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के पक्ष में नहीं जुटे । एक अकेले सुभाष जैन ही सुनील मल्होत्रा के साथ रहे । सुभाष जैन के नजदीकियों व शुभचिंतकों ने उन्हें समझाने के खूब प्रयास किए कि एक हारते दिख/लग रहे उम्मीदवार के पक्ष में रहने से आखिर क्या हासिल होगा ? सुभाष जैन ने लेकिन किसी की नहीं सुनी । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का आकलन था कि सुनील मल्होत्रा को 20/25 से ज्यादा वोट नहीं मिलेंगे । चुनावी नतीजे में उन्हें 75 वोट के रूप में जो करीब 43 प्रतिशत वोट मिले हैं - उन्हें सुभाष जैन के राजनीतिक प्रताप तथा उनकी चुनावी रणनीति के नतीजे के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । ललित खन्ना के सामने कहीं टिकते नहीं दिख रहे सुनील मल्होत्रा को सुभाष जैन की चुनावी रणनीति ने जिस तरह से मुकाबले पर ला दिया और ललित खन्ना के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी, उसे देखते/समझते हुए ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को सुनील मल्होत्रा की पराजय में भी सुभाष जैन की जीत 'दिखाई' दे रही है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में इससे पहले किसी एक गवर्नर ने प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक माहौल में ऐसा समर्थन जुटाया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता है ।
ललित खन्ना ने वोटिंग शुरू होने से पहले होशियारी न दिखाई होती और अपनी उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता की 'छाया' से मुक्त न किया होता, तो बहुत संभव है कि वह चुनाव हार गए होते । दीपक गुप्ता ने यूँ तो ललित खन्ना को चुनाव जितवाने के लिए सारे हथकंडे अपना लिए थे, और इसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को भी छिन्न-भिन्न कर लिया/दिया था - लेकिन उनकी हरकतें ललित खन्ना की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाने की बजाये नुकसान पहुँचाती लग रही थीं । ललित खन्ना ने दीपक गुप्ता से जल्दी चुनाव करवाने का फायदा तो ले लिया, लेकिन उसके बाद उन्होंने दीपक गुप्ता से अपने आप को अलग कर लिया और इस तरह दीपक गुप्ता की हरकतों के कारण होने वाले नुकसान से अपने आप को बचा लिया । मजे की बात यह रही कि ललित खन्ना को हालाँकि दीपक गुप्ता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, लेकिन ललित खन्ना की जीत का श्रेय ललित खन्ना को ही दिया जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि ललित खन्ना ने हर मौके का बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता से कब उन्हें जुड़ना है और कब उनसे पीछा छुड़ा लेना है - इसे समझ/बूझ कर तथा जरूरत के हिसाब से करते हुए ललित खन्ना ने अपनी जीत का रास्ता खुद ही बनाया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों के बीच ही नहीं होता है, वह उनके समर्थक नेताओं के बीच भी होता है - इसीलिए लोगों को लग रहा है कि इस वर्ष के चुनाव में दीपक गुप्ता जीत कर भी हार गए हैं, और सुभाष जैन हार कर भी जीत गए हैं । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि हिंदी कथा साहित्य की मशहूर कहानी 'हार की जीत' इसी से मिलती-जुलती परिस्थिति को लेकर लिखी गई थी ।

Sunday, August 4, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के ई-क्लब मैग्नम से पैसा वापस माँगने की रोटरी फाउंडेशन की कार्रवाई ने 'बताया' कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता के खासमखास सुनील प्रकाश ने रवि सिंघल व नवनीत गुप्ता के साथ मिल कर सीएसआर, रोटरी फाउंडेशन व स्कूली बच्चों के साथ एक साथ धोखा किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों को रोटरी फाउंडेशन से मिले करीब 31 लाख रुपए वापस लौटाने के आदेश ने डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले को उजागर कर दिया है । इस मामले ने रोटरी फाउंडेशन के साथ-साथ सीएसआर (कॉपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी) के पैसों में भी रोटेरियंस की लूट की तरकीबों को सामने लाने का काम किया है । इस मामले ने डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के गैर-जिम्मेदार रवैये को भी उद्घाटित किया है, जो उनकी मिलीभगत होने के भी संकेत देता है । ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारियों ने जिस ग्लोबल ग्रांट (जीजी 1755525) में घपला किया है, वह शरत जैन के गवर्नर वर्ष में मंजूर हुई थी, और उस दौरान मुकेश अरनेजा डीआरएफसी थे । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने वरदान अस्पताल में बनने वाले ब्लड बैंक की ग्रांट के मामले में तो बड़ा बबाल काटा था, लेकिन ई-क्लब मैग्नम की ग्लोबल ग्रांट बिना किसी चूँ-चपड़ के पास कर दी थी । विन्स इंडिया के सेक्रेटरी के रूप में रमेश अग्रवाल ने उक्त ग्रांट मिलने पर खासी खुशी जाहिर की थी । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने तो और भी कमाल किया है । रोटरी फाउंडेशन व सीएसआर के पैसों की लूट के उद्देश्य से स्कूलों और स्कूली बच्चों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराए जा रहे क्लब के पूर्व प्रेसीडेंट सुनील प्रकाश को दीपक गुप्ता ने अपनी टीम में बेसिक एजुकेशन एंड लिट्रेसी कमेटी का जोन चेयरमैन बनाया हुआ है । इस तरह जाहिर होता है और देखने में आया है कि रोटरी फाउंडेशन, सीएसआर तथा स्कूली बच्चों के पैसों व उनकी सुविधाओं की लूट करने वाले ई-क्लब मैग्नम के पदाधिकारी डिस्ट्रिक्ट के कई बड़े पदाधिकारियों/नेताओं के चहेते हैं ।
सुनील प्रकाश को संबोधित रोटरी फाउंडेशन की तरफ से भेजे गए पाँच पृष्ठीय पत्र में विस्तार से बताया गया है कि हरियाणा के छह स्कूलों में शौचालय, पीने के पानी और शिक्षा सुविधाओं के स्तर में सुधार के उद्देश्य से ग्लोबल ग्रांट ली गई थी, जिसके तहत नए शौचालय बनने थे; नए कंप्यूटर लगने थे; विज्ञान की प्रयोगशालाओं के लिए टेबल व रैक्स व स्टूल तथा क्लास रूम्स के लिए नए डेस्क्स आने थे; इन्वर्टर व यूपीएस लगने थे; आदि-इत्यादि । प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद रोटरी फाउंडेशन की ऑडिट टीम ने मौके पर जा कर जो जाँच की, उसमें लेकिन घपलेबाजी की पोल खुली । ऑडिट टीम ने पाया कि प्रोजेक्ट के तहत जो कुछ भी किया जाना था, उसमें से कुछ भी नहीं किया गया । नए शौचालय बनवाने की जगह पुराने बने शौचालयों की ही मरम्मत/पुताई करवा दी गई; नए कंप्यूटर, इन्वर्टर व यूपीएस देने/लगाने की जगह पुराने कंप्यूटर्स, इन्वर्टर व यूपीएस की ही सर्विस करवा दी गई; डेस्क, टेबल, रैक्स, स्टूल आदि के मामले में भी यही रवैया अपनाया गया । प्रोजेक्ट के सलाहकार की फीस के नाम पर करीब साढ़े तीन लाख रुपए खर्च दिखाए गए । ऑडिट टीम का निष्कर्ष रहा कि प्रोजेक्ट में जो जो काम करने की बात की गई थी, उनमें से कोई भी काम करने के उदाहरण नहीं मिले हैं । ऑडिट टीम की रिपोर्ट के आधार पर रोटरी फाउंडेशन ने सुनील प्रकाश को फैसला सुनाया है कि चूँकि प्रोजेक्ट के तहत बताए गए कोई काम नहीं हुए हैं, इसलिए विभिन्न मदों में दिखाए गए कुल खर्च के 30,85,085 रुपए वह रोटरी फाउंडेशन को 31 अगस्त तक वापस भेजें ।
रोटरी फाउंडेशन के पैसों के साथ की गई इस लूट का और भी गंभीर व सनसनीखेज पक्ष यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जेको एयरकॉन लिमिटेड से सीएसआर के तहत पैसा लिया गया । जो तथ्य इस बात को गंभीर व सनसनीखेज बनाता है, वह यह है कि सुनील प्रकाश इस कंपनी में डायरेक्टर हैं । सुनील प्रकाश के साथ प्रोजेक्ट कमेटी में जो दूसरे लोग सदस्य हैं, उनमें रवि सिंघल इसी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और नवनीत कुमार गुप्ता इसी कंपनी में एक अन्य डायरेक्टर हैं । रवि सिंघल पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के प्रेसीडेंट थे, और नवनीत कुमार गुप्ता प्रेसीडेंट इलेक्ट हैं । क्लब में कुल 16 सदस्य हैं । यानि क्लब कुल मिलाकर इन्हीं तीन-चार लोगों का क्लब है । इस तरह कहानी यह बनी कि इनकी कंपनी इनके क्लब को सीएसआर के तहत पैसे देती है, जिसे दिखा कर यह रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम ले लेते हैं - और उसे हजम कर जाते हैं । इस तरह यह एक साथ सरकार से, रोटरी फाउंडेशन से और स्कूली बच्चों से धोखा करते हैं । सुनील प्रकाश, रवि सिंघल, नवनीत कुमार गुप्ता आदि बड़े लोग हैं, बड़े पैसे वाले लोग हैं, बड़ी बड़ी बातें करते हैं; यह स्कूली डेस्क, स्टूल, रैक्स, कंप्यूटर और शौचालयों के पैसों में चोरी-चकारी जैसा काम करेंगे - यह किसी ने नहीं सोचा था । लेकिन रोटरी फाउंडेशन से सुनील प्रकाश को संबोधित और भेजा गया पत्र इनकी सारी कारस्तानी की पोल खोल देता है और इनके मामले में 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' वाली कहावत को चरितार्थ करता है । 

Wednesday, July 24, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नामांकन आमंत्रित करके जल्दी चुनाव कराने के संकेत दिए हैं; लोगों को लगता है कि जल्दी चुनाव करवाने की कोशिश दीपक गुप्ता का हाल सतीश सिंघल जैसा कर सकती है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए नामांकन आमंत्रित करने की कार्रवाई को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जल्दी चुनाव करवाने की 'तैयारी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि दीपक गुप्ता जल्दी चुनाव करवा कर ललित खन्ना की जीत को सुनिश्चित कर देना चाहते हैं । दिलचस्प संयोग यह है कि करीब दो वर्ष पहले यही फार्मूला अपना कर तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल ने ललित खन्ना की चुनावी संभावनाओं को खत्म कर/करवा दिया था, और आलोक गुप्ता की जीत को सुनिश्चित किया था - लेकिन उसी फार्मूले के जरिए इस बार ललित खन्ना की उम्मीदवारी की नाव को किनारे पहुँचाने की तैयारी की जा रही है । दीपक गुप्ता के नजदीकी पदाधिकारियों का हालाँकि कहना है कि उन्हें नहीं लगता है कि दीपक गुप्ता जल्दी चुनाव करवाने की तैयारी में हैं; और नामांकन आमंत्रित करने के पीछे ऐसा कोई उद्देश्य नहीं देखा जाना चाहिए । अन्य लोगों को भी लगता है कि जल्दी चुनाव करवा कर सतीश सिंघल की गवर्नरी का प्रभाव जिस तरह खराब हो गया था, उसे दीपक गुप्ता ने देखा/पहचाना है और उससे सबक लेकर वह वैसी 'गलती' नहीं करेंगे - जैसी सतीश सिंघल ने की थी । दरअसल अक्टूबर में चुनाव का नतीजा आ जाने से क्लब्स के पदाधिकारी आलोक गुप्ता के स्वागत/सम्मान में लग गए थे और यह भूल ही गए थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की उपेक्षा होने की स्थितियाँ आलोक गुप्ता की जीत की घोषणा होने के साथ ही बन गईं थीं । इसी आधार पर लोगों को लगता है कि दीपक गुप्ता ने यदि जल्दी चुनाव करवाया तो उनका हाल भी सतीश सिंघल जैसा ही होगा ।
उल्लेखनीय है कि सतीश सिंघल का हाल देख कर ही पिछले वर्ष सुभाष जैन ने नामांकन आमंत्रित करने का काम ही नबंवर में किया था और चुनावी प्रक्रिया को जनवरी में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस तक खींच ले गए थे । इसी बिना पर उम्मीद की जा रही थी कि दीपक गुप्ता भी अपने गवर्नर-वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनाव को करवाने में जल्दी नहीं दिखायेंगे । लेकिन दीपक गुप्ता ने नामांकन आमंत्रित करके लोगों को यह कयास लगाने के लिए प्रेरित किया है कि वह जल्दी चुनाव कराने की तैयारी कर रहे हैं । लोगों को लगता है कि जल्दी चुनाव करवा कर दीपक गुप्ता दरअसल ललित खन्ना की जीत को व्यावहारिक रूप दे देना चाहते हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का मानना और कहना है कि दीपक गुप्ता को लगता है कि इस समय ललित खन्ना की चुनावी स्थिति बहुत अच्छी है, और यदि अभी चुनाव हो जाएँ, तो उनकी जीत पक्की है - चार/पाँच महीने बाद हालात बदल भी सकते हैं । दूसरे लोगों को भी लगता है कि डिस्ट्रिक्ट में अभी क्लब्स के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह हो रहे हैं, और अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता की पूछ/परख हो रही है - इस कारण दीपक गुप्ता अभी ललित खन्ना की जीत का श्रेय भी ले सकेंगे; बाद में फिर नए समीकरण बनने लगेंगे और तब राजनीतिक स्थिति जरूरी नहीं है कि वैसी ही बनी रहे, जैसी कि वह अभी नजर आ रही है । 
दीपक गुप्ता को यह डर अभी दिख रहे संकेतों से भी मिल रहा है । दीपक गुप्ता को यह देख/जान कर दरअसल तगड़ा झटका लगा है कि अधिष्ठापन समारोह के लिए उन्होंने क्लब्स को जो 'प्रोटोकॉल' दिया था, अधिकतर क्लब्स के पदाधिकारियों ने उसे मानने/अपनाने से इंकार कर दिया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के पदाधिकारियों को निर्देश दिए थे कि अधिष्ठापन समारोह में वह सिर्फ उन्हें ही आमंत्रित करें, अन्य किसी गवर्नर को नहीं; उनके क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद के अलावा दो/तीन अन्य क्लब्स के पदाधिकारियों ने ही उनके इस निर्देश को स्वीकार किया, बाकी क्लब्स उनके साथ पिछले/अगले गवर्नर्स को भी अपने अधिष्ठापन समारोह में आमंत्रित कर रहे हैं, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद दीपक गुप्ता असहाय बने क्लब्स पदाधिकारियों द्वारा की जा रही अपने निर्देश की इस अवहेलना को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हुए पड़े हैं । इसके अलावा, उनकी इस तथा अन्य कुछेक हरकतों के चलते डिस्ट्रिक्ट के पूर्व व भावी गवर्नर्स उनसे नाराज होते जा रहे हैं; डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा कई मामलों को लेकर उनसे खफा सुने/बताए जा रहे हैं । दीपक गुप्ता के प्रति गवर्नर्स के बीच पैदा होने वाली यह नाराजगी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बन सकती है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता की पहले ही महीने में डिस्ट्रिक्ट में जो भद्द पिटने लगी है, उसे देख/पहचान कर खुद दीपक गुप्ता को ही लगने लगा है कि उन्हें यदि ललित खन्ना की जीत का श्रेय लेना है, तो उन्हें जल्दी चुनाव करवा लेना चाहिए । चुनावी राजनीति की जरूरत दीपक गुप्ता को भले ही जल्दी चुनाव करवाने के लिए प्रेरित कर रही हो, लेकिन जल्दी चुनाव करवाने के जरिए सतीश सिंघल के हुए हाल को याद करके उनके लिए जल्दी चुनाव करवाने का फैसला करना आसान भी नहीं होगा । लोगों को लगता है कि दीपक गुप्ता नामांकन आमंत्रित करके फिलहाल 'गोटी' अपने हाथ में कर लेना चाहते हैं और फिर हालात के अनुरूप उन्हें जैसा करने में 'फायदा' दिखेगा, वैसा कर लेंगे । दीपक गुप्ता क्या करेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनके नामांकन आमंत्रित करने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति की हलचल जरूर बढ़ गई है ।

Saturday, July 13, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अचानक से प्रस्तुत हुई मनीष गोयल की उम्मीदवारी के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समीकरणों में सेंध लगने की स्थिति सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाती लग रही है

नई दिल्ली । मनीष गोयल इंकार करते करते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी संग्राम में आखिरकार कूद ही पड़े हैं । यही तमाशा पिछले दिनों अशोक जैन ने किया/दिखाया था; वह भी ना ना करते हुए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर बैठे थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें यह समझ में आ गया कि यह 'खेल' उनके बस का है नहीं - सो वह चुपचाप वापस हो लिए । मनीष गोयल को जानने वालों का कहना है कि यह खेल मनीष गोयल के बस का भी नहीं है, और यदि उनकी सद्बुद्धि वापस लौटी तो वह भी अशोक जैन वाली होशियारी दिखायेंगे - अन्यथा उनका हाल रवि सचदेवा जैसा होगा । मनीष गोयल के मामले में दो बातें गौर करने वाली हैं : एक यह कि उनके नजदीकी और डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ी पिछले करीब दो महीने से उन्हें उम्मीदवार बनने के लिए उकसा/भड़का रहे थे, लेकिन अपनी तात्कालिक पारिवारिक जिम्मेदारियों का वास्ता देकर वह कह/बता रहे थे कि इस वर्ष तो उम्मीदवार बन पाना उनके लिए असंभव ही होगा ।उनके नजदीकी एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने इन पंक्तियों के लेखक से बताया है कि मनीष गोयल ने अपनी कुछेक ऐसी तात्कालिक पारिवारिक जिम्मेदारियों का जिक्र किया, जिन्हें सुन/जान कर उन्हें भी लगा कि इस वर्ष उम्मीदवार बनना मनीष गोयल के लिए मुसीबतभरा ही होगा और इसीलिए उन्होंने मनीष गोयल से उम्मीदवारी की बात करना बंद कर दिया था । गौर करने वाली दूसरी बात मनीष गोयल का वह सार्वजनिक कथन है जो उन्होंने डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी बनाए जाने पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को थैंक्यू कहते हुए दर्ज किया था, जिसमें उन्होंने अपने सेक्रेटरी-वर्ष को 'लर्निंग ईयर' (सीखने वाला वर्ष) कहा था । इन दो बातों पर गौर करते हुए कह सकते हैं कि अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए मनीष गोयल ने खुद अपने द्वारा ही बताई गईं अपनी गंभीर पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लिया है; और जो 'लर्निंग' उन्हें पूरे वर्ष करनी थी, वह उन्होंने शुरू के महीने के पहले सप्ताह में ही कर ली है ।
इसीलिए मनीष गोयल की उम्मीदवारी पर सबसे पहली प्रतिक्रिया के रूप में डिस्ट्रिक्ट के लोगों का कहना यही है कि ऐसा कन्फ्यूज्ड व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनेगा भी, तो करेगा क्या ? लोगों का कहना यही है कि उम्मीदवारी प्रस्तुत करने में मनीष गोयल ने जितनी जो देरी की है, उससे ही साबित है कि यह उनका 'अपना' फैसला नहीं है, वह तो बस किन्हीं और लोगों के उकसाने/भड़काने के चलते उम्मीदवार बन गए हैं । मनीष गोयल किन लोगों के उकसाने/भड़काने के चलते उम्मीदवार बने हैं, इसे लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों की राय बँटी हुई है; कुछेक लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट आलोक गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो अन्य कुछेक लोग इसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता को जिम्मेदार मान रहे हैं । मनीष गोयल को डिस्ट्रिक्ट में हालाँकि पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; मुकेश अरनेजा को लेकिन सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा है - इसलिए यह बात पहेली भी बनी हुई है कि मनीष गोयल आखिर किस भरोसे उम्मीदवार बने हैं ? डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच चर्चा यही है कि दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता ने अपने अपने 'स्वार्थ' में मनीष गोयल को बलि के लिए बकरा बना दिया है । मनीष गोयल की उम्मीदवारी को डिस्ट्रिक्ट में कोई भी गंभीरता से लेता हुआ भले ही न दिख रहा हो, लेकिन उनकी अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को नाटकीय बनाने का काम तो किया ही है - और इस नाटकीय परिदृश्य में ललित खन्ना के लिए मुसीबत बढ़ती देखी जा रही है, और ललित खन्ना की बढ़ती मुसीबत में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को फायदा होने का अनुमान लगाया जा रहा है ।
ललित खन्ना दरअसल अभी तक दीपक गुप्ता और उनकी कोर टीम का एकतरफा समर्थन पाते हुए नजर आ रहे थे; मनीष गोयल की उम्मीदवारी के आने से जिसके बँटने का खतरा पैदा हो गया है । ललित खन्ना के कुछेक शुभचिंतकों का हालाँकि दावा है कि ललित खन्ना ने दीपक गुप्ता के लिए जो किया है, उसे देखते हुए दीपक गुप्ता उनके साथ धोखा नहीं करेंगे; लेकिन उनके सामने सवाल यह है कि मनीष गोयल की उम्मीदवारी के पीछे यदि दीपक गुप्ता नहीं हैं, तो दीपक गुप्ता उम्मीदवारी घोषित करने के बाद मनीष गोयल को डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के पद से हटा क्यों नहीं देते हैं और क्लब्स की मीटिंग्स में उन्हें अपने साथ ले जाना बंद क्यों नहीं कर देते हैं ? दीपक गुप्ता को 'जानने' वाले लोगों का कहना तो यहाँ तक है कि दीपक गुप्ता ने वास्तव में ललित खन्ना की 'लगाम कसने' के लिए ही मनीष गोयल को उम्मीदवार बनाया है, और इसीलिए वह मनीष गोयल को डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी बनाए रखेंगे । जो लोग मनीष गोयल की उम्मीदवारी के पीछे आलोक गुप्ता को देख रहे हैं, उनका कहना है कि अपनी गवर्नरी की 'धमक' पैदा करने के लिए उन्हें एक उम्मीदवार चाहिए था; दरअसल रोटरी में गवर्नरी तभी 'पूरी हुई' मानी जाती है जब वह किसी और को गवर्नर बनवाता है - जैसे जेके गौड़ ने सुभाष जैन को बनवाया, सुभाष जैन ने अशोक अग्रवाल को बनवाया, दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता को सतीश सिंघल के 'प्रॉडक्ट' के रूप में देखा/पहचाना जाता है, दीपक गुप्ता ने ललित खन्ना का झंडा उठा लिया; आलोक गुप्ता के पास हालाँकि गवर्नरी 'पूरी' करने का अभी अगले वर्ष का मौका है, लेकिन उन्होंने जब देखा/पाया कि मनीष गोयल में 'कीड़े' तो हैं, लेकिन कीड़े अलग अलग दिशाओं में भाग रहे हैं, तो उन्होंने मौका ताड़ा और मनीष गोयल के 'कीड़ों' को एक दिशा में करके उन पर एडहेसिव टेप लगा दिया; आलोक गुप्ता को यह भी उम्मीद होगी कि मनीष गोयल के रूप में एक उम्मीदवार उनके हाथ में होगा, तो उनके कार्यक्रमों में उनके 'काम' आयेगा ।
मनीष गोयल की उम्मीदवारी को 'कठपुतली' उम्मीदवारी के रूप में देखे जाने के कारण मनीष गोयल के लिए एक उम्मीदवार के रूप में 'मूव' करना फजीहतभरा तो होगा, लेकिन उनकी उम्मीदवारी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को त्रिकोणीय बनाने का जो काम किया है - उसने ललित खन्ना की तैयारी व स्थिति को गड़बड़ा दिया है । दरअसल मनीष गोयल की उम्मीदवारी के चलते बनते/बिगड़ते समीकरण सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करते हैं; वह सिर्फ ललित खन्ना की उम्मीदवारी के पक्ष में बनते समीकरणों को प्रभावित करते नजर आ रहे हैं - इसलिए मनीष गोयल की उम्मीदवारी के चलते ललित खन्ना के समर्थन-आधार में पड़ती दिख रही सेंध सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाती लग रही है ।

Friday, July 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के इंस्टॉलेशन समारोह में ललित खन्ना के मेजर डोनर लेवल थ्री बनने की घोषणा पर प्रेसीडेंट्स से मिली उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले रोटेरियंस ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए अच्छे संकेत के रूप में देख/पहचान रहे हैं

नई दिल्ली । ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में मेजर डोनर लेवल थ्री बनने के लिए जो चेक दिया, और उनके चेक को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा ने जिस उत्साहपूर्ण तरीके से समारोह में उपस्थित लोगों को 'दिखाया' - उसके चलते क्लब्स के प्रेसीडेंट के बीच ललित खन्ना की पहचान का रंग और गाढ़ा हुआ दिख रहा है । इंस्टॉलेशन समारोह में मंच से ललित खन्ना की जो वाह-वाही हुई, उसे देख कर क्लब्स के प्रेसीडेंट इतने प्रभावित हुए कि उनमें से अधिकतर ने वहीं ललित खन्ना को अपने अपने क्लब के इंस्टॉलेशन समारोह में आने का निमंत्रण दे डाला । प्रेसीडेंट्स ने उनसे आग्रह किया कि उन्हें उनके क्लब के इंस्टॉलेशन समारोह में अवश्य ही आना है । अपने क्लब के इंस्टॉलेशन समारोह में ललित खन्ना की उपस्थिति को सुनिश्चित करवाने का प्रेसीडेंट्स का यह नजारा डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में तो देखने को मिला ही, उसके बाद भी कई एक प्रेसीडेंट्स अपने क्लब के इंस्टॉलेशन में ललित खन्ना की उपस्थिति को सुनिश्चित करने के प्रयासों में लगे हैं । दरअसल यह बात दर्शाती है कि डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन में मेजर डोनर लेवल थ्री बनने के लिए ललित खन्ना ने रोटरी फाउंडेशन के नाम जो चेक दिया, उसकी प्रेसीडेंट्स पर कुछ अलग ही छाप पड़ी है । ललित खन्ना चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार हैं, इसलिए क्लब्स के प्रेसीडेंट पर पड़ी इस छाप का एक राजनीतिक अर्थ भी निकलता है, जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को मजबूती प्रदान करता है । 
डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में मंच से हुई ललित खन्ना की वाह-वाही ने प्रेसीडेंट्स को दरअसल इसलिए भी अलग तरीके से प्रभावित किया, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में पहुँचने से पहले ही, प्रेसीडेंट-वर्ष की शुरुआत होने के मौके पर उन्हें ललित खन्ना की तरफ से खास तौर से डिजाईन किया गया शुभकामना-संदेश देता हुआ कॉर्ड मिल चुका था; जिसे पा/देख कर उन्हें ललित खन्ना की व्यापक सोच व नजरिये का ठोस परिचय मिल चुका था । दरअसल इसी परिचय को डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में उस समय और मजबूती मिली जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता तथा कुछेक अन्य गवर्नर्स की मौजूदगी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना के द्वारा दिए गए चेक को जब लहरा कर दिखाया और उनके मेजर डोनर लेवल थ्री बनने की घोषणा की । इस घोषणा को सुन कर ललित खन्ना से प्रेसीडेंट्स के प्रभावित होने की 'जमीन' वास्तव में ललित खन्ना की तरफ से भेजे गए उस शुभकामना-कॉर्ड ने तैयार की हुई थी, जो प्रेसीडेंट्स को पहले ही मिल चुका था । ललित खन्ना ने उक्त कॉर्ड को खास तरीके से डिजाईन किया/करवाया था, जिसमें रोटरी के संस्थापक पॉल हैरिस का रोटेरियंस को लेकर कहा गया एक प्रेरणा-संदेश था, उसके साथ क्लब के प्रेसीडेंट की तस्वीर थी और उन्हें उनके नाम के साथ संबोधित करते हुए शुभकामना-संदेश था । ललित खन्ना ने सभी प्रेसीडेंट्स को इस कॉर्ड की सॉफ्ट व हॉर्ड कॉपी भेजी, जिससे सभी प्रेसीडेंट्स ने 'स्पेशल' फील किया । 
प्रेसीडेंट्स को 'स्पेशल' फील करवा कर ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी को मजबूती देने की जो कोशिश की, उसे डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह में उनके मेजर डोनर लेवल थ्री बनने की घोषणा ने और बल प्रदान किया है । ललित खन्ना के नजदीकियों तथा उनके शुभचिंतकों को लगता है कि प्रेसीडेंट्स ने ललित खन्ना के साथ नजदीकी बनाने तथा दिखाने में जिस तरह से दिलचस्पी प्रदर्शित की है, उसके कारण निश्चित ही ललित खन्ना की उम्मीदवारी को फायदा होगा । डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट अपने अपने क्लब के इंस्टॉलेशन समारोह में ललित खन्ना की उपस्थिति को सुनिश्चित करने/करवाने के लिए जो रुचि दिखा रहे हैं, उसे ललित खन्ना के नजदीकियों व शुभचिंतकों के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले दूसरे रोटेरियंस भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए अच्छे संकेत के रूप में देख/पहचान रहे हैं - और इस बात ने इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य में ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खासा महत्त्वपूर्ण बना दिया है ।

Friday, June 14, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी फाउंडेशन के लिए 'जबरन बसूली' के चलते मुसीबत में फँसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन की मदद के लिए अब उन रोटेरियंस की तरफ देख रहे हैं, जिन्हें अभी तक वह सुभाष जैन का 'आदमी' बताते हुए उपेक्षित और 'अपमानित' करते रहे थे

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की तैयारी करते हुए दीपक गुप्ता ने जो भी काम किए हैं, उनमें से कुछेक ऐसे रहे हैं जिन्होंने उन्हें रोटेरियंस के बीच 'चुटकुला' बना छोड़ा है । अपने गवर्नर-वर्ष के इंस्टॉलेशन समारोह को लेकर दीपक गुप्ता ने जो 'कांड' किया है, उसने उनकी चुटकुला पहचान को और गाढ़ा बनाने का काम ही किया है । एक मशहूर चुटकुला है कि एक कार्यक्रम के आयोजकों ने घोषणा की कि उनके कार्यक्रम में प्रवेश निःशुल्क है । कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद लोग बाहर निकलने के लिए जब दरवाजे की तरफ बढ़े, तब उन्हें बताया गया कि बाहर निकलने के लिए उन्हें पैसे देने पड़ेंगे । लोगों ने यह कहते हुए आपत्ति की कि कहा तो यह गया था कि प्रवेश निःशुल्क है; तो उन्हें मासूमियतभरा जबाव मिला कि इसीलिए तो प्रवेश के समय आपसे पैसे नहीं माँगे गए थे । दीपक गुप्ता ने 'शंखनाद' शीर्षक से आयोजित हो रहे डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन समारोह को लेकर उसी चुटकुले को चरितार्थ किया है । दीपक गुप्ता ने घोषणा की है कि उक्त समारोह में शामिल होने वाले लोगों से कोई चार्ज नहीं लिया जायेगा; लेकिन अगले ही वाक्य में उन्होंने स्पष्ट किया है कि समारोह का निमंत्रण पत्र उन्हें ही मिलेगा, जो रोटरी फाउंडेशन के लिए 250 अमेरिकी डॉलर, यानि 17 हजार पाँच सौ रुपए देंगे । कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रत्येक रोटेरियन को जब 17 हजार पाँच सौ रुपए देने ही पड़ेंगे, तब फिर उनके लिए समारोह निःशुल्क कहाँ रहा ? चुटकुले वाले आयोजकों की तर्ज पर लोगों को दीपक गुप्ता का मासूमियत भरा जबाव और तर्क है कि यह रकम तो वह रोटरी फाउंडेशन के लिए ले रहे हैं, समारोह तो लोगों के लिए निःशुल्क ही है ।
दीपक गुप्ता की इस हरकत पर वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना हालाँकि यह है कि दीपक गुप्ता का उद्देश्य तो अच्छा है, लेकिन उद्देश्य को पाने का उनका तरीका बहुत ही फूहड़ और बेवकूफीभरा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे जुटाना प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए प्राथमिक कार्य माना जाने लगा है, और इसके लिए रोटेरियंस को प्रेरित करने के उद्देश्य से छोटे/बड़े स्तर पर ट्रेनिंग प्रोग्राम किए जाते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से भी उम्मीद की जाती है कि वह अपने कार्यक्रमों में तथा क्लब्स में होने वाली जीओवी में रोटेरियंस को रोटरी फाउंडेशन में पैसे देने के महत्त्व के बारे में बताते हुए प्रेरित करेंगे; लेकिन दीपक गुप्ता ने रोटरी फाउंडेशन के लिए पैसे इकट्ठे करने के मामले में प्रेरित करने/कराने का चक्कर छोड़ कर जबरन बसूली का रास्ता अपना लेने में सहूलियत देखी है । डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रोटेरियंस को रोटरी फाउंडेशन के प्रति जागरूक बनाने तथा उसको दान देने के लिए प्रेरित करने के मौके के रूप में भी देखते/पहचानते हैं; लेकिन दीपक गुप्ता ने उल्टी ही चाल पकड़ी है और डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन को जबरन बसूली का मौका बना दिया है । कुछेक लोगों को लगता है कि दीपक गुप्ता ने ऐसा करके दरअसल बड़ी चालाकी खेली है । उन्हें डर था कि डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन में प्रवेश निःशुल्क रखेंगे, तो बड़ी संख्या में लोग आ धमकेंगे, जिससे खर्चा बढ़ेगा; उपस्थिति सीमित करने/रखने के लिए वह कम लोगों को निमंत्रण देंगे तो जिन्हें निमंत्रण नहीं मिलेगा, वह नाराज होंगे - लेकिन अब 'मुफ्त' वाले लोग इंस्टॉलेशन में आयेंगे नहीं, और कोई शिकायत भी नहीं कर सकेगा कि उसे निमंत्रित नहीं किया गया । इस तरह रोटरी फाउंडेशन के नाम पर 17 हजार पाँच सौ रुपए का बोझ डाल कर दीपक गुप्ता ने दरअसल डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन में हो सकने वाली भीड़ को नियंत्रित करने का काम किया है । 
दीपक गुप्ता को लेकिन अपनी यह होशियारी भारी पड़ती हुई भी दिख रही है । 17 हजार पाँच सौ रुपए देकर डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने में रोटेरियंस दिलचस्पी लेते हुए नहीं दिख रहे हैं; जिसके बाद दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के उन वरिष्ठ रोटेरियंस के दरवाजे खटखटाना शुरू किया है - जिन्हें अभी तक उन्होंने अपने किसी कार्यक्रम में नहीं पूछा/बुलाया था । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि उन्होंने करीब सौ/सवा सौ ऐसे वरिष्ठ रोटेरियंस की सूची बनाई हुई है, जो सुभाष जैन के मौजूदा गवर्नर-वर्ष में मुख्य पदों पर हैं और सक्रिय हैं; दीपक गुप्ता इन्हें सुभाष जैन के 'आदमी' के रूप में देखते/पहचानते हैं, और इस नाते उन्होंने इन्हें अपने कार्यक्रमों से दूर दूर ही रखा है; लेकिन अब दीपक गुप्ता इन्हें तरह तरह से मैसेज करके डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं । असल में, दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन के रजिस्ट्रेशन के लिए उन लोगों से कोई मदद नहीं मिल रही है, जिन्हें उन्होंने अपने आसपास जोड़ा हुआ है । इस मामले में दीपक गुप्ता को सबसे तगड़ा झटका डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की तरफ से लगा है । उनका रोना है कि मुकेश अरनेजा रजिस्ट्रेशन के लिए मदद तो नहीं ही कर रहे हैं, उलटे लोगों को डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन के खिलाफ भड़का और रहे हैं । दरअसल, रोटरी फाउंडेशन के लिए की जा रही जबरन बसूली की शिकायत लोगों ने मुकेश अरनेजा से की, तो मुकेश अरनेजा ने यह कहते/बताते हुए अपनी जान छुड़ाई कि उन्होंने तो दीपक गुप्ता को बहुत समझाया था कि डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन यदि निःशुल्क कर रहे हो, तो 'सचमुच' निःशुल्क करो; और यदि रोटरी फाउंडेशन के नाम पर पैसे लेना ही चाहते हो, तो रकम प्रतीकात्मक रखो और कम रखो - लेकिन दीपक गुप्ता ने उनकी सुनी/मानी ही नहीं । मुकेश अरनेजा के इस जबाव को दीपक गुप्ता लोगों को भड़काने वाला बता रहे हैं; और ऐसे में डिस्ट्रिक्ट इंस्टॉलेशन की मदद के लिए अब वह डिस्ट्रिक्ट के उन वरिष्ठ रोटेरियंस की तरफ देख रहे हैं, जिन्हें अभी तक वह सुभाष जैन का 'आदमी' बताते हुए उपेक्षित और 'अपमानित' करते रहे थे ।

Monday, June 10, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता द्वारा अपनी कोर टीम के सदस्य मनीष गोयल पर मुकेश अरनेजा के लिए जासूसी करने के लगाए आरोप ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता को डराया

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की तैयारी कर रहे दीपक गुप्ता और उनके गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की भूमिका निभाने वाले मुकेश अरनेजा के बीच गलतफहमियाँ पैदा होने तथा झगड़े जैसी स्थितियाँ बनने के लिए मनीष गोयल को जिम्मेदार ठहराए जाने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता के सामने मुसीबत खड़ी हो गई है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की ही तरह आलोक गुप्ता की कोर टीम में भी मनीष गोयल को खासी तवज्जो मिलती दिख रही है । मनीष गोयल को एक अच्छे कार्यकर्त्ता के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और इसी नाते वह पहले दीपक गुप्ता तथा अब आलोक गुप्ता की 'आँखों के तारे' बन रहे हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि मनीष गोयल ने काफी मेहनत से दीपक गुप्ता के काम किए हैं, और संभवतः उनकी इसी खूबी को देख कर आलोक गुप्ता ने भी उन्हें अपने नजदीक किया है । लेकिन पिछले कुछेक दिनों से मनीष गोयल का नाम दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा के बीच मनमुटाव की स्थितियाँ बनाने के मामले में आ रहा है । दीपक गुप्ता ने अपने नजदीकियों के बीच पहले तो संदेह जताया था और अब वह सीधे सीधे आरोप लगाने लगे हैं कि मनीष गोयल उनके यहाँ मुकेश अरनेजा के जासूस की तरह काम कर रहे हैं, और उनकी गतिविधियों व कामकाज की तैयारी के बारे में मुकेश अरनेजा को पल पल की खबरें देते/पहुँचाते रहे हैं । दीपक गुप्ता के इस आरोप ने आलोक गुप्ता को मुसीबत में डाल दिया है; आलोक गुप्ता को डर हुआ है कि मनीष गोयल कहीं उनके यहाँ भी तो मुकेश अरनेजा की जासूसी नहीं करेंगे ?
दीपक गुप्ता को कई बार यह देख/जान कर हैरानी हुई कि उनके कई फैसले उद्घाटित होने से पहले ही संबद्ध लोगों को मालूम होते है, और कई एक मामलों में दीपक गुप्ता को यह भी पता चला कि यह सब मुकेश अरनेजा के जरिये होता है ।मुकेश अरनेजा ने कई लोगों को बताया कि उन्होंने उन्हें दीपक गुप्ता की टीम में फलाँ पद दिलवा दिया है; कुछेक लोगों से तो मुकेश अरनेजा ने यहाँ तक दावा कर दिया कि दीपक गुप्ता तो तुम्हें उक्त पद देना ही नहीं चाहता था, लेकिन मैंने जोर दिया तब तुम्हें उक्त पद मिल सका है । दीपक गुप्ता के आयोजनों में दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स से आने वाले वरिष्ठ रोटेरियंस व पदाधिकारियों तक के साथ मुकेश अरनेजा ने ऐसा ही खेल खेला । मुकेश अरनेजा ने उन्हें फोन करके पूछा/कहा कि अरे, दीपक गुप्ता ने अभी आपको फोन नहीं किया है; मैंने उससे कहा है कि आपको फोन करे; मैं फिर उससे आपको फोन करने के लिए कहता हूँ; आदि-इत्यादि । दीपक गुप्ता ने जब इस तरह की बातें सुनीं तो वह हैरान हुए और मुकेश अरनेजा की इस हरकत पर नाराज हुए । कई मामलों में 'मौके' इतने सटीक थे कि दीपक गुप्ता के फोन करने से ठीक पहले मुकेश अरनेजा का फोन पहुँचा हुआ था और 'दूसरी तरफ' जो व्यक्ति था, उसने यही समझा कि मुकेश अरनेजा की कोशिशों से ही दीपक गुप्ता ने उन्हें फोन किया है । मुकेश अरनेजा की इस तरह की हरकतों से दीपक गुप्ता नाराज तो हुए ही, लेकिन उन्हें इस बात पर हैरानी भी हुई कि जो बातें और जो काम चार-पाँच लोगों के बीच ही डिस्कस हुए हैं, उनकी खबर मुकेश अरनेजा तक कैसे पहुँची । दीपक गुप्ता को यह समझने में हालाँकि देर नहीं लगी कि यह सब मनीष गोयल की ही कारस्तानी है ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में मनीष गोयल को मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के रूप में ही पहचाना जाता है । दीपक गुप्ता की कोर टीम में मनीष गोयल को मुकेश अरनेजा की सिफारिश पर ही जगह मिली है । मजे की जानकारी यह भी है कि मुकेश अरनेजा ने मनीष गोयल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का उम्मीदवार बनाने की तैयारी भी की थी, लेकिन दीपक गुप्ता के दिलचस्पी न लेने के कारण मुकेश अरनेजा और मनीष गोयल को फिर पीछे हटना पड़ा । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का कहना/बताना है कि दीपक गुप्ता ने एक कार्यक्रम में मनीष गोयल से स्पॉन्सरशिप के लिए कहा था, लेकिन मनीष गोयल उसके लिए तैयार नहीं हुए । इसी से दीपक गुप्ता को आभास हुआ कि मनीष गोयल मुफ्त में उम्मीदवार बनना चाहते हैं, और इसीलिए उन्होंने मनीष गोयल की उम्मीदवारी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई; फलस्वरूप मनीष गोयल की उम्मीदवारी की बात जितनी तेजी से उठी, उतनी ही तेजी से वह दब भी गई । दीपक गुप्ता को अब लग रहा है कि मनीष गोयल की उम्मीदवारी को वह शह/समर्थन यदि दे देते तो मनीष गोयल और मुकेश अरनेजा मिलकर उनकी गवर्नरी का पता नहीं क्या हाल करते । मुकेश अरनेजा के साथ दीपक गुप्ता के संबंध पहले ही तनावपूर्ण हो चुके थे, जिस कारण मुकेश अरनेजा उनके किसी किसी कार्यक्रम को बीच में ही छोड़ कर निकल गए थे; बात बढ़ने पर हालाँकि मुकेश अरनेजा ने सफाई दी थी कि एक बार तबियत खराब होने पर तथा एक बार एक काम के कारण उन्हें कार्यक्रम के बीच से जाना पड़ा था । लेकिन दीपक गुप्ता ने मनमुटाव की बातों पर पर्दा डालने की कोई कोशिश नहीं की । दीपक गुप्ता को लग रहा है और जो उन्होंने अपने नजदीकियों के बीच कहा भी कि मुकेश अरनेजा और उनके बीच संबंधों को खराब करने का काम मुकेश अरनेजा के लिए की गई मनीष गोयल की जासूसी ही जिम्मेदार है । दीपक गुप्ता के इस अनुभव और आरोप ने आलोक गुप्ता को चिंता में डाल दिया है; उन्हें डर हुआ है कि मनीष गोयल उनके गवर्नर-वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार बनने का प्रयास करेंगे और मुकेश अरनेजा के लिए जासूसी भी करेंगे - और इस तरह उनका गवर्नर-वर्ष कहीं मुकेश अरनेजा की हरकतों की भेंट न चढ़ जाए ।

Saturday, May 18, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने से पहले ही दीपक गुप्ता ने पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर और फिर डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की तैयारी शुरू करके रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में एक नया तमाशा खड़ा कर दिया है तथा अपने आप को मजाक का पात्र भी बना लिया है

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता की आलोक गुप्ता के गवर्नर-काल का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की कोशिशों ने आलोक गुप्ता और मुकेश अरनेजा को एक साथ मुसीबत में डाल दिया है । हालाँकि कई लोगों को दीपक गुप्ता का मजाक बनाने का मौका भी मिल गया है । उनका कहना है कि दीपक गुप्ता का अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का कार्यकाल शुरू नहीं हुआ है, और वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की जिम्मेदारी संभालने के लिए भी तैयार हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि इससे पहले, दीपक गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की फुनगी छोड़ कर अपना मजाक उड़वा चुके हैं । उन्होंने घोषणा की थी कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए नामांकन भरने का मौका जिस वर्ष आयेगा, उस वर्ष वह निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होंगे और इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के लिए पात्रता पूरी कर चुके होंगे । दीपक गुप्ता की उक्त घोषणा पर उनके कलीग गवर्नर्स के बीच तथा देश के प्रमुख नेताओं व पदाधिकारियों के बीच उनका जैसा मजाक बना, उसे देखते/सुनते हुए उन्होंने फिर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी की बात करना छोड़ दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहते हुए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की कोशिशों के जरिये दीपक गुप्ता लेकिन एक बार फिर अपने आप को मजाकिया चर्चाओं के केंद्र में ले आये हैं । दीपक गुप्ता की बदकिस्मती ही है कि वह अपने आप को जितना होशियार समझते हैं, और तरह तरह से जैसे जैसे 'दिखाने' की और साबित करने की कोशिश करते हैं - वैसे वैसे वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ रोटरी के नेताओं के बीच मजाक का पात्र बन जाते हैं, और कोई भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेता है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर वाले मामले में तो चलो मान लिया जा सकता है कि दीपक गुप्ता कुछ ज्यादा ऊँचा 'उड़' गए थे; लेकिन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर वाले मामले में उन्होंने अपनी 'उड़ान' को नीचा भी किया - लेकिन इस मामले में भी उन्हें कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है; खुद वह आलोक गुप्ता भी इस मामले में उन्हें गंभीरता से लेते नहीं नजर आ रहे हैं, वास्तव में जिनकी मदद करने के उद्देश्य से वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए 'तैयार' हो गए हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद को लेकर आलोक गुप्ता चूँकि असमंजस ने फँसे दिख रहे हैं, इसलिए दीपक गुप्ता ने उनकी असमंजसता को दूर करने के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की है । माना/समझा जा रहा है कि सीमित उपलब्धता, खेमेबाजी और व्यक्तिगत पसंद/नापसंद के चलते आलोक गुप्ता के सामने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए उचित चयन करना खासा मुश्किल बना हुआ है । ले दे कर बार बार मुकेश अरनेजा का नाम ही सामने आ रहा है । मुकेश अरनेजा हालाँकि कई बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बन चुके हैं, लेकिन लगता है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद की उनकी 'भूख' मिटी नहीं है । एक समस्या और है - मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर तो कई बार बन चुके हैं, लेकिन बेचारे को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी ठीक से करने का मौका नहीं मिल पाया है । एक बार वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाये जाने के बाद हटा दिए गए, एक बार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का कार्यकाल पूरा न हो पाने के कारण उनकी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी बीच में ही छिन गई । दीपक गुप्ता ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया तो है, लेकिन उन्हें किनारे बैठाया हुआ है; दीपक गुप्ता के तौर-तरीकों से मुकेश अरनेजा परेशान तो रहते हैं और कई बार अपमानित भी महसूस करते हैं - जिसके चलते कुछेक मौकों पर मुकेश अरनेजा कार्यक्रम बीच में ही छोड़ कर निकल गए हैं । मुकेश अरनेजा अपमान सह कर भी चुप इसलिए बने हुए हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी करने को लेकर उन्होंने ज्यादा चूँ-चपड़ की तो कहीं अमित जैन की तरह दीपक गुप्ता भी उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटा ही न दें ।
मुकेश अरनेजा को लगता है कि आलोक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष में उन्हें पूरी स्वतंत्रता और मनमाने तरीके से डिस्ट्रिक्ट ट्रेनरी करने का अवसर मिल जायेगा, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने के लिए आलोक गुप्ता पर डोरे डाले बताये/सुने जा रहे हैं । मुकेश अरनेजा की बदनामी और उनके रवैये को देखते हुए आलोक गुप्ता उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने से बचना चाहते हैं । मुकेश अरनेजा यह सुन/जान कर परेशान भी हुए कि आलोक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के लिए रूपक जैन से बात कर रहे हैं । रूपक जैन का पत्ता काटने के लिए मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता तक संदेश पहुँचवाए हैं कि रूपक जैन डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर पायेंगे और इसलिए रूपक जैन को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर उन्हें पछताना ही पड़ेगा । जेके गौड़ का नाम भी बीच बीच में आलोक गुप्ता के गवर्नर-वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में उछलता रहा है । जेके गौड़ के नाम पर आलोक गुप्ता को कोई बड़ा ऐतराज तो नहीं बताया जाता है, लेकिन उन्हें डर यह है कि उनके बाद यदि अशोक अग्रवाल ने भी जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया, तो गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में जेके गौड़ का रुतबा थोड़ा बढ़ जायेगा - और इसीलिए जेके गौड़ का नाम आलोक गुप्ता उठाते हैं और फिर छोड़ देते हैं । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के चयन में आलोक गुप्ता की असमंजसता को देखते हुए ही दीपक गुप्ता ने अपना नाम आगे बढ़ाया है । पिछले एक वर्ष में आलोक गुप्ता को कई मौकों पर दीपक गुप्ता पर निर्भर देखा गया है, जिसके चलते दीपक गुप्ता को लगता है कि आलोक गुप्ता उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद देने के लिए सहर्ष ही राजी हो जायेंगे । दीपक गुप्ता सचमुच डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बन पायेंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन लोगों के बीच उनका मजाक जरूर बन रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने से पहले दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने की तैयारी शुरू करके रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में एक नया तमाशा खड़ा कर दिया है ।